मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

माँ का दिवाली तोहफ़ा





माँ का दिवाली तोहफ़ा

- Anita Verma भिलाई छत्तीसगढ़ 
(यह मार्मिक कहानी अनीता वर्मा जी की फेसबुक से ली गई है  )
शालिनी आईना के सामने खड़ी होकर साड़ी के पल्लू अपने कंधे पर सलीके से जमाते हुए बोली, सूरज इस बार मैं दिवाली शॉपिंग के लिए बहुत लेट हो गयी हूँ, मिसेस तनेजा ने तो वृद्धाश्रम जाकर मिठाई और कपड़े बाँट कर, अपनी पोस्ट फेसबुक मे भी डाल दी, और, मिसेस वोहरा भी अनाथालय में गिफ्ट बांटती हुई अपनी फोटो इंस्टाग्राम में डाली है,.... सूरज तुम सुन भी रहे हो मै क्या बोल रही हूँ...... सूरज झुंझला कर बोला हां यार सुन रहा हूँ मैंने तुझे कब मना किया था, shopping के लिए, ड्राइवर को लेके चली जाती और तुम भी किसी आश्रम में दें आती जो तुम्हें देना है, और अपनी नेकी करती तस्वीरें डाल देतीं फेसबुक पर.... मुझे क्यूँ सुना रही हो.... शर्ट की बटन लगाते हुए सूरज बोला अब और कितनी देर लगाओगी तैयार होने में..... मुझे आज ही अपने स्टाफ को बोनस बांटने भी जाना है जल्दी करो मेरे पास" टाईम" नहीं है... कह कर रूम से बाहर निकल गया सूरज तभी बाहर लॉन मे बैठी "माँ" पर नजर पड़ी,,, कुछ सोचते हुए वापिस रूम में आया।....शालू तुमने माँ से भी पूछा कि उनको दिवाली पर क्या चाहिए.... शालिनी बोली नहीं पूछी अब उनको इस उम्र मे क्या चाहिए होगी यार, दो वक्त की रोटी और दो जोड़ी कपड़े इसमे पूछने वाली क्या बात है..... वो बात नहीं है शालू... "माँ पहली बार दिवाली पर हमारे घर में रुकी हुई है" वरना तो हर बार गाँव में ही रहती है तो... औपचारिकता के लिए ही पूछ लेती......... अरे इतना ही माँ पर प्यार उमड़ रहा है तो खुद क्यूँ नही पूछ लेते झल्लाकर चीखी थी शालू, और कंधे पर हेंड बैग लटकाते हुए तेजी से बाहर निकल गयी...... सूरज माँ के पास जाकर बोला माँ हम लोग दिवाली के खरीदारी के लिए बाजार जा रहे हैं आपको कुछ चाहिए तो.. माँ बीच में ही बोल पड़ी मुझे कुछ नही चाहिए बेटा.... सोच लो माँ अगर कुछ चाहिये तो बता दीजिए..... सूरज के बहुत जोर देने पर माँ बोली ठीक है तुम रुको मै लिख कर देती हूँ, तुम्हें और बहू को बहुत खरीदारी करनी है कहीं भूल ना जाओ कहकर, सूरज की माँ अपने कमरे में चली गई, कुछ देर बाद बाहर आई और लिस्ट सूरज को थमा दी।..
सूरज ड्राइविंग सीट पर बैठते हुए बोला, देखा शालू माँ को भी कुछ चाहिए था पर बोल नही रही थी मेरे जिद्द करने पर लिस्ट बना कर दी है,, "इंसान जब तक जिंदा रहता है, रोटी और कपड़े के अलावा भी बहुत कुछ चाहिये होता है" अच्छा बाबा ठीक है पर पहले मैं अपनी जरूरत की सारी सामान लूँगी बाद में आप अपनी माँ का लिस्ट देखते रहना कह कर कार से बाहर निकल गयी.... पूरी खरीदारी करने के बाद शालिनी बोली अब मैं बहुत थक गयी हूँ, मैं कार में Ac चालू करके बैठती हूँ आप माँ जी का सामान देख लो,,, अरे शालू तुम भी रुको फिर साथ चलते हैं मुझे भी जल्दी है,..... देखता हूँ माँ इस दिवाली क्या मंगायी है... कहकर माँ की लिखी पर्ची जेब से निकलता है, बाप रे इतनी लंबी लिस्ट पता नही क्या क्या मंगायी होगी जरूर अपने गाँव वाले छोटे बेटे के परिवार के लिए बहुत सारे सामान मंगायी होगी,....... और बनो "श्रवण कुमार" कहते हुए गुस्से से सुरज की ओर देखने लगी, पर ये क्या सूरज की आंखों में आंसू........ और लिस्ट पकड़े हुए हाथ सूखे पत्ते की तरह हिल रहा था... पूरा शरीर काँप रहा था,, शालिनी बहुत घबरा गयी क्या हुआ येसा क्या मांग ली है तुम्हारी माँ ने कह कर सूरज की हाथ से पर्ची झपट ली.... हैरान थी शालिनी भी इतनी बड़ी पर्ची में बस चंद शब्द ही लिखे थे..... पर्ची में लिखा था....
बेटा सूरज मुझे दिवाली पर तो क्या किसी भी अवसर पर कुछ नहीं चाहिए फिर भी तुम जिद्द कर रहे हो तो, और तुम्हारे "शहर की किसी दुकान में अगर मिल जाए तो फुर्सत के कुछ" पल "मेरे लिए लेते आना.... ढलती साँझ हुई अब मैं, सूरज मुझे गहराते अँधियारे से डर लगने लगा है, बहुत डर लगता है पल पल मेरी तरफ बढ़ रही मौत को देखकर.. जानती हूँ टाला नही जा सकता शाश्वत सत्‍य है,...... पर अकेले पन से बहुत घबराहट होती है सूरज ...... तो जब तक तुम्हारे घर पर हूँ कुछ पल बैठा कर मेरे पास कुछ देर के लिए ही सही बाँट लिया कर मेरा बुढ़ापा का अकेलापन... बिन दीप जलाए ही रौशन हो जाएगी मेरी जीवन की साँझ.. कितने साल हो गए बेटा तूझे स्पर्श नही की एक फिर से आ मेरी गोद में सर रख और मै ममता भीजे हथेली से सहलाऊँ तेरे सर को एक बार फिर से इतराए मेरा हृदय मेरे अपनों को करीब बहुत करीब पा कर...और मुस्कुरा कर मिलूं मौत के गले क्या पता अगले दिवाली तक रहूँ ना रहूँ, ....... पर्ची की आख़री लाइन पढ़ते पढ़ते शालिनी फफक, फफक कर रो पड़ी..........Anita Verma भिलाई छत्तीसगढ़

क्या देश में धर्मनिरपेक्षता का पैमाना सिर्फ हिंदू संत-महात्माओं तक ही सीमित है - प्रणब मुखर्जी



प्रणब मुखर्जी ने खोला शंकराचार्य पर अत्याचार का सच

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की किताब ने देश के आगे एक बड़े सवाल को फिर से खड़ा कर दिया है। सवाल ये कि कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती की गिरफ्तारी और उन पर लगाए गए बेहूदे आरोपों के पीछे कौन था ? नवंबर 2004 में कांग्रेस के सत्ता में आने के कुछ महीनों के अंदर ही दिवाली के मौके पर शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को हत्या के एक केस में गिरफ्तार करवाया गया था। जिस वक्त गिरफ्तारी की गई थी, तब वो 2500 साल से चली आ रही त्रिकाल पूजा की तैयारी कर रहे थे। गिरफ्तारी के बाद उन पर अश्लील सीडी देखने और छेड़खानी जैसे घिनौने आरोप भी लगाए गए थे। दरअसल प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब ‘द कोएलिशन इयर्स 1996-2012’ में इस घटना का जिक्र किया है। उन्होंने लिखा है कि “मैं इस गिरफ्तारी से बहुत नाराज था और कैबिनेट की बैठक में मैंने इस मसले को उठाया भी था। मैंने सवाल पूछा कि क्या देश में धर्मनिरपेक्षता का पैमाना सिर्फ हिंदू संत-महात्माओं तक ही सीमित है? क्या किसी राज्य की पुलिस किसी मुस्लिम मौलवी को ईद के मौके पर गिरफ्तार करने की हिम्मत दिखा सकती है?”



सोनिया गांधी पर गंभीर सवाल

अब तक मोटे तौर पर यह माना जाता रहा है कि कांची पीठ के शंकराचार्य को झूठे मामले में फंसाकर गिरफ्तार करवाने की पूरी साजिश उस वक्त मुख्यमंत्री रहीं जयललिता ने अपनी सहेली शशिकला के इशारे पर रची थी। उस वक्त इस सारी घटना के पीछे किसी जमीन सौदे को लेकर हुआ विवाद बताया गया था। लेकिन प्रणब मुखर्जी ने इस मामले को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रणब मुखर्जी ने किताब में लिखा है कि उन्होंने केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में गिरफ्तारी को लेकर कड़ा विरोध जताया। हालांकि उन्होंने यह नहीं लिखा कि इस पर उस वक्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह या कैबिनेट के दूसरे सदस्यों ने क्या प्रतिक्रिया दी। यह भी नहीं बताया कि सोनिया गांधी इस पर क्या सोचती थीं। लेकिन यह स्पष्ट है कि वरिष्ठ मंत्री के तौर पर जिस तरह से उन्होंने विरोध दर्ज कराया, उन्हें इस बात की जानकारी रही होगी कि गिरफ्तारी के पीछे केंद्र सरकार की सहमति ली गई है। विश्व हिंदू परिषद हमेशा से कहती रही है कि यह गिरफ्तारी सिर्फ जयललिता की मर्जी से नहीं, बल्कि सोनिया गांधी के इशारे पर हुई थी। ये वो दौर था जब सोनिया और जयललिता के बीच काफी करीबियां थीं।



ईसाई मिशनरियों के लिए रोड़ा

यह बात भी सामने आती रही है कि दक्षिण भारत में ईसाई धर्म को बेरोक-टोक फैलाने के लिए कांची के शंकराचार्य को जानबूझकर फंसाया गया था। जिस समय मीनाक्षीपुरम में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण की घटनाओं से पूरा हिंदू समाज सकते में था, तब कांची मठ ने सचल मंदिर बनाकर उन्हें दलित बस्तियों में भेजा और कहा कि अगर वो मंदिर तक नहीं आ सकते तो मंदिर उन तक पहुंचेगा। सामाजिक बराबरी के लिए जितनी कोशिश कांची मठ ने की उतनी शायद और किसी हिंदू संस्थान ने नहीं की होगी। यही कारण था कि वो ईसाई मिशनरियों को खटक रहे थे। उनकी गिरफ्तारी आंध्र प्रदेश से की गई थी, जहां पर कांग्रेस की सरकार थी। गिरफ्तारी के बाद उन्हें तमिलनाडु की वेल्लोर जेल में रखा गया। जहां उनके साथ टॉर्चर भी किया गया। इस बात की पुष्टि उस वक्त जेल से जुड़े लोगों ने भी की है। शायद ये प्रणब मुखर्जी के दबाव का ही नतीजा था कि बाद में मनमोहन सिंह ने इस मामले में जयललिता को चिट्ठी लिखकर चिंता जताई थी, लेकिन तब की सुप्रीम नेता सोनिया गांधी इस मसले पर चुप्पी साधे रहीं।

अपनी किताब में प्रणब मुखर्जी इस मसले को छूकर निकल गए हैं, लेकिन इसने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। उम्मीद की जा सकती है कि एक दिन यह सच्चाई सामने आएगी कि हिंदुओं के सबसे बड़े धर्म गुरु को गिरफ्तार करके उन्हें अपमानित करने की साजिश के पीछे असली गुनहगार कौन था। न्यूज़लूज़ पर हमने ऐसी कई रिपोर्ट दी हैं, जो इशारा करती हैं कि सोनिया गांधी का एकमात्र एजेंडा भारत में ईसाई धर्म को फैलाना रहा है।

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हमेशा से हिंदू विरोधी है कांग्रेस, 10 सबसे बड़े सबूत
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वकील और कांग्रेस के नेता कपिल सिब्बल ने दलील दी है जिस तरह से राम हिंदुओं के लिए आस्था का सवाल हैं उसी तरह तीन तलाक मुसलमानों की आस्था का मसला है। भगवान राम की तुलना तीन तलाक और हलाला जैसी घटिया परंपराओं से करना लोगों को बहुत चुभ रहा है। माना जा रहा है कि कपिल सिब्बल ने सोच-समझकर हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाने की नीयत से ये बयान दिया है। लेकिन कपिल सिब्बल का बयान इस लंबे सिलसिले की एक कड़ी भर है। हम आपको बताते हैं उन 10 बयानों और घटनाओं के बारे में जो इस बात का सबूत हैं कि कांग्रेस पार्टी हमेशा से हिंदू विरोध की नीति पर चली है और आज भी वो इसी नीति पर मजबूती के साथ कायम है।

1. वंदेमातरम से थी दिक्कत:- आजादी के बाद यह तय था कि वंदे मातरम राष्ट्रगान होगा। लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने इसका विरोध किया और कहा कि वंदे मातरम से मुसलमानों के दिल को ठेस पहुंचेगी। जबकि इससे पहले तक तमाम मुस्लिम नेता वंदे मातरम गाते थे। नेहरू ने ये रुख लेकर मुस्लिम कट्टरपंथियों को शह दे दी। जिसका नतीजा देश आज भी भुगत रहा है। आज तो स्थिति यह है कि वंदेमातरम को जगह-जगह अपमानित करने की कोशिश होती है। जहां भी इसका गायन होता है कट्टरपंथी मुसलमान बड़ी शान से बायकॉट करते हैं।

2. सोमनाथ मंदिर का विरोध: -गांधी और नेहरू ने हिंदुओं के सबसे अहम मंदिरों में से एक सोमनाथ मंदिर को दोबारा बनाने का विरोध किया था। गांधी ने तो बाकायदा एतराज जताते हुए कहा था कि सरकारी खजाने का पैसा मंदिर निर्माण में नहीं लगना चाहिए, जबकि इस समय तक हिंदू मंदिरों में दान की बड़ी रकम सरकारी खजाने में जमा होनी शुरू हो चुकी थी। जबकि सोमनाथ मंदिर के वक्त ही अगर बाबरी, काशी विश्वनाथ और मथुरा कृष्ण जन्मभूमि के विवादों को भी हल किया जा सकता था। लेकिन कांग्रेस ने ऐसा नहीं होने दिया।

3. बीएचयू में हिंदू शब्द से एतराज: - नेहरू और गांधी को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदू शब्द पर आपत्ति थी। दोनों चाहते थे कि इसे हटा दिया जाए। इसके लिए उन्होंने महामना मदनमोहन मालवीय पर दबाव भी बनाया था। जबकि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के नाम से दोनों को ही कोई एतराज नहीं था।

4. हज के लिए सब्सिडी शुरू की:-  ये कांग्रेस सरकार ही थी जिसने हज पर जाने वाले मुसलमानों को सब्सिडी देने की शुरुआत की। दुनिया के किसी दूसरे देश में ऐसी सब्सिडी नहीं दी जाती। जबकि कांग्रेस सरकार ने अमरनाथ यात्रा पर खास तौर पर टैक्स लगाया। इसके अलावा हिंदुओं की दूसरी धार्मिक यात्राओं के लिए भी बुनियादी ढांचा कभी विकसित नहीं होने दिया गया। अब मोदी सरकार के आने के बाद उत्तराखंड के चारों धाम को जोड़ने का काम शुरू हुआ है।
5. 26/11 के पीछे हिंदुओं का हाथ:- मुंबई हमले के बाद कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने इसके पीछे हिंदू संगठनों की साजिश का दावा किया था। दिग्विजय के इस बयान का पाकिस्तान ने खूब इस्तेमाल किया और आज भी जब इस हमले का जिक्र होता है तो पाकिस्तानी सरकार दिग्विजय के हवाले से यही साबित करती है कि हमले के पीछे आरएएस का हाथ है। दिग्विजय के इस बयान पर उनके खिलाफ कांग्रेस ने कभी कोई कार्रवाई या खंडन तक नहीं किया।
6. मंदिर जाने वाले छेड़खानी करते हैं:- राहुल गांधी ने कहा था कि जो लोग मंदिर जाते हैं वो लड़कियां छेड़ते हैं। यह बयान भी कांग्रेस और उसके शीर्ष नेतृत्व की हिंदू विरोधी सोच की निशानी थी। यह अलग बात कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारने के बाद खुद राहुल गांधी कई मंदिरों के चक्कर काट चुके हैं। हालांकि उनकी मां सोनिया अब भी ऐसा कुछ नहीं करती हैं जिससे यह मैसेज जाए कि उनका हिंदू धर्म से कोई नाता है।
7. राम सेतु पर हलफनामा: - 2007 में कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा था कि चूंकि राम, सीता, हनुमान और वाल्मिकी वगैरह काल्पनिक किरदार हैं इसलिए रामसेतु का कोई धार्मिक महत्व नहीं माना जा सकता है। जब बीजेपी ने इस मामले को जोरशोर से उठाया तब जाकर मनमोहन सरकार को पैर वापस खींचने पड़े। हालांकि बाद के दौर में भी कांग्रेस रामसेतु को तोड़ने के पक्ष में दिखती रही है।

8. हिंदू आतंकवाद शब्द गढ़ा: - इससे पहले हिंदू के साथ आतंकवाद शब्द कभी इस्तेमाल नहीं होता था। मालेगांव और समझौता ट्रेन धमाकों के बाद कांग्रेस सरकारों ने बहुत गहरी साजिश के तहत हिंदू संगठनों को इस धमाके में लपेटा और यह जताया कि देश में हिंदू आतंकवाद का खतरा मंडरा रहा है। जबकि ऐसा कुछ था ही नहीं। इस केस में जिन बेगुनाहों को गिरफ्तार किया गया वो इतने सालों तक जेल में रहने के बाद बेकसूर साबित हो रहे हैं।

9. राम की तुलना इस्लामी कुरीति से: - तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने इसकी तुलना भगवान राम से की। यह तय है कि कपिल सिब्बल ने यह बात अनजाने में नहीं, बल्कि बहुत सोच-समझकर कही है। उनकी नीयत भगवान राम का मज़ाक उड़ाने की है। कोर्ट में ये दलील देकर कांग्रेस ने मुसलमानों को खुश करने की कोशिश की है।

10. सेना में फूट डालने की कोशिश:- सोनिया गांधी के वक्त में भारतीय सेना को जाति और धर्म में बांटने की बड़ी कोशिश हुई थी। तब सच्चर कमेटी की सिफारिश के आधार पर सेना में मुसलमानों पर सर्वे की बात कही गई थी। बीजेपी के विरोध के बाद मामला दब गया, लेकिन इसे देश की सेनाओं को तोड़ने की गंभीर कोशिश के तौर पर आज भी देखा जाता है।

       यह बात भी ऐतिहासिक तथ्य है कि राजनीति में सोनिया गांधी के बढ़ते असर के साथ देश में ईसाई मिशनरियों की गतिविधियां भी बढ़ी हैं। पहले राजीव गांधी और बाद में मनमोहन सिंह के काल में ईसाई मिशनरियों को उन इलाकों में भी गतिविधियां चलाने की इजाज़त दी गई जो आदिवासी होने के कारण संरक्षित माने जाते हैं। नतीजा ये निकला कि बीते करीब 3 दशक में देश के तमाम आदिवासी इलाके ईसाई मिशनरियों के चंगुल में फंस चुके हैं। जबकि इसी दौरान हिंदू संगठनों के लिए इन इलाकों में काम करना लगभग नामुमकिन बना दिया गया।

शनिवार, 30 सितंबर 2017

कोटा महानगर की नगर रचना

 कोटा महानगर की  नगर रचना 

1 गणेश नगर
संतोषी नगर स्थित शिवाजी पार्क से संतोषी नगर चैराहा, केशवपुरा 7 सेक्टर, व्यायामशाला, विश्वकर्मा मंदिर, केशवपुरा सेक्टर 6, राधाकृष्ण मंदिर, शिशु भारती स्कूल की गली, चैथमाता मंदिर, हनुमान मंदिर विस्तार योजना, शिव ज्योति कान्वेंट स्कूल, तिलक स्कूल, टीवीएस सर्किल होते हुए संतोषी नगर में विसर्जन।

2 विवेकानंद नगर
मारूतिनन्दन हनुमान मंदिर से तलवण्डी प्रथम, तलवण्डी सर्किल, वर्धमान स्टेशनर्स, बरथूनिया के पीछे, मंशापूर्ण हनुमान मंदिर, खण्डेलवाल नर्सिंग होम रोड, इन्द्रविहार, तलवण्डी शिवज्योति स्कूल से मारूतिनन्दन हनुमान मंदिर तक

3 चाणक्य  नगर
तलवण्डी आजाद पार्क से सेक्टर 4, सेक्टर 5, सिटी सेंटर, एलेन कैरियर इन्स्टीट्यूट, जवाहर नगर, गायत्री पार्क, मां भारती स्कूल से आजाद पार्क

4 विश्वकर्मा नगर
राजकीय विद्यालय इन्द्रा विहार से एसएसएफ चैराहा, मेन रोड, गोचर साइकिल की गली, राधाकृष्ण मंदिर, कंसुआ, आदर्श विद्या मंदिर, कंसुआ मेन रोड, कंसुआ चैराहा, डीसीएम रोड सर्किल, मेन रोड, पावर हाऊस चैराहा से इन्द्रा गांधी नगर।

5 प्रताप नगर
सनातन मंदिर दादाबाड़ी, शास्त्री नगर, गुरू गोविंद सिंह पार्क, पंजाबी मैस, छोटा चैराहा,आनंन्द नमकीन की गली, रिद्धि सिद्धि किराना, दादाबाड़ी, हुकुम काका का मकान, मधु शर्मा का मकान, डाॅ. मनीष मेहता क्लिनिक, डिस्पेंसरी, पोस्ट हाऊस, बड़ा चैराहा, खण्डेलवाल मेडिकल की गली से शास्त्री नगर।

6 अम्बेडकर नगर
रामलीला मैदान बीड़ के बालाजी से बालाजी की बाउण्ड्री, यूआईटी काॅलोनी की गली, बालीता मेन रोड, पत्थर मण्डी, बालीता मेन रोड, बालाजी मेन गेट, आदर्श नगर, श्री निकेतन सकूल, हाइवे, बालीता मेन रोड, बालाजी मेन गेट, रामलीला मैदान पर समापन।
7 दीनदयाल नगर
राम तलाई मैदान, राष्ट्रदूत कार्यालय, प्रतिभा विकास, कैथूनीपोल चैराहा, दीनदयाल पार्क, गढ पैलेस, नीलकण्ठ महादेव, अफीम गोदाम, साबरमती पार्क, शिव मंदिर न्यू साबरमती, वेटरनरी हाॅस्पीटल, श्रीराम शाखा रामतलाई।

8 सूरज नगर
सूरज भवन बल्लभबाड़ी, पवन डेयरी, गुरूद्वारा, पुलिस चैकी, गुमानपुरा, मेन रोड, कोटड़ी चैराहा, बल्लभबाड़ी, सूरज भवन

9 गायत्री नगर
बालाजी की बगीची, पेट्रोल पम्प बोरखेड़ा, द्वारकाधीश मंदिर, मेन रोड, गोकुल काॅलोनी, नहर के किनारे, थेकड़ा रोड, सैनी रेस्टोरेंट की गली, पाश्र्वनाथ नगर, नहर, देवली अरब रोड, बालाजी की बगीची।

10 शिवाजी नगर
दरबारी कोठी से सुभाष काॅलोनी, जननायक गली, नन्दाजी की बाड़ी, सुभाष काॅलोनी, मेन रोड, खेरली फाटक, गणेश चैक गली, खेरली फाटक चैराहा, गांव के बीच बालाजी मंदिर, काली माता मंदिर, मंगलाश्रम, आदर्श काॅलोनी मेन रोड, तिलक काॅलोनी, माॅडल टाऊन, दरबारी बगीची।

11 तानाजी नगर
लोको राम मंदिर, देवनारायण मंदिर, काला तालाब, पूनम काॅलोनी, गली नम्बर 1, प्रताप संघ स्थान

12 संभाजी नगर
कृष्णा विद्यालय भदाना, सरकारी स्कूल भदाना, नहर, रिद्धि सिद्धि नगर, सरस्वती काॅलोनी, रोटेदा रोड, चैथमाता मंदिर, रंगपुर रोड, भदाना।

रोहिंगिया देश की सुरक्षा व एकात्मता पर संकट ही बनेंगे : परम पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहन राव भागवत


                                                                                                                                                                                                            



परम पूज्य सरसंघचालक जी डॉ. मोहन राव भागवत का संबोधन  

      इस वर्ष की विजयादशमी के पावन अवसर को संपन्न करने के लिये हम सब आज यहाँ पर एकत्रित हैं। यह वर्ष परमपूज्य पद्मभूषण कुषोक बकुला रिनपोछे ( His eminence Kushok Bakula Rinpoche ) की जन्मशती का वर्ष है। पूज्य कुषोक बकुला रिनपोछे तथागत बुद्ध के 16 अर्हतों में से बकुल के अवतार थे ऐसी पूरे हिमालय बौद्धों में मान्यता है। वर्तमान काल में आप लद्दाख के सर्वाधिक सम्मानित लामा थे। पूरे लद्दाख में शिक्षा का प्रसार, कुरीतियों का निवारण एवं समाज सुधार व राष्ट्रभाव जागरण में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। 1947 में जब कबाईलियों के वेश में पाकिस्तान की सेना ने जम्मूकश्मीर पर आक्रमण किया तो उनकी प्रेरणा से वहाँ के नौजवानों ने नुबरा ब्रिगेड का गठन कर आक्रमणकारियों को स्कर्दू से आगे बढने नहीं दिया। जम्मू कश्मीर की विधानसभा के सदस्य, राज्य सरकार में मंत्री व भारतीय संसद में लोकसभा सांसद के रूप में अखिल भारतीय दृष्टिकोण के साथ आपका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। आप 10 वर्ष मंगोलिया में भारत के राजदूत रहे। उस कालखंड में मंगोलिया में लगभग 80 वर्ष से चली आ रही कम्युनिस्ट शासन व्यवस्था के अंत के पश्चात् परंपरा से चली आ रही बौद्ध परंपरा को पुनर्जीवित करने के वहाँ के समाज के सफल प्रयासों में आपके महत्त्वपूर्ण योगदान के कारण आप वहाँ सर्वदा श्रद्धेय बन गये। उन्हें 2001 में मंगोलिया के नागरिक सम्मान Polar Star से सम्मानित किया गया। आध्यात्मिक अनुभवसंपदा, अविचल राष्ट्रनिष्ठा तथा निःस्वार्थ बुद्धि से सतत लोकहितरत रहने के कारण वे हम सब के श्रद्धेय तथा अनुकरणीय भी हैं। स्वामी विवेकानंद जी ने अपने शिकागो अभिभाषण में भारत की विश्वमानवता के प्रति जिस राष्ट्रीय दृष्टि की घोषणा की थी उसी का व्यक्तिगत व सार्वजनिक जीवन में प्रकटीकरण ही आचार्य बकुला जी के द्वारा किया गया। 

       समाज को राष्ट्रगौरव से परिपूर्ण पुरूषार्थ के लिये खड़ा करना है तो देश के चिंतकों को, बुद्धिधर्मियों को पहले अपने स्वयं के चित्त से उस विदेशी दृष्टि के विचारों को व संस्कारों को - जो गुलामी के कालखंडों में हमारे चित्त को व्याप्त कर उसे आत्महीन, भ्रमित व मलिन कर चुके हैं - हटाकर उनसे मुक्त होना ही होगा। जन्मगत युरोपीय संस्कारों से पूर्ण मुक्ति पाकर पूर्णतः भारतीय जनता के मानस, मूल्यों तथा संस्कारों के साथ एकात्म होने की भगिनी निवेदिता की साधना हम सब भारतवासियों को भी उस सनातन राष्ट्रीय दृष्टि व मूल्यों के साथ तन्मय होने की प्रेरणा देती रहती है।


         राष्ट्र कृत्रिम पद्धतियों से बनाये नहीं जाते। सत्ता आधारित Nation State की कल्पना से हमारी संस्कृति व लोक आधारित राष्ट्र की वस्तुस्थिति एकदम अलग व विशिष्ट है। हम सब की भाषाएँ, प्रान्त, पंथसंप्रदाय, जाति उपजाति, रीतिरिवाज, रहन-सहन की विविधताओं को एकसूत्र में पिरोकर जोड़ने वाली हमारी संस्कृति व उसके जनक, विश्वमानवता को कौटुंबिक दृष्टि से देखकर विकसित हुए सनातन जीवनमूल्य, हमारी ‘‘हमभावना’’ है। वह राष्ट्र को जोड़ने वाली जीवनदृष्टि, उस राष्ट्र की अपनी भूमि में समाज के सदियों तक साथ-साथ बिताऐ जीवन के सब प्रकार के अनुभवों से, मिलकर किये हुए पुरुषार्थ से, उसमें से प्राप्त जीवन सत्य के साक्षात्कार तथा सामूहिक समझदारी से बनती है। वही भावना समाज के व्यक्ति, परिवार तथा समाज के जीवन के सभी अंगों को अनुप्राणित करती हुई उनके क्रियाकलापों से स्पष्ट रुप में आविष्कृत होती है। तब ही अपने राष्ट्र का वास्तविक विकास होता है; उसे जगन्मान्यता प्राप्त होती है; विश्व जीवन में अपनी भूमिका का योग्य व समर्थ निर्वहन कर वह राष्ट्र अपना अपेक्षित सार्थक योगदान करता है। 

        पश्चिम सीमा पर पाकिस्तान की तथा उत्तर सीमा पर चीन की कारवाईयों के प्रति, ‘‘डोकलाम’’ जैसी घटनाओं में उजागर भारत का सीमाओं पर तथा अंतर्राष्ट्रीय राजनय में सशक्त व दृढ प्रतिभाव हमारे मन में स्वसामर्थ्य की आश्वासक अनुभूति जगाने के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय जगत में भी भारत की प्रतिमा को नयी सम्मानजनक उँचाई प्रदान करता है। 

         काश्मीर पर दृढ़ता का स्वागत, परंतु लद्दाख, जम्मू सहित संपूर्ण जम्मूकश्मीर राज्य में भेदभावरहित, पारदर्शी, स्वच्छ प्रशासन की अभी भी आवश्यकता है - डॉ. मोहन राव भागवत
कश्मीर घाटी की परिस्थिति को लेकर जिस दृढ़ता के साथ सीमा के उस पार से होने वाली आतंकियों की घुसपैठ व बिना कारण गोलीबारी का सामना किया जा रहा है, उसका स्वागत हो रहा है। सेना सहित सभी सुरक्षाबलों को अपने कर्तव्य को करने की छूट दी गई। अलगाववादी तत्वों की उकसाऊ कारवाई व प्रचार-प्रसार को, उनके अवैध आर्थिक स्रोतों को बंद करके तथा राष्ट्रविरोधी आतंकी शक्तियों से उनके संबंधों को उजागर कर तथा रोककर नियंत्रित किया जा रहा है। उसके सुपरिणाम भी वहाँ की परिस्थिति में प्राप्त हो रहे दिखते हैं।
          परंतु लद्दाख, जम्मू सहित संपूर्ण जम्मूकश्मीर राज्य में भेदभावरहित, पारदर्शी, स्वच्छ प्रशासन के द्वारा राज्य की जनता तक विकास के लाभ पहुँचाने का कार्य त्वरित व अधिक गति से हो; इसकी अभी भी आवश्यकता है। राज्य में विस्थापितों की समस्या का निदान अभी भी नहीं हुआ है। भारतभक्त व हिन्दू बने रहने के लिये ही कई दशकों से थोपी गई विस्थापित अवस्था को उनकी पीढ़ियाँ झेल रही हैं। भारत के नागरिक होते हुए भी राज्य की भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते मूल अधिकारों से वंचित रह जाने के कारण शिक्षा, आजीविका तथा प्रजातांत्रिक सुविधाओं से अभी भी दूर हैं, बहुत पिछड़ गये हैं। राज्य के ही स्थाई निवासी पाक अधिक्रांत जम्मू कश्मीर से 1947 में आये व कश्मीर घाटी से 1990 से विस्थापित बंधुओं की समस्याएँ भी पहले की तरह ही बनी हुई हैं। भारतभक्ति व स्वधर्मभक्ति पर अडिग रहते हुए हमारे यह सब बंधु बराबरी से अपने प्रजातांत्रिक कर्तव्यों का वहन तथा प्रजातांत्रिक अधिकारों का उपयोग करते हुए सुख, सम्मान व सुरक्षा के साथ सब देशवासियों के साथ रह सकें ऐसी परिस्थिति लानी होगी। यह न्याय कार्य संपन्न हो सके इसलिये आवश्यकतानुसार संवैधानिक प्रावधान करने होंगे, पुराने बदलने होंगे। तब ही जम्मू कश्मीर की प्रजा का शेष भारतीय प्रजा के मानस से सात्मीकरण तथा संपूर्ण राष्ट्र के विकास की प्रक्रिया में सहयोग व समभाग संभव होगा। 

   राज्य व केन्द्र शासन प्रशासनों के साथ समाज की भूमिका का भी अहम् महत्व – सरसंघचालक, रा.स्व.संघ

        राज्य के सीमावर्ती प्रदेशों में रहने वाले नागरिक सदैव सीमापार से चलने वाली गोलीबारी, आतंकी घुसपैठ आदि की छाया में वीरतापूर्वक डटे हैं, एक प्रकार से वे भी राष्ट्रविरोधी शक्तियों के साथ प्रत्यक्ष युद्धरत हैं। उनको सदैव इन स्थितियों में सतत असुरक्षा तथा जीवन व आजीविका की अस्तव्यस्तता को झेलते रहना पड़ता है। शासन व प्रशासन के द्वारा उनको पर्याप्त राहत आदि की व्यवस्था करवाने के साथ-साथ समाज के विभिन्न संगठनों को भी वहाँ संपर्क बनाकर, अपनी शक्ति में संभव हो उतनी तथा आवश्यकतानुसार सुयोग्य सेवाओं की व्यवस्था करनी चाहिये। इस दिशा में संघ के स्वयंसेवक पहले से ही वहाँ कार्य में लगे हैं। समाज का सोचना, करना बढ़ने से, प्रशासन व समाज के संयुक्त प्रयासों से व्यवस्था अधिक अच्छी हो सकती है। कश्मीर घाटी तथा लद्दाख के सुदूर सीमावर्ती क्षेत्रों में भी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार तथा संस्कार करने वाले कार्यों की और अधिक आवश्यकता प्रतीत होती है। समाज के सकारात्मक संपर्क, जागरण व प्रबोधन का कार्य, जनमानस को सुविहित आकार देने के लिये समाज के ही प्रयत्नों द्वारा संपन्न कराना इस परिस्थिति की अनिवार्य आवश्यकता है। वर्षों से योजनाबद्ध असत्य कुप्रचार के द्वारा मनों में घोले गये अलगाव व असंतोष के विष को दूर करने के लिये स्वाभाविक अकृत्रिम आत्मीयता का परिचय भी समाज के द्वारा किये गये ऐसे सकारात्मक कार्यों से दिलवाना होगा। राष्ट्रविरोधी शक्तियों के षड़यंत्रों को दृढतापूर्वक, सामर्थ्य के साथ निपटने की सुविचारित नीति के पीछे जब सम्पूर्ण समाज भी अपना बल समेटकर खडा होगा तब समस्या के सम्पूर्ण निराकरण का मार्ग प्रशस्त होगा।

       रोहिंगिया देश की सुरक्षा व एकात्मता पर संकट ही बनेंगे यह ध्यान में रखकर उनका विचार व निर्णय करना चाहिये - डॉ. मोहन राव भागवत 

भाषा, प्रान्त, पंथसंप्रदाय, समूहों की स्थानीय तथा समूहगत महत्वाकांक्षाओं को उभाडकर समाज में आपस में असंतोष, अलगाव, हिंसा, शत्रुता या द्वेष तथा संविधान कानून के प्रति अनादर का वातावरण बढाते हुए अराजकसदृश्य स्थिति उत्पन्न करने का खेल राष्ट्रविरोधी शक्तियाँ अन्य सीमावर्ती राज्यों में भी खेलती हुई दिखाई देती हैं। बंगाल व केरल की परिस्थितियाँ किसी से छिपी नहीं हैं। वहाँ के राज्यशासन व उनके द्वारा योजनापूर्वक राजनीतिक रंग चढाया हुआ प्रशासन इस गंभीर राष्ट्रीय संकट के प्रति केवल उदासीन ही नहीं, तो केवल अपने संकुचित राजनीतिक स्वार्थ के चलते उन राष्ट्रविरोधी शक्तियों की ही सहायता करते हुए दिखते हैं। राष्ट्रविरोधी गतिविधियों की यह सारी सूचनाएँ केन्द्र शासन व प्रशासन के पास पहुँचती हैं। इन सबको निष्फल करने का उनका भी प्रयास निश्चित रुप से चल रहा होगा। परंतु सीमापार से होने वाली गौ-तस्करी सहित सभी प्रकार की तस्करी चिन्ता का विषय बनी ही है। देश में पहले से ही अनधिकृत बंगलादेशी घुसपैठियों की समस्या है उस पर अब म्यांमार से खदेडे गये रोहिंगिया भी घुसे हैं तथा बहुत अधिक संख्या में घुसने को तैयार हैं। म्यांमार से लगातार चलती आयी उनकी अलगाववादी हिंसक व अपराधी गतिविधि तथा आतंकियों से सांठगाठ ही वहाँ से उनके खदेडे जाने का मुख्य कारण है। यहाँ पर वे केवल देश की सुरक्षा व एकात्मता पर संकट ही बनेंगे यह ध्यान में रखकर ही उनका विचार व निर्णय करना चाहिये। शासन की सोच भी वही दिख रही है। परंतु परिस्थिति की इस जटिलता में पूर्ण सफलता समाज के सहयोग के बिना मिलना संभव नहीं। इसलिये इन प्रदेशों में विद्यमान सज्जनशक्ति को निर्भयतापूर्वक आगे आना पड़ेगा। संगठित होकर अधिक मुखर व सक्रिय होते हुए समाज को भी निर्भय, सजग व प्रबुद्ध बनाना पड़ेगा।

         देश के सीमाओं की व देश की अंतर्गत सुरक्षा का व्यवस्थागत दायित्व सेना, अर्धसैनिक व पुलिस बलों का होता है। स्वतंत्रता के बाद अब तक उसको निभाने में पूरी जिम्मेवारी के साथ परिश्रम व त्यागपूर्वक वे लगे हैं। परंतु उनको पर्याप्त साधनसंपन्न करना, आपस में व देश के सूचना तंत्र के साथ तालमेल बिठाना, उनकी तथा उनके परिवारों के कल्याण की चिंता करना, युद्धसाधनों में देश की आत्मनिर्भरता, इन बलों में पर्याप्त मात्रा में नई भरती व प्रशिक्षण इसमें शासन के पहल की गति अधिक बढ़ानी पड़ेगी, इन बलों से शासन को सीधा संवाद बढ़ाना पड़ेगा। समाज से भी उनके प्रति अधिक आत्मीयता व सम्मान की व उनके परिवारों के देखभाल की अपेक्षा है। अपने राष्ट्रीय हित, आकाँक्षायें, आवश्यकतायें तथा परिवेश के संदर्भ में सुयोग्य नीतियों के साथ ही समाज भी राष्ट्र गौरव की स्पष्ट कल्पना से अनुप्राणित होकर, संगठित व गुणसंपन्न होकर चले इसकी आवश्यकता सर्वत्र दिखाई देती है। प्रशासन उन नीतियों के मर्म को समझकर उनके क्रियान्वयन को परिणाम तक पहुँचाने की मानसिकता में आये इसकी भी आवश्यकता है। 

      आर्थिक परिदृश्य - जनधन, मुद्रा, गैस सबसिडी, कृषि बीमा जैसी अनेक लोककल्याणकारी योजनाएँ
आर्थिक परिदृश्य भी हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचाता है। भ्रष्टाचार पर नियंत्रण, आर्थिक स्थिति में द्रुतगति से प्रगति तथा समाज के अंतिम व्यक्ति को लाभ पहुँचाने के लिये शासन के द्वारा जनधन, मुद्रा, गैस सबसिडी, कृषि बीमा जैसी अनेक लोककल्याणकारी योजनाएँ व कुछ साहसी निर्णय किये गये। परंतु अभी भी एकात्म व समग्र दृष्टि से देश की सभी विविधताओं व आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर उद्योग, व्यापार, कृषि, पर्यावरण को एकसाथ चलाने वाली, देश के बड़े उद्योगों से लेकर छोटे मध्यम व लघु उद्योगों को तक, खुदरा व्यापारियों, कृषकों व खेतीहर मजदूरों तक सबके हितों का ध्यान रखने वाली समन्वित नीति की आवश्यकता प्रतीत होती है। दुनिया के प्रचलन में वहाँ के दोषपूर्ण, कृत्रिम व समृद्धि का आभास उत्पन्न करने वाले तथा नैतिकता, पर्यावरण, रोजगार तथा स्वावलंबन का हृास करने वाली नीति व मानकों पर चलने की अनिवार्यता एक मर्यादा तक समझी जा सकती है। परंतु अर्थशास्त्र व नीति के पुनर्विचार की तथा प्रत्येक देश के अपने विशिष्ट अर्थव्यवस्था प्रतिमान की आवश्यकता तो अब सारा विश्व मानने लगा है। विश्व के अद्यतन अनुभव व अपने देश के धरातल की वास्तविकता दोनों का ध्यान रखते हुए, अपने देश का आदर्श, परंपरा, आकांक्षा, आवश्यकता व संसाधनों का एकत्र विचार करते हुए, घिसीपिटी आर्थिक मतवादों की लीक से बाहर आकर हमारे नीति आयोग व राज्यों के नीति सलाहकारों को सोचना पड़ेगा। समाज को भी दिन प्रतिदिन के उपयोग की वस्तुएँ तथा अन्य खरीददारी में स्वदेशी उत्पादन की खरीदी का आग्रह कठोरतापूर्वक रखना पड़ेगा। 


      स्वरोजगार के लिए लघु, मध्यम, कुटीर उद्योगों का, सहकार क्षेत्र का तथा कृषि और कृषि पर निर्भर कार्यों का बड़ा योगदान – सरसंघचालक 

    त्रुटिपूर्ण होकर भी सकल घरेलु उत्पाद का मानक अर्थव्यवस्था की सुदृढता व बढ़त की गति का मापक इस नाते प्रचलित है। खाली हाथों को काम मिलना, उसमें से आजीविका की न्यूनतम पर्याप्त व्यवस्था होना यानी रोजगार, वह भी अपने देश की मुख्य आवश्यकता मानी जाती है। इन दोनों में सबसे बड़ा योगदान हमारे लघु, मध्यम, कुटीर उद्योगों का, खुदरा व्यापार तथा स्वरोजगार के छोटे-छोटे नित्य चलने वाले अथवा तात्कालिक रूप से करने के काम करने वालों का, सहकार क्षेत्र का तथा कृषि और कृषि पर निर्भर कार्यों का है। जागतिक व्यापार के क्षेत्र में होने वाले उतार-चढाव तथा आर्थिक भूचालों से समय-समय पर वे हमारी सुरक्षा का भी कारण बने हैं। अभी भी सुदृढ़ बनी हुई हमारी परिवार व्यवस्था में घर की महिलाएँ भी घर बैठे छोटा-मोटा काम कर परिवार की आजीविका में योगदान करती रहती हैं। कभी-कभी इसको अनौपचारिक अर्थव्यवस्था भी कहा जाता है। आर्थिक भ्रष्टाचार का प्रमाण भी यहाँ न्यूनतम है। करोडों जनता को इनसे नौकरी अथवा स्वरोजगार प्राप्त होता है। समाज के अंतिम पंक्ति के व्यक्ति भी अधिकतर इसी में खडे़ मिलते हैं। अर्थव्यवस्था के सुधार और स्वच्छता के उपायों में यद्यपि सर्वत्र थोड़ी बहुत उथल-पुथल व अस्थिरता अपेक्षित है, इन क्षेत्रों में उसका परिणाम न्यूनतम हो व अंततोगत्वा इनका बल बढे़ यह ध्यान में रखना पड़ेगा। उनकी कौशल-गुणवत्ता बढ़े, उनके उत्पादनों की गुणवत्ता बढ़े, उनके लिये बाजार की सुविधाएँ उत्पन्न हों ऐसे अनेक कार्य, शासन, स्वयंसेवी संगठन तथा कुछ बडे़ उद्योग भी नैगमिक सामाजिक दायित्व (कार्पोरेट सोशल रिस्पान्सिबिलिटी) की कल्पना प्रचलित होने के पहले से हमारी परंपराओं के संस्कार के कारण कर रहे हैं। उन सबके प्रयासों का समन्वय भी विचार की एक दिशा हो सकती है। परंतु कुल मिलाकर हमारे आर्थिक चिन्तन में अर्थव्यवस्था उत्पादन को विकेन्द्रित, उपभोग को संयमित, रोजगार को परिवर्धित तथा मनुष्य को संस्कार केन्द्रित बनाने वाली हो तथा ऊर्जा की बचत करने वाली व पर्यावरण को सुरक्षित रखने वाली हो ऐसा सोचकर बढ़े बिना; देश में अंत्योदय तथा अंतर्राष्ट्रीय जगत में संतुलित, धारणक्षम व गतिमान अर्थव्यवस्था का उदाहरण बनने का हमारा स्वप्न साकार हो नहीं सकेगा। आज की अपनी आर्थिक स्थिति में से मार्ग निकालकर आगे बढ़ते समय यह बात हम सबके ध्यान में रहनी चाहिये। अनुसूचित जाति, जनजाति, घुमंतु जाति जैसे सुविधाओं से वंचित वर्गों के लिये केन्द्र व राज्यों में अनेक प्रावधान है। उनका लाभ इन वर्गों के सभी लोगों को मिले, शासन प्रशासन इस विषय में सजग व संवेदनशील होकर ध्यान दें इसमें शासन प्रशासन की तत्परता व सावधानी व समाज के भी सहानुभूतिपूर्ण सहयोग की आवश्यकता है।

        जैविक कृषि, गौआधारित पशुपालन सहित कृषि का प्रचलन बढ़ाना होगा - डॉ. मोहन राव भागवत
अपने देश में उद्योग, व्यापार व कृषि इनकी कभी प्रतिस्पर्धा नहीं रही, इनको परस्पर पूरक माना गया। इसलिये कृषि का क्षेत्र हमारे देश में बहुत बड़ा है तथा हमारा किसान स्वभाव से न केवल अपने परिवार का, अपितु सबका भरणपोषण करने वाला है। वह आज दुखी है। वह बाढ़, अकाल की, आयात निर्यात नीति की, फसल बढाने पर भारी कर्जे की व कम भाव की व फसल बर्बाद होने पर सब तरह से नुकसान की मार झेलकर निराश होने लगा है। एक भाव घर करता जा रहा है कि नयी पीढ़ी पढ़ेगी तो शहरों में जाकर बेरोजगार बन जायेगी, देहात में रहकर खेती में काम करना पसंद नहीं करेगी और यदि खेती में काम करती है तो देहातों के सुविधाशून्य जीवन में ही पड़ी रहेगी। परिणामस्वरुप गाँव खाली हो रहे हैं व शहरों पर दबाव बढ़ता चला जा रहा है। दोनों में विकास की समस्या, शहरों में अपराध की समस्या बढ़ रही है। फसल बीमा जैसी अच्छी योजनाएँ प्रवर्तित हुई हैं। मृदा परीक्षण, बाजार से संगणकों द्वारा सीधी खरीदी ऐसे उपयुक्त कदम भी बढाए जा रहे हैं। परंतु धरातल पर इसका अमल ठीक से हो इसलिये केन्द्र व राज्य शासनों के द्वारा अधिक चौकसी होनी चाहिये। कर्जमाफी जैसे कदम भी शासन की संवेदना व सद्भावना के परिचायक हैं परंतु केवल तात्कालिक राहत यह इस समस्या का उपाय नहीं है। नई तकनीकि व अप्रदूषणकारी परंपरागत तरीकों से कहीं से कर्जा लिये बिना किसान कम लागत में खेती कर सके यह रीति सीखनी पडे़गी। नई तकनीकि को भी उसके जमीन, पर्यावरण व मनुष्य के स्वास्थ्य पर कोई घातक, दीर्घकालिक दुष्परिणाम नहीं है इसकी व्यापक परीक्षा करने के बाद ही स्वीकार करना होगा। अपने परिवार को चलाकर अगले वर्ष की खेती कर सके इतना लागतव्यय पर लाभ देने वाला फसल का न्यूनतम मूल्य किसानों को मिलना चाहिये। फसल की समर्थनमूल्य पर खरीददारी शासन के द्वारा सुनिश्चित करनी पडे़गी। जैविक कृषि, मिश्र कृषि, गौआधारित पशुपालन सहित कृषि का प्रचलन बढ़ाना होगा। अन्न, जल व जमीन को विषयुक्त बनाने वाली, किसान का खर्चा बढाने वाली रासायनिक खेती धीरे-धीरे बंद करनी पड़ेगी।

      गौरक्षा व गौरक्षकों को हिंसक घटनाओं के साथ जोड़ना व सांप्रदायिक प्रश्न के नाते गौरक्षा पर प्रश्नचिन्ह लगाना ठीक नहीं

कम खर्चे में कृषि, जैविक कृषि की बात आती है तो स्वाभाविक ही वह बात भी सामने आती है कि अपने देश में बड़े प्रमाण में कृषक अल्पभूधारक तथा सिंचन व्यवस्थारहित भूमि में कृषि करने वाला है। उसके लिये तो कम व्यय में विषमुक्त खेती करने का सहजसुलभ उपाय गौआधारित खेती ही है। इसलिये गौरक्षा तथा गोसंवर्धन की गतिविधि संघ के स्वयंसेवक, भारतवर्ष के सभी संप्रदायों के संत, अनेक अन्य संगठन संस्थाएँ तथा व्यक्ति चलाते हैं। गौ अपनी सांस्कृतिक परंपरा में श्रद्धा का एक मानबिंदु है। गौरक्षा का अंतर्भाव अपने संविधान के मार्गदर्शक तत्वों में भी है, अनेक राज्यों में उसके लिये कानून विभिन्न राजनीतिक दलों के शासनों के काल में बन चुके हैं। देशी गाय के दूध में ए-2 (A-2) प्रकार का दूध जिनकी मनुष्य के पोषण के दृष्टि से श्रेष्ठतम उपयुक्तता तथा गोमय व गोमूत्र में पाए जाने वाली मनुष्य व पशुओं की चिकित्सा तथा भूमि सुधार में भी योगदान करने वाले, व हानिकारक प्रभावों से रहित खाद व कीट नियंत्रकों के निर्माण में उपयुक्तता अब विज्ञान सिद्ध है और उसके कई अनुसंधान भी चल रहे हैं। गोधन की तस्करी एक चिंताजनक समस्या बनकर सभी राज्यों में व विशेषतः बंगलादेश की सीमा पर उभरकर आयी है। ऐसी स्थिति में ये गतिविधियाँ और अधिक उपयुक्त हो जाती हैं। ये सभी गतिविधियाँ उनके सभी कार्यकर्ता कानून, संविधान की मर्यादा में रहकर करते है। हिंसा व अत्याचार के बहुचर्चित प्रकरणों में जाँच के बाद इन गतिविधियों से व कार्यकर्ताओं से उसका कोई संबंध नहीं यह भी सामने आया है। इधर के दिनों में उलटे गोरक्षा का प्रयत्न अहिंसक रीति से करने वाले कई कार्यकर्ताओं की हत्याएँ हुई है उसकी न कोई चर्चा है न कोई कार्यवाही। वस्तुस्थिति न जानते हुए अथवा उसकी उपेक्षा करते हुए गौरक्षा व गौरक्षकों को हिंसक घटनाओं के साथ जोड़ना व सांप्रदायिक प्रश्न के नाते गौरक्षा पर प्रश्नचिन्ह लगाना ठीक नहीं। अनेक मुस्लिम मतानुयायी सज्जनों के द्वारा भी गौरक्षा, गौपालन व गौशालाओं का उत्तम संचालन किया जाता है। गौरक्षा के विरोध में होने वाला कुत्सित प्रचार बिना कारण ही विभिन्न संप्रदायों के लोगों के मन पर तथा आपस में तनाव उत्पन्न करता है यह मैने कुछ मुस्लिम मतानुयायी बंधुओं से ही सुना है। ऐसे में हाल में सद्हेतु से दिये गये शासन में उच्चपदस्थों के बयान तथा सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी से, सात्विक भाव से संविधान कानून की मर्यादा का पालन कर चलने वाले गौरक्षकों को, गौपालकों को चिन्तित या विचलित होने की आवश्यकता नहीं। हिंसा में लिप्त आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के लिये वह चिन्ता का विषय होना चाहिये। हितसंबंधी शक्तियों द्वारा ऐसे वाक्यों के गलत अर्थ लगाकर सभी के दृष्टिकोणों को प्रभावित करने के चंगुल से शासन प्रशासन के लोग भी मुक्त रहे, कानून का अमल अपराधी को अवश्य दंड दें, सज्जनों को उसका उपद्रव न हों इसकी चिन्ता करें। गौरक्षा व गौसंवर्धन का वैध व पवित्र लोकोपकारी कार्य चलेगा, बढे़गा। यही इन परिस्थितियों का उत्तर भी होगा।

       जलसिंचन की व्यवस्था कृषि की सफलता का और एक प्रमुख कारण होता है। देश को प्रतिवर्ष प्राप्त होने वाली जलराशी के वैज्ञानिक व्यवस्थापन का हमें समग्रता से विचार करना पड़ेगा। विषमुक्त खेती व जलव्यवस्थापन में शासन के द्वारा जलसंचयन, जलसंरक्षण, नदी प्रवाहों का निर्मलीकरण व अविरलीकरण, वृक्षारोपण जैसी उपयुक्त पहलें हो चुकी हैं। समाज में अनेक व्यक्ति जलव्यवस्थापन जैसे विषय पर ‘‘असरकारी’’ पद्धति से काम कर रहे हैं। वृक्षों व जंगलों के विषयों पर भी Rally for Rivers जैसे अनेक उपक्रम हो रहे हैं। जंगलों की सुरक्षा व रखरखाव का दायित्व जंगलों में ही स्थित ग्रामवासियों को अधिकृत कर देने के स्तुत्य उपक्रम भी कहीं-कहीं प्रारम्भ हुआ यह अच्छा लक्षण है। इन सब प्रयासों के समन्वय से देश का पर्यावरण व कृषि कोई नया समृद्ध रूप लेकर उभरेगी यह आशा है।

     शिक्षा सत्य का ज्ञान कराने वाली, राष्ट्रीयता व राष्ट्रगौरव का बोध जागृत कराने के साथ-साथ शील, विनय, संवेदना, विवेक व दायित्वबोध जगाने वाली बने – सरसंघचालक

राष्ट्र के नवोत्थान में शासन, प्रशासन के द्वारा किये गये प्रयासों से अधिक भूमिका समाज के सामूहिक प्रयासों की होती है। इस दृष्टि से शिक्षा व्यवस्था महत्वपूर्ण है। भारतीय समाज के मानस में आत्महीनता का भाव व्याप्त हो इसलिये शिक्षा व्यवस्था की रचनाओं में, पाठ्यक्रम में व संचालन में अनेक अनिष्टकारी परिवर्तन विदेशी शासकों के द्वारा पारतंत्र्यकाल में लाये गये। उन सब प्रभावों से शिक्षा को मुक्त होना पड़ेगा। नई शिक्षानीति की रचना हमारे देश के सुदूर वनों में, ग्रामों में बसने वाले बालक-तरुण भी शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे उतनी सस्ती व सुलभ होनी पड़ेगी। उसके पाठ्यक्रम मतवादों के प्रभाव से मुक्त रहकर सत्य का ही ज्ञान कराने वाले, राष्ट्रीयता व राष्ट्रगौरव का बोध जागृत कराने वाले तथा प्रत्येक छात्र में आत्मविश्वास, उत्कृष्टता की चाह, जिज्ञासा, अध्ययन व परिश्रम की प्रवृत्ति जगाने के साथ-साथ शील, विनय, संवेदना, विवेक व दायित्वबोध जगाने वाले होने पड़ेंगे। शिक्षकों को छात्रों का आत्मीय बनकर स्वयं के उदाहरण से यह बोध कराना पड़ेगा। शिक्षा परिसरों का वातावरण तदनुकूल बनाना पड़ेगा। उचित प्रकार के भवन, उपकरण, वाचनालयों से व प्रयोगशालाओं से सुसज्जित होने पड़ेंगे। शिक्षा का बाजारीकरण समाप्त हो इसलिये शासकीय विद्यालयों, महाविद्यालयों को भी व्यवस्थित कर स्तरवान बनाना पड़ेगा। इस दिशा में समाज में भी अनेक सफल प्रयोग चल रहे है उनके अनुभवों का भी संज्ञान लेना पड़ेगा। शिक्षकों के योगक्षेम की उचित व्यवस्था करनी पड़ेगी। यह पुनरुक्ती इस आशा में, कि इन अपेक्षाओं को पूर्ण करने वाली बहुप्रतीक्षित, आमूलाग्र परिवर्तनकारी शिक्षानीति शीघ्र ही देश के सामने रखी जायेगी, मैं कर रहा हूँ।
परंतु क्या शिक्षा केवल विद्यालयीन शिक्षा होती है? क्या अपने स्वयं के घरपरिवार, अपने माता-पिता, घर के ज्येष्ठ, अड़ोस-पड़ोस के वरिष्ठों के कथनी व करनी से उनको आचरण के प्रामाणिकता व भद्रता की, संस्कारों से युक्त मनुष्यता के व्यवहार, करुणा व सहसंवेदना की सीख नहीं मिलती? क्या समाज में चलने वाले उत्सव, पर्वों सहित सभी उपक्रमों, अभियानों, आंदोलनों से मन, वचन, कर्म के संस्कार उन्हें नहीं मिलते? क्या माध्यमों के द्वारा, विशेषकर अंतरताने पर चलने वाले सूचना प्रसारण के द्वारा उनके चिन्तन व व्यवहार पर परिणाम नहीं होता? ब्लू व्हेल खेल इसका ही उदाहरण है। इस खेल के कुचक्रों से अबोध बालकों को निकालने के लिये शीघ्र ही परिवार, समाज एवं शासन द्वारा प्रभावी कदम उठाने होंगे। 


कुटुंब एवं समाज प्रबोधन के माध्यम से सद्संस्कार जागरण के कार्य को अधिक गति से बढ़ाना होगा - डॉ. मोहन राव भागवत 

पिछले कुछ समय से पारिवारिक संबंधों में बिखराव एवं सामाजिक विद्रूपताओं के अनेक चिंताजनक उदाहरण सामने आये हैं, ये घटनायें परिवारों एवं समाजजीवन में संस्कारों के स्खलन के ही संकेत हैं। अतः हमें कुटुंब एवं समाज प्रबोधन के माध्यम से सद्संस्कार जागरण के कार्य को अधिक गति से बढ़ाना होगा। हम सभी को अंतर्मुख होकर आत्मशोधन के द्वारा अपने व्यक्तिगत आचरण, पारिवारिक वातावरण तथा सामाजिक क्रियाकलापों की निर्वहण पद्धति को सुधारना पड़ेगा, क्योंकि स्वतंत्र विजिगीषु राष्ट्र में राष्ट्रीय भावना को पोषण देने वाला नागरिक व्यवहार ही होता है। इस संबंध में भगिनी निवेदिता ने कहा है -
The Samaj is the strength of the family: the home is behind the civic life and the civic life sustains the nationality. This is the formula of human combination. The essentials of all four elements we have among us, in our ancient Dharma. But we have allowed much of their consciousness to sleep. We have again to realize the meaning of our own treasure.
(‘‘ समाज कुटुंब की शक्ति है। नागरिक सभ्य जीवन की पृष्ठभूमि में गृहजीवन है और नागरिक सभ्य जीवन राष्ट्रीयता का पोषण करता है। मनुष्यों को जोड़ने वाला यह सूत्र है। इन चारों तत्वों के आवश्यक अंश को हमें हमारे प्राचीन धर्म ने दिया है, परंतु हमने उनके प्रति अपनी अधिकांश चेतना को सुला दिया है। हमें पुनः अपने स्वयं के संचित निधि के अर्थ को समझना पड़ेगा।’’)
इसलिये सद्यस्थिति में शासन की भारतीय मूल्याधारित नीति तथा प्रशासन द्वारा उसका प्रामाणिक, पारदर्शी व अचूक क्रियान्वयन जितना आवश्यक है उतना ही समाज का राष्ट्रहितैक बुद्धि से संघबद्ध, गुणवत्तायुक्त व अनुशासित होकर चलना इसकी आवश्यकता है। सनातन भारत युगानुकूल रुप लेकर अवतरित हो रहा है। समाज की सज्जनशक्ति अनेक क्षेत्रों में किये जाने वाले अपने उद्यम से उसके स्वागत के लिये सिद्ध हो रही है। आवश्यकता है समाज की सिद्धता की। 

परमवैभवसंपन्न विश्वगुरु भारत के पूर्ण स्वरूप का प्रकटन हम आने वाले कुछ ही दशकों में कर सकेंगे – सरसंघचालक 

1925 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसी कार्य में लगा है। अपने राष्ट्र के स्वरूप की स्पष्ट कल्पना जिनकी बुद्धि में है तथा वाणी उतनी ही स्पष्टता से निर्भयतापूर्वक उसको मुखरित करने का साहस रखती है, मन में अपनी इस पवित्र अखंड मातृभूमि की भक्ति तथा उसके प्रत्येक पुत्र के प्रति अपार आत्मीयता व संवेदना भरी है, अपने पराक्रमी व त्यागी पूर्वजों का गौरव जिनके अंतःकरण का आलंबन है व इस राष्ट्र को परमवैभवसंपन्न बनाने के लिये सर्वस्वत्याग ही जिनकी सामूहिकता की व कर्म की प्रेरणा है, ऐसे कार्यकर्ताओं का देशव्यापी समूह बनाने का यह कार्य अपने 93वे वर्ष में पदार्पण कर रहा है। कार्य निरंतर गति से बढ़ रहा है। राष्ट्रजीवन के सभी अंगों में संघ के स्वयंसेवक सक्रिय हैं व अपने संपर्क से संस्कारों का वातावरण बना रहे हैं। अभावग्रस्तों की सेवा में भी समाज के सभी को साथ लेकर एक लाख सत्तर हजार के लगभग सेवा के कार्य विभिन्न संगठनों व संस्थाओं के माध्यम से चला रहे हैं। समाज में इन सब कार्यों से बने वातावरण से ही समाजमन के भेद, स्वार्थ, आलस्य, आत्महीनता आदि त्रुटियाँ दूर होकर उसके संगठितता व गुणवत्ता से परिपूर्ण आचरण का चित्र खड़ा होगा। समाज को समरस व संगठित बनाने का यह एकमेवाद्वितीय उपाय है। उसमें आप सभी के सहभागिता की आवश्यकता है। स्व आधारित सही नीति, उत्तम क्रियान्वयन, सज्जनशक्ति का सहयोग व तदनुसार समाज का संगठित, उद्यम व एकरस आचरण इस चतुर्विध संयोग से परमवैभवसंपन्न विश्वगुरु भारत के पूर्ण स्वरूप का प्रकटन हम आने वाले कुछ ही दशकों में कर सकेंगे ऐसी अनुकूलता सर्वदूर विद्यमान है, अवसर को तत्परतापूर्वक पकड़ना हमारा कर्तव्य है।
कोटि-कोटि हाथों वाली माँ का अद्भुत आकार उठे
लख विश्वनयन विस्फार उठे
जगजननी का जयकार उठे।।
हिन्दुभूमि का कण-कण हो अब शक्ति का अवतार उठे
जलथल से अंबर से फिर हिन्दू की जय-जयकार उठे
जगजननी का जयकार उठे।।
।। भारत माता की जय ।।





संघ : श्रेष्ठ विचारों से ही पूरे विश्व में आदरणीय



विजयादशमी: संघ  के स्थापना दिवस पर

श्रेष्ठ विचारों से ही पूरे विश्व में आदरणीय हो गया संघ

प्रस्तुति - अरविन्द सिसौदिया


    भारत में ही नही सम्पूर्ण विश्व में संघ या आरएसएस के नाम से जाने जाने वाले संगठन की स्थापना सन् 1925 में विजयदशमी के शुभमुहूर्त पर नागपुर में हुई थी। कांग्रेस गरम दल अर्थात “ स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।“ की घोषणा करने वाले बाल गंगाधर तिलक के मार्ग का अनुसरण करने वाले सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के नाम से इसे स्थापित किया था।  हेडगेवार इससे पहले पराधीन भारत में चलने वाले भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय भाग लेने वाले प्रखर स्वतंत्रता सेनानी थे एवं संघ की स्थापना का मार्ग भी स्वतंत्रता संघर्ष के कार्यों को करते हुये उनके विचार में आया । उन्होने उस समय के प्रमुख क्रांतिकारियों के साथ और बाद में कांग्रेस ने गरमदल के नेताओं के मार्गदर्शन में निरपेक्ष भावना से तथा सर्वस्वार्पण की वृत्ति से अपनी सारी शक्ति लगाकर कार्य किया था, जेल भी गये थे। उनकी स्पष्ट एवं प्रखर शैली के कारण स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं और कार्यकर्ताओं के मन में हेडगेवारजी के प्रति आदर एवं श्रद्धा भाव था। डॉ. हेडगेवार जो कि इस संगठन के संस्थापक एवं प्रथम सरसंघचालक रहे , उनके पश्चात अन्य सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर अर्थात गुरूजी, मधुकर दत्रातेय देवरस, प्रो0 राजेन्द्र सिंह अर्थात रज्जू भईया, कुप्पाहल्ली सीतारमैया सुदर्शन और वर्तमान में सरसंघचालक  डॉ. मोहनराव मधुकर राव भागवत हैं।

    देश के लिये कार्य करते समय हेडगेवारजी ने अपने व्यक्तिगत जीवन का क्षण भर भी विचार नहीं किया। अपना पूर्ण कर्तव्य भारतमाता के चरणों में समर्पित किया था। इस पृष्ठभूमि में, विविध आंदोलनों के मूलभूत विचारों तथा कार्यपध्दतियों का, भारत की राजनीतिक परिस्थियों का तथा अपने राष्ट्रजीवन के वैचारिक अधिष्ठान का वस्तुनिष्ठ विचार करने के बाद हेडगेवार जी ने संघ स्थापना का निष्कर्ष निकाला, वही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के रूप में है । आज यह संगठन स्वंय विश्व का सबसे बडा स्वंयसेवी संगठन है। संघ के विचारों का अनुगमन करते हुये अन्य क्षेत्रों में भी समविचारी संगठन स्थापित हुये यथा राजनीति में भारतीय जनता पार्टी, विद्यार्थीयों में अखिल भारतीय विद्यार्थि परिषद, श्रमिकों में भारतीय मजदूर संघ, कृषि में भारतीय किसान संघ , शिक्षा में शिक्षक संघ, हिन्दू समाज में विश्व हिन्दू परिषद सहित सौ से भी अधिक क्षैत्रों में अन्य अनुगामी सक्रीय संगठन कार्यरत हे। इस संगठन ने अपने विचारों और कार्यपद्यति के आधार पर ही विकास किया और आज भारत का सर्वमान्य एवं आदरनीण संगठन है। इस संगठन भारत की राजनीती को भी प्रधानमंत्री के रूप में अटलबिहारी वाजपेयी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी , उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण अडवाणी,  उपराष्ट्रपति वेंकयै नायडु सहित अनेकों केन्द्रीय मंत्री मुख्यमंत्री, सांसद विधायक तथा राजनैतिक सामाजिक विभूतियों को देश सेवा के लिए दिये है। संघ ने देष को क्या दिया इस विषय पर तो अनेक पुस्तकें लिखी जा सकती हे। असल विषय है संघ के विचार क्या है। इन पर हम इस आलेख में सम्बद्ध होते है।

                                                                      समविचारी संगठन
   
        संघ की विचारधारा इतनी सरल और स्पष्ट है कि सामान्य व्यक्ति को भी सहजता से उसका आंकलन करना संभव है। सच यही है कि “ अपना देश , हिन्दू जीवन दृष्टि तथा हिन्दू जीवन पध्दति के आधार पर विकसित हुआ है। इसका हिन्दुत्वपूर्ण राष्ट्रजीवन विगत हजारों वर्षों से विद्यमान है। इस कारण यह प्राचीनतम राष्ट्र है। भारत को बदलने की कोई आवश्यकता नहीं है । बल्कि इसमें मौजूद अमर तत्वों को सामनें रखते हुये निरंतर एकात्म भाव से चलते रहने की आवश्यकता है।”

    हमारे इस प्राचीन राष्ट्र पर अनेक बार आक्रमण हुए। राजनैतिक दृष्टि से हम अनेंकों वार पराधीन भी हुये, लगातार तीन हजार वर्षों में शत्रुओं के अनेक आघात भारत को सहने पड़े। किन्तु इन सारे आक्रमणों और आघातों से जूझते हुए आज भी श्रीराम और श्रीकृष्ण का आदर्श अपने सामने रख कर जीवन बिताने वाला हिन्दु समाज भारत में अनंतकाल से है। अमीर, गरीब, वनवासी, गिरिजन क्षेत्रों में तथा ग्रामीण क्षेत्रों का अनपढ़ और निरक्षर व्यक्ति भी पीढ़ी दर पीढ़ी श्री राम और श्री कृष्ण की कथाएं जानता है। भारत माता, गौ माता और भागीरथी गंगा के प्रति उनके हृदय में अगाध श्रध्दा और भक्ति भाव रखता हैं। भारत वर्ष में यत्र-तत्र हजारों हजारों की संख्या में इनके मंदिर देखे जा सकते हैं। भारत में 18-20 भिन्न किंतु समृध्द भाषाएं प्रचलित हैं। उनकी लिपि भी अलग - अलग है किंतु प्रत्येक भाषा के श्रेष्ठ साहित्य में उपनिषद्, पुराण, रामायण, महाभारत आदि हैं, पुरुषोत्ताम श्री राम की कथाएं इन सभी भाषाओं के साहित्य में आपको पढ़ने को मिलेंगे।

   हिन्दु जीवन पद्यती में चार धामों की यात्रा करने से मनुष्य का जीवन सार्थक बनता है। इय यात्रा से वह अपने राष्ट्र की सांस्कृतिक विविधिता को जानता समझता ग्रहण करता हे। इसीलिए सांस्कृतिक एकता से अनुप्राणित भारत का समाज जीवन वेद-उपनिषद काल से आज तक अबाध गति से चलता आया है। हमारा यह अनादि हिंदू राष्ट्र है। यहां हिन्दू-जीवन प्रवाह को ही प्रधानता दी जानी चाहिए क्योंकि वही अपने राष्ट्र की वैचारिक और व्यावहारिक दृष्टि से रीढ़ है।

   भारत की उन्नति अथवा अवनति हिन्दू समाज-जीवन के सुदृढ़ अथवा दुर्बल व आत्मविस्मृत होने के कारण हुई। आज भी अपनी राष्ट्रजीवन की दुर्दशा हिन्दु समाज के असंगठित रहने तथा राष्ट्रीयता का बोध न होने के कारण ही हो रही है। हिन्दु समाज यदि सुसंगठित, बलशाली बना और अपने राष्ट्रजीवन के बोध से अनुप्राणित हुआ तो भारत की सारी समस्याएं हल करना सहज संभव हो सकेगा। हम विघटित और बंटे हुए रहे हैं, इसीलिए इस देश पर परकीय मुसलमान और अंग्रेज अपनी सत्ता प्रस्थापित कर सके। वास्तव में अपना शत्रु और कोई न होकर हिन्दू समाज की फूट ही अपने राष्ट्रजीवन की शत्रु हैं। अपनी पराधीनता के लिए तुर्क, मुगल अथवा अंग्रेजों को दोष देने का कोई कारण नहीं। हमने आज तक इस बात की चिन्ता नहीं की कि हमारा समाज सुदृढ़, शक्तिशाली, सुसंगठित, अनुशासित और राष्ट्रभावना से भरा हुआ हो। इसीलिए हम पर ये विपत्तियां और संकट आये।

   अतः हिन्दू समाज की फूट को दूर करने की चिंता करके, अपने हिन्दुसमाज को यदि हम बल सम्पन्न- सुसंगठित करें तो ये संकट सहजता से दूर किए जा सकेंगे। हम जानते हैं कि हिन्दू समाज पर हुए धार्मिक आक्रमण के कारण अपने ही कुछ बांधव मुसलमान और ईसाई बनने के लिए मजबूर हुए। इसीलिए आज की सर्व प्रमुख आवश्यकता हिन्दुसमाज को सुसंगठित बलशाली बनाने की है। संघ संस्थापक हेडगेवारजी के चिंतन का यही निष्कर्ष था और आज हम कह सकते हैं कि उनका निष्कर्ष सही था । समाज ने इसे स्विाकर किया है। इसी कारण संघ विश्व का सबसे बड़ा स्वंयसेवी संगठन है और भाजपा विश्व की सबसे अधिक सदस्य संख्यावाला राजनैतिक दल है।

“ अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी । “ 


     हिन्दु समाज को अपना राष्ट्रजीवन पहिचान कर उसे अपनाना चाहिए। भगवान श्री राम ने अपने श्रीमुख से ही कहा है कि माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी ऊपर है, स्वर्ग से भी श्रेष्ठ और श्रध्देय हैं। अपनी भारत माता के हम सब पुत्र हैं। इसीलिए हम सारे सगे बंधु हैं। इस आत्मीयता और बंधु-प्रेम की अनुभूति समाज के प्रत्येक व्यक्ति में जागृत कर निरपेक्ष बंधुभाव के स्नेह से उन्हें परस्पर जोड़ना ही संघ कार्य का भावनात्मक मौलिक विचार है।
     राष्ट्रीय एकात्मकता के सूत्र को उन तक पहुंचाने और उसे मजबूत बनाने की चिंता हमने आज तक नहीं की। यह हमारा अपना दोष है। इस दोष को निर्मूलन कर अपने ही प्रयत्नों ये हम यहां का राष्ट्रजीवन, एक राष्ट्रपुरुष के नाते विश्व में अजेय शक्ति के रूप में खड़ा करेंगे। संघ कार्य के मूल में ही यही प्रेरक और विधायक विचार रहा है।
    हेडगेवारजी ने भारत माता के प्रति अनन्य श्रध्दा को ही संघ कार्य के अधिष्ठान के रूप में स्वीकार किया। अपने हिन्दू समाज के प्रति आत्मीयता और स्नेहपूर्ण व्यवहार से हिन्दू समाज को सुसंगठित करने का कार्य हाथों में लिया। भारतमाता की पूजा का विचार, भारत की सर्वांगीण उन्नति के सूत्र के रूप में अपने पास है। हम प्रयत्नों की पराकाष्ठा कर अपने राष्ट्र को परम वैभव की स्थिति पर ले जायेंगे। इस विचार से समाज में स्फूर्ति पैदा हुई। भारत माता की आराधना का, संघ कार्य का आधारभूत विचार तो स्वामी विवेकानंद, योगी अरविंद तथा लोकमान्य बालगंगाधर तिलक जैसे महान नेताओं ने पहले ही प्रतिपादित किया था। अंतर केवल इतनी है कि संघ की अपनी कार्यपध्दति से हेडगेवारजी ने उस विचार को समाज जीवन में चरितार्थ कर दिखाया। आसेतुहिमाचल विशाल भारत में फैले इस हिन्दु समाज को सुसंगिठत करने की विशेष कार्यपध्दति हेडगेवारजी ने अपनी अद्भुत प्रतिभा से विकसित की। यद्यपि जून 1940 में उनके देहावसान हो गया, उनके जीवन का बहुत कम समय ही संघ को प्राप्त हुआ किन्तु परिश्रम की पराकाष्ठा से उन्होंने संघ की विशेष कार्यपध्दति के सर्वांगीण विकास की रूपरेखा कार्यान्वित कर दिखाई थी। इसी कारण संघ तेजी से उस मार्ग से लगातार बढ़ता गया और आज विश्व का सबसे बडा स्वंयसेवी संगठन ही नहीं बल्कि आदरणीय संगठन भी बन गया।


- अरविन्द सिसौदिया,
लेखक विश्लेषक एवं स्वंतंत्र पत्रकार
भाजपा जिला महामंत्री कोटा
बेकरी के सामनें , राधाकृष्ण मंदिर रोड़,
डडवाडा, कोटा जं0 2 राजस्थान ।
9509559131
9414180151

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

दिवाली पर ‘लक्ष्मी’ को चीन जाने से रोकें : क्षेत्र संघ प्रचारक दुर्गादास जी




भारतीय लोक कल्याण प्रन्यास की विचार गोष्ठी सम्पन्न

दिल में राष्ट्रभक्ति, हाथ में स्वदेशी वस्तु होना चाहिए

दिवाली पर ‘लक्ष्मी’ को चीन जाने से रोकें : क्षेत्र संघ प्रचारक दुर्गादास 




        कोटा | भारतीय लोक कल्याण प्रन्यास की ओर से मंगलवार को बल्लभबाड़ी स्थित सूरज भवन पर ‘‘चीन की आर्थिक चुनौतियां एवं समाधान’’ विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षैत्र प्रचारक दुर्गादास थे। वहीं अध्यक्षता कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जीएल केशवा ने की। महानगर संघचालक ताराचंद गोयल भी मंच पर मौजूद रहे। इस दौरान रमेश जोशी ने ‘ राष्ट्रभक्ति ले हृदय में हो खड़ा यदि देश सारा, संकटों पर मात करता राष्ट्र विजयी हो हमारा...’ की प्रस्तुति दी। शिवकुमार मिश्रा ने भूमिका रखी।

        कार्यक्रम को संबोधित करते हुए दुर्गादास जी ने कहा कि चीनी सामानों के कारण से हमारे उद्योग धंधों पर संकट खड़ा हो गया है। आज फिरोजाबाद का परंपरागत कांच का उद्योग संकट झेल रहा है। वहां पर गत 12-13 वर्षाें में 500 में से करीबन 300 उद्योग बंद हो गए हैं तथा शेष को रूग्ण घोषित कर दिया गया है। वहीं लुधियाना का विश्व प्रसिद्ध साइकल उद्योग जो कभी उत्पादक और निर्यातक के रूप में प्रतिष्टित था। वहां के 60 प्रतिशत उद्योग बंद हो चुके हैं। हमारा प्रसिद्ध टायर उद्योग चीनी टायरों के कारण से संकटपूर्ण स्थित में हैं। विशेषज्ञों के अनुसार आज प्रतिमाह डेढ लाख चीनी टायर भारत में आयात किए जा रहे हैं। जो हमारे लोगों की जिन्दगी के साथ भी खिलवाड़ है। उन्होंने कहा कि खिलौना उद्योग, दवा उद्योग, शिवाकाशी का पटाखा उद्योग, कम्बल उद्योग हर क्षैत्र में चीन के कारण से संकट के हालात बने हैं। जिनके कारण से सैंकड़ों लोगों को बेरोजगार होना पड़ा है।
         उन्होंने कहा कि पूर्व सरकारों की  गलत विदेश नीति और अदूरदर्शितापूर्ण राजनैतिक सोच के कारण से तिब्बत को हमने खो दिया। आज तिब्बत यदि भारत के पास होता तो चीन की सीमा हमसे दूर होती। चीन सदैव पाकिस्तानी आतंकियों का समर्थन करता रहा है। चीन से भारत का आयात 61 बिलियन डाॅलर का है, जबकि निर्यात केवल 9 बिलियन डाॅलर का ही है। सम्पूर्ण वैश्विक घाटे में से 44 प्रतिशत निर्यात घाटा केवल चीन से झेलना पड़ रहा है। ऐसे में जब दिवाली मनाएं तो यह ध्यान में रहे कि दिवाली पर ‘लक्ष्मी’ चीन न जाए। इसके लिए सरकार, उद्यमी और जनता के स्तर पर प्रयास करने चाहिए। सरकार ने 5 चीनी वस्तुओं को प्रतिबंधित किया है तथा 93 वस्तुओं पर एंटी डंपिंग टेक्स लगाया है। दिवाली पर केवल मिट्टी का दीया जलाकर ही हम अपने कुंभकार बंधु की मदद कर सकते हैं। हृदय में राष्ट्रभक्ति और हाथ में स्वदेशी वस्तु लेकर ही विभिन्न संकटों से पार पायी जा सकती है।

         अध्यक्षता कर रहे प्रो. जीएल केशवा ने कहा कि चीन के कारण से हर ओर संकट है। वह गोभी और चावल जैसे खाद्य पदार्थ भी नकली बनाने लगा है। इसका मुकाबला करने के लिए कौशल विकास योजनाओं के अलावा मानव संसाधन का सदुपयोग करना होगा। उन्होंने कहा कि बाबा रामदेव ने स्वदेशी अभियान के द्वारा लोगों को जागृत करने का कार्य किया है। बाबा रामदेव ने करौली में जमीन लेकर राजस्थानी गायों पर अनुसंधान शुरू किया है। बाबा रामदेव राजस्थान की गायों को 40 लीटर तक दूध देने लायक बनाने पर अनुसंधान कर रहे हैं।

राष्ट्रभक्ति ले हृदय में हो खड़ा यदि देश सारा
संकटों पर मात करता राष्ट्र विजयी हो हमारा...
















मंगलवार, 26 सितंबर 2017

गरबा : माँ की जीवन शक्ति के सौभाग्य की आराधना


एक नये जीवन को जन्म देने की शक्ति ताकत या व्यवस्था मात्र मां स्वरूपा स्त्री में ही हे। गरवा संम्भवतः उसी शक्ति को प्राप्त करने तथा उससे सम्पन्न बनें रहनें की उत्कट इच्छा की आराधना स्वरूप हे। 



माँ की गर्भ शक्ति की आराधना 

जानिए, सौभाग्य का प्रतीक गरबा का इतिहास

लाइफस्टाइल डेस्क। गरबा गुजरात का प्रसिद्ध लोकनृत्य है। यह नाम संस्कृत के गर्भ-द्वीप से है। गरबा सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है और अश्विन मास की नवरात्रों को गरबा नृत्योत्सव के रूप में मनाया जाता है। नवरात्रों की पहली रात्रि को गरबा की स्थापना होती है। फिर उसमें चार ज्योतियां प्रज्वलित की जाती हें। फिर उसके चारों ओर ताली बजाती फेरे लगाती हैं। आईये और जानते गरबा का इतिहास....

• यह परंपरागत रूप से एक बड़ी गर्भ दीप के आसपास प्रदर्शन किया गया था, जो कि मां के गर्भ में भ्रूण के रूप में जीवन का प्रतिनिधित्व करती है। यह नृत्य रूप देवी दुर्गा की दिव्यता और शक्ति की पूजा करता है।

• गरबा के प्रतीकात्मक रूप पर एक और दृष्टिकोण यह है, कि जैसे नृतक अपने पैरों से परिपत्र बनाते हैं। यह जीवन के चक्र का प्रतिनिधित्व करता है जो जीवन से मृत्यु और पुनर्जन्म तक चलता है। केवल देवी दुर्गा को छोड़कर, अपरिवर्तनीय और अजेय, यह परिपत्र के साथ अंगूठी के रूप में किया जाता है।

• गरबा के लिए भक्त रंगीन वेशभूषा पहनते है।

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गरवा नृत्य का इतिहास 


1 गरबा की धूम
नवरात्रि के दिनों में गरबा की धूम अलग ही रौनक जमाती है। बहुत से लोग तो ऐसे हैं जो नवरात्रि का इंतजार ही इसलिए करते हैं क्योंकि इस दौरान उन्हें गरबा खेलने, रंग-बिरंगे कपड़े पहनने की अवसर मिलेगा।

2 गुजरात
भारत का पश्चिमी प्रांत, गुजरात तो वैसे ही गरबे की धूम के लिए अपनी अलग पहचान रखता है लेकिन अब तो भारत समेत पूरे विश्व में नवरात्रि के पावन दिनों में गरबा खेला जाता है।

3 गरबा खेलने की शुरुआत
ये सब तो बहुत कॉमन बातें हैं जो अमूमन सभी लोग जानते हैं। गरबा खेलना और गरबे की रौनक का आनंद उठाना तो ठीक है लेकिन क्या आप जानते हैं कि गरबा खेलने की शुरुआत कहां से हुई और नवरात्रि के दिनों में ही इसे क्यों खेला जाता है?

4 गरबा और नवरात्रि का कनेक्शन
गरबा और नवरात्रि का कनेक्शन आज से कई वर्ष पुराना है। पहले इसे केवल गुजरात और राजस्थान जैसे पारंपरिक स्थानों पर ही खेला जाता था लेकिन धीरे-धीरे इसे पूरे भारत समेत विश्व के कई देशों ने स्वीकार कर लिया।

5 शाब्दिक अर्थ
गरबा के शाब्दिक अर्थ पर गौर करें तो यह गर्भ-दीप से बना है। नवरात्रि के पहले दिन छिद्रों से लैस एक मिट्टी के घड़े को स्थापित किया जाता है जिसके अंदर दीपक प्रज्वलित किया जाता है और साथ ही चांदी का एक सिक्का रखा जाता है। इस दीपक को दीपगर्भ कहा जाता है।

6 अपभ्रंश रूप
दीप गर्भ के स्थापित होने के बाद महिलाएं और युवतियां रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर मां शक्ति के समक्ष नृत्य कर उन्हें प्रसन्न करती हैं। गर्भ दीप स्त्री की सृजनशक्ति का प्रतीक है और गरबा इसी दीप गर्भ का अपभ्रंश रूप है।

7 डांडिया
गरबा नृत्य में महिलाएं ताली, चुटकी, डांडिया और मंजीरों का प्रयोग भी करती हैं। ताल देने के लिए महिलाएं दो या फिर चार के समूह में विभिन्न प्रकार से ताल देती हैं। इस दौरान देवी शक्ति और कृष्ण की रासलीला से संबंधित गीत गाए जाते हैं।

8 गरबा का आयोजन
गुजरात के लोगों का मानना है कि यह नृत्य मां अंबा को बहुत प्रिय है, इसलिए उन्हें प्रसन्न करने के लिए गरबा का आयोजन किया जाता है।

9 ईश्वर की आराधना
हिन्दू धर्म में ईश्वर की आराधना करने के लिए भजन और आरती की जाती है जिसे सिर्फ पढ़ा नहीं बल्कि संगीत और वाद्य यंत्रों के साथ गाया भी जाता है। भक्तिरस से परिपूर्ण गरबा भी मां अंबा की भक्ति का तालियों और सुरों से लयबद्ध एक माध्यम है।

10 महत्वपूर्ण कारण
आपने देखा होगा कि जब महिलाएं समूह बनाकर गरबा खेलती हैं तो वे तीन तालियों का प्रयोग करती हैं। इसके पीछे भी एक महत्वपूर्ण कारण विद्यमान है। क्या कभी आपने सोचा है गरबे में एक-दो नहीं वरन् तीन तालियों का ही प्रयोग क्यों होता है?

11 त्रिमूर्ति
ब्रह्मा, विष्णु, महेश, देवों की इस त्रिमूर्ति के आसपास ही पूरा ब्रह्मांड घूमता है। इन तीन देवों की कलाओं को एकत्र कर शक्ति का आह्वान किया जाता है।

12 गरबा
इन तीन तालियों का अर्थ अगली स्लाइड्स में उल्लिखित है।

13 पहली ताली
पहली ताली ब्रह्मा अर्थात इच्छा से संबंधित है। ब्रह्मा की इच्छा तरंगों को ब्रह्मांड के अंतर्गत जागृत किया जाता है। यह मनुष्य की भावनाओं और उसकी इच्छा का समर्थन करती है।

14 दूसरी ताली
दूसरी ताली के माध्यम से विष्णु रूपी कार्य तरंगें प्रत्यक्ष रूप से मनुष्य को शक्ति प्रदान करती हैं।

15 तीसरी ताली
जबकि तीसरी ताली शिव रूपी ज्ञान तरंगों के माध्यम से मनुष्य की इच्छा पूर्ति कर उसे फल प्रदान करती है। ताली की आवाज से तेज निर्मित होता है और इस तेज की सहायता से शक्ति स्वरूप मां अंबा जागृत होती है। ताली बजाकर इसी तेज रूपी मां अंबा की आराधना की जाती है।

16 राजनीति और साहित्य
गरबा का महत्व केवल धार्मिक ना होकर इसे राजनीति और साहित्य के साथ भी जोड़ा गया है।

17 गुजरात की शान
आजादी से पहले गुजरात में नवाबों का राज था, उस समय गरबा केवल गुजरात की ही शान हुआ करता था। परंतु आजादी के बाद जब गुजरात के लोग अपने प्रदेश से बाहर निकले और अन्य स्थानों को अपना निवास बनाया तब धीरे-धीरे गरबा अन्य स्थानों पर भी आयोजित किया जाने लगा।

18 मां अंबा
आजादी से पहले गरबा नृत्य में केवल शक्ति स्वरूपा मां अंबा को समर्पित गीत ही नहीं बल्कि देश भक्ति से ओतप्रोत और साम्राज्यवाद विरोधी गीत भी शामिल किए जाते थे।

19 आज का गरबा
आज का गरबा नृत्य पूरी तरह पारंपरिक रूप लिए हुए है जिसमें राजनीति का स्वरूप बिल्कुल न्यूनतम या कहें ना के बराबर है। लेकिन , आप इसके व्यवसायिक स्वरूप को भी देख सकते हैं।

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गरबा, भारत का सबसे बड़ा धार्मिक नृत्य उत्सव
गरबा, संसार का सबसे बड़ा सामूहिक धार्मिक नृत्य उत्सव है! यह गुजरात राज्य का नृत्य है, नवरात्र उत्सव यानी 9 दिनों तक देवी पांडालों और मंदिरों में गरबा नृत्य की धूम रहती है।

इन दिनों लोग मां शक्ति की आराधना करते हैं, ताकि उनके जीवन में सुख, समद्धि का समावेश हो इसलिए नवरात्र में वो गरबा खेलते हैं। गरबा नृत्य के दौरान मां अम्बे की मूर्ति को किसी बड़े मैदान में बीच में रखा जाता है। गरबा नृत्य कर रहे लोग इस मूर्ति के चारों तरफ घूमते हैं।

वो अपने हाथों में दो लकड़ी की डंडियां लिए होते हैं, जिन्हें एक बार घूमने के बाद टकराते हैं। इस दौरान भक्तिमय भजनों का सिलसिला जारी रहता है। गरबा नृत्य के दौरान लड़के और लड़कियां विशेष तरह के पारंपरिक कपड़े पहनते हैं।

गरबा सिर्फ नवरात्र में ही नहीं बल्कि गुजरात में शरद पूर्णिमा, वसंत पंचमी, होली और अन्य त्योहारों पर भी खेला जाता है। गरबा को गर्भदीप के नाम से भी जाना जाता है। वह इसलिए क्योंकि गरबा एक मां की मूर्ति के सामने जलते एक दीपक के चारों तरफ खेला जाता है।

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गरबा गुजरात, राजस्थान और मालवा प्रदेशों में प्रचलित एक लोकनृत्य जिसका मूल उद्गम गुजरात है। आजकल इसे आधुनिक नृत्यकला में स्थान प्राप्त हो गया है। इस रूप में उसका कुछ परिष्कार हुआ है फिर भी उसका लोकनृत्य का तत्व अक्षुण्ण है।

आरंभ में देवी के निकट सछिद्र घट में दीप ले जाने के क्रम में यह नृत्य होता था। इस प्रकार यह घट दीपगर्भ कहलाता था। वर्णलोप से यही शब्द गरबा बन गया। आजकल गुजरात में नवरात्रों के दिनों में लड़कियाँ कच्चे मिट्टी के सछिद्र घड़े को फूलपत्तियों से सजाकर उसके चारों ओर नृत्य करती हैं।

गरबा सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है और अश्विन मास की नवरात्रों को गरबा नृत्योत्सव के रूप में मनाया जाता है। नवरात्रों की पहली रात्रि को गरबा की स्थापना होती है। फिर उसमें चार ज्योतियाँ प्रज्वलित की जाती हें। फिर उसके चारों ओर ताली बजाती फेरे लगाती हैं।

गरबा नृत्य में ताली, चुटकी, खंजरी, डंडा, मंजीरा आदि का ताल देने के लिए प्रयोग होता हैं तथा स्त्रियाँ दो अथवा चार के समूह में मिलकर विभिन्न प्रकार से आवर्तन करती हैं और देवी के गीत अथवा कृष्णलीला संबंधी गीत गाती हैं। शाक्त-शैव समाज के ये गीत गरबा और वैष्णव अर्थात्‌ राधा कृष्ण के वर्णनवाले गीत गरबा कहे जाते हैं।

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और स्वयंसेवक


विश्व के सबसे बडे स्वंयसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की भारत में संघ की आवश्यता क्यों हुई और उसका स्वंयसेवक कौन है । इन प्रश्नों का संझिप्त उत्तर यह शब्द हैं।











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दृष्टी और दर्शन
दिनांक: 04-Jun-2017
प्राचीन काल से चलते आए अपने राष्ट्रजीवन पर यदि हम एक सरसरी नजर डालें तो हमें यह बोध होगा कि अपने समाज के धर्मप्रधान जीवन के कुछ संस्कार अनेक प्रकार की आपत्तियों के उपरांत भी अभी तक दिखार्इ देते हैं। यहाँ धर्म-परिपालन करनेवाले, प्रत्यक्ष अपने जीवन में उसका आचरण करनेवाले तपस्वी, त्यागी एवं ज्ञानी व्यक्ति एक अखंड परंपरा के रूप में उत्पन्न होते आए हैं। उन्हीं के कारण अपने राष्ट्र की वास्तविक रक्षा हुर्इ है और उन्हीं की प्रेरणा से राज्य-निर्माता भी उत्पन्न हुए हैं।

उस परंपरा को युगानुकूल बनाएँ
अत: हम लोगों को समझना चाहिए कि लौकिक दृष्टि से समाज को समर्थ, सुप्रतिष्ठित, सद्धर्माघिष्ठित बनाने में तभी सफल हो सकेंगे, जब उस प्राचीन परंपरा को हम लोग युगानुकूल बना, फिर से पुनरुज्जीवित कर पाएँगे। युगानुकूल कहने का यह कारण है कि प्रत्येक युग में वह परंपरा उचित रूप धारण करके खड़ी हुर्इ है। कभी केवल गिरि-कंदराओं में, अरण्यों में रहनेवाले तपस्वी हुए तो कभी योगी निकले, कभी यज्ञ-यागादि के द्वारा और कभी भगवद्-भजन करनेवाले भक्तों और संतों के द्वारा यह परंपरा अपने यहाँ चली है।

युगानुकूल सद्य: स्वरूप
आज के इस युग में जिस परिस्थिति में हम रहते हैं, ऐसे एक-एक, दो-दो, इधर-उधर बिखरे, पुनीत जीवन का आदर्श रखनेवाले उत्पन्न होकर  उनके द्वारा धर्म का ज्ञान, धर्म की प्रेरणा वितरित होने मात्र से काम नहीं होगा। आज के युग में तो राष्ट्र की रक्षा और पुन:स्थापना करने के लिए यह आवश्यक है कि धर्म के सभी प्रकार के सिद्धांतों को अंत:करण में सुव्यवस्थित ढंग से ग्रहण करते हुए अपना ऐहिक जीवन पुनीत बनाकर  चलनेवाले, और समाज को अपनी छत्र-छाया में लेकर चलने की क्षमता रखनेवाले असंख्य लोगों का सुव्यवस्थित और सुदृढ़ जीवन एक सच्चरित्र, पुनीत, धर्मश्रद्धा से परिपूरित शक्ति के रूप में प्रकट हो और वह शक्ति समाज में सर्वव्यापी बनकर खड़ी हो। यह आज के युग की आवश्यकता है।

कौन पूर्ण करेंगे
इस आवश्यकता को पूरा करनेवाला जो स्वयंस्फूर्त व्यक्ति होता है वही स्वयंसेवक होता है और ऐसे स्वयंसेवकों की संगठित शक्ति ही इस आवश्यकता को पूर्ण करेगी ऐसा संघ का विश्वास है।

स्वयंसेवक
दिनांक: 04-Jun-2017

स्वयंसेवक होने से बढ़कर गर्व और सम्मान की दूसरी बात हमारे लिए कोर्इ नहीं है। जब हम कहते हैं कि मैं एक साधारण स्वयंसेवक हूँ, तब इस दायित्व का बोध हमें अपने हदय में रखना चाहिए कि यह दायित्व बहुत बड़ा है। समाज भी हमारी ओर देख रहा है और समाज हमें एक स्वयंसेवक के रूप में देखता है। समाज की हमसे बड़ी-बड़ी अपेक्षाएँ रहें और उन अपेक्षाओं को पूर्ण करते हुए हम उनसे भी अधिक अच्छे प्रमाणित हों।
शाखा के विषय में नित्य करणीय बातें
संघ-शाखा के विषय में ध्यान रखें कि हमारी शाखा निम्नलिखित अपेक्षाओं को पूर्ण करनेवाली हो
* शाखा नित्य लगनी चाहिए।
* वह निश्चित समय पर लगनी चाहिए।
* शाखा में भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्यक्रम होने चाहिए।
* सब स्वयंसेवकों में परस्पर मेलजोल, स्नेह, प्रेम और शुद्धता का वातावरण हो।
* आपस में विचार-विनिमय, चर्चा आदि कर अपने अंत:करण में ध्येय  साक्षात्कार नित्य अधिकाधिक सुस्पष्ट और बलवान करते रहने की हमारे अंदर प्रेरणा व इच्छा रहे।
* सामूहिक रूप से नित्य अपनी प्रार्थना का उच्चारण गंभीरता, श्रद्धा तथा उसका भाव समझकर करें।
* हमारे परम पवित्र प्रतीक के रूप में जो अपना भगवा ध्वज है, उसे मिलकर नम्रतापूर्वक प्रणाम करें।
* ‘‘शाखा विकिर’ के अनंतर बैठकर आपस में बातचीत करें। कौन आया, कौन नहीं आया, इसकी पूछताछ करें।
ऐसी अपनी दैनिक शाखा के विषय में नित्य करणीय बातें हैं।
नित्य न्यूनतम कार्य
* यदि शाखा नियमित एवं समय पर प्रारंभ करनी है तो शाखा के निर्धारित समय से पर्याप्त पूर्व अपने निवास से निकलें और शाखा के समय से कम से कम दो मिनट पूर्व संघस्थान पर उपस्थित रहें।
* कोर्इ हमें बुलाने आएगा तब जाएँगे, ऐसी प्रतीक्षा करना आवश्यक नहीं है। बुलाने वाला अपना कर्तव्य करेगा, पर उसे कर्तव्य करने का अवसर देने के लिए घर पर ही बैठे रहें, यह उचित नहीं, इसका ध्यान रखें।
* विचार करें कि मैं संगठन करनेवाला मनुष्य हूँ, अकेलाराम नहीं। तब शाखा के लिए कुछ पहले निकलकर आसपास जो स्वयंसेवक रहते हों, उन्हें पुकारकर अपने साथ ले जाएँ। इसमें दायित्व का प्रश्‍न नहीं उठता। गटनायक अथवा गणशिक्षक बनने पर ही करने का काम नहीं है। सामान्य बात है कि जब भी हम किसी अच्छे काम के लिए जाते हैं, तो अपने साथ अपने मित्रों को बुलाकर ले जाते हैं। यह हमारे लिये स्वाभाविक कार्य होना चाहिए।
* संघस्थान पर सभी कार्यक्रम मन लगाकर, अनुशासनपूर्वक, नियमानुसार करें। उसमें कष्ट हो तो रुष्ट न हों। अपने कार्यक्रम कष्टकर होते हैं। कष्ट करने का अभ्यास कर बड़े-बड़े काम सहज करने की शक्ति बढ़ानी चाहिए। इसलिए उन्हें प्रयत्नपूर्वक करें। ये कार्यक्रम अंत:करण में निर्भयता, आत्मविश्‍वास, पराक्रम के भाव उत्पन्न कर सबको एक अनुशासन में गूँथकर, हम सब एक महती शक्ति के अंग हैं, इस अनुभूति को निरंतर जागृत रखने के लिए हैं। इसलिए उन कार्यक्रमों का उत्तम अभ्यास करें।
* विकिर होने पर तुरत-फुरत घर भागने की इच्छा नहीं होनी चाहिए। घर जाने अथवा और कहीं घूमने जाने की इच्छा होने का अभिप्राय होगा कि हम शाखा में अनिच्छा से बलात् आए थे। विकिर होते ही इस बला से मुक्त होने का अनुभव करते हैं। हम किसी के दबाव में शाखा नहीं आते। आना भी नहीं चाहिए। अत: बैठकर दो काम करें
        पहला यह कि शाखा में आनेवाले स्वयंसेवक बंधुओं में से कौन आए, कौन नहीं आए, इसकी जानकारी कर लें और जो नहीं आया हो, उसकी चिंता करें। वे क्यों नहीं आए इसका पता लगाने छोटी-छोटी टोलियों में सबके यहाँ जाएँ। कोर्इ कठिनार्इ हो तो उसका निवारण करने का प्रयास करें। कठिनार्इ न हो, तो अकारण शाखा से अनुपस्थित रहना ठीक नहीं यह बात उसे भली-भाँति समझाएँ।
      दूसरा यह कि नित्य अपने ध्येय का स्मरण करें। हिमालय से लेकर दक्षिणी महासागर के तट तक असंख्य पवित्र स्थान बिखरे हैं, उनका स्मरण करें। अनेक ऐतिहासिक स्थल हैं, प्रत्येक स्थल से किसी महापराक्रमी पुरुष की कुछ न कुछ विशेषता जुड़ी हुर्इ है, उसका स्मरण करें। उस महापुरुष की विशेषता में से जो गुण प्रकट होते हैं, उनका सब मिलकर स्मरण करें और उन्हें अपने में उतारने के प्रयास का निश्‍चय करें।
यह है हमारा नित्य का न्यूनतम कार्य। ‘‘साधारण स्वयंसेवक’ के रूप में इतना हमें करना ही चाहिए। इसके अतिरिक्त भी हमारे लिए कुछ कर्तव्य हैं।

पड़ोसी धर्म
अपना कुछ पड़ोस धर्म भी है। उस धर्म के अनुसार हमें यह जानकारी करनी चाहिए कि इन पड़ोसियों का जीवनयापन कैसे चलता है? उनकी कठिनाइयाँ, दु:ख क्या हैं? उनकी सहायता में तत्पर रहना पड़ोसी का धर्म है। पड़ोस में कोर्इ गड़बड़ हुर्इ, तो अपना दरवाजा अंदर से बंदकर बैठना पड़ोस-धर्म नहीं है। पड़ोस में कोर्इ अस्वस्थ हुआ तो अपने भाग्य से हुआ होगा, वह जिए चाहे मरे, ऐसा सोचकर उसकी अनदेखी करना पड़ोसी का धर्म नहीं है। इसमें पड़ोस-धर्म तो दूर की बात रही, मनुष्यता भी नहीं है। अत: पड़ोस-धर्म का पालन करने हेतु घर-घर में जाना, सबसे मिलना, बोलना, सबसे अत्यंत स्नेह और आत्मीयता के संबंध रखने का प्रयास करना और इस बात का भी कि सबके हृदय में हमारे बारे में ऐसी धारणा बने कि यह व्यक्ति विश्‍वास करने योग्य है, इसमें अपने प्रति निष्कपट, नि:स्वार्थ प्रेम है। यह अपना सच्चा मित्र है, अपने को कोर्इ कष्ट नहीं होने देगा, नित्य अपना साथ देगा और जरूरत पड़ने पर सहायता के लिए दौड़ा आएगा। इस विश्‍वास के बल पर सब पड़ोसी मानो एक बड़ा परिवार बने हैं, ऐसा हम प्रयास करें।


बुधवार, 20 सितंबर 2017

नरेंद्र मोदी की आज भारत को जरूरत है : रतन टाटा






आज भारत को है नरेंद्र मोदी की जरूरत: रतन टाटा

News18Hindi
Updated: September 20, 2017, 6:59

टाटा संस के चेयरमैन एमिरेटस रतन टाटा ने नेटवर्क 18 समूह के बिजनेस चैनल सीएनबीसी टीवी18 के साथ एक खास इंटरव्‍यू में कहा कि आज भारत को नरेंद्र मोदी की जरूरत है. मोदी ने न्यू इंडिया के लिए एक विजन क्रिएट किया है और नए भारत के निर्माण के लिए वे सभी तरह के इनोवेटिव कदम उठा रहे हैं. टाटा ने कहा कि लोगों को राजनीतिक पूर्वाग्रह से ऊपर उठकर देश के निर्माण के लिए काम करना चाहिए.

देश निर्माण में युवा दें सहयोग
टाटा ने कहा कि लोग भले ही मोदी से असहमत हो सकते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि अगर भारत को इस समय किसी चीज की जरूरत है तो वह है- नरेंद्र मोदी. नए भारत के निर्माण के लिए सभी को मोदी के विजन के साथ होना चाहिए. उन्होंने उम्मीद जताई कि देश के युवा नए भारत के निर्माण में उनकी मदद करेंगे.

समूह की अधिकांश कमाई परोपकार से जुड़े कार्यों पर खर्च होती है. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ की. उन्होंने कहा कि मैं नरेंद्र मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री के समय से जानता हूं. पश्चिम बंगाल के सिंगुर से फैक्ट्री को गुजरात ले जाने के क्रम में उन्होंने हमारी जिस तरह से मदद की, वह मैं नहीं भूल सकता हूं. मोदी ने हमें गुजरात बुलाया और महज तीन दिनों में वादा के अनुसार फैक्ट्री के लिए जरूरी जमीन दे दी. सरकारी स्तर पर इस तरह का निर्णय भारत में नहीं लिया जाता है.

आने वाले 10 साल में होंगे बड़े बदलाव
रतन टाटा ने कहा कि टाटा ग्रुप चंद्रा के रूप में बेहद योग्य हाथों में है. वैसे बिजनेस में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं. ग्रुप ने घाटे में चल रही कई कंपनियों को खरीदा और आगे भी हम ऐसा करते रहेंगे. आने वाले 10 साल में शायद यह ग्रुप कुछ अलग दिखेगा. हम नए बिजनेस में उतरेंगे, नई कंपनियां बनाएंगे, हालांकि अपने मूल्यों से कभी समझौता नहीं करेंगे.

नैतिक मूल्यों से बची है कंपनी
टाटा ने कहा कि कंपनी 150 साल पूरे करने जा रही है. ऐसा नैतिक मूल्यों के कारण ही संभव हुआ है. अक्सर इतने लंबे समय में कंपनियां बिखर जाती है. टाटा ग्रुप को बचाने और आगे बढ़ाने के लिए हम कुछ भी करेंगे. अगले 30-50 साल में कुछ बदलाव आ सकते हैं. नैतिक मूल्य हमेशा बरकरार रहने की उम्मीद है. ग्रुप की ज्यादातर कमाई परोपकार पर खर्च होती है. संस्थापकों और नेताओं की जेब में नहीं कुछ नहीं जाता. ऐसा करना बेहद संतोषजनक है.

सिंगुर में हुआ था भारी विरोध
गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल के सिंगुर में टाटा की नैनो फैक्ट्री के विरोध में ममता बनर्जी की पार्टी की अगुवाई में हुए हिंसात्मक आंदोलन के बाद कंपनी को अपनी फैक्टरी के लिए जल्‍द कोई जमीन चाहिए थी.

नए भारत का निर्माण कर रहे हैं मोदी
टाटा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नए भारत का निर्माण कर रहे हैं. इसके लिए उनमें जरूरी योग्यता और प्रतिबद्धता है और वे देश को नया स्वरूप देने के लिए इनोवेटिव पहल कर रहे हैं. हमें उनका सहयोग करना चाहिए. टाटा ने कहा कि उन्हें मोदी के नेतृत्व में पूरी आस्‍था है.

तेजी से फैसला लेते हैं मोदी
टाटा ने दिल खोलकर चैनल के साथ बातचीत की. उन्होंने टाटा ग्रुप, इकोनॉमी और राजनीति से जुड़े सभी मुद्दों पर अपने मन की बात रखी. इंटरव्यू में प्रधानमंत्री मोदी की जमकर तारीफ की और कहा कि उन्हें मोदी से बहुत उम्मीदें हैं. मोदी तेजी से फैसला लेना जानते हैं.

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

प्रधानमंत्री श्री मोदी के नेतृत्व में : पॉलिटिक्स ऑफ़ परफॉरमेंस के एक नए युग की शुरुआत - अमित शाह 


भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह द्वारा रांची, झारखंड में पंडित दीनदयाल उपाध्याय सम्पूर्ण वांड्मय का लोकार्पण और प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन में दिए गए उद्बोधन के मुख्य बिंदु

शुक्रवार, 15 सितम्बर 2017


भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह द्वारा रांची, झारखंड में पंडित दीनदयाल उपाध्याय सम्पूर्ण वांड्मय का लोकार्पण और प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन में दिए गए उद्बोधन के मुख्य बिंदु
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हमने रिफॉर्म्स से भी दो कदम आगे बढ़ कर ट्रांसफॉर्मेशन अर्थात सम्पूर्ण परिवर्तन की दिशा में देश को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है ***********
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने देश से परिवारवाद, जातिवाद और तुष्टीकरण की राजनीति को ख़त्म करके पॉलिटिक्स ऑफ़ परफॉरमेंस के एक नए युग की शुरुआत की है *********** 13वें वित्त आयोग में कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार ने झारखंड को शेयर इन सेन्ट्रल टैक्स में 42,847 करोड़ रुपये राशि आवंटित की जबकि 14वें वित्त आयोग में मोदी सरकार ने झारखंड के 1,24,408 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की है जो 13वें वित्त आयोग के मुकाबले लगभग तीन गुनी अधिक है ***********
शेयर इन सेन्ट्रल टैक्स, ग्रांट-इन ऐड, लोकल बॉडीज ग्रांट और स्टेट डिजास्टर रिस्पांस फंड आदि के फंड को मिला दिया जाए तो मोदी सरकार ने कांग्रेस की यूपीए सरकार के 55,253 करोड़ की तुलना में झारखंड को 1,43,345 करोड़ रुपये दिया है ***********
रघुबर दास जी के नेतृत्व में झारखंड की भाजपा सरकार राज्य के विकास के लिए अहर्निश काम कर रही है ***********
झारखंड के विकास की गति पूरी दुनिया देख रही है। भारतीय जनता पार्टी ने झारखंड में स्थिरता एवं पारदर्शिता के साथ-साथ एक निर्णायक सरकार देने का काम किया है ***********
गरीबी उन्मूलन, जीडीपी ग्रोथ, स्वास्थ्य, साक्षरता, ग्रामीण विकास, कृषि विकास, बिजली उत्पादन एवं वितरण और बच्चों एवं माताओं की मृत्यु दर में कमी - इन सभी क्षेत्रों में भाजपा की सरकारें पहले स्थान पर हैं ***********
देश के जिन-जिन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं, वहां विकास तेज गति से आगे बढ़ा है। हमने विकास को विकास की पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाया है ***********
भारतीय जनता पार्टी में नेता अपनी निष्ठा, देश के लिए काम करने की लगन, परिश्रम, मेधा और परफॉरमेंस के आधार पर बनते हैं, यही कारण है कि यहाँ एक बूथ कार्यकर्ता भी पार्टी का अध्यक्ष बन सकता है और एक गरीब का बेटा व पार्टी का एक छोटा सा कार्यकर्ता देश का प्रधानमंत्री ***********
आज देश में लगभग 1650 छोटी-बड़ी पार्टियों में से सिर्फ और सिर्फ भारतीय जनता पार्टी ही एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसके अंदर आतंरिक लोकतंत्र बचा हुआ है ***********
भारतीय जनता पार्टी की स्थापना सत्ता प्राप्त करने के लिए नहीं बल्कि राष्ट्र के भविष्य को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से हुई थी, भारत को फिर से विश्वगुरु के पद पर प्रतिष्ठित कर देश के खोये हुए गौरव को पुनर्स्थापित करने के लिए हुई थी ***********
भारतीय जनता पार्टी ओबीसी कमीशन को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए कटिबद्ध है, कुछ ही समय में हम इस विधेयक को राज्य सभा से पारित करा कर ओबीसी कमीशन को संवैधानिक मान्यता देने का कार्य पूरा कर लेंगे ***********
दुनिया में विरले ही ऐसे होते हैं जो देश एवं समाज के लिए अनवरत काम करते रहने के वाबजूद किसी प्रकार के यश की कामना नहीं रखते और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी एक ऐसे ही व्यक्तित्व थे *********** भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष के नाते मेरे सम्पूर्ण जीवन और आने वाले जीवन में भी सबसे बड़े गौरव की बात यह है कि मैं उस पार्टी का अध्यक्ष हूँ जिस पार्टी के अध्यक्ष कभी पंडित दीनदयाल उपाध्याय थे ***********
पंडित दीनदयाल उपाध्याय सम्पूर्ण वांड्मय देश की राजनीति को आगे ले जाने और राजनीति को निर्मल रखने में एक बहुत बड़ा साधन सिद्ध होने वाला है ***********
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह ने आज रिप्स ऑडिटोरियम, रांची (झारखंड) में पंडित दीनदयाल उपाध्याय सम्पूर्ण वांड्मय का लोकार्पण किया. उन्होंने इस अवसर पर आयोजित प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन को भी संबोधित किया और भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा, सिद्धांतों और कार्यपद्धति पर विस्तार से चर्चा की। विदित हो कि श्री शाह देश के सभी राज्यों में कुल 110 दिनों के अपने विस्तृत प्रवास कार्यक्रम के तहत तीन दिवसीय दौरे पर अभी झारखंड में हैं। इससे पहले रांची पहुँचने पर राष्ट्रीय अध्यक्ष जी का भव्य स्वागत किया गया। तत्पपश्चात् श्री शाह ने बिरसा चौक पर मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए अंग्रेजों से लोहा लेने वाले शौर्य और पराक्रम के परिचायक "भगवान बिरसा मुंडा जी" को श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके पश्चात् उन्होंने 15 सिंतबर से 02 अक्टूबर तक चलने वाले "स्वच्छता पखवाड़ा" अभियान का शुभारंभ किया और वहां उपस्थित लोगों के साथ स्वच्छता की शपथ भी ली। उन्होंने प्रदेश भाजपा कार्यालय, राँची में परम श्रद्धेय डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें पुष्पांजलि अर्पित की। भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि दुनिया में विरले ही ऐसे होते हैं जो देश एवं समाज के लिए अनवरत काम करते रहने के वाबजूद किसी प्रकार के यश की कामना नहीं रखते और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी एक ऐसे ही व्यक्तित्व थे। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में रहते हुए अपने लिए कुछ भी किये बगैर पंडित दीनदयाल जी ने हमेशा देश के लिए सोचा। उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन के आधार पर देश की राजनीति कैसे चल सकती है, लोकतंत्र को हमारे मूल विचारों के साथ कैसे समाहित किया जा सकता है, एक राजनीतिक दल को राष्ट्र के उत्थान का माध्यम कैसे बनाया जा सकता है और संगठन के आधार पर एक राजनीतिक दल को कैसे चलाया जा सकता है - इसे अल्प समय में ही पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने चरितार्थ करके दिखाया। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष के नाते मेरे सम्पूर्ण जीवन और आने वाले जीवन में भी सबसे बड़े गौरव की बात यह है कि मैं उस पार्टी का अध्यक्ष हूँ जिस पार्टी के अध्यक्ष कभी पंडित दीनदयाल उपाध्याय थे। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार और देश की 18 राज्य सरकारों ने सरकार के स्तर पर और भारतीय जनता पार्टी ने संगठन स्तर पर इस वर्ष को पंडित दीनदयाल उपाध्याय जन्म शताब्दी वर्ष के रूप में मनाने का निर्णय लिया है, केंद्र सरकार इस जन्मशताब्दी वर्ष को गरीब कल्याण वर्ष के रूप में मना रही है। उन्होंने कहा कि यह हम सबका दायित्व है कि आने वाले अनेक पीढ़ियों तक हमारी राजनीति सुदृढ़ रहे, इसके लिए न केवल भारतीय जनता पार्टी बल्कि सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले हर व्यक्ति को पंडित दीनदयाल उपाध्याय का स्मरण करना चाहिए। उन्होंने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय सम्पूर्ण वांड्मय देश की राजनीति को आगे ले जाने और राजनीति को निर्मल रखने में एक बहुत बड़ा साधन सिद्ध होने वाला है। उन्होंने इस वांड्मय को लोगों तक पहुंचाने के लिए श्री महेश चन्द्र शर्मा एवं उनकी पूरी टीम को ह्रदय से साधुवाद दिया। श्री शाह ने कहा कि बहुपक्षीय लोकतांत्रिक संसदीय प्रणाली में किसी भी पार्टी का मूल्यांकन तीन विषयों के आधार पर हो सकता है - पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र, पार्टी का सिद्धांत और सत्ता में आने पर सरकार की कार्यपद्धति। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि देश की जनता को इन आधारभूत मापदंडों पर राजनीतिक पार्टियों का तुलनात्मक अध्ययन करना चाहिए। भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि आज देश में लगभग 1650 छोटी-बड़ी पार्टियों में से सिर्फ और सिर्फ भारतीय जनता पार्टी ही एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसके अंदर आतंरिक लोकतंत्र बचा हुआ है। उन्होंने कहा कि यदि पार्टी के अंदर ही लोकतंत्र नहीं है तो वह देश का भला नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि देश की अधिकतर पार्टियों में सबको पता है कि उसका अगला अध्यक्ष कौन होगा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस का अगला अध्यक्ष कौन होगा, जेएमएम का अगला अध्यक्ष कौन होगा, यह सबको पता है लेकिन भारतीय जनता पार्टी का अगला लक्ष्य कौन होगा, यह किसी को मालूम नहीं है क्योंकि भारतीय जनता पार्टी में अध्यक्ष वंश, जाति अथवा धर्म के आधार पर नहीं बल्कि योग्यता के आधार पर तय होते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी में नेता अपनी निष्ठा, देश के लिए काम करने की लगन, परिश्रम, मेधा और परफॉरमेंस के आधार पर बनते हैं, यही कारण है कि यहाँ एक बूथ कार्यकर्ता भी पार्टी का अध्यक्ष बन सकता है और एक गरीब का बेटा व पार्टी का एक छोटा सा कार्यकर्ता देश का प्रधानमंत्री। उन्होंने कहा कि देश में कई सारी पार्टियाँ हैं जो परिवारवाद और जातिवाद के आधार पर ही चल रही हैं। उन्होंने कहा कि मैं देश की जनता का भी आह्वान करना चाहूँगा कि वे भी ऐसे दलों को चुनें जहां आंतरिक लोकतंत्र हो। श्री शाह ने कहा कि पार्टी के मूल्यांकन का दूसरा महत्वपूर्ण मापदंड है - पार्टी का सिद्धांत। उन्होंने कहा कि जो पार्टियां सिद्धांतों के आधार पर नहीं चलती हैं, वे देश का भला नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि भारतीय जन संघ की स्थापना ही सिद्धांतों के आधार पर देश को एक वैकल्पिक नीति देने के लिए हुई थी। भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि नेहरू जी के नेतृत्व में जब देश की विकास नीति, कृषि नीति, विदेश नीति, अर्थ नीति, रक्षा नीति और शिक्षा नीति का निर्माण हो रहा था तब डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी सहित कई राष्ट्र मनीषियों को लगा कि नेहरू सरकार देश के लिए जो नीतियाँ बना रही है, उन नीतियों के रास्ते पर यदि यह देश चलता रहा तो पीछे मुड़ने का भी रास्ता नहीं मिलेगा, तब उन लोगों ने एक ऐसी वैकल्पिक नीति को राष्ट्र के सामने रखने का साहस किया जिसमें देश की मिट्टी की सुगंध हो, उससे पाश्चात्य विचारों की बू न आती हो और जो नीतियाँ देश को विकास के पथ पर गतिशील करने में सहायक हो। उन्होंने कहा कि ने कहा कि 1950 से 2017 की जन संघ से भारतीय जनता पार्टी की यात्रा अंत्योदय, एकात्म मानववाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की यात्रा रही है और यही हमारे मूल सिद्धांत हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी की स्थापना सत्ता प्राप्त करने के लिए नहीं बल्कि राष्ट्र के भविष्य को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से हुई थी, भारत को फिर से विश्वगुरु के पद पर प्रतिष्ठित कर देश के खोये हुए गौरव को पुनर्स्थापित करने के लिए हुई थी। श्री शाह ने कहा कि कांग्रेस पार्टी के क्या सिद्धांत हैं, कोई नहीं बता सकता क्योंकि कांग्रेस पार्टी की स्थापना सिद्धांत के लिए हुई ही नहीं थी, आजादी प्राप्त करने के लिए हुई थी और इसमें सभी विचारधाराओं के लोग शामिल थे। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और भारतीय जन संघ की विचारधारा में एक बड़ा मूल अंतर यह था कि कांग्रेस देश का नवनिर्माण करना चाहती थी जबकि भारतीय जन संघ देश की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत और गौरवशाली वैभव के आधार पर देश का पुनर्निर्माण करना चाहती थी। उन्होंने कहा कि जिस पार्टी का कोई सिद्धांत नहीं है, वह देश का विकास नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि स्थापना से लेकर आज तक हमारे नेतृत्व के जीवन का क्षण-क्षण और शरीर का कण-कण राष्ट्र-सेवा के प्रति समर्पित रहा है। उन्होंने कहा कि स्थापना से लेकर आज तक हमने जितने भी कार्यक्रम हाथ में लिए है, वे देश की समस्याओं के समाधान के लिए हैं चाहे वह कश्मीर आन्दोलन हो, कच्छ का सत्याग्रह हो, गोवा मुक्ति संग्राम हो, राम जन्मभूमि आंदोलन हो, भ्रष्टाचार के खिलाफ देश की यात्रा हो या फिर गौ-हत्या को बंद करने का आंदोलन हो। उन्होंने कहा कि आज भी हमारे पास हजारों ऐसे कार्यकर्ता हैं जो निस्वार्थ भाव से पार्टी और देश की सेवा में लगे हुए हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि यदि हम सरकारों का मूल्यांकन करें तो यह पता चलता है कि देश में जब-जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार आती है तो देश का विकास होता है। उन्होंने कहा कि देश ने कांग्रेस की सरकारें भी देखी, कम्युनिस्ट पार्टियों की सरकारें भी देखी, क्षेत्रीय दलों की सरकारें भी देखी और भारतीय जनता पार्टी की केंद्र और राज्य सरकारों को भी देखा, अब वक्त आ गया है कि इन सरकारों के विकास के आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए। उन्होंने कहा कि गरीबी उन्मूलन, जीडीपी ग्रोथ, स्वास्थ्य, साक्षरता, ग्रामीण विकास, कृषि विकास, बिजली उत्पादन एवं वितरण और बच्चों एवं माताओं की मृत्यु दर में कमी - इन सभी क्षेत्रों में भाजपा की सरकारें पहले स्थान पर हैं। उन्होंने कहा कि देश के जिन-जिन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं, वहां विकास तेज गति से आगे बढ़ा है। श्री शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हमने देश को कांग्रेस के 12 लाख करोड़ रुपये के घपले-घोटाले और भ्रष्टाचार वाली सरकार की जगह एक भ्रष्टाचार-मुक्त, पारदर्शी और निर्णायक सरकार देने का काम किया है। उन्होंने कहा कि आंतरिक लोकतंत्र, पार्टी के सिद्धांत और सत्ता में आने पर सरकार की कार्यपद्धति - इन तीनों मापदंडों पर भारतीय जनता पार्टी जन-अपेक्षाओं पर खड़ी उतरी है। उन्होंने कहा कि आज पूरी दुनिया यह मानने लगी है कि भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे चल पड़ा है। श्री शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत दुनिया की सबसे तेज गति से विकास करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक अर्थव्यवस्था बनी है। उन्होंने कहा कि साढ़े चार करोड़ से अधिक शौचालय का निर्माण कर महिलाओं को सम्मान के साथ जीने का अधिकार दिया गया है और लगभग 29 करोड़ लोगों के बैंक अकाउंट खोल कर उन्हें देश के अर्थतंत्र की मुख्यधारा में जोड़ा गया है। उन्होंने कहा कि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के कारण लाभार्थियों को मिलने वाली आर्थिक सहायता सीधे उनके बैंक अकाउंट में जाती है, इससे लगभग 59,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी का भ्रष्टाचार कम हुआ है। उन्होंने कहा कि मुद्रा बैंक योजना के माध्यम से देश के करोड़ों गरीब युवाओं को स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराये गए हैं। उन्होंने कहा कि जीएसटी के रूप में ‘एक राष्ट्र, एक कर’ का स्वप्न साकार हुआ है। उन्होंने कहा कि आजादी के 70 साल बाद भी बिजली से वंचित देश के 18 हजार से अधिक गाँवों में से 13 हजार से अधिक गाँवों में बिजली पहुंचाने का काम पूरा कर लिया गया है। उन्होंने कहा कि 2018 तक हर गाँव में और 2022 तक देश के हर घर में बिजली पहुंचाने का लक्ष्य प्राप्त कर लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि आजादी से लेकर केंद्र की यूपीए सरकार तक देश में लगभग 12.5 करोड़ गैस सिलिंडर ही बांटे गए थे जिसमें से 11.80 करोड़ कनेक्शन शहरी क्षेत्रों में बांटे गए थे। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने तीन सालों में देश के पांच करोड़ गरीब महिलाओं को गैस कनेक्शन देने का निर्णय लिया है जिसमें से देश के 2.80 करोड़ गरीब महिलाओं के घर में गैस सिलिंडर पहुंचाया जा चुका है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने देश के सोचने के स्केल को बदलने का काम किया है। भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि उन्होंने कहा कि 104 उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में प्रक्षेपित कर भारत अंतरिक्ष के अंदर दुनिया की एक प्रमुख ताकत के रूप में उभरा है। उन्होंने कहा कि 40 वर्षों से लंबित भूतपूर्व सैनिकों की ‘वन रैंक, वन पेंशन’ की मांग को एक ही साल में पूरा करके मोदी सरकार ने पूर्व सैनिकों को सम्मान के साथ जीने का अधिकार दिया है। उन्होंने कहा कि सर्जिकल स्ट्राइक से दुनिया का देश को देखने के नजरिये में बदलाव आया है। उन्होंने कहा कि पहले राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं थी, इसलिए दुश्मनों को उसी की भाषा में जवाब देने के फैसले नहीं लिए जाते थे। उन्होंने कहा कि सर्जिकल स्ट्राइक करके अमेरिका के बाद ऐसा साहस दिखाने का काम हिन्दुस्तान ने करके दिखाया। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने तीन सालों में देश की अर्थव्यवस्था में से काले धन के दुष्प्रभाव को काफी हद तक दूर करने में सफलता प्राप्त की है। उन्होंने कहा कि नोटबंदी, राजनीतिक चंदे में कैश के रूप में मिलने वाली रकम को 2,000 रुपये तक सीमित करने की नीति, दो लाख शेल कंपनियों के रजिस्ट्रेशन को ख़त्म करने की कार्रवाई, बेनामी संपत्ति पर नकेल और मॉरीशस-साइप्रस-सिंगापुर रूट को बंद करके मोदी सरकार ने काले धन पर कठोर प्रहार किया है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री फसल बीमा, स्वायल हेल्थ कार्ड, नीम कोटेड यूरिया, सिंचाई योजना, ई-मंडी जैसी योजनाओं के माध्यम से किसानों की आय को 2022 तक दुगुना करने के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में तेज गति से काम हो रहा है। उन्होंने कहा कि ‘भीम' एप से डिजिटल ट्रांजेक्शन को बढ़ावा दिया गया है। उन्होंने कहा कि जेनरिक दवाई, स्टैंट एवं कृत्रिम घुटनों के प्रत्यारोपण मूल्य में भारी कमी से देश के गरीब एवं मध्यम वर्ग के लोगों को फायदा पहुंचा है। श्री शाह ने कहा कि 1955 से लंबित ओबीसी कमीशन को संवैधानिक मान्यता देने की मांग को पूरा करने का प्रयास भारतीय जनता पार्टी की मोदी सरकार ने किया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के दोहरे रवैये के कारण ओबीसी कमीशन को संवैधानिक मान्यता देने का विधेयक राज्य सभा से पास नहीं हो पाया। उन्होंने देश की जनता को विश्वास दिलाते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी पिछड़े वर्ग को यह सम्मान दिलाने के लिए कटिबद्ध है, कुछ ही समय में हम इस विधेयक को राज्य सभा से पारित करा कर ओबीसी कमीशन को संवैधानिक मान्यता देने का कार्य पूरा कर लेंगे। उन्होंने कहा कि निष्ठा और लगन के साथ अनवरत रूप से जब देश के विकास के लिए योजनाओं को इम्प्लीमेंट किया जाता है तब जाकर तीन साल में इतने काम होते हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने देश से परिवारवाद, जातिवाद और तुष्टीकरण की राजनीति को ख़त्म करके पॉलिटिक्स ऑफ़ परफॉरमेंस के एक नए युग की शुरुआत की है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हमने रिफॉर्म्स से भी दो कदम आगे बढ़ कर ट्रांसफॉर्मेशन अर्थात सम्पूर्ण परिवर्तन की दिशा में देश को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है। भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि मोदी सरकार ने झारखंड के विकास के लिए कई कदम उठाये हैं। उन्होंने कहा कि 13वें वित्त आयोग में कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार ने झारखंड को शेयर इन सेन्ट्रल टैक्स में 42,847 करोड़ रुपये राशि आवंटित की जबकि 14वें वित्त आयोग में मोदी सरकार ने झारखंड के 1,24,408 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की है जो 13वें वित्त आयोग के मुकाबले लगभग तीन गुनी अधिक है। उन्होंने कहा कि ग्रांट-इन ऐड को भी 6087 से बढ़ा कर 9469 करोड़ कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि 13वें वित्त आयोग में कांग्रेस सरकार ने 2014-15 में लोकल बॉडीज ग्रांट में जहां महज 1891 करोड़ रुपये दिए थे जबकि 14वें वित्त आयोग में मोदी सरकार ने केवल दो वर्षों (2015-16 aur 2016-17) में झारखंड को 7961 करोड़ रुपये आवंटित किये हैं। उन्होंने कहा कि स्टेट डिजास्टर रिस्पांस फंड को भी 1075 करोड़ से बढ़ाकर 1507 करोड़ रुपये कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने इन सभी क्षेत्रों में कुल मिलाकर पिछली कांग्रेस की यूपीए सरकार के 55,253 करोड़ की तुलना में झारखंड को 1,43,345 करोड़ रुपये दिया है, इसके अतिरिक्त राज्य में 13,937 करोड़ रुपये का निवेश आया है, खदानों की नीलामी से झारखंड को 1,17,000 करोड़ रुपये अधिक आय होगी एवं उदय डिस्कॉम योजना के अंतर्गत भी झारखंड को लगभग 53,00 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई है। श्री शाह ने कहा कि झारखंड में रघुबर दास जी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी सरकार राज्य के विकास के लिए अहर्निश काम कर रही है। उन्होंने कहा कि झारखंड के विकास की गति पूरी दुनिया देख रही है। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी ने झारखंड में स्थिरता एवं पारदर्शिता के साथ-साथ एक निर्णायक सरकार देने का काम किया है।
 (महेंद्र पांडेय) कार्यालय सचिव