सोमवार, 4 अप्रैल 2011

परमपूज्य डॉक्टर हेडगेवार : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रणेता



- हरिकिशन पुरोहित
(फलोदी से हैं , जोधपुर में रहते हैं )
( पुरोहित ने यह लेख facebook पर डाला हुआ है , मेंने यह उठा कर यहाँ आप सब के लिए प्रस्तुत भर कर दिया है | )      आन्ध्र प्रदेश के कन्द्कुर्ती गाँव में हेडगेवार परिवार रहता था। उसकी एक शाखा महाराष्ट्र के नागपुर में आ गयी थी। इसी शाखा के एक कर्मनिष्ठ और परोपकारी व्यक्ति, बलिराम हेडगेवार और उनकी सहृदय पत्नी, रेवती सुशीला के यहाँ केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म हुआ। इनका जन्म एक अप्रैल, 1889 को गुढी पाडवा पर्व के दिन हुआ। गुढ़ी पाड़वा का अर्थ है—ध्वजारोहण करना। इस दिन सभी लोग अपने घरों पर झंडा फहराते हैं एवं द्वारों पर तोरणादि बांधकर उल्लास प्रदर्शित करते हैं। यह दिन बड़ा शुभ माना जाता है। शुभ दिवस और पुत्र जन्म से हेडगेवार परिवार में दोहरा हर्ष छा गया। लोग बालक को बड़ा पराक्रमी एवं भाग्यशाली मान रहे थे। दरअसल गुढ़ी-पाड़वा दिवस का इतिहास ही पराक्रम एवं विजय से परिपूर्ण रहा है। हजारों वर्ष पूर्व आज ही के दिन लंका विजय के बाद भगवान राम ने अयोध्या में प्रवेश किया था और इसी दिन राजा शालिवाहन ने मिट्टी के घुड़सवारों में प्राण फूंककर उनके द्वारा आक्रमणकारी शकों को मार भगाया था।

     बचपन में माता रेवतीबाई उन्हें शिवाजी की देशभक्तिपूर्ण कथाएं सुनाती थीं। उन्हें सुनकर वह बहुत खुश होते थे। बचपन में सुनी इन कहानियों का केशव के मन पर गहरा असर पड़ा। उनके मन में देश-प्रेम की भावना जाग उठी। उनकी ये भावनाएं उनके छात्र जीवन में ही झलकने लगीं थीं। 22 जून 1897 का दिन था। अंग्रेज अपनी महारानी विक्टोरिया के राज को 60 वर्ष पूरा होने के उपलक्ष्य में देश भर में बड़ा समारोह मना रहे थे। जिस विद्यालय में केशव पढ़ते थे वहां मिठाइयाँ बांटी गयी। सब छात्र खुश हुए और अंग्रेजों तथा रानी विक्टोरिया की स्तुति करने लगे। केशव से ये सब नहीं देखा गया। उन्होंने मिठाई को कूड़ेदान में फेंकते हुए कहा, " अंग्रेज हमारे दुश्मन हैं। वे मिठाई खिलाकर हमें गुलामी की जंजीरों में और अधिक कसना चाहते हैं।" केशव के एक इशारे पर सभी छात्रों ने मिठाई फेंक दी। केशव पढने में एक साधारण विद्यार्थी थे, लेकिन अंग्रेजों के विरुद्ध अपने साथियों को संगठित करने और उनमें देश-प्रेम की भावना जगाने में सबसे आगे थे।

     सन् 1902 की बात है। भारत के कई शहरों में प्लेग की बीमारी फैली हुई थी। इस बीमारी से नागपुर के लोग भी नहीं बच पाये। वहां बहुत-से लोगों को अपनी जिन्दगी से हाथ धोना पड़ा। ऐसे में कोई अपने रिश्तेदारों के यहां उनका हाल पूछने भी नहीं जाता था, लेकिन केशव के माता-पिता सामान्य रूप से लोगों के घर जा-जाकर उनका हाल पूछते थे। छुआछूत के चलते उन्हें भी प्लेग का शिकार होना पड़ा और उनकी मृत्यु हो गई।

     जब केशव नागपुर में हाई स्कूल में पढ़ रहे थे तब एक दिन अंग्रेज निरीक्षक विद्यालय में निरीक्षण के लिए आये। विद्यार्थियों ने उनके स्वागत की अनूठी योजना बनाई। कक्षा में उनके आते ही सभी छात्र एक साथ गा उठे, 'वन्दे मातरम्!' सभी कक्षाओं में यही हुआ। पूरे विद्यालय में 'वन्दे मातरम्' गूँज उठा। निरीक्षण कार्य ठप्प हो गया। अधिकारी क्रोध से तमतमा उठे। वे हेडमास्टर पर बरस पड़े, "यह कैसी बगावत हो रही है? कौन है इसकी जड़ में? सबको कड़ी सजा दो।" हेडमास्टर ने छात्रों को कड़ी डाँट पिलाई। शिक्षकों ने लड़कों को मारा-पीटा, डराया-धमकाया, पुचकारा-ललचाया और बार-बार पूछा, "यह किसकी शरारत है?" लेकिन किसी ने भी केशव का नाम नहीं लिया। 'वन्दे मातरम्' और 'भारत माता की जय' के नारे लगाते हुए विद्यार्थी अपने-अपने घर चले गए। फिर भी बात छिपी नहीं रही। माफ़ी मांगने के लिए केशव पर दबाव डाला गया। केशव ने माफ़ी मांगने से साफ़ मना कर दिया। उन्होंने कहा, "जो शासन अपनी माँ को प्रणाम नहीं करने देता, वह अन्यायी है। उसे उखाड़ फेंकना चाहिए।" इस पर केशव को विद्यालय से निकाल दिया गया। इसके बाद केशव ने यवतमाल व पूना में शिक्षा प्राप्त की। केशव का शरीर सुगठित था। उनका अध्ययन व्यापक और विचार शक्ति पैनी थी। यवतमाल तथा पूना में उन्हें बड़े नेताओं का साथ मिला। अब छोटे-बड़े उनका आदर करने लगे। सब उन्हें केशवराव कहने लगे।

     केशव ने दो बातें ठान ली थीं। पहली बात, उन्हें बंगाल जाना था क्योंकि वह बंगाल के देशभक्त क्रांतिकारियों से बहुत प्रभावित थे। उस भूमि को वह निकट से देखना चाहते थे। दूसरी बात, वह आगे पढना चाहते थे। विशेषतः उनकी इच्छा डाक्टर बनने की थी। इस व्यवसाय में जन-सेवा, प्रतिष्ठा तथा धन-लाभ - तीनों ही थे। उनका मन ऊंची उड़ानें भर रहा था, परन्तु उनकी आर्थिक स्थिति ने उनका जमीन पर चलना भी कठिन कर दिया था।

     केशवराव की आगे की पढ़ाई कलकत्ता में हुई। उनकी दृष्टि में कलकत्ता केवल महानगरी ही नहीं थी, वह आत्मबलिदान की वेदी भी थी। वहां के युवक मातृभूमि को गुलामी से मुक्त कराने के लिए क्रांति करना चाहते थे। जल्दी ही केशवराव बंगला भाषा बोलना सीख गए। वह नलिनी किशोर गुह, अमूल्यरत्न घोष, प्रतुलचंद गांगुली, श्यामसुंदर चक्रवर्ती, विपिनचंद्र पाल आदि गणमान्य बंगाली सज्जनों के घर आने-जाने लगे। धीरे-धीरे वह उनके घर के सदस्य जैसे बन गए।

       केशवराव ने प्रतिज्ञाबद्ध होकर क्रांतिकारी दल में प्रवेश किया। वह अनुशीलन समिति के सदस्य बने। एक दिन मेडिकल कॉलेज के एक प्राध्यापक नहीं आये थे। इसलिए कक्षा में छात्र अपनी-अपनी धुन में मस्त थे। अमूल्य रत्न घोष नाम का एक छात्र अपने आपको कुछ दादा समझता था। वह केशवराव के सामने आ खड़ा हुआ और कहने लगा, "जरा तुम्हारी ताकत तो देखें, मेरी भुजा पर मुक्के मारो।" केशवराव ने अपनी भुजा खोलकर कहा, "पहले आप।" 'अच्छा! मुझे चुनौती देता है? देखता हूँ।' यह सोचते हुए अमूल्य ने दांत किटकिटाकर केशव की बाजू पर कसकर मुक्के जमाये। वह मुक्के मारते ही चला गया, परन्तु केशव टस-से-मस नहीं हुए। आख़िरकार अमूल्य ने अपनी हार मान ली और हमेशा के लिए केशव का प्रशंसक बन गया।

      अनेक गतिविधियों में लगे रहने के बावजूद केशव पढाई में पीछे नहीं रहे। उन्हें अनेक असुविधाओं का सामना करना पड़ता था। उनके पास पर्याप्त पुस्तकें नहीं थीं। वह दूसरों से पुस्तकें मांग लाते थे। रात के एकांत में एकाग्र होकर पढ़ते थे तथा सुबह लौटा देते थे। हर परीक्षा में केशव को अच्छे अंक मिलते थे। यह देखकर उनके साथी चकित होते थे। अंतिम परीक्षा में भी उन्हें अच्छे अंक मिले। अंततः उन्हें एल. एम. एस. की उपाधि प्राप्त हुई और वे डॉक्टर बने। कॉलेज के प्राचार्य उन्हें बहुत चाहते थे। वह एक बड़े अस्पताल में उनको नौकरी दिलाना चाहते थे, लेकिन केशव ने विनम्र शब्दों में उनसे मना कर दिया, "महोदय, अपने देश की परिस्थिति सुधारने के लिए मेरे जैसे हजारों युवकों को अपना सब कुछ न्योछावर करना होगा। इसलिए मैंने नौकरी, विवाह आदि न करने का फैसला किया है। मैं केवल आपका आशीर्वाद चाहता हूँ।" बंगाल से डॉक्टर बनकर केशव नागपुर लौटे। परन्तु उन्होंने न तो कहीं नौकरी की और न क्लिनिक ही खोला। उनके भाई तथा रिश्तेदार उन्हें तरह-तरह के सुझाव देते रहे। डॉक्टर जी सबकी बातें सुनते थे और अपने देश की सेवा में लगे रहते थे।

      जब विवाह के सम्बन्ध में बार-बार प्रस्ताव आने लगे तब उन्होंने अपने चाचाजी को साफ शब्दों में पत्र लिखा - "मैंने आजन्म देश-सेवा का व्रत लिया है। मेरे जीवन में न निजी सुख के लिए कोई जगह है और न निजी परिवार के लिए। देश की सेवा करते समय न जाने कितनी बार जेल जाना होगा। हो सकता है जान की बाजी भी लगानी पड़े। इसलिए मेरे विवाह के बारे में न सोचें।"

      डॉक्टर बनने की इच्छा पूरी होने पर केशव के सामने दो लक्ष्य थे- अंग्रेजो की गुलामी से देशवासियों को छुटकारा दिलाना और देश की उन्नती के नए रास्ते खोजना। युवकों के दिलों में देश-प्रेम की भावना जगाना ही उनका प्रमुख कार्य था। उसे करने का वह कोई मौका नहीं छोड़ते थे। डॉक्टर जी ने प्रांतीय कांग्रेस के कार्यवाह के नाते कार्य किया। सन 1920 के नागपुर अधिवेशन में उन्हें भोजन-व्यवस्था का कार्य दिया गया था। सन 1921 में जब असहयोग आन्दोलन छिड़ा तब उन्होंने उग्र भाषण दिए। अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ा, उन पर मुक़दमा चलाया और उन्हें एक वर्ष के सश्रम कारावास की सजा हुई। कारागार में उनका व्यव्हार बहुत धैर्यपूर्ण तथा संतुलित रहा। वह सदा प्रसन्न रहते थे और दूसरों की सहायता करते थे।

      जेल से छूटने के बाद डॉक्टर जी ने अनेक कार्यकर्ताओं से विचार-विमर्श करके सच्चरित्र नवयुवकों को एकत्र किया और सन 1925 के विजयादशमी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। शुरुआत में सब सदस्य सप्ताह में एक दिन इकट्ठे होते थे। फिर नागपुर के सलूबाई मोहिते के बाड़े में संघ ने शाखा का रूप धारण किया। धीरे-धीरे स्वयंसेवकों की संख्या बढ़ने लगी। नागपुर में कई स्थानों पर शाखाएं शुरू हुईं। स्वयंसेवक जब भी दूसरे गाँव जाते, वहां शाखा शुरू करते। कई बुद्धिमान स्वयंसेवकों को डॉक्टर जी ने पढाई के बहाने अन्य प्रान्तों में भेजा। लाहौर, दिल्ली, लखनऊ, पटना, कलकत्ता, मद्रास, बम्बई, पूना, अहमदाबाद, जयपुर आदि स्थानों पर शाखाएं चलने लगीं। इन शाखाओं में न तो अंग्रेजों को गालियाँ दी जाती थीं और न मुसलमानों को। वहां कहा जाता था- 'अपनी मातृभूमि से प्रेम करो। जाति-पांति आदि का भेद मन में न लाते हुए भारत माता के पुत्रों से प्रेम करो। स्वावलंबी बनो। वीर बनो। दुनिया के दूसरे देशों की तरफ मत ताको। त्याग करते हुए हिन्दुओं को संगठित करो। इसी दवा से देश के सब रोग दूर हो जायेंगे।' संघ में सभी आयु, वर्ग और जाति के लोग आने लगे। संघ का कार्य दिन दूना रात चौगुना बढ़ता चला गया। डॉक्टर जी हर छोटे बड़े स्वयं सेवक के साथ अपनेपन से पेश आते थे।

       सन १९३० में अंग्रेजों के विरुद्ध कानून तोड़ने का आन्दोलन चला। इसी आन्दोलन के अंतर्गत उन्होंने यवतमाल जिले में जंगल सत्याग्रह किया, जिसके लिए उन्हें नौ महीने की कैद की सजा मिली। जेल में भी वह संघ का कार्य करते रहे। उन्होंने अनेक कैदियों को संघ का उद्देश्य और महत्त्व समझाया। कई कैदियों को स्वयंसेवक भी बनाया।

       लम्बे समय तक सतत काम करते रहने से डॉक्टर जी बीमार हो गए। यह सन 1940 की बात है। नागपुर में संघ शिक्षा वर्ग लगा था। डॉक्टर जी उसमे स्वयंसेवकों से मिलने के लिए परेशान थे। अंत में डॉक्टरों ने उन्हें इजाजत दे दी। 9 जून, 1940 को वह स्वयंसेवकों से मिले। उस समय उनका शरीर बुखार से तप रहा था। फिर भी उनका मन उछल रहा था। उन्होंने स्वयंसेवकों को संघ के महत्त्व के बारे में समझाया। थोड़े में ही बहुत सी बातें कह दीं। धीरे-धीरे डॉक्टर जी की सेहत गिरने लगी। 21 जून, 1940 को डॉक्टर जी ने अपना नश्वर शरीर त्याग दिया।

आज भी डॉक्टर हेडगेवार के विचार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के रूप में हमारा मार्गदर्शन कर रहे हैं।

विक्रम संवत के प्रवर्तक चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य

सन् 2016 में नव संवतसर 08 अप्रैल  को विक्रम 2073 
विक्रम संवत के प्रवर्तक चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य 
- अरविन्द सिसोदिया
यो रुमदेशधिपति शकेश्वरं जित्वा गृहीत्वोज्जयिनी महाहवे |
आनीय संभ्राम्य मुमोचयत्यहो स विक्रमार्कः समस हयाचिक्र्मः||
(- 'ज्योतिविर्दाभरण ' नमक ज्योतिष ग्रन्थ २२/ १७ से .......)
    यह श्लोक स्पष्टतः यह बता  रहा है कि रुमदेशधिपति .. रोम देश के स्वामी शकराज ( विदेशी राजाओं को तत्कालीन भाषा में शक ही कहते थे , तब शकों के आक्रमण से भारत त्रस्त था ) को पराजित करके विक्रमादित्य ने बंदी बना लिया और उसे उज्जैनी नगर में घुमा कर छोड़ दिया था | यही वह शौर्य है जो पाश्चात्य देशों के ईसाई वर्चस्व वाले इतिहास करों को असहज कर देता है और इससे बच निकालनें के लिए वे एक ही शब्द का उपयोग करते हैं 'यह मिथक है '/ 'यह सही नहीं है'...| उनके साम्राज्य में पूछे भी कौन कि हमारी सही  बातें गलत हैं तो आपकी बातें सही कैसे हैं ..? यही कारण है कि आज जो इतिहास हमारे सामनें है वह भ्रामक और झूठा होनें के साथ साथ योजना पूर्वक कमजोर किया गया इतिहास है | पाश्चत्य इतिहासकार रोम की इज्जत बचानें और अपनें को बहुत बड़ा बतानें के लिए चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के अस्तित्व को भी नकारते हैं .., मगर हमारे देश में जो लोक कथाएं , किंवदंतियाँ और मौजूदा तत्कालीन साहित्य है वह बताता है कि श्री राम और श्री कृष्ण के बाद कोई सबसे  लोकप्रिय चरित्र है तो वह सम्राट विक्रमादित्य का है ..! वे लोक नायक थे , उनके नाम से सिर्फ विक्रम संवत ही नहीं , बेताल पच्चीसी और सिंहासन बतीसी का यह नायक , भास्कर पुराण में अपने सम्पूर्ण वंश वृक्ष के साथ उपस्थित है | विक्रमादित्य परमार वंश के राजपूत थे उनका वर्णन सूर्यमल्ल मिश्रण कृत वंश भास्कर में भी है | उनके वंश के कई प्रशिद्ध राजाओं के नाम पर चले आरहे नगर व क्षेत्र आज भी हमारे बीच उपस्थित हैं ..!! जैसे देवास , इंदौर, भोपाल और बुन्देलखंड नामों का नाम करण विक्रमादित्य के ही वंशज राजाओं के नाम पर है |
        दूसरी बात कई इतिहासकार चन्द्रगुप्त द्वितीय को भी विक्रमादित्य सिद्ध करनें कि कोशिस करते हैं .., यह भी गलत है , क्यों कि शकों के आक्रमण कई सौ साल तक चले हैं और उनसे अनेकों भारतीय सम्राटों ने युद्ध किये और उन्हें वापस भी खदेड़ा ..! बाद के कालखंड में  किसी एक शक शाखा को चन्द्रगुप्त ने भी पराजित किया था, तब उनका सम्मान विक्रमादित्य के अलंकारं से किया गया था | क्यों कि उन्होंने मूल विक्रमादित्य जैसा कार्य कर दिखाया था | मूल या आदि विक्रमादित्य की पदवी तो शाकिर और सह्सांक थी | वे उज्जैनी के राजा थे |  
विक्रम और शालिवाहन संवत
  वर्तमान भारत में दो संवत प्रमुख रूप से प्रचलित हैं , विक्रम संवत और शक-शालिवाहन संवत | दोनों संवतों का सम्बन्ध शकों की पराजय से है | उज्जैन के पंवार वंशीय राजा विक्रमादित्य ने जब शकों को सिंध के बहार धकेल कर महँ विजय प्राप्त की थी , तब उन्हें शाकिर की उपाधि धारण करवाई गई थी तथा तब से ही विक्रम संवत का शुभारम्भ हुआ | विक्रमादित्य की मृत्यु के पश्चात शकों के उपद्रव पुनः प्रारंभ हो गए , तब  उन्ही के प्रपोत्र राजा शालिवाहन ने शकों को पुनः पराजित किया और इस अवसर पर शालिवाहन संवत प्रारंभ हुआ , जिसे हमारी केंद्र सरकार ने राष्ट्रिय संवत मन है , जो की सौर गणना पर आधारित है |
सम्राट विक्रमादित्य 
  उज्जैनी के चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के महान साम्राज्य क्षेत्र में वर्तमान भारत , चीन , नेपाल , भूटान , तिब्बत , पाकिस्तान , अफगानिस्तान, रूस , कजाकिस्तान , अरब क्षेत्र , इराक, इरान, सीरिया, टर्की , माय्मंर ,दोनों कोरिया श्री लंका  इत्यादि क्षेत्र या तो सम्मिलित थे अथवा संधिकृत थे | उनका साम्राज्य सुदूर बलि दीप तक पूर्व में और सऊदी अरब तक पश्चिम में था |
"Sayar -UI -Oknu " Makhtal -e - Sultania / Library in Istanbul   , Turky
 के अनुसार सम्राट विक्रमादित्य ने अरब देशों पर शासन किया है , अनेंकों दुर्जेय युद्ध लडे और संधियाँ की |
     यह सब इस लिए हुआ कि भारत में किसी भी राजा को सामर्थ्य के अनुसार राज्य विस्तार की परम्परा थी , जो अश्वमेध यज्ञ  के नाम से जानी जाती थी | उनसे पूर्व में भी अनेकों राजाओं के द्वारा यह होता रहा है ,राम युग में भी इसका वर्णन मिलता है |  कई उदहारण बताते हैं कि विक्रमादित्य की अन्य राज्यों से संधियाँ  मात्र कर प्राप्ति तक सिमित नहीं थी , बल्कि उन राज्यों में समाज सुव्यवस्था, शिक्षा का विस्तार , न्याय और लोक कल्याण कार्यों की प्रमुखता को भी संधिकृत किया जाता था | अरब देशों में उनकी कीर्ति इसीलिए है की उन्होंने वहां व्याप्त तत्कालीन अनाचार की समाप्त करवाया था | वर्त्तमान ज्ञात  इतिहास में विक्रम जितना बड़ा साम्राज्य और इतनी विजय का कोई समसामयिक  रिकार्ड सामनें आता है सिवाय  ब्रिटेन की विश्व विजय के  | सिकंदर जिसे कथित रूप से विश्व विजेता कहा जाता  है , विक्रम के सामनें वह बहुत ही बौना था, उसने सिर्फ कई देशों को लूटा , शासन नहीं किया ..! उसे लुटेरा  ही कहा जा सकता है एक शासक के जो कर्तव्य हैं उनकी पूर्ती का कोई इतिहास सिकंदर का नहीं है | जनश्रुतियां हैं की विक्रम की सेना के घोड़े एक साथ तीन समुद्रों का पानी पीते थे |
भारतीय पुरुषार्थ को निकला ...
  विक्रमादित्य तो एक उदाहरण  मात्र है , भारत का पुराना अतीत इसी तरह के शौर्य से भरा हुआ है | भारत पर विदेशी शासकों के द्वारा लगातार राज्य शासन के बावजूद निरंतर चले भारतीय संघर्ष के लिए येही शौर्य प्रेरणाएं जिम्मेवार हैं | भारत पर शासन कर रही ईस्ट इण्डिया कंपनी  और ब्रिटिश सरकार  ने उनके साथ हुए कई  संघर्ष और १८५७ में हुई स्वतंत्रता क्रांति के लिए भारतीय शौर्य को ही जिम्मेवार माना और उससे भारतियों को विस्मृत करनें का कार्यक्रम संचालित हुआ  ताकि  भारत की संतानें पुनः आत्मोत्थान प्राप्त न कर सकें | एक सुनियोजित योजना से भारत वासियों को हतोत्साहित करने के लिए प्रेरणा खंडों को लुप्त किया गया , उन्हें इतिहास से निकाल दिया गया , उन महँ अध्यायों को मिथक या कभी अस्तित्व में नहीं रहे ..., इस तरह की  भ्रामकता थोपी गई |
         अरबी और यूरोपीय इतिहासकार श्री राम , श्री कृष्ण और विक्रमादित्य को इसी कारन लुप्त करते हैं कि भारत का स्वाभिमान पुनः जाग्रत न हो , उसका शौर्य और श्रेष्ठता पुनः जम्हाई न लेने लगे | इसीलिए एक जर्मन इतिहासकार पाक़ हेमर ने एक बड़ी पुस्तक ' इण्डिया - रोड टू नेशनहुड ' लिखी है , इस पुस्तक में उन्होंने लिखा है कि " जब में भारत का इतिहास पढ़ रहा हूँ लगता है कि भारत कि पिटाई का इतिहास पढ़ रहा हूँ ,- भारत के लोग पिटे ,मरे ,पारजित हुए ,यही पढ़ रहा हूँ ! इससे मुझे यह भी लगता है कि यह भारत का इतिहास नहीं है |" पाक हेमर ने आगे उम्मीद की है कि " जब कभी भारत का सही इतिहास लिखा जायेगा , तब भारत के लोगों में , भारत के युवकों में ,उसकी गरिमा की एक वारगी ( उत्प्रेरणा ) आयेगी |"
अर्थात हमारे इतिहास लेखन में योजना पूर्वक अंग्रजों नें उसकी यशश्विता को निकल बहार किया , उसमें से उसके पुरुषार्थ को निकल दिया ,उसके मर्म को निकल दिया , उसकी आत्मा को निकल दिया ..! महज एक मरे हुए शारीर की तरह मुर्दा कर हमें पारोष दिया गया है | जो की झूठ का पुलंदा मात्र है |  
भारत अपने इतिहास को सही करे ..! 
हाल ही में भारतीय इतिहास एवं सभ्यता के संदर्भ में अँतरराष्ट्रिय संगोष्ठी ११-१३ जनवरी २००९ को नई दिल्ली में हुई , जिसमें १५ देशों के विशेषज्ञ एकत्र हुए थे ,उँ सभी ने एक स्वर में कहा अंग्रेजों  के द्वारा लिखा गया लिखाया गया इतिहास झूठा है तथा इस का पुनः  लेखन होना चाहिए | इसमें हजारों वर्षो का इतिहास छूठा हुआ है , कई बातें वास्तविकता से मेल नहीं खाती हैं | उन्होंने बताया की विश्व के कई देशों ने स्वतन्त्र होनें के बाद अपने देश के इतिहास को पुनः लिखवाया है उसे सही करके व्यवस्थित किया है | भारत अपने इतिहास को सही करे ..!
बहुत कम है भारतीय इतिहास ....
भारत के नई दिल्ली स्थित संसद भवन ,विश्व का ख्याति प्राप्त विशाल राज प्रशाद है , जब इसे बनाए की योजना बन रही थी ; तब ब्रिटिश सरकार ने एक गुलाम देश में इतनें बड़े राज प्रशाद निर्माण के औचित्य  पर प्रश्न खड़ा किया था | इतने विशाल और भव्य निर्माण की आवश्यकता क्या है ? तब ब्रिटिश सरकार को बताया गया कि ; भारत कोई छोटा मोटा देश नहीं है ; यहाँ सैंकड़ों बड़ी बड़ी रियासतें हैं और उनके राज प्रशाद भी बहुत बड़े बड़े तथा विशालतम हैं ..! उनकी भव्यता और क्षेत्रफल भी असामान्य रूप से विशालतम हैं ! उनको नियंत्रित करने वाला राज प्रशाद  कम से कम इतना बड़ा तो होना चाहिए कि वह उनसे श्रेष्ठ न सही तो कमसे कम सम कक्ष तो हो ..! इसी तथ्य के आधार पर भारतीय संसद भवन के निर्माण कि स्वीकृति मिली !
अर्थात जिस देश में लगातार हजारों राजाओं का राज्य एक साथ चला हो , उस देश का इतिहास महज चंद अध्यायों में पूरा हो गया ..? क्षेत्रफल , जनसँख्या और गुजरे  विशाल अतीत के आधार पर यह इतिहास महज राई भर भी नहीं है !न ही एतिहासिक तथ्य हैं , न हीं स्वर्णिम अध्याय ,न हीं शौर्य गाथाएं ...! सब कुछ जो भारत के मस्तक को ऊँचा उठता हो वह गायव कर दिया गया ..!! नष्ट कर दिया गया !!
इस्लाम के आक्रमण ने लिखित इतिहास जलाये 
यह एक सच और निर्विवाद तथ्य है कि इस्लाम ने जन्मते ही विश्व विजय कि आंधी चलाई उससे अक तरफ यूरोप और दूसरी तरफ पुर्व एसिया गंभीरतम  प्रभावित हुआ , जो भी पुराना लिखा था उसे जलाया गया ! बड़े बड़े पुस्तकालय नष्ट कर दिए गए | मगर जन श्रुतियों में इतिहास का बहुत बड़ा हिस्सा बचा हुआ था , जागा परम्परा ने भी इतिहास को बचा कर रखा था |  मगर इतिहास संकलन में इन पर गौर ही नहीं किया गया | 
 राजपूताना का इतिहास लिखते हुए कर्नल टाड कहते हैं कि " जब से भारत पर महमूद ( गजनी ) द्वारा आक्रमण होना प्रारम्भ हुआ , तब से मुस्लिम शासकों नें जो निष्ठुरता ; धर्मान्धता दिखाई ,उसको नजर में रखनें पर , बिलकुल आश्चर्य नहीं होता कि भारत में  इतिहास के ग्रन्थ बच नहीं पाए ! इस पर से यह असंभवनीय अनुमान निकलना भी गलत है कि हिन्दू लोग इतिहास लिखना जानते नहीं थे | अन्य विकसित देशों में इतिहास लेखन कि प्रवृति प्राचीन कल से पाई जाती थी ,तो क्या अति विकसित हिन्दू राष्ट्र में वह नहीं होगी ?" उन्होंने आगे लिखा है कि "जिन्होनें ज्योतिष - गणित आदि श्रम साध्य शास्त्र सूक्ष्मता और परिपूर्णता  के साथ अपनाये | वास्तुकला ,शिल्प ,काव्य ,गायन आदि कलाओं को जन्म दिया ,इतना ही नहीं ; उन कलाओं को / विद्याओं को नियम बध्दता ढांचे में ढाल कर उसके शास्त्र शुध्द अध्ययन कि पध्दति  सामनें रखी , उन्हें क्या राजाओं का चरित्र और उनके शासनकाल में घटित प्रसंगों को लिखने का मामूली काम करना न आता ..?  " 
हर ओर विक्रमादित्य ...
भारतीय और  सम्बध्द विदेशी इतिहास एवं साहित्य के पृष्ठों पर , भारतीय संवत , लोकप्रिय कथाओं ,ब्राह्मण - बौध्द और जैन साहित्य तथा जन श्रुतियों , अभिलेख (एपिग्राफी ) , मौद्रिक ( न्युमीस्टेटिक्स  ) तथा मालव और शकों की संघर्ष गाथा आदि में उपलब्ध विभिन्न स्त्रोतों तथा उनमें निहित साक्ष्यों का परिक्षण सिध्द करता है कि "ईस्वी पूर्व प्रथम शताब्दी में सम्राट विक्रमादित्य का अस्तित्व था , वे मालव गणराज्य के प्रमुख थे ,उनकी राजधानी उज्जैनी थी , उन्होंने मालवा को शकों के अधिपत्य से मुक्त करवाया था और इसी स्मृति में चलाया संवत विक्रम संवत कहलाता है | जो प्रारंभ में कृत संवत , बाद में मालव संवत ,सह्सांक संवत और अंत में विक्रम संवत के नाम से स्थायी रूप से विख्यात हुआ | "
धर्म युध्द जैसा विरोध क्यों ....
डा. राजबली पाण्डेय जो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर तथा पुरातत्व विभाग के थे , उन्होंने एक टिप्पणी में कहा कि पाश्चात्य इतिहासकार और उनके भारतीय अनुचर विक्रमादित्य के नाम को सुन कर इस तरह से भड़क उठातें हैं कि जैसे कोई धर्मयुध्द का विषय हो ! वे  इतनें दृढ प्रतिज्ञ हो जाते हैं कि सत्य के प्रकाशमान तथ्यों को भी देखना और सुनना नहीं चाहते | डा.पाण्डेय ने विक्रमादित्य पर अंग्रेजी में कई खोज परख लेख लिखे, जिस पर उन्हें राष्ट्रिय स्तर के सम्मान से भी पुरुस्कृत किया गया तथा एक अनुसन्धान परक पुस्तक " विक्रमादित्य" लिखकर यह साबित किया है कि विक्रमादित्य न केवल उज्जैन के सम्राट थे अपितु वे एशिया महाद्वीप के एक बड़े भूभाग के विजेता और शासक थे | 
भविष्य पुराण में संवत प्रवर्तक 
भविष्य पुराण में संवत प्रवर्तक विक्रमादित्य और संवत प्रवर्तक शालिवाहन का जो संक्षिप्त वर्णन मिलाता है , वह इस प्रकार से है "अग्निवंश के राजा अम्बावती नामक पूरी ( कालांतर में यही स्थान उज्जैन कहलाया ) में राज्य करते थे | उनमें एक राजा प्रमर  (परमार) हुए , उनके पुत्र महामर (महमद) ने तीन वर्षें तक , उसके पुत्र देवासि ने भी तीन वर्षों तक ,उसके पुत्र देवदूत ने भी तीन वर्षों तक , उनके पुत्र गंधर्वसेन ने पचास वर्षों तक, राज्य कर वानप्रस्थ लिया | वन में उनके पुत्र विक्रमादित्य हुआ उसने सौ वर्षों तक , विक्रमादित्य के पुत्र देवभक्त ने दस वर्षों तक ,देव भक्त को सकों ने पराजित कर मार दिया , देवभक्त का पुत्र शालिवाहन हुआ और उसनें शकों को फिरसे जीत कर साथ वर्षों तक राज किया |" इसी पुराण में इस वंश के अन्य शासक शालिवर्ध्दन,शकहन्ता , सुहोत्र, हविहोत्र,हविहोत्र के पुत्र इन्द्रपाल ने इन्द्रावती के किनारे नया नगर वसाया (जो इंदौर के नाम से प्रशिध्द है ) , माल्यवान ने मलयवती वसाई, शंका दत्त , भौमराज , वत्सराज , भोजराज , शंभूदत्त , बिन्दुपाल ने बिंदु खंड ( बुन्देल खंड )का निर्माण किया | उसके वंश में राजपाल , महीनर , सोम वर्मा , काम वर्मा , भूमिपाल , रंगपाल , कल्प सिंह हुआ और उसने कलाप नगर वसाया ( कालपी ) उसके पुत्र गंगा सिंह कुरु क्षेत्र में निः संतान मरे गए | 
४०० वर्षों का लुप्त इतिहास ...
ब्रिटश इतिहासकार स्मिथ आदि ने आंध्र राजाओं से लेकर हर्षवर्धन के राज्यकाल में कोई एतिहासिक सूत्र नहीं देखते | प्रायः चार सौ वर्षों के इतिहास को घोर अंधकार मय मानते हैं |  पर भविष्य पुराण में जो वंश वृक्ष निर्दिष्ट हुआ है , यह उन्ही चार सौ वर्षों के लुप्त कल खंड से सम्बध्द है |  इतिहासकारों को इससे लाभ उठाना चाहिए |
भारत में विक्रमादित्य अत्यन्त प्रसिध्द , न्याय प्रिय , दानी , परोपकारी और सर्वांग सदाचारी राजा हुए हैं | स्कन्ध पुराण और भविष्य पुराण ,कथा सप्तशती , वृहत्कथा और द्वात्रिश्न्त्युत्तालिका,सिंहासन बत्तीसी , कथा सरितसागर , पुरुष परीक्षा , शनिवार व्रत  की कथा आदि ग्रन्थों में इनका चरित्र आया है | बूंदी के सुप्रशिध्द इतिहासकार सूर्यमल्ल मिश्रण कृत वंश भास्कर में परमार वंशीय राजपूतों का सजीव वर्णन मिलता है इसी में वे लिखते हैं "परमार वंश में राजा गंधर्वसेन से भर्तहरी और विक्रमादित्य नामक तेजस्वी पुत्र हुए, जिसमें विक्रमादित्य नें धर्मराज युधिष्ठर के कंधे से संवत का जुड़ा उतार कर अपने कंधे पर रखा | कलिकाल को अंकित कर समय का सुव्यवस्थित गणितीय विभाजन का सहारा लेकर विक्रम संवत चलाया |" | वीर सावरकर ने इस संदर्भ में लिखा है कि एक इरानी जनश्रुति है कि ईरान के राजा मित्रडोट्स जो तानाशाह हो अत्याचारी हो गया था का वध विक्रम दित्य ने किया था और उस महान विजय के कारण विक्रम संवत प्रारम्भ हुआ |
संवत कौन प्रारंभ कर सकता है 
यूं तो अनेकानेक संवतों का जिक्र आता है और हर संवत भारत में चैत्र प्रतिपदा से ही प्रारम्भ होता है | मगर अपने नाम से संवत हर कोई नहीं चला सकता , स्वंय के नाम से संवत चलने के लिए यह जरुरी है कि उस राजा के राज्य में कोई भी व्यक्ति / प्रजा कर्जदार नहीं हो ! इसके लिए राजा अपना कर्ज तो माफ़ करता ही था तथा जनता को कर्ज देने वाले साहूकारों का कर्ज भी राज कोष से चुका कर जनता को वास्तविक कर्ज मुक्ति देता था | अर्थात संवत नामकरण को भी लोक कल्याण से जोड़ा गया था ताकि आम जनता का परोपकार करने वाला ही अपना संवत चला सके | सुप्रशिध्द इतिहासकार सूर्यमल्ल मिश्रण कि अभिव्यक्ति से तो यही लगता है कि सम्राट धर्मराज युधिष्ठर के पश्चात विक्रमादित्य ही वे राजा हुए जिन्होनें जनता का कर्ज (जुड़ा ) अपने कंधे पर लिया | इसी कर्ण उनके द्वारा प्रवर्तित संवत सर्वस्वीकार्य हुआ |  
४००० वर्ष पुरानी उज्जनी ...
अवंतिका के नाम से सुप्रसिध्द यह नगर श्री कृष्ण के बाल्यकाल का शिक्षण स्थल रहा है , संदीपन आश्रम यहीं है जिसमें  श्री कृष्ण, बलराम और सुदामा का शिक्षण हुआ था | अर्थात आज से कमसे कम पांच हजार वर्षों से अधिक पुरानी यह नगरी है | दूसरी प्रमुख बात यह है कि अग्निवंश के परमार राजाओ कि एक शाखा चन्द्र प्र्ध्दोत नामक सम्राट ईस्वी सन के ६०० वर्ष पूर्व सत्तारूढ़ हुआ अर्थात लगभग २६०० वर्ष पूर्व और उसके वंशजों नें तीसरी शताव्दी तक राज्य किया | इसका अर्थ यह हुआ कि ९०० वर्षो तक परमार राजाओं का मालवा पर शासन रहा | तीसरी बात यह है कि कार्बन डेटिंग पध्दति से उज्जेन नगर कि आयु ईस्वी सन से २००० वर्ष पुरानी सिध्द हुई है , इसका अर्थ हुआ कि उज्जेन नगर का अस्तित्व कम से कम ४००० वर्ष पूर्व का है | इन सभी बातों से सवित होता है कि विक्रमादित्य पर संदेह गलत है | 

नवरत्न ...
सम्राट विक्रमादित्य कि राज सभा में नवरत्न थे .., ये नो व्यक्ति तत्कालीन विषय विशेषज्ञ थे | संस्कृत काव्य और नाटकों के लिए विश्व प्रशिध्द कालिदास , शब्दकोष (डिक्सनरी) के निर्माता अमर सिंह , ज्योतिष में सूर्य सिध्दांत के प्रणेता तथा  उस युग के प्रमुख ज्योतिषी वराह मिहिर थे, जिन्होंने विक्रमादित्य की बेटे की मौत की भविष्यवाणी की थी | आयुर्वेद के महान वैध धन्वन्तरी , घटकर्पर , महान कूटनीतिज्ञ बररुची जैन , बेताल भट्ट , संकु  और क्षपनक आदि द्विव्य विभूतियाँ थीं | बाद में अनेक राजाओं ने इसका अनुशरण कर विक्रमादित्य पदवी धारण की एवं नवरतनों  को राजसभा में स्थान दिया | इसी वंश के राजा भोज से लेकर अकबर तक की राजसभा में नवरतनों  का जिक्र  है |

वेतालभट्ट एक धर्माचार्य थे. माना जाता है कि उन्होंने विक्रमादित्य को सोलह छंदों की रचना "नीति -प्रदीप" (Niti-pradīpa सचमुच "आचरण का दीया") का श्रेय दिया है.
विक्रमार्कस्य आस्थाने नवरत्नानि
धन्वन्तरिः क्षपणको मरसिंह शंकू वेताळभट्ट घट कर्पर कालिदासाः। ख्यातो वराह मिहिरो नृपते स्सभायां रत्नानि वै वररुचि र्नव विक्रमस्य।।