सोमवार, 6 सितंबर 2010

भगवा का संविधान सभा ने गुणगान किया है....


भगवा रंग की स्तुत्य स्थिती
- अरविन्द सीसोदिया
      यद्यपि तिरंगा ध्वज बनाते समय से ही विवाद ग्रस्त रहा है , कारण यह कि इसे महात्मा गांधी ने इसे धर्म और पंथ के प्रतिनिधित्व के आधार पर बनवाया था , जब सिखों   ने इसमें अपने रंग को समाविष्ट करने के लिए जोर देना शिरू किया तो, कांग्रेस ने राष्ट्रीयध्वज तैयार करने के लिए सन १९३१ में एक कमेटी गठित की जिसमें सरदार वल्लभभाई पटेल , पंडित जवाहरलाल नेहरु , मौलाना आजाद , पट्टाभि सीतारामेय्या , मास्टर तारासिंह , काका कालेलकर और  हर्डीकर को सम्मिलित किया गया था कांग्रेस की इस कमेटी ने जिस झंडे की अनुशंसा की थी वह भगवा रंग का ही था; भगवा ध्वज कि सलाह देते हुए उसमें चरखा स्थपित करने कि बात की थी | मगर तब गांधीजी की जिद के कारण कमेटी की सिफारिस नहीं मानीं गई !
     किन्तु जब भारत स्वतंत्र हो रहा था तब सारा देश भगवा ध्वज की मांग कर रहा था तब , कांग्रेस  अपने २७ साल से उपयोग किये जा रहे तिरंगे को ही देश का राष्ट्रिय ध्वज बनाने पर  दृढ  थी, इसलिए मात्र एक संसोधन  के रूप में चरखे की जगह सारनाथ का अशोक चक्र स्थापित किया गया ..! इतना  जरूर हुआ कि कांग्रेस के झंडे  के लालरंग को केसरिया  कर दिया गया, संविधान सभा में २२ जुलाई १९४७ को बिना किसी संसोधन के, एक बहुत मामूली बहस के उपरांत तिरंगे को राष्ट्रिय ध्वज के रूप में स्वीकार  किया गया, इस बहस  के  दैरान इस रंग के संदर्भ  में उसमें से थोडा सा यहाँ प्रस्तुत है....., जो भगवा रंग की स्तुत्य स्थिती के लिए पर्याप्त सन्देश नेता है...
 संविधान सभा में आसाम के सदस्य,
मौलवी सैयद मोहम्मद सादुल्ला ने जो कहा उसे में सर्वप्रथम ले रहा हूँ ...
  ' ....भारत अपनी आध्यात्मिकता के लिए प्रसिद्ध है, सर्वत्र यह स्वीकार किया गया है कि भारत वर्ष के पास संसार के भिन्न -भिन्न देशों को देने के लिए एक महान आध्यात्मिक सन्देश है, केसरिया  रंग , जैसा कि प्रसिद्ध है , उन सब लोगों का रंग है जो आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करते हैं , केवल हिन्दुओं में ही नहीं वरन मुसलमानों में भी ! अतः  केसरिया रंग हमें  याद दिलाता है कि हम अपने  को त्याग के उस उऊंचे स्तर पर रखें जिस पर हमारे साधू, सन्यासी, पीर और पंडित रहे हैं , में इसलिए झंडे में इस रंग के समावेश का स्वागत करता हूँ ! '
  कांग्रेस और उनके कुछ नेता गण जिस मानसिकता से और जिन लोगों को खुश करने के ढोंग के रूप में केसरिया  शब्द को गाली दे रहें हैं उनकी आँख इन शब्दों को पढकर खुल जानी चाहिए ..!


  संविधान सभा के एक वरिष्ठ सदस्य और बाद में भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपती रह चुके,
सर एस. राधाकृष्णन ने जो कहा वह बहुत ही मार्मिक और भावी भारतीय राजनीति के लिए सन्देश था...,
  "...लाल; नारंगी और भगवा रंग त्याग की भावना प्रदर्शित करताहै, यह कहा गया है कि ' सर्वे त्याग  राज धर्मेशु  दृष्टाः  | ' अर्थात  त्याग के समस्त रूप धर्म के अंतर्गत हैं , दार्शनिकों को राजा होना चाहिए , हमारे नेताओं को निष्पक्ष  होना चाहिए , उनको कर्त्तव्य परायण होना चाहिए , वे ऐसे व्यक्ती होने चाहिए जिनमें त्याग की भावना कूट कूट कर भरी हो, वह त्याग जो कि हमारे आरंभ काल से ही इस केसरिया रंग ने हममें भरा है | यह उस सत्य को सिध्द   करता है कि संसार धनाढ्यों का नहीं है ; सम्पन्न व्यक्तियों का नहीं है बल्कि दीनहीन कर्तव्य परायण और विरागियों का है |  वैराग्य और त्याग की वह भावना नारंगी या केसरिया  रंग से प्रदर्शित की गयी है....| "  उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा "...महात्मा गांधी ने अपने जीवन में हमारे लिए इसका समावेश किया है और कांग्रेस ने उनके सन्देश और उनकी नीति का अनुसरण  किया है | यदि इस कठिन समय में हमने त्याग की भावना नहीं रहती तो हमारा फिर पतन होगा!...., "
  एच जे खांडेकर ने कहा ..,
"....इस झंडे के अन्दर तीन रंग है, एक है भगवा रंग जिसके बारे में खुद की कम्युनिटी का सम्बन्ध आता है | में डिप्रेस्ड क्लास से हूँ और में आपको याद दिलाना चाहता हूँ कि महाराज शिवाजी की शक्ति का जब प्रादुर्भाव हुआ था और जब इस देश को स्वतंत्र करने का मौका आया तो इस  झंडे के नीचे हमारी कौम ने लाखों की तादाद में कुर्बानियां  की हैं | अगर आपको  इसका उदहारण  देखना है तो सिध्दनाख महार का कोट गाँव में आज भी लौह स्तम्भ उस ज़माने की याद दिलाता है |  "
पंडित गोविन्द मालवीय ने कहा ..,एक प्रभावशाली संविधान सभा सदस्य थे और जब देश को यह पाता चला कि तिरंगा ही राष्ट्रिय ध्वज बन रहा है तो इसके विरुद्ध देश में वातावरण पनप रहा था जिसका जबाव देते हुए पंडित जी ने तो पूरा ही तिरंगा हिन्दुओं का बताते हुए जो तर्क दिए उसमें से कुछ इस प्रकार से हैं ....


 "....और फिर में तो अपने कट्टर से कट्टर हिन्दू भाई से सादर और साग्रह  निवेदन करता हूँ कि यह झंडा हिन्दू भावनाओं से ओत प्रोत है | हिन्दुओं की द्रष्टि में यह झंडा उनकी हर एक भावनाओं की , हर एक अंगों की पूर्ती करता है और हिंदुत्व का इसमें पूरा - पूरा स्थान है | वेद  भगवान कहते हैं झंडे का रंग अरूण होना चाहिए | अथर्ववेद में लिखा है  ' अरूणा : सन्तु केतवः |  ' अतः अरुण रंग वैदिक रीति से हिन्दुओं के झंडे का रंग है |

 जब संविधान सभा ने इतने आदर भाव से भगवा का गुणगान किया है उसे आप आतंकवाद का शब्द देकर क्या दिखाना चाहते है , कांग्रेस का हिन्दू विरोध का यह पहला अवसर नहीं है , उसे जब जब भी अवसर मिला तब तब उसके मंच से हिन्दू विरोध हुआ..! मगर यह हिंदुत्व ही है जो लगातार कई शताब्दियों से शत्रुर को परस्त कर मौन तपस्वी की तह आगे और आगे मंजिल की और बाद रहा है ..! बढ़ता रहेगा ...!



However, there were many who were not satisfied with the communal interpretation of the flag. The All India Sanskrit Congress that convened in Calcutta in 1924 suggested the inclusion of saffron or ochre and the "gadha" (mace) of Vishnu as the symbol of the Hindus. Later that year, it was suggested that geru (an earthy-red colour) "typified the spirit of renunciation and symbolised an ideal common to the Hindu yogis and sanyasis as well as the Muslim fakirs and darveshes." The Sikhs also stepped up the demand to either include a yellow colour that would represent them, or abandon religious symbolism altogether.
 In light of these developments, the Congress Working Committee appointed a seven member Flag Committee on 1931- 04-02 to sort out these issues. A resolution was passed noting that "objection has been taken to the three colours in the flag on the ground that they are conceived on the communal basis." The unlikely result of these confabulations was a flag featuring just one colour, ochre ( saffron), and a "Charkha" at upper hoist. Though recommended by the flag committee, the INC did not adopt this flag, as it seemed to project a communalistic ideology.
schools-wikipedia.org/wp/f/Flag_of_India.htm