बुधवार, 2 मार्च 2011

सजा इतनी तो होनी ही चाहिए कि फिर कोई गोधरा न हो ...



- अरविन्द सिसोदिया
     हमारे देश के कमजोर, गैर जिम्मेवार और सत्तालोलुप हुक्मरानों के कारण,  देश में हिन्दू - मुस्लिम को आपस में मुर्गों की तरह लडानें का सिलसिला अभी भी चल रहा है ..!! अंग्रेजों ने तो यह खेल अपनी सत्ता  बनाये रखनें के लिए खेला था..!  देश की न्यायपालिका,प्रशासन और मिडिया वह मंच था जो निष्पक्ष होजाता तो .., यह सिलसिला रु सकता था .., न्यायलय को छोड़ कर अन्य तंत्रों नें अपनी विश्वसनीयता खो दी है ..! 
   .....मगर कांग्रेस ने भी वही अंग्रेज खेल लगातार अपनी सत्ता बनाये रखनें के लिए खेला और निर्दोष हिन्दू और मुसलमानों को आपस  में लड़वाया ..!!  उन्हें आपस में लड़वा कर ; अपना सत्ता  सुख सुनिश्चित किया ; गोधरा वह सच है जिसमें यह स्पष्ट है कि कांग्रेस के नेता गण अपराध का नेतृत्त्व कर रहे थे ..! यह सजा इसलिए कम है कि इस अत्यंत गैर जिम्मेवार ढंग से कि गई अपराधिका  से दोनों पक्षों के यथा हिन्दू और मुस्लमान जो निर्दोष थे ; मरे गए ; बेघर हुए.., दंगे हुए थे .., पूरा देश ही दंगों कि लपेट में आ सकता था ..! 
       ....इसलिए सजा इतनी तो होनी ही चाहिए कि फिर कोई गोधरा न हो ...!! गोधरा में सवारमती यात्री गाड़ी के दो कोचों को जलानें में जो भी सम्मिलित रहा है उसे जीनें का अधिकार नहीं है..! क्यों कि वह सिर्फ रेल यात्री हिन्दुओं के ही हत्यारे नहीं हैं बल्कि वे वाद में प्रतिक्रिया स्परूप हुई हिंसा को भड्कानें और उसमें हुई जान - माल की हानी के लिए भी जिम्मेवार हैं ..! इसलिए इतनें बड़े और व्यापक विद्वेष के कर्क तत्वों को पूरी पूरी सजा मिलना चाहिए..!!  
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अहमदाबाद। विशेष अदालत ने गोधरा कांड में दोषी करार दिए 31 आरोपियों को १ मार्च 2011को सजा सुना दी। इनमें से 11 को फांसी तथा 20 को उम्रकैद मिली। फैसले को तीन माह के भीतर हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। साबरमती जेल में जज पीआर पटेल की विशेष अदालत ने करीब 900 पेज का फैसला दिया। जून 2009 से मामले की सुनवाई कर रही विशेष अदालत ने 25 फरवरी को बहस के बाद सजा के बिंदु पर फैसला सुरक्षित रख लिया था।
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नईदिल्ली। 2002 के गोधरा कांड में दोषी पाए गए 31 लोगों के खिलाफ गुजरात कीएक विशेष अदालत ने मंगलवार को सज़ा का ऐलान किया। अदालत ने इस मामले में 11 दोषियों को फांसी और बाकी 20 दोषियों को उम्र कैद की सज़ा सुनाई है। पाठकों ने इस फैसले पर मिलीजुली प्रतिक्रिया दी है। आइए, देखें गोधरा कांड में आए फैसले पर चुनिंदा पाठकों की राय:-
'गोधरा पर कोर्ट के फैसले का सभी को स्वागत करना चाहिए। न्यायपालिका में सबको यकीन करना चाहिए। मुस्लिम भाइयों को राष्ट्र को और मजबूत और उन्नति के लिए मिलजुल कर काम करने की जरूरत है। अनावश्यक तनाव देश को तोड़ता है।हमें सिरफिरे चरमपंथियों से किनारा करना चाहिए, ताकि पूरी कौम बदनाम न हो।अगर ऐसे राष्ट्रद्रोही सिरफिरे हमारे आस-पास दिखे, या जानकारी में आएं, तो एक सच्चे मुसलमान होने के नाते उसकी जानकारी नजदीकी पुलिस थाने में देकर अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। जय हिंद।' - मोहम्मद उस्मान (तिरूवनंतपुरम, केरल)
'जब एक हजार लोग ट्रेन पर हमला करते हैं तो सज़ा फिर सिर्फ 31 लोगों को कही क्यों दी गई?'
- रोहित
'गोधरा कांड में सिर्फ 11 लोगों को फांसी की सज़ा सुनाना काफी नहीं है। सरकार को सुप्रीम कोर्ट में अपील करनी चाहिए।' - नवीन (बेल्लारी, कर्नाटक)
'सरकार का कामकाज देखकर लग रहा है कि इस देश में सच और झूठ का फर्क ही खत्म हो गया है। हर मामले में सिर्फ यही देखा जाता है कि उससे किस पार्टी को फायदा होगा और किसको नुकसान होगा। गोधरा कांड पर दो आयोग गठित किए गए है और दोनों ने अलग-अलग रिपोर्ट दी। अगर गुजरात में भी कांग्रेस होती तो गोधरा कांड में आरोपी बनाए गए लोगों को शायद ही सजा होती। लालू ने ही बनर्जी आयोग गठित किया था जिसने बताया था कि गोधरा कांड साजिश नहीं दुर्घटना थी, लेकिन हमारे देश के लोगों को जो थोड़ी बहुत उम्मीद है वह न्यायपालिका से ही बची हुई है। वह भी इसलिए बची है कि न्यायपालिका में न्याय सबूतों के आधार पर होता है न कि राजनीति और पैसे के बल पर। नहीं तोयहां से भी लोगों को मायूस ही होना पड़ता। अब वक्त आ गया है जनता जागे औरऐसे लोगों को सबक सिखाएं जो देश को बेच रहे हैं। जब तक जनता सोती रहेगीउन्हें मूर्ख बनाने वाले पैदा होते रहेंगे।' - मोहन, दिल्ली
'बहुत अच्छा हुआ कि इन्हें फांसी हुई। अब गुजरात दंगों के जिम्मेदार लोगो को भी फांसी दो। तभी हिसाब बराबर होगा। नहीं तो ये हिंदुस्तान कि न्यायपालिका पर कलंक होगा कि 1984 और 2001 के दंगों के लिए जिम्मेदार किसी भी एक आदमी को सज़ा नहीं हुई।' - गुरमीत सिंह पटियाला (पंजाब)
'सच तो यह है कि भारत में होने की वजह सज़ा कम हुई और देर से भी। इस मामले में अब भी कानूनी अड़चनों और अपील की सुविधा के चलते सज़ा कब अमल मेंलाई जाएगी, किसी को पता नहीं।' -अजय, इंदौर
'बेहतर होगा कि इस संवेदनशील मुद्दे पर कोई भी टिप्पणी न करें। इस देशके सभी संप्रदायों को न्यायपालिका पर विश्वास है। उसे अपना काम करने दें।' -राजेश, मुंबई

maha shivaratri : शिवरात्रि शिव और शक्ति




    
  This year 2012  maha shivaratri 20 February .., 
   Auspicious festival of Mahashivaratri falls on the 13th or the 14th night of the new moon during Krishna Paksha in the Hindu month of Phalgun. The Sanskrit term, Krishna Paksha means the period of waning moon or the dark fortnight and Phalguna corresponds to the month of February - March in English Calendar. Shivaratri Festival is celebrated on a moonless night.
    According to Hindu mythology, Shivaratri or 'Shiva's Great Night'symbolizes the wedding day of Lord Shiva and Parvati. Many however, believe, Shivaratri is the night when Lord Shiva performed the Tandava Nritya - the dance of primordial creation, preservation and destruction. Celebrating the festival in a customary manner, devotees give a ritual bath to the Lingam with the panchagavya - milk, sour milk, urine, butter and dung. Celebrations of Shivaratri Festival mainly take place at night. Devotees of Lord Shiva throng Shiva temples across the country and spend ‘the Night of Lord Shiva’ by chanting verses and hymns in praise of the Lord. The festival holds special meaning for the ladies. They pray to Goddess Parvati also called 'Gaura', the giver of 'suhag' for good husbands, marital bliss and a long and prosperous married life.
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यदि तुम विष पी सकते हो तो ,
तुम भी शंकर बन सकते हो !

तुम्ही बताओ कौन बात में
शिव हम तुम से न्यारे थे ?
फिर भी वे तैंतीस कोटि
देवों के अति प्यारे थे !

जीवन गरल प्रत्येक देव का ,
अपने प्याले में डाला ,
चेहरे पर मुस्कान बिखेरी ,
पी डाला भरकर प्याला !

विषम परिस्थिति में यदि तुम भी ,
मानव को सहयोग करो ,
नूतन गंगा बह सकती है ,
तुम भी शंकर बन सकते हो !
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शिकारी की कथा ......
एक बार पार्वतीजी ने भगवान शिवशंकर से पूछा, 'ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?' उत्तर में शिवजी ने पार्वती को 'शिवरात्रि' के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- 'एक गांव में एक शिकारी रहता था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकार को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।'

शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल-वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो विल्वपत्रों से ढका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।

पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुंची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, 'मैं गर्भिणी हूं। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई।

कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे पारधी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।' शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, 'हे पारधी!' मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो।

शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़फ रहे होंगे। उत्तर में मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान मांग रही हूं। हे पारधी! मेरा विश्वास कर, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं।

मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में बेल-वृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं।' उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गया। भगवान् शिव की अनुकंपा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।

थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया। देवलोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहे थे। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प-वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए'।

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जागरण पर ......
डा. अतुल टण्डन
http://in.jagran.yahoo.com/dharm/?page=article&category=10&articleid=3343
शिवरात्रि शिव और शक्ति के मिलन का महापर्वहै। इस पुण्यतमातिथि का दूसरा पक्ष ईशान-संहिता में इस प्रकार बताया गया है-शिवलिङ्गतयोद्भूत: कोटिसूर्यसमप्रभ:

फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी की रात्रि में आदिदेव भगवान शिव करोडों सूर्यो के समान परम तेजस्वी लिंग के रूप में प्रकट हुए।

शिवपुराणकी विद्येश्वर-संहिता में वíणत कथा के अनुसार शिवजी के निष्कल (निराकार) स्वरूप का प्रतीक लिंग इसी पावन तिथि की महानिशामें प्रकट होकर सर्वप्रथम ब्रह्मा और विष्णु के द्वारा पूजित हुआ था। इसी कारण यह तिथि शिवरात्रि के नाम से विख्यात हो गई। जो भक्त शिवरात्रि को दिन-रात निराहारएवं जितेंद्रिय होकर अपनी पूर्ण शक्ति व साम‌र्थ्य द्वारा निश्चल भाव से शिवजी की यथोचित पूजा करता है, वह वर्षपर्यतशिव-पूजन करने का संपूर्ण फल मात्र शिवरात्रि को सविधि शिवार्चन से तत्काल प्राप्त कर लेता है।

शिवपुराणकी कोटिरुद्रसंहिता में शिवरात्रि-व्रत की विधि एवं महिमा का वर्णन तथा अनजान में शिवरात्रि-व्रत करने से भील पर भगवान शंकर की अद्भुत कृपा होने की कथा मिलती है। भोलेनाथके समस्त व्रतों में शिवरात्रि सर्वोच्च पद पर आसीन है। भोग और मोक्ष की कामना करनेवालोंको इस व्रतराज का पालन अवश्य करना चाहिए। देवाधिदेव महादेव को प्रसन्न रखनेवाले सभी मनुष्यों के लिए यह शिवरात्रि-व्रत सर्वश्रेष्ठ है।

स्कन्दपुराण में इस महाव्रत की प्रशंसा में कहा गया है-

परात् परतरंनास्तिशिवरात्रिपरात्परम्। यह शिवरात्रि-व्रत परात्पर है अर्थात् इसके समान दूसरा कोई और व्रत नहीं है। स्कन्दपुराणके नागरखण्डमें ऋषियों के पूछने पर सूतजीकहते हैं-माघ मास की पूíणमा के उपरांत कृष्णपक्ष में जो चतुर्दशी तिथि आती है, उसकी रात्रि ही शिवरात्रि है। उस समय सर्वव्यापी भगवान शिव समस्त शिवलिंगोंमें विशेष रूप से संक्रमण करते हैं। कलियुग में यह व्रत थोडे से ही परिश्रम से साध्य होने पर भी महान पुण्यप्रदतथा सब पापों का नाश करने वाला है। जिस कामना को मन में लेकर मनुष्य इस व्रत का अनुष्ठान करता है, वह मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है। इस लोक में जो चल अथवा अचल शिवलिंगहैं, उन सबमेंउस रात्रि को भगवान शिव की शक्ति का संचार होता है। इसीलिए इस महारात्रि को शिवरात्रि कहा गया है। इस एक दिन उपवास रखते हुए शिवार्चन करने से साल भर के पापों से शुद्धि हो जाती है।

जो मनुष्य शिवरात्रि में भगवान शंकर की पांच मंत्रों से पंचोपचारविधिपूर्वक गन्ध (सफेद चंदन), पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य चढाते हुए पूजा करता है, वह निस्संदेह पापरहित हो जाता है। ये मंत्र हैं-

ॐसद्योजातायनम:।

ॐवामदेवायनम: ।

ॐअघोरायनम: ।

ॐईशानायनम: ।

ॐतत्पुरुषायनम:।

इस दिन व्रत करने वाले स्त्री-पुरुष स्नानादिनित्य कर्मो से निवृत्त होकर सर्वप्रथम शिवपुत्रश्रीगणेश का स्मरण करके शिवालय या घर में शिवलिंगके सम्मुख व्रत का संकल्प करें।

शिवरात्रि के व्रत में उपवास करते हुए रात भर जगने से भगवान शंकर की अनुकम्पा अवश्य प्राप्त होती है। इस संदर्भ में स्वयं शिवजी का यह कथन है-फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष की अर्धरात्रिव्यापिनीचतुर्दशी की रात्रि (महाशिवरात्रि) में जागरण, उपवास और आराधना से मुझे जितनी संतुष्टि प्राप्त होती है, उतनी किसी अन्य साधना से नहीं। कलियुग में मुझे प्राप्त करने का यह सबसे सरल व सुगम उपाय है।

संस्कृतज्ञशुक्लयजुर्वेदीयरुद्राष्टाध्यायीके सस्वर पाठ के साथ रुद्राभिषेक करें। साम‌र्थ्यवान सुयोग्य आचार्य के माध्यम से रुद्रार्चनकर सकते हैं। अन्य लोग पंचाक्षर मंत्र (नम: शिवाय)द्वारा पवित्र जल, गोदुग्ध,पंचामृत आदि से शिवलिंगका अभिषेक करें। शिवरात्रि के चारों प्रहरों में पृथक पूजन का भी विशेष विधान है। रात्रि के प्रथम प्रहर में दूध से, दूसरे प्रहर में दही से, तीसरे प्रहर में घी से तथा चतुर्थ (अंतिम) प्रहर में शहद द्वारा शिवलिंगका अभिषेक करने से मनोवांछित फल प्राप्त होता है। रातभर जगने वाले भक्त शिव नाम, पंचाक्षर मन्त्र अथवा शिव-स्तोत्र का आश्रय लेकर रात्रि-जागरण सफल कर सकते हैं। शिवरात्रि में सोना अनन्त पुण्यराशिको खोना है। इसलिए यत्नपूर्वकरात्रि-जागरण अवश्य करें।

लेकिन जो लोग किसी कारणवश रातभर जगने में असमर्थ हों वे शिवरात्रि की अर्धरात्रिमें उपलब्ध होने वाले महानिशीथकाल में पूजन करने के उपरान्त ही शयन करें।

शिवजी को बिल्वपत्रविशेष प्रिय हैं अत:कम से कम 11अखण्डित बिल्वपत्रशिवलिंगपर अवश्य चढाएं। भगवान शंकर को आक, कनेर, मौलसिरी,धतूरा, कटेली,छोंकरके फूल चढाए जाते हैं।

शिवपुराण में लिखा है कि देवाधिदेव महादेव की जिन अष्टमूíतयोंसे यह अखिल ब्रह्माण्ड व्याप्त है, उन्हीं से सम्पूर्ण विश्व की सत्ता संचालित हो रही है। भगवान शिव की इन अष्टमूíतयोंको इन्हीं आठ मन्त्रों से पुष्पांजलि दें-

ॐशर्वायक्षितिमू‌र्त्तयेनम:।

ॐभवायजलमू‌र्त्तयेनम:।

ॐरुद्रायअग्निमू‌र्त्तयेनम:।

ॐउग्रायवायुमू‌र्त्तयेनम:।

ॐभीमायआकाशमू‌र्त्तयेनम:।

ॐपशुपतयेयजमानमू‌र्त्तयेनम:।

ॐमहादेवायसोममू‌र्त्तयेनम:।

ॐईशानायसूर्यमू‌र्त्तयेनम:।

पुराणों के मत से शिवरात्रि-व्रत मात्र शैवोंके लिए ही नहीं वरन् वैष्णव, शाक्त, गाणपत्य, सौर आदि सभी संप्रदायों के मतावलंबियों के लिए भी अनिवार्य है। प्राचीनकाल में राजा भरत, मान्धाता,शिवि,नल,नहुष,सगर,युयुत्सु, हरिश्चन्द्र आदि महापुरुषों ने तथा स्त्रियों में लक्ष्मी, इन्द्राणी, सरस्वती, गायत्री, सावित्री, सीता, पार्वती, रति आदि देवियों ने भी शिवरात्रि-व्रत का श्रद्धापूर्वकपालन किया था। इस लोक के सभी पुण्यकर्म इस व्रतराज की समानता नहीं कर सकते।

फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष की अर्धरात्रिव्यापिनीचतुर्दशी महाशिवरात्रि से प्रारम्भ करके वर्षपर्यन्तप्रत्येक मास के कृष्णपक्ष में मध्यरात्रिव्यापिनीचतुर्दशी मासिक शिवरात्रि में व्रत करते हुए शिवार्चन करने से असाध्य कार्य भी सिद्ध हो जाता है।

कुंवारियोंके लिए विवाह का सुयोग बनता है। विवाहितोंके दाम्पत्य जीवन की अशान्ति दूर होती है। वस्तुत:शिवरात्रि भगवान शंकर के सान्निध्य का स्वíणम अवसर प्रदान करती है। इस अमोघ व्रत के फलस्वरूप जीव शिवत्व की प्राप्ति से भगवान शिव का सायुज्य अíजत कर लेता है।