रविवार, 3 अक्तूबर 2010

अयोध्या फैसला ; कांग्रेस की चिंगारी, मुलायम कठोर



कांग्रेस की साम्प्रदायिकता उजागर की चिदंम्बरम  ने ...
- अरविन्द सीसोदिया 
 जब देश में एक येसा फैसला आया  , जो सबसे ज्यादा संवेदनशील हो, तब मनमुटाव और आपसी संघर्ष की याद दिलाने क्या जरुरत आ पढ़ी थी ...? इस बात को कहने की आवश्यकता नहीं होते हुए भी क्यों कहा गया..? सारा मीडिया और देश के लोग शांती के प्रयत्न में लगे थे और आप शांत, ठहरे हुए  पानी में ककड फेंक रहे थे..! आपको देश का गृहमंत्री होने का हक़ नहीं है ...! आपका दिमाग साम्प्रदायिकता से भरा पडा है...! चिदम्बरम साहव भारत को साम्प्रदायिकता क्या होती है यह आपसे  समझने की जरुरत नहीं है.., इस देश के पुरखों  ने इसे भुगता है, आप जिन्हें मुसलमान कह रहे हैं इनमें से ज्यादातर हिन्दू पुरखों  की ही संतानें हैं , सबको मालूम है की पूरी दुनिया में जबरिया मुसलमान किस तरह से बनाये गए थे.., यूरोप को भी क्रुसेड याद हैं और हमें भी हमारे विध्वंश याद हैं ..., जब देश की एक बड़ी समस्या सुलझ रही हो तो उसे सुलझाना ही सरकार का दायित्व  होता है, उसमें रोड़े डालना और उसे उलझाना , सुलझन में रोड़े  खड़े करने का प्रयत्न करना ही मूलतः साम्प्रदायिकता है जिसे आप कर रहे हैं..., यही वह समय जब इस मामले को अंतिम रूप से हल करवा कर समाप्त करवा दिया जाये...!   
कांग्रेस की राजनैतिक चाल....
  ३० सितम्बर २०१० को श्रीरामजन्म भूमी के महत्वपूर्ण मामले का निर्णय  आया ही था , सभी और कम ज्यादा  इस की प्रशंसा हो रही थी , इलाहवाद उच्च  न्यायालय क़ी लखनऊ खंड  पीठ ने एतिहासिक निर्णय ही नहीं दिया था बल्की सदभाव पूर्ण रास्ता भी निकाल दिया था..! जिससे हिन्दू हक़ को ही नुकसान हुआ मगर सब दूर एक अच्छा रास्ता माना जा रहा था..!
मगर पिछले साथ साल से हिन्दू को मुसलमान से लड़ाने का जो खेल कांग्रेस खेलती रही उसे यह नागवार  गुजरा..! उनकी सरकार के  केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने दूसरे ही दिन अपना  जहर उगलते हुए कहा  कि अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के फैसले के आधार पर 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाने की कार्रवाई को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता।
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह बात रही क़ी उन्होंने अदालत के निर्णय से ऊपर बढ़ाते हे यह भी कह दिया  कि अयोध्या के विवादित जमीन पर यथा स्थिति बनी रहेगी। चिदम्बरम ने कहा कि इस फैसले का 1992 के बाबरी मस्जिद विध्वंस से कुछ लेना-देना नहीं है। लिब्रहान आयोग के मुताबिक वह पूरी तरह अस्वीकार्य था। यह फैसला किसी भी रूप में बाबरी मस्जिद के विध्वंस को न्यायोचित नहीं ठहराता। वह आज भी एक आपराधिक मामला है। उन्होंने कहा कि जब तक सर्वोच्च न्यायालय में मामला नहीं आ जाता तब तक हमें इंतजार करना पड़ेगा। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुना दिया है लेकिन अभी यह प्रभावी नहीं है। यह मूलतः कांग्रेस की राजनैतिक चाल थी जिसे उसने दूसरे दिन ही चल दिया ....!
मुलायम का पलट वार...
अयोध्या पर हाईकोर्ट का फैसला आने के अगले ही दिन नेताओं ने अपना असली चेहरा दिखाना शुरू कर दिया है। गृह मंत्री चिदम्बरम के बाद ; अपने आप को मौलाना मुलायम सिंह यादव कहलाना पशन्द करने वाले कैसे चुप रह जाते..,  मुस्लिम वोट बैंक को अपनी खैरात समझने वाले यादव ने भी फैसले पर प्रश्न खड़े कर ; कांग्रेस की चिंगारी  में अपना बम फिट कर दिया...!!
  अयोध्या विवाद पर हाईकोर्ट के फैसले को लेकर सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव की टिप्पणी मुसलमानों और विशेष रूप से मुस्लिम धर्मगुरुओं को नागवार गुजरी है। अधिकांश मुस्लिम उलमा का कहना है कि इस संवेदनशील मुद्दे पर किसी को भी ऐसी बयानबाजी नहीं करनी चाहिए जो राजनीति से प्रेरित हो और जिससे माहौल बिगड़ने की आशंका हो। आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्य और लखनऊ ईदगाह के नायब इमाम मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने कहा कि पूरे मुल्क में दोनों समुदायों के धार्मिक नेताओं, राजनेताओं व मीडिया ने इस संवेदनशील मुद्दे पर संयम का परिचय दिया है। यही हालात आगे भी रहने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि संघ परिवार से लेकर सभी ने अब तक परिपक्वता का परिचय दिया है और यह संयमपूर्ण व्यवहार आगे भी बना रहना चाहिए। ऐसी बयानबाजी न हो जिससे फिरकापरस्त ताकतों को हरकत में आने का मौका मिले।
       बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह का कहना है कि अब भी केंद्र सरकार के पास इस मसले को लेकर वक्त है।  सिंह ने कहा है कि अयोध्या मामला सुप्रीम कोर्ट में जाने से पहले केंद्र को सभी पक्षों को बुलाकर सुलह की कोशिश करनी चाहिए।
स्वागत योग्य कदम ... 
अयोध्या विवाद पर फैसला आ जाने के बाद शिया समुदाय के युवकों से जुड़े एक संगठन ने राम मंदिर के निर्माण के लिए 15 लाख रुपये के मदद की पेशकश की है। इस संगठन का नाम 'शिया हुसैनी टाइगर्स' है। संगठन के प्रमुख शमील शम्सी ने ""हम सुन्नी सेट्रल वक्फ बोर्ड से औपचारिक आग्रह करेंगे कि वह इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील न करे और इस विवाद को हमेशा के लिए खत्म कर दिया जाए।""  शम्सी ने कहा है कि जामा मस्जिद के शाही इमाम मौलाना अहमद बुखारी और समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव जैसे लोगों की ओर से फैसले की आलोचना  करना दुर्भाग्यपूर्ण है।
मत उलझाओ पीढ़ियों को , 
हम ही कुछ अच्छा कर जाएँ ! 
- देश के एक अग्रणी मुस्लिम संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने लोगों से आग्रह किया है कि अयोध्या विवाद एक संवेदनशील मुद्दा है और अदालत द्वारा दिए गए फैसले पर जल्दबाजी में कोई निष्कर्ष न निकालें।राज्यसभा सदस्य और जमीयत के नेता मौलाना मोहम्मद मदनी ने कहा, "कुरान के मुताबिक हमें नकारात्मक चीजों से सकारात्मक चीजें निकालने की कोशिश करनी चाहिए।" अयोध्या विवाद पर अपनी व्यक्तिगत राय देने से बचते हुए मदनी ने कहा, "पहले अदालत के फैसले को समझने की जरुरत है।
कानून मत  बघारो , 
देश को अपना मसाला हल करने दो 
- अयोध्या की विवादित भूमि को लेकर आए इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर कानून के जानकारों की राय बंटी हुई है। कुछ का मानना है कि ये फैसला समझौते की तरह लग रहा है तो कुछ मानते हैं कि जजों के पास इससे बेहतर कोई और रास्ता नहीं था। 8189 पन्नों के फैसले में तथ्यों को बड़ी बारीकी से रखा गया है। लेकिन इन बारीकियों से जो जवाब मिल रहे हैं उनसे कई सवाल भी खड़े हो रहे हैं। कुछ जानकारों का मानना है कि ये फैसला कानूनी पैमाने पर कम और राजनीतिक पैमाने पर ज्यादा खरा उतर रहा है। अयोध्या के फैसले को तीन जजों ने अलग-अलग लिखा है।

फैसले के चार बिंदुओं पर सबसे ज्यादा चर्चा की जा रही है। जब वक्फ बोर्ड का दावा खारिज कर दिया गया तो फिर उन्हें एक-तिहाई ज़मीन क्यों दी गई। जब जजों ने उस जगह को मस्जिद माना है तो फिर वक्फ बोर्ड का दावा कैसे खारिज हुआ। कोर्ट ने ये कैसे तय किया कि वही जगह भगवान राम का जन्म स्थान है। आस्था के मामले को कानूनी जामा क्यों पहनाया गया। दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस राजेंद्र सच्चर ( कांग्रेस के बहुत निकट हैं ) कहते हैं कि आखिर कोर्ट ने कैसे तय कर लिया कि राम का जन्म उस जगह हुआ। केवल आस्था के आधार पर तो फैसला नहीं होता। ठोस सबूत होने चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के वकील पी पी राव कहते हैं कि ये टाइटल शूट था लेकिन इसे पार्टीशन शूट बना दिया गया है। किसी की पुश्तैनी जायदाद होती और बेटों में बंटनी होती तो बांटा जा सकता था लेकिन टाइटल शूट में तो किसी एक पक्ष को ही पूरी भूमी मिलनी चाहिए थी। हालांकि कुछ जानकार इस फैसले को सही भी मान रहे हैं। पूर्व एडीशनल सॉलिसिटर जनरल अमरेंद्र शरण कहते हैं कि टाइटल शूट पजेशन के आधार पर तय होता है। सभी जज मान रहे हैं कि वहां हिंदू-मुस्लिम दोनों पूजा करते थे तो दोनों पक्षों को मिल गया।
बाबरी विध्वंस के लिए; ताला खोलना  जिम्मेदार
अयोध्या विवाद में ऐतिहासिक फैसला देने वाली इलाहाबाद हाईकोर्ट के तीन सदस्यीय बेंच के जज जस्टिस एसयू खान ने बाबरी विध्वंस के लिए 1986 में ताला खोलने के फैसले को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने मालिकाना हक के फैसले में इसका उल्लेख भी किया है। जस्टिस खान ने अपने फैसले में लिखा है कि 1986 की घटना ने इस विवाद की तरफ पूरे देश का ध्यान आकृष्ट करा दिया। इसके बाद प्रतिक्रियाओं का सिलसिला शुरू हुआ, जिसकी पराकाष्ठा 1992 में मस्जिद के विध्वंस के रूप में हुई। ताला खोलने का आदेश देने वाले फैजाबाद के सेशन जज ने जिस तरह प्रक्रिया की अनदेखी की और अनावश्यक जल्दबाजी दिखाई, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता?
 हिंदू- मुस्लिमों को भाईचारे की याद दिलाई 
जस्टिस खान ने अपने फैसले में हिंदू-मुस्लिमों को त्याग और भाईचारे की उच्च परंपराओं की याद भी दिलाई। उन्होंने कहा कि जहां त्याग का गुण राम के चरित्र का प्रतीक है, वहीं दुनिया यह भी जानना चाहती है कि दूसरों के साथ रिश्तों के संबंध में इस्लाम के वास्तविक उसूल क्या हैं।
निष्कर्ष 
कानून का यह मसला है भी नहीं .., यह मसला शुद्ध रूप से एतिहासिक गलती को सुधारने का है , अब एक अदालती फैसला यह कह  रहा है क़ी यह स्थान  श्रीराम की जन्मभूमी है ..! अच्छा यह है की करोड़ों हिन्दुओं और मुसलमानों को लड़ाने का खेल बंद हो और मंदिर निर्माण करवा कर मामला शांत किया जाये...!! इतिहास जहाँ मंदिर के पक्ष में खड़ा है तब भी जानबूझ कर लोगों को लड़वाना ठीक नहीं ...!!  केंद्र सरकार क़ी ढीली और कूटनीतिक प्रतिक्रिया ठीक नहीं है , उसे आगे आकर यह मसला उतनी ही गंभीरता से निवटाना  चाहिए जितना क़ी केंद्र सरकार शब्द का महत्व है...!!