शुक्रवार, 11 मई 2018

हाथी को चींटी ने पछाड़ा : खबरों से खिलवाड़


हाथी को चींटी ने पछाड़ा 
आज चैनली मिडिया में कुछ चैनल इस तरह खबरों को परोस रहे हैं कि सच हाथी की तरह वजनदार हो कर भी झूठ रुपी चींटी से परास्त हो गया | इसके लिया कुछ चैनलों का  व्यवहार / लक्ष्य  -  हिंदुत्व को किसी भी तरह नीचा दिखाओ , उसे अपमानित करो , हिन्दू समाज में विभाजन करो , देश का बुरा करने वालोँ पक्ष लो , मदद करो की नीति का है | कुछ चैनलों के कारण सम्पूर्ण मिडिया के प्रति अविश्वास फैलता जा रहा हे |
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खबरों से खिलवाड़ : पांचजन्य से साभार ......
दिनांक 24-अप्रैल-2018
सत्य को न देखने के कारण यह संसार जला है, इस समय जल रहा है और जलेगा।
— अश्वघोष (सौंदरनंद 16/43)

संस्कृत की प्रख्यात उक्ति है- अति सर्वत्र वर्जयेत्।

         यानी किसी भी चीज की अधिकता बुरी है। यदि यह कसौटी खबरों पर लागू करें तो पाएंगे कि आजकल हम सूचनाओं की बमबारी से त्रस्त हैं। दिनभर जैसी कच्ची-पक्की, सच्ची-झूठी, नफरत या राजनैतिक एजेंडे में पगी खबरों की बमवर्षा होती है उसमें खबरों की छंटाई लगता है बीते दिनों की बात हो गई है। यह लापरवाही पाठक और मीडिया दोनों के स्तर पर है और इसीलिए दोहरी खतरनाक भी है। इससे व्यक्ति, सूचना-समाचारों में सही-गलत का अंतर भूलने लगता है। ध्यान रखिए, उलझा हुआ यही व्यक्ति मजहबी उन्माद या राजनैतिक हित-प्रपंचों का आसान हरकारा है।

            चिन्ता की बात यह है कि सत्य अन्वेषण के साथ ही सामाजिक सरोकार और समस्या के समाधानपरक दृष्टिकोण पत्रकारिता से दूर हो रहे हैं। पता नहीं मीडिया में इस बात को लेकर कितनी चिंता है किन्तु हिंसा, बंद, तोड़फोड़ और भड़काऊ नारे और बयानों वाले गुटों-चेहरों को प्राथमिकता देना मीडिया की इस लगातार नकारात्मक होती छवि का बड़ा कारण है। कठुआ बलात्कार कांड में क्या हुआ? अपराध विज्ञान की बारीकियों और पारिवारिक-सामाजिक सजगता की मांग करता एक मामला राजनीतिक झुकाव वाले मीडिया के हल्ले की बलि चढ़ गया। ऐसे में कुछ सवाल बनते हैं : जिस मामले में स्थानीय जम्मू पुलिस को हटा ‘कश्मीर’ के हाथों जांच की कमान सौंपी गई उस मामले में खुद मीडिया की स्थानीय रिपोर्टिंग कितनी है?
मामले को राजनीतिक तूल और रंग देने वालों की कितनी पड़ताल मीडिया द्वारा हुई है? मासूम बच्ची का चित्र छापने और उसकी पहचान उजागर करने की भूल यदि धरना-प्रदर्शन करने वालों से हुई होती तो भी क्षम्य होता किन्तु वह मीडिया, जहां चित्रों की छंटाई और प्रकाशन के स्पष्ट नियम-निर्देश हैं वहां यह आपराधिक कृत्य! इतना ही नहीं, उस बच्ची की पहचान को मामले को तूल देने वाला ‘मसाला’ बनाना और इसके इर्द-गिर्द तरह-तरह के ‘हैशटैग’ रचना क्या बताता है!

         बॉलीवुड हस्तियों के चेहरे आगे करते हुए मीडिया ने यह खंगालने की जरूरत नहीं समझी कि पोस्टर पकड़कर फोटो खिंचाते व्यक्ति की सामाजिक मुद्दों पर समझ और संवेदनशीलता की कोई पृष्ठभूमि है भी या नहीं? या फिर इस संवेदनशीलता का कोई राजनीतिक झुकाव या प्रपंच हो सकता है अथवा नहीं! भ्रामक तथ्यों से भरा और किसी के पूजा स्थल को अंतिम जांच-निष्कर्ष से पहले ही निकृष्ट रूप में चित्रित करता एक ही पोस्टर जब अलग-अलग हाथों से गुजरा तो इस पूरे अभियान के सूत्रधारों की पहचान बनती थी जो शुरुआत में तो नहीं ही हुई। बाद में वही कहानी साफ हुई ‘लुटियन दिल्ली’ के चर्चित चेहरों की वही ब्रिगेड इसके पीछे सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा सक्रिय भी थी, जिसका अतीत पहले भी ऐसी ही झूठी नफरत में पगी खबरें फैलाने का रहा है। जिसका उद्देश्य नफरत और गुस्से से भरे हैशटैग को सूचना-संदेश के बाजार में उतारना, लोगों को भड़काना और अंतत: किसी भी मामले को केन्द्र सरकार (पढ़ें, भारतीय जनता पार्टी) के विरुद्ध मोड़ देने का रहा है।

 --- जुनैद के मामले में भी यही हुआ था ना! सीट को ‘बीफ’ कहने वाला मीडिया नहीं तो कौन था?
— गौरी लंकेश को गोली लगते ही इस मामले का रुख साजिशी अंदाज में सत्तारूढ़ दल की ओर मोड़ने की कोशिश करने वाले लोग कौन थे?
— और इस मामले में क्या हुआ? पूजास्थल और समस्त हिंदू समाज को निकृष्ट रूप में इंगित करने का यह सिलसिला अलग-अलग बस्तियों में उन बैनरों पर जाकर रुका जिनमें लिखा गया था कि इन बस्तियों में भाजपा कार्यकर्ताओं का प्रवेश वर्जित है!

      ऐसे में लाख टके का सवाल यह है कि क्या दुनिया का सबसे विशाल लोकतंत्र अपने मीडिया को राजनीतिक दुष्प्रचार का पिटठू और सामाजिक वैमनस्य का माध्यम बनने-बनाने की छूट दे सकता है? इस सवाल का उद्देश्य किसी भी तरह मीडिया की आजादी और धार को कुंद करना नहीं बल्कि उस जहर की काट ढूंढना है जो आज संचार माध्यमों के जरिए समाज में फैल रहा है। सूचनाओं की अति सहन की जा सकती है किन्तु ‘गति’ के नाम पर, तकनीक के बेजा प्रयोग से समाचारों को मारने, गलत प्रकार से उछालने या लोगों को भ्रमित करने का खेल अब बहुत हो चुका।

अति सर्वत्र वर्जयेत् की कसौटी यहां भी लागू होती है।

रविवार, 29 अप्रैल 2018

परमाणु परीक्षण : 11 मई और 13 मई 1998 को पोकरण


भारत की प्लानिंग से बौखला गया था अमेरिका, यूं किया था परमाणु परीक्षण
Posted on July 27, 2016 by vijayrampatrika.Com

जैसलमेर के पोकरण फील्ड फायरिंग रेंज में खेतोलाई गांव के पास 11 व 13 मई 1998 को भारत की ओर से किए गए परमाणु परीक्षण की अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश को भनक तक नहीं लगी थी। इस बात का उसे आज भी मलाल है। किस दिन किस तरह परमाणु परीक्षण करना है इसकी पूरी प्लानिंग डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने की थी। पूरे विश्व में परमाणु संयंत्रों और सैन्य गतिविधियों पर सैटेलाइट से निगरानी करने वाला अमेरिका उस समय हैरान रह गया था, जब उसे मालूम पड़ा कि भारतीय वैज्ञानिकों ने 11 मई व 13 मई को पोकरण में परमाणु परीक्षण किया है।

Vijayrampatrika.com यहां आपको बता रहा है भारत द्वारा किए गए एटम बम के परीक्षण के बारे में। सन् 1998 में हुए इस परीक्षण में डॉ.ए पी जे अब्दुल कलाम की भूमिका अहम थी। एक साल पहले वे आज ही के दिन हिंदुस्तान को हमेशां के लिए सूना छोड़ गए थे।

ऐसे बचे अमेरिका से

1974 के बाद 11 मई 1998 को पोकरण में भारत ने परमाणु परीक्षण किया तो विश्व के सारे देश भारत के खिलाफ हो गए। थे। अमेरिका सहित कई देशों ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। लेकिन भारतीय सरकार पीछे नहीं हटी और 13 मई को फिर से परमाणु परीक्षण कर दिया। परीक्षण से पहले भारतीय सेना ने अपनी खुफिया गतिविधियां कश्मीर सहित दूसरे संवेदनशील केंद्रों पर बड़ा दी थी। भारतीय सेना ने दूसरी रेंज में युद्धाभ्यास भी शुरू कर दिया। जिससे अमेरिका के जासूसी उपग्रहों का ध्यान उस तरफ चला गया।

सैन्य अधिकारियों की ड्रेस में थे वैज्ञानिक
अमेरिका के जासूसी उपग्रहों की निगाह से बचने के लिए भारतीय सेना ने अपनी सैन्य गतिविधियां दूसके क्षेत्रों में बढ़ा दी थी। इधर कलाम जानते थे कि जैसे ही सैन्य गतिविधियां दूसरे क्षेत्र में संचालित होंगी अमेरिका के जासूसी उपग्रह वहां अपनी चौकसी बढ़ा देगें। जैसे ही वह अपने मकसद में कामयाब हुए रात में उन्होंने पोकरण की मिट्टी के कलर का करीब 500 मीटर का तंबू वहां लगवा दिया। इक्का दुक्का सेना के वाहनों का मूवमेंट वहां होने लगा। कलाम सहित अन्य वैज्ञानिक उन्ही सेना के खुले ट्रकों 45 डिग्री तापमान में वहां सैन्य अधिकारियों के साथ पूरे ऑपरेशन को अंजाम तक पहुंचाया।

1. खेतोलाई गांव खाली करवा दिया: भारत द्वारा एटमिक टेस्ट के दौरान कर्इ किमी का एरिया खाली हो गया था। खेतोलाई वासियों के अनुसार, परमाणु परीक्षण से पहले उनके इलाके में सेना की गतिविधियां तेज हो गई थी। खेतोलाई निवासियों का कहना था कि परमाणु परीक्षण से कुछ घंटे पहले गांव खाली करवा दिया और दीवारों व पेड़ों की ओट में खड़े रहने की हिदायतें सेना के अधिकारियों ने दी। उस समय लोगों को पता चल गया था कि कुछ न कुछ हो रहा है। 

2. लाफिंग बुद्धा था कोड वर्ड: जानकार सूत्रों के अनुसार, सेना व रक्षा विशेषज्ञों ने 11 व 13 मई को किए गए परमाणु परीक्षा का कोड वर्ड लाफिंग बुद्धा रखा था। परीक्षण सफल होने के बाद फोन कर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को लाफिंग बुद्धा (बुद्ध मुस्कराया) के रूप में सफलता का संकेत दिया गया। पूरा कार्यक्रम इतना गुपचुप तरीके से हुआ कि सभी अत्याधुनिक सैटेलाइट तकनीकें धरी रह गई और भारत को बहुत बड़ी कामयाबी मिली। 

3. जैसलमेर व पोकरण का रास्ता रोक दिया गया: 11 व 13 मई को हुए परमाणु परीक्षण से दो घंटे पहले तक जैसलमेर व पोखरण के बीच का रास्ता रोक दिया गया। जैसलमेर व पोकरण के बीच आने वाले गांवों व इस सड़क मार्ग पर किसी को आने जाने नहीं दिया। केवल सेना के वाहन ही आते-जाते रहे। जैसे ही परमाणु परीक्षण हुआ जैसलमेर की धरती कांपने लगी और जिन्होंने 1974 का परीक्षण देखा था वे समझ गए कि भारत ने एक बार फिर परमाणु परीक्षण किए हैं।

4. पीएम और रक्षा मंत्री ने लिया था जायजा: पोकरण में परमाणु परीक्षण के बाद जहां विश्व के कई देशों ने भारत के ऊपर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे। इसके दो दिन भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नाडीस सहित सेना के आला अधिकारियों ने पोकरण का दोरा किया था।

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11 मई 1998, दोपहर 3.45 बजे जब प्रधानमंत्री बोले भारत अब परमाणु शक्ति है 
Posted By: Ankur Singh Published: Monday, May 11, 2015

नई दिल्ली। देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को उनकी अदम्य साहस के लिए जाना जाता है। खासकर जिस तरह से दुनिया के दबाव के बावजूद भारत ने सफलतापूर्वक परमाणु परीक्षण किया उसने दुनिया में भारत का डंका बजाने का काम किया है। आज ही के दिन 11 मई 1998 को भारत ने पोखरन में सफलतापूर्वक परमाणु परीक्षण किया था।

परमाणु बम का जवाब परमाणु बम से ही दिया जा सकता है 1964 में जब पहली बार भारत ने परमाणु परीक्षण किया था तो अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में कहा था कि परमाणु बम का जवाब परमाणु बम से ही दिया जा सकता है किसी और चीज से नहीं। वहीं जब भारत ने सफलतापूर्वक परमाणु परीक्षण किया था तो वाजपेयी ने इस परीक्षण के तुरंत बाद मीडिया में आकर कहा था कि भारत अब परमाणु शक्ति वाला देश है, हमारे पास अब परमाणु बम है। सेना की वर्दी और रात के अंधेरे में करते थे वैज्ञानिक काम इस अभियान की सबसे बड़ी बात यह थी कि भारत पर इस परीक्षण तो नहीं करने का भारी दबाव था। जिसके चलते भारतीय वैज्ञानिक सेना की वर्दी में हमेशा काम करते थे। यही नहीं अमेरिकी सैटेलाइट्स से बचने के लिए देश के वैज्ञानिक रात में ही इस ऑपरेशन पर काम किया करते थे।

ऑपरेशन शक्ति के नाम से चल रहा था यह अभियान

भारत ने इससे पहले भी भारत ने मई के माह में 1974 में परमाणु परीक्षण किया था, जिसका नाम स्माइलिंग बुद्धा रखा गया था। जबकि 11 मई 1998 को किये गये परीक्षण का नाम ऑपरेशन शक्ति दिया गया था। भारत अब परमाणु शक्ति है इस सफल परीक्षण के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रेस कांफ्रेंस करके इस परीक्षण की सबको जानकारी दी थी। उन्होंने प्रेस में आकर बयान दिया था कि मैं देश के वैज्ञिनकों को इस सफलतापूर्वक परीक्षण की बधाई देता हूं, साथ हीं उन्होंने कहा था कि आज से भारत पूरी तरह से परमाणु शक्तिशाली देश है। दुनियाभर के देशों ने की थी  भारत की आलोचना वहीं भारत के इस सफलतापूर्वक परीक्षण के बाद दुनियाभर के देशों ने भारत की तीखी आलोचना की थी। अमेरिका ने कड़ा बयान जारी करते हुए कहा था कि भारत पर प्रतिबंध जारी रहेगा। वहीं भारत के इस परीक्षण की तैयारी को अमेरिका को नहीं पता चल पाने के चलते अमेरिकी खुफिया एजेंसी को काफी शर्मिंदगी का भी सामना करना पड़ा था। भारत के इस परीक्षण के बाद कनाडा ने भी आलोचना की थी और भारत से अपने राजदूत तक को वापस बुला लिया था। जापान ने भी इस परीक्षण के खिलाफ भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिया था। जापान ने भारत के साथ सभी आर्थिक समझौतों पर रोक लगा दी थी। पाकिस्तान बोला भारतीयों का इसका जवाब मिलेगा वहीं पाकिस्तान ने भारत के इस परीक्षण के खिलाफ भारत की जमकर आलोचना की थी। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने कहा था कि पाकिस्तान भारतीयों को इसका जवाब देगा। वहीं पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने बयान जारी करके कहा था कि पाक भी भारत की बराबरी को तैयार है और हम परमाणु परीक्षण करने की कूबत रखते हैं। कुछ देशों ने नहीं दी कोई प्रतिक्रिया वहीं एक तरफ जहां दुनिया के कई देश भारत के इस परमाणु परीक्षण की आलोचना कर रहे थे तो ब्रिटेन, फ्रांस, रूस ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देते हुए भारत की कोई भी आलोचना नहीं की। वहीं इस दिन को यादगार बनाने के लिए 11 मई को आधिकारिक रूप से नेशनल टेक्नोलॉजी डे घोषित किया गया था। इस दिन विज्ञान के क्षेत्र में बेहतरी योगदान देने वालों को सम्मानित किया जाता है।


मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

डाटा चोरी की राजनैतिक चोर बाजारी

डाटा चोरी की राजनैतिक  चोर बाजारी 

विश्वास पर घात
 दिनांक ०२-अप्रैल-२०१८

कांग्रेस ने 2014 के लोकसभा चुनावों में कैम्ब्रिज एनालिटिका की सेवाएं ली थीं, जबकि उसके एक कर्मचारी डैन मर्सीन ने किसी एनआरआई से कांग्रेस को ही हराने के पैसे ले लिए। गौरतलब है कि डैन मर्सीन 2012 में केन्या के नैरोबी स्थित एक होटल में मृत पाए गए थे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस व्यक्ति की मृत्यु 2012 में हो गई, वह दो साल बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के हारने की वजह कैसे बन सकता है? सवाल यह भी उठता है कि जब फेसबुक के डाटा लीक के खुलासे से पहले मीडिया कांग्रेस और कैम्ब्रिज एनालिटिका में अगले चुनाव के लिए हो रही बातचीत की खबरें छाप रहा था, तब कांग्रेस कहां सो रही थी? कहीं ऐसा तो नहीं कि तब कांग्रेस को कैम्ब्रिज एनालिटिका से जुड़ने की खबरें रास आ रही थीं? उसे लग रहा था कि इससे देश में माहौल तैयार करने में मदद मिलेगी

अरविंद शरण  



फेसबुक प्लेटफॉर्म पर अवैध डाटा खुदाई और तमाम गैरकानूनी हथकंडों से अमेरिका समेत कई देशों की राजनीतिक सत्ता का स्वरूप तय करने के विश्वव्यापी गंदे खेल में भारत का नाम भी उछल गया है और निशाने पर है कांग्रेस।

‘व्हिसल ब्लोअर’ क्रिस्टोफर विली ने ब्रिटेन की संसदीय समिति के सामने दिए बयान में कहा है कि उनकी कंपनी कांग्रेस के लिए लंबे समय तक काम करती रही है। विली के इस बयान के बाद भाजपा ने कड़े लहजे में कहा कि आखिर उसके आरोप सच निकले कि कांग्रेस इस गंदे खेल में शामिल रही है। राहुल गांधी को इन सबके लिए देश से माफी मांगनी चाहिए। वहीं, अब तक कैम्ब्रिज एनालिटिका से किसी भी तरह के संबंधों से स्पष्ट इनकार करती रही कांग्रेस ने सरकार को फेसबुक और कैम्ब्रिज एनालिटिका के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर मामले की जांच कराने की चुनौती दे डाली है। ब्रिटिश कंपनी कैम्ब्रिज एनालिटिका द्वारा फेसबुक से 5 करोड़ लोगों की निजी जानकारी गलत तरीके से हासिल कर अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव जीतने का रास्ता साफ करने के खुलासे के बाद ब्रिटेन की संसदीय समिति ने क्रिस्टोफर विली को तलब किया था। इसी समिति के सामने दिये बयान में विली ने कैम्ब्रिज एनालिटिका और इसकी मूल कंपनी स्ट्रैटेजिक कम्युनिकेशंस लैबोरेटरीज (एससीएल) की काली करतूतों का खुलासा किया। विली ने कहा कि कैम्ब्रिज एनालिटिका ने राज्यों के स्तर पर कांग्रेस के लिए ‘बड़े पैमाने’ पर काम किया है। कैम्ब्रिज एनालिटिका के लिए भारत क्यों महत्वपूर्ण रहा? इसके जबाव में विली ने कहा कि भारत में परस्पर विरोधी राजनीतिक विचारधाराएं काफी मजबूत हैं, इसलिए वहां ‘अस्थिरता के अवसर’ हैं। जब समिति में मौजूद एक सांसद ने पूछा कि चूंकि भारत में हमेशा चुनाव होते रहते हैं, इसलिए हो सकता है कि यह आपके कारोबार का मुख्य स्रोत भी रहा हो, तो क्या आपने राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस के लिए काम किया? इस पर विली कांग्रेस के साथ राष्ट्रीय स्तर पर काम करने का वाकया तो याद नहीं कर पाए, लेकिन इतना जरूर कहा, ‘‘भारत इतना विशाल है कि वहां का एक राज्य भी ब्रिटेन से बड़ा हो सकता है। मुझे पता है कि कंपनी ने वहां हर तरह की योजना पर काम किया। वहां कंपनी के दफ्तर हैं, कर्मचारी हैं। मेरे पास इसके दस्तावेज मौजूद हैं और आप चाहेंगे तो मैं आपको दे सकता हूं।’’ इसके साथ ही विली ने बताया कि कैम्ब्रिज एनालिटिका की कार्यप्रणाली मुख्यत: फेसबुक डाटा पर आधारित है।


भाजपा आक्रामक, निशाने पर राहुल
विली के इस खुलासे के बाद केंद्र सरकार और भाजपा आक्रामक हो गई है। अवैध रूप से फेसबुक डाटा लीक होने की खबरों के बाद से ही कांग्रेस पर कैम्ब्रिज एनालिटिका की सेवाएं लेने का आरोप लगा रहे कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने आक्रामक रुख अपनाते हुए कहा कि व्हिसल ब्लोअर ने पुष्टि कर दी है कि कैम्ब्रिज एनालिटिका ने कांग्रेस के साथ काम किया। कांग्रेस और राहुल गांधी, दोनों को अब माफी मांगनी चाहिए। 
मजेदार तथ्य यह है कि अब तक कैम्ब्रिज एनालिटिका के साथ कभी काम न करने की कसमें खाने वाली कांग्रेस ने विली के बयान के बावजूद एक बार फिर कहा कि उसका कैम्ब्रिज एनालिटिका से कभी कोई संबंध नहीं रहा और सरकार फेसबुक तथा एनालिटिका के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराके मामले की जांच करा ले। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा, ‘‘कैम्ब्रिज एनालिटिका की भारतीय सहयोगी ओबीआई (ओवलेनो बिजनेस इंटेलिजेंस प्रा. लि.) के एक भारतीय साझीदार अवनीश राय ने सनसनीखेज खुलासा किया है कि एक अमेरिकी एनआरआई ने 2014 में कांग्रेस की सरकार को गिराने के लिए कैम्ब्रिज की सेवाएं लीं। कांग्रेस ने कभी सीए की सेवाएं नहीं लीं, भाजपा जवाब दे कि यह एनआरआई कौन था।’’ सुरजेवाला जिस ओबीआई का जिक्र कर रहे हैं, उसका दफ्तर दिल्ली से सटे गाजियाबाद में भी है और इस कंपनी ने अपनी वेबसाइट पर ग्राहकों की सूची में कई राजनीति दलों का उल्लेख कर रखा था, हालांकि फेसबुक डाटा लीक का मामला सामने आने के बाद से उसकी वेबसाइट काम नहीं कर रही। सूत्रों के मुताबिक इस कंपनी ने बड़ी संख्या में पत्रकारों को अपने नेटवर्क में जोड़ रखा है जो उनकी जरूरत के हिसाब से मीडिया में खबरें चलाते हैं। 
वरिष्ठ पत्रकार और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष रामबहादुर राय कहते हैं, ‘‘अब तो स्पष्ट है कि कांग्रेस ने कैम्ब्रिज एनालिटिका की सेवाएं लीं। जब  फेसबुक के पांच करोड़ लोगों के डाटा में सेंध लगने की खबर आई, तभी कांग्रेस को अंदाजा हो गया होगा कि अब बहुत जल्दी उसका सच भी उजागर हो जाएगा। इसीलिए वह और राहुल गांधी आक्रामक दिखने की कोशिश कर रहे थे। ‘व्हिसल ब्लोअर’ यह भी बताने को तैयार है कि यह सब कैसे हुआ। मुझे लगता है कि आने वाले समय में कांग्रेस इसमें उलझती चली जाएगी।’’

कांग्रेसी दावे की खुली पोल
ब्रिटेन की संसदीय समिति के सामने एक आईटी विशेषज्ञ पॉल ओलिवर डेहे भी पेश हुए, जिन्होंने दावा किया कि कैम्ब्रिज एनालिटिका में क्रिस्टोफर विली से पहले उनकी जगह डैन मर्सीन भारत में कांग्रेस के लिए काम कर रहे थे। पॉल के मुताबिक, केन्या में मृत्यु से पहले वह भारत में कांग्रेस के लिए काम कर रहे थे, लेकिन उन्होंने उसी कांग्रेस को हराने के लिए एक अमेरिकी एनआरआई से पैसे ले रखे थे और वह इसी दिशा में काम कर रहे थे। सुरजेवाला इसका उल्लेख करते हुए सवाल करते हैं कि जिस कैम्ब्रिज एनालिटिका के कर्मचारी ने कांग्रेस को 2014 के लोकसभा चुनाव में हराने के लिए पैसे लिए हों, भला उसी कंपनी की सेवाएं कांग्रेस कैसे ले सकती थी? यहां दो बातें गौर करने लायक है। पहली, कांग्रेस ने 2014 के लोकसभा चुनावों में मदद के लिए कैम्ब्रिज एनालिटिका की सेवाएं ली थीं और उसके एक कर्मचारी डैन मर्सीन ने किसी एनआरआई से कांग्रेस को ही हराने के लिए पैसे ले लिए। गौरतलब है कि डैन मर्सीन केन्या के नैरोबी स्थित एक होटल में 2012 में मृत पाए गए थे। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस व्यक्ति की मृत्यु 2012 में हो गई, वह भला दो साल बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के हारने की वजह कैसे बन सकता है? इसलिए कांग्रेस बेशक इसे आधार बनाकर अपनी झेंप मिटाने की कोशिश कर रही हो, लेकिन सच्चाई यह है कि इसमें झोल ही झोल है। 
रामबहादुर राय कहते हैं, ‘‘यह तो जांच का विषय है कि वह एनआरआई कौन था? उसने क्या वाकई कांग्रेस को हराने के लिए पैसे दिए? अगर दिए तो कब दिए? अगर पैसे लेने वाले की 2012 में मृत्यु हो गई तो क्या फिर किसी और को भी पैसे दिए गए? अगर ऐसा भी हुआ तो उसके कांग्रेस से मनमुटाव की वजह क्या थी। कहीं कोई निजी मामला तो नहीं था?’’ वैसे तब इस तरह खबरें छपी थीं कि डैन मर्सीन की मृत्यु हृदयाघात के कारण हुई। हालांकि क्रिस्टोफर विली ने संसदीय समिति के सामने कहा कि  ‘‘संभवत: उनकी मौत जहर देने से हुई थी।’’ साथ ही विली ने जो बात कही, उससे साफ हो जाता है कि उनकी मौत बेशक संदिग्ध थी और उनकी हत्या की आशंका थी, लेकिन उसका कारण केन्या की स्थानीय राजनीति थी। विली ने कहा, ‘‘जब आप केन्या या फिर दूसरे अफ्रीकी देशों की राजनीति पर काम कर रहे होते हैं और अगर कोई सौदा गड़बड़ हो जाए तो इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ता है।’

तब कहां थी कांग्रेस?
जिस ‘व्हिसल ब्लोअर’ के खुलासे के बाद अमेरिका-ब्रिटेन जैसे तमाम देशों की सत्ता की नींद हराम हो गई हो, यह उसी कीटाणु का असर है कि कांग्रेस किसी भी तरह कैम्ब्रिज एनालिटिका के भूत से पीछा छुड़ाना चाह रही है। बेशक, विली ने खुले शब्दों में कांग्रेस के साथ पुराने रिश्ते तार-तार कर दिए हों, पर कांग्रेस अपना दामन बचाती फिर रही है। लेकिन कल यह स्थिति नहीं थी। फेसबुक के डाटा में सेंध से पहले वह कैम्ब्रिज एनालिटिका से संबंधों में अपनी शान देखती हो या नहीं, लेकिन इतना तय है कि उसे इसमें कोई बुराई नहीं दिखती थी। इस सनसनीखेज खुलासे से पहले मीडिया में ऐसी तमाम खबरें आईं जिनमें कहा गया कि कांग्रेस अगले लोकसभा चुनाव के लिए कैम्ब्रिज एनालिटिका से बात कर रही है, लेकिन तब पार्टी ने कुछ नहीं कहा। उदाहरण के लिए कुछ प्रकाशनों पर गौर करना आवश्यक होगा। 12 नवंबर, 2017 के अंक में संडे गार्जियन ने लिखा है, ‘‘पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस कैम्ब्रिज एनालिटिका की सेवाएं लेने के लिए बातचीत कर रही है और यह बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है। सूत्रों के मुताबिक, वैसे तो कांग्रेस की सारी रणनीति 2019 के लोकसभा चुनावों को लेकर है, लेकिन कैम्ब्रिज एनालिटिका से बात बन गई तो अगले साल मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में होने वाले चुनावों में भी इसकी सेवाएं ली जाएंगी। राजनीतिक दलों को चुनाव जिताने के मामले में कैम्ब्रिज एनालिटिका को महारत हासिल है। इसके अलावा, कैम्ब्रिज एनालिटिका ने पूरे ब्रेक्जिट अभियान के दौरान भी अहम भूमिका निभाई, जिसका नतीजा यह हुआ कि ब्रिटेन यूरोपीय संघ से अलग हो गया।’’

10 अक्तूबर, 2017 को बिजनेस स्टैंडर्ड ने प्रकाशित किया, ‘‘कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा चुनावों की तैयारी शुरू कर दी है। इस बार ऐसा लगता है कि वह बिग डाटा का इस्तेमाल करने जा रही है। कहा जा रहा है कि इसके लिए कांग्रेस बिग डाटा क्षेत्र की कंपनी कैम्ब्रिज एनालिटिका से बातबीत कर रही है, जिसने डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव जीतने में मदद की। मनी कंट्रोल के मुताबिक, कंपनी ने लोगों के आॅनलाइन व्यवहार का विश्लेषण कर डाटा आधारित सोशल मीडिया रणनीति का खाका तैयार कर लिया है। कैम्ब्रिज एनालिटिका ने इसके बारे में कुछ सुझाव भी दिए हैं।’’ ऐसी तमाम खबरें राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस और कैम्ब्रिज एनालिटिका के बीच बातचीत के बारे में प्रकाशित की गईं। सवाल है कि जब फेसबुक डाटा लीक के खुलासे से पहले मीडिया कांग्रेस और कैम्ब्रिज एनालिटिका में अगले चुनाव के लिए हो रही बातचीत की खबरें छाप रहा था, तब कांग्रेस कहां सो रही थी? कहीं ऐसा तो नहीं कि तब कांग्रेस को कैम्ब्रिज एनालिटिका से जुड़ने की खबरें रास आ रही थीं? उसे लग रहा था कि इससे देश में माहौल तैयार करने में मदद मिलेगी?

कई स्तरों पर सरकार सक्रिय
दुनियाभर में बढ़ते बवाल को देख कैम्ब्रिज एनालिटिका ने अपने विवादित सीईओ अलेक्जेंडर निक्स को निलंबित कर दिया है, जबकि फेसबुक ने एनालिटिका से नाता तोड़ लिया है। अमेरिका समेत कई देशों में फेसबुक के खिलाफ जांच शुरू हो गई है और भारत ने भी फेसबुक और कैम्ब्रिज एनालिटिका से जवाब तलब किया है, सख्त लहजे में चेतावनी दी है कि यहां के चुनावों को प्रभावित करने की किसी भी स्थिति के गंभीर परिणाम होंगे। सरकार इस बात की भी पड़ताल कर रही है कि कहीं फेसबुक के प्लेटफॉर्म से भारतीयों का डाटा भी तो नहीं लीक हो गया। इसके लिए फेसबुक से जवाब तलब किया गया है। इसके साथ ही सरकार ने कई स्तरों पर चुनाव को प्रभावित न होने देने के लिए जरूरी तैयारी शुरू कर दी है। सूत्रों के मुताबिक, सरकार डाटा सुरक्षा के लिए एक दीर्घकालिक नीति तैयार करने में जुटी है। सरकार चाहती है कि कानूनी प्रावधानों से देश में ऐसी व्यवस्था बने जो डाटा लीक होने की आशंकाओं को कम करती हो। जानकारी के मुताबिक चुनाव आयोग में भी इस बात पर विचार-विमर्श शुरू हो गया है कि उसे कौन से उपाय करने होंगे, जिससे चुनावों को प्रभावित करने की चालों को विफल किया जा सके।


गंदे खेल का हीरो
मामला तब और गंभीर हो जाता है जब कैम्ब्रिज एनालिटिका के निलंबित सीईओ अलेक्जेंडर निक्स की अगुआई वाली टीम यह कहते खुफिया कैमरे में कैद हो जाती है कि अपने ग्राहकों के हितों के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं, चाहे बात डाटा में सेंध लगाने की हो, उनके मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर किसी भौगोलिक क्षेत्र की मैपिंग की हो, जैसा कंपनी ने अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के लिए चुनाव में किया। अगर इन सबसे बात नहीं बनती है तो कंपनी अपने ग्राहकों के हितों को पूरा करने के लिए नेताओं को घूस देने से लेकर उन्हें सुंदर महिलाओं के जाल में फांसने से भी पीछे नहीं हटती।


मोबाइल डाटा भी ले लिया
जब डाटा के दुरुपयोग के कारण फेसबुक के खिलाफ दुनियाभर में चिंता और छले जाने का भाव मजबूत हो रहा था, अपनी खोई विश्वसनीयता पाने के लिए फेसबुक ने ब्रिटेन और अमेरिका में विज्ञापन देकर अपनी स्थिति सुधारने की कोशिश की। फेसबुक ने विज्ञापन में बड़े भावुक अंदाज में अपनी गलती मानते हुए कहा कि जो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जानकारी सुरक्षित नहीं रख सकता, उसे लोगों से निजी जानकारी लेने का कोई अधिकार नहीं। साथ ही, उसने भविष्य में गलती सुधारने का वादा किया और अपनी विश्वसनीयता के खोने का दुख जताया। लेकिन, जिस दिन यह विज्ञापन आया, उसी दिन फेसबुक एक और विवाद में फंस गई। अब तक तो फेसबुक इन आरोपों का सामना कर रही थी कि उसने संभवत: जान-बूझकर अपने प्लेटफॉर्म से डाटा निकल जाने दिया, पर ताजा आरोप है कि फेसबुक वर्षों से एंड्रायड आधारित फोन का इस्तेमाल कर रहे अपने उपभोक्ताओं के कॉल रिकॉर्ड, एसएमएस आदि जमा करती जा रही थी। फिलहाल मोबाइल डाटा के दुरुपयोग की जानकारी तो नहीं आई है, पर यह खबर एक नए खतरे की ओर इशारा जरूर कर रही है।

जिम्मेदारी से बच नहीं सकती फेसबुक
डाटा चोरी का मामला सामने आया तो फेसबुक ने पहले सफाई दी कि उसने तो 2015 में ही उस एप को हटा दिया था, क्योंकि यह जरूरत से ज्यादा डाटा ले रहा था और यह कंपनी की नीतियों के विरुद्ध था। साथ ही कहा कि लोगों ने अपनी मर्जी से डाटा दिया, लिहाजा इसमें सुरक्षा संबंधी कोई चूक नहीं हुई और न ही कोई पासवर्ड ‘हैक’ हुआ। लेकिन देखते-देखते दुनियाभर में फेसबुक के खिलाफ विरोध के स्वर तेज हो गए और ट्विटर पर ‘डिलीट फेसबुक’ हैशटैग ट्रेंड करने लगा। और तो और, व्हाट्सएप के संस्थापक ब्रैन एक्टम ने भी 20 मार्च को ट्वीट कर ‘डिलीट फेसबुक’ का समर्थन कर दिया। गौरतलब है कि व्हाट्सएप को फेसबुक ने खरीद रखा है। बाद में मार्क जुकरबर्ग सामने आए और चूक की बात मानी और वादा किया कि फेसबुक विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगी। साथ ही, भारत में होने वाले चुनावों को देखते हुए सुरक्षा के उपाय बेहतर करने की भी बात कही। 
फेसबुक की बातों का विरोधाभास ही उसे कठघरे में खड़ा करता है। उसने यह तो कहा कि 2005 में जब मामला खुला तो उसने कोगान द्वारा विकसित उस एप यानी ‘दिस इज योर डिजिटल लाइफ ’ को हटा दिया। लेकिन फेसबुक यह नहीं बताती कि उस समय उसने सुरक्षा बेहतर करने के लिए कोई कदम उठाए या नहीं। जाहिर है, नहीं उठाए, क्योंकि उठाए होते तो अब तक अपनी सफाई में कह चुकी होती और मामले के तूल पकड़ने के बाद उसे भारत में अपनी खिसकती जमीन को बचाने के लिए डाटा सुरक्षा के ताजा उपाय का भरोसा न देना पड़ता। इतने बड़े पैमाने पर डाटा चोरी के बाद तो सबसे पहले उसे कैम्ब्रिज एनालिटिका के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराना चाहिए था। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया और अपने वकील के जरिये चोरी के डाटा को वापस पाने के लिए मोल-तोल करती रही। हैरत की बात है कि यह कोशिश गुपचुप तरीके से अगस्त 2016 तक, यानी 11 साल चलती रही। इतनी मशक्कत के बाद कैम्ब्रिज एनालिटिका ने डाटा को हटा देने का आश्वासन दिया और फेसबुक ने मान लिया। सवाल है कि जिस कंपनी ने धोखा किया हो, उसकी बातों को आपने ऐसे ही कैसे मान लिया? विशेषज्ञों की देखरेख में डाटा हटाने का काम क्यों नहीं कराया? इस मोर्चे पर भी फेसबुक ने लापरवाही की, जिसका नतीजा यह रहा कि एनालिटिका ने चोरी का डाटा हटा देने का वादा करने के बाद भी उसे अपने पास ही रखा। सवाल यह भी उठता है कि कैम्ब्रिज एनालिटिका के महज आश्वस्त कर देने भर से जुकरबर्ग इतने संतुष्ट कैसे हो गए कि उसे अपने प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते रहने की अनुमति दे दी? 
दूसरी महत्वपूर्ण बात, जब उसे 2015 में ही डाटा लीक की बात पता चल गई, तो उसने अपने उपभोक्ताओं को अंधेरे में क्यों रखा? उसे तभी लोगों को डाटा में सेंध की जानकारी ईमानदारी से दे देनी चाहिए थी। साथ ही उन्हें उपयोगकर्ताओं को यह बताना चाहिए था कि फेसबुक पर अपने डाटा को सुरक्षित रखने के लिए क्या करना चाहिए।


कई विकास योजनाओं में साथ
फेसबुक भारत में कई विकास योजनाओं में साझीदार है। उसकी एक आॅनलाइन स्टार्ट-अप हब बनाने की योजना है, जिससे लोगों में उद्यमशीलता को बढ़ावा मिले। इसके अलावा, वह देशभर में डिजिटल प्रशिक्षण केंद्र खोलने की योजना पर भी काम कर रही है ताकि युवाओं को इसका प्रशिक्षण दिया जा सके। अगले तीन साल में इन केंद्रों से 50 लाख लोगों को प्रशिक्षित करने की योजना है। कंपनी उड़ीसा सरकार के साथ भी महिलाओं को उद्यमी बनाने की योजना में सहयोग कर रही है, तो वहीं आंध्र प्रदेश की सरकार के डिजिटल फाइबर कार्यक्रम में भी हाथ बंटा रही है। इनके अलावा, केंद्र सरकार और फेसबुक आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में साथ मिलकर काम कर रहे हैं। चुनाव आयोग कई वर्षों से फेसबुक के साथ मिलकर मतदाता जागरूकता कार्यक्रम चला रहा है। इस तरह के तमाम सहयोग बताते हैं कि भारत की सरकार और लोगों ने फेसबुक पर कितना भरोसा किया था।


2014 में लिखी गई 2017 की पटकथा
2016 में अमेरिका में हुए चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति चुने गए। उनके चुनाव प्रचार की रणनीति तय करने में कैम्ब्रिज एनालिटिका की अहम भूमिका थी। इस कंपनी के मालिकों में से एक हैं रॉबर्ट मर्सर। अरबपति व्यवसायी रॉबर्ट मर्सर रिपब्लिकन पार्टी के बड़े दानदाता हैं। इस कंपनी पर मुख्यत: दो आरोप हैं। पहला, 2016 में हुए अमेरिकी चुनाव में इसने डोनाल्ड ट्रंप के पक्ष में मतदाताओं का रुझान बनाया और इसके लिए फेसबुक से लोगों की निजी जानकारी गलत तरीके से हासिल की। दूसरा, ब्रेक्जिट में ब्रिटेन के लोगों को यूरोपीय संघ से हटने के लिए प्रेरित किया। इस गोरखधंधे का खुलासा कैम्ब्रिज एनालिटिका के पूर्व कर्मचारी क्रिस्टोफर विली ने किया और समाचारपत्र आॅब्जर्वर ने इसे छापा। 
2016 में होने वाले अमेरिकी चुनाव की तैयारी 2014 में ही शुरू हो गई थी। कैम्ब्रिज एनालिटिका ने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर डॉ. अलेक्जेंडर कोगान को आठ लाख डॉलर दिए ताकि वह ऐसा एप बनाएं, जिससे फेसबुक उपभोक्ताओं के डाटा निकाले जा सकें। कोगान ने ‘दिस इज योर डिजिटल लाइफ’ एप बनाया, जिसका इस्तेमाल फेसबुक पर हुआ और लगभग 2.70 लाख लोगों ने इसे डाउनलोड किया। इस एप के जरिये न केवल 2.7 लाख लोगों के नाम, फोन नंबर, ईमेल, कहां के रहने वाले हैं जैसी जानकारी ले ली गई, बल्कि इनके दोस्तों वगैरह की भी जानकारी निकाल ली, जबकि फेसबुक अपनी निजता नीति के चाक-चौबंद होने का दावा करती है। कोगान ने यह डाटा कैम्ब्रिज एनालिटिका को दे दिया। कोगान की कंपनी ग्लोबल साइंस रिसर्च ने फेसबुक उपभोक्ताओं का डाटा निकालने का तरीका निकाला और फेसबुक के जरिये ही लोगों को पैसे देकर सर्वे आदि में भाग लेने के बहाने उनकी और जानकारी निकाली। यह डाटा भी उसने कैम्ब्रिज एनालिटिका को बेच दिया। एनालिटिका ने इन आंकड़ों से भौगोलिक आधार पर लोगों की मनोवैज्ञानिक प्रोफाइल बनाई। फिर लोगों को उन्हीं मुद्दों से जुड़े विज्ञापन दिखाए गए जो उनके सरोकार के थे। भूगोल के हिसाब से लोगों के सरोकार, चिंताएं मालूम हो जाने के बाद यह तय किया गया कि ट्रंप को किस इलाके में कैसी बात करनी है और किस तरह के मुद्दे उठाने हैं। इस तरह सीधे-सीधे पांच करोड़ लोगों को प्रेरित किया गया कि वह ट्रंप के पक्ष में वोट करें। कुल मिलाकर फेसबुक के प्लेटफॉर्म से निकली काली करतूतों की यह कहानी एक ऐसी दुनिया की ओर इशारा कर रही है, जहां एक नई तरह की गुलामी ने सिर उठाना शुरू कर दिया है। अगर इससे बचने के उपाय नहीं किए गए तो इसके खतरनाक परिणाम होंगे। यह सही है कि डाटा सुरक्षा से जुड़ी नीतियां तय करना सरकारों का काम है, लेकिन हमारी भी कोई भूमिका होती है। 
हम हर तरह के प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करें, लेकिन यह तो तस्दीक कर लें कि आपके एक क्लिक ने आपकी कौन सी जानकारी थाली में सजाकर दे दी। सरकार को नीतियां बनाने में कुछ समय लग सकता है, लेकिन हमें यह सावधानी अपनाने में मिनट नहीं लगने वाले।     

धोखा, घूस और सुंदरियों का जाल 
चैनल-4 के स्टिंग का नतीजा आंखें खोलने वाला है। इससे पता चलता है कि कैम्ब्रिज एनालिटिका ने न केवल फेसबुक उपयोगकर्ताओं की निजी जानकारी धोखे से हासिल की, बल्कि दुनियाभर में चुनावों को प्रभावित करने के लिए   घूस और महिलाओं का हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया। मौजूदा विवाद में फेसबुक सवालों के घेरे में इसलिए है, क्योंकि उसने अपने प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग होने दिया। सवाल है कि जब उसे मामले की जानकारी 2005 में ही मिल गई थी तो उसने अपने उपभोक्ताओं को अंधेरे में क्यों रखा?

कैसे हुआ खेल
लोगों से कुछ सवाल पूछे गए और उनकी पसंद-नापसंद, उनके लिए चिंता के मुद्दे आदि के आधार पर उनकी मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट तैयार की गई और इस तरह अमेरिका के विभिन्न इलाकों की प्रोफाइल बनाई गई। ट्रंप जब वहां प्रचार के लिए जाते, तो उन्हीं मुद्दों पर जोर देते।


कैसे हुआ खुलासा
समाचारपत्र आॅब्जर्वर ने करीब पांच करोड़ फेसबुक  उपभोक्ताओं  की निजी जानकारी के गलत तरीके से निकाले जाने की खबर प्रकाशित की।

सनसनी
चैनल-4 के एक स्टिंग में कैम्ब्रिज एनालिटिका के सीईओ अलेक्जेंडर निक्स यह मानते देखे गए कि डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव में उनकी कंपनी ने अंदरखाने किस तरह महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्टिंग में कैम्ब्रिज एनालिटिका के सीईओ समेत वरिष्ठ अधिकारी कंपनी की रणनीति पर बोलते देखे गए। इन अधिकारियों ने कहा कि वे अपने ग्राहक के हितों को साधने के लिए घूस और  महिलाओं का भी सहारा लेते थे।  

भारत पर भी आंच
चैनल-4 के स्टिंग में कैम्ब्रिज एनालिटिका के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि मूल कंपनी स्ट्रैटेजिक कम्युनिकेशंस लैबोरेटरीज (एससीएल) के साथ मिलकर उन लोगों ने अमेरिका, नाइजीरिया, केन्या, चेक रिपब्लिक, अजेंटीना और भारत समेत कई देशों में 200 से अधिक चुनावों में अपनी सेवाएं दीं।

फेसबुक पर बरतें ये सावधानियां  
बाहरी एप की गतिविधियां: बाहरी एप डाटा चोरी का सबसे बड़े स्रोत होते हैं। इन पर अंकुश के लिए सबसे पहले अपने फेसबुक प्रोफाइल में एप वाले सेक्शन में जाएं। एप-सेटिंग पर क्लिक करें। ‘एडिट सेटिंग’ में जाकर साझा की जा रही जानकारी को सीमित करें या इससे इनकार करें। 
पिछली जानकारी के लिए मशक्कत: यदि पहले आप बाहरी एप से जानकारी साझा कर चुके हैं, वह नहीं हटेगी। इन्हें हटाने के लिए आपको अलग से हर एप से संपर्क करना होगा।
बदल दें सेटिंग: ‘एप्स अदर्स यूज’ सेक्शन में जाकर यह तय कर सकते हैं कि जब फेसबुक के जरिये बाहरी एप या किसी साइट पर जा रहे हों तो कैसी और कितनी जानकारी साझा हो।
लॉग इन विद फेसबुक: अगर आप किसी भी एप या साइट पर जाने के लिए इस विकल्प का इस्तेमाल करते हैं तो समझिए कि आपने ऐसे सभी बाहरी एप और वेबसाइट को अपनी जानकारियां लेने की अनुमति दे दी। इससे बचने के लिए फेसबुक के जरिये बाहरी एप या साइट पर जाने से परहेज करें।

घेरे में किरदार
- अलेक्जेंडर निक्स
ब्रिटेन के एससीएल समूह की सहयोगी कंपनी कैम्ब्रिज एनालिटिका के सीईओ हैं। कंपनी की दशा-दिशा तय करने में इनकी अहम भूमिका रही। एससीएल समूह कई देशों में चुनाव प्रचार की रणनीति तय करने संबंधी सेवाएं देता रहा है।

रॉबर्ट मर्सर
एक पूर्व वैज्ञानिक, जो बाद में उद्योगपति बने और रिपब्लिकन पार्टी को मोटा चंदा देने वालों में से हैं। कैम्ब्रिज एनालिटिका में करीब डेढ़ करोड़ डॉलर का निवेश किया और कंपनी की नीतियां तय करने में भूमिका निभाने लगे।

अलेक्जेंडर कोगान
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के व्याख्याता हैं। कैम्ब्रिज एनालिटिका ने आठ लाख डॉलर में कोगान की सेवाएं लीं और इन्हें एक ऐसा एप बनाने को कहा जिसके जरिये फेसबुक उपयोगकर्ताओं की निजी जानकारी निकाली जा सके। इस एप का नाम था- दिज इज माई डिजिटल लाइफ।


पल्ला नहीं झाड़ सकते
फेसबुक यह कहती रही कि उसकी ओर से कोई सुरक्षा संबंधी चूक नहीं हुई। बात बढ़ने पर जुकरबर्ग सामने आए और माफी मांगी। कहा कि ऐसा दोबारा नहीं होगा और वह सुरक्षा मानदंड बेहतर करेंगे। जब फेसबुक को 2015 में ही पता चल गया था और उसने एप हटा दिया था, तो तभी सुरक्षा बेहतर क्यों नहीं की? लोगों को डाटा लीक की बात क्यों नहीं बताई?

चीन ने बनाई ‘दीवार’ 
चीन इंटरनेट की बेलगाम आजादी को खतरनाक मानता है और इसलिए उसने कई जरूरी कदम उठाए हैं, जिससे देश का डाटा बाहर जाना आसान नहीं है। चीन के इन कदमों को एक तरफा-अलोकतांत्रिक कहा जा सकता है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं कि फेसबुक-कैम्ब्रिज एनालिटिका के खुलासे के बाद दुनियाभर के देशों को अपने लोगों के निजी आंकड़ों के इर्द-गिर्द अभेद्य दीवार बनानी होगी और भारत जैसे देश के लिए, जहां रोकथाम के कानूनी प्रावधान  कमजोर हैं, वहां सावधान तो होना पड़ेगा।  
ग्रेट फायरबॉल आॅफ चाइना: इंटरनेट की दुनिया को नियंत्रित करने के लिए कानूनी और तकनीकी तौर पर किए गए उपाय जो स्थानीय डाटा को सुरक्षित करते हैं। इस ‘दीवार’ को भेदकर चीन में ताक-झांक की अनुमति न तो गूगल, फेसबुक जैसों को है, और न ही किसी मोबाइल एप को। ये सब यहां प्रतिबंधित हैं।
आम लोगों तक इंटरनेट की पहुंच: जनवरी, 1995 में चीन ने पहली बार आम लोगों को इंटरनेट की सुविधा दी। इसके पहले यह सरकारी तंत्र को ही उपलब्ध थी।
अंकुश का पहला कदम: डेढ़ साल में ही चीन को पता चल गया कि बाहरी एजेंसियों को बेलगाम नहीं छोड़ा जा सकता और अगस्त 1996 में वॉयस आॅफ अमेरिका, अमेरिकी समाचार समूहों और मानवाधिकार समूहों पर रोक लगाई।
यू-ट्यूब का रास्ता बंद: तिब्बत में अशांति के बाद मार्च 2008 में लगाई रोक।
फेसबुक-ट्विटर पर रोक: जुलाई 2009 में सिंक्यांग में दंगा भड़कने के बाद फेसबुक और ट्विटर पर स्थायी तौर पर रोक लगाई। इसके पहले भी उन पर अस्थायी रोक लगाई गई थी।
ब्लूमबर्ग और न्यूयॉर्क टाइम्स की बारी: सत्तासीन नेताओं के संबंधियों के भ्रष्टाचार पर खबरें लिखने पर लगाई रोक।
याहू  ने मानी शर्तें: अमेरिकी कंपनी याहू  ने 1999 में चीन में प्रवेश किया। यह एकमात्र पश्चिमी कंपनी है, जिसने चीन की तमाम शर्तों को माना कि उसे क्या दिखाना है और क्या नहीं। साथ ही, याहू सारा डाटा चीन की सरकार से साझा करती रही, जिसके कारण अप्रैल 2005 में लोकतंत्र समर्थक विदेशी साइट को ईमेल भेजने के मामले में पत्रकार शी ताओ की गिरफ्तारी हुई और फिर सजा।   
साइबर कानून सख्त किया: पिछले साल जून से चीन ने साइबर सुरक्षा कानून को और सख्त कर दिया है। अब चीनी नागरिकों से जुड़ी जानकारी (चाहे वह निजी हो या फिर वेतन आदि जैसी पेशेवर) को देश से बाहर ले जाने पर रोक लगा दी गई है। ये बाध्यताएं सोशल मीडिया और इंटरनेट कंपनियों पर भी लागू हैं और उल्लंघन पर आजीवन प्रतिबंध का प्रावधान है।

कांग्रेस पर ‘व्हिसल ब्लोअर’ के खुलासे के बाद
व्हिसल ब्लोअर क्रिस्टोफर विली ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि कैम्ब्रिज एनालिटिका ने कांग्रेस के साथ काम किया। मैं तो पहले दिन से ही कहता रहा हूं कि राहुल गांधी मामले से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं। राहुल बेनकाब हो गए हैं जो अब तक इससे इनकार करते रहे थे। कांग्रेस और राहुल गांधी, दोनों को अब माफी मांगनी चाहिए। 
— रविशंकर प्रसाद
कानून एवं आईटी मंत्री, भारत

सीए (कैम्ब्रिज एनालिटिका) की भारतीय सहयोगी ओबीआई (ओवलेनो बिजनेस इंटेलिजेंस प्रा. लि.) के एक भारतीय पार्टनर अवनीश राय ने सनसनीखेज खुलासा किया है कि एक अमेरिकी एनआरआई ने 2014 में कांग्रेस की सरकार को गिराने के लिए सीए की सेवाएं लीं। कांग्रेस ने कभी सीए की सेवाएं नहीं लीं, भाजपा जवाब दे कि यह एनआरआई कौन था।
— रणदीप सुरजेवाला
कांग्रेस प्रवक्ता 

फेसबुक डाटा में सेंध के खुलासे के बाद 
क्या चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस डाटा की चोरी पर निर्भर है? राहुल गांधी की सोशल मीडिया प्रोफाइलिंग में सीए  (कैम्ब्रिज एनालिटिका) की क्या भूमिका है? देश की सुरक्षा के लिए यह एक गंभीर खतरा है और कांग्रेस को इसका जवाब देना चाहिए।
— रविशंकर प्रसाद, कानून एवं आईटी मंत्री

भाजपा की फेक न्यूज फैक्टरी ने एक और फेक न्यूज गढ़ दी है। ऐसा लगता है कि यह उनका रोज का काम हो गया है। न तो कांग्रेस और न ही राहुल गांधी ने कभी इस कंपनी (कैम्ब्रिज एनालिटिका) की सेवाएं लीं।
— रणदीप सुरजेवाला, कांग्रेस प्रवक्ता 

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हमारा डाटा देश में ही रहे 
 पवन दुग्गल
कैम्ब्रिज एनालिटिका प्रकरण ने दुनियाभर को चिंता में डाल दिया है। अगर लोगों की निजी जानकारी को गलत तरीके से हासिल करके अमेरिका या फिर दूसरे देशों के चुनाव को प्रभावित किया जा सकता है तो भारत में भी ऐसा हो सकता है। इसलिए हमारे लिए यह सावधान हो जाने का समय है। सबसे बड़ी बात यह है कि भारत में डाटा सुरक्षा, निजता और साइबर सुरक्षा को लेकर प्रभावी कानून नहीं है। इसलिए अगर हमारे यहां डाटा चोरी की कोई घटना हो गई तो प्रभावित व्यक्ति के लिए न्याय पाने का रास्ता आसान नहीं होगा। इसलिए सबसे पहले तो कानूनी प्रावधान करने होंगे जिनके अंतर्गत ठोस कार्रवाई हो सके। दूसरी बात है, हमने सेवा प्रदाता के प्रति बहुत ही ढीला रवैया अपना रखा है। अधिकतर सेवा प्रदाता यह दलील देते हैं कि हम भारत से बाहर स्थित हैं और फलां देश के कानून के अधीन हैं, आपके कानून हम पर लागू नहीं होते। हम कानूनी प्रावधानों के माध्यम से उन्हें कड़ा संदेश देने में नाकामयाब रहे हैं, तभी वे इस तरह की बातें कह पाते हैं, वरना यह तो सामान्य सी बात है कि जब आप भारत के लोगों से कमाई कर रहे हैं तो आप यहां स्थित रहें या बाहर, आपको यहां के कानूनों को मानना होगा।एक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह कह रखा है कि अगर आप सेवा प्रदाता हैं तो आपके कामकाज में अदालत या सरकार ही हस्तक्षेप कर सकती है। इसलिए जब भी कोई विवाद होता है, वे कह देते हैं कि जाइए अदालत से फैसला ले आइए। सभी जानते हैं कि अदालत की प्रक्रिया अपने हिसाब से चलती है, इसमें थोड़ा वक्त लग जाता है। नतीजा यह होता है कि सेवा प्रदाता कंपनियां बेखौफ होती जा रही हैं। अगर हम अपने लोगों के डाटा की सुरक्षा चाहते हैं तो इन कंपनियों के बचने के रास्तों को बंद करना होगा। इनके कामकाज को नियंत्रित करने के लिए हमें संबद्ध कानून के साथ-साथ इनकी जिम्मेदारी भी स्पष्टता के साथ तय करनी होगी।
दूसरी बात है, ऐसा कानूनी प्रावधान करना जिससे कि लोगों का डाटा देश में ही रहे, बाहर न जाए। डाटा की सुरक्षा की दृष्टि से यह जरूरी है। एक बार ऐसा हो जाने पर कंपनियों पर सीधा अंकुश लग सकेगा और डाटा के दुरुपयोग की आशंका कम हो जाएगी।
( लेखक सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता तथा साइबर कानून विशेषज्ञ हैं)


आयोग को भी निकालने होंगे नए तरीके

एस.वाई.कुरैशी
जहां तक मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की बात है, तो इसकी कोशिश तो सभी दल करते हैं और उसमें कुछ भी गलत नहीं। तमाम कंपनियां इस तरह की सेवाएं दे रही हैं। यह एक उभरता हुआ क्षेत्र है, जिसमें वैज्ञानिक तरीके से लोगों के व्यवहार का आकलन किया जाता है और फिर लक्षित लोगों की चिंताओं, उनके सरोकारों को देखते हुए मुद्दे तय किए जाते हैं, विज्ञापन बनाए जाते हैं। दिक्कत तब खड़ी होती है जब लोगों की निजी जानकारी का इस्तेमाल बगैर उनकी अनुमति हो जाए। यह निजता का उल्लंघन है, उनके साथ धोखा है। इसलिए मोटे तौर पर ऐसा करने वाली कंपनी या लोग इसी बात के लिए दोषी ठहराए जा सकते हैं।
लेकिन लोकतंत्र के लिहाज से यह खतरनाक है कि कोई सोशल मीडिया कंपनी यह तय करने लगे कि किस देश का शासन किसके हाथ में जाए और इसके लिए गैरकानूनी हथकंडे अपनाए जाएं। फेसबुक का यह विवाद वाकई चिंताजनक है क्योंकि भारत में तो कई वर्षों से चुनाव आयोग मतदाता जागरूकता के लिए उसके साथ अभियान चला रहा है। फेसबुक-कैम्ब्रिज एनालिटिका प्रकरण से ऐसा लगता है कि इसमें सोची-समझी रणनीति के अंतर्गत डाटा की चोरी हुई। डाटा की चोरी आईटी एक्ट की एक मामूली घटना हो सकती है, लेकिन अगर इसके इस्तेमाल से किसी देश की सत्ता का भविष्य तय होने लगे तो यह एक बड़ी साजिश का हिस्सा होने के नाते बड़ी घटना हो जाती है। आयोग के पास धारा 171(सी) के तहत अधिकार है कि अगर कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश करता है तो वह कार्रवाई करे। लेकिन इस तरह के मामले में कार्रवाई करना आयोग के लिए बहुत मुश्किल है, क्योंकि यह कोई तात्कालिक घटना नहीं। इस तरह की घटनाओं को प्रभावी कानूनी प्रावधानों के जरिये ही रोका जा सकता है।
वैसे, चुनाव के दौरान आयोग बहुत सारे ऐसे फैसले ले लेता है जो सीधे उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं होते। जैसे, प्रचार के दौरान घरों-दफ्तरों आदि की दीवारों पर नारे लिखना या फिर प्लास्टिक का इस्तेमाल न करना। अब जबकि लोग एक छोटा सा कानूनी उल्लंघन करके बड़ी साजिश की जमीन तैयार कर ले रहे हैं, तो निष्पक्ष चुनाव कराने का उसका बुनियादी काम प्रभावित हो रहा है। ऐसे में चुनाव आयोग को भी वक्त के साथ बदलना होगा और ऐसी स्थितियों में क्या कदम उठाए जा सकते हैं, इसपर अभी से तैयारी करनी होगी क्योंकि यहां कुछ राज्यों के चुनाव और फिर लोकसभा के चुनाव होने हैं। अगर वे डाल-डाल चलेंगे तो आपको भी पात-पात चलना सीखना होगा।
( लेखक  पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त हैं)


स्टेशनों पर मुफ्त वाई-फाई
गूगल ने भारत के 500 रेलवे स्टेशनों पर मुफ्त में वाई-फाई देने का वादा किया है। यह काम दो चरणों में होगा। गूगल केवल सेवाएं देगी और जरूरी बुनियादी ढांचा सरकार को बनाना होगा।    

फेसबुक, गूगल, ट्विटर तलब  अमेरिकी सीनेट ने फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग, गूगल के सीईओ सुंदर पिचई और ट्विटर के सीईओ जैक डोर्सी को न्यायिक आयोग के सामने 14 अप्रैल को पेश होने को कहा है।

फेसबुक-गूगल की धाक
 पिछले साल पूरी दुनिया में डिजिटल विज्ञापन में फेसबुक और गूगल का हिस्सा 20 फीसदी रहा। दोनों 100 अरब डॉलर  की कंपनी बनने की ओर हैं। इनका काफी सारा पैसा भारत से आता है।

चीन में बायडू और 360 की धूम
चीन में गूगल जैसे सर्च इंजन काम नहीं करते। वहां आॅनलाइन सर्च में बायडू और 360 का कोई मुकाबला नहीं। करीब 84 प्रतिशत खोज  इन्हीं पर होती है।

भारत में सर्वाधिक फेसबुक उपयोगकर्ता 
 जुलाई 2017 में भारत में फेसबुक उपभोक्ता की संख्या तकरीबन 24.1 करोड़ थी, जो दुनिया में सर्वाधिक है। इसके बाद अमेरिका का नंबर आता है जहां इसी अवधि में 24 करोड़ उपभोक्ता थे।

गूगल को पल-पल की जानकारी
फेसबुक के डाटा लीक के बीच गूगल का ध्यान करें तो पाएंगे कि इस सर्च इंजन को हमारे पल-पल की जानकारी रहती है। जैसे- कब कहां गए, कब क्या खोजा। आपके कम्प्यूटर-मोबाइल से ‘हिस्ट्री’ हटा देने के बाद भी गूगल के पास वह सब सुरक्षित रहता है। सोचिए, कभी इसमें कोई घपला हुआ तो क्या होगा?


सोमवार, 23 अप्रैल 2018

उपराष्ट्रपति नायडू ने CJI के खिलाफ महाभियोग के नोटिस को खारिज किया


उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने CJI के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव के नोटिस को किया खारिज

Publish Date:Mon, 23 Apr 2018
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By Sachin Bajpai

नई दिल्ली (जेएनएन)। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ विपक्ष के महाभियोग प्रस्ताव  के नोटिस को उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने खारिज कर दिया। इस संबंध में राज्यसभा सभापति एम. वेंकैया नायडू ने कुछ संविधान विशेषज्ञों से चर्चा व सलाह मशविरा के बाद ये निर्णय लिया।

कांग्रेस के इस नोटिस में जितने सांसदों के हस्ताक्षर थे उसमें से 7 सांसद रिटायर हो चुके हैं और इसी को आधार बनाते हुए उपराष्ट्रपति ने इस प्रस्ताव को खारिज किया है। साथ ही उपराष्ट्रपति ने इस प्रस्ताव को राजनीति से प्रेरित भी बताया है। उन्होंने कहा है कि प्रस्ताव में चीफ जस्टिस पर लगाए गए सभी आरोपों को मैंने देखा और साथ ही उसमें लिखी अन्य बातें भी देखीं।
उपराष्ट्रपति के इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा नेता नलीन कोहली ने कहा कि कांग्रेस की सारी बाते हवा में होती है। न्यायपालिका का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए।
राजनीतिक दलों की अोर से इस बारे में नोटिस मिलने के बाद नायडू 4 दिन की छुट्टी पर आंध्र गए थे, लेकिन मामला गंभीर होते देख वह रविवार को ही दिल्ली लौट आए थे। सोमवार को उपराष्ट्रपति ने इस बारे में फैसला किया। इस फैसले से चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग की मुहिम चलाने वाली कांग्रेस को करारा झटका लगा है। कांग्रेस के नेतृत्व में सात दलों ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव उपराष्ट्रपति को दिया था। यह एक अभूतपूर्व कदम था। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के खिलाफ कभी भी महाभियोग का प्रस्ताव नहीं आया था।
इससे पहले रविवार शाम उपराष्ट्रपति ने लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप, पूर्व विधि सचिव पीके मलहोत्रा, पूर्व विधायी सचिव संजय सिंह व राज्यसभा सचिवालय के अधिकारी से चर्चा की थी। बताते हैं कि देर शाम सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश सुदर्शन रेड्डी से भी उनकी मुलाकात हुई।
गौरतलब है कि विपक्ष की ओर से कांग्रेस ने रविवार को प्रेसवार्ता कर जहां भाजपा पर निशाना साधा था कि वह इसे राजनीतिक मुद्दा बना रही है। वहीं सभापति से आशा जताई थी कि जल्द फैसला होगा। सूत्रों के अनुसार यूं तो वेंकैया मीडिया में जाने के विपक्ष के आचरण से नाराज थे, लेकिन महाभियोग नोटिस की गंभीरता का ध्यान रखते हुए अपना बाहर का दौरा छोटा किया और दिल्ली पहुंच गए।
सभापति के नोटिस अस्वीकार करने के आदेश को कांग्रेस यदि सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देती है, तो उस पर सुनवाई करने वाली पीठ सीजेआई ही तय करेंगे, क्योंकि चीफ जस्टिस ही मास्टर आफ रोस्टर होते हैं।

इन आधारों पर लाया गया था महाभियोग
कांग्रेस पार्टी ने महाभियोग प्रस्ताव लाने के पीछे 5 कारण बताए थे। कपिल सिब्बल ने मीडिया से बात करते हुए कहा था कि न्यायपालिका और लोकंतत्र की रक्षा के लिए ये जरूरी था।
1. मुख्य न्यायाधीश के पद के अनुरुप आचरण ना होना, प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट में फायदा उठाने का आरोप।इसमें मुख्य न्यायाधीश का नाम आने के बाद जांच की जरूरत।
2. प्रसाद ऐजुकेशन ट्रस्ट का सामना जब मुख्य न्यायाधीश के सामने आया तो उन्होंने न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रिया को किनारे किया।
3. बैक डेटिंग का आरोप।
4. जमीन का अधिग्रहण करना, फर्जी शपथ पत्र लगाना और सुप्रीम कोर्ट जज बनने के बाद 2013 में जमीन को सरेंडर करना।
5. कई संवेदनशील मामलों को चुनिंदा बेंच को देना।
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इन 5 कारणों से उपसभापति नायडू ने खारिज किया CJI के खिलाफ महाभियोग का नोटिस

- (इनपुट - भाषा)

राज्यसभा के सभापति एम. वेंकैया नायडू ने कहा कि प्रस्ताव में न्यायमूर्ति के खिलाफ लगाए गए आरोप न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमतर आंकने वाले हैं.

ज़ी न्यूज़ डेस्क | Updated: Apr 23, 2018,

नई दिल्ली: प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ विक्षप की ओर से दिए गए महाभियोग का नोटिस को राज्यसभा के सभापति एम. वेंकैया नायडू ने खारिज कर दिया.  वेंकैया नायडू ने कहा कि प्रस्ताव में न्यायमूर्ति के खिलाफ लगाए गए आरोप न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमतर आंकने वाले हैं.

'आरोप स्वीकार करने योग्य नहीं हैं'
नायडू ने सोमवार को इस प्रस्ताव को नामंजूर करते हुए अपने आदेश में कहा कि उन्होंने न्यायमूर्ति मिश्रा के खिलाफ लगाए गए प्रत्येक आरोप के प्रत्येक पहलू का विश्लेषण करने के बाद पाया कि आरोप स्वीकार करने येाग्य नहीं हैं. उन्होंने आरोपों की विवेचना के आधार पर आदेश में लिखा ‘‘इन आरापों में संविधान के मौलिक सिद्धातों में शुमार न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कम करने वाली प्रवृत्ति गंभीर रूप से दिखती है.’’

'शीर्ष कानूनविदों, संविधान विशेषज्ञों से राय लेने के बाद लिया फैसला'
नायडू ने कहा कि वह इस मामले में शीर्ष कानूनविदों, संविधान विशेषज्ञों, संसद के दोनों सदनों के पूर्व महासचिवों और देश के महान्यायवादी के. के. वेणुगोपाल, पूर्व महान्यायवादी के. पारासरन तथा मुकुल रोहतगी से विचार विमर्श के बाद इस फैसले पर पहुंचे हैं. उन्होंने विपक्षी सदस्यों द्वारा पेश नोटिस में खामियों का जिक्र करते हुये कहा कि इसमें सदस्यों ने जो आरोप लगाये हैं वे स्वयं अपनी दलीलों के प्रति स्पष्ट रूप से अनिश्चिचत हैं.

उन्होंने कहा कि सदस्यों ने न्यायमूर्ति मिश्रा के खिलाफ कदाचार के आरोप को साबित करने के लिए पेश किए गए पहले आधार में कहा है, ‘‘प्रसाद एजूकेशन ट्रस्ट में वित्तीय अनियमितता के मामले में प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि प्रधान न्यायाधीश भी इसमें शामिल रहे होंगे.’’ इस आधार पर सदस्यों ने कहा कि देश के प्रधान न्यायाधीश को भी मामले की जांच के दायरे में रखा जा सकता है.

'प्रस्ताव महज शक और अनुमान पर आधारित'
नायडू ने आरोपों की पुष्टि के लिए इसे अनुमानपरक आधार बताते हुये कहा कि देश के प्रधान न्यायाधीश को पद से हटाने की मांग करने वाला प्रस्ताव महज शक और अनुमान पर आधारित है. जबकि संविधान के अनुच्छेद 124(4) के तहत न्यायाधीश को पद से हटाने लिये कदाचार को साबित करने वाले आधार पेश करना अनिवार्य शर्त है. इसलिये पुख्ता आधारों के अभाव में यह स्वीकार किये जाने योग्य नहीं हैं.

'अधिकारों के दुरुपयोग का आरोप भी स्वीकार्य नहीं'
नायडू ने उच्चतम न्यायालय में मुकदमों की सुनवाई हेतु विभिन्न पीठों को उनके आवंटन में प्रधान न्यायाधीश द्वारा अपने प्रशासनिक अधिकारों का दुरुपयोग करने के आरोप को भी अस्वीकार कर दिया. उन्होंने कहा कि हाल ही में उच्चतम न्यायालय के पांच न्यायाधीशों की पीठ ने अपने फैसले में निर्धारित कर दिया है कि प्रधान न्यायाधीश ही मुकदमों के आवंटन संबंधी ‘रोस्टर का प्रमुख’ है. ऐसे में अधिकारों के दुरुपयोग का आरोप भी स्वीकार्य नहीं है.

'प्रस्ताव को स्वीकार करना अनुपयुक्त और गैर जिम्मेदाराना होगा'
राज्यसभा के सभापति ने कहा कि पुख्ता और विश्वसनीय तथ्यों के अभाव में पेश किये गये प्रस्ताव को स्वीकार करना अनुपयुक्त और गैरजिम्मेदाराना होगा. उन्होंने इस तरह के आरोप लगाने से बचने की सदस्यों को नसीहत देते हुये कहा ‘‘लोकतांत्रिक व्यवस्था के संरक्षक होने के नाते इसे वर्तमान और भविष्य में मजबूत बनाना तथा संविधान निर्माताओं द्वारा सौंपी गयी इसकी समृद्ध एवं भव्य इमारत की नींव को कमजोर नहीं होने देना हम सबकी यह सामूहिक जिम्मेदारी है.’’
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केंद्रीय मंत्री का बड़ा हमला- संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर कर रही है कांग्रेस

Publish Date:Mon, 23 Apr 2018   By JP Yadav
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नई दिल्ली (जेएनएन)। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआइ) के खिलाफ कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों की ओर से लाए गए महाभियोग प्रस्ताव को उपराष्ट्रपति द्वारा खारिज किए जाने का भाजपा ने स्वागत किया है। उसका कहना है कि कांग्रेस ने राजनीति से प्रेरित होकर यह प्रस्ताव लाया था। वह संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने की साजिश रच रही है।

केंद्रीय संसदीय कार्य राज्य मंत्री विजय गोयल ने कहा कि देश में आपातकाल लगाकर प्रेस, अदालत और संसद तक की स्वतंत्रता को छीनने और फिर उसे सही साबित करने वाली कांग्रेस अब संविधान बचाओ मुहिम के नाम पर देशवासियों को गुमराह कर रही है।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस के मनमुताबिक चीजें न होने पर वह हर काम में बाधा डालती है। संसद न चलने देना, सरकार के बिल पास न होने देना, चुनाव में हारने पर ईवीएम पर सवाल उठाना और जीतने पर ईवीएम के खिलाफ चुप्पी साधना और अब अदालतों पर हमला करना इसका उदाहरण है।

उन्होंने कहा कि राज्यसभा के चेयरमैन और उपराष्ट्रपति ने इस मामले में कानून विशेषज्ञों, पूर्व सेक्रेटरी जनरल, संविधान विशेषज्ञों, लॉ कमीशन के सदस्यों व न्यायपालिका से जुड़े विभिन्न लोगों से राय करने के बाद ही यह फैसला किया है।

इस मामले पर भी काग्रेस उसी सुप्रीम कोर्ट में जाएगी, जिसके जजों पर उन्होंने अविश्वास व्यक्त किया है। ऐसा करके वह संवैधानिक संकट पैदा करना चाहती है। पूर्व मंत्री व वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल मुख्य न्यायधीश की अदालत में उपस्थित नहीं होने की बात करके न्यायालय की अवमानना कर रहे हैं।
कांग्रेस चेयरमैन के निर्णयों पर भी आपत्ति कर रही है। इस तरह से उसे किसी भी संवैधानिक संस्था पर विश्वास नहीं रहा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 4 सालों में जो विकास के काम किए, उनकी विकास यात्रा को रोकने के लिए इस तरह की ओछी राजनीति की जा रही है।

देश में अफरातफरी का माहौल बना यह दिखाने की कोशिश की जा रही है कि केंद्र सरकार में सब कुछ ठीक नहीं है। दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी ने कहा कि कांग्रेस व आम आदमी पार्टी सहित अन्य विपक्षी दल हताश हैं, इसलिए वह न्यायिक व्यवस्था और अर्थव्यवस्था को लेकर देश में अवसाद का वातावरण पैदा करना चाहती हैं।

आपातकाल लगाकर कांग्रेस ने आम नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन किया था। उस समय कांग्रेस ने इलाहाबाद हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट के अधिकारों एवं निर्णयों पर भी आघात किया था। एक बार फिर से वह न्यायिक व्यवस्था पर आघात करने का प्रयास कर रही है। कपिल सिब्बल ने सिर्फ सोनिया गाधी एवं राहुल गाधी को प्रसन्न करने के लिए मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने का प्रयास किया।



शनिवार, 14 अप्रैल 2018

अपनी भाषा :अपने स्वत्व की अभिव्यक्ति भी है – परम पूज्य भागवत जी


    अपनी भाषा का प्रयोग व्यवहारिक सुविधा ही नहीं, अपने स्वत्व की अभिव्यक्ति भी  है – परम पूज्य डॉ. मोहन भागवत जी

April 07, 2018

नई दिल्ली (इंविसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि अपनी भाषा का प्रयोग केवल व्यवहारिक सुविधा नहीं है, अपितु अपने स्वत्व की अभिव्यक्ति भी है. स्व की अभिव्यक्ति मातृभाषा में ही संभव है. भाव विदेशी भाषा में व्यक्त नहीं होते. लोकव्यवहार में बोली जाने वाली भाषाओं का अनुवाद भाषा के भाव के अनुरूप नहीं हो पाता. सरसंघचालक जी “जनता को जनता की भाषा में न्याय” विषय पर संबोधित कर रहे थे.

शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास द्वारा केदारनाथ साहनी सभागार में आयोजित सम्मलेन में मुख्य अतिथि के रूप में उन्होंने कहा कि आजादी की लड़ाई में बिरसा मुंडा की जेल में संदेहास्पद स्थिति में मृत्यु हो गयी थी, उनके साथ पकड़े गये 241 मुन्डावी बोली बोलने वाले क्रांतिकारियों के साथ उनकी भाषा के भाषांतर करने वाले ना होने के कारण उनके साथ अन्याय हुआ, अंग्रेजों द्वारा चलाए जा रहे न्यायालय में उम्रकैद की सजा हो गई थी. लेकिन वो ब्रिटिशर्स का राज था, अब तो अपना राज है. न्यायालयों सहित सब जगह अपनी बात स्वतंत्र रूप से अपनी भाषा में रखनी चाहिए. देश में प्राचीन काल से इतनी भाषाएँ होते हुए भी यहाँ लोगों को अन्य प्रान्तों से संपर्क में कोई कठिनाई नहीं आई. सुदूर दक्षिण के केरल से मलयाली भाषी लोग हिमालय की तीर्थ यात्राएं करते रहे हैं, काशी के हिन्दी भाषी लोग रामेश्वरम में कावड़ अर्पित करने जाते रहे हैं, संपर्क के लिए भाषा को लेकर यहाँ कोई मतभेद इतिहास में नहीं दिखता.

उन्होंने कहा कि विद्यालयों में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होने से बच्चों पर अनावश्यक बोझ पड़ने के कारण उनका बौद्धिक विकास रुक जाता है. वह ज्ञान विज्ञान का मौलिक चिंतन नहीं कर पाते. उन्होंने आह्वान किया कि हम अपने से शुरुआत करें कि परिवार में तथा स्वभाषी लोगों से मातृभाषा में ही बात करेंगे.

शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय संयोजक अतुल कोठारी जी ने विषय प्रस्तुतिकरण करते हुए कहा कि 2012 में सर्वप्रथम भारतीय भाषा आन्दोलन का विषय उठाया गया. कानून में प्रावधान है कि जिला, सत्र न्यायालय क्षेत्रीय भाषा में काम करें. लोगों को लोगों की भाषा में न्याय नहीं मिलने के कारण कई कठिनाइयों से गुजरना पड़ता है. धारा 348 – 2 में प्रावधान है – न्यायालयों में अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में भी न्यायिक फैसले की प्रति उपलब्ध करवाई जाए. लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश एवं राजस्थान इन चार राज्यों को छोड़कर अन्य राज्यों में इसका पालन नहीं हो रहा. जब संसद में भाषा को यंत्र के माध्यम से अपनी भाषा में परिवर्तन की व्यवस्था की जा सकती है तो सभी उच्च न्यायालयों में भी लोगों के लिए यह हो सकती है. 20-25 करोड़ रुपये कोई ज्यादा राशि नहीं है इस काम के लिए, किन्तु सवाल इच्छा शक्ति का है, करना चाहते हैं या नहीं. न्याय 130 करोड़ जनता के लिए है या 200 – 300 न्यायाधीशों के लिए, यह सोचने का विषय है. इस समय इसके लिए अनुकूल वातावरण है, हमारे उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति ने इस दिशा में पहल की है.

पांच राज्यों में न्यायाधीश रह चुके न्यायमूर्ति प्रमोद कोहली जी ने कहा कि यदि आईएएस स्थानीय भाषा सीख सकते हैं तो न्यायाधीश भी सीख सकते हैं. भाषा को समझे बिना वहां के कल्चर को समझना कठिन है. न्यायिक प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए स्थानीय भाषा में भी नियम और कानून बना कर, स्थानीय लोगों को उनकी भाषा में न्याय उपलब्ध करवाने की आवश्यकता है.

इस अवसर पर सह सरकार्यवाह डॉ. मनमोहन वैद्य जी, अ.भा. संपर्क प्रमुख अनिरुद्ध देशपांडे जी, विशिष्ट अतिथि के रूप में हरिहरन नय्यर जी, दीनानाथ बत्रा जी, अधिवक्ता परिषद् के अध्यक्ष जॉयदीप रॉय जी, सहित न्यायविद, शिक्षाविद एवं बुद्धिजीवी उपस्थित थे.

गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

कैंसर का घरेलु इलाज, जो लास्ट स्टेज में भी करता है काम




कैंसर का ऐसा घरेलु इलाज, जो लास्ट स्टेज में भी करता है काम

http://rajivdixitji.com/cancer-treatment

http://videominecraft.ru/watch/

कैंसर हमारे देश मे बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है । हर साल बीस लाख लोग कैंसर से मर रहे है और हर साल नए cases आ रहे है । और सभी डॉक्टर्स हाथ-पैर डाल चुके है । राजीव भाई की एक छोटी सी विनती है याद रखना के … ” कैंसर के patient को कैंसर से death नही होती है, जो treatment उसे दिया जाता है उससे death सबसे अधिक होती है ” । माने कैंसर से ज्यादा खतरनाक कैंसर का treatment है ।

Treatment कैसा है ? ?आप सभी जानते है .. Chemotherapy दे दिया, Radiotherapy दे दिया, Cobalt-therapy दे दिया । इसमें क्या होता है के शरीर का जो प्रतिरक्षक शक्ति है Resistance power ! वो बिलकुल ख़तम हो जाती है । जब Chemotherapy दिए जाते है तो डाक्टर ये बोलते है की हम कैंसर के सेल को मारना चाहते है लेकिन होता क्या है अच्छे सेल भी उसी के साथ मर जाते है ।

डॉक्टर आपको भूल-भुलैया में रखता है अभी 6 महीने में ठीक हो जायेगा 8 महीने में ठीक हो जायेगा लेकिन अंत में वो मर ही जाता है , कभी हुआ नही है के Chemotherapy लेने के बाद कोई बच पाया हो । आपके घर परिवार में अगर किसी को कैंसर हो जाये तो ज्यादा खर्चा मत करिए कियों की जो खर्च आप करेंगे उससे मरीज का तो भला नही होगा उसको इतना कष्ट होता है की आप कल्पना नही कर सकते । उसको जो injections दिए जाते है, जो Tablets खिलाई जाती है, उसको जो Chemotherapy दी जाती है उससे सारे बाल उड़ जाते है, भ्रू के बाल उड़ जाते है, चेहरा इतना डरावना लगता है के पहचान में नही आता ये अपना ही आदमी है? इतना कष्ट क्यों दे रहे हो उसको ? सिर्फ इसलिए के आपको एक अहंकार है के आपके पास बहुत पैसा है तो Treatment कराके ही मानुगा ! होता ही नही है वो,

और आप अपनी आस पड़ोस की बाते ज्यादा मत सुनिए क्योंकि आजकल हमारे Relatives बहुत Emotionally Exploit करते है । घर में किसी को गंभीर बीमारी हो गयी तो जो रिश्तेदार है वो पहले आ के कहते है ‘ अरे All India नही ले जा रहे हो? PGI नही ले जा रहे हो ? Tata Institute बम्बई नही ले जा रहे हो ? आप कहोगे नही ले जा रहा हूँ मेरे घर में ही चिकित्सा …. अरे तुम बड़े कंजूस आदमी हो बाप के लिए इतना भी नही कर सकते माँ के लिए इतना नही कर सकते ” । ये बहुत खतरनाक लोग होते है !! हो सकता है कई बार वो Innocently कहते हो, उनका intention ख़राब नही होता हो लेकिन उनको Knowledge कुछ भी नही है, बिना Knowledge के वो suggestions पे suggestions देते जाते है और कई बार अच्छा खासा पढ़ा लिखा आदमी फंसता है उसी में .. रोगी को भी गवाता है पैसा भी जाता है ।

हल्दी में एक तत्व पाया जाता हैं जिसको करक्यूमिन कहा जाता हैं जो कैंसर को रोकने में रामबाण हैं। अगर आपको कैंसर का डर हैं या इस की शुरुवात भी हो गयी हैं तो आप घबराइये नहीं आप निरंतर हल्दी का सेवन अपने भोजन में करे। 90 % मरीज कैंसर से नहीं मरते बल्कि उसके इलाज से मर जाते हैं ये एक आश्चर्यजनक तथ्य हैं। अगर किसी मरीज ने अपना कीमो करवाना शुरू कर दिया हैं तो फिर उसका नार्मल होना बहुत मुश्किल हो जाता हैं। और उस पर फिर ये प्रयोग ना करे। राजीव दीक्षित भाई ने ऐसे कई मरीज सही किये थे जिनको कैंसर था। और उन्होंने जो देसी इलाज अपनाया वह था भारतीय गौ मूत्र, हल्दी और पुनर्नवा । अगर आप या किसी अन्य को ऐसी कोई शिकायत हैं तो आप भी इस घरेलु नुस्खे से स्वस्थ्य पा सकते हैं।

देसी गाय ये आपको अपने आस पड़ोस में या गौशाला में मिल जाएगी, इसमें भी विशेष हैं काली गाय और ये ध्यान रखे के गाय गर्भवती ना हो, बेहतर होगा आप वो गाय का मूत्र लीजिये जो अभी छोटी बछड़ी हैं। अब इस एक गिलास गौ मूत्र में 1 चम्मच हल्दी डाल कर इसको धीमी आंच तक 10 मिनट तक उबाले, उबलने के बाद आप इसको रूम टेम्परेचर पर ठंडा कर ले, बस दवा तैयार। इसको छान कर आप किसी कांच की बोतल में डाल कर रख ले। अब हर रोज़ सुबह खली पेट और रात को सोते समय बिलकुल आखिर में और दिन में कम से कम 3 बार 10-10 मिली ले। और निरंतर अपना चेक अप करवा ले आप देखेंगे के आपकी कैंसर की बीमारी चमत्कारिक रूप से सही हो रही हैं।

संपर्क – Shri Navgrah Ashram, Moti Bor Kheara Near Raila (Bhilwara)-Rajasthan 311026
COMPILERS- Hansraj choudha

बुधवार, 28 मार्च 2018

गुलाबचन्द कटारिया : जन विश्वास का नेता




- अरविन्द सिसौदिया
जिला महामंत्री भाजपा कोटा !!! 
9414180151 / 9509559131

माननीय गुलाबचन्द्र कटारिया जी को कभी सत्ता सुख ने छुआ तक नहीं हे। कांग्रेस को खुश करने के लिये कोई कुछ भी कह सकता है - लिख सकता हे। समस्या,समाधान, अनुसंधान और विकास निरंतर चलनेवाली प्रतिक्रिया है। जनता के बीच जिनकी जमानत भी नहीं बचती वे लिखनें में कुछ भी लिख सकते हे। मगर कोई भी आरोप लगाने वाला श्री गुलाबचन्द कटारिया जैसा जन विश्वास का नेता बन कर दिखायें तो जानें।

विधानसभा की सदस्यता
1977 - 1955 सदस्य, 6वीं राजस्थान विधान सभा
1980 - 1985 सदस्य, 7वीं राजस्थान विधान सभा
1989 - 1991 सदस्य, 9वीं लोक सभा
1993 - 1998 सदस्य, 10वीं राजस्थान विधान सभा
1998 - 2003 सदस्य, 11वीं राजस्थान विधान सभा
2003 - 2008 सदस्य, 12वीं राजस्थान विधान सभा
2008 - 2013 सदस्य, 13वीं राजस्थान विधान सभा
2013 - cont. सदस्य, 14वीँ राजस्थान विधान सभा
पार्टी पदों पर कार्य
1977 - 1980 उपाध्यक्ष एवं महासचिव, जनता युवा मोर्चा
1980 - 1985 सचिव, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), राजस्थान
1986 - 1993 महासचिव, भाजपा, राजस्थान
27/05/1999 - 19/06/2000 भाजपा अध्यक्ष, राजस्थान
सरकार में पदों पर कार्य
1980 - 1981 सदस्य, प्राक्कलन समिति, राजस्थान विधान सभा।
1981 - 1985 सदस्य, प्राक्कलन समिति (अ), राजस्थान विधान सभा।
19/01/1990 Member, Committee on Papers Laid on the Table, Lok Sabha
1990 सदस्य, कृषि संबंधी समिति, लोक सभा।
13/12/1993 - 30/11/1998 मंत्री, प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा, भाषा, सरकार. राजस्थान की।
13/12/1993 - 05/07/1998 मंत्री, संस्कृत शिक्षा, भाषी अल्पसंख्यक, भाषा विभाग (भाषा विभाग), देवस्थान, राजस्थान सरकार।
1999 - 2000 अध्यक्ष, लोक लेखा समिति, राजस्थान विधान सभा।
1999 - 2000 सदस्य, सदन समिति, राजस्थान विधान सभा।
24/08/2002 से 04/12/2003 विपक्ष के नेता, राजस्थान विधान सभा।
08/01/2004 से 31/05/2004 लोक निर्माण विभाग और गृह मंत्री, राजस्थान सरकार।
31/05/2004 से 31/12/08 गृह मंत्री, राजस्थान सरकार।

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** देश के बढ़ते मान सम्मान को आगे ले जानें के लिये निरंतर भाजपा को जितायें - आगे बढ़ायें - गृहमंत्री गुलाबचन्द कटारिया 

कोटा 27 मार्च। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व पर पूरे देश को विश्वास है, उन्ही के नेतृत्व में भाजपा विभिन्न प्रदेशों सहित पूरे देश में छा गई और भारत पूरे विश्व में छा गया है। देश को आगे बढ़ानें के लिये भारतमाता को परम वैभव पर पहुंचानें के लिये, अमीर गरीब की खाई खत्म करने के लिये, आतंकवाद परास्त करने के लिये और पाकिस्तान को घर में घुस कर ठोकनें के लिये लगातार भाजपा को विजयी बनाना होगा ताकि शक्तिशाली देश का वास्तविक निर्माण हो सके,नया भारत बने सके। यह उदगार भाजपा शहर जिला कोटा की जिला बैठक में गृहमंत्री गुलाबचन्द कटारिया ने कहे।
उन्होने कहा कार्यकर्ताओं को सचेत करते हुये कहा “ व्यक्तिगत लाभ हॉनी के कारण देश हित में बाधा नहीं आनी चाहिये , देश का नव निर्माण होगा, देश मजबूत बनेगा, देश आत्म निर्भर बनेगा तो पीढ़ियों का सुख और वैभव बढ़ेगा।” कटारिया ने भावुक होते हुये कहा “ भष्टाचार की भट्टी में जल कर राख हो चुकी कांग्रेस भाजपा के विजय रथ को नहीं रोक सकती, राई जैसी किसी सफलता से भाजपा को नहीं रोका जा सकता, सारा विपक्ष मोदी के विरूद्ध एक जुट हो रहा है। हमें चुनौती समझना चाहिये और भाजपा कार्यकर्ताओं को संकल्प लेना चाहिये कि किसी भी तरह की चुनौती हो हम भाजपा के विजयी रथ को आगे बढ़ायेंगे।”
उन्होने कहा “ भाजपा की वर्तमान सत्ता को देख कर किसी भी नेता को अभिमान करने की जरूरत नहीं है, यह स्थिती 93 साल से संघ के चल रहे अथक परिश्रम की परिलब्धि है, शाखा की मिट्टी में खेलो लोगों की सिद्धि है, 70 साल से राजनैतिक क्षैत्र में आहूती बन कर स्वाहा हो गये लाखों - लाखों कार्यकर्ता के परिश्रम और तपस्या का फल है। इसे हमें संजो कर और आगे तक ले जाना है, भारत माता को परमवैभव के सिंहासन पर आरूढ़ करना है। चरैवेती चरैवैती की तरह निरंतर विजयी के साथ राष्ट्रनिर्माण के सारथी बनना है।”
कटारिया ने कहा कांग्रेस किसी भी मंच पर आकर विकास कार्यो पर मुझसे बहस कर सकती है, उन्होने 50 साल के शासन में जो किया उससे कई गुना हमनें अपने शासन करके दिखाया है।

अरविन्द सिसौदिया
जिला महामंत्री भाजपा कोटा
9414180151

गुरुवार, 22 मार्च 2018

एक है हिन्दुत्व : परम पूज्य भागवत जी



एक है हिन्दुत्व – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक जी का साक्षात्कार


रा.स्व.संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा यानी संघ से जुड़ा वर्ष का सबसे बड़ा आयोजन. समाज में संघ कार्य की स्वीकार्यता तेजी से बढ़ रही है. विविध क्षेत्रों में संघ के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने की उत्कंठा है. 2018 के अवसर पर रेशिम बाग, नागपुर में सरसंघचालक परम पूज्य श्री मोहन भागवत जी ने देश के वर्तमान राजनीतिक – सामाजिक परिदृश्य तथा संघ के बढ़ते व्याप के संदर्भ में पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर तथा आर्गनाइजर के संपादक प्रफुल्ल केतकर से विस्तृत बातचीत की. प्रस्तुत हैं विशेष साक्षात्कार के संपादित अंश –

आज संघ कार्य के लिए जो अनुकूलता दिखती है, इसे आप कैसे देखते हैं?
संघ के स्वयंसेवक सर्वदूर समाज में जाते हैं. अन्यान्य क्षेत्रों में काम भी करते हैं. संघ की शाखा में भी जाते हैं. समाज में, विभिन्न संगठनों में काम करते हैं. कई ऐसे हैं जो ऐसा कुछ नहीं करते, अपनी घर-गृहस्थी के लिए ही काम करते हैं. इन सबके व्यवहार और आचरण से वह सब झलकता है. जो काम उन्होंने किया है, वह घर-गृहस्थी चलाने का काम हो या किसी संगठन को चलाने का काम हो या समाज में किसी समस्या को सुलझाने का हो. उस समय में उनकी दृष्टि, समझदारी, सबको साथ लेकर चलने का स्वभाव रहा है और स्वयं की पारदर्शिता, सरलता, नि:स्वार्थ बुद्धि, इन सबका दिव्य परिणाम होता है, समाज पर संघ का विश्वास बढ़ाता है. संघ के जो प्रसिद्ध लोग हैं, आज उनको तो समाज दूर से देखता है. पर उसके घर के आस-पास रहने वाले संघ कार्यकर्ताओं को देखकर समाज को संघ पर विश्वास होता है. संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के बोलने और व्यवहार को देखकर लोग एक बात का बड़ी मात्रा में अनुभव करते हैं कि ये वे लोग हैं जो जैसा बोलते हैं, वैसा करते हैं. जो बोलते हैं, वह करते हैं. छुपाते कुछ नहीं. और विश्वास के लिए यह आवश्यक होता है. संघ के स्वयंसेवक विश्वासपात्र हैं और ये अच्छा करेंगे, मंगल करेंगे, इनके साथ रहने से अपना भी अच्छा होगा, ऐसा समाज को लगने लगा है. इसलिए समाज विश्वास करता है. अब उनके विश्वास पर खरा उतरने के लिए और कुछ नहीं करना केवल स्वयंसेवकों को और अच्छा स्वयंसेवक बनना पड़ेगा. समाज को साथ लेकर चलने से ही समाज की अपेक्षा धीरे-धीरे पूरी होगी.

 अगले एक-डेढ़ वर्ष में समाज और राजनीति की क्या दिशा होगी? क्या ऐसा लगता है कि हम बड़े बदलावों से गुजर रहे हैं?

बदलाव तो होते रहते हैं. वातावरण बदला है. भारत की स्थिति बदली है. देश पहले से अधिक बलवान एवं अधिक प्रतिष्ठित हो गया है. ऐसे में स्वाभाविक है कि देश के अंदर और बाहर परिस्थिति को संभालने का उसका तरीका थोड़ा बदल जाएगा. अधिक ताकत से संभालेगा. अधिक प्रतिष्ठा है तो उसका अधिक प्रभाव रहेगा. इसलिए बदलाव आता है. समाज के आचरण में धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है. विशेषकर तरुण पीढ़ी में अनुभव होता है कि स्वतंत्रता के पूर्व की तरुण पीढ़ी में जो उत्साह का वातावरण था कि देश के लिए जीना और देश के लिए मरना, यह एक अंतर्प्रवाह बह रहा था, जिसके चलते स्वार्थ गौण हो गये थे. आज फिर से वैसा वातावरण तरुण पीढ़ी में दिख रहा है. वह जो चाहता है प्रामाणिकता से चाहता है, उसको किसी प्रकार का दंभ, नाटक पसंद नहीं. जहां उसको सही बात मिलेगी, सादगी मिलेगी, दंभ नहीं मिलेगा, पारदर्शिता मिलेगी, वहां वह जुड़ जाएगा. स्वतंत्रता के बाद इतने वर्षों का अनुभव लेकर समाज की समझदारी भी बढ़ी है. एक स्वाभाविक प्रक्रिया चल रही है. उसके भी परिणाम अच्छाई की ओर ले जाएंगे. समाज के नाते एक स्वस्थ समाज बनने की दिशा में जाएगा. उथल-पुथल बहुत है. लेकिन यह उथल-पुथल अंत में नवनीत निकालने वाली है. उथल-पुथल में चौदह रत्न निकलते हैं. समुद्र मंथन में हलाहल भी थोड़ा बहुत निकलता ही है. उसे पीने वाले शिव हैं तो फिर उससे डरने की आवश्यकता नहीं है. संघ के स्वयंसेवक ऐसी ही भूमिका अदा करेंगे, ऐसा दिखता है.

 बाहर बहुत कयासबाजी हो रही थी कि नागपुर में प्रतिनिधि सभा है तो इस बार कुछ बड़ा होगा. मगर उस सारी चीज को धत्ता बताते हुए और जो बाहर कयास हो रहे थे, उनको चौंकाने वाली उद्घोषणा हुई. संघ इतना सरल है, फिर इतना चौंकाता क्यों है?
सरलता वस्तु में होने से नहीं चलता. सरलता देखने वाले में चाहिए. अन्यान्य कारणों से वह सरल चीज को भी कठिन महसूस करता है. सामान्य गणित, जो आज एक मिनट में ठीक कर देते हैं, वह जब हम उस आयु में थे, तब हमको बड़ा कठिन लगता था क्योंकि हमारा ध्यान वैसा नहीं था, आज है इसलिए वह हम कर सकते हैं. यह पहली बात है.

दूसरी बात है कि दृष्टि ऐसी हो कि देखने की सरलता में भी लोग अर्थ खोजते हैं.

अगर अनुभव ऐसा सीधा आता होगा कि बार-बार सरलता मानकर गए और कुटिलता दिखी. तो वह पहले किसी भी सरलता की परीक्षा लेकर परखेगा, फिर कहेगा कि ये सरल है. ये तीसरे प्रकार के लोग बहुत थोड़े हैं. ऐसे लोग आते हैं, देखते हैं तो उनकी बातें ठीक हो जाती हैं.

संघ तो सरल है. लेकिन बाहर ऐसा कहीं होता नहीं, इसलिए कयास लगाते हैं लोग. कुछ बड़ा होगा. बड़ा हमारे यहां कुछ रहता ही नहीं. हां, दायित्व का परिवर्तन कोई बड़ी बात नहीं है. यह तो हमारे यहां दायित्वों की जो श्रृंखला है, वह एक व्यवस्था है कार्य चलाने के लिए. सब लोग स्वयंसेवक हैं. समाज में काम करना है तो एक औपचारिकता रखनी ही पड़ती है, उसके लिए व्यवस्था बनानी पड़ती है. उसमें दायित्व भिन्न प्रकार के मिलते हैं. लेकिन सरसंघचालक जितने बड़े, उतने सरकार्यवाह बड़े, उतना ही स्वयंसेवक भी बड़ा है. संघ सबका है, सब संघ के ही स्वयंसेवक हैं. एक समय यह चर्चा चलती थी कि हू आफ्टर नेहरू? तो गुरुजी से उस समय भी किसी ने एक बार पूछ लिया – हू आफ्टर यू? तब गुरुजी ने तपाक से कहा – वाइ नॉट यू? यह काम मेरे भरोसे थोड़े चल रहा है. सब लोग हैं. बालासाहब ने कहा कि डॉ. हेडगेवार जैसी मूलगामी प्रतिभा या गुरुजी के व्यक्तित्व जैसा उच्चस्तर मेरे पास नहीं है. जो संघ कार्य हुआ, इन महापुरुषों के कारण हुआ. लेकिन यह देवदुर्लभ कार्यकर्ताओं का संच है. तो इतने लोग मिलकर संघ चलाते हैं, उसमें एक व्यक्ति का इधर से उधर होना, किसी का दायित्व बदलना होता रहता ही है. इसमें ऊंचा-नीचा कुछ नहीं है. तो यह कोई बड़ी बात नहीं, संघ में ये सहज बातें हैं. बाहर से लोगों को लगता है कि यह प्लेस ऑफ पावर है.

एग्जिक्यूटिव अथॉरिटी. ऐसा कुछ है ही नहीं यहां. यह सारे स्वयंसेवकों की सहमति से होता है. उसमें उनका प्रस्ताव आता है. उसके आधार पर चुनाव घोषणा आदि होते हैं.

इसका आधार क्या है और प्रक्रिया क्या है?
प्रक्रिया तो संविधान के अनुसार है कि शाखा के क्रियाशील स्वयंसेवक प्रतिनिधि चुनते हैं. प्रांतों में जो प्रतिनिधि चुने जाते हैं एक विशिष्ट संख्या में, अखिल भारतीय प्रतिनिधि, प्रांत के संघचालक, विभाग प्रचारक और ऊपर के अधिकारी मिलकर सब मतदाता होते हैं. वे चुनाव करते हैं, लेकिन चुनाव एक प्रक्रिया से ही होता है. सबके मन की बात जानकर प्रस्ताव आता है, उसे समझने के बाद उसका अनुमोदन होता है. मैं सरकार्यवाह बना तो अचानक ही बना. मेरे से वरिष्ठ बहुत लोग थे. बदलने का बहुत ज्यादा कारण नहीं था. लेकिन शेषाद्रि जी ने कहा कि मैं इस दायित्व पर लगातार चार बार रहा हूं, अब बदल दो. एक व्यक्ति ही ज्यादा वक्त दायित्व निभाए, ऐसा नहीं है. विभिन्न व्यक्ति आने चाहिए. नई-नई बातें आती रहती हैं. कल्पना आती रहती है. तो इसलिए बदलना पड़ता है. संघ में व्यक्तिवाद नहीं है, इस बात को लोग नहीं जानते. व्यक्ति का महत्व है. प्रत्येक व्यक्ति की चिंता हम करते ही हैं, ख्याल रखते हैं, रखना भी चाहिए, लेकिन संगठन व्यक्तिवादी नहीं बनता.

संघ की प्रेरणा से अलग-अलग क्षेत्रों में चल रहे कार्यों का फलक बहुत बड़ा है. क्या यह फलक और विस्तृत होगा?

हो सकता है. संघ की प्रेरणा स्वयंसेवक में रहती है. स्वयंसेवक ही ऐसा करते हैं. संघ योजना नहीं बनाता. कार्य अच्छा चल रहा है तो प्रोत्साहन देते हैं. सहायता की आवश्यकता होती है तो सहायता करते हैं. विद्यार्थी परिषद गठित करने की संघ की कोई योजना नहीं थी. उस समय की परिस्थति में तरुणों ने सोचा और काम शुरू हो गया. एक ही समय में दो संगठन उत्तर में जम्मू-कश्मीर, पंजाब में नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन बनी तो उसी समय इधर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश में विद्याथी परिषद. बाद में दोनों ने सोचा, हम दोनों स्वयंसेवकों के बनाए संगठन हैं और एक ही उद्देश्य के लिए काम कर रहे हैं फिर दो क्यों रहें? तब वे दोनों मिल गए. ऐसे विद्यार्थी परिषद शुरू हुई 1949 में. लेकिन उसमें पहला प्रचारक जो संघ ने दिया वह 1960 में. संघ केवल शाखा चलाएगा, बाकी काम स्वयंसेवक कर रहे हैं. स्वयंसेवकों को और कुछ काम करने लायक दिखेगा तो वे उसे शुरू करेंगे, ऐसे विस्तार होता जाएगा.

 इतनी संस्थाओं के संवर्द्धन में ये सब काम कैसे करता है?

यह करना नहीं पड़ता, यह होता है. स्वयंसेवक का संस्कार, समवैचारिक व्यवहार, लक्ष्य-स्वयंसेवकत्व ये तीन बातें समान रही हैं. संघ केवल स्वयंसेवक, स्वयंसेवक रहे इसकी चिंता करता है. बाकी सब अपने आप होता है और कोई प्रत्यक्ष संघ के स्वयंसेवक नहीं हैं, लेकिन ये तीन बातें जिनमें हैं तो संघ उनके साथ समायोजित हो जाता है.

इस बार भारतीय भाषाओं को लेकर प्रस्ताव पारित हुआ है. मातृभाषा को लेकर पूर्व में भी एक प्रस्ताव पारित हुआ है. दोनों में क्या मूलभूत अंतर है और क्या साम्य है?

दोनों प्रस्ताव भाषा को लेकर हैं, भारतीय भाषाओं को लेकर हैं. लेकिन पहला प्रस्ताव मातृभाषा में शिक्षा से संबंधित है इसलिए शासकीय तंत्र से उसका अधिक संबंध है. यह प्रस्ताव भारत की भाषाओं, बोलियों और नीति तीनों से संबंधित हैं. यह ज्यादा समाज के व्यवहार से संबंधित है. नीति का कुछ हिस्सा तो आता है, उसका उल्लेख उसमें है, लेकिन हम लोग अपनी भाषाओं का मान रखकर सब भाषाओं को मातृभाषा जैसे ही अपना मानें. अपनी भाषाओं में परस्पर व्यवहार करें. अपनी भाषाओं के ग्रंथों के पठन-पाठन की परंपरा से संबंधित सुझाव इसमें है. यह केवल सरकार के संदर्भ में नहीं है. मीडिया को भी हमने कहा है कि शुद्ध भाषा का उपयोग करो, भाषा का उपयोग शुद्धता से करो.

 आज का संघ मैदान और शाखा के साथ ही दुनिया के संदर्भ में भी अपनी भूमिका देखता है. आपने दोनों दौर देखे हैं, कैसा अनुभव करते हैं?

यह तो होता ही है. हम तो साधन सुविधा के मामले में समाज से दस कदम पीछे रहते हुए भी साथ चलते हैं. समाज के प्रवाह में समाज के साथ चलते हैं. लेकिन जान-बूझकर उससे थोड़ा पीछे रहते हैं. साधन-सुविधा उपयोगी है. लेकिन इसका कुछ दुष्परिणाम भी है. इसलिए इसको एक मर्यादा में उपयोग करना चाहिए. ऐसा ही हम करते हैं. कार्य के लिए जो उपयुक्त है वह हम लेते हैं. यह होता रहा है पहले से. पहले संघ की स्थिति ऐसी थी कि हम पैदल घूमते थे, फिर वाहन दिया गया. हमने वह जमाना देखा है जब पूरे नागपुर में संघ के पास केवल एक ही गाड़ी थी जो कि गुरुजी के लिए उपयोग होती थी. बाकी उस गाड़ी में कोई जाता नहीं था. संघ के कार्यकर्ताओं में तीन-चार लोग थे, जिनके पास अपनी कार थी, वही पुरानी एंबेसडर या फियेट. तीन-चार गाड़ियां थीं. बुलेट मोटरसाइकिल वाले तीन चार स्वयंसेवक थे. वेस्पा स्कूटर उस समय आने लगा था, तो महाराष्ट्र सरकार के कोटे से दो स्कूटर हमको मिले थे, जिसमें एक कार्यकर्ता के पास और एक कार्यालय में रहता था. बाकी सब लोग साइकिल वाले थे. उस समय वाहन इतना प्रचलित भी नहीं था. समाज की स्थिति बदली तो स्वयंसेवकों के पास भी साधन आए. उनका उपयोग होने लगा. यह बिल्कुल स्वाभाविक है. हम इतनी चिंता जरूर करते हैं कि इसकी आदत न हो जाए, और इसके जो दुष्परिणाम हैं, वे न आ जाएं.

तकनीकी साधनों, सुविधाओं एप्स, सोशल मीडिया वगैरह को आप कैसे देखते हैं?

साधन है, उपयोगी है, उपयोग करना चाहिए, किंतु मर्यादा में रहकर. संगठन के स्तर पर सुविधा के लिए एक सीमा तक तकनीकी साधनों का उपयोग किया जा सकता है. इन्हें प्रयोग करते हुए इनकी सीमाओं और नकारात्मक दुष्प्रभावों को समझना जरूरी है. यह आपको आत्मकेंद्रित और अहंकारी बना सकते हैं. सोशल मीडिया का स्वरूप कुछ ऐसा हो गया है कि बस ‘मैं और मेरा’! यानी ‘मैं’ हर बात पर मत व्यक्त करता हूं. ‘मैं’ एक समूह का एक अंग हूं, किंतु समूह के लिए रुकने की भी आवश्यकता नहीं है! फट से ‘मैं’ सोशल मीडिया में पोस्ट भेज देता हूं. कभी-कभी उसके कारण कई बार हटाना पड़ता है. ऐसा सबके साथ होता होगा. फेसबुक तो बिल्कुल है ही ‘फेस’ और यह उसका दुष्परिणाम है. यह आत्मकेंद्रितता को बढ़ाने वाला भाग है. संघ का फेसबुक पेज है, मेरा नहीं है. संघ का ट्विटर हैंडल है, मेरा नहीं है.. और न कभी होगा. वह राजनीतिक क्षेत्र में काम करने वालों के पास होता है, क्योंकि वहां उनकी अधिक उपयोगिता होती है. लेकिन उनको भी उपयोग करते समय सावधानी बरतनी पड़ती है. इसका उपयोग करें पर इसके आदी न बनें. मर्यादा में रहते हुए उसके साथ चलें.

संघ पहले शाखा, संगठन और सांगठनिक बिंदुओं पर ज्यादा केंद्रित दिखता था, अब शाखाओं में सामाजिक प्रश्नों को विस्तार से लिया जाता है. क्या संघ अब बदल रहा है?

यह परिवर्तन नहीं है, यह अभिव्यक्ति है. जिसको ठेंगड़ी जी ‘प्रोग्रेसिव अनफोल्डमेंट’ कहते थे.

विजेत्री च न: संहता कार्यशक्तिर्, विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्.
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं, समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्॥
यह काम संघ का है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इतना ही काम करता है. लेकिन स्वयंसेवक समूह के रूप में एक है और व्यक्तिगत रूप में संघ का घटक बनकर कार्य करता है. प्रामाणिकता से, बुद्धि से, तन-मन-धन से, इसलिए अपने पवित्र मन से ये सब करता है. पहले भी करता था. लेकिन पहले हम बहुत थोड़े थे. हम जो करते थे उस पर ध्यान नहीं जाता था. पहले भी राष्ट्रीय विपदाओं के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने काम किया है. डॉ. साहब के समय रामटेक की यात्रा की अव्यवस्था को सुधारने का काम 1926 में स्वयंसेवकों ने किया, तब से यह चल रहा है. तब ध्यान नहीं जाता था. आज संघ बड़ा हो गया है तो संघ के स्वयंसेवक क्या कर रहे हैं, उस पर ध्यान जाता है. शाखाओं में हम बताते हैं. अब अपनी ताकत ऐसी है कि एक शाखा गांव या शहर में लगती है. उस गांव या शहर के लोग शाखा को अपना मानते हैं. अच्छा मानते हैं. अपेक्षा करते हैं कि संघ उन्हें पूरा करे. अब ताकत है इसलिए कर सकते हैं. क्योंकि संघ की बीजरूप में कल्पना उसी रूप में है.

सज्जन व्यक्ति क्या है, उसका उदाहरण डॉ. हेडगेवार देते थे कि जो घर से ऑफिस के लिए निकलता है सिर झुकाकर और शाम को पांच बजे ठीक से वापस आ जाता है. अपने घर के बाहर किसी के चक्कर में नहीं पड़ता, उसे समाज सज्जन मानता है. पर वास्तव में, सज्जन तो वह होता है जो समाज की चिंता करता है. अपने घर के बाहर क्या होता है, उसका ध्यान रखता है. यह डॉ. हेडगेवार का स्वयं का उदाहरण है. लेकिन इस सब को करने की स्थिति उस समय नहीं थी. आज हम इसको करने की स्थिति में हैं, इसलिए कर रहे हैं.

इस बार प्रतिनिधि सभा में एक बहुत बड़ा बदलाव हुआ है. चार के स्थान पर छह सह सरकार्यवाह! यह काफी बड़ा बदलाव है.
यह संघ कार्य विस्तार का परिणाम है. शाखा और संघ की रचना बहुत विस्तृत हो गयी है. संघ कार्य मिलने पर आधारित है. मिलने-जुलने के लिए एक व्यक्ति के पास पहले समय काफी रहता था. संघ बढ़ने लगा तो शारीरिक प्रमुख, बौद्धिक प्रमुख आदि हुए. बढ़ते कार्य के आयाम भी बढ़ते हैं. उसके लिए लोग देने पड़ते हैं और मिलने-जुलने की एक संख्या रखनी पड़ती है. जिसके साठ लाख तक स्वयंसेवक हों और प्रदेशों के प्रत्येक खंड में लगभग पहुंच गया है, अब मंडल तक जाने की बात कर रहा हो, ऐसे संगठन को संभालने के लिए ऊपर कितने लोग चाहिए, ये तो तय करना ही पड़ेगा. बाकी संगठन अपना क्रियाकलाप स्वतंत्र रूप से स्वयं चलाते हैं, लेकिन उनसे संपर्क करने के लिए मिलना-जुलना रहता है, इस सब कार्य के लिए ज्यादा लोग चाहिए. इसलिए सहसरकार्यवाहों की संख्या बढ़ी है. सरसंघचालक की संख्या नहीं बढ़ सकती, सरकार्यवाह की संख्या नहीं बढ़ सकती. हां, सह सरकार्यवाहों की संख्या बढ़ सकती है. कल और कोई आवश्यकता पड़ी तो भिन्न प्रकार की रचना करेंगे. पर अभी तो वही चल रही है. तो हमने सहसरकार्यवाहों की संख्या बढ़ाई, जिनके गौर करने के अलग अलग बिंदु होंगे.

गौर करने के इन्हीं बिंदुओं में त्रिपुरा भी जुड़ा है. त्रिपुरा को अलग प्रांत के तौर पर चिन्हित करने का कोई विशेष कारण है?
कोई विशेष कारण नहीं है. सरकार जैसे भौगोलिक क्षेत्र और प्रशासकीय सुविधा की दृष्टि से देखती है, हमारे कार्य के संदर्भ में देखा जाता है कि लोगों का जाना-आना कहां ज्यादा है. लोगों की परस्पर प्रकृति कितनी किससे मिलती है. इसी दृष्टि से हमारे प्रांत बनते हैं. जैसे अरुणाचल है. अरुणाचल का सारा जन व्यापार अरुणाचल में केंद्रित है. तो त्रिपुरा एक अलग प्रांत है ही, प्रकृति से, तो अलग कर ही दिया उसे हमने. चुनाव तो अभी हुए, इसे अलग प्रांत बनाने के बारे में हम दो साल पहले से विचार कर रहे थे. गोवा अलग राज्य है और संघ दृष्टि से वह कोंकण प्रांत में है. विदर्भ अलग राज्य नहीं है, पर वह हमारी रचना में अलग प्रांत है. इसी तरह त्रिपुरा हमारी दृष्टि से एक अलग प्रांत बन गया है. हमारे कार्य की वह स्थिति वहां आ गयी. अब वहां एक टीम हो सकती है जो वहां की बातों को संभाल सके.

भारत विश्व का सबसे युवा देश है और सबसे ज्यादा युवा अगर किसी संगठन की तरफ आकर्षित हो रहे हैं तो वह है संघ. इतना बड़ा मानव संसाधन संघ की ओर आकर्षित हो रहा है. इस बारे में आप क्या कहेंगे?
युवा संघ की ओर आकर्षित हो रहे हैं, तो हम उनको साथ लाएंगे और उनको तैयार करेंगे. उनकी रुचि-क्षमता के अनुसार उनको देशहित में लगाएंगे. संघ को अन्यान्य कामों के लिए नई पीढ़ी की आवश्यकता तो रहती है. वे संघ में आएंगे, संघ से परिचित होंगे, संघ से अनुभव लेंगे. अनुभव लेने के बाद उनको लगेगा कि यह ठीक है. साथ-साथ उनकी सक्रियता का भी ध्यान रखकर उनको तैयार करेंगे. यह होने वाला है.

आज के परिदृश्य में राजनीति दो प्रकार से हिन्दुत्व का चित्रण कर रही है, एक है आक्रामक हिन्दुत्व और दूसरा जो वास्तव में हिन्दुत्व है. राजनीतिक परिदृश्य में इन दोनों में अंतर को कैसे देखते हैं?
हम एक ही हिन्दुत्व को मानते हैं. और जिसे मानते हैं उसे मैंने मेरठ में राष्ट्रोदय समागम के भाषण में स्पष्ट किया है. हिन्दुत्व यानी हम उसमें श्रद्धा रखकर चलते हैं. सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, तप, शौच, स्वाध्याय, संतोष और जो ईश्वर को मानते हैं उनके लिए ‘ईश्वर प्रणिधान’. जो ईश्वर को नहीं मानते हैं उनके लिए ‘सत्य प्रणिधान’.

महात्मा गांधी कहते थे, सत्य का नाम हिन्दुत्व है. वही जो हिन्दुत्व के बारे में गांधीजी ने कहा है, जो विवेकानंद जी ने कहा है, जो सुभाष बाबू ने कहा है, जो कविवर रविन्द्रनाथ ने कहा है, जो डॉ. आंबेडकर ने कहा है, हिन्दू समाज के बारे में नहीं, हिन्दुत्व के बारे में. वही हिन्दुत्व है. लेकिन उसकी अभिव्यक्ति कब और कैसे होगी, यह तो व्यक्ति और परिस्थिति पर निर्भर करता है. मर्यादा पुरुषोत्तम राम के समय हिन्दू शब्द नहीं था लेकिन जो हिन्दुत्व है, वही है. वह चलता आ रहा है, उसी का नाम हिन्दुत्व पड़ा. वे हिन्दू थे. सब मर्यादाएं तोड़ने वाले कृष्ण उसी हिन्दुत्व के आधार पर जी रहे थे. परशुराम – कितना बड़ा संहार करने वाले और करुणावतार, दोनों में उनकी जो परिस्थति थी और उनको जो अभिव्यक्ति मिली थी, उनको जो समाज में देना था वह उन्होंने दिया. शिवाजी महाराज ने मिर्जा राजा का सम्मान रखा. वे भी हिन्दुत्व का आचरण कर रहे थे.

इसलिए हिन्दुत्व एक ही है. किसी के देखने के नजरिए से हिन्दुत्व का प्रकार अलग नहीं कर सकते. मैं सत्य को मानता हूं और अहिंसा को भी मानता हूं और मुझे ही खत्म करने के लिए कोई आए और मेरे मरने से वह सत्य भी मरने वाला है और अहिंसा भी मरने वाली है, उसका नाम लेने वाला कोई बचेगा नहीं तो उसको बचाने के लिए मुझे लड़ना पड़ेगा. लड़ना या नहीं लड़ना, यह हिन्दुत्व नहीं है. सत्य, अहिंसा के लिए जीना या मरना. सत्य, अहिंसा के लिए लड़ना अथवा सहन करना, यह हिन्दुत्व है. कब सहन करना, कब नहीं करना किसी व्यक्ति का निर्णय हो सकता है. वह सही भी हो सकता है, गलत भी हो सकता है. लेकिन गलत निर्णय करके वह लड़े तो उसके लड़ने को हिन्दुत्व नहीं कह सकते. गलत निर्णय करके वह चुप रहे तो उसके चुप रहने को आप हिन्दुत्व नहीं कह सकते. लेकिन जिन मूल्यों के आधार पर उसने निर्णय लिया वह मूल्य, वह तत्व, हिन्दुत्व है. ये जो बातें चलती हैं कि स्वामी विवेकानंद का हिन्दुत्व और संघ वालों का हिन्दुत्व, कट्टर हिन्दुत्व और सरल हिन्दुत्व. तत्व का नहीं, स्वभाव आदमी का होता है. कट्टर आदमी होता है. सरल आदमी होता है. ये भ्रम पैदा करने के लिए की जाने वाली तोड़-मरोड़ है, क्योंकि हिन्दुत्व की ओर आकर्षण बढ़ रहा है. दुनिया में बढ़ रहा और अपने देश में भी बढ़ रहा है. उसका लाभ हिन्दुत्व के गौरवान्वित होने से अपने आप हो रहा है. वह न हो इसलिए लोग उसमें मतभेद उत्पन्न करना चाहते हैं. हम हिन्दू के नाते किसी को अपना दुश्मन नहीं मानते. किसी को पराया नहीं मानते. लेकिन उस हिन्दुत्व की रक्षा के लिए हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति, हिन्दू समाज का संरक्षण हमको करना ही पड़ेगा. अब संरक्षण करने में समझाना भी पड़ता है. लड़ना पड़ेगा तो लड़ेंगे भी. हमारा लड़ना हिन्दुत्व नहीं है. हमारा समझाना हिन्दुत्व नहीं है. जिन बातों को लेकर हम चल रहे हैं उसके आधार पर अनुमान करके निर्णय करते हैं. वह मूल ही होता है. एक ही है, सर्वत्र एक ही है. और इसलिए मैंने मेरठ में कहा कि हिन्दू अब कट्टर बनेगा. इसका मतलब है हिन्दू अधिक उदार बनेगा. हिन्दू कट्टर बनेगा का मतलब ऐसे है कि महात्मा गांधी कट्टर हिन्दू थे और उन्होंने हरिजन में कहा भी है – मैं कट्टर सनातनी हिन्दू हूं. उन्होंने उसी अर्थ में कहा कि आप मुझे क्या कह रहे हो, मैं तो हिन्दुत्व का पूरा पालन कर रहा हूं. अब हिन्दुत्व में हिन्दुत्व का कैसा पालन करना, वह तो व्यक्तिगत निर्णय है. हिन्दुत्व में फर्क नहीं होता. आप यह कह सकते हैं कि फलां हिन्दुत्व को गलत समझ रहे हैं. आप कहेंगे कि मैं सही हूं, वह गलत है. इनका हिन्दुत्व, उनका हिन्दुत्व, यह सब कहने का कोई मतलब नहीं है. इसका निर्णय समाज करेगा और कर रहा है. समाज को मालूम है, हिन्दुत्व क्या है.

जब भी अनुकूलता की बात आती है तो उसके साथ कुछ चुनौती भी आ जाती है. आज संघ के बढ़ते हुए परिदृश्य में इस चुनौती को आप कैसे देखते हैं? इस संदर्भ में स्वयंसेवकों को संदेश के रूप में आप क्या कहेंगे?

अनुकूलता में असावधानी बढ़ती है. मनुष्य पर इसका स्वाभाविक परिणाम होता है. इस स्वाभाविकता से ऊपर उठकर अनुकूलता में भी सावधान रहना है. हम जो हैं वह बने रहें. आठवीं कक्षा में अंग्रेजी की पाठ्य पुस्तक में एक कहानी थी – अयाज नाम का एक दीवान था जो बहुत कर्तृत्व संपन्न विश्वासपात्र था. राजा का उस पर भरोसा था. जैसे आज होता है – वैसे उस वक्त भी दरबार में जलने वाले लोग थे. षड्यंत्र भी करते थे. किसी ने राजा के कान में भर दिया कि ये रात को उठकर बाहर नगर के जंगल में जाता है. वहां क्या करता है, पता नहीं, पर रोज जाता है. राजा को विश्वास नहीं हो रहा था, पर रोज-रोज बात सामने आ रही थी. राजा ने सोचा – जरा मैं भी देख लूं, यह क्या है. वेष बदलकर राजा उसके घर के पास रुका रहा. दीवान रात को बारह बजे निकला तो राजा ने उसका पीछा किया. वह जंगल में गया चोर दरवाजे से. एक खंडहरनुमा घर था जंगल में. सुनसान, अकेला. उसमें वह अंदर गया. उस घर की दीवारें वगैरह गिरी हुई थीं. छत नहीं थी. दीवान एक कमरे में गया और दो मिनट के बाद बाहर आया. तब राजा ने उसे पकड़ा और पूछा – बताओ, तुम यहां क्या करते हो. मुझे इतना विश्वास है तुम पर. यहां तुम क्या करने आते हो? मैंने झूठा विश्वास नहीं किया, अपनी आंखों से देखा है. उसने कहा – महाराज, मैं जो करता हूं आप भी चलकर देखिए उस कमरे में. दीवान के हाथ में मशाल थी. राजा बोला, ठीक है. उस खंडहरनुमा कमरे में एक छोटा – सा संदूक था. उसने उसको खोला, और राजा की तरफ देखकर बोला – महाराज आप भी देखिए. संदूक में फटा पुराना एक कोट था. उसने ढक्कन बंद किया और कहा – महाराज, मैं यहां रोज आता हूं और इसको देखता हूं. फिर वापस चला जाता हूं. राजा ने कहा – यह क्या? यह तो तुम्हारा फटा – पुराना कोट है. उसमें हीरे – मोती कुछ भी नहीं हैं. दीवान बोला – महाराज, मैं जब इस नगरी में पहली बार आया था तो मेरे पास संपत्ति के नाम पर यह ही था. आपका कुछ गुण – ग्राह्य स्वभाव और कुछ मेरा अपना कुछ, उसके आधार पर मैं यहां पहुंचा हूं. अब ऐसे कोट मैं देखता भी नहीं. इतने सुंदर वस्त्र मैं पहनता हूं. मेरा मान बढ़ा है. ऐसे में मुझे विस्मरण न हो कि एक दिन मैं ऐसा था. वहां से यहां तक मैं अपने गुणों के भरोसे आया हूं. उन गुणों का मुझे विस्मरण न हो, इसलिए उस स्थिति का स्मरण करा देने वाले इस कोट को मैं रोज देखने आता हूं. अनुकूलता में इसका ध्यान रखना पड़ता है. अनुकूलता अपेक्षा बढ़ाती है. अपना स्तर, अपना कर्तृत्व, समझदारी अपना सब कुछ बढ़ाना पड़ता है. अपने मन को भी उतना विशाल करना पड़ता है. अनुकूलता के चलते अपने स्तर को बढ़ाना पड़ता है और अनुकूलता के चलते ही अपने स्तर को कायम भी रखना पड़ता है. याद करना पड़ता है कि किन गुणों के कारण यहां तक आए हैं. उन सब गुणों को कायम रखकर चलना पड़ता है. बस, यही संदेश है.

साभार – पाञ्चजन्य