शनिवार, 11 सितंबर 2010

श्री गणेश जी का संदेशा










श्री गणेश वन्दना


गजाननं भूत गणधि सेवितं, कपीत्थ जम्बू फल चारू भक्षणम् ।
उमासुतं शोक विनाश कारकंम्, नमामी विध्नेश्वर पाद पंकजम् ।
वर्णानामर्थ संघानाम् रसानाम छन्द सामपी ।
मंगलनाम् च कर्तारो वन्दे वाणी विनायको: ॥



- अरविन्द सीसोदिया 
 श्री गणेश जी सनातन संस्कृति में सर्वाधिक  प्रभावशाली देवता हैं , उनकी मान्यता और प्रभाव का यह सबूत है कि वे हिन्दुओं के प्रत्येक शुभ कार्य में , मांगलिक कार्य में प्रथम पूजे जाते हैं , उनकी पूजा के बिना कोई भी धार्मिक और मांगलिक कार्य प्रारंभ नही होता है ..! मूलतः उनका जन्म , शौर्य  और अग्रपूजा इस बात के द्योतक  हैं कि  शक्ती ही सर्वोपरी है..!  यही कारण है कि उनकी मान्यता और पूजा भारत में तांत्रिक से लेकर आमजन तक और नास्तिक तक करते हैं .., कभी यह देव विश्व  व्यापी थे , इस तरह का भी अनुसन्धान  हमें मिलता है.., शिव और शिवी  तत्व बहुत ही गूढ़  और व्यापक विषय है.., यूं कहा जाये कि ये अनंत महाशक्ति हैं तो उतम होगा..,  आज सिर्फ चर्चा गणेश जी के  जन्म के कारण  और उनको प्राप्त वर्चस्व की करेंगे..! 
श्री गणेश जी के  जन्म के पूर्व ...
शक्ति स्वरूपा , माता पार्वती अपनीं सहेलियों के साथ कोई चर्चा कर रहीं थी कि उनकी प्रिय सहेलीयां जया और विजया ने उलाहना  दिया कि हमारा भी गण ( रक्षा कार्य को कर्त्ता ) होना चाहिए..! उन्होंने कहा नंदी , भ्रन्गी सहित सभी गण हमारे होते हुए भी हमारे नहीं हैं , वे भगवाण शंकर की ही सेवा में रहते हैं और आज्ञा पालन करते हैं , इन असंख्य प्रथम गणों में हमारा कोई नही है , यद्यपी वे सभी हमारे ही हैं , आप हमारे लिए भी कृपा पूर्वक एक  गण की रचना करें जो हमारी रक्षा को ही प्राथमिकता दे..! 
  एकबार   माता पार्वती जी स्नान कर रहीं थीं , भगवान शंकर आये , नंदी पहरे पर होते हुए भी रोक नही पाए , पति होने के नाते भगवान् अंदर चले गए , पार्वतीजी को शर्मिन्दगी उठानी पड़ी.., उन्हें तत्काल  सहेलियों की बात का स्मरण  हो आया.., सोचा  यह सही ही होगा कि एक गण अपना भी हो...! 
  यहाँ यह बात सहज ही समझी जा सकती है कि शक्ति की सहेली जय और विजय ही तो होंगी...! 
 जब  आर्यावर्त शक्तिशाली था उसका राज , पूरे विश्व पर था, जब  इंग्लैंड शक्तिशाली हुआ उसका राज पूरे विश्व पर हो गया , शक्तिहीन हुआ तो अपने ही उत्पन्न किये हुए देश अमरीका की छाया  में खड़ा है..! आज अमरीका और चीन का खौप  है, उनकी  बात मानीं जाती है , उनके घर के अन्दर घुसा कर कोई आतंक नही फैलाता , उनकी सीमाओं पर शांती रहती है , उनके व्यापारिक हित कोई प्रभावित नहीं कर पाता है |  
श्री गणेश जी का  जन्म  ...
 एक बार माता पार्वती जी के उबटन लगा हुआ था और वे स्नान की तैयारी कर रहीं थी सहेलियां भी उनके  साथ थी जी स्नान में मदद करतीं थीं .., उबटन को मल मल कर छुटाया जा रहा था , कि पार्वती जी ने इसी दौरान उस मेल से एक सुंदर बालक की प्रतिमा बना दी और उसमें प्राणों का संचार कर दिया , वह बालक ही श्री गणेश हुए.., 
 पार्वती जी ने उसे सुन्दर सुंदर वस्त्र , आभूषण  और शस्त्र इत्यादी दे कर कहा तुम मरे पुत्र हो  और तुम्हारा कार्य मेरी रक्षा करना है , उन्हें अनेक प्रकार के आशीर्वाद दे कर उन्हें एक दंड भी दे दिया जिसे हाथ में लेकर , गणपती ही द्वारपाल  हो गए ..!!
भाद्रपद्र शुक्ल की चतुर्थी पर छोटे छोटे बच्चे हाथ  में छोटी छोटी दंडिकाओं  को बजाते हुए घर घर पैसा मांगते हैं .., यह बल गणेश कि दंडिका का ही स्वरूप है..! 
श्री गणेश और देवों में भीषण संग्राम... 
  महा शक्ति पार्वती और आदि देव भगवान शंकर ने कौन सी लीला रच रखी थी यह तो वे ही जानें , मगर शिव पुराण में इस भीषण संग्राम को बहुत ही रोचक प्रस्तुती है.., 
  घटना क्रम वही बनता है , पार्वतीजी अपनी सखियों के साथ स्नान करने गई हैं द्वार पर द्वारपाल रूप में दंडिका लिए श्री गणेश जी खड़े हैं , भगवान शिव पहुचते हैं , गणेश जी उन्हें रोक देते हैं , माता स्नान कर रहीं हैं ; उनकी आज्ञा मिलने पर ही आप अन्दर जा सकेगें.., भगवान  शिवजी सभी तर्कों और तथ्यों से समझाते हैं कि उनके अन्दर प्रवेश में कोई बाधा नहीं है , वे पति होने के नाते जा ही सकते हैं , मगर गणेश जी उन्हें  नही जाने देते .., एक छोटे से  बालक की इस ध्रष्टता पर वे कुपित होकर गणों को आदेश देते हैं कि वह बालक को हटादें.., 
 संझिप्त में इतना बताना ही बहुत होगा की ; गण क्या, भूत प्रेत क्या , देव और अन्य शिव भक्त क्या .., सभी शिवजी के सहयोग के लिए आ पहुचे और उनकी आज्ञा पर युद्धरत भी हो लिए |  
  सक्षम के साथ दुनिया खड़ी हो जाती है , यह उसका उदहारण  है , एक बालक से युद्ध करने सब तत्पर थे, शक्तिशाली शिव को संतुष्ट करने के लिए सभी देव आगये और अपनीं सेवाएं शिव को समर्पित करदीं ..,  ईश्वरतुल्य देवों ने भी बालक गणेश से त्रिलोकी के स्वामी  शिव के पक्ष में युद्ध किया .., भगवान की लीला भगवान जानें.., सभी  पराजित हुए कोई गणेश विजय नहीं कर सका.., अन्तः शिव  जी ने अपने त्रिशूल से गणेश जी के सीर को काट दिया..,
 हाशक्ती   पार्वती का प्रलय .,
 उन्होंने अपनीं तेजस्वी शक्त्तीयों  को संसार में प्रलय मचा देने की आज्ञा देदी, सम्पूर्ण ब्रम्हांड प्रलय ग्रस्त हो गया , सृष्टी चक्र प्रभावित हो गया, ब्रम्हा , विष्णु , महेश कोई रास्ता निकाल कर स्थिति को संभालने की कोशिश में जुट गए.., नारद जी  सहित तमाम देव गण, त्राहीमाम की स्थिती में आ गए .., तब माता पार्वती की स्तुती करते हुए प्रलय शांत करने का आग्रह किया जाने लगा, स्तुती के पश्चात माता ने शांत हो कर देवों को निर्देश दिए कि.., 
१-  सबसे पहले; मेरे पुत्र  गणेश को पुनः जीवित करो.., 
२-  तुम सभी देव मिल कर भी उसे  पराजित नहीं कर सके; फलतः.., वह देवों में प्रथम पूज्य घोषित हो.., 
३- आप लोग  गणेश को  सर्वदेवाध्यक्ष स्वीकार करो..,
महाशक्ती के  आगे समर्पण..,
देवों  ने समझोते के इस  फार्मूले को स्वीकार कर लिया.., देवी ने प्रलय को रोक दिया , 
१- देवों ने सबसे पहले गणेश के धड में हाथी के बच्चे का सिर जोड़ कर उन्हें जीवित  किया.., 
   यह  सिर प्रत्यारोपण की घटना थी .., 
२  - सभी देवों ने एक साथ उपस्थित  हो , वचनबध्दता   की कि हम सभी देवों में प्रथम पूज्य देव गणेश होंगे.., गणेश जी की पूजा  के बिना यदी कोई पूजा होओगी तो वह फलीभूत नहीं होगी.., अतः गणेश जी की पूजा अर्चना  के पश्चात ही अन्य पूजाएँ की जाएँ.., तब से यही विधी सनातन संस्कृती में चल रही है.., 
३  - भगवान शिव , विष्णु और ब्रम्हा ने गणेश जी को सर्व  देवाध्य्क्ष घोषित किया.., 
४-    भगवान शिव ने उन्हें अपना पुत्र स्वीकार कर गणों का नायक बना  दिया..,  


महाशक्ती का आशीर्वाद..,
महाशक्ति  पार्वती जी ने गणेश जी की समर्पण पूर्ण सेवा ( युद्ध कौशल और बलिदान  ) के बदले आशीर्वाद दिया कि ' तुम्हारा पुर्न  जीवित होते समय मुखमंडल  सिन्दूर की तरह तेजस्वी हो रहा था .., इसलिए  तुम्हारी पूजा सिन्दूर से करनी चाहिए.., जो कोई तुम्हारी पूजा सिन्दूर करेगा उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी और वह विघ्न रहित होकर सुख पूर्वक जीवन यापन करेगा ..,
गणेश परिवार 
 गणेश जी का विवाह प्रजापति कि दोनों कन्याओं से हुआ , उनका नाम रिद्धी और सिद्धी है, उनके दो पुत्र शुभ और लाभ हैं , उनकी एक पुत्री संतोषी माता को कहा गया है , मगर इस पर कुछ लोगों का मानना है कि यह गलत है..! 
स्वतंत्रता संग्राम में भी गणेशजी.. 
स्वतन्त्रता संग्राम में में बाल गंगाधर तिलक ने गणेश मंडलों की स्थापना की और उन्हें राष्ट्र जागरण से जोड़ा.., महाराष्ट्र से प्रारंभ  होकर पूरे देश में गणपती जी के मंडल फैल गए और वे स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत  बनें..,  
निष्कर्ष
कुल मिला कर शिवी और शिव  की इस लीला से  हमें सन्देश मिलता है कि .., सृष्टि में सिर्फ शक्ती का ही महत्व है.., उसके अभाव में पराजित होना पड़ता है.., शक्ति  जिस पर हो उसी की अग्रपूजा होती है.., शक्ति  जिस पर हो वही सर्व  देवाध्यक्ष होता है.., शक्ति  जिस पर हो वही वन्दनीय होता है..! आज गणेश जयंती के अवसर पर वे हमें सन्देश दे रहे हैं कि है भारत पुत्रों.., स्वय शक्ति शाली बनों , देश को शक्ति सम्पन्न बनाओ.., शक्ति ही अस्तित्व की गारंटी है, शक्ति सम्पन्न बनों..! 
    
  



श्री गुरू वन्दना

ध्यान मूलं गुर्रु: मूर्ती, पूजा मूलं गुर्रू पदम् ।
मन्त्र मूलं गुर्रू: वाक्यं, मोक्ष मूलं गुर्रू कृपा ॥
गुर्रू ब्रह्मा,गुर्रू विष्णु:, गुर्रू देवो महेश्वर: ।
गुरू: साक्षात परं ब्रह्म: तस्मै श्री गुरुवै नम: ॥


०५ सितंबर २०१६  अपडेट 

स्वतंत्रता को अक्षुण्य रखने का संकल्प 

गणेशोत्सव उत्सव के 11 दिवसीय कार्यक्रमों के माध्यम से युवा शक्ति महा-जागरण के उत्सव में आपकी सक्रीय भागेदारी को नमन् करता हूं एवं समाजोत्थान के इस महान पुरूषार्थ में आपका स्वागत करते हुऐ, में आपका एवं आपके मित्र - बंधुओं एवं सहयोगियों का अभिवादन करता हूं , अभिनंदन करता हूं एवं शुभकामनायें प्रेषित करता हूं।

     भारत के विश्वप्रसिद्ध तेजस्वी प्रधानमंत्री माननीय नरेन्द्र मोदी जी के आव्हान पर आजादी की 70वीं जयंती पर हमनें “ याद करो कुर्बानी ” कार्यक्रम के माध्यम से शहीदों एवं स्वतंत्रता सेनानियों को तिरंगायात्रा निकाल कर श्रृद्धांजली दी हैं। गणेशोत्सव की स्वतंत्रता संग्राम में अत्यंत महत्पवूर्ण भूमिका रही है। हम इस अवसर पर “स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार” की प्रेरणा देने वाले एवं गणेशोत्सव के संस्थापक भारतमाता के महान सपूत लोकमान्य बालगंगाधर तिलक का पूज्य स्मरण करते हुऐ, अपने - अपने क्षैत्र में गरिमापूर्ण तरीके से गणेशोत्सवों का आयोजन सम्पन्न करें। 
      समस्त विध्नों के हर्ता और मंगलकर्ता गणपति महाराज की पूजा का इतिहास चिर-पुरातन तथा वे हमेशा ही अग्रपूज्य रहे हैं। इसमें नित्य नवीनता के प्रयास निरंतर होते रहे हें। इसी क्रम में हमारे पूर्वज ़ऋषियों ; मुनियों ; संतो और शासनकर्ताओं के द्वारा गणेशोत्सव आयोजित होते रहे हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज की माता सौभाग्यकांक्षणी जीजाबाई ने पूणे में गणेश मण्डप की स्थापना की थी जो “क़स्बा गणपति” नाम से आज भी जाना जाता है। पूर्वकाल में यह पर्व पारिवारिक गणेशोत्सव त्यौहार ही था । स्वतंत्रता संग्राम में युवा शक्ति में अपनी संस्कृति के प्रति तेजस्विता का व्यापक जनजागरण करने के लिये, स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने इस त्यौहार को सामाजिक त्यौहार का स्वरूप दिया, जिससे परिवार और मंदिरों से निकलकर चौराहों पर , गली - मौहल्लों में पांण्डलों एवं झांकियों के रूप में गणपति उत्सव आयोजित होना प्रारम्भ हुऐ। जिनके माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम में युवा शक्ति की व्यापक सहभागिता प्रारम्भ हुई, जनजागरण से समाज में ओजस्वी एवं तेजस्वी सांस्कृतिक उत्थान का स्वरूप निर्मित हुआ। जिसमें सर्म्पूण भारतीय समाज एकत्रित होकर स्वतंत्रता के लिये आंदोलित व सह भागी बना।  इसके परिणामस्वरूप हम आज स्वतंत्र है। 
स्वतंत्रता को अक्षुण्य रखनें का संकल्प
     माननीय लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव की विधिवत शुरुआत 1893 ई. में की थी। इतिहासविद् व  ब्रिटिश सरकार ने एकमत से स्विकार किया है कि भारत की आजादी के आंदोलन में गणपति उत्सव की अहम भूमिका रही थी। तिलक द्वारा शुरू किए गए इस उत्सव को आज भी भारतीय पूरी निष्ठा , समर्पण एवं धूमधाम से मनाते हैं और आगे भी मनाते रहेंगे। तब से आज तक और आगे भी इस स्वतंत्रता को अक्षुण्य रखनें का संकल्प , हम भारतवासियों के हदय में हमेशा - हमेशा गणपति उत्सव  के माध्यम से प्रेरणास्त्रोत बन कर रहेगा । इस वसर पर स्वतंत्रता को अक्क्षुण्य रखनें का संकल्प लेते हुए पुनः आप सभी को गणेशोत्सव की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें। आदर सहित ।

इंडिया शब्द हटे,भारत के संविधान से...!



गुलामी के द्योतक शब्द इंडिया से छुटकारा पाए भारत
- अरविन्द सीसोदिया 
   गोवा से कांग्रेस के राज्य सभा सांसद , शांताराम नाईक ने एक गैर सरकारी संविधान संशोधन विधेयक के माध्यम से २७ अगुस्त २०१० को सदन में  भारत के संविधान से इंडिया शब्द हटाने की मांग की , संसद में दोनों सदनों में बहुत सारे गैर सरकारी विधेयक रखे जाते रहते हैं और वे अंततः वापिस ले लिए जाते हैं , मुख्य रूप से किसी विसंगती या सुधार विशेष के लिए ये लाए जाते हैं , यह भी ध्यानकर्षण  का एक तरीका है..! 

Rajya Sabha , August 27, 2010
Shantaram Naik, Congress MP from Goa , on Friday sought a Constitution amendment bill in the Rajya Sabha to call the country simply 'Bharat' and not 'India' 
His private member bill seeks to amend the Preamble and Article 1 of the Constitution of India  to drop India and use 'Bharat'. It says the words 'India, that is Bharat' in sub-clause 1 of Article be replaced with just 'Bharat'.The grounds for changing the name of the country into simply 'Bharat' are many but, more than the grounds or reasons, it is the sense of patriotism that the name generates and electrifies the people of this country that is relevant, Naik noted.The Congress MP quoted a lyric from the 1965 film Sikandar-E-Aazam to buttress his case: "Jahan daal daal par sone ki chidiyan karti hai basera, woh Bharat desh hai mera."
What are your views on the debate? Should India be called just 'Bharat'?

 मुझे लगा कि इस विषय पर संविधान सभा के समय की कुछ बातें सामनें रखीं जाएँ ...
  ज्ञात  रहे कि भारत के संविधान निर्माण के दौरान कांग्रेस और जवाहरलाल नेहरु ही सर्वे सर्वा थे , उनकी ही हर बात मानी जाती थी अडंगा लगाने वाले मुस्लिम लीग के सदस्य संविधान सभा में आये ही नहीं वे पाकिस्तान की मांग में ही व्यस्त थे और उन्हें पाकिस्तान मिल भी गया था!  कुल मिला कर पूर्ण स्वतंत्र स्थिती थी , इस के बावजूद संविधान भारतीयता का प्रतीरूप नहीं बन पाया इसके लिए जवाहरलाल नेहरु और उस समय की कांग्रेस को ही अपराधी माना जाएगा...!
  भारतीय संविधान को सामान्यतः विधि क्षैत्र और लोक प्रसाशन के विद्यार्थी गंभीरता से पढ़ते हैं , मगर जो इस संविधान  सभा के वाद विवाद को पढ़ते हैं वे सहज ही समझ जाते हैं कि संविधान निर्माण के दौरान कांग्रेस और जवाहर लाल नेहरु जी ने , बड़ी ही निर्ममता   से अपनी मनमानी की..! जिसका नतीजा यह हुआ कि देश को आजाद हुए जितने साल नहीं हुए उससे ज्यादा उसमें संविधान - संसोधन हो गए...!! 
 संविधान सभा में जब अनुच्छेदवार  विचार हुआ तो आपको आश्चर्य होगा कि अनुच्छेद - १ पर , जो कि देश के नाम से संम्बन्धित था , पहला अनुच्छेद था उस पर ,  आखिरी में विचार हुआ, और उससे भी अधिक आश्चर्य की बात यह है कि डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी की देखरेख में बनें संविधान की प्रथम मसौदा प्रती में देश का नाम भारत कहीं दर्ज नहीं था... उसमें सिर्फ  इण्डिया  शब्द मात्र था..! जब यह बात उजागर हो गई तब पूरे देश में आलोचनाएँ हुई सर्व व्यापी निंदा के बाद, कहीं प्रारूप समीति  के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने संशोधन  प्रस्तुत किया जिसकी भाषा भी भारत नाम के प्रती अपमान जनक थी , यह संशोधन निम्न प्रकार से है " India , that is, Bhart shall be a Union of states " अर्थात " इण्डिया अर्थात भारत राज्यों का संघ होगा |" इससे पूर्व राष्ट्रवादी विचारधारा वाले सदस्यों ने एक संशोधन  पेश कर भारत शब्द कि इज्जत बनाये रखने की कोशिश की थी  " भारत  अथवा अंग्रेजी भाषा में इण्डिया राज्यों का संघ होगा |   " मगर यह संशोधन ३८ मतों के मुकावले ५१ मतों से हार गया , देखिये दुर्भाग्य की इण्डिया शब्द भारतवासियों  के मत से ही जीता , वे वही लोग थे जिन्हें कांग्रेस और जवाहरलाल नेहरु ने चुनवा  कर संविधान सभा में लाया गया  था , साफतौर पर बात यह है कि नेहरूजी चाहते तो संविधान में इण्डिया शब्द नहीं होता...! 
 इस मुद्दे  पर जो बहस हुई और उसमे जो भारत के पक्षधर सदस्यों  ने तर्क दिए उनमें से कुछ इस प्रकार से हैं ....
१- हरिविष्णु कामत :- 
    संविधान सभा में डॉ. अम्बेडकर के द्वारा प्रस्तुत संशोधन पर अपना संशोधन प्रस्तुतइस प्रकार प्रस्तुत किया ' भारत अथवा अंग्रेजी भाषा में इण्डिया , राज्यों का संघ होगा | ' विकल्प के तौर पर उन्होंने यह भी सुझाया  कि ' हिंद अथवा अंग्रेजी भाषा में इण्डिया , राज्यों का संघ होगा |' उन्होंने अपने तर्क में कहा 'में समझता हूँ कि "इण्डिया अर्थात भारत "  पद का अर्थ "इण्डिया जिसको भारत कहा जाता है " है , यह संविधान में कुछ  भद्दा सा लगेगा |  ' इस तर्क के पक्ष में उन्होंने आयरलैंड के संविधान की धारा को बताया जिसमें लिखा है ' राज्य का नाम एयर अथवा अंग्रेजी भाषा में आयरलैंड है | '
२- सेठ गोविन्द दास :- 
  उन्होंने सुझाव देते हुए कहा " हमारे देश का प्राचीन नाम है , वह हम रख सकते हैं , परन्तु वह जिस सुन्दर तरीके से रखा जाना चाहिए था, डॉ. अम्बेडकर मुझे क्षमा करेंगे , उस तरह से नहीं रखा जा रहा |" उन्होंने आगे कहा '.......वेदों , उपनिषदों तथा ब्राह्मण ग्रंथो के पश्चात हमारा सबसे प्राचीन और महान ग्रन्थ जो 'महा भारत 'है, हमको उससे भारत का नाम मिलता है |  '
" अथते कीर्ति पष्यामी , वर्ष भारत भारतं |  " - भीष्म पर्व , महाभारत
'गायन्तिः देवा किल गीत कानी , धन्यान्तु ने भारत भूमि भागे ' - विष्णु पुराण
" भरणाच्य प्रजानावै  मनुर्भरत  उच्यते |
 निरुक्त  वाचनाचेव वर्ष तद भारतं स्मृतं ||  " - ब्रम्हांड पुराण
 चीनी  यात्री इत्सिग ने देश के रूप में अपने यात्रा वृतांत में 'भारत ' नाम ही प्रयोग किया है |
३- कल्लूर सुब्बा  राव :-
मद्रास के इस सम्मानीय सदस्य ने तर्क उपस्थित करते हुए कहा , मैं भारत  नाम का हार्दिक समर्थन करता हूँ , जो प्राचीन है , भरत नाम   ऋग्वेद  में है, ३, ४, २३.४ में है | ' इम इंद्र भरतस्य पुत्रा '
४- हरगोविंद पन्त :- 
उत्तर प्रदेश के इस सदस्य ने ठोस तर्क देते हुए कहा.., " भारत वर्ष या भारत यह नाम तो हमारे दैनिक धार्मीक संकल्प  में कहा जाता है जो नित्य स्नान में भी काम आता है  : जम्बू दीपे भरत खण्डे आर्यावते......   "
  उन्होंने इण्डिया शब्द का विरोध करते हुए कहा था "... इण्डिया नाम , इस शब्द से न जाने क्यों हमारी ममता सी हो गई है, यह नाम इस देश को विदेशियों ने दिया है , यह नामकरण भी विदेशियों ने ही  किया है , उनको इस देश के वैभव का हाल सुन का लालच हुआ था, और अपनी लालसा को पूरा करने के लिए उन्होंने हमारी स्वाधीनता  पर आक्रमण किया था , अगर हाँ इण्डिया शब्द को अब भी अपने ह्रदय से लगाए रखें तो इसके माने यह होता है कि हमको इस नाम से , जो हमारे लिए अपमान जनक है , जिस नाम को विदेशियों ने हमारे ऊपर थोपा है , और जिसका नामकरण उन्होंने किया है , उससे हमको कोई दुःख नहीं है | मेरी समझ में यह बातें नहीं आती कि क्यों हम इस नाम को अपने पास रख रहे हैं..?  "
".....यह हमारे लिए लज्जा का विषय होगा |"=====
मेरा मत
  मेरा मानना है कि जब हम बहुत से नामों को देश में उनकी पुरानी पहचान के कारण संसोधित कर पुनः बहाल  चुके हैं , तो हब संविधान से इण्डिया शब्द हटा कर पूरे विश्व को भारत लिखने के लिए मजबूर कर सकते हैं , अभी इण्डिया शब्द हमारे भारत को रोक लेता है , अर्थात हमें संविधान से इण्डिया शब्द तुरत हटाना चाहिए..!
 भारत  की किसीभी राष्ट्रिय वंदना में , कहीं भी इण्डिया शब्द की कोई आराधना नहीं है.., हमारे अधिकृत  राष्ट्रगान  में भी भारत शब्द ही है , ऐसी स्थिती में इण्डिया शब्द का क्या ओचित्य है..?