शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

हिन्दी आम व्यक्ती की भाषा













 राजभाषा हिन्दीं  को आगे बढ़ाएं
 साहस  और संकल्पशक्ति से
हिन्दी में दम है , राजनीती कायर है.. 
- अरविन्द सीसोदिया 
मैं एक बात समझने मैं बहुत ही असफल हो रहा हूँ कि हमारी संविधान सभा में , कांग्रेस में और विशेष कर जवाहरलाल नेहरु जी के मस्तिष्क  में, इस देश की मूल संस्कृती के विरुद्ध ऐसा क्या भरा था जो , सब कुछ अपने हाथमें होने के बावजूद भी देश हित के निर्णय नहीं कर सके ..! वन्देमातरम हो या भगवा ध्वज हो या विक्रम संवत हो या गोऊ  - हत्या बंदी हो या मुस्लिम आक्रान्ताओं के द्वारा ध्वस्त किये हिन्दू मंदिरों  के मामले हों या  राष्ट्रभाषा हिन्दी हो....??? हर मामले में आप फिसड्डी साबित हो रहे थे ...!! किसके दबाव में ...!! क्या कोई गुप्त संधी थी किसी से..! जो कुछ आप देश को दे कर गए उससे तो देश की जन आकांक्षा की पूर्ती नही होती है..!! क्यों नही पुनः देश को अपनी जन आकांक्षा की पूर्ती के लिए नई संविधान सभा मिलाना चाहिए..!!  
    यह बात कांग्रेस और गांधी जी १९१० से कहते चले आ रहे थे और इस हेतु गांधी जी ने खूब प्रयत्न भी किये और जब  वक्त आया तो बड़ी मुस्किल हो गई , ना वह सहास दिखा और न वह द्रढ़ निश्चय ही सामने आया ...!!  संविधान सभा में आम सदस्य यदी जिद पर नहीं आता तो हिन्दी  को राष्ट्रभाषा का सम्मान नहीं मिलता, वन्देमातरम को स्वंय राजेन्द्र प्रशाद जी ने अपनी और से निर्णय देकर बराबरी का दर्जा भर दे पाए.., राष्ट्र भाषा हिन्दी और वन्देमातरम.. दोनों मिले मगर सौतन के साथ..? 
  में   जहाँ तक जनता हूँ , अंग्रेजी १६५० तक इंग्लैंड की राजभाषा भी नहीं थी मगर आज विश्व की भाषा  होने का दावा कर रही है...क्यों ? इस लिए की उन लोगों में स्व अभिमान की द्रढ़ता थी , वे पूरी ताकत से विश्व व्यापी बनाने के लिए संकल्पित थे.., उनकी तरह हमें भी आगे बड़ने की इच्छाशक्ती रखने की मनाही थोड़े ही है...!! हसे किसने कहा कि हाँ निकम्में बनकर अपना देश चलाएंगे...! देश चलाने के लिए देश-स्वाभिमान होना भी जरुरी है..! जिसकी कमी हमेशा ही हर जगह खलती है...! 


    महात्मा गांधीजी ने कहा था " भारत वर्ष में सात लाख देहात हैं | सारे कार्य देहातों पर निर्भर हैं , इसलिए जिसे वे लोग समझ सकें ऐसी भाषा का प्रयोग करने की आवश्यकता है | " भारत कि स्वतंत्रता के तुरंत बाद ही एक ब्रिटिश  पत्रकार ने सन्देश माँगा  था तब गांधी जी ने तुरंत कह दिया था " दुनिया से कह दो गांधी अंग्रेजी भूल गया | "


  १९७७ में  पहलीबार भारत में गैर कांग्रेसी सरकार पुराने कांग्रेसी मोरारजी भाई देसाई के प्रधानमंत्रित्व में बनीं थी , तब अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री बने थे , उन्हें राष्ट्र संघ में भाषण  का अवसर मिला उन्होंने  राष्ट्र संघ में हिन्दी में भाषण देकर  देश का गौरव बदाय था , इसे कहते हैं देशाभिमान.., यह बहुत कम है मगर एक बार इस तरह के प्रयत्न सब और से होनें लगें तो देश में और वोदेश में हिन्दी कि व्यार बह ने लगे..!! १९८८ में विदेश  मंत्री के रूप में नरसिंह राव भी हिन्दीं में ही बोले थे..!  
  हिन्दी में बहुत दम है , उससे धोका कर रहे लोगों को पश्ताना पडेगा.., यह आम व्यक्ती की भाषा है .., जो लोग अंग्रेजी को बनाये रखना चाहते हैं वे देश से गद्दारी कर रहें हैं , गांधी जी ने एक व्यवहारिक सुझाव दिया था कि देश दूसरे देशों से भलेही अंग्रेजी में व्यवहार करे मगर देश के अन्दर का काम केंद्र को हिन्दी में और जिन राज्यों को अपनी प्रांतीय भाषा में काम करना हो वे प्रांतीय भाषा में काम कर सकते हैं ..!  
गहरा षड्यंत्र भी 
   मेरा भी मानना है कि चंद अंग्रेजी की समझ वाले लोग , जिनके व्यापर इससे जुड़े हैं और वे अपना एकाधिकार बनाये रखने के लिए , देश के आम आदमी में इसलिए वह सामग्री भारतीय भाषाओं में  नहीं आने देना  चाहते  की वह समझ न जाए ...! की जालसाजी में देश के राजनेता फंसे हुए हैं .., दूसरा वे लोग जो भारत को निकट भविष्य में इसाई देश बनाने का स्वप्न देस्ख रहे हैं वे भी भारत में से भारतीय भाषाओं के धीरे धीरे उन्मूलन में लगे हैं ..., पाश्चात्य धर्म और व्यापर वर्ग एक गहरे षड्यंत्र के तहत हिन्दी और भारतीय भाषाओं को समाप्त करवा देने के उद्देश्य से काम कर रहे हैं , जिसे समझना होगा ..! और असफल करना होगा ..!!         


हिन्दी संवैधानिक रूप से भारत की प्रथम राजभाषा है और भारत की सबसे अधिक बोली और समझी जानेवाली भाषा है। चीनी के बाद यह विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा भी है।हिन्दी और इसकी बोलियाँ उत्तर एवं मध्य भारत के विविध प्रांतों में बोली जाती हैं । भारत और विदेश में ६० करोड़ से अधिक लोग हिन्दी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। फ़िजी, मॉरिशस, गयाना, सूरीनाम की अधिकतर और नेपाल की जनता हिन्दी बोलती है।
 हिन्दी राष्ट्रभाषा, राजभाषा, सम्पर्क भाषा, जनभाषा के सोपानों को पार कर विश्वभाषा बनने की ओर अग्रसर है। भाषा विकास क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी हिन्दी प्रेमियों के लिए बड़ी सन्तोषजनक है कि आने वाले समय में विश्वस्तर पर अन्तरराष्ट्रीय महत्त्व की जो चन्द भाषाएँ होंगी उनमें हिन्दी भी प्रमुख होगी।

hi.wikipedia.org/wiki/हिन्दी      पर उपलब्ध लेख  बहुत ही ज्ञानवर्धक है  

हिन्दी की विशेषताएँ एवं शक्ति

हिंदी भाषा के उज्ज्वल स्वरूप का भान कराने के लिए यह आवश्यक है कि उसकी गुणवत्ता, क्षमता, शिल्प-कौशल और सौंदर्य का सही-सही आकलन किया जाए। यदि ऐसा किया जा सके तो सहज ही सब की समझ में यह आ जाएगा कि -
१. संसार की उन्नत भाषाओं में हिंदी सबसे अधिक व्यवस्थित भाषा है,
२. वह सबसे अधिक सरल भाषा है,
३. वह सबसे अधिक लचीली भाषा है,
४, वह एक मात्र ऐसी भाषा है जिसके अधिकतर नियम अपवादविहीन हैं तथा

५. वह सच्चे अर्थों में विश्व भाषा बनने की पूर्ण अधिकारी है।
६. हिन्दी लिखने के लिये प्रयुक्त देवनागरी लिपि अत्यन्त वैज्ञानिक है।
७. हिन्दी को संस्कृत शब्दसंपदा एवं नवीन शब्दरचनासमार्थ्य विरासत में मिली है। वह देशी भाषाओं एवं अपनी बोलियों आदि से शब्द लेने में संकोच नहीं करती। अंग्रेजी के मूल शब्द लगभग १०,००० हैं, जबकि हिन्दी के मूल शब्दों की संख्या ढाई लाख से भी अधिक है।
८. हिन्दी बोलने एवं समझने वाली जनता पचास करोड़ से भी अधिक है।
९. हिन्दी का साहित्य सभी दृष्टियों से समृद्ध है।
१०. हिन्दी आम जनता से जुड़ी भाषा है तथा आम जनता हिन्दी से जुड़ी हुई है। हिन्दी कभी राजाश्रय की मुहताज नहीं रही।

११. भारत के स्वतंत्रता-संग्राम की वाहिका और वर्तमान में देशप्रेम का अमूर्त-वाहन
१२. भारत की सम्पर्क भाषा
१३. भारत की राजभाषा

हिन्दी के विकास की अन्य विशेषताएँ

  • हिन्दी के विकास में राजाश्रय का कोई स्थान नहीं है; इसके विपरीत, हिन्दी का सबसे तेज विकास उस दौर में हुआ जब हिन्दी अंग्रेजी-शासन का मुखर विरोध कर रही थी। जब-जब हिन्दी पर दबाव पड़ा, वह अधिक शक्तिशाली होकर उभरी है। 


  • १९वीं शताब्दी तक उत्तर प्रदेश की राजभाषा के रूप में हिन्दी का कोई स्थान नहीं था। परन्तु २० वीं सदी के मध्यकाल तक वह भारत की राष्ट्रभाषा बन गई।
  • हिन्दी के विकास में पहले साधु-संत एवं धार्मिक नेताओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा। उसके बाद हिन्दी पत्रकारिता एवं स्वतंत्रता संग्राम से बहुत मदद मिली; फिर बंबइया फिल्मों से सहायता मिली और अब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया (टीवी) के कारण हिन्दी समझने-बोलने वालों की संख्या में बहुत अधिक वृद्धि हुई है।

राष्ट्रभाषा को स्थापित करने का तरीका अटल जी ने बताया

अंग्रेजी भाषा निहित स्वार्थ को बनाये रखने के लिए, 
कांग्रेस ने,देश को गूंगा और बहरा करके रख दिया
-- अरविन्द सीसोदिया  

      १२ दिसम्बर १९६७ क़ी तारीख में सरकारी भाषा संशोधन विधेयक और प्रस्ताव  पर हुई चर्चा में भाग लेते हुए , तत्कालीन लोकसभा के सदस्य और भारतीय जनसंघ के नेता जो बाद में प्रधानमंत्री भी बने, अटलबिहारी वाजपेयी जी का भाषण पढ़ रहा था, इस भाषण में उनने राजभाषा हिंदी के पक्ष में जो कुछ  कहा  उसके कुछ सार्थक अंश निम्न प्रकार से हैं.....
       अध्यक्ष महोदय , जब मैं श्री फ़्रेंक एंथनी का भाषण सुन रहा था तो मुझे १६५० के  इंग्लैंड  की याद आ रही थी | उस समय इग्लैंड  मैं दो भाषाएँ चलतीं थी | एक फ्रेंच भाषा और दूसरी  लैटिन भाषा | जितने भी कानून बनते थे फ्रेंच भाषा मैं बनते थे और उंची शिक्षा की भाषा लैटिन थी | उस समय फ्रेंच और लैटिन को बनाये रखने के लिए, अंग्रेजी को नहीं लाने के लिए वही तर्क दिए जा रहे थे जो आज भारत मैं अंग्रेजी को बनाये रखने के लिए और भारतीय भाषाओँ को न लाने के लिए  दिए जा रहे हैं | 
   अध्यक्ष महोदय , ताज्जुब तो यह है क़ी अंग्रेजी का विरोध करने वाले १६५० मैं इंग्लैंड मैं थे डाक्टर , वकील , बुद्धिजीवी और ऐसे लोग जिनका फ्रेंच और लैटिन से निहित जुडाव था , उन्होंने अंग्रेजी भाषा को एक बार " बैरिक लेंगुएज " कहा था | बड़े प्रयत्नों से में एक किताब ढूढ़ कर लाया हूँ , " ट्रायम्फस आफ दी इंग्लिश लेंगुएज  " | इस किताब के लेखक हैं मि.जोन्स , यह किताब हमारे पुस्तकालय मैं उपलब्ध  नही है | 
एक माननीय सदस्य : कहाँ से लाए ?
    श्री वाजपेयी जी : यह ब्रिटिश हाई कमीशन के पुस्तकालय से प्राप्त की गई  है, इसके एक अंश को में आपके माध्यम से सदन के सामने रखना चाहता हूँ | १६५० मैं इंग्लैंड  की पार्लियामेंट को एक पेटीशन , एक याचिका , दी गई | इस पेटीशन मैं क्या कहा गया , यह मैं पढ़ना चाहता हूँ : " इसे नार्मन विजेता के प्रति हमारी गुलामी का बिल्ला मानते हुए, फ्रेंच भाषा मैं हमारे कानून होना , और यह क़ी उन कानूनों के अनुसार चलना, जिनको जनता नहीं जान सकती, पाशविक  ग़ुलामी से कुछ ही कम है , क़ी इसलिए इस शासन के क़ानून और परम्पराएँ बिना शब्दों को संझिप्त किए तत्काल मातृभाषा मैं लिखे जाने चाहिए | "
    श्री वाजपेयी जी ने आगे कहा, इस सम्बन्ध मैं इंग्लैंड की पार्लियामेंट ने जो निर्णय किया , उसको भी इस सदन को ध्यान मैं रखना चाहिए |  यह २२ नवम्बर १६५० का फैसला है | " संसद ने यह घोषित करना और क़ानून बनाना उचित समझा है, और इस वर्तमान संसद द्वारा, इसके अधिकार द्वारा यह घोषित हो और कानून बनें , क़ी सभी रिपोर्ट बुक और न्यायाधीशों के निर्णयों और इंग्लैंड के कानून की पुस्तकों का इंग्लिश भाषा मैं अनुवाद हो , और पहली जनवरी १६५१ से और उसके वाद से न्यायाधीशों के निर्णयों की सभी ' रिपोर्ट बुक ' और कानून  की अन्य सभी पुस्तकें जो प्रकाशित होगी , इंग्लिश भाषा मैं होंगी | "
   इंग्लैंड  मैं भी अंग्रेजी को लाने के लिए लडाई लडनी पड़ी थी |
श्री  मनोहरन  : वह एकात्मवादी राज्य है | हमारा संघीय ढांचा है |
श्री  वाजपेयी : में उस बात की भी चर्चा करूँगा |
      इंग्लैंड मैं भी यह तर्क दिया गया था कि अगर डाक्टरों की पढ़ी अंग्रेजी मैं की गई तो मरीज मर जाएंगे , अंग्रेजी इस योग्य नहीं है कि वह क़ानून की और शिक्षा क़ी माध्यम बन सके |  लेकिन  इंग्लैंड की जनता ने अंग्रेजी को लाने का स्वाभिमान पूर्ण निर्णय लिया और आज अंग्रेजी को इतना विकसित कर दिया गया है क़ी हम उस अंग्रेजी के मोह मैं पड  गए हैं , हम उस अंग्रेजी को नहीं छोड़ना चाहते हैं | मेरी मातृभाषा हिन्दी है | 
श्री एन . श्री कान्तन नायर : मेरी नहीं है | 
श्री वाजपेयी जी :
    ...........हिन्दी का किसी भारतीय भाषा से झगडा  नहीं है , हिन्दी सभी भारतीय भाषाओं को विकसित देखना चाहती है | लेकिन यह निर्णय संविधान सभा का है कि हिन्दी केंद्र की भाषा बनें | जब संविधान सभा ने यह निर्णय किया, तो संविधान का जो प्रारूप बना था, उसमें अंग्रेजी के प्रयोग  के लिए केवल पांच  साल रखे गए थे | बाद मैं अहिन्दी - भाषी लोगों की कठिनाई को ध्यान मैं रख कर पांच साल की अवधी बढाकर पन्द्रह साल की गई |
श्री जी भा कृपलानी : यही बेवकूफी थी |
 श्री वाजपेयी जी : आचार्य जी ठीक कह रहे हैं | यह गलती की गई | किछ लोग इस मत के हैं - और इसमें सच्चाई भी हो सकती है - कि अगर अंग्रेजी जानी थी , तो एक बार मैं ही चली जानी चाहिए थी | अंग्रेजी को धीरे धीरे हटाना मुश्किल है | लेकिन जनता की कठिनाइयों का विचार करके यह निर्णय किया गया कि पन्द्रह साल तक अंग्रेजी चले | ........ 
यह जो ब्रिटेन का अपनी भाषा को स्थापित करो फार्मूला था , उससे तो अटलजी ने हमें यहाँ परिचित करवा दिया है ! सवाल यह है कि हम इस पर चल कर कितना आगे बढ़ सकते हैं ....
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