बुधवार, 13 अक्तूबर 2010

अमरीकी भ्रम जाल में नहीं फंसना चाहिए...!!

- अरविन्द सीसोदिया
      अमरीका ; चीन के साथ पाकिस्तान के गहरे से भी गहरे संम्बध होने पर भी , लगातार उसकी मदद में कोई कमी नहीं रखता है , बल्की कुछ ज्यादा ही दे रहा है, इसका एक ही अर्थ है कि अमरीकी नीति के अनुसार आज भी पाकिस्तान आंग्ल- अमरीकी सैन्य गुट का सदस्य है और वह इस गुट के प्रति संवेदनशील है ! जबकि सच यह है कि जिस तरह से चीन की बातों में जवाहरलाल नेहरु ने फँस कर देश का सत्यानाश कर दिया, वही पाकिस्तान का होने वाला है ...! चीन की दोस्ती और दुश्मनी ; दोनों ही फायदे के , लाभ के दृष्टिकोण पर आधारित होती है.., जो भी है .., भारत को नुक्सान ही नुक्सान है ..!!
     आज का मुख्य सवाल यह है कि ; भारत को अमरीका से पूछना चाहिए कि ' उसका भारत के प्रति दृष्टिकोण की सच्चाई क्या है ?' और  यह पूछना चाहिए कि ' क्या वह आंग्ल- अमरीकी सैन्य गुट और गुटनिरपेक्षता के प्रति १९६२ - ६३ के दृष्टिकोण पर कायम है ? ' क्यों कि इस प्रश्न के उत्तर में ही भारत के प्रति अमरीका  की सच्चाई व उसका  दृष्टिकोण का सच निर्भर करता है...!!!
१९६२-६३ कि अमरीकी कहानीं ...
   यह सभी को विदित ही है कि १९६२ में भारत पर चीन का हमला हुआ था , भारत बुरी तरह से हारा था...! पहलीवार देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने देश की सुरक्षा के विषय में सोचा था...! उन्होंने अत्यंत गुप्त रूप से तब अमरीका को दो पत्र लिखकर सैन्य मदद का अनुरोध किया था ...|  उन्होंने १२ स्क्वाड्रन सुपरसोनिक फाईटरों   और बी-४७ बमवर्षकों की २ स्क्वाड्रन  की मांग देश की सुरक्षा जरूरतों के कारण मांगे थे |
     पूर्व रक्षामंत्री जसवंतसिंह और पूर्व उपप्रधान मंत्री लालकृष्ण अडवाणी  जी क़ी पुस्तकों में तब के अमरीका शासन के द्वारा दिए उत्तर के कुछ अंश छपे हैं...!!  अपने काम के दो अंश  इस प्रकार से हैं....
  १- "...अमरीका भारत को अधितम सैन्य  मदद इसलिए नहीं दे पायेगा ; क्योंकि भारत की अधिकांश  सेना पाकिस्तान के खिलाफ एक ऐसे मसले पर  तैनात है , जिसमें जानता के आत्मनिर्णय से सीधे जुड़े  अमरीकी हित के कारण सन १९५४ से ही हमें पाकिस्तान के दावों के प्रती सहानुभूति पूर्ण रुख अपनाना पड़ा है |"
 अर्थात यह अंश  स्पष्ट कह रहा है समस्या कश्मीर में नहीं अमरीका में है.. उसके पेट में दर्द होने से यह मामला लगातार उलझा रहा और  आज तक नासूर बना हुआ है !
२- "... प्रधानमंत्री की ओर से प्राप्त नवीनतम सन्देश का अर्थ भारत और अमरीका के बीच सैनिक गठबंधन ही नहीं , बल्कि  लडाई में ( भारत की ओर से ) शामिल होने के लिए हमारी ओर से पूर्ण प्रतिबद्धता भी है | हम समझते हैं हताशा की स्थिति में किसी भी सरकार की यही प्रतिक्रिया हो सकती है, लेकिन यह ऐसा प्रस्ताव है , जो भारत के गुटनिरपेक्ष नीति से मेल नहीं | अगर नेहरु के मन में यही बात है तो हमें अपने निर्णय पर विचार करने से पहले उन्हें इस  ( गुट निरपेक्षता के   ) बारे में पूरी तरह स्पष्ट  होना चाहिए |"
   अर्थात उसे हमारी गुट निरपेक्ष नीति पशन्द नहीं है .., जब तक हम इस नीति पर हैं तब तक वह हमारी सैन्य मदद नहीं कर सकता...!
 ( यह वृत्तांत तब के अमरीका के राष्ट्रपति को जान ऍफ़ कैनेडी को नेहरु जी द्वारा लिखे पत्रों के जबाव में; उनके विदेश मंत्री डीन रस्क की और से  , भारत में अमरीका के नियुक्त राजदूत जान के गैलब्रेथ के पास भेजे  तार के अंश के रूप में सामने आये थे...!)
       इसके अतिरिक्त जब भारत - पाकिस्तान युद्ध १९७१ में चल रहा था तब पाकिस्तान की मदद के लिए अमरीकी बेडा भारत
से युद्ध करने आने वाला था ...!
      अमरीका यह अच्छी तरह से जानता है कि  पाकिस्तान उसकी मदद का इस्तेमाल भारत के विरुद्ध आतंकवादी गतिविधियों में कर रहा है तब भी मदद जारी रहने का मतलव यही है की अमरीका की भी नियत भारत के विरुद्ध अभी भी ठीक नहीं है !अमरीका यह अच्छी तरह से जानता है क़ी भविष्य का तीसरा विश्व युद्ध चीन  - अमरीका में संभव है तव भी उसका पाकिस्तान प्रेम कई तरह की आशंकाएं  उत्पन्न किये हुए है...!
अमरीका से दो टूक बात हो...
   इस समय भारत क़ी मनमोहन सिंह सरकार अमरीका के प्रति गजब  क़ी श्रद्धावान  है.., इस समय इस देश में उनके कहने से ही सूरज उग  रहा है , मगर उसी समय में जब कश्मीर में पत्थर अभियान होता है तब पाकिस्तान को भारी  आर्थिक मदद अमरीका के द्वारा दी जाती है..., कुल मिला कर भारत को दो टूक बात अमरीका से करनीं चाहिए..., कि उसका  भारत के प्रति क्या नीति  है....? १९६२-६३ की नीति में बदलाव नहीं है तो भारत को अमरीकी भ्रम जाल में नहीं फंसना चाहिए...!! 

एलियंस,हिन्दू अवधारणा के रास्ते पर ; पाश्चात्य वैज्ञानिक

मानव से उच्च चेतन सभ्यता के संकेत
हिन्दुओं ने अनादीकाल से इसे महसूस किया है ..!   
- अरविन्द सीसोदिया  
    हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ ने सम्पूर्ण ब्रह्मांड में पृथ्वी के अलावा; कहीं मौजूद मानव (एलियंस) से बातचीत के लिए एक राजदूत नियुक्ती का फैसला  लिया है! इसका सीधा सीधा अर्थ है कि अखिल अन्तरिक्ष में कोई इस तरह के संकेत हैं कि मानव या उससे उच्च  जीवसत्ता मौजूद है !  
  विश्व में यूं तो पुरानी मानी जानें वाली सभी सभ्यताओं नें कम ज्यादा संकेत इस बात के दिए हैं कि पृथ्वी के अतिरिक्त  भी मानव सभ्यताएं  है...! वे हमसे बहुत अधिक शक्ती एव बुद्धी में संम्पन्न हैं..!! पश्चिम जो नई सोच  ने जन्म लिया वह बहुत ही कम बुद्धी वाली थी सो , उनने बहुत से गपोडे हांकें ..! जब तब उनका खंडन  हुआ तो उनको दंडित किया गया...! मगर सच के आगे हर कर ; आधुनिक विज्ञान को ईसाई समुदाय को भी स्वीकार करना पड़ा..! जैसे - जैसे विज्ञान आगे बड़ रहा है.., वे बातें जिन्हें वे हिन्दुओं के मिथक कहते थे.., उन पर ही आ रहे हैं..! हिन्दुओं की तीन बातें बड़ी महत्व पूर्ण हैं..! 
१- मानव सभ्यता से भी उच्च सभ्यताएं हैं...! उन्हें देव आदि और ईश्वर कहते हुए मान्यता दी गई है ! और इनका निवास भी अनकों लोकों में है ! उनमें क्षमतावान व्यक्तीयों का आवागमन होता रहता है...! आवागमन के साधन भी हैं, नारद जी का सभी लोकों में पहुचते रहने की तमाम घटनाएँ पढने को मिलती हैं ..! 
२- पृथ्वी या अन्य ब्रह्मांड के असंख्य ग्रहों पिंडों  की आयु करोड़ों ही नही अरबों वर्षों से भी ज्यादा है...! जबकी ईसाइयत मात्र ६००० वर्ष पूर्व का ही समय निर्धारण करता  था..! हिदुओं के लगभग सभी मान्यता प्राप्त धार्मिक ग्रंथो में सृष्ट रचना और मानव से उच्च चेतन सभ्यता कि बातें आई हैं ..! 
३- यह जो हमारी आत्मा है वह स्थूलशरीर  रूप में शरीर के रूप में हमारे सामने मौजूद है, जिसे हम देख सकते हैं जो हमसे बातचीत व्यवहार करता है, किन्तु  इसके सूक्ष्म शरीर भी हैं..! जो हम  नहीं देख सकते...!!  वैसे भी वही चीज आप देख सकते हैं जिससे प्रकाश परावर्तित हो सकता है, लौट कर आ सकता है ..! जिस चीज से प्रकाश पार हो जाता है वह हमें नहीं दिखती !
     ये वे  बातें हैं जिन पर भारतीय ज्ञान ज्यादा सही साबित हो रहा है.., क्यों कि वह बहुत गहरा है.., इसे सगी ढंग से समझने और जानने में जो चक्कर है वह वस इतना है की इस सभ्यता ने लगातार ३०००से ४००० वर्ष तक जंगली और बेहूदा आक्रमण कारियों से लोहा लिया है.., इश्लाम के हमलावरों ने तो इतने पुस्तकालय जलाये की उनकी आग वर्षों तक ठंडी नहीं हुई.., वे यह नहीं जानते थे की कितनी महत्व पूर्ण परिश्रम को नादानी में फूंक रहे हैं..!  
     कई वैज्ञानिक मानते हैं कि एलियंस का वजूद है और वो आज नहीं तो कल धरती पर आएंगे। जब वो आएंगे तो उनसे मलेशिया की वैज्ञानिक मजलान ओथमान बात करेंगी, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें धरती का एलियंस एंबेसडर चुना है।
      58 साल की एस्ट्रोफिजिशिस्ट ओथमान संयुक्त राष्ट्र के सहयोगी संगठन; यूनाइटेड नेशंस ऑफिस फॉर ऑउटर स्पेस अफेयर्स की प्रमुख हैं। उनका कहना है कि दुनिया भर के वैज्ञानिक और संस्थान दूसरी दुनिया के लोगों की तलाश में जुटे हैं और उम्मीद है कि एक दिन ऐसा होगा जब हमें दूसरी दुनिया से कोई संकेत मिलेगा। जब ऐसा होगा, उस दिन के लिए हमें अपनी तैयारी करके रखनी होगी। ओथमान इससे पहले मलेशिया के नेशनल स्पेस एजेंसी की मुखिया थी और अंतरिक्ष में जाने वाली मलेशिया की पहली महिला हैं। दुनिया के कई वैज्ञानिक एलियंस के होने और उनके धरती तक पहुंचने की कल्पना कर चुके हैं।  
      इस दौर के सबसे बड़े वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग भी मानते हैं कि एलियंस हैं और धरती पर आ सकते हैं। हॉकिंग का कहना है कि मेरे दिमाग की गणनाएं बताती हैं कि एलियंस हैं लेकिन असल चुनौती ये जानने की है कि एलियंस दिखते कैसे हैं। जहां तक मेरा मानना है कि अगर कभी एलियंस धरती पर आए तो उनका बर्ताव इतना दोस्ताना नहीं होगा जितनी कि उम्मीद है। हॉकिंग का कहना है कि ज्यादातर एलियंस या तो माइक्रोब्स की तरह या फिर बेहद छोटे जानवरों जैसे हो सकते हैं। हॉकिंग ये चेतावनी देते हैं कि धरती के वैज्ञानिकों को दिमागदार एलियंस से संपर्क करने से बचना होगा क्योंकि वो धरती को नुकसान पहुंचा सकते हैं। कई सालों की रिसर्च और पड़ताल के बाद वैज्ञानिक ये तो मानते हैं कि एलियंस हो सकते हैं लेकिन पुख्ता तौर पर उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं है।
Now, Othman is the director of the UN’s Office for Outer Space Affairs (UNOOSA); a branch of the General Assembly, established in 1962. The office is responsible for promoting international co-operation and peace in dealing with outer space, and includes topics such as satellite navigation and space debris.



   If approved, her latest role would place her as the go-to contact in the event of aliens making contact with earth. She’s got to pitch her new job title at a scientific conference at the Royal Society’s Kavli conference centre in Buckinghamshire next week, then if the idea is backed by the UN scientific advisory committees, it’ll be passed to General Assembly.
   Othman recently gave a talk to fellow scientists, where she said that the continued search sustains the hope that “some day humankind will receive signals from extraterrestrials. When we do, we should have in place a coordinated response that takes into account all the sensitivities related to the subject”.
      Stephen Hawking suggested earlier this year that aliens almost certainly exist, but cautioned humanity against making contact. He warned that extraterrestrial nomads could be “looking to conquer and colonise whatever planets they can reach.”

- कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि एलियंस इंसानों के मुकाबले ज्यादा बुद्धिमान हैं और तकनीकी तौर पर बेहद ताकतवर भी हैं। स्पेन और अमेरिका के कुछ वैज्ञानिकों का दावा है कि एलियंस अपनी ताकतवर दूरवीनों  से पृथ्वी पर नजर रख रहे हैं। उन्हें पृथ्वी के घूमने की गति, दिन की लंबाई, मौसम चक्र, महासागरों, महाद्वीपों और बादलों की जानकारी है। तमाम रिसर्च और अध्ययन के बाद भी दुनिया भर के वैज्ञानिक ये तक नहीं पता लगा पाए कि ब्रह्मांड में पृथ्वी के अलावा कहीं और जीवन है या नहीं। एलियंस का वजूद साबित करने के लिए अब तक हजारों दावे किए जा चुके हैं, लेकिन सच सही है कि आज तक एलियन तो दूर, कोई यूएफओ तक किसी के हाथ नहीं लगा है।
- कुछ वैज्ञानिक को कहना है कि एलियंस हमसे संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन संपर्क नहीं हो पा रहा है। एलियंस धरती पर इंसान से संपर्क स्थापित करने के लिए दशकों से 'कॉस्मिक ट्वीट्स' भेज रहे हैं। 15 अगस्त 1977 को ओहियो स्थित एक दूरबीन ने 72 सेकंड का एक महत्वपूर्ण संकेत पकड़ा था। ये संकेत अंतरिक्ष के एक खाली हिस्से से ठीक उसी फ्रीक्वेंसी पर आया था जिस पर वैज्ञानिक एलियंस से संदेश मिलने की उम्मीद कर रहे थे। लेकिन आज तक इस संकेत का मतलब नहीं निकाला जा सका।
- अज्ञात उड़ान वस्तु (सामान्यतः संक्षिप्त रूप में यूएफओ या यू.एफ.ओ. ) किसी भी आकाशीय अद्भुत वस्तु के लिए लोकप्रिय शब्द है जिसकी पहचान पर्यवेक्षक आसानी से या तुरंत नहीं कर पाता है. संयुक्त राज्य वायु सेना, जिसने 1952 में यह शब्द ढूंढा, ने शुरुआत में यूएफओ को ऐसी चीज़ के रूप में परिभाषित किया जो विशेषज्ञ जांचकर्त्ताओं  की जांच के बाद भी अज्ञात रहती है, हालांकि आज बोलचाल की भाषा में यूएफओ शब्द का प्रयोग किसी अज्ञात नज़ारे के लिए भी किया जाता है, यह परवाह किये बगैर कि उसकी जांच हुई भी है या नहीं. 24 जून 1947 को पहली बार निजी पायलट केनेथ अर्नाल्ड द्वारा अमेरिका में दिखे नज़ारे की रिपोर्ट के बाद ही अचानक यूएफओ रिपोर्ट में सीधी बढ़ोत्तरी हो गयी, जिसने