मंगलवार, 1 जून 2010

आतंकवादी,उग्रवादी और विघटनवादी गतिविधियों में दया याचिका अस्वीकार हो

दया याचिका के प्रकरणों का वर्गीकरण होना चाहिए , सामान्य जनता के मध्य हुए आपसी विवाद के अपराध और देश के विरुद्ध हुए अपराध में फर्क हे , वही किसी दूसरे देश के इशारे पर किये गये अपराध की भी अलग श्रेणी हे , अर्थार्त अपने देशवासियों के आपस के सामान्य किस्म के विवादों के लिए दया याचिका और फ़ांसी की सजा माफ़ी की बात का द्रष्टिकोण अलग हो सकता हे , मगर विदेशी भूमि के  धन और दिमाग से भारत के विरुद्ध चल rhe  हे आतंकवादी ,उग्रवादी और विघटनवादी गतिविधियों में  दया याचिका अस्वीकार होनी चाहिएइस तरह के मामलों में दया याचिका का प्रावधान ही नही होना चाहिए , व्यवस्था का दोष न्याय में बाधक बने तो उसे तय समय में निर्णय लेने के आदेस सर्वोच्च न्यायालय तो दे ही सकता हे , किसी अपराध की वाजिव सजा देने में केंद्र सरकार या राज्य सरकार भी भय  ग्रस्त हे या डरती हे तो उसका सरकार होना ही नही माना जाना चाहिए , न्यायलय को स्पस्ट टिप्प्न्नी के साथ आदेश की पालना करवानी चाहिए , राजनेतिक हितो के लिए अदालत का इस्तेमाल  नही होना चाहिए  और जब मामला देश के विरुद्ध हो , संसद पर हमले का हो तो रियायत का प्रश्न कहं   से आ गया ,
- मुंबई हमलों के मामले में सरकारी वकील उज्ज्वल निकम का मानना है कि विशेष मामलों में फांसी की सजा पाए अभियुक्तों की दया याचिका को क्रम में सुने जाने की बाध्यता नहीं होनी चाहिए। उनके मुताबिक फांसी की सजा में देरी इसके उद्देश्यों को नष्ट कर देती है। निकम के मुताबिक वे मुंबई हमले के मामले की सुनवाई का हिस्सा रहे हैं जो विश्व के सबसे छोटे आतंकी मुकदमे में से एक रहा है। उन्होंने दया याचिकाओं के संबंध में कहा कि एक विकल्प यह भी है कि जिन दया याचिकाओं पर छह महीने में निर्णय न हो पाए उनको रद्द मान लिया जाना चाहिए।


अरविन्द सिसोदिया 
राधा क्रेशन मंदिर रोड , 
ददवारा , कोटा ,
राजस्थान .  ,         ....,