बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

2 जी : अंडरवल्र्ड डॉन दाउद इब्राहिम



 
- अरविन्द सिसोदिया 
अब जांच जे पी सी के पास जानें वाली है और उसे सबसे पहले यह यह जांच करनी चाहिए की २ जी स्पेक्ट्र घोटाले का संबंध अंडरवल्र्ड डॉन दाउद इब्राहिम की 'डी' कंपनी से क्या है ....?देश की आंतरिक व्यवस्था में गहरा असर अंडरवल्र्ड का है , ख़ास कर मुम्बई और फिल्म जगत पर ....!!!! मगर यह हाथ देश की संसद के अन्दर और केंद्र की सरकार में भी पहुच गए तो यह गंभीर चिंता का विषय होगी ..!! सबसे पहले इसी विषय पर जांच होनी चाहिए ..!! गाथा बंधन सरकार की मजबूरी  अंडरवल्र्ड डॉन दाउद इब्राहिम की 'डी' कंपनी  का गुलाम देश को बनती है तो इसा तरह की गठबंधन सरकार नहीं चाहिए...!! 
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राजस्थान पत्रिका का आलेख ....
' डी ' कंपनी का खेल
http://www.rajasthanpatrika.com/news/INDIA/2132011/india%20news/121290मुम्बई।
2जी स्पेक्ट्रम घोटाला सिर्फ पैसे की लूट न होकर अब देश की सुरक्षा से जुड़ गया है। सीबीआई द्वारा हिरासत में लिए गए स्वान टेलीकॉम के डायरेक्टर शाहिद बलवा से मिले दस्तावेजों में कुछ अहम सुबूत मिले हैं, जो इस घोटाले में अंडरवल्र्ड डॉन दाउद इब्राहिम की 'डी' कंपनी के शामिल होने के संकेत दे रहे हैं।  इस खुलासे ने सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं। सीबीआई सूत्रों के मुताबिक, बलवा और 'डी' कंपनी का खासा कनेक्शन है। बलवा अंडरवल्र्ड का पैसा हिंदुस्तान के शेयर बाजार में लगाता है।

22 हजार करोड़ का चूना लगाया देश को
इतना ही नहीं, बलवा ने दिल्ली की एक नामी रियल एस्टेट कंपनी के साथ देश को 22 हजार करोड़ से भी ज्यादा का चूना लगाया है। ये खुलासा सीबीआई ने अपनी 6 पेजों वाली एफआईआर में किया है। सूत्र बताते हैं कि सीबीआई के पास इस पूरे खेल के सूत्रधार का भी नाम है, मगर इसका खुलासा अभी नहीं करेगी।
बलवा-दाउद कनेक्शन
सूत्रों ने बताया कि सीबीआई को टेलीकॉम घोटाले से जुड़े लोगों की छापेमारी के दौरान बलवा के खिलाफ अहम सबूत हाथ लगे हैं। इन दस्तावेजों में बलवा की कंपनी स्वान टेलीकॉम और यूएई की एतिसलात कंपनी के बीच समझौते का जिक्र है। एतिसलात कंपनी को बलवा ने अपनी कंपनी स्वान टेलीकॉम में 45 फीसदी हिस्सेदारी बेची।
 एतिसलात का अच्छा खासा स्टेक पाकिस्तान टेलीकॉम कॉर्पाेरेशन लि. में है, जो वर्तमान में आईएसआई की निगरानी में है। हिस्सेदारी बेचने का बलवा का एक ही मकसद था। वह दुबई में बैठे उन लोगों को पैसे पहुंचाना चाहता था, जिनका पैसा पिछले कई सालों से वो अपने रियलिटी के धंधे में लगा रहा था।
राजा का खासमखास
इस एफआईआर में कहा गया है कि बलवा पूर्व दूरसंचार मंत्री और 2जी घोटाले के मुख्य आरोपी ए. राजा का सबसे खासमखास था। वह न केवल राजा के पैसों को देश और विदेश में इनवेस्ट करता था, बल्कि जिस समय वो टू जी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस को हासिल करने की जुगत में था। उस वक्त विदेश में बैठे संदिग्ध शख्स ने उसे पैसे भी उपलब्ध कराए थे।
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राष्ट्रीय सुरक्षा के पहलू भी खंगालें: 
सीबीआई से जज ने कहा कि जांच एजेंसी को याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए मसलों पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘यह पता लगाना आपका (सीबीआई) काम है कि 2जी घोटाले से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे का कोई पहलू तो नहीं जुड़ा है।’ मामले में अगली सुनवाई 8 मार्च को होगी।

याचिका में खतरे का अंदेशा:
स्वामी ने अपनी याचिका में बताया है, ‘2जी लाइसेंस हासिल करने वाली स्वान टेलीकॉम और यूनीटेक वायरलेस ने अपनी हिस्सेदारी विदेशी कंपनियों इत्तिस्लात और टेलीनोर को बेची है। इन दोनों कंपनियों का संपर्क पाकिस्तान से भी हैं। इनको लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताएं जताई थीं।’

कौन है शहीद बलवा 
(बी बी सी हिंदी से विनीत खरे की रिपोर्ट ...)
http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2011/02/110209_balwa_profile_skj.श्त्म्ल
 देश की प्रमुख रियल इस्टेट कंपनी डीबी रिऐल्टी के मैनेजिंग डॉयरेक्टर शाहिद उस्मान बलवा को दो दिनों के ट्रांज़िट रिमांड पर जाँच एजेंसी सीबीआई को दे दिया गया है.
उन्हें सीबीआई दिल्ली ले आई है जहाँ उनसे 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले के बारे में पूछताछ की जाएगी.
बलवा की कंपनी डीबी रिऐल्टी ने स्वान टेलीकॉम नाम की कंपनी शुरू की थी जिसने 13 सर्कल्स के स्पेक्ट्रम के लिए 1537 करोड़ रुपए सरकार को दिए, लेकिन कुछ ही समय में कंपनी के 45 प्रतिशत शेयर संयुक्त अरब अमीरात की कंपनी एटियालसेट को 4500 करोड़ रुपए में बेच दिए.
आरोप है कि इस घोटाले से सरकार को करोड़ों की चपत लगी और कथित तौर पर ये सब पूर्व टेलीकॉम मंत्री ए राजा की मदद से हुआ. कंपनी का नाम एटियालसेट डीबी टेलीकॉम प्राईवेट लिमिटेड रख दिया गया.
बलवा की गिरफ़्तारी की खबर से मुंबई में रियल एस्टेट कंपनियाँ सकते में हैं.
डीबी रिऐल्टी देश की तीसरी सबसे बड़ी रिएल इस्टेट कंपनी है. कंपनी की वेबसाईट के मुताबिक उसके पास मुंबई और पुणे में 30 बड़े प्रोजेक्ट हैं जो पूरे होने के विभिन्न चरणों में हैं. वेबसाईट के मुताबिक कंपनी की बाज़ार में कीमत 2.2 अरब अमरीकी डॉलर की है.
गिरफ़्तारी की ख़बर आने के बाद कंपनी के शेयरों के दाम रिकॉर्ड तेज़ी से गिरे हैं.
ज़बर्दस्त प्रगति
शाहिद बलवा के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने कॉलेज में ही पढ़ाई छोड़ दी. उनका परिवार रेस्तराँ कारोबार से जुड़ा है और वो गुजरात से मुंबई आए. मुंबई के मरीन लाइंस में उत्तर भारतीय और चाइनीज़ खाने के लिए मशहूर बलवाज़ रेस्तराँ उन्हीं का है.
कहा जाता है कि उनके दादा, परदादा का कारोबार था हिंदुस्तानी नवाबों के लिए मध्य पूर्व से अच्छे नस्ल के घोड़े मंगवाना.
महाराष्ट्र जैसे राज्य में जहाँ राजनीति और बिल्डर्स के बीच घनिष्ठ संबंध हैं, जहाँ कई राजनीतिज्ञ बिल्डर हैं.
डीबी रिएल्टी पर आरोप लगते रहे हैं कि इसमें महाराष्ट्र के एक बड़े नेता का काफ़ी पैसा लगा है और ये कथित तौर पर उनके फ्रंट के तौर पर काम करती रही है, लेकिन इस बारे में कोई सुबूत सामने नहीं आए हैं. कंपनी भी ऐसे आरोपों से इंकार करती है.
शाहिद बलवा की गिरफ़्तारी के बाद कई हलकों में कहा जा रहा है कि आदर्श और लवासा के बाद निशाना फिर उसी नेता पर है.
डीबी रिएल्टी में शाहिद बलवा के अलावा दूसरा नाम विनोद गोयनका का है. माना जाता है कि राजनीति और राजनीतिज्ञों पर उनकी पकड़ अच्छी है. शाहिद और विनोद करीब 15 साल पहले साथ आए जब उन्होंने होटल ल रॉयल मेरिडियन बनाया जो अभी हिल्टन के नाम से जाना जाता है. प्रोजेक्ट के सफ़ल होने के बाद दोनो ने करीब चार साल पहले डीबी (डायनमिक्स बलवा) रिएल्टी नाम की कंपनी बनाई.
फ़ोर्ब्स पत्रिका के मुताबिक शाहिद के पास एक अरब डॉलर से ज़्यादा की संपत्ति है. कंपनी की वेबसाईट के मुताबिक पत्रिका फोर्ब्स ने विनोद गोयनका को देश का 49वाँ और शाहिद बलवा को 50वाँ अमीर व्यक्ति बताया है.
लेकिन करीब चार साल में ही इस कंपनी के देश की इतनी बड़ी कंपनी बनने पर सवाल भी उठे हैं. मुंबई में जहाँ पुरानी रिएल एस्टेट कंपनियाँ पीछे छूट गई हैं, नई कंपनियों में लोधा ग्रुप, इंडियाबुल्स और डीबी रिएल्टी का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है जिन्होंने बाज़ार को जैसे अपने हाथ में ले लिया है.
हाल ही में डीबी रिएल्टी ने सभी को उस समय अचंभे में डाल दिया जब उन्हें मुंबई के बांद्रा पूर्व में वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे के पास स्थित करीब 57-एकड़ की सरकारी कॉलोनी को दोबारा विकास करने के अधिकार मिले. मुंबई में अपनी तरह का ये सबसे बड़ी पुर्नविकास योजना थी, खासकर बांद्रा जैसे महंगे इलाके में.
शाहिद और विनोद के बारे में कहा जाता है कि उन्हें ऊँची शानो-शौकत वाली ज़िंदगी बेहद पसंद है. शाहिद अपनी सेहत का बहुत ध्यान रखते हैं. वो शादी-शुदा हैं और उनके दो बच्चे हैं.
उधर कारोबार सूत्रों के मुताबिक शाहिद बलवा की गिरफ़्तारी एक छोटी घटना है और जाँच एजेंसियों का निशाना दरअसल देश की एक बड़ी कंपनी का प्रमुख है जिसकी कंपनी का नाम भी टेलीकॉम घोटाले में लिया जा रहा है.
जब बीबीसी ने इस पूरे मामले बारे में विनोद गोयनका से बात करने की कोशिश की, तो बताया गया कि वो किसी मीटिंग में व्यस्त हैं. उधर डीबी रिएल्टी ने सभी आरोपों से इंकार किया है और कहा है कि कंपनी के काम काज पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी): कांग्रेस सरकार का मन का पाप जा नहीं रहा है ...!

- अरविन्द सिसोदिया 

जांच कब से....; के पीछे की असलियत ....
मनमोहन सिंह सरकार कभी जनता के वोट से जीते नहीं , एक बार चुनाव लड़े थे मगर जनता ने उन्हें हरा दिया सो वे अब जनता से बदला लेने का कोई अवसर नहीं चूकते ..! उनके जयादातर कारनामें इसा तरह के हैं की उन्हें देश के इतिहास में अलीबाबा और चालीस चोर की कहावत के दर्जें में दर्ज करेगा!  यह स्पष्ट है की २ जी और ३ जी और एस बैंड स्पेक्ट्रम का कार्यकाल मनमोहन सिंह का है , जांच को इसी समय से करना चाहिए था .., मगर जब तक कांग्रेस में कोई न कोई हल्का पन , टुच्चापन नहीं आये तब तक यह सरकार आगे बडती ही नहीं है ..! २०१० के साल में जो भी घोटाले सामनें आये वे सभी जे पी सी के दायरे की योग्यता रखते हैं .., कारण इन घोटालों में जो राशियाँ हैं और जो लोग सम्मिलित हैं , वे बहुत उंची पहुच वाले हैं ..! देश का धन लूटा गया है ...! मगर कांग्रेस नेत्रत्व नें महज एक राजहठ जो सोनिया जी की बालहठ थी के लिए एक पूरा सत्र  बर्वाद किया..!! अब जब उनकी हठ नहीं चली तो , समय को लेकर हेराफेरी हो रही है ...??? एन डी ए का कोई प्रभावशाली सांसद जे पी सी में न आ पाए इसलिए कभी उसे २००१ से जांच करने को कहते हैं कभी १९९८ से जांच  करने की कहते हैं ...! कांग्रेस सरकार का मन का पाप जा नहीं रहा है ...! 
सरकार 2जी मामले की जांच संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से कराने को तैयार है। इसकी औपचारिक घोषणा भी बजट सत्र के दूसरे दिन मंगलवार को हो गई । अत: अब सत्ता पक्ष और विपक्ष जेपीसी का दायरा और अध्यक्ष तय करने की कवायद में लग गए हैं। सूत्रों की मानें तो जेपीसी के दायरे में सिर्फ डी एम् के के ; ए. राजा का कार्यकाल रहे या कांग्रेस के सुखराम के जमाने से जांच हो, इस पर मशक्कत चल रही है। इस मसले पर शिवराज वी. पाटील समिति की अनुशंसा को ध्यान में रखा जाता है तो 2001 से 2010 तक स्पेक्ट्रम आवंटन प्रक्रिया से जुड़े सभी पहलुओं की जांच की जा सकती है। कांग्रेस का एक वर्ग चाहता है कि 1998 से (राजग सरकार के कार्यकाल की शुरुआत से) 2010 तक मामले की जांच जेपीसी के दायरे में होनी चाहिए। भाजपा के नेताओं का कहना है कि उन्हें इस प्रस्ताव पर आपत्ति नहीं होगी। लेकिन अगर जेपीसी का दायरा बढ़ाना ही है तो पूर्व दूरसंचार मंत्री सुखराम के कार्यकाल से अब तक (1994-2010) इसकी जांच क्यों नहीं कराई जा सकती।
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हर " जी " के साथ जुड़ा है घोटाला
- संतोष ठाकुर , भास्कर.कॉम 
http://www.bhaskar.com/article/spldb-every-g-is-associated-with-a-scam-1823726.html 
नई दिल्ली. दूरसंचार मंत्रालय और घोटाला एक ही सिक्के के दो पहलू बनते जा रहे हैं। जब भी देश में नई दूरसंचार तकनीक आई या उसका विस्तार हुआ उसके क्रियान्वयन में गड़बड़ी-घपले के आरोप लगते रहे। चाहे फिर वह सुखराम रहे हों, जिनके शासनकाल में 1-जी या लैंडलाइन की उन्नत तकनीक आई या फिर ए राजा जिनके शासनकाल में 2-जी और 3-जी तकनीक आधारित स्पेक्ट्रम का आवंटन हुआ और इस सेवा का विस्तार हुआ। सुखराम 1993 से 1996 तक केंद्र की नरसिंह राव सरकार में दूरसंचार मंत्री थे। उनके समय में देश में लैंडलाइन फोन की उन्नत तकनीक आई। इस तकनीक को उस समय 1-जी के नाम से भी जाना गया था। इसे पहली पीढ़ी की नई तकनीक करार दिया गया।

सुखराम पर आरोप था कि उन्होंने देश में टेलीफोन लाइनों का जाल बिछाने के लिए दिए जाने वाले टेंडर में गड़बड़ी की है। सुखराम को भी सीबीआई ने ही १८ अगस्त 1996 मंे गिरफ्तार किया था। वह तब सांसद थे। जिस समय उन्हें गिरफ्तार किया गया उससे करीब तीन महीने पहले तक (16 मई 1996 तक) वह दूरसंचार मंत्री थे।

सुखराम के बाद देश में मोबाइल फोन तकनीक आई। यह शुरुआती चरण में 1.6 से 1.8 जी तकनीक कहलाई, जबकि उसी दौरान इससे कुछ अधिक उन्नत तकनीक 2-जी आई। इसको लेकर कहा जाता है कि यह असल में 2.5 जी तकनीक है। क्योंकि आधी संख्या की गणना नहीं होती है इसलिए इसे 2-जी तकनीक या दूसरी पीढ़ी की तकनीक कहा गया। बतौर दूरसंचार मंत्री ए राजा को अंतत: इसी 2-जी तकनीक आधारित लाइसेंस व स्पेक्ट्रम आवंटन में धांधली व मनमर्जी के आरोप में न केवल अपना पद गंवाना पड़ा बल्कि उसी सीबीआई के हाथों गिरफ्तार भी होना पड़ा, जो उनसे पहले 1-जी आधारित तकनीक को सर्वसुलभ कराने वाले पूर्व दूरसंचार मंत्री सुखराम को गिरफ्तार कर चुकी थी।

घटनाक्रम

22 अक्टूबर 2009 सीबीआई ने केंद्रीय सतर्कता आयोग की ओर से संदर्भ हासिल होने के बाद दूरसंचार मंत्रालय के अज्ञात अधिकारियों के खिलाफ स्पेक्ट्रम आवंटन में भूमिका का मामला दर्ज किया

नवंबर 2010 पहला सप्ताह मीडिया में कैग की रपट का हवाला देते हुए खबर आई कि स्पेक्ट्रम आवंटन में गड़बड़ी की वजह से सरकार को 1 लाख 76 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।

9 नवंबर 2010 संसद का शीतकालीन सत्र शुरू। विपक्षी पार्टियों ने स्पेक्ट्रम घोटाले मंे संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की मांग शुरू की

9 नवंबर 2010 राजा ने अपनी इस्तीफा सौंपा

8 दिसंबर 2010 सीबीआई ने राजा के सरकारी निवास के साथ ही पूर्व दूरसंचार सचिव सिद्धार्थ बेहुरा और राजा के निजी सचिव रहे आरके चंदोलिया के घरों पर दबिश दी और कई कागजात जब्त किए।

15 दिसंबर 2010 सीबीआई ने कॉरपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया के दफ्तर पर दबिश दी।

24 दिसंबर 2010 सीबीआई ने राजा से नई दिल्ली में पूछताछ की

25 दिसंबर 2010 राजा से लगातार दूसरे दिन भी सीबीआई ने पूछताछ की

31 जनवरी 2011 सीबीआई ने फिर से राजा से पूछताछ की

2 फरवरी 2011 सीबीआई ने पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा, पूर्व दूरसंचार सचिव सिद्धार्थ बेहुरा और राजा के निजी सहायक रहे आरके चंदोलिया को गिरफ्तार किया।
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30 सदस्यीय जेपीसी करेगी 2-जी की जांच 
 
    2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच के लिए सरकार द्वारा संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के ऎलान के बाद इसका खाका तैयार हो गया है। सूत्रों के अनुसार समिति में 30 सदस्य होंगे। बताया जा रहा है कि 30 सदस्यीय समिति में लोकसभा से 20 और राज्यसभा से 10 सदस्य होंगे। कुछ देर में इसकी औपचारिक घोषणा होने की संभावना है।
      जेपीसी समिति के अध्यक्ष का नाम तय नहीं हो पाया है। हालांकि, चेयरमैन के लिए वरिष्ठ कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल, पीसी चाको और वी किशोर चंद्र देव का नाम सामने आ रहा है। कांग्रेस और भाजपा के सदस्यों के अलावा जेपीसी पैनल में तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बसपा, जदयू, डीएमके पार्टी के भी सदस्य होंगे। उल्लेखनीय है कि मंगलवार को सरकार ने विपक्ष की मांग के आगे झुकते हुए 2-जी घोटाले की जांच जेपीसी से कराने को मंजूरी दे दी थी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद के बजट सत्र के दौरान जेपीसी के गठन का ऎलान किया था। संसद का पूरा शीतकालीन सत्र जेपीसी के चलते हंगामे की भेंट चढ़ गया था। बजट सत्र सुचारू रूप से चल सके, इसलिए सरकार ने अपना रूख बदलते हुए जेपीसी का गठन करने का फैसला किया।

Godhra : 27-2-2002 Hindu pilgrims have died in a fire on a train in India

- अरविन्द सिसोदिया 
 गोधरा में जब जिन्दा कर सेवक जलाये गए थे तब यह समाचार बी बी सी ने दिया था जो यथावत यहाँ है .....
http://news.bbc.co.uk/onthisday/hi/dates/stories/february/27/newsid_4168000/4168073.stm
2002: Hindus die in train fire
Fifty-seven Hindu pilgrims have died in a fire on a train in India.

The fire happened as the Sabarmati Express, bound for Ahmedabad, was pulling out of Godhra station in the western state of Gujarat at approximately 0630 today.
The train was returning hundreds of Hindu activists from a pilgrimage to the disputed holy site of Ayodhya in the northern Indian state of Uttar P, which is claimed by both Muslims and Hindus.
A gang of Muslims are suspected of causing the fire and India's prime minister Atal Bihari Vajpayee has appealed for calm amid fears of renewed religious tension in the country.
'Sad and unfortunate'
The dispute over Ayodhya has been ongoing for several years.
In 1992 the Vishwa Hindu Parishad (VHP), or World Hindu Council, organised a demonstration which resulted in the destruction of a 500-year-old Moghul mosque at Ayodhya.
The Hindus believe the mosque occupied the same spot where their god Ram was born.
The destruction of the mosque sparked the most widespread rioting India has seen since partition, and resulted in the deaths of more than 3,000 people.
More than 14,000 Hindus have gathered at Ayodhya in recent weeks to plan the construction of a temple. They have set a deadline of 15 March for work to begin.
According to the head of police in Godhra, Raju Bhargava, it appears this morning's train fire was started by a gang of Muslims who were angered by pro-Hindu chanting on the train.
Initial evidence suggests kerosene was poured into four of the carriages before they were set alight.
Local resident Rakesh Kimani, 18, witnessed the event: "I heard screams for help as I came out of my house.
"I saw a huge ball of fire... people putting out their hands and heads through the windows, trying to escape.
"It was a horrible sight."
Schools and shops have been shut in Godhra and a curfew has been imposed. Police in the town have been ordered to shoot troublemakers on sight.
Prime Minister Vajpayee, whose Hindu nationalist party Bharatiya Janata party (BJP), allied to the VHP, came to power in the mid-1990s in a landslide victory, said: "This is a very sad and unfortunate incident.
"The Ayodhya dispute can be solved only by dialogue between Hindus and Muslims or resolved by the court. It cannot be resolved through violent means or agitation.
"I would appeal to the VHP to suspend their campaign and help government in maintaining peace and brotherhood in the country."
But the VHP has called for a state-wide strike to protest against the attack and the more militant members have vowed to continue with the temple's construction.
There have been scattered reports of clashes between Hindus and Muslims in Gujarat after news of the train attack spread.

fire was a pre-planned conspiracy : a large quantity of petrol was used in the incident

 Forensic report was key to Godhra conviction
Published: Tuesday, Feb 22, 2011, 23:28 IST 
 http://www.dnaindia.com/india/report_forensic-report-was-key-to-godhra-conviction_1511619
By Nikunj Soni | Place: Ahmedabad | Agency: DNA 
Public prosecutor JM Panchal said on Tuesday that evidence that led to the conviction of 31 persons in connection with the Godhra train burning case came from Gandhinagar’s Forensic Science Laboratory (FSL), eyewitnesses and circumstantial evidence.

The forensic evidence was crucial since two panels formed to investigate the cause of the fire on the Sabarmati Express on Feb 27, 2002, came to two different conclusions. While the Nanavati commission, set up by the Gujarat government in 2002 concluded that the fire was a pre-planned conspiracy and that the coach caught fire after petrol was poured inside deliberately, the UC Banerjee Commission, set up by the central government in 2004 said the fire was an ‘accident’ and ruled out the possibility of external attack.

Tuesday’s(22-2-2011)judgement depended on forensic evidence conducted by the FSL that concluded that the fire broke out in the S-6 coach after petrol was poured inside the compartment. The FSL report stating that a large quantity of petrol was used in the incident was placed on record before the court while the case was being heard.

According to sources connected to the case, the FSL examined the pattern of burning and even reconstructed the episode to determine how the coach caught fire. Given the pattern of the fire when the coach was set ablaze, the FSL ruled out the possibility of petrol being thrown from outside the coach either through the windows or doors. The FSL, however, noted the presence of petrol hydrocarbons at the site of the attack. Two containers found on the track also had some petrol in it.

According to the prosecution, the accused had brought these petrol-filled containers in a tempo to the Godhra railway station. They then entered the coach after forcing open the vestibule between two coaches and poured petrol into the coach that caused the fire.

However, the defence challenged the conclusion on many grounds. One argument was that the doctors who conducted the post-mortem on the victims of the fire did not note any smell of petrol or kerosene on the bodies. Thus, the defence argued that there was no evidence to prove that kerosene or petrol was used to start the fire that led to 59 deaths.

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साबरमती की विशेष अदालत ने 9 साल पहले हुए गोधराकांड में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए 94 में से 63 आरोपियों को बरी कर दिया जबकि अग्नीकांड को साजिश करार देते हुए 31 लोगों को दोषी करार दिया। गोधराकांड की जांच के लिए बनाए गए दो आयोगों ने भी इस मामले में अलग-अलग राय दी थी। निम्न बिंदू बने फैसले की मुख्य वजह..-कोर्ट ने अभियोजन की इस मुख्य दलील को मान लिया कि अयोध्या में विवादित स्थल से यज्ञ आहुति करके साबरमती एक्सप्रेस से लौट रहे कारसेवकों से बदला लेने के लिए साजिश रची गई।
- चश्मदीद अजय बारिया, रंजीत सिंह पटेल, प्रभात सिंह पटेल, सिकंदर फकीर की गवाही को मंजूर किया गया है। इनमें से दो पेट्रोल पंप कर्मचारी थे, उन्होंने बयान में बताया कि एस-6 कोच में बड़ी मात्रा में पेट्रोल छिड़का गया।
-यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि जिन 63 आरोपियों को बरी किया गया है उन्हें संदेह का लाभ दिया गया है या साक्ष्यों के अभाव में उन्हें छोड़ा गया है।
-कारसेवकों और अन्य यात्रियों सहित 50 चश्मदीद के बयानों पर कोर्ट ने विचार किया
 

गोधरा कांड : रेल के डिब्बे में आग लगाई गई थी ..!


- अरविन्द  सिसोदिया
  गोधरा  में जो कांड हुआ था निश्चित रूप से दुखद था .., श्री राम जन्म भूमी ; अयोध्या से कार सेवा कर लौट  रहे स्त्री , बच्चों और पुरुँषों  को ले कर आरही बोगी में पट्रोल डाल कर निर्दयता पूर्वक जिन्दा जला दिया गया कि सामान्यतः शांत रहनें वाले हिन्दू समाज को भी भयंकर गुस्सा आगया और प्रतिक्रिया स्वरूप जो घटित हुआ वह भी दुखद था ..! इंदिराजी की हत्या के बाद भी इसी तरह की प्रतिक्रिया हुई थी ..! यह होना स्वभाविक है ..! हिंषा के बल पर सच का गला ज्यादा समय तक घोंटा नहीं जा सकता ..!! गैर भाजपा दलों नें तब इस महा भयानक षड्यंत्र को भी सिर्फ वोटों की खातिर कांग्रेस के नेत्रतत्व  में मात्र छोटी सी दुर्घटना में बदलनें की हर संभव कोशिस की ...! इस घटना के प्रतिक्रिया स्वरूप घटे घटनाक्रम को नरेंद्र मोदी सरकार के द्वारा समपन्न अपराध बता कर उसे घेरनें में कोई कसर नहीं छोड़ी गई..!! जब की इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस नेताओं की अगुआई में हुए हिंषक कृत्यों को जायज ठहराया गया और हत्यारों को सजा नहीं हुई ..! ख़ैर अब अदालत ने अपने फैसले में यह स्पष्तः दर्ज किया है की गोधरा में रेल के डिब्बे में आग लगाई गई थी ..! यह पूर्व निर्धारित षड्यंत्र था ..!!   
* अहमदाबाद;२२ फरबरी २०११ 
 गोधरा कांड की सुनवाई कर रही साबरमती विशेष कोर्ट ने 94 आरोपियों में 63 आरोपियों को बरी कर दिया है जबकि 31 आरोपियों को दोषी माना है। 25 फरवरी को सजा का ऐलान किया जाएगा। गौरतलब है कि 27 फरवरी 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस की बोगी नंबर एस-6 आग लगानें से 58 लोगों की मौत हो गई थी। गुजरात पुलिस ने अपनी जांच में ट्रेन जलाने की वारदात को आईएसआई की सोची-समझी साजिश करार दी थी। मकसद हिन्दू कारसेवकों की हत्या कर राज्य का साम्प्रदायिक माहौल बिगाड़ना था।
लेकिन राजनीति से प्रेरित ममोहन सिंह की केंद्र सरकार का यू सी बैनर्जी कमीशन इस नतीजे पर पहुंचा कि गोधरा की घटना महज एक हादसा थी। बैनर्जी कमीशन के मुताबिक जांच एजेंसियों ने गवाहों को काफी टार्चर कर उनके स्टेटमेंट लिए। कुछ लोगों का ऐसा भी मानना है कि गुजरात के मुख्यमंत्री ने कांड को साजिश बता कर जांच की दिशा पहले ही तय कर दी थी। बाद में पुलिस भी उसी लाइन पर चली।
जबकि गुजरात पुलिस और नानावती कमीशन साजिश की थ्योरी को लेकर जांच कर रही थी। चार्जशीट में 134 आरोपी बनाए गए, जिसमें 16 अब भी फरार हैं। पांच लोगों की हिरासत में ही मौत हो गई। 13 लोग सबूत के अभाव में छोड़ दिए गए जबकि पांच घटना के वक्त नाबालिग थे। अब तक तीन अलग-अलग एजेंसियां इस कांड की जांच कर चुकी हैं। फिलहाल आर के राघवन की अध्यक्षता वाली एसआईटी सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में इस मामले की जांच कर रही है।
गोधरा कांड घटनाक्रम पर एक नजर
दरअसल गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस में लगाई गई  आग आजाद हिन्दुस्तान के इतिहास पर काले धब्बे की तरह है। ट्रेन की उस कोच में लगी आग की आंच को पूरे गुजरात ने महसूस किया था। क्रोध  की आग में पूरा गुजरात  झुलस गया था। गोधरा में हुए उस कांड और उसके बाद इसकी जांच में कई अहम मोड़ आए।
27 फरवरी 2002 की सुबह 7 बजकर 43 मिनट पर अहमदाबाद जाने वाली साबरमती एक्सप्रेस गोधरा स्टेशन पर थी। गोधरा कांड की जांच करने वाली एजेंसियों के मुताबिक ट्रेन अहमदाबाद के लिए प्लेटफॉर्म से कुछ ही दूर आगे बढ़ी कि एस 6 बोगी आग की लपटों से घिर गई। इस हादसे में 58 लोगों की जान चली गई। मृतकों में 23 पुरुष, 15 महिलाएं और 20 बच्चे थे।
हादसे की चपेट में जो एस-6 कोच आया, उसमें अयोध्या से कार सेवा कर लोट रहे कारसेवक सवार थे। इसलिए इसे साजिश होने की आशंका हुई । घटना क्रम भी सर्व विदित रहा जिसके कारण इस खबर ने पूरे गुजरात ही नहीं पूरे देश को आंदोलित कर दिया था !  
साल 2002 में ही राज्य सरकार ने मामले की जांच के लिए नानावती आयोग का गठन कर दिया। नानावती आयोग ने 2008 में रिपोर्ट सरकार को सौंपी। कई गैर सरकारी संगठनों ने इस रिपोर्ट को विधानसभा में पेश करने पर रोक लगाने की मांग की। इस सिलसिले में गुजरात हाईकोर्ट में भी याचिका दाखिल की गई। लेकिन हाईकोर्ट ने रोक लगाने से इनकार कर दिया।
इस बीच यूपीए सरकार ने भी वोट बाएँ की खातिर गोधरा कांड की जांच के लिए एक समिति बनाई। ये समिति साल 2004 में बनाई गई। समिति के अध्यक्ष रिटायर्ड जस्टिस यूसी बनर्जी बनाए गए। इस समिति ने साल 2006 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस बीच सरकार ने इस मामले की सुनवाई के लिए स्पेशल कोर्ट बनाने का फैसला किया। ये स्पेशल कोर्ट साबरमती जेल के अंदर ही बना। जून 2009 में स्पेशल कोर्ट में मुकदमा शुरू हुआ। मुकदमे के दौरान 253 गवाहों से पूछताछ की गई और गुजरात पुलिस ने कोर्ट के सामने 1500 से अधिक दस्तावेजी सबूत पेश किए। 94 आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए गए। सितंबर 2010 में स्पेशल कोर्ट में ये सुनवाई पूरी हो गई। आज कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया।
अहमदाबाद। 
एक विशेष द्रुत गति अदालत द्वारा गोधरा मामले में दोषी ठहराए गए 31 लोगों की सूची निम्न प्रकार है।
1. हाजी बिलाल
2. रजाक कुरकुर
3. शौकत पिटादी
4. सलीम जर्दा
5. जाबिर बिनयामिन बेहरा
6. अब्दुल रउफ
7. यूनुस घड़ियाल
8. बिलाल बादाम
9. फारुख गाजी
10. इरफान कलंदर
11. अयूब पठाडिया
12. शोएब बादाम
13. सलमान पीर
14. जम्बूरा कनखट्टा
15. बिलाल टीडो
16. बिरयानी
17. रजाक कुरकुर
18. सादिक बादाम
19. मोहम्मद पोपा
20. रमजानी बोहरा
21. हसन चर्खा
22. मोहम्मद चांद
23. मोहम्मद हनीफ भाना
24. मोहम्मद हसन
25. शौकत बिबिनो
26. सोएब कलंदर पठाडिया
27. सिद्दीक मोरा
28. अब्दुल सत्तार
29. अब्दुल रउफ कमाली
30. इस्माइल सवाली
31. सिराज वाडा
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प्रमुख रूप से घटना क्रम .......
वर्ष 2002 के गोधरा ट्रेन कांड और उसके बाद हुए सांप्रदायिक दंगे का घटनाक्रम इस प्रकार है-
27 फरवरी, 2002: गोधरा रेलवे स्टेशन के पास साबरमती ट्रेन की एस-6 कोच में भीड़ द्वारा आग लगाये जाने के बाद 59 कारसेवकों की मौत हो गई. इस मामले में 1500 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गयी.
28 फरवरी से 31 मार्च 2002 :गुजरात के कई इलाकों में दंगा भड़का जिसमें 1200 से अधिक लोग मारे गये. मारे गये लोगों में ज्यादातर अल्पसंख्यक समुदाय के लोग थे.
3 मार्च, 2002: गोधरा ट्रेन जलाने के मामले में गिरफ्तार किये गये लोगों के खिलाफ आतंकवाद निरोधक अध्यादेश (पोटो) लगाया गया.
6 मार्च, 2002: गुजरात सरकार ने कमिशन ऑफ इन्क्वायरी एक्ट के तहत गोधरा कांड और उसके बाद हुई घटनाओं की जांच के लिये एक आयोग की नियुक्ति की.
9 मार्च, 2002: पुलिस ने सभी आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 120 बी (आपराधिक षडयंत्र) लगाया.
25 मार्च, 2002: केंद्र सरकार के दबाव की वजह से सभी आरोपियों पर से पोटो हटाया गया.
27 मार्च, 2002: 54 आरोपियों के खिलाफ पहला पहला आरोप पत्र दाखिल किया गया लेकिन उन पर आतंकवाद निरोधक कानून के तहत आरोप नहीं लगाया गया. (पोटो को उस समय संसद ने पास कर दिया था जिससे वह कानून बन गया)
18 फरवरी, 2003: गुजरात में भाजपा सरकार के दुबारा चुने जाने पर आरोपियों के खिलाफ फिर से आतंकवाद निरोधक कानून लगा दिया गया.
21 नवंबर, 2003: उच्चतम न्यायालय ने गोधरा ट्रेन जलाये जाने के मामले समेत दंगे से जुड़े सभी मामलों की न्यायिक सुनवाई पर रोक लगा दिया.
4 सितंबर, 2004: राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव के रेल मंत्री रहने के दौरान केद्रीय मंत्रिमंडल के फैसले के आधार पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश यू सी बनर्जी की अध्यक्षता वाली एक समिति का गठन किया गया. इस समिति को घटना के कुछ पहलुओं की जांच का काम सौंपा गया.
21 सितंबर, 2004: नवगठित संप्रग सरकार ने पोटा कानून को खत्म कर दिया और अरोपियों के खिलाफ पोटा आरोपों की समीक्षा का फैसला किया.
17 जनवरी, 2005: यू सी बनर्जी समिति ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में बताया कि एस-6 में लगी आग एक ‘दुर्घटना’ थी और इस बात की आशंका को खारिज किया कि आग बाहरी तत्वों द्वारा लगाई गई थी.
16 मई, 2005: पोटा समीक्षा समिति ने अपनी राय दी कि आरोपियों पर पोटा के तहत आरोप नहीं लगाये जायें.
13 अक्तूबर, 2006: गुजरात उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी कि यू सी बनर्जी समिति का गठन ‘अवैध’ और ‘असंवैधानिक’ है क्योंकि नानावती-शाह आयोग पहले ही दंगे से जुड़े सभी मामले की जांच कर रहा है. उसने यह भी कहा कि बनर्जी की जांच के परिणाम ‘अमान्य’ हैं.
26 मार्च, 2008: उच्चतम न्यायालय ने गोधरा ट्रेन में लगी आग और गोधरा के बाद हुए दंगों से जुड़े आठ मामलों की जांच के लिये विशेष जांच आयोग बनाया.
18 सितंबर, 2008: नानावती आयोग ने गोधरा कांड की जांच सौंपी और कहा कि यह पूर्व नियोजित षडयंत्र था और एस-6 कोच को भीड़ ने पेट्रोल डालकर जलाया.
12 फरवरी 2009: उच्च न्यायालय ने पोटा समीक्षा समिति के इस फैसले की पुष्टि की कि कानून को इस मामले में नहीं लागू किया जा सकता है.
20 फरवरी, 2009: गोधरा कांड के पीड़ितों के रिश्तेदार ने आरोपियों पर से पोटा कानून हटाये जाने के उच्च न्यायालय के फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी. इस मामले पर सुनवाई अभी भी लंबित है.
1 मई, 2009: उच्चतम न्यायालय ने गोधरा मामले की सुनवाई पर से प्रतिबंध हटाया और सीबीआई के पूर्व निदेशक आर के राघवन की अध्यक्षता वाले विशेष जांच दल ने गोधरा कांड और दंगे से जुड़े आठ अन्य मामलों की जांच में तेजी आई.
1 जून, 2009: गोधरा ट्रेन कांड की सुनवाई अहमदाबाद के साबरमती केंद्रीय जेल के अंदर शुरू हुई.
6 मई, 2010: उच्चतम न्यायालय सुनवाई अदालत को गोधरा ट्रेन कांड समेत गुजरात के दंगों से जुड़े नौ संवेदनशील मामलों में फैसला सुनाने से रोका.
28 सितंबर, 2010: सुनवाई पूरी हुई लेकिन शीर्ष अदालत द्वारा रोक लगाये जाने के कारण फैसला नहीं सुनाया गया.
18 जनवरी, 2011: उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुनाने पर से प्रतिबंध हटाया.
22 फरवरी, 2011: विशेष अदालत ने गोधरा कांड में 31 लोगों को दोषी पाया जबकि 63 अन्य को बरी किया.