सोमवार, 17 जुलाई 2017

माँ बाण माता : सिसोदिया वंश की कुलदेवी


सिसोदिया राजवंश सिर्फ मेवाड़ तक ही नहीं है , यह महाराष्ट्र में भोंसले और नेपाल में राणा वंस के रूप में विस्तृत है !

कुलदेवी बाण माता


गेहलोत वंश की कुलदेवी बाण माता
भरत गेहलोत (आना,राजस्थान)
कुल के फलने और फूलने में कुलदेवता व कुलदेवी की असीम कृपा होती हैं। गेहलोत वंश की कुलदेवी श्री बाण माता, बायण माता या ब्राह्मणी माता के संक्षिप्त इतिहास से में आपको रूबरू करवा रहा हूँ हालाँकि यह इतिहास वेद् वर्णित हैं फिर भी अगर किसी भी प्रकार की त्रुटि हो तो में क्षमा प्राथी हूँ। सिसोदिया गेहलोत, गुहिल या गेहलोत वंश की कुलदेवी बाण माता का मुख्य मंदिर विश्व प्रसिद्ध दुर्ग चित्तोड़गढ़ में स्थित हैं। माताजी का पुराना स्थान गिरनार गुजरात में था पर कालान्तर में माँ बाण माता चित्तोड़ पधार गयी थी। और इसके पीछे कथा इस प्रकार हैं की वर्षो पूर्व चित्तोड़ के महाराणा ने गुजरात पर आक्रमण कर गुजरात जीत लिया।

इस पर महाराणा ने गुजरात के राजा से कहा की वह अपनी राजकुमारी का विवाह चित्तोड़ के महाराणा से करे। हालाँकि गुजरात की राजकुमारी के मन में यह इच्छा पूर्व से ही थी की वह महाराणा की रानी बने और क्योंकि राजकुमारी माँ बाण माता की भक्त थी तो माँ ने ही कुछ ऐसी लीला रचाई की राजकुमारी की शादी महाराणा से हो गयी और माँ बाण माता भी राजकुमारी के साथ चित्तौड़गढ़ पधार गयी। हालाँकि गिरनार में अभी भी माँ का मंदिर हैं। इस प्रकार यह तो हुआ की माँ किस तरह चित्तोड़ में प्रकट हुई पर अब में आपको यह बताने का भी प्रयत्न करूँगा की किस तरह माँ ने देवलोक से भूलोक पर अवतार लिया। पुराणों के अनुसार हजारों वर्षों पूर्व बाणासुर नाम का एक दैत्य ने जन्म लिया। जिसकी भारत में अनेक राजधानियाँ थी। पूर्व में सोनितपुर (वर्तमान तेजपुर, आसाम) उत्तर में बामसू (वर्तमान लमगौन्दी, उत्तराखंड) मध्यभारत में बाणपुर मध्यप्रदेश में भी बाणासुर का राज था। बाणासुर बामसू में रहता था।बाणासुर को कही कही राजा भी कहा गया है, और उसके मंदिर भी मौजूद हैं जिसको आज भी उत्तराखंड के कुछ गावों में पूजा जाता है। संभवतः प्राचीन सनातन भारत में मनुष्य जब पाप के रास्ते पर चलकर अत्यंत अत्याचारी हो जाता था तब उसे असुर की श्रेणी में रख दिया जाता था क्योंकि लोगों को यकीन हो जाता था की अब उसका काल निकट है और वह अवश्य ही प्रभु के हाथो मारा जायेगा। यही हाल रावण का भी था वह भी एक महाज्ञानी-शक्तिशाली-इश्वर भक्त राजा था, किन्तु समय के साथ वह भी अभिमानी हो गया था और उसका भी अंत एक असुर की तरह ही हुआ।

किन्तु यह भी सत्य है की रावण को आज भी बहुत से स्थानों पर पूजा जाता है। दक्षिण भारत, श्रीलंका के साथ साथ उत्तर भारत में भी उसके कई मंदिर हैं जिनमे मंदसौर(मध्यप्रदेश) में भी रावण की एक विशाल प्रतिमा है जिसकी लोग आज भी पूजा करते हैं। बाणासुर भगवान शिव का अनन्य भक्त था। शिवजी के आशीर्वाद से उसे हजारों भुजाओं की शक्ति प्राप्त थी। शिवजी ने उससे और भी कुछ मांगने को कहा तो बाणासुर ने कहा की आप मेरे किले के पहरेदार बन जाओ। यह सुन शिवजी को बडी ही ग्लानि और अपमान महसूस हुआ लेकिन उन्होंने उसको वरदान दे दिया और उसके किले के रक्षक बन गए। बाणासुर परम बलशाली होकर सम्पूर्ण भारत और पृथ्वी पर राज करने लगा और उससे सभी राजा और कुछ देवता तक भयभीत रहने लगे। बाणासुर अजेय हो चुका था, कोई उससे युद्ध करने आगे नहीं आता था। एक दिन बाणासुर को अचानक युद्ध करने की तृष्णा जागी। तब उसने स्वयं शिवजी से युद्ध करने की इच्छा की। बाणासुर के अभिमानी भाव को देख कर शिवजी ने उससे कहा की वह उससे युद्ध नहीं करना चाहते क्योंकि वह उनका शिष्य है, किन्तु शिवजी ने उससे कहा की तुम विचलित मत हो तुम्हे पराजित करने वाला व्यक्ति कृष्ण जन्म ले चुका है। यह सुन कर बाणासुर भयभीत हो गया। और उसने शिवजी की पुनः तपस्या की और अपनी हजारों भुजाओं से कई सौ मृदंग बजाये, जिससे शिवजी पुनः प्रसन्न हो गए और बाणासुर ने उनसे फिर वरदान मांग लिया की वे कृष्ण से युद्ध में उसका साथ देंगे और उसके प्राणों की रक्षा करेंगे और हमेशा की तरह उसके किले के पहरेदार बने रहेंगे। समय बीतता गया और श्री कृष्ण ने द्वारिका बसा ली थी। उधर बाणासुर के एक पुत्री थी जिसका नाम उषा था। उषा से शादी के लिए बहुत से राजा महाराजा आए किन्तु बाणासुर सबको तुच्छ समझकर उषा के विवाह के लिए मना कर देता और अभिमानपूर्वक उनका अपमान कर देता था। बाणासुर को भय था की उषा उसकी इच्छा के विपरीत किसी से विवाह न कर ले इसलिए बाणासुर ने एक शक्तिशाली महल बनवाया और उसमे उषा को कैद कर नज़रबंद कर दिया। अब इसे संयोग कहो या श्री कृष्ण की लीला, एक दिन उषा को स्वप्न में एक सुन्दर राजकुमार दिखाई दिया यह बात उषा अपनी सखी चित्रलेखा को बताई।

चित्रलेखा को सुन्दर कला-कृतियाँ बनाने का वरदान प्राप्त था, उसने अपनी माया से उषा की आँखों में देख कर उसके स्वप्न दृश्य को देख लिया और अपनी कला की शक्ति से उस राजकुमार का चित्र बना दिया। चित्र देख उषा को उससे प्रेम हो गया और उसने कहा की यदि ऐसा वर उसे मिल जाये तो ही उसे संतोष होगा। चित्रलेखा ने बताया की यह राजकुमार तो श्री कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध का है। तब चित्रलेखा ने अपनी शक्ति से अनिरुद्ध को अदृश्य कर के उषा के सामने प्रकट कर दिया और तब दोनों ने ओखिमठ नामक स्थान(केदारनाथ के पास) विवाह किया जहाँ आज भी उषा-अनिरुद्ध नाम से एक मंदिर व्याप्त है। जब यह खबर बाणासुर को मिली तो उसे बड़ा क्रोध आया और उसने अनिरुद्ध और उषा दोनों को कैद कर लिया। जब कई दिनों तक अनिरुद्ध द्वारिका में नहीं आये तो श्रीकृष्ण और बलराम व्याकुल हो उठे और उन्होंने उसकी तलाश शुरू कर दी, अंत में जब उन्हें नारदजी द्वारा सत्य का पता चला तो उन्होंने बाणासुर पर हमला करने की ठानी। भयंकर युद्ध आरंभ हुआ जिसमे दोनों ओर के महावीरों ने शौर्य का परिचय दिया। अंत में जब बाणासुर हारने लगा तो उसने शिवजी की आराधना की। भक्त के याद करने पर शिवजी प्रकट हो गए और श्री कृष्ण से युद्ध करने लगे। युद्ध कितना विनाशक था इसका ज्ञान इसी बात से हो जाता है की शिवजी अपने सभी अवतारों और साथियों रुद्राक्ष, वीरभद्र, कूपकर्ण, कुम्भंदा सहित बाणासुर के सेनापति बने उधर दूसरी तरफ श्रीकृष्ण के साथ बलराम, प्रदुम्न, सत्याकी, गदा, संबा, सर्न,उपनंदा, भद्रा अदि कई योद्धा थे। इस भयंकर युद्ध में शिवजी ने श्रीकृष्ण की सेना के असंख्य सेनिको को मौत के घाट उतार दिया और श्री कृष्ण ने भी बाणासुर के असंख्य सैनिको का नाश कर दिया। तब अंत में शिवजी ने पशुपतास्त्र से श्री कृष्ण पर वार किया तो श्रीकृष्ण ने भी नारायणास्त्र से वार किया जिसका किसी को कोई लाभ नहीं हुआ। अंततः श्रीकृष्ण ने निन्द्रास्त्र चला कर कुछ देर के लिए शिवजी को सुला दिया। इससे बाणासुर की सेना कमजोर हो गयी। दूसरी तरफ बलराम जी ने कुम्भंदा और कूपकर्ण को घायल कर दिया।

यह देख बाणासुर अपने प्राण बचा कर भागा। श्रीकृष्ण ने उसे पकड़कर उसकी भुजाएँ काटनी शुरू कर दी जिस पर वह बहुत ही अभिमान करता था। जब बाणासुर की सारी भुजाएँ कट गयी थी और केवल चार शेष रह गयी थी तब शिवजी अचानक जाग उठे और श्रीकृष्ण द्वारा उन्हें निंद्रा में भेजने और बाणासुर की दशा जानकर बहुत ही क्रोधित हुए। शिवजी ने अंत में अपना सबसे भयानक शस्त्र ”शिवज्वर अग्नि” चलाया जिससे सारा ब्रह्माण अग्नि में जलने लगा और हर तरफ भयानक ज्वर बीमारिया फैलने लगी। यह देख श्री कृष्ण को न चाहते हुए भी अपना आखिरी शास्त्र ”नारायणज्वर शीत” चलाया। श्रीकृष्ण के शस्त्र से ज्वर का तो नाश हो गया किन्तु अग्नि और शीत का जब बराबर मात्र में विलय होता है तो सम्पूर्ण श्रृष्टि का नाश हो जाता है। इसके कारण पृथ्वी और ब्रह्माण्ड बिखरने लगे तब नारद मुनि और समस्त देवताओं, नव-ग्रहों, यक्ष और गन्धर्वों ने ब्रह्मा जी की आराधना की लेकिन ब्रह्मा जी ने दोनों को रोक पाने में असर्थता बताई। तब सबने मिलकर परमशक्ति भगवती माँ दुर्गाजी की आराधना की तब माँ ने दोनों पक्षों (कृष्ण और शिवजी) को शांत किया। श्रीकृष्ण ने कहा की वे तो केवल अपने पौत्र अनिरुद्ध की आज़ादी चाहते हैं और शिवजी ने भी कहा की वह भी केवल अपने वचन की रक्षा कर रहे हैं और बाणासुर का साथ दे रहे हैं और उनकी केवल यही इच्छा है की श्रीकृष्ण बाणासुर के प्राण न ले। तब श्रीकृष्ण कहा की आपकी इच्छा भी मेरा दिया हुआ वचन ही है, मेने पूर्वावतार में बाणासुर के पूर्वज बलि राजा के पूर्वज प्रहलाद को यह वरदान दिया था की दानव वंश के अंत में उसके परिवार का कोई भी सदस्य उनके (विष्णु)के अवतार के हाथो कभी नहीं मरेगा। माँ भगवती की कृपा से श्रीकृष्ण की बात सुनकर बाणासुर को आत्मग्लानी होने लगी और उसे अपनी गलती का एहसास होने लगा और उसकी वजह से ही दोनों देवता लड़ने को उतारू हो गए थे। बाणासुर ने श्रीकृष्ण से माफ़ी मांग ली।

बाणासुर के माफ़ी मांगते ही शिवजी का वचन सत्य हुआ की बाणासुर श्रीकृष्ण से पराजित होगा लेकिन वो उसका साथ देंगे और उसके प्राण बचायेंगे। तत्पश्चात शिवजी और श्रीकृष्ण ने भी एक दुसरे से माफ़ी मांग ली और एक दुसरे की महिमामंडन करने लगे ।माता परमशक्ति ने दोनो को आशीर्वाद दिया और दोनों इस तरह से एक दुसरे में समा गए तब नारद जी ने प्रभु की इस लीला को देखकर सभी से कहा की आज से केवल एक इश्वर हरी-हरा हो गए हैं। फिर बाणासुर ने उषा-अनिरुद्ध का विवाह कर दिया और सब सुखी-सुखी रहने लगे। तत्पश्चात बाणासुर नर्मदा नदी के पास गया और शिवजी की फिर तपस्या करने लगा। शिवजी ने प्रकट होकर कर फिर उसकी इच्छा जाननी चाही इस पर बाणासुर ने कहा की वे उसको अपने डमरू बजाने की कला का आशीर्वाद दे और उसको अपने विशेष सेवकों में जगह भी देें तब शिवजी ने कहा की हे! बाणासुर तुम्हारे द्वारा पूजे गए शिवजी के लिंगो को बाणलिंग के नाम से जाना जायेगा और उसकी भक्ति को हमेशा याद रखा जायेगा। अब आगे की कथा इस प्रकार है की जब अनिरुद्ध और उषा का विवाह हो गया और अंत में कृष्ण-शिव एक दूसरे में समां गए लेकिन फिर भी बाणासुर की आसुरी प्रवृति नहीं बदली। बाणासुर अब और भी ज्यादा क्रूर हो गया था। बाणासुर अब जान गया था की श्रीकृष्ण कभी उसके प्राण नहीं ले सकते और शिवजी उसके किले के रक्षक हैं तो वह भी ऐसा नहीं करेंगे। राजाओं के परामर्श से ऋषि-मुनियों ने यज्ञ किया। यज्ञ की अग्नि में से माँ पार्वती जी एक छोटी सी कुंवारी कन्या के रूप में प्रकट हुयीं और उन्होंने सभी क्षत्रिय राजाओं से वर मांगने को कहा। तब सभी राजाओं ने देवी माँ से बाणासुर से रक्षा की कामना करी (जिनमे विशेषकर संभवतः सिसोदिया गेहलोत वंश के पूर्वज प्राचीन सूर्यवंशी राजा भी रहे होंगे) तब माता जी ने सभी राजाओं-ऋषि मुनियों और देवताओं को आश्वस्त किया की वे सब धैर्य रखें बाणासुर का वध समय आने पर अवश्य मेरे ही हाथो होगा। यह वचन देकर माँ वहां से निकलकर भारत के दक्षिणी छोर पर जा कर तपस्या में बैठ गयीं जहा पर त्रिवेणी संगम है। (पूर्व में बंगाल की खाड़ी-पश्चिम में अरब सागर और दक्षिण में भारतीय महासागर है) बायण माता की यह लीला बाणासुर को किले से दूर लाने की थी ताकि वह शिवजी से अलग हो जाये। आज भी उस जगह पर बायणमाता को दक्षिण भारतीय लोगो द्वारा कुंवारी कन्या के नाम से पूजा जाता है और उस जगह का नाम भी कन्याकुमारी है।

जब पार्वती जी के अवतार देवी माँ थोड़े बड़े हुए तब उनकी सुन्दरता से मंत्रमुग्ध हो कर शिवजी उनसे विवाह करने कृयरत हुए जिस पर माताजी भी राजी हो गए।विवाह की तैयारिया होने लगी। किन्तु तभी नारद मुनि यह सब देख कर चिंतित हो गए की यह विवाह अनुचित है। बायण माता तो पवित्र कुंवारी देवी हैं जो पार्वती जी का अवतार होने के बावजूत उनसे भिन्न हैं, यदि उन्होंने विवाह किया तो वे बाणासुर का वध नहीं कर पाएंगी क्यूंकि बाणासुर केवल परम सात्विकदेवी के हाथो ही मृत्यु को प्राप्त हो सकता था। तब नारद जी ने एक चाल चली क्योंकि सूर्योदय से पहले पहले शादी का मुहर्त था और शिवजी रात को कैलाश से बारात लेकर निकले थे लेकिन रास्ते में नारद मुनि मुर्गे का रूप धर के जोर जोर से बोलने लगे जिससे शिवजी को लगा की सूर्योदय होने वाला है भोर हो गयी है अब विवाह की घडी निकल चुकी है अतः शिवजी विवाह स्थल से 8-10 किलोमीटर दूर ही रुक गए। देवी माँ दक्षिण में त्रिवेणी स्थान पर शिवजी का इंतज़ार करती रह गयी। जब शिवजी नहीं आये तो माताजी क्रोद्धित हो गयीं। उन्होंने जीवन पर्यन्त सात्विक रहने का प्रण ले लिया और सदैव कुंवारी रहकर तपस्या में लीन हो गयी। जहाँ शिवजी रुक गए थे वहाँ पर आज भी कन्याकुमारी के पास में शुचीन्द्रम नामक स्थान पर उनका बहुत ही भव्य मंदिर हैं। इश्वर की लीला से कुछ वर्षो बाद बाणासुर को माताजी की माया का पता चला तब वह खुद माताजी से विवाह करने को आया किन्तु देवी माँ ने माना कर दिया। जिसपर बाणासुर क्रुद्ध हुआ वह पहले से ही अति अभिमान हो कर भारत वर्ष में क्रूरता बरसा ही रहा था। तब उसने युद्ध के बल पर देवी माँ से विवाह करने की ठानी।

जिसमे देवी माँ ने प्रचंड रूप धारण कर उसकी पूरी दैत्य सेना का नाश कर दिया और अपने चक्र से बाणासुर का सर काट के उसका वध कर दिया। मृत्यु पूर्व बाणासुर ने परा-शक्ति के प्रारूप उस देवी से अपने जीवन भर के पापों के लिए क्षमा मांगी और मोक्ष की याचना करी जिस पर देवी माता ने उसकी आत्मा को मोक्ष प्रदान कर दिया। इस प्रकार देवी माँ को बाणासुर का वध करने की वजह से बायण माता,बाण माता या ब्राह्मणी माता के नाम से भी जाना जाता है। महा-मायादेवी माँ दुर्गा की असंख्य योगिनियाँ हैं और सबकी भिन्न भिन्न निशानिया और स्वरुप होते हैं। जिनमे बायणमाता पूर्ण सात्विक और पवित्र देवी हैं जो तामसिक और कामसिक सभी तत्वों से दूर हैं। माँ पारवती जी का ही अवतार होने के बावजूद बायण माता अविवाहित देवी हैं। तथा परा-शक्ति देवी माँ दुर्गा का अंश एक योगिनी अवतारी देवी होने के बावजूद भी बायण माता तामसिक तत्वों से भी दूर हैं अर्थात इनके काली-चामुंडा माता की तरह बलिदान भी नहीं चढ़ता है। में व्यक्तिगत रूप से माँ की कृपा के कारण अपने आप को कृतघ्न मानता हूँ क्योंकि माँ सदैव मेरे आसपास ही रहती हैं।


जहाँ मेरा गांव और जन्मभूमि हैं वहा पर माँ पहले से ही सोनाणा खेतलाजी के साथ विराजित हैं। वहां पर माँ को ब्राह्मणी माँ के नाम से पूजते हैं। और जब सुदूर दक्षिण में रोजी रोटी के लिए आया हूँ तो माँ यहाँ भी पहले कन्याकुमारी रूप में विराजित हैं। वर्तमान मे भारत के दक्षिण में कन्याकुमारी ही मेरी कर्मभूमि हैं और जब मेने कन्याकुमारी का इतिहास जाना तो मुझे बहुत ही आश्चर्य हुआ। और इसी आश्चर्य ने मुझे माँ के इतिहास और अवतार के बारे में जानने के लिए प्रेरित किया। क्योंकि देवी कन्याकुमारी ने भी बाणासुर का वध किया था और माँ बाण माता ने भी बाणासुर का वध किया था और जब मेने इतिहास के पन्नों को खंगालना शुरू किया और जो भी जानकारी मुझे मिली मेने उसे आप तक पहुचाने की गुस्ताखी की हैं। इस तरह मुझे यह जानने में भी आसानी हुई की किस तरह माँ बाण माता ही दक्षिण में कन्याकुमारी के रूप में भी पूजी जाती हैं। भरत गेहलोत (आना)

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सिसोदिया राजवंश  



सन् 556 ई. में जिस 'गुहिल वंश' की स्थापना हुई, बाद में वही 'गहलौत वंश' बना और इसके बाद यह 'सिसोदिया राजवंश' के नाम से जाना गया। जिसमें कई प्रतापी राजा हुए, जिन्होंने इस वंश की मानमर्यादा, इज़्ज़त और सम्मान को न केवल बढ़ाया बल्कि इतिहास के गौरवशाली अध्याय में अपना नाम जोड़ा। महाराणा महेन्द्र तक यह वंश कई उतार-चढाव और स्वर्णिम अध्याय रचते हुए आज भी अपने गौरव और श्रेष्ठ परम्परा के लिये पहचाना जाता है। मेवाड़ अपनी समृद्धि, परम्परा, अद्भुत शौर्य एवं अनूठी कलात्मक अनुदानों के कारण संसार के परिदृश्य में देदीप्यमान है। स्वाधीनता एवं भारतीय संस्कृति की अभिरक्षा के लिए इस वंश ने जो अनुपम त्याग और अपूर्व बलिदान दिये जो सदा स्मरण किये जाते रहेंगे। मेवाड़ की वीर प्रसूता धरती में रावल बप्पा, महाराणा सांगा, महाराणा प्रताप जैसे शूरवीर, यशस्वी, कर्मठ, राष्ट्रभक्त व स्वतंत्रता प्रेमी विभूतियों ने जन्म लेकर न केवल मेवाड़ वरन संपूर्ण भारत को गौरान्वित किया है। स्वतन्त्रता की अलख जगाने वाले महाराणा प्रताप आज भी जन-जन के हृदय में बसे हुये, सभी स्वाभिमानियों के प्रेरक बने हुए है।

इतिहास
सन 712 ई. में अरबों ने सिंध पर आधिपत्य जमा कर भारत विजय का मार्ग प्रशस्त किया। इस काल में न तो कोई केन्द्रीय सत्ता थी और न कोई सबल शासक था जो अरबों की इस चुनौती का सामना करता। फ़लतः अरबों ने आक्रमणों की बाढ ला दी और सन 725 ई. में जैसलमेर, मारवाड़, मांडलगढ और भडौच आदि इलाकों पर अपना आधिपत्य जमा लिया। ऐसे लगने लगा कि शीघ्र ही मध्य पूर्व की भांति भारत में भी इस्लाम की तूती बोलने लगेगी। ऐसे समय में दो शक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ। एक ओर जहां नागभाट ने जैसलमेर, मारवाड, मांडलगढ से अरबों को खदेड़कर जालौर में प्रतिहार राज्य की नींव डाली, वहां दूसरी ओर बप्पा रायडे ने चित्तौड़ के प्रसिद्ध दुर्ग पर अधिकार कर सन 734 ई. में मेवाड़ में गुहिल वंश अथवा गहलौत वंश का वर्चश्व स्थापित किया और इस प्रकार अरबों के भारत विजय के मनसूबों पर पानी फ़ेर दिया।

गुहिल वंश

मेवाड़ का गुहिल वंश संसार के प्राचीनतम राज वंशों में माना जाता है। मेवाड़ राज्य की केन्द्रीय सत्ता का उद्भव स्थल सौराष्ट्र रहा है। जिसकी राजधानी बल्लभीपुर थी और जिसके शासक सूर्यवंशी क्षत्रिय कहलाते थे। यही सत्ता विस्थापन के बाद जब ईडर में स्थापित हुई तो गहलौत मान से प्रचलित हुई। ईडर से मेवाड़ स्थापित होने पर रावल गहलौत हो गई। कालान्तर में इसकी एक शाखा सिसोदे की जागीर की स्थापना करके सिसोदिया हो गई। चूँकि यह केन्द्रीय रावल गहलौत शाखा कनिष्ठ थी। इसलिये इसे राणा की उपाधि मिली। उन दिनों राजपूताना में यह परम्परा थी कि लहुरी शाखा को राणा उपाधि से सम्बोधित किया जाता था। कुछ पीढियों बाद एक युद्ध में रावल शाखा का अन्त हो गया और मेवाड़ की केन्द्रीय सत्ता पर सिसोदिया राणा का आधिपत्य हो गया। केन्द्र और उपकेन्द्र पहचान के लिए केन्द्रीय सत्ता के राणा महाराणा हो गये। गहलौत वंश का इतिहास ही सिसोदिया वंश का इतिहास है।

मान्यताएँ

मान्यता है कि सिसोदिया क्षत्रिय भगवान राम के कनिष्ठ पुत्र लव के वंशज हैं। सूर्यवंश के आदि पुरुष की 65 वीं पीढ़ी में भगवान राम हुए 195 वीं पीढ़ी में वृहदंतक हुये। 125 वीं पीढ़ी में सुमित्र हुये। 155 वीं पीढ़ी अर्थात सुमित्र की 30 वीं पीढ़ी में गुहिल हुए जो गहलोत वंश की संस्थापक पुरुष कहलाये। गुहिल से कुछ पीढ़ी पहले कनकसेन हुए जिन्होंने सौराष्ट्र में सूर्यवंश के राज्य की स्थापना की। गुहिल का समय 540 ई. था। बटवारे में लव को श्री राम द्वारा उत्तरी पश्चिमी क्षेत्र मिला जिसकी राजधानी लवकोट थी। जो वर्तमान में लाहौर है। ऐसा कहा जाता है कि कनकसेन लवकोट से ही द्वारका आये। हालांकि वो विश्वस्त प्रमाण नहीं है। टॉड मानते है कि 145 ई. में कनकसेन द्वारका आये तथा वहां अपने राज्य की परमार शासक को पराजित कर स्थापना की जिसे आज सौराष्ट्र क्षेत्र कहा जाता है। कनकसेन की चौथी पीढ़ी में पराक्रमी शासक सौराष्ट्र के विजय सेन हुए जिन्होंने विजय नगर बसाया। विजय सेन ने विदर्भ की स्थापना की थी। जिसे आज सिहोर कहते हैं। तथा राजधानी बदलकर बल्लभीपुर (वर्तमान भावनगर) बनाया। इस वंश के शासकों की सूची टॉड देते हुए कनकसेन, महामदन सेन, सदन्त सेन, विजय सेन, पद्मादित्य, सेवादित्य, हरादित्य, सूर्यादित्य, सोमादित्य और शिला दित्य बताया। 524 ई. में बल्लभी का अन्तिम शासक शिलादित्य थे। हालांकि कुछ इतिहासकार 766 ई. के बाद शिलादित्य के शासन का पतन मानते हैं। यह पतन पार्थियनों के आक्रमण से हुआ। शिलादित्य की राजधानी पुस्पावती के कोख से जन्मा पुत्र गुहादित्य की सेविका ब्रहामणी कमलावती ने लालन पालन किया। क्योंकि रानी उनके जन्म के साथ ही सती हो गई। गुहादित्य बचपन से ही होनहार था और ईडर के भील मंडालिका की हत्या करके उसके सिहांसन पर बैठ गया तथा उसके नाम से गुहिल, गिहील या गहलौत वंश चल पडा। कर्नल टॉड के अनुसार गुहादित्य की आठ पीढ़ियों ने ईडर पर शासन किया ये निम्न हैं - गुहादित्य, नागादित्य, भागादित्य, दैवादित्य, आसादित्य, कालभोज, गुहादित्य, नागादित्य।[1]

सिसोदिया गहलौत
जेम्स टॉड के अनुसार शिकार के बहाने भीलों द्वारा नागादित्य की हत्या कर दी। इस समय इसके पुत्र बप्पा की आयु मात्र तीन वर्ष की थी। बप्पा की भी एक ब्राहमणी ने संरक्षण देकर अरावली के बीहड में शरण लिया। गौरीशंकर ओझा गुहादित्य और बप्पा के बीच की वंशावली प्रस्तुत की, वह सर्वाधिक प्रमाणिक मानी गई है जो निम्न है - गुहिल, भोज, महेन्द्र, नागादित्य, शिलादित्य, अपराजित, महेन्द्र द्वितीय और कालभोज बप्पा आदि। यह एक संयोग ही है कि गुहादित्य और मेवाड राज्य में गहलोत वंश स्थापित करने वाले बप्पा का बचपन अरावली के जंगल में उन्मुक्त, स्वच्छन्द वातावरण में व्यतीत हुआ। बप्पा के एक लिंग पूजा के कारण देवी भवानी का दर्शन उन्हे मिला और बाबा गोरखनाथ का आशिर्वाद भी। बडे होने पर चित्तौड़ के राजा से मिल कर बप्पा ने अपना वंश स्थापित किया और परमार राजा ने उन्हे पूरा स्नेह दिया। इसी समय विदेशी आक्रमणकारियों के आक्रमण को बप्पा ने विफ़ल कर चित्तोड़ से उन्हे गजनी तक खदेड कर अपने प्रथम सैन्य अभिमान में ही सफ़लता प्राप्त की। बप्पा द्वारा धारित रावल उपाधि रावल रणसिंह ( कर्ण सिंह ) 1158 ई. तक निर्वाध रुप से चलती रही। रावण रण सिंह के बाद रावल गहलोत की एक शाखा और हो गई। जो सिसोदिया के जागीर पर आसीन हुई जिसके संस्थापक माहव एवं राहप दो भाई थे। सिसोदा में बसने के कारण ये लोग सिसोदिया गहलौत कहलाये।


महाराणा प्रताप
सत्ता परिवर्तन, स्थान परिवर्तन, व्यक्तिगत महत्वकांक्षा एवं राजपरिवार में संख्या वृद्धि से ही राजपूत वंशों में अनेक शाखाओं एवं उपशाखाओं ने जन्म लिया है। यह बात गहलौत वंश के साथ भी देखने को मिली है। बप्पा के शासन काल मेवाड़ राज्य के विस्तार के साथ ही उसकी प्रतिष्ठा में भी अत्यधिक वृद्धि हुई है। बप्पा के बाद गहलौत वंश की शाखाओं का निम्न विकास हुआ।

1. अहाडिया गहलौत
अहाड नामक स्थान पर बसने के कारण यह नाम हुआ।

2. असिला गहलौत
सौराष्ट्र में बप्पा के पुत्र ने असिलगढ का निर्माण अपने नाम असिल पर किया जिससे इसका नाम असिला पडा।

3. पीपरा गहलौत
बप्पा के एक पुत्र मारवाड के पीपरा पर आधिपत्य पर पीपरा गहलौत वंश चलाया।

4. मागलिक गहलौत
लोदल के शासक मंगल के नाम पर यह वंश चला।

5. नेपाल के गहलोत
रतन सिंह के भाई कुंभकरन ने नेपाल में आधिपत्य किया अतः नेपाल का राजपरिवार भी मेवाड़ की शाखा है।

6. सखनियां गहलौत
रतन सिंह के भाई श्रवण कुमार ने सौराष्ट्र में इस वंश की स्थापना की।

7. सिसौद गहलौत
कर्णसिंह के पुत्र को सिसौद की जागीर मिली और सिसौद के नाम पर सिसौदिया गहलौत कहलाया।

सिसौदिया वंश की उपशाखाएं
चन्द्रावत सिसौदिया
यह 1275 ई. में अस्तित्व में आई। चन्द्रा के नाम पर इस वंश का नाम चन्द्रावत पडा।

भोंसला सिसौदिया
इस वंश की स्थापना सज्जन सिंह ने सतारा में की थी।

चूडावत सिसौदिया
चूडा के नाम पर यह वंश चला। इसकी कुल 30 शाखाएं हैं।
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सिसोदिया वंश (गहलौत वंश) के शासक और उनका शासनकाल

शासकशासनकाल
रावल बप्पा (काल भोज)734 - 753 ई.
रावल खुमान753 - 773 ई.
मत्तट773 – 793 ई.
भर्तभट्त793 – 813 ई.
रावल सिंह813 – 828 ई.
खुमाण सिंह828 – 853 ई.
महायक853 – 878 ई.
खुमाण तृतीय878 – 903 ई.
भर्तभट्ट द्वितीय903 – 951 ई.
अल्लट951 – 971 ई.
नरवाहन971 – 973 ई.
शालिवाहन973 – 977 ई.
शक्ति कुमार977 – 993 ई.
अम्बा प्रसाद993 – 1007 ई.
शुची वरमा1007- 1021 ई.
नर वर्मा1021 – 1035 ई.
कीर्ति वर्मा1035 – 1051 ई.
योगराज1051 – 1068 ई.
वैरठ1068 – 1088 ई.
हंस पाल1088 – 1103 ई.
वैरी सिंह1103 – 1107 ई.
विजय सिंह1107 – 1127 ई.
अरि सिंह1127 – 1138 ई.
चौड सिंह1138 – 1148 ई.
विक्रम सिंह1148 – 1158 ई.
रण सिंह (कर्ण सिंह)1158 – 1168 ई.
क्षेम सिंह1168 – 1172 ई.
सामंत सिंह1172 – 1179 ई.
रतन सिंह1301-1303 ई.
राजा अजय सिंह1303 - 1326 ई.
महाराणा हमीर सिंह1326 - 1364 ई.
महाराणा क्षेत्र सिंह1364 - 1382 ई.
महाराणा लाखासिंह1382 - 1421 ई.
महाराणा मोकल1421 - 1433 ई.
महाराणा कुम्भा1433 - 1469 ई.
महाराणा उदा सिंह1468 - 1473 ई.
महाराणा रायमल1473 - 1509 ई.
महाराणा सांगा (संग्राम सिंह)1509 - 1527 ई.
महाराणा रतन सिंह1528 - 1531 ई.
महाराणा विक्रमादित्य1531 - 1534 ई.
महाराणा उदय सिंह1537 - 1572 ई.
महाराणा प्रताप1572 -1597 ई.
महाराणा अमर सिंह1597 - 1620 ई.
महाराणा कर्ण सिंह1620 - 1628 ई.
महाराणा जगत सिंह1628 - 1652 ई.
महाराणा राजसिंह1652 - 1680 ई.
महाराणा अमर सिंह द्वितीय1698 - 1710 ई.
महाराणा संग्राम सिंह1710 - 1734 ई.
महाराणा जगत सिंह द्वितीय1734 - 1751 ई.
महाराणा प्रताप सिंह द्वितीय1751 - 1754 ई.
महाराणा राजसिंह द्वितीय1754 - 1761 ई.
महाराणा हमीर सिंह द्वितीय1773 - 1778 ई.
महाराणा भीमसिंह1778 - 1828 ई.
महाराणा जवान सिंह1828 - 1838 ई.
महाराणा सरदार सिंह1838 - 1842 ई.
महाराणा स्वरुप सिंह1842 - 1861 ई.
महाराणा शंभू सिंह1861 - 1874 ई.
महाराणा सज्जन सिंह1874 - 1884 ई.
महाराणा फ़तेह सिंह1883 - 1930 ई.
महाराणा भूपाल सिंह1930 - 1955 ई.
महाराणा भगवत सिंह1955 - 1984 ई.
महाराणा महेन्द्र सिंह1984 ई.

राष्ट्रपति चुनाव : विस्तृत जानकारी





भारत में कैसे होता है राष्ट्रपति का चुनाव

नवभारत टाइम्स | Updated: Jun 7, 2017

अखिलेश प्रताप सिंह
हमारे देश में राष्ट्रपति के चुनाव का तरीका अनूठा है और एक तरह से इसे आप सर्वश्रेष्ठ संवैधानिक तरीका कह सकते हैं। इसमें विभिन्न देशों की चुनाव पद्धतियों की अच्छी बातों को चुन-चुन कर शामिल किया गया है। मसलन यहां राष्ट्रपति का चुनाव एक इलेक्टोरल कॉलेज करता है, लेकिन इसके सदस्यों का प्रतिनिधित्व आनुपातिक भी होता है। उनका सिंगल वोट ट्रांसफर होता है, पर उनकी दूसरी पसंद की भी गिनती होती है। इस चुनाव प्रणाली की खूबसूरती को समझने के लिए हमें इन बिंदुओं को समझना होगा।

इनडायरेक्ट इलेक्शन: प्रेजिडेंट का चुनाव एक निर्वाचक मंडल यानी इलेक्टोरल कॉलेज करता है। संविधान के आर्टिकल 54 में इसका उल्लेख है। यानी जनता अपने प्रेजिडेंट का चुनाव सीधे नहीं करती, बल्कि उसके वोट से चुने गए लोग करते हैं। यह है अप्रत्यक्ष निर्वाचन।

वोट देने का अधिकार: इस चुनाव में सभी प्रदेशों की विधानसभाओं के इलेक्टेड मेंबर और लोकसभा तथा राज्यसभा में चुनकर आए सांसद वोट डालते हैं। प्रेजिडेंट की ओर से संसद में नॉमिनेटेड मेंबर वोट नहीं डाल सकते। राज्यों की विधान परिषदों के सदस्यों को भी वोटिंग का अधिकार नहीं है, क्योंकि वे जनता द्वारा चुने गए सदस्य नहीं होते।

सिंगल ट्रांसफरेबल वोट: इस चुनाव में एक खास तरीके से वोटिंग होती है, जिसे सिंगल ट्रांसफरेबल वोट सिस्टम कहते हैं। यानी वोटर एक ही वोट देता है, लेकिन वह तमाम कैंडिडेट्स में से अपनी प्रायॉरिटी तय कर देता है। यानी वह बैलट पेपर पर बता देता है कि उसकी पहली पसंद कौन है और दूसरी, तीसरी कौन। यदि पहली पसंद वाले वोटों से विजेता का फैसला नहीं हो सका, तो उम्मीदवार के खाते में वोटर की दूसरी पसंद को नए सिंगल वोट की तरह ट्रांसफर किया जाता है। इसलिए इसे सिंगल ट्रांसफरेबल वोट कहा जाता है।

आनुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था: वोट डालने वाले सांसदों और विधायकों के वोट का वेटेज अलग-अलग होता है। दो राज्यों के विधायकों के वोटों का वेटेज भी अलग होता है। यह वेटेज जिस तरह तय किया जाता है, उसे आनुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था कहते हैं। कैसे तय होता है यह वेटेज?

एमएलए के वोट का वेटेज
विधायक के मामले में जिस राज्य का विधायक हो, उसकी आबादी देखी जाती है। इसके साथ उस प्रदेश के विधानसभा सदस्यों की संख्या को भी ध्यान में रखा जाता है। वेटेज निकालने के लिए प्रदेश की पॉपुलेशन को इलेक्टेड एमएलए की संख्या से डिवाइड किया जाता है। इस तरह जो नंबर मिलता है, उसे फिर 1000 से डिवाइड किया जाता है। अब जो आंकड़ा हाथ लगता है, वही उस राज्य के एक विधायक के वोट का वेटेज होता है। 1000 से भाग देने पर अगर शेष 500 से ज्यादा हो तो वेटेज में 1 जोड़ दिया जाता है।

एमपी के वोट का वेटेज
सांसदों के मतों के वेटेज का गणित अलग है। सबसे पहले सभी राज्यों की विधानसभाओं के इलेक्टेड मेंबर्स के वोटों का वेटेज जोड़ा जाता है। अब इस सामूहिक वेटेज को राज्यसभा और लोकसभा के इलेक्टेड मेंबर्स की कुल संख्या से डिवाइड किया जाता है। इस तरह जो नंबर मिलता है, वह एक सांसद के वोट का वेटेज होता है। अगर इस तरह भाग देने पर शेष 0.5 से ज्यादा बचता हो तो वेटेज में एक का इजाफा हो जाता है।

वोटों की गिनती
प्रेजिडेंट के चुनाव में सबसे ज्यादा वोट हासिल करने से ही जीत तय नहीं होती है। प्रेजिडेंट वही बनता है, जो वोटरों यानी सांसदों और विधायकों के वोटों के कुल वेटेज का आधा से ज्यादा हिस्सा हासिल करे। यानी इस चुनाव में पहले से तय होता है कि जीतने वाले को कितना वोट यानी वेटेज पाना होगा। इस समय प्रेजिडेंट इलेक्शन के लिए जो इलेक्टोरल कॉलेज है, उसके सदस्यों के वोटों का कुल वेटेज 10,98,882 है। तो जीत के लिए कैंडिडेट को हासिल करने होंगे 5,49,442 वोट। जो प्रत्याशी सबसे पहले यह कोटा हासिल करता है, वह प्रेजिडेंट चुन लिया जाता है। लेकिन सबसे पहले का मतलब क्या है?

प्रायॉरिटी का महत्व
इस सबसे पहले का मतलब समझने के लिए वोट काउंटिंग में प्रायॉरिटी पर गौर करना होगा। सांसद या विधायक वोट देते वक्त अपने मतपत्र पर बता देते हैं कि उनकी पहली पसंद वाला कैंडिडेट कौन है, दूसरी पसंद वाला कौन और तीसरी पसंद वाला कौन आदि आदि। सबसे पहले सभी मतपत्रों पर दर्ज पहली वरीयता के मत गिने जाते हैं। यदि इस पहली गिनती में ही कोई कैंडिडेट जीत के लिए जरूरी वेटेज का कोटा हासिल कर ले, तो उसकी जीत हो गई। लेकिन अगर ऐसा न हो सका, तो फिर एक और कदम उठाया जाता है।

पहले उस कैंडिडेट को रेस से बाहर किया जाता है, जिसे पहली गिनती में सबसे कम वोट मिले। लेकिन उसको मिले वोटों में से यह देखा जाता है कि उनकी दूसरी पसंद के कितने वोट किस उम्मीदवार को मिले हैं। फिर सिर्फ दूसरी पसंद के ये वोट बचे हुए उम्मीदवारों के खाते में ट्रांसफर किए जाते हैं। यदि ये वोट मिल जाने से किसी उम्मीदवार के कुल वोट तय संख्या तक पहुंच गए तो वह उम्मीदवार विजयी माना जाएगा। अन्यथा दूसरे दौर में सबसे कम वोट पाने वाला रेस से बाहर हो जाएगा और यह प्रक्रिया फिर से दोहराई जाएगी। इस तरह वोटर का सिंगल वोट ही ट्रांसफर होता है। यानी ऐसे वोटिंग सिस्टम में कोई मैजॉरिटी ग्रुप अपने दम पर जीत का फैसला नहीं कर सकता है। छोटे-छोटे दूसरे ग्रुप्स के वोट निर्णायक साबित हो सकते हैं। यानी जरूरी नहीं कि लोकसभा और राज्यसभा में जिस पार्टी का बहुमत हो, उसी का दबदबा चले। विधायकों का वोट भी अहम है।

रेस से बाहर करने का नियम
सेकंड प्रायॉरिटी के वोट ट्रांसफर होने के बाद सबसे कम वोट वाले कैंडिडेट को बाहर करने की नौबत आने पर अगर दो कैंडिडेट्स को सबसे कम वोट मिले हों, तो बाहर उसे किया जाता है, जिसके फर्स्ट प्रायॉरिटी वाले वोट कम हों।

बना रहता है चांस
अगर अंत तक किसी प्रत्याशी को तय कोटा न मिले, तो भी इस प्रक्रिया में कैंडिडेट बारी-बारी से रेस से बाहर होते रहते हैं और आखिर में जो बचेगा, वही विजयी होगा।
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राष्ट्रपति चुनाव: कैसे चुनते हैं राष्ट्रपति (विस्तृत जानकारी)  
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। राष्ट्रपति का यहां सर्वोच्च संवैधानिक पद है। संवैधानिक प्रक्रिया के अंतर्गत हर 5 वर्षों में राष्ट्रपति का चुनाव किया जाता है। 
एक व्यक्ति को राष्ट्रपति बनने के लिए कुछ अनिवार्य शर्तें हैं, जिनमें प्रमुख हैं:-
 
वह भारत का नागरिक हो.
उसने कम से कम 35 वर्ष की आयु पूर्ण कर ली हो.
वह लोकसभा का सदस्य बनने की पात्रता रखता हो.
राष्ट्रपति बनने के बाद उम्मीदवार संसद के किसी भी सदन या राज्यों की किसी भी विधानसभा/विधान परिषद का सदस्य नहीं होना चाहिए.
वह भारत सरकार के अंतर्गत किसी भी लाभ के पद पर न हो.
भारत में राष्ट्रपति का चयन सीधे-सीधे जनता नहीं करती है, लेकिन वह अप्रत्यक्ष रूप से इस चुनाव में सम्मिलित होती है. राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को जनता का वोट उसके प्रतिनिधि यानी क्षेत्र के विधायक के ज़रिए मिलता है. राष्ट्रपति के चुनाव में लोकसभा, राज्यसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य मतदान करते हैं. राष्ट्रपति चुनाव में कोई भी पार्टी व्हिप नहीं जारी करती है यानी यह ज़रूरी नहीं है कि किसी भी पार्टी के सदस्य उस पार्टी द्वारा प्रस्तावित उम्मीदवार को ही वोट करेंगे. चूंकि राष्ट्रपति चुनाव में गुप्त मतदान होता है, इसलिए इसका खुलासा नहीं हो पाता है कि किस सांसद/विधायक ने किस उम्मीदवार को वोट दिया. देश में छह राज्य ऐसे हैं, जहां विधानसभा के साथ-साथ विधान परिषद भी है, लेकिन इस चुनाव में केवल राज्यों के निचले सदन (विधानसभा) के सदस्य ही मतदान में भाग ले सकते हैं. देश में सभी राज्यों में उच्च सदन (विधान परिषद) नहीं है. सभी राज्यों में एकरूपता और समानता बनी रहे, इसलिए केवल विधानसभा के सदस्यों को ही राष्ट्रपति के चुनाव में मत देने का प्रावधान है. विधानसभा में ऐसे विधायक, जो राज्यपाल द्वारा मनोनीत किए जाते हैं, वे किसी क्षेत्र विशेष की जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं, इसलिए राष्ट्रपति के  चुनाव में उन्हें मतदान का अधिकार नहीं होता है. ठीक यही नियम लोकसभा और राज्यसभा में मनोनीत सदस्यों पर लागू होता है. राज्यसभा के वे सदस्य, जिन्हें अपने क्षेत्र में विशिष्ट पहचान और स्थान बनाने की वजह से मनोनीत किया गया है, भी राष्ट्रपति के चुनाव में अपना वोट नहीं डाल सकते. उदाहरण के तौर पर इस बार के राष्ट्रपति चुनाव में राज्यसभा सदस्य क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर, अभिनेत्री रेखा एवं अनु आगा अपना वोट नहीं डाल सकेंगे. इसी तरह लोकसभा में मनोनीत किए जाने वाले एंग्लो इंडियन सदस्य भी राष्ट्रपति चुनाव में मतदान नहीं कर सकते हैं.

अब यह जानते हैं कि आ़िखर राष्ट्रपति चुनाव में मतदान किस प्रकार होता है:-
 
भले ही 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 1.2 अरब है, लेकिन अभी भी भारत में चुनावों के लिए 1971 की जनगणना के आंकड़ों को आधार माना जाता है. 2026 तक 1971 की जनगणना के आधार पर ही चुनाव संपन्न होंगे. राष्ट्रपति चुनाव के लिए ़खास प्रकार का फार्मूला तय किया गया है, जिससे बिना किसी पक्षपात या गड़बड़ी के यह चुनाव सही तरीक़े से संपन्न हो सके. इसके लिए यह जानना ज़रूरी है कि राष्ट्रपति चुनाव में प्रत्येक मतदाता का मत एक मत के रूप में नहीं गिना जाता है. सांसदों के वोट की वैल्यू तो समान होती है, मगर हर राज्य के विधायक के वोट की वैल्यू अलग-अलग होती है. दोनों सदनों के निर्वाचित सांसदों के वोट की वैल्यू सभी राज्यों के विधायकों की कुल वोट वैल्यू के बराबर होती है.

राष्ट्रपति चुनाव में इस्तेमाल होने वाले फार्मूले के आधार पर वोट वैल्यू निकालने के तीन चरण हैं:-

सबसे पहले हर राज्य के विधायक के वोट की वैल्यू निकाली जाती है.
विधायकों की संख्या के आधार पर उस राज्य के  कुल वोटों की वैल्यू निकाली जाती है.
 देश के कुल विधायकों की संख्या और वोट वैल्यू के आधार पर लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों के वोट की वैल्यू निकाली जाती है.
इस प्रक्रिया से गुज़रते हुए राष्ट्रपति चुनाव में पड़ने वाले कुल वोटों की गणना की जाती है. चुनाव में पड़ने वाले कुल वोटों की वैल्यू निकाली जा सकती है.

राज्य के विधायक के वोट की वैल्यू यानी संख्या निकालने के लिए:- 1971 की जनगणना के अनुसार, राज्य की जनसंख्या को वहां की विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों की संख्या से भाग दिया जाए, परिणाम में जो भी संख्या आए, उसे फिर से 1000 से भाग दिया जाए. इसके बाद जो परिणाम निकलेगा, वह उस राज्य के एक विधायक के वोट की वैल्यू होगी. इस तरह प्रत्येक राज्य के विधायकों के वोट की वैल्यू निकाली जाती है.
राज्य की कुल वोट वैल्यू निकालने के लिए:- राज्य के कुल विधायकों के वोटों की वैल्यू निकालने के लिए एक विधायक के वोट की वैल्यू को राज्य विधानसभा के कुल विधायकों की संख्या से गुणा किया जाए. इससे जो परिणाम आएगा, वह उस राज्य का कुल वोट होगा. इसी तरह हर राज्य अपनी भागीदारी राष्ट्रपति चुनाव में सुनिश्चित करता है.
सांसदों के वोट की वैल्यू निकालने के लिए:- सांसदों के वोट की वैल्यू निकालने के लिए संसद के निर्वाचित सदस्यों की संख्या को जोड़ते हैं. लोकसभा और राज्यसभा के निर्वाचित सदस्यों को जोड़कर जो परिणाम आए, उससे राज्यों के कुल वोट में भाग देते हैं. इससे जो परिणाम आए, वह एक सांसद के वोट की वैल्यू होगी. कुल सांसदों के वोटों की वैल्यू निकालने के लिए कुल सांसदों की संख्या को एक सांसद के वोट की वैल्यू से गुणा करते हैं. अब राष्ट्रपति चुनाव में मतदाताओं के वोटों की वैल्यू निकालने के लिए कुल सांसदों और कुल विधायकों के वोटों की वैल्यू जोड़ेंगे, जो परिणाम आए, वह मतदान में कुल पड़ने वाले वोटों की संख्या होगी.
नियम यह है कि राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार व्यक्ति को चुनाव जीतने के लिए 50 प्रतिशत से ज़्यादा वोट पाना आवश्यक होता है. मतलब यह कि 50 प्रतिशत के अलावा 1 और वोट उम्मीदवार के पक्ष में आना ज़रूरी है. राष्ट्रपति पद का चुनाव मल्टी कैंडिडेट इलेक्शन होता है यानी इस चुनाव में दो से ज़्यादा उम्मीदवार खड़े हो सकते हैं, इसलिए ज़्यादातर यह संभव नहीं है कि किसी भी उम्मीदवार को निर्वाचन के लिए 50 प्रतिशत से ज़्यादा वोट मिल सकें. इसलिए ट्रांसफरेबल वोट सिस्टम का प्रावधान है. देश के छठवें राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी इस मामले में अपवाद रहे हैं. वह ऐसे राष्ट्रपति हुए, जिनके खिलाफ कोई अन्य प्रत्याशी खड़ा नहीं हुआ था और इसीलिए वह निर्विरोध यानी अनअपोज्ड राष्ट्रपति बने थे. एक सही उम्मीदवार चुनने का एक खास तरीक़ा है, जिसे उदाहरण के साथ समझते हैं.
सबसे पहले यह जान लें कि राष्ट्रपति चुनाव में प्रिफ्रेंसियल सिस्टम वोटिंग होता है यानी मतदाताओं को सभी प्रत्याशियों को अपनी पसंद के क्रम के अनुसार वोट करना ज़रूरी होता है. मान लें कि 4 लोग अ, ब, स, द राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं, उन्हें सभी मतदाता अपनी इच्छा से पहली पसंद, दूसरी पसंद, तीसरी और फिर चौथी पसंद के क्रम के अनुसार वोट देंगे. मान लें कि इनमें अ को 30 प्रतिशत वोट मिले, ब को 12 प्रतिशत वोट मिले, स को 40 प्रतिशत वोट मिले और द को 18 प्रतिशत वोट मिले. ऐसे में सबसे कम वोट पाने वाले प्रत्याशी को बाहर कर दिया जाता है. बाहर किए गए उम्मीदवार को मिले वोटों को उसमें वर्णित सेकेंड प्रिफ्रेंस के आधार पर अन्य उम्मीदवारों के वोटों में शामिल कर दिया जाता है. एलिमिनेशन की यह प्रक्रिया तब तक जारी रहती है, जब तक किसी भी उम्मीदवार को 50 प्रतिशत से ज़्यादा वोट न मिल जाएं. 50 प्रतिशत से ज़्यादा वोट पाने वाले प्रत्याशी को निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है. आज तक भारत में राष्ट्रपति निर्वाचन की प्रक्रिया में एक बार ही दूसरे दौर की गिनती की गई है. 1969 में हुए चुनाव में वोटों की गिनती सेकेंड प्रिफ्रेंस के हिसाब से हुई थी. इसके बाद वी वी गिरि निर्वाचित घोषित किए गए थे. यह चुनाव इस तरह अपवाद है. इसके अलावा आज तक दूसरे दौर तक वोटों की गिनती की आवश्यकता नहीं पड़ी.
 
राष्ट्रपति चुनाव में मतदाताओं के लिए कुछ विशेष प्रावधान हैं:-

यदि किसी राज्य में विधानसभा किसी भी कारणवश निलंबित हो, फिर भी उसके निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति चुनाव में भाग ले सकते हैं. 1967 में राजस्थान विधानसभा के निलंबित होने के बावजूद निर्वाचित सदस्यों ने अपना वोट दिया था. इसी तरह बिहार विधानसभा भी 1969 में निलंबित थी, मगर निर्वाचित सदस्यों ने राष्ट्रपति चुनाव में अपना वोट डाला था.

1950 के बाद देश के 12 राष्ट्रपति हुए हैं, जिनमें कुछ ऐसे हैं, जो विशेष प्रकार से राष्ट्रपति रहे हैं.

देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद अब तक के अकेले ऐसे राष्ट्रपति हैं, जो लगातार दो बार राष्ट्रपति बने थे.
देश के दो राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन और फ़खरुद्दीन अली अहमद की मौत उनके कार्यकाल के दौरान हो गई थी, जिसके बाद तत्काल तौर पर उप राष्ट्रपति ने राष्ट्रपति का पद संभाला.
ज़ाकिर हुसैन की कार्यकाल के दूसरे वर्ष (1969) में मृत्यु के बाद तत्कालीन उप राष्ट्रपति वी वी गिरि कार्यवाहक राष्ट्रपति बने. उसके कुछ माह बाद ही राष्ट्रपति चुनाव में खड़े होने के लिए उन्होंने कार्यवाहक राष्ट्रपति के पद से इस्ती़फा दे दिया था, लेकिन चुनाव में वह हार गए और उनकी जगह मोहम्मद हिदायतुल्ला कार्यकारी राष्ट्रपति बने. फिर हुए चुनाव में वी वी गिरि खड़े हुए और उन्हें जीत मिली. इस तरह वी वी गिरि ऐसे राष्ट्रपति हुए, जो उप राष्ट्रपति रहते हुए कार्यवाहक राष्ट्रपति बने और बाद में चुनाव जीतकर राष्ट्रपति भी बने.
वी वी गिरि के बाद फ़खरुद्दीन अली अहमद राष्ट्रपति बने, लेकिन कार्यकाल के दौरान ही उनकी मृत्यु हो गई, तब तत्कालीन उप राष्ट्रपति बसप्पा दनप्पा जट्टी कार्यवाहक राष्ट्रपति बने थे.
वर्तमान में इस पद की शोभा बढ़ा रहीं प्रतिभा देवी सिंह पाटिल देश की पहली महिला राष्ट्रपति हैं.


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राष्ट्रपति चुनाव पर आपके हर सवाल का जवाब यहां है


बीबीसी की ख़ास पहल 'हमसे पूछिए' के तहत हमने आपसे पूछा था कि आप राष्ट्रपति चुनावों के किस पहलू के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं.
आपने कई सवाल भेजे जिसमें से इस सवाल में सबकी दिलचस्पी थी कि भारत का राष्ट्रपति कैसे चुना जाता है.
हमसे पूछिए: राष्ट्रपति चुनाव से जुड़े सवाल
जानिए राष्ट्रपति चुनाव में किसके पास कितने वोट
हम इस रिपोर्ट में ऐसे ही कुछ महत्वपूर्ण सवालों के जवाब दे रहे हैं.

1. राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया क्या होती है?
(भौमिक पटेल) (हर्ष प्रमेश) (मनीष कुमार) (अशोक सिंह) (मोहम्मद अलीम) (शैलेंद्र कुमार) सुशील नारायण) (लवनीत जैन) (शाहवाज) (अरविंद सिंह) (अब्दुल करीम टाक) (आर एस तिवारी) (अखिलेश यादव) सुभाष, (हरिकिशोर कुमार) (माधव शर्मा) (हेमाराम बारूपाल) (राजीव) (फैजान मलिक) (जयदेव यादव)
राष्ट्रपति का निर्वाचन इलेक्टोरल कॉलेज के द्वारा किया जाता है. इन इलेक्टोरल कॉलेज निर्वाचक मंडल के सदस्य होते हैं लोकसभा और राज्यसभा के निर्वाचित सदस्य और इसके अलावा सभी विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य.
विधान परिषद् के सदस्य उसके सदस्य नहीं होते. लोकसभा और राज्यसभा के नामांकित सदस्य भी इसके सदस्य नहीं होते हैं.
लेकिन इन सभी के मतों का मूल्य अलग-अलग होता है. लोकसभा और राज्यसभा के मत का मूल्य एक होता है और विधानसभा के सदस्यों का अलग होता है. ये राज्य की जनसंख्या के आधार पर तय होता है.
इसमें मशीन का इस्तेमाल नहीं होता है.
2.क्या राष्ट्रपति चुनाव में टाई होता है और ऐसा होता है तो चुनाव कैसे किया जाता है? (मनोज ककाडे)
टाई होने के बारे में संविधान बनाने वाले ने संकल्पना नहीं की थी. इसलिए इसके बारे में जिक्र नहीं है. राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव को लेकर जो 1952 का कानून है उसमें भी इसका जिक्र नहीं है. ऐसी स्थिति आज तक आई भी नहीं है और आने की संभावना भी नहीं दिखती है.
3.राष्ट्रपति का कार्यकाल खत्म होने के बाद क्या उनका राजनीतिक जीवन खत्म हो जाता है. क्या वो उसके बाद चुनाव नहीं लड़ सकते. (प्रदीप बस्सी)
संविधान में स्पष्ट प्रावधान है कि राष्ट्रपति कार्यकाल समाप्त होने के बाद दोबारा राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा जा सकता है. राजनीतिक जीवन समाप्त होने का कोई सवाल नहीं उठता है. वो चाहे तो किसी भी तरह से राजनीतिक जीवन में रह सकते हैं. लेकिन देश के सर्वोच्च पद पर रहने के बाद स्वाभाविक है कि वो सांसद या विधायक या राज्यपाल बनना पसंद नहीं करेंगे. क्योंकि ये सब तो राष्ट्रपति के नीचे के पद हैं.
4.राष्ट्रपति पद का क्या महत्व है जब भारत में सारे अधिकार प्रधानमंत्री के पास होते हैं? (मनोज कुमार सिंह) (मोहम्मद जावेद अख्तर) (परमजीत सिंह) (मोहम्मद अफज़ल)
ऐसा नहीं है कि सारे अधिकार प्रधानमंत्री के पास रहते हैं. सबके अपने-अपने क्षेत्र हैं. पूरी कार्यपालिका की शक्तियां राष्ट्रपति के हाथ में होती है. राष्ट्रपति इनका प्रत्यक्ष तौर पर स्वयं या फिर अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से इस्तेमाल कर सकते हैं.
राष्ट्रपति का प्रमुख दायित्व प्रधानमंत्री को नियुक्त करना और संविधान का संरक्षण करना है. यह काम कई बार वो अपने विवेक से तय करते हैं. कोई भी अधिनियम उनकी मंजूरी के बिना पारित नहीं हो सकता. वो मनी बिल को छोड़कर किसी भी बिल को पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं.
5.राष्ट्रपति का चुनाव कौन लड़ सकता है और उस व्यक्ति की योग्यता और उम्र क्या होनी चाहिए. राष्ट्रपति के कर्तव्य और अधिकार क्या हैं? (मोहम्मद इमरान खान) (अनिल कुमार) (सुरेंद्र मिश्रा)
भारत का नागरिक होना चाहिए. आयु कम से कम 35 साल होनी चाहिए. लोकसभा का सदस्य होने की पात्रता होनी चाहिए. इलेक्टोरल कॉलेज के पचास प्रस्तावक और पचास समर्थन करने वाले होने चाहिए.
राष्ट्रपति का मूल कर्तव्य संघ की कार्यकारी शक्तियों का निर्वहन करना है. फौज के प्रमुखों की नियुक्ति भी वो करते हैं.
6.राष्ट्रपति को पद से कैसे हटाया जा सकता है? (ओमप्रकाश सिंह)
राष्ट्रपति को उसके पद से महाभियोग के ज़रिये हटाया जा सकता है.
इसके लिए लोकसभा और राज्यसभा में सदस्य को चौदह दिन का नोटिस देना होता है. इस पर कम से कम एक चौथाई सदस्यों के दस्तख़त ज़रूरी होते हैं. फिर सदन उस पर विचार करता है. अगर दो-तिहाई सदस्य उसे मान लें तो फिर वो दूसरे सदन में जाएगा. दूसरा सदन उसकी जांच करेगा और उसके बाद दो-तिहाई समर्थन से वो भी पास कर देता है तो फिर राष्ट्रपति को पद से हटा हुआ माना जाएगा.
7.क्या दो ही उम्मीदवार खड़े होते हैं या ज़्यादा भी उम्मीदवार हो सकते हैं? (कृपानंद)
दो से ज्यादा भी उम्मीदवार हो सकते हैं बशर्ते कि पचास प्रस्तावक और पचास समर्थन करने वाले हो.
8.राष्ट्रपति क्षमादान के अधिकार का उपयोग अपने विवेक से करता है या मंत्रिपरिषद की सलाह पर? (नितिन गायकवाड़)
क्षमादान के अधिकार का उपयोग राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद के सलाह पर ही करता है. लेकिन मंत्रिपरिषद ने राष्ट्रपति को क्या सलाह दी है, ये अदालत में भी नहीं पूछा जा सकता है.

9.सिंगर ट्रांसफरेबल वोटिंग क्या चीज़ है. (संतोष मीणा और अब्दुल करीम टाक) (तरूण कुमार उपाध्याय)
इसमें प्रावधान यह है कि राष्ट्रपति के चुनाव में आनुपातिक प्रतिनिधित्व सिंगर ट्रांसफरेबल वोट होगा. संविधान के निर्माण के समय ये बिना किसी मीटिंग के पास हो गया था. लेकिन सवाल उठता है कि एक से ज्यादा सीटों पर अगर चुनाव हो रहा है तो आनुपातिक प्रतिनिधित्व की बात होती है. एक पद के लिए नहीं.
10.क्या अब तक किसी राष्ट्रपति का चुनाव निर्विरोध हुआ है.
नीलम संजीव रेड्डी अकेले राष्ट्रपति हुए जो निर्विरोध चुने गए थे और डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद अकेले राष्ट्रपति थे जो दो बार चुने गए.

शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

73 प्रतिशत भारतीय अपनी सरकार और उसकी नीतियों पर भरोसा करते हैं : फोर्ब्स



इस मामले में विश्व में नंबर वन बनी मोदी सरकार, 
आसपास भी नहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

फोर्ब्स मैगजीन में छपे ओईसीडी के सर्वे के अनुसार गर्वमेंट एट ग्लांस 2017 नाम के सर्वे में ये भी बताया गया है कि पिछले कुछ सालों में अलग-अलग देशों की सरकारों में जनता का भरोसा बदला रहा है।
जनसत्ता ऑनलाइन July 14, 2017


अपने देश के नागरिकों को भरोसे में लेने के मामले में भारत सरकार विश्व में नबंर वन साबित हुई है। भारतीय नागरिकों ने विश्व में सबसे ज्यादा मोदी सरकार और उनकी नीतियों पर भरोसा जताया है। हाल ही में प्रकाशित हुई इकोनॉमिक कॉर्पोरेशन ओर्गनाईजेशन ने अपनी रिपोर्ट मे कहां कि 73 फीसदी भारतीय नागरिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर भरोसा करते हैं। ये विश्व में सबसे अधिक है। जबकि दूसरे नंबर पर कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो हैं जिनकी सरकार पर 62 फीसदी कनेडियन भरोसा करते हैं। वहीं तुर्की इसमें तीसरे पायदान पर है जहां 58 फीसदी लोग अपनी सरकार पर भरोसा करते हैं। रूस और जर्मनी चौथे और पांचवे नंबर हैं। जहां जनता ने दोनों देशों की सरकार पर 58 और 55 फीसदी भरोसा जताया है। दूसरी तरफ इस मामले में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पिछड़ते हुए नजर आए। ट्रंप सरकार महज 30 फीसदी अमेरिकी नागरिकों का भरोसा हासिल करने में कामयाब हो सकी है। यूरोप के माइग्रेशन क्राइसिस, एक से ज्यादा चुनाव और बैंकों के बंद होने के चलते ग्रीस इस मामले में सबसे नीचे रहा। इस देश के केवल 13 फीसदी नागरिकों ने सरकार पर भरोसा जताया है।


वहीं हाल ही में एक भ्रष्टाचार और घोटाले के दौरान राष्ट्रपति पार्क गीन-हई के महाभियोग ने दक्षिण कोरियाई सरकार में लोगों के आत्मविश्वास को घटाकर 25 फीसदी पर ला दिया है। फोर्ब्स मैगजीन में छपे ओईसीडी के सर्वे के अनुसार गर्वमेंट एट ग्लांस 2017 नाम के सर्वे में ये भी बताया गया है कि पिछले कुछ सालों में अलग-अलग देशों की सरकारों में जनता का भरोसा बदला रहा है। सर्वे में कुल 15 देशों को जगह दी गई है। जिसमें ग्रीस सबसे नीचे तो भारत चोटी पर बना हुआ है। जानकारी के लिए बता दें कि सभी आंकड़े साल 2016 के आधार पर हैं।

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मोदी सरकार नंबर वन, भारतीयों को है उनकी कार्यशैली पर पूरा भरोसा...
पुनः संशोधित शुक्रवार, 14 जुलाई 2017  

फोर्ब्स ने दुनिया के 34 अग्रणी लोकतांत्रिक देशों में रह रहे लोगों का हवाला देते हुए एक ट्वीट कर कहा है कि दुनिया में सबसे ज्यादा 73 प्रतिशत भारतीय अपनी सरकार और उसकी नीतियों पर भरोसा करते हैं। फोर्ब्स मैगजीन में छपे ओईसीडी के सर्वे के अनुसार दुनिया में सबसे ज्यादा 73 प्रतिशत भारतीय अपनी सरकार और उसकी नीतियों पर भरोसा करते हैं।


गवर्नमेंट एट ग्लांस 2017 नाम की सर्वे रिपोर्ट में बताया गया है पिछले कुछ सालों में अलग-अलग देशों की सरकारों में जनता का भरोसा बदलता रहा है। इस लिस्ट में कुल 15 देशों को जगह दी गई है। जहां ग्रीस सबसे कम 13 प्रतिशत के साथ नीचे है वहीं भारत 75 प्रतिशत के साथ ऊपर है। भारत के बाद कनाडा, तुर्की और रूस का नाम है। इस सूची में अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और जापान जैसे देश इस मामले में भारत  से कहीं पीछे हैं।  

सोमवार, 10 जुलाई 2017

राहुल गांधी की चीन के राजदूत से गुप्त मुलाकात क्यों ?


कांग्रेस की कभी पाकिस्तान से और कभी चीन से वार्ता करना अनुचित है। चीन से वार्ता करने में जिस तरह की गुप्तता वर्ती गई उससे दाल में काला प्रतीत हेता है। कांग्रेस की बचकानी हरकतों से देश के दुश्मनों की हिम्मत बढती है। - अरविन्द सिसौदिया, जिला महामंत्री भाजपा , कोटा ।


भारत में चीन के राजदूत लिओ झाओहुई के साथ राहुल गांधी (फोटो-Twitter/@iarunmani)


राहुल गांधी की चीन के राजदूत से हुई गुप्त मुलाकात का खुलासा 

MONDAY, JULY 10, 2017

नई दिल्ली। भारत और चीन के बीच चल रहे तनाव के दौरान राहुल गांधी ने चीन के राजदूत लू झाओहुई से मुलाकात की। यह मुलाकात 8 जुलाई को हुई। चीनी दूतावास ने इसकी जानकारी अपनी बेवसाइट पर अपडेट की, फिर हटा दी। अब इसे लेकर विवाद शुरू हो गया है। कांग्रेस ने पहले ऐसी किसी भी मुलाकात से इंकार किया था अब स्वीकार कर लिया है कि मीटिंग हुई थी। लोग सवाल कर रहे हैं कि ऐसे तनाव भरे माहौल में राहुल गांधी चीन के राजदूत से क्या बात करने गए थे। इधर कांग्रेस ने कहा है कि मुद्दा यह नहीं है कि राहुल गांधी ने मुलाकात क्यों की बल्कि मुद्दा यह है कि मोदी ने चीन के राष्ट्रपति से मुलाकात के समय सीमा विवाद का मुद्दा क्यों नहीं उठाया।

पार्टी के वरिष्ठ नेता रणदीप सुरजेवाला ने इसे एक शिष्टाचार भेट बताया है। कांग्रेस नेता सुरजेवाला ने न्यूज एजेंसी एएनआई से कहा, 'कई राजदूत कांग्रेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष से समय-समय पर शिष्टाचार भेंट करते रहते हैं। किसी को इस भेंट को लेकर सनसनी फैलाने की जरूरत नहीं है। सुरजेवाला ने कहा, 'चाहे वह चीनी राजदूत हों या फिर भूटानी राजदूत राहुल गांधी समय-समय पर इनलोगों से मिलते रहते हैं। राहुल गांधी और विपक्ष के नेता सिक्किम में भारत और चीन के बीच चल रही तनातनी से वाकिफ हैं और उन्हें राष्ट्रीय हित के बारे में जानकारी है।

गौरतलब है कि चीनी दूतावास की वेबसाइट पर बाकायदा जानकारी दी गई थी कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी चीनी राजदूत लू झाओहुई से मिले और मौजूदा द्विपक्षीय संबंधों को लेकर बात की। इस जानकारी का स्क्रीनशॉट भी मौजूद है। हालांकि चीनी दूतावास की ओर से सिर्फ जानकारी हटाई गई है, सफाई में कुछ नहीं कहा गया है। अब कांग्रेस के इस बयान के बाद स्थिति साफ हो गई है।

बता दें कि कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने पीएम नरेंद्र मोदी की G20 सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग से मुलाकात पर सवाल खड़े किए थे। साथ ही राहुल गांधी ने भी हाल ही में ट्वीट पर कहा था कि पीएम मोदी चीन के मसले पर खामोश क्यों हैं।

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राहुल गांधी ने की चीनी राजदूत ने मुलाकात, कांग्रेस ने पहले किया इनकार, बाद में लिया यूटर्न
कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि कई राजदूत और नेता शिष्टाचरवश कांग्रेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष से मिलते रहते हैं, खासकर जी 5 देशों और पड़ोसी देशों के राजदूत, चाहे वो चीन के राजदूत हों, भूटान के राजदूत या फिर पूर्व एनएसए शिवशंकर मेनन।

जनसत्ता ऑनलाइन July 10, 2017

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भारत में चीन के राजदूत लिओ झाओहुई से मुलाकात की है। इस खबर के मीडिया में आते ही सनसनी मच गई। मामला यहां तक पहुंचा कि कांग्रेस को दो-दो बार सफाई देनी पड़ी। राहुल गांधी और चीनी राजदूत के बीच ये मुलाकात भारत और चीन के बीच सिक्किम मुद्दे पर अभूतपूर्व तनाव के बीच हुई है। लिहाजा इस मुलाकात पर तरह तरह के कयास लगाये जा रहे हैं। बता दें कि सबसे पहले चीनी दूतावास ने अपने वेबसाइट पर एक बयान जारी कर कहा कि दोनों के बीच में मुलाकात हुई है, लेकिन बाद में वेबसाइट ने इस बयान को हटा लिया, लेकिन सोशल मीडिया पर इस बयान की कॉपी मौजूद है। चीनी दूतावास ने बताया कि 8 जुलाई को राजदूत लिओ झाओहुई राहुल से मिले और दोनों के बीच भारत चीन संबंधों पर बात हुई। कांग्रेस ने भी पहले इस मुलाकात से इनकार किया लेकिन सोमवार (10 जुलाई) को दोपहर होते-होते कांग्रेस को फिर से अपने बयान से पलटना पड़ा और कांग्रेस ने बाद कहा कि कई देशों के नेता और राजदूत कांग्रेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष से मुलाकात करते रहते हैं।

कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि कई राजदूत और नेता शिष्टाचरवश कांग्रेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष से मिलते रहते हैं, खासकर जी5 देशों और पड़ोसी देशों के राजदूत, चाहे वो चीन के राजदूत हों, भूटान के राजदूत या फिर पूर्व एनएसए शिवशंकर मेनन। राहुल गांधी इन सभी से मिले, इसलिए किसी को भी ऐसी सामान्य मुलाकातों को बढ़ा चढ़ा कर पेश नहीं करना चाहिए, और इसे किसी घटना की तरह पेश नहीं करना चाहिए जैसा कि विदेश मंत्रालय करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन अगर आप रणदीप सुरजेवाला का 6 घंटे का पहले को ट्वीट देखे तो वो इससे एकदम अलहदा था, रणदीप सुरजेवाला ने कहा था कि मीडिया इस मामले पर फर्जी खबर चला रहा है। सुरजेवाला ने ट्वीट किया, भक्त बनने की कोशिश कर रहा एक चैनल केन्द्र के तीन मंत्रियों के चीन दौरे पर सवाल नहीं उठाएगा, जी 20 में  पीएम मोदी की चीनी राष्ट्पति की तारीफ पर सवाल खड़े नहीं करेगा, हां फर्जी खबर जरूर चलाएगा।
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चीन के राजदूत से मुलाक़ात पर चौतरफा घिरे राहुल गांधी, 
कांग्रेस बोली- भाजपा फैला रही झूठ

नई दिल्ली| एक तरफ सिक्किम बॉर्डर पर भारत और चीन की सेना युद्ध के लिए आमने-सामने डटी हुई है वहीं दूसरी ओर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने चीन के राजदूत से मुलाक़ात की है. हालांकि, कांग्रेस पार्टी ने इस मुलाकात को सिरे से खारिज किया था लेकिन चीनी दूतावास के WeChat अकाउंट से इस बात की पुष्टि हुई है.

भारत के चीनी दूतावास के मुताबिक़ राहुल और राजदूत लियो झाओहुई के बीच 8 जुलाई को मुलाकात हुई थी. इस मुलाकात में चीन-भारत संबंध के बारे में चर्चा हुई थी.

चीन के राजदूत से मिले राहुल!
वहीं, इस बात का खुलासा होने के बाद भी कांग्रेस पार्टी अभी तक इस बात को नकारने में लगी हुई है. कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने एक साथ कई ट्वीट कर मीडीय पर अपना गुस्सा निकाला है. उनका आरोप है कि कुछ टीवी चैनल भारत में चीन के राजदूत के साथ राहुल गांधी की कथित मुलाकात की झूठी खबरें दिखा रहे हैं.

उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी के संबंध में ये खबरें विदेश मंत्रालय और खुफिया एजेंसियों के सूत्रों की मनगढ़ंत कहानी है.

कांग्रेस की सोशल मीडिया प्रमुख राम्या ने अपने ट्वीट में कहा, “अगर कांग्रेस उपाध्यक्ष ने चीनी राजदूत से मुलाकात की है तो भी मुझे यह कोई मुद्दा नहीं लगता. पर प्रधानमंत्री द्वारा निजी और सार्वजनिक तौर पर सीमा विवाद को नहीं उठाना मुद्दा जरूर है.”

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

संघ में श्री गुरुदक्षिणा पर्व



संघ में गुरू दक्षिणा पर्व 
संघ में कोई भी व्यक्ति गुरु नहीं रहेगा- परम पवित्र भगवा ध्वज ही हमारा गुरु है।
- संघ संस्थापक डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार



संघशाखा प्रारम्भ होने के बाद प्रारंभिक दो वर्षों तक तो धन की कोई आवश्यकता महसूस नहीं हुई। कार्यक्रम भी सामान्य और छोटे स्वरूप के होते थे, इसलिए खर्चा भी विशेष नहीं होता था। जो कुछ थोड़ा बहुत खर्च होता उसकी पूर्ति डॉक्टरजी का मित्र-परिवार करता। उनके मित्रों को यह पूरा विश्वास था कि डॉक्टरजी निरपेक्ष देश सेवा का कार्य कर रहे हैं। इसलिए वर्ष भर में एक या दो बार वे बड़ी खुशी से संघ कार्य के लिए आर्थिक मदद देते थे। 1927 तक संघ के जिम्मेदार स्वयंसेवक डॉक्टरजी के इन विश्वासपात्र मित्रों के यहां जाकर धन ले आते थे। द्रुत गति से बढ़ने वाले संघ कार्य के लिए, कार्यक्रमों तथा प्रवास हेतु जब अधिक खर्च करना अपरिहार्य हो गया तब डॉक्टरजी ने इस संबंध में स्वयंसेवकों के साथ विचार-विमर्श प्रारंभ किया। आज तक तो धनराशि एकत्रित होती उसका पाई-पाई का हिसाब डॉक्टरजी स्वयं रखते थे और यही आदत उन्होंने स्वयंसेवकों में भी डाली। परिणम स्वरूप स्वयंसेवकों को अपने सारे कार्यक्रम सादगीपूर्ण ढंग से, कम खर्च में करने की आदत हो गई। शाखाएं तेजी से खुलने लगीं थी। नागपुर के पड़ोसी वर्धा और भंडारा जिलों में नयी शाखाएं खुलीं। इस कारण आवश्यक खर्च भी बढ़ने लगा। कुछ दिनों तक मित्रों से उधार लेने का क्रम चला। मित्र भी बड़ी आस्था से रकम उधार देते और वापसी की कोई जल्दबाजी नहीं की जाती, फिर भी उधार ली गई रकम आखिर कभी न कभी वापस करनी है- यह चिंता उन्हें अवश्य होती। फिर इस तरह उधार लेकर काम करने का क्रम आखिर कब तक चलेगा, यह चिंता स्वयंसेवकों के मन में भी उत्पन्न होने लगी और इसका कोई निदान ढूंढा जाने लगा।

एक स्वयंसेवक ने कहा, संघ कार्य हिन्दूसमाज का कार्य है। इसलिए जो आर्थिक मदद दे सकते हैं, ऐसे संघ से सहानुभूति रखने वाले लोगों से धन एकत्रित किया जाए। अन्य स्वयंसेवक ने भी इस सुझाव का समर्थन करते हुए कहा कि समाज जीवन की उन्नति हेतु चलने वाले सभी प्रकार के कार्य आखिर लोगों द्वारा दिए गए दान, अनुदान और चंदे की रकम से ही चलते हैं- अत: हमें भी इसी तरीके से धन जुटाना चाहिए। एक और स्वयंसेवक ने इस पर आपत्ति उठाते हुए कहा कि हमारा कार्य सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय कार्य है इसका लोगों का बोध कराना होगा किंतु इसके लिए उनसे आर्थिक मदद मांगना उचित नहीं होगा। इसी बात को आगग बढ़ाते हुए अन्य स्वयंसेवक ने कहा कि यदि हम इसे अपना ही कार्य कहते हैं तो संघ जैसे उदात्ता कार्य हेतु हम स्वयं ही अपना धन लगाकर खर्च की व्यवस्था क्यों न करें? डॉक्टरजी ने उसे अपना विचार अधिक स्पष्ट रूप से कहने का आग्रह किया। तब उस स्वयंसेवक ने कहा, अपने घर में कोई धार्मिक कार्य अथव विवाह आदि कार्य होते हैं। कोई अपनी लड़की के विवाह के लिए चंदा एकत्रित कर धन नहीं जुटाता। इसी प्रकार संघ कार्य पर होने वाला खर्च भी, जैसे भी संभव हो, हम सभी मिलकर वहन करें।
स्वयंसेवक खुले मन से अपने विचार व्यक्त करने लगे। एक ने शंका आशंका उपस्थित काते हुए कहा, यह धन राशि संघ के कार्य हेतु एकत्र होगी- क्या इसे हम कार्य हेतु अपना आर्थिक सहयोग माने? दान, अनुदान, चंदा आर्थिक सहयोग आदि में पूर्णतया निरपेक्ष भाव से देने का भाव प्रकट नहीं होता। अपनी घर-गृहस्थी ठीक तरह स चलाते हुए, हमें जो संभव होता है, वही हम दान, अनुदान चंदा आदि के रूप में देते हैं। कंतु हमारा संघ कार्य तो जीवन में सर्वश्रेष्ठ वरण करने योग्य कार्य है। वह अपना ही कार्य है, इसलिए हमें अपने व्यक्तिगत खर्चों में कटौती कर संघ कार्य हेतु जितना अधिक दे सकें, उतना हमें देना चाहिए- यह भावना स्वयंसेवकों में निर्माण होनी चाहिए। अपने व्यक्तिगत जीवन में भी धन-सम्पत्ति की ओर देखने का योग्य दृष्टिकोण हमें स्वीकार करना चाहिए। मुक्त चिंतन के चलते स्वयंसेवक अपने अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। डॉक्टरजी ने सबके विचारों को सुनने के बाद कहा, कृतज्ञता और निरपेक्षता की भावना से गुरुदक्षिणा समर्पण की पध्दति भारत में प्राचीनकाल में प्रचलित थी। संघ कार्य करते समय धन संबंधी हमें अपेक्षित भावना गुरुदक्षिणा की इस संकल्पना में प्रकट होती है- हमें भी वही पध्दति स्वीकार करनी चाहिए। डॉक्टरजी के इस कथन से सभी स्वयंसेवकों के विचार को एक नयी दिशा मिली और विशुध्द भावना से 'गुरुदक्षिणा' समर्पण का विचार सभी स्वयंसेवकों के हृदय में बस गया।
दो दिन बाद ही व्यास पूर्णिमा थी। गुरुपूजन और गुरुदक्षिणा समर्पण हेतु परम्परा से चला आ रहा, यह पावन दिवस सर्व दृष्टि से उचित था। इसलिए डॉक्टरजी ने कहा कि इस दिन सुबह ही स्नान आदि विधि पूर्णकर हम सारे स्वयंसेवक एकत्रित आयेंगे और श्री गुरुपूर्णिमा व श्री गुरुदक्षिणा का उत्सव मनायेंगे। डॉक्टरजी की यह सूचना सुनते ही घर लौटते समय स्वयंसेवकों के मन में विचार-चक्र घूमने लगा। परसों हम गुरु के नाते किसकी पूजा करेंगे? स्वयंसेवकों का गुरु कौन होगा? स्वाभाविकतया सबके मन में यह विचार आया कि डॉक्टरजी के सिवा हमारा गुरु कौन हो सकता है? हम परसों मनाये जाने वाले गुरुपूजन उत्सव में उन्हीं का पूजन करेंगे। कुछ स्वयंसेवकों के विचार में, राष्ट्रगुरु तो समर्थ रामदास स्वामी हैं। प्रार्थना के बाद नित्य हम उनकी जय जयकार करते हैं। अत: समर्थ रामदासजी के छायाचित्र की पूजा करना उचित रहेगा। उन्हीं दिनों अण्णा सोहनी नामक एक कार्यकर्ता शाखा में उत्ताम शारीरिक शिक्षके रूप में प्रसिध्द थे- उनकी शिक्षा से हमारी शारीरिक क्षमता और विश्वास से वृध्दि होती है, अत: क्यों न उन्हें ही गुरु के रूप में पूजा जाए? अनेक प्रकार की विचार तरंगे स्वयंसेवकों के मन में उटने लगीं।
व्याप पूर्णिमा के दिन प्रात:काल सभी स्वयंसेवक निर्धारित समय पर डॉक्टरजी के घर एकत्रित हुए। ध्वजारोहण, ध्वजप्रणाम के बाद स्वयंसेवक अपने अपने स्थान पर बैठ गए। व्यक्तिगत गीत हुआ और उसके बाद डॉक्टरजी भाषण देने के लिए उठ खड़े हुए। अपने भाषण में उन्होंने कहा कि संघ किसी भी जीवित व्यक्ति को गुरु न मानते हुए अपने परम पवित्र भगवा ध्वज को ही अपना गुरु मानता है। व्यक्ति चाहे तिना ही श्रेष्ठ क्यो न हो, वह सदा अविचल-अडिग उसी स्थिति में रहेगा- इसकी कोई गारंटी नहीं। श्रेष्ठ व्यक्ति में भी कोई न कोई अपूर्णता या कमी रह सकती है। सिध्दांत ही नित्य अडिग बना रह सकता है। भगवा ध्वज ही संघ के सैध्दान्तिक विचारों का प्रतीक है- इस ध्वज की ओर देखते ही अपने राष्ट्र का उज्जवल इतिहास, अपनी श्रेष्ठ संस्कृति और दिव्य दर्शन हमारी आंखों के सामने खड़ हो जाता है। जिस ध्वज की ओर देखते ही अंत:करण में स्फूर्ति का संचार होने लगता है वही भगवा ध्वज अपने संघ कार्य के सिध्दांतों का प्रतीक है- इसलिए वह हमारा गुरु है। आज हम उसी का पूजन करें और उसे ही अपनी गुरुदक्षिणा समर्पित करें।
कार्यक्रम बड़े उत्साह से सम्पन्न हुआ और इसके साथ ही भगवा ध्वज को अपना गुरु और आदर्श मानने की पध्दति शुरु हुई। इस प्रथम गुरुपेजा उत्सव में कुल 84 रु. श्रीगुरुदक्षिणा के रूप में एकत्रित हुए। उसका तथा आगे संघ कार्य पर होने वाले खर्चे का पूरा हिसाब रखने की व्यवस्था की गई। श्रीगुरुदक्षिणा का उपयोग केवल संघ कार्य हेतु ही हो, अपने व्यक्तिगत कार्य के लिए उसमें से एक भी पैसा उपयोग में नहीं लाया जाए- इसकी चिंता स्वयं डॉक्टरजी किया करते। वही आदत स्वयंसेवकों में भी निर्माण हुई इस प्रकार आत्मनिर्भर होकर संघ कार्य करने की पध्दति संघ में प्रचलित हुई।

सोमवार, 3 जुलाई 2017

GST : 22 राज्यों ने हटाए चेक पोस्ट







GST : 22 राज्यों ने हटाए चेक पोस्ट, 2300 करोड़ बचेंगे
टाइम्सऑफइंडिया.कॉम | Updated: Jul 3, 2017

रामार्को सेनगुप्ता, नई दिल्ली
एक देश, एक टैक्स के नारे के साथ शुक्रवार की आधी रात से लागू किए गए गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स से भारत की अर्थव्यवस्था को सालाना 2,300 करोड़ रुपये की भारी बचत होगी। अब तक राज्यों के चेक पोस्ट्स पर ट्रकों को जगह-जगह रुकना पड़ता था। वित्त मंत्रालय के मुताबिक जीएसटी लागू होने के बाद से अब तक 22 राज्य चेक पोस्ट्स खत्म कर चुके हैं। माना जा रहा है कि अब जीएसटी के चलते ट्रकों की आवाजाही तेज होगी और रास्ते की बाधाएं हटने से भारी बचत होगी। वर्ल्ड बैंक की 2005 की रिपोर्ट के मुताबिक, 'चेकपॉइंट्स पर ट्रकों को होने वाली देरी के चलते सालाना 9 अरब रुपये से लेकर 23 अरब रुपये तक का नुकसान होता है।' ऑपरेटिंग आवर्स के इस नुकसान को टालकर इस स्थिति से बचा जा सकता है।

हालांकि इस आंकड़े में तमाम चेक पोस्ट्स से निकलने के लिए ट्रकों की ओर दी जाने वाली घूस को शामिल नहीं किया गया है, वरना यह आंकड़ा 900 करोड़ रुपये से 7200 करोड़ तक पहुंच सकता है। स्टडी के मुताबिक इस तरह की घूस से इकॉनमी को सीधे तौर पर कोई नुकसान नहीं होता, लेकिन सरकार को मिलने वाले राजस्व को जरूर चपत लगती है। लेकिन, अब चेक पोस्ट्स पर ट्रकों का लेट होना बीते दौर की बात हो सकता है।

जीएसटी से पहले के दौर में चेक पोस्ट गुड्स के मूवमेंट पर टैक्स कलेक्ट करते थे। रेवेन्यू सेक्रटरी हसमुख अढ़िया ने कहा, 'जहां तक टैक्सेशन की बात है तो अब चेक पोस्ट्स का दौर खत्म हो जाएगा। इसके अलावा भी कई चेक पोस्ट्स होती हैं, जैसे स्टेट चेक पोस्ट्स। इनमें शराब पर स्टेट एक्साइज वसूला जाता है। यह व्यवस्था पहले की तरह ही बनी रहेगी।'

जीएसटी लागू होने के बाद राज्यों ने फील्ड ऑफिसर्स अडवायजरी जारी कर गुड्स के मूवमेंट को न रोकने और नए नियमों के पालन का आदेश दिया है। असम और उत्तर प्रदेश ने अपने अधिकारियों को ई-वे बिल की व्यवस्था लागू होने तक जीएसटी पहचान नंबर, इनवॉइस नंबर, टैक्स इनवॉइस और लॉजिस्टिक्स फर्म के रजिस्ट्रेशन को चेक करने का आदेश दिया है। सरकार जीएसटी लागू होने के 6 महीने के भीतर ही ई-वे बिल लाने की योजना पर काम कर रही है। इससे ट्रकों की आवाजाही बेहद आसान हो जाएगी।

जानें, कैसी होगी ई-वे बिल की व्यवस्था
इसके तहत 50,000 रुपये से अधिक के सामान को राज्य या राज्य से बाहर ले जाने के लिए जीएसटी-नेटवर्क की वेबसाइट पर ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कराना होगा। इस प्रस्ताव के तहत जीएसटी-एन के जरिए जो ई-वे बिल जनरेट होगा, वह 1 से 15 दिन तक वैध होगा। यह वैधता सामान ले जाने की दूरी के आधार पर तय होगी। जैसे 100 किलोमीटर तक की दूरी के लिए 1 दिन का ई-बिल बनेगा, जबकि 1,000 किलोमीटर से अधिक की दूरी के लिए 15 दिन की वैधता वाला ई-बिल तैयार होगा।
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जीएसटी के दूसरे दिन भी ऑटो, कन्ज्यूमर गुड्स समेत कई सामानों के दाम घटाने की घोषणा
इकनॉमिक टाइम्स | Updated: Jul 3, 2017

सागर मालवीय/रत्ना भूषण/ऋतंकर मुखर्जी/शर्मिष्ठा मुखर्जी, मुंबई/कोलकाता/नई दिल्ली
जीएसटी लागू होने के दूसरे दिन यानी रविवार को कुछ कारों और दोपहिया वाहनों की कीमतें घटाने के ऐलान हुए जबकि कई कंपनियों ने आनेवाले दिनों में कुछ और कटौतियों का आश्वासन दिया। इनका कहना है कि 1 जुलाई को जीएसटी लागू होने के बाद बने प्रॉडक्ट्स सस्ते में मिलेंगे। जापान की दिग्गज वाहन निर्माता कंपनी टोयोटा ने अपनी कारों के दाम में 13 प्रतिशत तक की कटौती की जबकि नई दिल्ली स्थित हीरो मोटोकॉर्प ने दोपहिया वाहनों के दाम 400 से 4,000 रुपये तक घटा दिए। उम्मीद की जा रही है कि ह्यूंदै मौटर्स, टाटा मोटर्स और फोर्ड इंडिया भी अगले कुछ हफ्ते में कीमतों में कटौती का ऐलान करेंगी।

कन्ज्यूमर गुड्स
रविवार को प्रमुख कन्ज्यूमर गुड्स कंपनियों ने भी अगले कुछ हफ्तों में कीमतें घटाने का भरोसा दिलाया। इनका कहना है कि 1 जुलाई के बाद बने सामान सस्ते में मिलेंगे। इससे पहले देश की सबसे बड़ी कन्ज्यूमर फर्म हिंदुस्तान यूनिलिवर ने कुछ सामानों के दाम घटा दिए तो कुछ के वजन बढ़ा दिए।

फूड सेक्टर की बड़ी कंपनी नेस्ले अपने मैगी केचअप, सेरलैक और कुछ डेयरी प्रॉडक्ट्स के दाम कम करेगी। नेस्ले के एमडी सुरेश नारायणन ने कहा, 'जिन कैटिगरीज में टैक्स घटे हैं, उनमें 1 जुलाई के बाद बने सामानों की कीमतों में उचित कटौती की जाएगी। नई कीमत वाले स्टॉक मार्केट में आने तक ट्रांजिशन टाइम रहेगा।'

गोदरेज कन्ज्यूमर प्रॉडक्ट्स के एमडी विवेक गंभीर ने कहा कि उनके साबुनों के दाम घटाने या इनके वजन बढ़ाने की योजना है। इसी तरह, पेप्सिको, मैरिको, पार्ले और बिसलरी ने भी कहा है कि 1 जुलाई के बाद बने सामान सस्ते में दिए जाएंगे।

बुधवार, 28 जून 2017

राष्ट्रपति चुनाव : 2017





राष्ट्रपति चुनाव को लेकर सोनिया गांधी का अहम बयान, जानिए- क्या कहा
Date:Wed, 28 Jun 2017

सोनिया गांधी ने कहा कि यह चुनाव हमारे लिए एक विचार धारा, उसूलों अौर सच्चाई की लड़ाई है, हम लड़ेंगे।
नई दिल्ली (एएनअाई)। राष्ट्रपति चुनाव को लेकर चल रहे गुणा-गणित के बीच कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का अहम बयान सामने अाया है। सोनिया गांधी ने कहा कि यह चुनाव हमारे लिए एक विचारधारा, उसूलों अौर सच्चाई की लड़ाई है, हम लड़ेंगे।
इससे पहले ईद पर भी सोनिया गांधी ने कुछ इसी तरह से बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि 'विध्वंसकारी ताकतें, अनेकता में एकता और सांप्रदायिक समरसता के भारत के अनोखे चरित्र पर हमला करने का प्रयास कर रही हैं' लेकिन अपनी 'साजिशों' में वे कभी कामयाब नहीं होंगी।
सोनिया गांधी ने कहा था कि भारत को दुनिया में एकमात्र ऐसा देश होने का विशेष दर्जा हासिल रहा है जहां विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोग प्यार और समरसता के माहौल में एक साथ रहते आए हैं। उन्होंने कहा, 'विध्वंसकारी ताकतें विभिन्नता में एकता और सांप्रदायिक मेलमिलाप के भारत के खास चरित्र पर हमला करने का प्रयास कर रही हैं लेकिन ये ताकतें अपनी साजिशों में कभी कामयाब नहीं होंगी।'
वहीं विपक्ष की ओर से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार मीरा कुमार ने कहा कि राष्ट्रपति चुनाव जाति के आधार पर नहीं, बल्कि विचारधारा के आधार पर होगा। मीरा कुमार ने हैरानी जताते हुए कहा कि दोनों राष्ट्रपति उम्मीदवारों की उपलब्धियों और योग्यताओं पर बहस के बजाय उनकी जाति पर बहस की जा रही है। उन्होंने कहा कि वह सामाजिक न्याय के मूल्यों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समावेशीकरण तथा जाति व्यवस्था के उन्मूलन के लिए लड़ेंगी।
उन्होंने कहा कि उच्च जाति वर्ग से ताल्लुक रखने वाले दो नेताओं के बीच भी पहले राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हो चुका है, लेकिन उनकी जाति पर चर्चा नहीं की गई। इस बार जब दो दलित एक-दूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं, तो इसे लेकर हर जगह बहुत चर्चाएं हो रही हैं। मेरा मानना है कि जाति को दफना दिया जाना चाहिए और इसे पूरी तरह से भुला दिया जाना चाहिए।
यह भी पढ़ेंः राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद अौर मीरा कुमार सहित 64 नामांकन पत्र दाखिल
By Sanjeev Tiwari

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राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद अौर मीरा कुमार सहित 64 नामांकन पत्र दाखिल
Date:Wed, 28 Jun 2017

राष्ट्रपति चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने का आज आखिरी दिन है।
नई दिल्ली, जेएनएन।  राष्ट्रपति चुनाव के लिए 17 विपक्षी दलों की उम्मीदवार मीरा कुमार अाज संसद भवन पहुंचकर अपना नामांकन दाखिल किया। इससे पहले राजग उम्मीदवार रामनाथ कोविंद सहित 64 नामांकन पत्र भरे जा चुके हैं। नामांकन भरते वक्त मीरा कुमार के साथ सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह और 17 विपक्षी दलों के नेता मौजूद थे। मीरा कुमार ने नामांकन पत्र के चार सेट लोकसभा महासचिव के समक्ष दाखिल किया। राष्ट्रपति चुनाव में लोकसभा महासचिव निर्वाचन अधिकारी हैं। 17 विपक्षी दलों में से प्रत्येक के नेता को मीरा कुमार के नाम का प्रस्ताव या अनुमोदन करने का अवसर मिला।
नामांकन के समय मीरा कुमार के साथ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के अलावा पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह तथा विपक्ष के अन्य नेता उपस्थित थे। इससे पहले वह सुबह 10 बजे ‘राजघाट’ पहुंचकर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि दी। इसके बाद अपने पिता बाबू जगजीवन राम की समाधि स्थल ‘समता स्थल’ जाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
नामांकन से एक दिन पहले मीडिया से रूबरू हुई मीरा कुमार ने कहा कि 17 पार्टियों का उन पर जताया गया विश्वास उनके लिए सम्मान की बात है।
   राष्ट्रपति चुनाव को दलित बनाम दलित बताए जाने को गलत करार देते हुए विपक्ष की उम्मीदवार मीरा कुमार ने मंगलवार को पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि वह जाति व्यवस्था के ढांचे को खत्म कर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा को मुद्दा बनाएंगी। मीरा कुमार इस चुनाव को वैचारिक लड़ाई बनाने के लिए अपने प्रचार अभियान का आगाज साबरमती के गांधी आश्रम से करेंगी।
मीरा ने कहा कि अब वक्त आ गया है कि जाति की मानसिकता को गठरी में बांधकर नीचे दबा समाज को आगे बढ़ना चाहिए। इस वक्त देश हित सर्वोपरि है और जो विचारधारा प्रेस की आजादी, पारदर्शिता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और समावेशी समाज में विश्वास रखती है उसी में देश हित है। इसीलिए उन्होंने अंतरात्मा की आवाज की अपील की है।
   मीरा ने कहा कि यह जातिगत लड़ाई नहीं है और अच्छी बात है कि इसको लेकर चर्चा हो रही है क्योंकि इससे समाज की असलियत सामने आ रही है। उन्होंने यह सवाल उठाया कि जब राष्ट्रपति चुनाव में दो उच्च जातियों के प्रत्याशी आमने-सामने थे तब जाति का सवाल नहीं उठा और उनके गुणों पर बात हुई।
विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के स्पीकर के रुप में खुद पर पक्षपात करने के लगाए आरापों को मीरा कुमार ने खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि स्पीकर के तौर पर उनके कामकाज की सत्ता और विपक्ष दोनों की तरफ से सार्वजनिक रुप से प्रशंसा की गई। पिछले लोकसभा के आखिरी सत्र में सभी दलों के नेताओं की ओर से दिए गए भाषण के रिकार्ड होने का हवाला देते हुए मीरा ने कहा कि उन्होंने न कभी पक्षपात किया और न ही किसी ने आरोप लगाया।
राष्ट्रपति चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने का आज आखिरी दिन है। राष्ट्रपति चुनाव 17 जुलाई को होना निर्धारित है तथा मतगणना 20 जुलाई को होगी।

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किसान से लेकर चाय बेचने वाले तक हैं राष्ट्रपति पद की दौड़ में, जानिए- मकसद
Date:Wed, 28 Jun 2017

अलग-अलग पृष्ठभूमि से आने के बावजूद इनमें एक समानता है कि ये सभी राष्ट्रपति चुनाव को लेकर काफी आशान्वित हैं।
नई दिल्ली (जेएनएन)। पूरे देश में राष्ट्रपति की चुनाव की बयार जोरों पर है। अगले महीने होने वाले राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए क्लर्क, किसान से लेकर वकील तक सभी अपनी किस्मत आजमाने में लगे हैं। लालू प्रसाद यादव बिहार में एक क्लर्क रह चुके हैं। तमिलनाडु के अग्नि श्रीरामचंद्रन एक किसान हैं, अजय कुमार गुप्ता उत्तराखंड में एक वकील हैं। इनके अलावा आनंद सिंह कुशवाहा मध्य प्रदेश में चाय बेचने वाले रह चुके हैं और मोहम्मद अब्दुल हमीद पाटिल महाराष्ट्र के एक कंस्ट्रक्शन में नौकरी कर चुके हैं।
अलग-अलग पृष्ठभूमि से आने के बावजूद इनमें एक समानता है कि ये सभी राष्ट्रपति चुनाव को लेकर काफी आशान्वित हैं। इन्होंने 15,000 रुपए जमा कराकर अगले महीने होने वाले देश के राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपना नॉमिनेशन फाइल किया है। ऐसी संभावना नजर आ रही है कि इनमें से कोई भी अपना नॉमिनेशन वापस नहीं लेंगे। लेकिन जांच के दौरान उनके नामांकन पत्र को खारिज कर दिया जा सकता है।
हरिद्वार के गुप्ता भारत के राष्ट्रपति पद की दावेदारी को लेकर कहते हैं, "रबर युग समाप्त हो जाएगा।" वहीं दूसरी तरफ पाटिल ने राष्ट्रपति बनने के 24 घंटे के भीतर कश्मीर में आतंकवाद को खत्म करने की गारंटी दी है। उन्होंने कहा, "मैं कश्मीर से आतंकवाद को खत्म कर दूंगा जो कि देश की सबसे बड़ी आंतरिक समस्या है। कार्यालय संभालने के 24 घंटों के भीतर, मैं पाकिस्तान को एक सबक सिखाया जाएगा और कश्मीर में शांति बहाल की जाएगी।"
इस समय राष्ट्रपति पद के लिए 65 उम्मीदवारों ने अपने नामांकन दायर किए हैं, जिनमें एनडीए के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद शामिल हैं। विपक्ष की उम्मीदवार मीरा कुमार बुधवार को अपना नामांकन दाखिल करेंगी। चुनावी अधिकारियों ने पहले से ही 12 उम्मीदवारों के नामांकन को खारिज कर दिया है।
इस रेस में महाराष्ट्र के हामिद पाटिल की पत्नी, साइरा बानो भी हैं। वो कहती हैं, अपने पति की तरह विजयी होने पर उनका उद्देश्य सशस्त्र बलों में अधिक से अधिक महिलाओं को भर्ती करना होगा। क्योंकि राष्ट्र की रक्षा में महिलाएं पुरुष से कमतर नहीं होती हैं। "
इन सबसे अलावा, लालू यादव को बिहार के जाने माने नेता हैं। वाराणसी के वकील नरेन्द्र दुबे अडीग ने इससे पहले चार बार राष्ट्रपति चुनाव लड़ा है, और इस बार एक बार फिरसे उन्होंने नामांकन पत्र दाखिल किया है।
तमिलनाडु के श्रीरामचंद्रन ने राजनीति में एक प्रतिष्ठित पहचान बनाई है, जो पूर्व मुख्यमंत्री के करुणानिधि, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ चुनावी मैदान में पहले उतर चुके हैं।

शुक्रवार, 23 जून 2017

नीतीश कुमार : दो बार मौका था तब क्यों नहीं याद आई बिहार की बेटी मीरा कुमार ?



बिहार के सीएम नीतीश का विपक्ष पर हमला, 
पूछा-मीरा कुमार को हराने के लिए राष्ट्रपति उम्मीदवार क्यों बनाया

नवभारतटाइम्स.कॉम | Updated: Jun 23, 2017

पटना
आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव इफ्तार पार्टी में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का 'टेस्ट' बदलने में कामयाब नहीं रहे। राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए उम्मीदवार रामनाथ कोविंद के साथ मजबूती से खड़े नीतीश ने इफ्तार पार्टी से बाहर निकलते ही विपक्ष पर जोरदार निशाना साधा और पूछा कि क्या बिहार की बेटी का चयन हारने के लिए किया गया है? लालू ने नीतीश से फैसले पर पुनर्विचार करने और विपक्षी उम्मीदवार मीरा कुमार के समर्थन की अपील की थी।

शुक्रवार को सभी की नजरें लालू की इफ्तार पार्टी पर ही टिकी हुईं थीं। इसमें नीतीश-लालू गले तो जरूर मिले, लेकिन राष्ट्रपति चुनाव पर दोनों की पसंद अलग ही रही। नीतीश ने मीडिया कर्मियों से कहा, 'मैं मीरा कुमार का बहुत सम्मान करता हूं, लेकिन क्या बिहार की बेटी का चयन हराने के लिए किया गया? जिताने के लिए क्यों नहीं किया गया? दो बार मौका था तब क्यों नहीं याद आई बिहार की बेटी? यदि सच में सम्मान करना है तो 2019 में जीत के लिए रणनीति बनाइए और 2022 में बिहार की बेटी को राष्ट्रपति बनाइए। अभी भी मौका है उन्हें दोबारा सोचना चाहिए। हम लोगों ने हर पहलू पर गौर करके निर्णय लिया है। यह कोई ऐसा मुद्दा नहीं है। जहां तक जेडीयू की बात है पार्टी स्वतंत्र निर्णय लेती है। पिछली बार जब प्रणव मुखर्जी और हामिद अंसारी उम्मीदवार थे तो बीजेपी के कुछ नेताओं ने उनके खिलाफ बयानबाजी की थी तो मैंने उसकी मुखालफत की थी। एनडीए में रहते हुए हमने उनका समर्थन किया था।'

राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष की ओर से साझा उम्मीदवार के तौर पर मीरा कुमार के नाम के ऐलान के बाद आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने मीरा को 'बिहार की बेटी' बताते हुए कहा था कि कोविंद को समर्थन देकर नीतीश 'ऐतिहासिक भूल' कर रहे हैं। पत्रकारों ने जब नीतीश से इस पर प्रतिक्रिया मांगी तो उन्होंने कहा, 'लालू जी आपको क्या कहते हैं मुझे उस पर कुछ नहीं कहना है? जब 17 पार्टियां एक साथ बैठीं और एक उम्मीदवार तय किया तो उनका फर्ज था अपील करना। कहा जा रहा है कि ऐतिहासिक भूल है....तो करने दीजिए... छोड़ दीजिए।

विपक्ष को झटका
जेडीयू का एनडीए उम्मीदवार को समर्थन विपक्ष की एकता के लिए बहुत बड़ा झटका माना जा रहा है। नीतीश के इस कदम से बिहार में महागठबंधन के भविष्य को लेकर भी कयासों के नए दौर की शुरुआत हो सकती है। सियासी गलियारों में काफी लंबे समय से जेडीयू और आरजेडी के रिश्तों में तल्खी के कयास लग रहे हैं। 

बुधवार, 21 जून 2017

रामनाथ कोविंद : राष्ट्रपति पद पर चुनना तय





राष्ट्रपति चुनाव: कोविंद को मिला जदयू का साथ, नीतीश के मंथन के बाद हुआ ऐलान

जदयू ने एनडीए के राष्ट्रपति उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को आधिकारिक तौर पर समर्थन करने का ऐलान कर दिया है. पार्टी प्रवक्ता के सी त्यागी ने बुधवार को इसकी घोषणा की.

केसी त्यागी ने कहा कि पार्टी के इस फैसले से महागठबंधन पर कोई असर नहीं पड़ेगा. इसके साथ ही त्यागी ने साफ कर दिया है विपक्ष की गुरुवार को होने वाली बैठक में जदयू के नेता शामिल नहीं होंगे.

जदयू नेता ने कहा कि अब समर्थन देने के फैसले के बाद बैठक में भाग लेने का अब कोई औचित्य नहीं है. इस संबंध में कांग्रेस पार्टी को सूचित कर दिया गया है.

त्यागी ने कहा कि माननीय कोविंद का बेहतरीन कार्यकाल के तौर पर रहा है. उन्होंने (कोविंद) ने किसी भी तरह का टकराव राजभवन से नहीं होने दिया. राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी पर सर्वसम्मति से ये फैसला किया गया है. गुरुवार की अन्य दलों की होने वाली मीटिंग में जदयू शिरकत नहीं करेगी. इसके बावजूद जदयू विपक्षी एकता के लिए हमेशा प्रयासरत रहेगा. नीतीश जी ने पहले ही अपने फैसले से सोनियाजी और लालूजी को अवगत करा चुके हैं.

राष्ट्रपति पद के लिए तय किया गया रामनाथ कोविंद का नाम
रामनाथ कोविंद : कानपुर के एक छोटे से गाँव से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनने तक का सफर 
by Vineet Bajpai on Jun 19th 2017

लखनऊ। BJP संसदीय बोर्ड की बैठक के बाद BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा की है। आइये हम आपको बताते हैं कि कौन हैं रामनाथ कोविंद और कैसा है उनका राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनने तक का सफर...

रामनाथ कोविंद का अब तक का सफर
राम नाथ कोविन्द का जन्म एक अक्टूबर 1945 में उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले की (वर्तमान में कानपुर देहात जिला ), तहसील डेरापुर के एक छोटे से गाँव परौंख में हुआ था।
कोविन्द का सम्बन्ध कोरी या कोली जाति से है जो उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति के अंतर्गत आती है।
वकालत की उपाधि लेने के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय में वकालत प्रारम्भ की।
वह 1977 से 1979 तक दिल्ली हाई कोर्ट में केंद्र सरकार के वकील रहे।
8 अगस्त 2015 को बिहार के राज्यपाल के पद पर नियुक्ति हुए।
वर्ष 1991 में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए।
वर्ष 1994 में उत्तर प्रदेश राज्य से राज्य सभा के निर्वाचित हुए।
वर्ष 2000 में पुनः उत्तरप्रदेश राज्य से राज्य सभा के लिए निर्वाचित हुए।
कोविन्द लगातार 12 वर्ष तक राज्य सभा के सदस्य रहे।
वह भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी रहे।
वह भाजपा दलित मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और अखिल भारतीय कोली समाज अध्यक्ष भी रहे।
वर्ष 1986 में दलित वर्ग के कानूनी सहायता ब्युरो के महामंत्री भी रहे।

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इन 10 कारणों से श्री रामनाथ कोविन्द ने राष्ट्रपति उम्मीदवारी की रेस जीती
द्वारा Himanshu Poswal - 20 जून , 2017

एक अप्रत्याशित दांव खेलते हुये नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जुगलबंदी मीडिया हाउस और सम्पूर्ण विपक्ष की बोलती बंद करने में एक बार फिर सफल रही है। जब मीडिया अपने ही विचारों और सिद्धांतों की पोटली बना राष्ट्रपति चुनाव में बाँच रही थी, और कई प्रसिद्ध नामों पर विचार विर्मश करने में व्यस्त थी, तभी एनडीए ने अपने राष्ट्रपति उम्मीदवार की घोषणा की, जो इनके आशाओं के एकदम विपरीत निकले।

हाल ही में एक नितिक्ष श्रीवास्तव के नाम से चलने वाले ट्विट्टर हैंडल का ट्वीट सामने आया है, जिसने बड़े सटीक रूप से 2016 में ही एनडीए के इस उम्मीदवार की घोषणा की भविष्यवाणी की थी, और बड़े करीने से इस हैंडल ने बड़े बड़े मीडिया घरानों और विपक्ष के प्रपंची नेताओं को धूल चटा दी।

वकालत की शिक्षा ग्रहण की।
बीएनएसडी इंटर कॉलेज के विद्यार्थी, और प्रसिद्ध दयानन्द एंग्लो वैदिक कॉलेज, कानपुर के स्नातक, श्री रामनाथ कोविन्द ने वकालत की शिक्षा भी ग्रहण की। कुशाग्र बुद्धि के विद्यार्थी, श्री कोविन्द ने स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली की तरफ चल पड़े।

लोक सेवा परीक्षा उत्तीर्ण की
दिल्ली आने का इनका प्रमुख कारण था, लोक सेवा परीक्षा [यूपीएससी एग्ज़ाम्स] के लिए पढ़ाई करना और उसे उत्तीर्ण करना। हालांकि वे दो बार असफल भी हुये, पर तीसरी बारी में उन्होने ये परीक्षा उत्तीर्ण की। हालांकि इनकी रैंक आईएएस सेवा के लिए काफी नहीं थी, सो इन्हे सम्बद्ध सेवा में नौकरी से संतोष करना पड़ा।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया में वकील के तौर पर 1971 में दाखिला
आईएएस बनने का सपना त्यागने के बाद इनहोने वही किया जिसके लिए इनहोने कॉलेज में पढ़ाई की। 1971 में इनहोने बार काउंसिल ऑफ इंडिया, दिल्ली में बतौर वकील अपना दाखिला करवाया।

दिल्ली हाइ कोर्ट में केंद्र सरकार के वकील (1977–1979)
इनकी सबसे पहली उपलब्धि आई 1977 में, जब इन्हे मोरारजी देसाई के नेतृत्व में केंद्र सरकार की तरफ से दिल्ली हाइ कोर्ट में वकील नियुक्त किया गया। वहाँ इनहोने दो साल अपनी सेवाएँ दी।

सूप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार के स्थायी वकील (1980 – 1993)
1980 में इनके जीवन में एक और मोड़ आया। अब इन्हे सरकार की तरफ से सूप्रीम कोर्ट में बतौर स्थायी वकील प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। 13 सालों तक माननीय कोविन्द जी ने निस्संकोच अपनी सेवाएँ दी।

मोरारजी देसाई के निजी सचिव के तौर पर कार्य किया
ये कुछ लोगों के लिए चौंकाने वाला तथ्य हो सकता है, पर इस राष्ट्रपति उम्मीदवार ने कभी भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री मोरारजी देसाई की बतौर निजी सचिव सेवा भी की थी। इससे इन्हे पीएमओ की कार्यशैली को करीब से जानने का मौका भी मिला।

दो बार उत्तर प्रदेश से राज्य सभा सांसद (1994-2000 और 2000-2006)
इनके नाम अनगिनत उपलब्धि में सबसे उत्कृष्ट उपलब्धि है इनका बतौर राज्य सभा सांसद दो बार उत्तर प्रदेश से निर्वाचित होना। बतौर सांसद इनहोने सांसद की कार्यप्रणाली का भी गहन अध्ययन किया है। कई महत्वपूर्ण संसदीय समितियों की इनहोने अपनी सेवाएँ भी दी है, जैसे एससी/एसटी कल्याण समिति, सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण समिति इत्यादि। इसे कहने में कोई हर्ज़ नहीं की इन सेवाओं से इनहोने उच्च पद पर आसीन होने के लिए आवश्यक प्रशासनिक अनुभव भी ग्रहण किया है।

न्यू यॉर्क में यूएन में भारत का प्रतिनिधित्व और यूएन आम सभा में अक्टूबर 2002 में भाषण का सौभाग्य

जब अटल बिहारी वाजपयी जी भारत के प्रधानमंत्री थे, तब उन्होने रामनाथ कोविन्द जी को संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधित्व का सुनहरा अवसर प्रदान किया। न सिर्फ इनहोने यह उत्तरदायित्व बखूबी संभाला, बल्कि अक्टूबर 2002 में आम सभा में इनहोने अपने भाषण से अपनी धाक भी जमाई। इससे ये साफ है की भारत के भावी राष्ट्रपति में देश का अंतराष्ट्रीय मंच पर प्रतिनिधित्व करने की उचित योग्यता भी है।

वर्तमान में बिहार के राज्यपाल
71 वर्षीय रामनाथ कोविन्द बिहार के वर्तमान राज्यपाल के तौर पर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। एक राज्य का कुशल निरीक्षण करने की इनकी क्षमता ने इन्हे एनडीए के लिए एक उचित उम्मीदवार के तौर पर उपर्युक्त समझा गया है।

दलित – जिसमें मीडिया को ख़ासी दिलचस्पी हैं।
ये एक विडम्बना है की इस देश की राजनीति में योग्यता नहीं, जाति मायने रखती है। अब इससे एनडीए पूरी तरह अनभिज्ञ रहे, ऐसा सोचना भी असह्य है। एक दलित को उच्च पद के लिए नामित करना पार्टी के आगामी अभियानों के लिए वरदान समान ही साबित होगा। पर जिस तरह इसे मीडिया एक आडंबर बनाने पर तुली है, ऐसे योग्य मनुष्य के लिए अपमानजनक प्रतीत होता है, जिनहोने अपनी जाति के दंश से ऊपर उठ कर अपने देश की उच्च से उच्चतम सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

इसके अलावा डॉ॰ बी. आर. अंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ में बतौर प्रबंधन बोर्ड के सदस्य श्री कोविन्द कभी प्रसिद्ध भारतीय प्रबंधन संस्थान, कलकत्ता [आईआईएम कलकत्ता] के बोर्ड ऑफ गोवेर्नर्स के मनोनीत सदस्य भी रह चुके है। आरएसएस बैक्ग्राउण्ड से आने वाले कोविन्द जी बीजेपी दलित मोर्चा की 1998-2002 में अगुवाई भी कर चुके हैं। वे अखिल भारतीय कोली समाज के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

भारत का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतितनिधित्व करने का सौभाग्य इनके फायदे में ही रहा। चूंकि मोरारजी देसाई के साथ इनहोने काम किया है, इसीलिए इन्हे नीति निर्माण में भी अनुभव प्राप्त है। इनहोने एससी और एसटी समुदाय की महिलाओं के उन्मूलन और कानूनी सहायता में भी अपना योगदान दिया है। उत्तर प्रदेश और बिहार से संबन्धित होने के नाते इन्हे देश के लाखों लोगों की कई समस्याओं का भी गहरा अनुभव है।

बहरहाल, चाहे आप खुश हो या नाखुश, पर इस बार एनडीए ने अपना दांव सही खेला है। राष्ट्रीय राजनीति में इनका दांव आने वाले कई वर्षों तक अपनी छाप छोडते जाएगा। रामनाथ कोविन्द के लिए प्रणब दा की जगह भरना काफी मुश्किल होगा, पर उनका अनुभव और उनका ज्ञान इस देश के लिए काफी मूल्यवान सिद्ध हो सकता है।