गुरुवार, 23 सितंबर 2010

भारतीय क्रांति की माता : मैडम भीखाजी कामा

- अरविन्द सीसोदिया  
   मैडम भीखा जी कामा भारतीय वीरांगनाओं में से वह नाम है जिसे हम अकबर से लोहा लेने वाली गौंडवानें  की  रानी दुर्गावती और ब्रिटश सरकार को नाकों चववा देने वाली झांसी की रानीं  महारानी लक्ष्मीबाई  क़ी श्रेणीं में रखते हुए गौरवान्वित होते हैं ..!  ब्रिटिश राज्य के विरुद्ध  भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में इन्होने जो वीरतापूर्ण भूमिका निभाई उसके लिए जब तक भारत का इतिहास पढ़ा जाएगा तब तक उन्हें भी पढ़ा जाएगा ..!  उनकी एक विशिष्ठ पहचान भारत के लिए विश्व स्तर  पर संघर्ष और स्वतंत्रता के प्रतीक रूप में तिरंगा झंडा विश्वस्तर पर सर्व प्रथम लहराना भी है | जिसके लिए वे प्रति वर्ष स्वतंत्रता  दिवस , झंडा  दिवस और गणतन्त्र दिवस पर याद किया जाता रहेगा ....!!


उनका सम्मान एक अन्य कारण से भी है क़ी उन्होंने देवनागरी लिपी में वन्देमातरम लिख हुआ झंडा फहराकर हिन्दी और वन्देमातरम गीत को भी सम्मान दिया था ..! 
 सच यह है क़ी वे वन्देमातरम महा राष्ट्रगान के चौथे पेरा ग्राफ  के सामान हैं... , उन्हें कोटि कोटि नमन..,  
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदल विहारिणी
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्
नमामि कमलां अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलां मातरम् ॥

    मैडम भीखा जी कामा  का जन्म , २४ सितंवर  १८६१ में  मुम्बई के प्रशिद्ध पारसी परिवार में हुआ था , पिटा का नाम सोराबजी फ्रामजी  पटेल था और माता का नाम जीजीबाई था ..!  ३ अगस्त १८८५ में उनका विवाह सुप्रसिद्ध वकील उस्तम कम के साथ हुआ था | कामा स्वाधीनता संग्राम से जुड़ी अत्यंत कर्मठ महिला थी। धनी परिवार में जन्म लेने के बावजूद इस साहसी महिला ने आदर्श और दृढ़ संकल्प के बल पर निरापद तथा सुखी जीवनवाले वातावरण को तिलांजलि दे दी और शक्ति के चरमोत्कर्ष पर पहुँचे साम्राज्य के विरुद्ध क्रांतिकारी कार्यों से उपजे खतरों तथा कठिनाइयों का सामना किया। श्रीमती कामा का बहुत बड़ा योगदान साम्राज्यवाद के विरुद्ध विश्व जनमत जाग्रत करना तथा विदेशी शासन से मुक्ति के लिए भारत की इच्छा को दावे के साथ प्रस्तुत करना था। भारत की स्वाधीनता के लिए लड़ते हुए उन्होंने लंबी अवधि तक निर्वासित जीवन बिताया था।
    वह अपने क्रांतिकारी विचार अपने समाचार-पत्र ‘वंदेमातरम्’ तथा ‘तलवार’ में प्रकट करती थीं। श्रीमती कामा की लड़ाई दुनिया-भर के साम्रज्यवाद के विरुद्ध थी। वह भारत के स्वाधीनता आंदोलन के महत्त्व को खूब समझती थीं, जिसका लक्ष्य संपूर्ण पृथ्वी से साम्राज्यवाद के प्रभुत्व को समाप्त करना था। उनके सहयोगी उन्हें ‘भारतीय क्रांति की माता’ मानते थे; जबकि अंग्रेज उन्हें कुख्यात् महिला, खतरनाक क्रांतिकारी, अराजकतावादी क्रांतिकारी, ब्रिटिश विरोधी तथा असंगत कहते थे।
     यूरोप के समाजवादी समुदाय में श्रीमती कामा का पर्याप्त प्रभाव था। यह उस समय स्पष्ट हुआ जब उन्होंने यूरोपीय पत्रकारों को अपने देश-भक्तों के बचाव के लिए आमंत्रित किया। वह ‘भारतीय राष्ट्रीयता की महान पुजारिन’ के नाम से विख्यात थीं। फ्रांसीसी अखबारों में उनका चित्र जोन ऑफ आर्क के साथ आया। यह इस तथ्य की भावपूर्ण अभिव्यक्ति थी कि श्रीमती कामा का यूरोप के राष्ट्रीय तथा लोकतांत्रिक समाज में विशिष्ट स्थान था।    
इस अवसर पर उनके कहे कुछ शब्दों का स्मरण और कुछ कार्यों का व्यौरा  उचित ही होगा...,  
"....जर्मनी के स्टूटगार्ट नगर में आयोजित द्वितीय इंटरनैशनल सोशलिस्ट  कांग्रेस में विभिन्न देशों से एकत्र हजारों प्रतिनिधियों के समक्ष २२ अगस्त १९०७ को , महीन कसीदाकारी की हुई साड़ी में सुसज्जित , काली आँखें वाली , गोरे रंग  की एक सुंदर महिला ने अपने जोशीले और भावपूर्ण भाषण से श्रोताओं को मन्त्र मुग्ध कर दिया | 
भाषण  में उन्होंने कहा ....प्रतिदान  में भारत को बिना कुछ दिए हुए ३ करोड़ ५० लाख पौंड की राशी , भारत से इंग्लैंड भेजी जा रही है , जिसके परिणाम स्वरूप हर महीने ५ लाख भारतीय  गरीबी से मर रहे हैं | भाषण के अंत में उन्होंने नाटकीय ढंग से हरे , सुनहरे और लाल रंगों वाला एक तिरंगा झंडा फहरा दिया | झंडे को लहराते हुए , भावपूर्ण शब्दों में उन्होंने कहा ' यह भारत की आजादी का झंडा है | देखिये, इसने जन्म ले लिया है , शहीद भारतीय युवाओं के रक्त ने इसे पवित्र किया है , मैं आप सभी महानुभावों से भारत की आजादी के इस झंडे  का अभिवादन करने का अनुरोध करती हूँ, साथ ही मैं समस्त विश्व के स्वाधीनता - प्रेमियों से यह भी अनुरोध करती हूँ कि वे सम्पूर्ण मानवता के पांचवे हिस्से , भारत को आजाद करने में इस झंडे को अपना सहयोग प्रदान करें | ' " (ब्यूरो आफ सोशलिस्ट इंटरनेशनल (ब्रसेल्स ) के सचिवालय द्वारा प्रकाशित  )
ब्रिटिश सरकार के, केन्द्रीय गुप्तचर विभाग कार्यालय ने मैडम भीजी रुस्तम के. कामा के नाम से गुप्त फाइल बनाई थी , जिसकी मूल प्रती दिल्ली स्थित राष्ट्रिय अभिलेखागार में सुरक्षित है | उनके एक भाषण के अंश निम्न प्रकार से हैं ---
"....स्वतंत्रता - संघर्ष में असाधारण कदम उठाने पड़ते हैं , विदेशी शासन के प्रति विद्रोह यदी सफल हो जाये तो वह देश भक्ति है , स्वतंत्रता के बिना जीवन क्या कोई महत्व रखता है ? सिद्धान्तहीन जीवन भी कोई जीवन होता है ? दोस्तों ! आईये , सभी प्रकार की बाधाओं , संदेह और भय से मुक्त हो जाएँ , मेजिनी के शब्दों  में मैं आपसे अनुरोध करती हूँ , "आये , हम उन लोगों से तर्क करना छोड़  दें जो हमारी बात को अच्छी तरह समझते हैं , लेकिन उस पर ध्यान नहीं देते हैं , यदी हमारे देश्वाशी अपमानित होते हैं तो हमारे लिए और भी जरुरी हो जाता है कि हम सभी प्रकार के खतरे उठ कर उनकी स्थिती सुधारें | "भारतीयों , आत्मसम्मान का परिचय दो और काम करना शुरू कर दो |
     अब सभाएं आजोजित करने और प्रस्ताव पास करने के दिन बीत चुके | मौन रह कर ठोस काम करो| मुट्ठी भर विदेशियों  , थोड़े से अंग्रेजों ने हमारे विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया है | यदी हम उनकी चुनौती को स्वीकार करके उनके विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दें तो इसमें आश्चर्य की क्या बात होगी ? स्वाधीनता की कीमत चुकानी ही पड़ती  है | कौन सा देश जिसने बिना कीमत चुकाए स्वतन्त्रता प्राप्त की है ? ...."







       मैडम   कामा   की  मुखकृति, आज   भी   दिल्ली    में,  संसद भवन  के    संग्रहालय    में    है, जिसमें    उन्हें   यह   झंडा     हाथ   में    लिये   हुए   दिखाया   गया   है। इस    प्रकार, इस   झंडे    को    ब्रिटिश   काल    में    लाने   का    श्रेय, गुजरात    के    एक    बहादुर   समाजवादी    नेता   श्री   इंदुलाल   याग्निक    को   है।


अंतिम सांस तक.........1914 में प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जब फ्रांस और ब्रिटेन के बीच संधि हुई तो पेरिस इंडियन सोसायटी के लगभग सभी सदस्यों ने पेरिस छोड दिया, लेकिन भीकाजी ने विपरीत स्थितियों में भी वहीं रह कर देश की आजादी के लिए संघर्ष करना मंजूर किया। जब पंजाब रेजिमेंट की टुकडी ब्रिटेन और उसके मित्र देशों की तरफ से लडाई करने के लिए फ्रांस की धरती पर पहुंची तो भीकाजी ने उसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया और उसी दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 1935 तक वह यूरोप में नजरबंद रहीं। इसी बीच वहीं उन्हें पक्षाघात का दौरा पडा और उनके वकील सर कावासाजी जहांगीर के काफी प्रयासों के बाद उन्हें घर वापस जाने की अनुमति मिल गई और वह मुंबई लौट आई। अपने देश की आजादी के लिए अंतिम सांस तक लडने वाली इस महान शख्सीयत का 13 अगस्त 1936 को, 74 वर्ष की आयु में मुंबई के पारसी जनरल हॉस्पिटल में स्वर्गवास हो गया।