शुक्रवार, 4 मार्च 2011

20 साल पहले : 2.5 Billions Swiss Francs in Rajiv Ji's account | 19 Nov 1991





रंगरंगीला परजातंतर



2.5 Billions Swiss Francs in Rajiv Ji's account | 19 Nov 1991
http://www.facebook.com/photo.php?fbid=157835170937109&set=at.108255112561782.22908.107805679273392.100000510523662.100000485228885.100001803484335.706920839&theater


हमेशा गाँधी परिवार पर आरोप लगते रहे है की इस परिवार का बहुत सा काला धन स्विस बैंक तथा अन्य कई बैंकों में में जमा है, इसी सन्दर्भ में स्विट्ज़रलैंड की एक नामी पत्रिका ने 19 नवम्बर 1991 में उन तानाशाह और राजनेताओं के नाम उजागर किये थे जिनका काला धन स्विस बैंक में जमा है | (नीचे फोटो ) इस पत्रिका ने गाँधी परिवार के बड़े पुत्र और भारत के पूर्व युवा प्रधानमंत्री राजीव गाँधी का फोटो सहित विवरण छापा, इस पत्रिका के अनुसार 1991 में कांग्रेस पार्टी के नेता राजीव गाँधी के स्विस बैंक में 2.5 बिलियन स्विस फ्रैंक जमा थे

यदि रुपए में बदले तो यह राशि 2500000000 × 48 रुपए (आज की स्विस फ्रैंक की स्थिति के अनुसार) होगी | अब सोचने वाली बात ये है की 20 साल पहले गाँधी परिवार का सिर्फ एक खाते में 2.5 बिलियन जमा था, ये तब की बात है जब भारत की स्थिति आज से ज्यादा भयावह और दयनीय थी | जब भारत की स्थिति इतनी खराब थी तो इतना पैसा एक बैंक के एक खाते में जमा था तो आज कितना और पैसा जमा होगा, जबकि आज भारत तेजी से विकसित तीन सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति में शुमार करता है | ये फोटो इस बात का परिचायक और सबूत है |

The November 1991 issue of Schweizer Illustrierte, the most popular magazine of Switzerland, carried an exposé of 14 politicians from developing nations who had stashed their bribes in Swiss banks. It alleged that Rajiv Gandhi was one of them, and put his figure at 2.5 billion (2500 Millions) (Current rate is x 84 Indian Rupees) Swiss francs. Schweizer Illustrierte is not some rag; it sells some 2,10,000 copies. Does that account still exist, if the allegation is correct? Only concern is this much could make India's better future why did Rajeev ji saved this in Swiss Banks !!

The Gandhi family has neither denied the allegations, nor taken legal action against the Swiss magazine or Indian politicians like Subramanian Swamy, who has charged that illicit monies are being recycled through the stock market. Why ?
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http://satyameva-jayate.org/2011/01/03/corruption-sonia-rahul-gandhi/

" भारत में भय हो... , स्विस बैंकों की जय हो... "

- अरविन्द सिसोदिया 
 हमारे देश में कई तरह के नारे चुनावों के दौरान लगते हैं , हाल ही में चुनाव आयोग नें पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों का कार्यक्रम घोषित किया है ..! पिछले चुनाव में कांग्रेस ने एक नारा लगाया था "जय हो !" तब भाजपा ने भी एक नारा दिया था "भय हो !" अब इस नारे का मतलब तो मेरी समझ में यह आरहा है की ..
" भारत में भय हो... , स्विस बैंकों की जय हो... "
क्यों की भारत में तो भयानक  भ्रष्टाचार की लूट मची है, लूट की रकम में कितनी बिंदियाँ लगी हैं यह भी ठीक से कहना मुस्किल होता है ..! इस तरह की लूट ईस्ट इण्डिया कंपनी ने भी क्या की होगी ..! हर लूट पर स्विस बैंक  खुश होते हैं .., उन्हें मालूम है की यह पैसा उनके यहाँ या उन जैसे ही किसी दुसरे देश में जमा होने वाला है ..! 
  भारत में भय इस लिए व्याप्त है की रोज रोज मंहगाई बढती है , बेरोएजगार रेलों से गिर कर मर रहे हैं , किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं ..!!
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DW-World.de: Deutsche Welle


http://www.dw-world.de/dw/article/0,,14774034,00.html

19.01.2011

विकीलीक्स की सूची में भारतीयों जैसे नाम


एक टेलीविजन चैनल ने दावा किया है कि विकीलीक्स को मिली स्विस बैंक खातों की सूची में भारतीयों जैसे सुनाई देने वाले नाम भी हैं. स्विस बैंक के एक पूर्व अधिकारी ने विकीलीक्स को बैंक के खाताधारकों की एक सूची सौंपी है.

भारतीय अंग्रेजी समाचार चैनल हेडलाइंस टुडे ने दावा किया है कि इस सूची में भारतीयों के नाम भी शामिल हो सकते हैं. चैनल ने एक सूची दिखाई जिसमें स्विट्जरलैंड के जूलियस बाएर बैंक एंड ट्रस्ट लिमिटेड नामक बैंक के खाताधारकों के नाम हैं. यह सूची बैंक के पूर्व अधिकारी रूडोल्फ एलमर ने विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन अंसाज को दी है.
चैनल ने दिखाया कि इस सूची में ऐसे नाम भी हैं जो सुनने में भारतीय लगते हैं. हालांकि चैनल ने साफ कहा कि वह इस बात की पुष्टि नहीं कर सकता कि यह सूची सच्ची है या नहीं या फिर इसमें दिए गए खाताधारकों के नाम सही हैं या नहीं. चैनल ने कहा कि उसे नहीं पता कि ये भारतीय जैसे सुनाई देने वाले नाम वाकई भारतीय लोगों के हैं या नहीं.
इस सूची के मुताबिक दो खातों में 432 करोड़ रुपये जमा हैं. इस बारे में एलमर ने चैनल से बातचीत के दौरान कहा कि जूलियस बाएर बैंक का भारत में बड़ा कारोबार है. उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि जूलियस बाएर के मालिक का भारत में अच्छा खासा कारोबार है. उन्होंने तो असल में भारत में कुछ निवेश मैनेजर भी नियुक्त किए हैं जिनका मकसद भारत से पैसा जुटाना है."
जब से विकीलीक्स के हाथ स्विस बैंक की सूची लगने की खबर आई है, भारत के राजनीतिक हलकों में खासी हलचल है. मंगलवार को भारतीय जनता पार्टी और भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी ने सरकार से मांग की कि स्विस बैंकों में पैसा जमा कराने वाले सभी लोगों के नाम उजागर किए जाएं. गुजरात के आणंद में बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने उम्मीद जताई कि इस बारे में सुप्रीम में याचिका की सुनवाई के बाद सरकार को स्विस बैंकों से पैसा वापस लाना होगा.
सीपीएम ने भी एक बयान जारी कर खाता धारकों के नाम उजागर करने की मांग की. इस बयान में कहा गया, "ये सभी खाते जब्त कर लिए जाने चाहिए और इनमें जमा पैसा देश के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए. भारत सरकार को फौरन यह मामला स्विट्जरलैंड की सरकार और स्विस बैंक असोसिएशन के सामने उठाना चाहिए."
माना जा रहा है कि विकीलीक्स के पास जो सूची है उसमें कम से कम दो हजार लोगों के नाम हैं. इनमें अमेरिका, ब्रिटेन और एशिया के काफी लोगों के नाम हैं.
रिपोर्टः एजेंसियां/वी कुमार
संपादनः एस गौड़
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18/11/2010   स्विस बैंक में सबसे ज्यादा पैसा इंडियंस का
नई दिल्ली ।। कहा जाता है कि 'भारत गरीबों का देश है, मगर यहां दुनिया के बड़े अमीर बसते हैं।' 
नई दिल्ली ।। कहा जाता है कि 'भारत गरीबों का देश है, मगर यहां दुनिया के बड़े अमीर बसते हैं।' यह बात स्विस  बैंक की एक चिट्ठी ने साबित कर दी है। काफी गुजारिश के बाद स्विस बैंक असोसिएशन ने इस बात का खुलासा किया है कि उसके बैंकों में किस देश के लोगों का कितना धन जमा है। इसमें भारतीयों ने बाजी मारी है। इस मामले में भारतीय अव्वल हैं। भारतीयों के कुल 65,223 अरब रुपये जमा है। दूसरे नंबर पर रूस है जिनके लोगों के करीब 21,235 अरब रुपये जमा है। हमारा पड़ोसी चीन पांचवें स्थान हैं, उसके मात्र 2154 अरब रुपये जमा है। 

भारतीयों का जितना धन स्विस बैंक में जमा है, तकनीकी रूप से वह हमारे जीडीपी का 6 गुना है। सरकार पर दबाव है और कोशिशें भी जारी है कि इस धन को वापस देश में लाया जाए। तकनीकी रूप से यह ब्लैक मनी है। अगर यह धन देश में वापस आ गया तो देश की इकोनॉमी और आम आदमी की बल्ले-बल्ले हो सकती है।
कर्ज नहीं लेना पड़ेगा 
प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक भारत को अपने देश के लोगों का पेट भरने और देश को चलाने के लिए 3 लाख करोड़ रुपये का कर्ज लेना पड़ता है। यही कारण है कि जहां एक तरफ प्रति व्यक्ति आय बढ़ रही है, वही दूसरी तरफ प्रति भारतीय पर कर्ज भी बढ़ता है। अगर स्विस बैंकों में जमा ब्लैक मनी का पहले चरण में 30 से 40 पर्सेंट भी देश में आ गया तो हमें कर्ज के लिए आईएमएफ या विश्व बैंक के सामने हाथ नहीं फैलाने पड़ेंगे। धन की कमी स्विस बैंक में जमा धन पूरा करेगा।

30 साल का बजट बिना टैक्स के 
स्विस बैंकों में भारतीयों का जितना ब्लैक मनी जमा है, अगर वह सारी राशि भारत को मिल जाती है तो भारत देश को चलाने के लिए बनाया जाने वाला बजट बिना टैक्स के 30 साल के लिए बना सकता है। यानी बजट ऐसा होगा कि जिसमें कोई टैक्स नहीं होगा। आम आदमी को इनकम टैक्स नहीं देना होगा और किसी भी वस्तु पर कस्टम या सेल टैक्स नहीं देना होगा।

सभी गांव जुड़ेंगे सड़कों से 
सरकार सभी गांवों को सड़कों से जोड़ना चाहती है। इसके लिए 40 लाख करोड़ रुपये की जरूरत है। मगर सरकार के पास इतना धन कहां हैं। अगर स्विस बैंक से ब्लैक मनी वापस आ गया तो हर गांव के पास एक ही चार लेन की सड़क बन सकती है।

कोई बेरोजगार नहीं 
देश में कोई भी बेरोजगार नहीं रहेगा। जितना धन स्विस बैंक में भारतीयों का जमा है, उससे उसका 30 पर्सेंट भी देश को मिल जाए तो करीब 20 करोड़ नई नौकरियां पैदा की जा सकती है। 50 पर्सेंट धन मिलेगा तो 30 करोड़ नौकरियां मार्केट में आ सकती हैं।

देश से गरीबी गायब 
अमेरिकी एक्सपर्ट का अनुमान है कि स्विस बैंकों में भारतीयों का जितना धन जमा है, अगर वह उसका 50 पर्सेंट भी भारत को मिल गया तो हर साल प्रत्येक भारतीय को 2000 रुपये मुफ्त में दिए जा सकते हैं। यह सिलसिला 30 साल तक जारी रहा सकता है। यानी देश में गरीबी दूर हो जाएगी।

भारत सरकार मेरी जेब में- हसन अली खान : Who is Hassan Ali Khan ?


- अरविन्द सिसोदिया 

जिस तरह से विहल होकर सर्वोच्च न्यायलय ने काले धन के महा माफिया कहे जा रहे,
घो़डा व्यापारी हसन अली खान और अन्य कथित दोषियों को हिरासत में लेकर पूछताछ क्यों नहीं करनें पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है , उससे तो लगता है कि यह हसन अली खान साहब सिगरेट पीते हुए; काश छोडनें के साथ जैसे कह रहे हों कि भारत सर्कार मेरी जेब में है ..!  
     सर्वोच्च अदालत ने काला धन जमा करने वालों के खिलाफ ठोस कदम उठाने में विफल रहने पर सरकार को क़डी फटकार लगाई और पूछा कि घो़डा व्यापारी हसन अली खान और अन्य कथित दोषियों को हिरासत में लेकर पूछताछ क्यों नहीं की जा रही है, जबकि जांच एजेंसियों के पास इस मामले में पर्याप्त सबूत हैं। कोर्ट ने इसी के साथ ही पुणे के व्यवसायी हसन अली खान के विदेशी मुद्रा के उल्लंघन के मामले में जांच के बीच ही हटाए गए तीन प्रवर्तन अधिकारियों का तबादला निरस्त कर बहाल करने का आदेश दिया।
     जस्टिस सुदर्शन रेड्डी और एसएस निज्जर की बेंच ने यह भी संकेत दिया कि यदि सरकार कोई कार्रवाई करने में विफल रहती है, तो वह दोषियों के खिलाफ जांच की निगरानी के लिए विशेष अधिकारी की नियुक्ति को बाध्य होंगे। सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम ने जब कुछ कहना चाहा तो उन्हें लगभग झिड़कते  हुए अदालत ने पूछा, इस देश में आखिर हो क्या रहा है। अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय के उन तीन प्रमुख अधिकारियों को तुरंत बहाल करनें  का निर्देश भी दिया जिनका विदेश मुद्रा विनियम कानून के उल्लंघन के मामले में पुणे के व्यवसायी हसन अली खान के खिलाफ जांच के बीच में ही कथित तौर पर तबादला कर दिया गया था।
* आज (३ मार्च २०११ ) सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से तीखी नाराजगी जाहिर करते हुए गिरप्तारी के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने सरकार को तगड़ी लताड़ लगाते हुए, कहा कि ऐसा लग रहा है कि जो जितना बड़ा अपराधी है, उसके खिलाफ उतनी ही ढिलाई से कार्रवाई हो रही है। कोर्ट ने सरकार से पूछा कि क्या वह देश से भी उपर है। अदालत ने कहा कि हसन अली के मामले में सरकार का रवैया बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अदालत ने सरकार से पूछा कि हसन अली के मामले में जांच के लिए आखिर कितने साल लगेंगे. क्या उसे गिरफ्तार कर, पूछताछ नहीं की जा सकती।
** विदेशी बैंकों में अरबों की राशि जमा करने के आरोपी हसन अली खान को आयकर विभाग ने 50,000 करोड़ रु. की पेनाल्टी देने को कहा है। 56 वर्षीय हसन पर बड़े पैमाने पर कर चोरी और हवाला कारोबार करने का आरोप है। सुप्रीम कोर्ट ने आज सरकार से कहा कि हसन अली के मामले में गंभीरता से जांच नहीं हुई है। आखिर हसन अली के खिलाफ कार्रवाई  करने में क्या दिक्कत है, क्या वह देश से उपर है? अदालत ने कहा कि यह देश की सुरक्षा का मामला है और इसमें ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जा सकती। अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि अब इस मामले में देर बर्दाश्त नहीं की जा सकती। 
***अदालत ने कहा कि जब सरकार के पास काला धन जमा करने वालों के नाम हैं तो फिर उन पर कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है? 
**** शीर्ष अदालत ने यह भी जानना चाहा कि आखिर किस वजह से सरकार खान और काला धन जुटाने वाले अन्य लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ नहीं कर रही है. खान ने कथित तौर पर विदेशी बैंकों में आठ अरब अमेरिकी डालर इकट्ठा कर रखे हैं और उसे आयकर विभाग ने कर के रूप में 50 हजार करोड़ रुपये जमा करने का नोटिस दिया है.पीठ ने दुख व्यक्त करते हुए कहा, ‘ऐसे उदाहरण भी हैं जब धारा 144 तोड़ने वाले छोटे जुर्म करने वालों को गोली मार दी गयी लेकिन आप ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करते. हम बहुत दुखी हैं. ऐसे लोग अभी मुक्त घूम रहे हैं.
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      मुंबई. पुणे के रियल एस्टेट कंसल्टेंट व घोड़ों के फार्म के मालिक हसन अली खान ने शुक्रवार को आखिरकार आयकर विभाग के चर्चगेट स्थित कार्यालय में हाजिरी लगाई। उस पर स्विट्जरलैंड के अग्रणी बैंक यूबीएस में 8 अरब अमेरिकी डॉलर काला धन जमा करने, करोड़ों रुपए के कर चोरी करने और हवाला कारोबार शामिल होने का आरोप है। इनके सिद्ध होने पर अली पर 40 हजार करोड़ रुपए की पेनाल्टी लगाई जा सकती है।
     आयकर अधिकारियों ने शुक्रवार को उसका बयान दर्ज किया। लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि अली ने 31 दिसंबर 2008 को आयकर विभाग द्वारा जारी नोटिस के सिलसिले में हाजिरी लगाई अथवा इसके पहले या बाद में जारी किसी नोटिस पर वह पेश हुआ।
      आयकर अधिकारियों ने जनवरी 2007 में खान के कोरेगांव पार्क (पुणे) स्थित घर पर छापा मारा था। इस दौरान अधिकारियों ने ऐसे दस्तावेज जब्त किए थे, जिनसे पता चला था कि खान के ज्यूरिख स्थित यूबीएस बैंक में लगभग 8.04 अरब अमेरिकी डॉलर काला धन जमा है। इसी के साथ विभाग ने खान के मुंबई-हैदराबाद स्थित ठिकानों पर भी छापे मारे थे। इसमें खान द्वारा आय छिपाने और 1999 से आयकर रिटर्न नहीं भरने की जानकारी सामने आई थी। यही कारण है कि आयकर विभाग ने 31 दिसंबर 2008 को नोटिस जारी कर 40 हजार करोड़ रुपए कर चुकाने को कहा था। आयकर विभाग की इस नोटिस के बाद से ही वह फरार हो गया था। हालांकि गत बुधवार यूबीएस बैंक ने एक बयान जारी कर हसन अली का अपने यहां खाता होने या संपत्ति होने की मीडिया में आई खबरों का खंडन किया था।
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मुंबई, 16 दिसम्बर 2008
     32 हजार करोड का मालिक और डर्बी किंग हसन अली अब पुलिस की गिरफ्त में है. उसके खिलाफ फर्जी पासपोर्ट के दो मामले दर्ज थे. पुलिस को उसकी तलाश काफी अर्से थी. हसन अली की गिरफ्तारी के लिए मुम्बई पुलिस कई दिनों से ख़ाक छानती फ़िर रही थी. इसने एक ही नाम पर फर्जी दस्तावेजो की बिना पर तीन पासपोर्ट बनवा रखे थे. अली हसन ने 1986 में पहला पासपोर्ट हैदराबाद से बनवाया, उसके बाद फर्जी नाम और पता देकर दो और पासपोर्ट मुंबई और पटना से बनवाए.
हसन का नाम तब सामने आया जब इसके पास से करोडो रुपये की नामी और बेनामी सम्पति रखने का खुलासा हुआ. इसी की जांच करते हुए एन्फोर्समेंट डाईरेकटोरेट ने पाया की हसन के पास कई फर्जी पासपोर्ट है, लेकिन इससे पहले पुलिस उसे दबोचती वो गायब हो गया .और अपनी संपत्ति की कुर्की और गिरफ्तारी पर रोक लगाने के लिए कोर्ट से स्टे आर्डर ले आया.
सोमवार को उसको अदालत से मिली इस राहत का आखरी दिन था, लिहाजा वो कोर्ट में पेश हो गया लेकिन पुलिस की अर्जी पर कोर्ट ने उसे बजाय जमानत के पुलिस हिरासत दे दी. पुलिस ये जानना चाहती है कि इस बीच इसने किन किन देशो की यात्रा की. पुलिस ये भी जानना चाहती है कि इसने दुश्मन देश से मिलकर भारत में आंतकी कार्रवाई की फंडिग तो नही की.
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  | New Delhi, March 3, 2011 |
The Supreme Court on Thursday came down heavily on the Centre for failing to crack the whip on black money hoarders. The court ordered the immediate reinstatement of three key Enforcement Directorate (ED) officials who were allegedly transferred midway through a foreign exchange law violation probe against Pune businessman Hassan Ali Khan.
Who is Ali?
 http://indiatoday.intoday.in/site/Story/131363/india/who-is-hassan-ali-khan.html
Hassan Ali Khan, son of a Hyderabad excise officer, is a scrap dealer with an annual income of Rs 30 lakh. He has a Swiss bank account with $8 billion in deposits. This figure has been verified by India Today from a letter written by UBS, Zurich, to Khan.

The government of India has confirmed the existence of this account in UBS, and ordered him to pay Rs 50,000 crore in tax on that wealth. Khan has not paid a rupee.

Racing horses is his passion and he regularly pays lakhs of rupees in cash to buy the ones he desires.

He is known to throw the most lavish parties in Mumbai and Pune.

He has a fleet of cars worth crores of rupees.

He has huge foreign funds at his disposal in different Swiss accounts and other places across the world.

Ali dabbled in antiques, car rentals, metal trading and exported rice and onion to the Middle East before he came into big money. How he did it, no one quite knows.

Hassan is also said to be a conduit for transferring politicians' and industrialists' ill-gotten gains into Swiss banks?

In 1991, in Hyderabad Hassan had entered the world of horse racing with just two horses. Soon, he moved to Mumbai and then expanded his base to Pune, Bangalore, Chennai and Delhi.

Hassan Ali started a jewellery shop in Kuwait in partnership in 2006-07. Pune Police had interrogated Hassan Ali in March 2007 when there were allegations of his involvement in a multi-crore hawala racket.

The man remains a mystery with connections in the highest places.

His wealth is said to be between $8-9 billion or much more, and most of it is unaccounted.

Ali allegedly opened two fictitious companies Autumn Holdings and Paysons in the Virgin Islands in partnership and laundered money to the tune of $280 million.

His wife Reema and her brother Faisal Abbas have allegedly helped him hide since 2007.

Mumbai Police, I-T department, Sebi, RBI and the passport division have investigated him for several offences. He was also jailed last year in a fake passport case.
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Hassan Ali Khan has not fled India, Pranab assures House

NEW DELHI, February 26, 2011
K. BALCHAND

Union Finance Minister Pranab Mukherjee on Friday said the income tax assessments of Hassan Ali Khan had been completed and steps were under way to prosecute him.
He stressed that Mr. Khan had not escaped the country and the government would abide by the directive of the Supreme Court in this regard. The issue was raised by some members during question hour in the Lok Sabha. They wanted to know why Mr. Khan had been allowed to flee the country and the Finance Minister pointed out this was not the case.
With members still not satisfied with his response and demanding that he make public the names of those who have black money stashed away in secret bank accounts abroad, Mr. Mukherjee lost his cool. The law of the land had to be followed, he said firmly. “My department had also raided the residence of a CPI (M) leader, but I cannot hang her. The law of the land is there. It has to be followed.”
Congress president Sonia Gandhi too appeared a bit discomfited by his knee-jerk reaction and Parliamentary Affairs Minister Pawan Bansal quietly signalled to him.
That led to more noisy scenes and some Left MPs began moving towards the well demanding an apology from Mr. Mukherjee. The Speaker quickly announced a short adjournment. When the House convened again, Mr. Mukherjee apologised for losing his temper. He again reiterated the point that Mr. Khan would not be allowed to leave the country as directed by the Supreme Court.
On the black money issue, he said the government had adopted a five-pronged strategy to try and get the names of secret account holders through treaties with a number of countries and the names could be disclosed only when the prosecution began.
Mr. Mukherjee assured the House that the government would soon ratify the U.N. Convention Against Corruption.
As regards money stashed away in Switzerland, he said he expected some information to be made available from April 1, 2011. Till date only once during the Nuremberg trials in the 1940s had the Swiss banks revealed the names of some account holders.

थामस की नियुक्ती रद्द : क्या जबाव है प्रधानमंत्रीजी और गृहमंत्रीजी ...

- अरविन्द सिसोदिया 
  
नया केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त आना तय ...
      दिनांक ३ मार्च २०११ , आज सर्वोच्च न्यायलय ने केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त पी जे थामस की नियुक्ति को निरस्त कर दिया है..! वहीं केंद्र सरकार ने जल्द ही नए केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त के चयन की बात कही है ! वहीं मिडिया में यह भी संभावना आई है की ..,सीवीसी अधिनियम, 2003 की धारा 10 (1) के अध्याय तीन के अनुसार, केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के निधन, इस्तीफे या अन्य किसी कारण से पद खाली होने की स्थिति में राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचना जारी करके केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के तौर पर किसी सतर्कता आयुक्त को अधिकृत किया जा सकता है जब तक खाली पद पर नए केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति नहीं हो जाती।
सर्वोच्च न्यायलय का आदेश केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त पी जे थामस की बर्खास्तगी   
      लेकिन थॉमस के वकील विल्स मैथ्यूज ने कहा कि उन्होंने पद से इस्तीफा नहीं दिया है। उन्होंने कहा कि यह गलत है। थॉमस ने इस्तीफा नहीं दिया है। हमें फैसले की प्रति तक नहीं मिली है। हम फैसले को देखेंगे और गहराई से इसका अध्ययन करेंगे। उसके बाद हम भविष्य की कार्रवाई के बारे में सोचेंगे। मैथ्यू के दावे पर प्रतिक्रिया लेने के लिए संपर्क करने पर मोइली ने कहा कि उन्होंने केवल वही कहा था जिसे मीडिया में गाया बजाया जा रहा था। लेकिन कानून के जानकारों का कहना है, जब उच्चतम न्यायालय ने उनकी नियुक्ति को रद्द कर दिया तो उनके इस्तीफे का कोई मतलब नहीं है। कानून के हिसाब से उन्हें बर्खास्त कर दिया गया है।
प्रधान मंत्री बनें मजाक .....सफाई को कुछ भी नहीं है पास ....
      केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस की नियुक्ति को गैरकानूनी करार देने का सर्वोच्च न्यायलय का फैसला प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए एक और जोर का झटका है। अभी प्रधानमंत्री ए राजा, सुरेश कलमाड़ी और अशोक चव्हाण के कर्मों से अपने दामन पर लगे दागों को साफ भी नहीं कर पाए थे कि सर्वोच्च न्यायलय ने थॉमस की नियुक्ति को गैरकानूनी करार देकर प्रधानमंत्री के दामन पर एक और गहरा दाग लगा दिया।
    वैसे इस मामले में प्रधानमंत्री के पास सफाई देने के लिए ज्यादा कुछ बाकी भी नहीं रह गया है। थॉमस की नियुक्ति के लिए गठित तीन सदस्यीय पैनल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृहमंत्री पी चिदंबरम के अलावा विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज थीं। सुषमा ने थॉमस की नियुक्ति का पुरजोर विरोध किया था। लेकिन प्रधानमंत्री ने उनके विरोध को दरकिनार करते हुए 7 सितंबर 2010 को पीजे थॉमस की नियुक्ति पर अपनी मुहर लगा दी थी। अब पीजे थॉमस की इसी नियुक्ति ने प्रधानमंत्री को पुअर जोक (सस्ता चुटकुला) बना दिया है।
'अभियुक्त सीवीसी कैसे?'
इससे पहले इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 'आपराधिक मामले का कोई अभियुक्त
केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के पद का कामकाज कैसे देख सकता है?'
इस बारे में जनहित याचिका की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाडिया की अध्यक्षता वाली पीठ ने की है.

सुप्रीम कोर्ट में मुख्य सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति को चुनौती दी गई है
सुनवाई के दौरान एक दिन तो जस्टिस कपाडिया ने पूछा, "इस फ़ाइल को पढ़े बिना ही हमारी चिंता ये है कि यदि कोई व्यक्ति किसी आपराधिक मामले में अभियुक्त है तो वह सीवीसी का कामकाज कैसे देख सकता है? हम एक साथ बैठकर इस फ़ाइल का अध्ययन करेंगे."

दलील भी घटिया पन से भरी हुई ......

आज से पहले थॉमस लगातार पद छोड़ने से इनकार करते रहे थे। उन्‍होंने दलील दी थी कि जब दागी नेता सांसद बने रह सकते हैं, तो वह क्‍यों नहीं? लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उनके पास कोई चारा नहीं रह गया है। लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की ओर से 3 सितंबर 2010 को की गई थॉमस की नियुक्ति को दरकिनार करते हुए भविष्‍य में सीवीसी के पद पर होने वाली नियुक्ति के लिए कड़े मानक भी तय कर दिए। कोर्ट ने कहा कि सीवीसी को नियुक्‍त करने वाली कमेटी की सिफारिश का कानून में कोई वजूद ही नहीं है। अदालत ने सवालिया लहजे में कहा कि आखिर थॉमस के खिलाफ आरोपों पर इस कमेटी ने गौर क्‍यों नहीं किया?

   योग्यता में भी धांधली...
सीवीसी पूरे देश में भ्रष्टाचार की किसी भी शिकायत की जांच कराने वाली सर्वोच्‍च एजेंसी है। इसके मुखिया पीजे थॉमस की नियुक्ति की प्रक्रिया अपने आप में कई राज खोलती है। थॉमस केरल के पामोलीन आयात घोटाले में फंसे थे। केंद्र सरकार में सचिव बनने के लिए जरूरी केंद्र में दो साल की प्रतिनियुक्ति (डेपुटेशन) का अनुभव तक उनके पास नहीं था। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने उन्हें सचिव बनाया। उनकी नियुक्ति पर ज्यादा लोगों का ध्यान न जाए, इसलिए उन्हें कम महत्वपूर्ण माने जाने वाले संसदीय कार्य मंत्रालय में सचिव बनाया गया। फिर एक आम तबादले की तरह उन्हें हाई प्रोफाइल टेलीकॉम विभाग में सचिव की कुर्सी मिली। उनकी तरफ लोगों का ध्यान तब गया, जब प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय कमेटी ने उन्हें सीवीसी नियुक्त किया। इस कमेटी में गृहमंत्री पी.चिदंबरम ने तो प्रधानमंत्री का समर्थन किया, लेकिन लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने कड़ी आपत्ति जताई।

  1973 बैच के आईएएस अधिकारी पीजे थॉमस को पॉमोलिन आयात मामले में आठवां अभियुक्त बनाया गया था। थॉमस पर आरोप लगे थे कि उन्होंने मलेशिया की एक कंपनी से 1500 टन पॉम आयल आयात करने के सौदे में भ्रष्टाचार किया। यह सौदा 1992 में उस समय किया गया था जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के. करुणाकरन केरल के मुख्यमंत्री थे। इस मामले में करुणाकरन प्रथम अभियुक्त जबकि उस समय राज्य के खाद्य मंत्री टीएच मुस्तफा दूसरे नंबर के अभियुक्त थे।      
 पीजे थॉमस के ख़िलाफ़ वर्ष 2002 से पालमोलीन निर्यात से संबंधित एक मामला लंबित है और उससे संबंधित चार्जशीट में थॉमस का नाम भी है.पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने पॉमोलीन घोटाले में थॉमस के खिलाफ मुकदमा चलाने पर लगाई गई रोक हटा ली थी। इसके बाद उनके इस्‍तीफे की मांग और तेज हुई थी, लेकिन उन्‍होंने पद छोड़ने से इनकार कर दिया था।1991 में केरल में हुए पॉमोलीन घोटाले में पूर्व मुख्यमंत्री के करुणाकरन और पीजे थॉमस समेत नौ लोगों पर मुकदमा चल रहा था। लेकिन 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी। पॉमोलीन घोटाले के दौरान पी जे थॉमस केरल के खाद्य एवं आपूर्ति विभाग सचिव थे। इसके अलावा यह भी कहा गया कि वे दूरसंचार सचिव रह चुके हैं। आरोप है कि उन्होंने 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले को भी दबाने की कोशिश की।
        इस मामले की सुनवाई के दौरान एटॉर्नी जनरल जीई वाहनवाटी ने कहा था कि पालमोलीन मामले से उनका कोई संबंध नहीं है और उनके ख़िलाफ़ अभियोग चलाने के बारे में फ़ैसला नहीं हुआ है.लेकिन न्यायधीशों के पीठ का कहना था, "हम ये मानकर चलते हैं कि हर क़दम पर आरोप लगेंगे कि आप सीवीसी के तौर पर इस मामले का निपटारा कैसे कर सकते हैं जब आप ही आपराधिक मामले में अभियुक्त हैं. आप सीवीसी के तौर पर कैसे काम करेंगे? हर मामले में केंद्रीय जाँच ब्यूरो को इनके सामने रिपोर्ट करना होता है."

"उच्च स्तरीय समिति ने पीजे थॉमस की नियुक्ति की सिफ़ारिश की थी उसका क़ानून के मुताबिक कोई अस्तित्व नहीं है...इस नियुक्ति के समय इस समिति और किसी सरकारी संस्था ने मुख्य सतर्कता आयुक्त की संस्था की ईमानदारी के मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया. जब मुख्य सतर्कता आयुक्त की दोबारा नियुक्ति हो तो प्रक्रिया को केवल नौकरशाहो तक सीमित न रखा जाए बल्कि समाज से अन्य ईमानादार और निष्ठावान व्यक्तियों के नाम पर ध्यान दिया जाए."- सर्वोच्च न्यायलय 
एक रिपोर्ट आलोक तोमर की है जिसमें उनका दावा है थामस की फ़ैल प्रधानमंत्री ने देखी थी सरकार ने सर्वोच्च न्यायलय में झूठा शपथपत्र दिया है ..!