शनिवार, 18 नवंबर 2017

महारानी पदमिनी और जौहर



卐 जरूर पढ़े और शेयर करे। ... महान सत्य 卐
🔘 1. *बप्पा रावल*- अरबो, तुर्को को कई हराया ओर हिन्दू धरम रक्षक की उपाधि धारण की
🔘 2. *भीम देव सोलंकी द्वितीय* - मोहम्मद गौरी को 1178 मे हराया और 2 साल तक जेल मे बंधी बनाये रखा
🔘 3. *पृथ्वीराज चौहान* - गौरी को 16 बार हराया और और गोरी बार बार कुरान की कसम खा कर छूट जाता ...17वी बार पृथ्वीराज चौहान हारे
🔘 4. *हम्मीरदेव (रणथम्बोर)* - खिलजी को 1296 मे अल्लाउदीन ख़िलजी के 20000 की सेना में से 8000 की सेना को काटा और अंत में सभी 3000 राजपूत बलिदान हुए राजपूतनियो ने जोहर कर के इज्जत बचायी ..हिनदुओ की ताकत का लोहा मनवाया
🔘 5. *कान्हड देव सोनिगरा* – 1308 जालोर मे अलाउदिन खिलजी से युद्ध किया और सोमनाथ गुजरात से लूटा शिवलिगं वापिस राजपूतो के कब्जे में लिया और युद्ध के दौरान गुप्त रूप से विश्वनीय राजपूतो , चरणो और राजपुरोहितो द्वारा गुजरात भेजवाया तथा विधि विधान सहित सोमनाथ में स्थापित करवाया
🔘 6. *राणा सागां*- बाबर को भिख दी और धोका मिला ओर युद्ध . राणा सांगा के शरीर पर छोटे-बड़े 80 घाव थे, युद्धों में घायल होने के कारण उनके एक हाथ नही था एक पैर नही था, एक आँख नहीं थी उन्होंने अपने जीवन-काल में 100 से भी अधिक युद्ध लड़े थे.
🔘 7. *राणा कुम्भा* - अपनी जिदगीँ मे 17 युदध लडे एक भी नही हारे
🔘 8. *जयमाल मेड़तिया*- ने एक ही झटके में हाथी का सिर काट डाला था। चित्तोड़ में अकबर से हुए युद्ध में *जयमाल राठौड़* पैर जख्मी होने कि वजह से *कल्ला जी* के कंधे पर बैठ कर युद्ध लड़े थे, ये देखकर सभी युद्ध-रत साथियों को चतुर्भुज भगवान की याद आयी थी, जंग में दोनों के सिर काटने के बाद भी धड़ लड़ते रहे और 8000 राजपूतो की फौज ने 48000 दुश्मन को मार गिराया ! अंत में अकबर ने उनकी वीरता से प्रभावित हो कर जयमाल मेड़तिया और पत्ता जी की मुर्तिया आगरा के किलें में लगवायी थी.
🔘 9. *मानसिहं तोमर*- महाराजा मान सिंह तोमर ने ही ग्वालियर किले का पुनरूद्धार कराया और 1510 में सिकंदर लोदी और इब्राहीमलोदी को धूल चटाई
🔘 10. *रानी दुर्गावती*- चंदेल राजवंश में जन्मी रानी दुर्गावती राजपूत राजा कीरत राय की बेटी थी। गोंडवाना की महारानी दुर्गावती ने अकबर की गुलामी करने के बजाय उससे युद्ध लड़ा 24 जून 1564 को युद्ध में रानी दुर्गावती ने गंभीर रूप से घायल होने के बाद अपने आपको मुगलों के हाथों अपमान से बचाने के लिए खंजर घोंपकर आत्महत्या कर ली।
🔘 11. *महाराणा प्रताप* - इनके बारे में तो सभी जानते ही होंगे ... महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलो था और कवच का वजन 80 किलो था और कवच, भाला, ढाल, और हाथ मे तलवार का वजन मिलाये तो 207 किलो था.
🔘 12. *जय सिंह जी* - जयपुर महाराजा ने जय सिंह जी ने अपनी सूझबुज से छत्रपति शिवजी को औरंगज़ेब की कैद से निकलवाया बाद में औरंगजेब ने जयसिंह पर शक करके उनकी हत्या विष देकर करवा डाली
🔘 13. *छत्रपति शिवाजी* - मेवाड़ सिसोदिया वंशज छत्रपति शिवाजी ने औरंगज़ेब को हराया तुर्को और मुगलो को कई बार हराया
🔘 14. *रायमलोत कल्ला जी* का धड़ शीश कटने के बाद लड़ता- लड़ता घोड़े पर पत्नी रानी के पास पहुंच गया था तब रानी ने गंगाजल के छींटे डाले तब धड़ शांत हुआ उसके बाद रानी पति कि चिता पर बैठकर सती हो गयी थी.
🔘 15. सलूम्बर के नवविवाहित *रावत रतन सिंह चुण्डावत* जी ने युद्ध जाते समय मोह-वश अपनी पत्नी हाड़ा रानी की कोई निशानी मांगी तो रानी ने सोचा ठाकुर युद्ध में मेरे मोह के कारण नही लड़ेंगे तब रानी ने निशानी के तौर
पैर अपना सर काट के दे दिया था, अपनी पत्नी का कटा शीश गले में लटका औरंगजेब की सेना के साथ भयंकर युद्ध किया और वीरता पूर्वक लड़ते हुए अपनी मातृ भूमि के लिए शहीद हो गये थे.
🔘 16. औरंगज़ेब के नायक तहव्वर खान से गायो को बचाने के लिए पुष्कर में युद्ध हुआ उस युद्ध में *700 मेड़तिया राजपूत* वीरगति प्राप्त हुए और 1700 मुग़ल मरे गए पर एक भी गाय कटने न दी उनकी याद में पुष्कर में गौ घाट बना हुआ है
🔘 17. एक राजपूत वीर जुंझार जो मुगलो से लड़ते वक्त शीश कटने के बाद भी घंटो लड़ते रहे आज उनका सिर बाड़मेर में है, जहा छोटा मंदिर हैं और धड़ पाकिस्तान में है.
🔘 18. जोधपुर के *यशवंत सिंह* के 12 साल के पुत्र *पृथ्वी सिंह* ने हाथो से औरंगजेब के खूंखार भूखे जंगली शेर का जबड़ा फाड़ डाला था.
🔘 19. *करौली के जादोन राजा* अपने सिंहासन पर बैठते वक़्त अपने दोनो हाथ जिन्दा शेरो पर रखते थे.
🔘 20. हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 राजपूत सैनिक थे और अकबर की और से 85000 सैनिक थे फिर भी अकबर की मुगल सेना पर हिंदू भारी पड़े
🔘 21. राजस्थान पाली में आउवा के *ठाकुर खुशाल सिंह* 1857 में अजमेर जा कर अंग्रेज अफसर का सर काट कर ले आये थे और उसका सर अपने किले के बाहर लटकाया था तब से आज दिन तक उनकी याद में मेला लगता है
🔘22. वीर बंदा बैरागी - मुगलो के अजेय होने के भ्रम को तोडा और वजीर खान को मारकर सरहिंद पर विजय प्राप्त की ।
🔘 23. *जौहर  युद्ध के बाद अनिष्ट परिणाम और होने वाले अत्याचारों व व्यभिचारों से बचने और अपनी पवित्रता कायम रखने हेतु महिलाएं अपने कुल देवी-देवताओं की पूजा कर,तुलसी के साथ गंगाजल का पानकर जलती चिताओं में प्रवेश कर अपने सूरमाओं को निर्भय करती थी कि नारी समाज की पवित्रता अब अग्नि के ताप से तपित होकर कुंदन बन गई है और राजपूतनिया जिंदा अपने इज्जत कि खातिर आग में कूद कर आपने सतीत्व कि रक्षा करती थी | पुरूष इससे चिंता मुक्त हो जाते थे कि युद्ध परिणाम का अनिष्ट अब उनके स्वजनों को ग्रसित नही कर सकेगा | महिलाओं का यह आत्मघाती कृत्य जौहर के नाम से विख्यात हुआ| सबसे ज्यादा जौहर और शाके चित्तोड़ के दुर्ग में हुए | शाका : महिलाओं को अपनी आंखों के आगे जौहर की ज्वाला में कूदते देख पुरूष कसुम्बा पान कर,केशरिया वस्त्र धारण कर दुश्मन सेना पर आत्मघाती हमला कर इस निश्चय के साथ रणक्षेत्र में उतर पड़ते थे कि या तो विजयी होकर लोटेंगे अन्यथा विजय की कामना हृदय में लिए अन्तिम दम तक शौर्यपूर्ण युद्ध करते हुए दुश्मन सेना का ज्यादा से ज्यादा नाश करते हुए रणभूमि में चिरनिंद्रा में शयन करेंगे | पुरुषों का यह आत्मघाती कदम शाका के नाम से विख्यात हुआ
""जौहर के बाद राजपूत पुरुष जौहर कि राख का तिलक कर के सफ़ेद कुर्ते पजमे में और केसरिया फेटा ,केसरिया साफा या खाकी साफा और नारियल कमर पर बांध कर तब तक लड़के जब तक उन्हें वीरगति न मिले ये एक आत्मघाती कदम होता। ....."""|
卐 *जैसलमेर* के जौहर में 24,000 राजपूतानियों ने इज्जत कि खातिर अल्लाउदीन खिलजी के हरम जाने की बजाय आग में कूद कर अपने सतीत्व के रक्षा कि ..
卐 1303 चित्तोड़ के दुर्ग में सबसे पहला जौहर चित्तोड़ की *महारानी पद्मिनी* के नेतृत्व में 16000 हजार राजपूत रमणियों ने अगस्त 1303 में किया था |
卐 चित्तोड़ के दुर्ग में दूसरे जौहर चित्तोड़ की *महारानी कर्मवती* के नेतृत्व में 8,000 हजार राजपूत रमणियों ने 1535 AD में किया था |
卐 चित्तोड़ के दुर्ग में तीसरा जौहर अकबर से हुए युद्ध के समय 11,000 हजार राजपूत नारियो ने 1567 AD में किया था |
卐 ग्वालियर व राइसिन का जोहर ये जोहर तोमर सहिवाहन पुरबिया के वक़्त हुआ ये राणा सांगा के रिशतेदार थे और खानवा युद्ध में हर के बाद ये जोहर हुआ
卐 ये जोहर अजमेर में हुआ पृथ्वीराज चौहान कि शहाबुद्दीन मुहम्मद गोरी से ताराइन की दूसरी लड़ाई में हार के बाद हुआ इसमें *रानी संयोगिता* ने महल उपस्थित सभी महिलाओं के साथ जौहर किया ) जालोर का जौहर ,बारमेर का जोहर आदि
""". इतिहास गवाज है हम राजपूतो की हर लड़ाई में दुश्मन सेना तिगुनी चौगनी होती थी राजस्थान मालवा और सौराष्ट्र में मुगलो ने एक भी हमला राजपूतो पर तिगुनी और चौगनी फ़ौज से कम के बिना नही नही किया पर युद्ध के अंतः में दुश्मन आधे से ऊपर मारे जाते थे ""
卐卐 तलवार से कडके बिजली, लहु से लाल हो धरती, प्रभु ऐसा वर दो मोहि, विजय मिले या वीरगति ॥ 卐卐
*|| जय एकलिंग जी की ||*
*११ जय श्री कल्याण ११*

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( जौहर ) यह शब्द एसा शब्द है जिसे सुनकर , पढ़कर या सोचकर मेरा मन आज भी उतना ही भयबीत हो जाता है जितना पहली बार इसके बारे मे समझकर हुआ था , आज बहुत से लोग इस प्रथा के बारे में नही जांते और जान्ने का प्रयत्न भी नही करते वैसे तो आप में से कई सारे भाइ बहनों नें इस प्रथा का नाम सुना होगा और कई सारे इस प्रथा के बारे में अच्छी तरह समझते भी होंगे ।
जौहर राजपूतों की एक प्रथा रही है जब कोई भी बाहरी इस्लामिक सेना राजपूत सामराज्यों पर आक्रमण करतीं थी तब युद्ध के दौरान इस समारंभ की तैयारीयाँ करवाई जाती थी , पौराणिक काल से चली आ रही यह प्रथा कब से शुरू हुई यह किसी को नहीं पता लेकिन कहते हैं की जौहर प्रथा बनाने का मुख्य कारण इस्लामिक आक्रमण थे । पौराणिक काल से ही इस्लामिक लुटेरे भारत पर उत्तर पूर्वी और उत्तर पश्चिमी छोर से आक्रमण करने का प्रयत्न करते थे और असफल हो जाते थे
उनकी सैना इतनी भयबीत हो चुकी थी की भारत पर आक्रमण करने के बारे में सोचना भी बंद कर दिया था , तब आक्रमणकर्ताओं को एक नई युक्ती सूझी और उन ने अपनी सेना को हिन्दू रानीयों और उनकी सुंदर दासीयों का लालच देकर भारत पर आक्रमण करने का मन बनाया । जब राजपुताने में यह खबर लगी तब जौहर प्रथा का निर्माण हुआ
यह प्रथा सती प्रथा से बिलकुल अलग होती थी सती प्रथा में किसी पुरूष के मरने के बाद उसकी विदवा औरत को सती होना पड़ता था और कई बार तो जबरन भी आग में फेंक दिया जाता था लेकिन जौहर प्रथा इस से बिल्कुल अलग होती थी जौहर प्रथा में राजपुतानीयों पर किसी तरह का दवाब नही होता था अथवा यह राजघराने की औरतों और उनकी दासीयों के आत्मसम्मान को बचाने के लिये यह प्रथा बनाई गई थी ।जब इस्लामिक आक्रमणकर्तओं को कोई भी औरत हाथ ना लगती तो वे अन्य हिन्दू जाती की औरतों को अपना शिकार बनाते और उनका धर्म परिवर्तन भी करवाते थे इस तरह इनकी सेना की जंसंख्या मे भी बड़ोतरी होती थी ।
जौहर प्रथा का समारंग निम्नलिखित स्थितियों में करवाया जाता था :-
1- जब सेना किसी इस्लामिक आक्रमणकर्ताओं से लड़ रही हो ।
2- सेना को यह स्मरण हो जाए की
जीत अनिश्चित है और दुश्मन की सेना जंसंख्या में अधिक बड़ी है ।
3- जब सेना को यह पता लग जाए की दुश्मन अमानवीय है और बच्चो तथा औरतों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाएगा ।
जौहर में राजपुतानी तब ही अग्नी कुण्ड में छलांग लगातीं थी जब युद्ध से कोई बड़ा शोक संदेश आया हो और इस प्रथा को सभी राजपुतीनीयाँ अपने विवाह के वस्त्र पहन कर करतीं थीं । जोहर प्रथा एक तरह से राजपूतों को अंतिम सांस तक लड़ने के लिये प्रोत्साहित करती थी क्योकी हर राजपूत युद्ध में स्वयं के लिये नहीं बल्की अपने परिवार और मात्रभूमी की रक्षा के लिये लड़ता था और यही वजह थी की हर राजपूत नपुंसक इस्लामिकों की चौगुना बड़ी फौज पर भारी पड़ता था ।जब किले के रक्षकों को यह प्रतीत हो जाता था की अब वह किले की रक्षा नहीं कर पाएंगे और बचने का भी कोई साधन नहीं बचता था तब सैनिक यह समाचार रानीयों तक पहुँचा देते थे अंत: सभी राजपुतानीयाँ बाहरी आक्रमणकर्ताओं के हाथ लगने से पूर्व ही अग्नी कुण्ड में छलांग लगाकर अग्नी को समर्पित हो जातीं थी और किले की बाकी राजपुतानीयाँ भी यही करतीं थी ।
इस दौरान गर्भवती महिला को जौहर नहीं करवाया जाता था अत: उनको किले पर मौजूद अन्य बच्चों के साथ सुरंगों के रास्ते किसी गुप्त स्थान या फिर किसी दूसरे राज्य में भेज दिया जाता था ।राजपुताने में सबसे ज्यादा जौहर मेवाड़ के इतिहास में दर्ज हैं और इतिहास में लगभग सभी जौहर इस्लामिक आक्रमणों के दौरान ही हुए हैं जिसमें अकबर और ओरंगजेब के दौरान सबसे ज्यादा हुए हैं ।
note- जब राजपुतानियाँ युद्ध खत्म होने से पहले ही पुन: अनुमान लगाकर जौहर कर लेतीं थीं तो राजपूत अपनी अंतिम सांस तक लड़ते थे जिसे साका कहते थे इस पूरी प्रथा को जौहर-साका कहते हैं ।।
राजपुताने के इतिहास में एसे कइ बड़े बलिदान दर्ज हैं ।
1- प्रथ्वीराज चौहान की पत्नी समयुक्ता ने अफगानी मुल्लो के समय आत्मसमर्पण करने से मना कर दिया था और किले की सभी राजपुतानीयों के साथ जोहर किया था ।
2- राजा विजयपाल की पत्नी बयाना ने जोहर किया था ।
3-ग्वालियर के राजा शिलादित्य की माँ दुर्गावती और उन्की पत्नी ने आत्मसमर्पण ना करके जोहर किया, ग्यात हो कि दुर्गावती ने मुघलों से रणभूमी में युद्ध भी लड़ा था । जब की राजपूत कभी औरतों पर अपनी शस्त्र विद्या नहीं आजमाते थे ।
4- जैसलमेर की भाटी राजपुतीनीयों ने और मांडोरगढ़ की प्रतिहार राजपुतानियों ने जौहर किया । इस जौहर में 12000 राजपूतानी आग की लप्टों मे कूदीं ।
5- रावल रतन सिंह की पत्नी महारानी पदमिनी ने जौहर किया ।इस जौहर में राजपुतानींयों ने जौहर किया
6- राना संगा की खंडवा युद्ध में वीरगती को प्राप्त होने के बाद चित्तौड़गढ़ और मेवाड़ की लगाम महारानी करनावती के हाथों आ गई जो की राणा उदय सिंह की माँ थीं
उन्होने हुमायू को राखी भेजी थी लेकिन हुमायूँ ने धोका दिया । रानी कर्णावती ने बाकी राजपुतानीयों के साथ जोहर किया
( March 8, 1535 A.D.)
7- चित्तौड़ का तीसरा जौहर
जिसमे जयमल जो कि मेड़तिया रियासत के राजा थे उन्होंने राणा उदय सिंह की मदत की तब तक राणा उदय सिंह गोगंडा उदयपुर में अरावली के पहाड़ो पर नया किला बनवा चुके थे सुरक्षा कारणों से और युद्ध नीती के तहत उन्होने एसा किया और जयमल ने चित्तौड़ की लगाम संभाली जयमल और पट्टा-फत्ता
( Fateh Singh Sisodiya ) ने संभाली इस युद्ध में भी अकबर ने युद्ध विराम के दौरान धोका दिया और अपनी बन्दूक से गोली मारी जो जयमल की जांघ पर लगी । चित्तौड़ गढ़ का किला पूरी तरह से घिर चुका था
अंत: 8000 राजपुतानींयों ने जौहर की आग में छलांग लगा दी ।अगले दिन किले का द्वार खुला सभी राजपूत केसरिया बाना पहन कर घोड़ों पर सवार हाथों में तलवार अकबर की सेना पर भूखे शेरों की तरह टूट पड़े
यह युद्ध इतना भयानक था की अकबर की एक तिहाई 1/3 सेना समाप्त हो गईं ।. . . . . . .
अंत में बस यही कहुंगा की अपना मूल्य समझो तुम क्षत्रीय की संतान हो । यह सब होने की 3 प्रमुख वजह थी
1 मुल्लों में औरतों का लालच
2 मुघलों की सत्ता की भूख
3 हम में एकता की कमीं
यह पोस्ट करने की कई वजह हैं
1 अन्य जाती समुदायों के लोग राजपूत ठाकुरों को अत्याचारी वाली छवी से देखते हैं ! भाइयों माना की कहीं कहीं अत्याचार हुए लेकिन बलिदान भी सबसे ज्यादा इसी कौम ने दिये और भारतीय सेना में आज भी दे रहे हैं ।
2 - कुछ अन्य जाती के लोगो को मैंने राजपूत पेजेस पर गालियाँ देते देखा था और राजपूत भी वहाँ धड़ाधड़ गालियां दे रहे थे । एसे Pages के ADMINS को मैं यह राय दूंगा की भाइ पहले प्यार से समझाइये कि यह झूठा इतिहास सरकार ने राजनितिक लाभ और हिन्दुत्व को बाँटने के लिये बनाया है
इसलिये चाहे कुछ हो जये एकता बनाये रखें ।
3- हमारे पूर्वजों ने कई बलिदान दिये सिर्फ राजपूत ही नहीं सभी जाति समुदायों ने बलिदान दिये वक्त बदल गया हम बदल गये लेकिन ये मुल्ले नहीं बदले और ना ही बदलेंगे आप सभी बहनों से मेरी प्रार्थना है लव जिहाद का शिकार मत बनिये वरना आपके पूर्वजों की कुर्बानी व्यर्थ जायेगी ।।
14 NOV को में एक महत्वपूर्ण पोस्ट करूंगा आप से आग्रह है की अपने ज्यादा से ज्यादा दोस्तों को हम से जोड़ें ।
पोस्ट अच्छा लगे तो अपनी राय जरूर दें "धन्यवाद"
VIA - K ρ δiηgh





















मंगलवार, 31 अक्तूबर 2017

देवउठनी एकादशी















ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु अपनी शेष शय्या से योगनिद्रा से जाग जाते हैं। इसी दिन से सभी मंगल कार्य शुरू हो जाते हैं। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी देवउठनी एकादशी के नाम से पूजनीय मानी जाती है।

शास्त्रों में इस एकादशी को अनेक नामों से संबोधित किया गया है, जिसमें प्रबोधिनी एकादशी, देवोत्थान एकादशी, देवठान एकादशी आदि प्रमुख रूप से उल्लेखित है। आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुरूप यह विश्वास किया जाता है कि आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की हरिशयनी एकादशी को शयन प्रारंभ करने वाले भगवान विष्णु प्रबोधिनी एकादशी को जागृत हो जाते हैं।

वास्तव में देव सोने और देव जागने का अंतरंग संबंध सूर्य वंदना से है। आज भी सृष्टि की क्रियाशीलता सूर्य पर निर्भर है और हमारी दैनिक व्यवस्थाएं सूर्योदय से निर्धारित होती हैं। प्रकाश पुंज होने के नाते सूर्य देवता को भगवान विष्णु का ही स्वरूप माना गया है क्योंकि प्रकाश ही परमेश्वर है। इसलिए देवउठनी एकादशी पर विष्णु सूर्य के रूप में पूजे जाते हैं। यह प्रकाश और ज्ञान की पूजा है। वेद माता गायत्री भी तो प्रकाश की ही प्रार्थना है।

प्रबोधिनी एकादशी असल में उसी विश्व स्वरूप की आराधना है जो भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान करने के बाद दिखाया था। यह परमात्मा के अखंड तेजोमय स्वरूप की आराधना है क्योंकि परमात्मा ने जब सृष्टि का सृजन किया तब उनके पास कोई सामान नहीं था। जब शरद ऋतु आती है तब बादल छंट जाते हैं, आसमान साफ हो जाता है, सूर्य भगवान नियमित दर्शन देने लगते हैं। इस तरह इन्हें प्रबोधित, चैतन्य व जागृत माना जाता है और कार्तिक शुक्ल एकादशी को देव उठने का पर्व मनाया जाता है। यह समस्त मंगल कार्यों की शुरुआत का दिन माना जाता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार पूरे देव वर्ग का नाम आदित्य या सूर्य था जिसके प्रमुख देव भगवान विष्णु थे।

पुराणों में सूर्योपासना का उल्लेख मिलता है और बारह आदित्यों के नाम भी उल्लेखित हैं जो इस प्रकार हैं : इंद्र, धातृ, भग, त्वष्ट, मित्र, वरुण, अयर्मन, विवस्वत, सवितृ, पूलन, अंशुमत और विष्णु। चूंकि चराचर जगत हरिमय है इसलिए ग्यारह आदित्य भी विष्णु के ही रूप हैं। इसलिए आदित्य व्रत करने की अनुशंसा की गई है।

यह व्रत रविवार को किया जाता है और प्रत्येक रविवार को एक वर्ष तक सूर्य पूजन किया जाता है। एकादशी व्रत अपने आप में विष्णु को समर्पित है। सूर्य के प्रकाश का मानव की पाचन शक्ति से भी संबंध है। चातुर्मास में सूर्य का प्रकाश नियमित न होने से पाचन शक्ति गड़बड़ा जाती है। इसलिए अनेक भक्तगण चातुर्मास में एक बार ही भोजन करते हैं। फिर देवउठनी एकादशी से सूर्य के नियमित प्रकाश से पाचन क्रिया पुनः उत्तेजित हो जाती है। सूर्य आयुष और आरोग्य के अधिष्ठाता भी माने गए हैं।