गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

भ्रष्टाचार और गरीवी : फ़िलहाल बातें ही बातें ...

भ्रष्टाचार और गरीवी : फ़िलहाल   बातें  ही बातें ...
भ्रष्टाचार के विरुद्ध तब तक कोई भी कामयाब नहीं हो सकता , जब तक की हम हर व्यक्ति के १८ साल के (वयस्क )होनें पर संपत्ति को रिकार्ड करें ..,और हर साल दर साल  यह रिकार्ड होना चाहिए .., तभी यह नियंत्रण हो सकता है ..! वर्त्तमान में सरकार सम्पत्ति के रिकार्ड की पुख्ता व्यवस्था नहीं करती .., इसी कारण सारी चोर बजारी चल रही है ..! अन्ना हजारे की कोई भी मुहीम आम आदमी के काम की नहीं है .., क्यों की आम आदमी को चाहिए सम्पत्ति और संसाधनों में हिस्सेदारी .., जो क़ी उनकी मांग में शामिल नहीं है ..! देश के आम आदमी के लिए कुछ किये बिना देश की तक़दीर और तस्वीर नहीं बदल सकती ..!
अरविन्द सिसोदिया , कोटा, राजस्थान |
9414180151

Anna hazare........




http://www.indiareport.com/India-usa-uk-news/latest-news/1025914/National/1/22/1
New Delhi (07 Apr ,2011),(PTI).
 
Social activist Anna Hazare's fast-unto-death entered the third day here Thursday even as a large number of people from various walks of life continued to extend support to the crusader for a stronger anti-corruption law.,


72-year-old Hazare's protest has led to the resignation of Agriculture Minister Sharad Pawar from the Group of Ministers on corruption after the Gandhian took potshots at him.

Prime Minister Manmohan Singh had yesterday discussed with some Cabinet colleagues the issue after which indications emerged that one or two ministers could be nominated to talk to the activist.

The general sense at the informal confabulations was that there was a need to defuse the situation that had arisen due to the fast-unto-death campaign launched on Tuesday which is getting support from the increasing number of people.

Asked if Hazare has been contacted by any one from the government, an aide of the activist said,"As of now we have not received any intimation from the government, we have read reports in this regard in the media only".

The aide said,"The fast was still on. Hazare is in perfect health".

Doctors are checking Hazare twice a day to keep a tab on his health.

Hazare had yesterday shot off a letter to Prime Minister Manmohan Singh, slamming the reaction of his government and Congress to his indefinite fast on Lokpal Bill issue, and urged him to show courage to take unprecedented steps to fight the menace.

Responding to Congress'criticism that his protest was"premature", he said authorities resort to"malicious slandering"whenever cornered and asserted that he was not a kind of person who could be"instigated"into going on an indefinite fast.

Since the fast started on Tuesday, people from all walks of life including students, senior citizens, actors, executives and activists are converging at the Jantar Mantar, the hotspot of protests in the capital, to lend support to the movement.

However, some politicians like Ajit Singh, Uma Bharti and OP Chautala who wanted to make common cause with the social activist and share the dais with him were shouted out by his supporters and had to make a hasty retreat. Hazare said the indefinite hunger strike does not have a political tone.

The activist is demanding enactment of Jan Lokpal Bill as the legislation proposed by the government was not adequate and lacked teeth. He has maintained that a joint committee, comprising representatives of the government and civil society, should be set up to firm up the bill.

Government has already set up a sub-group of four ministers within the Group of Ministers on anti-corruption to take on board the suggestions of civil society.

Hazare said he was not averse to dialogue but such discussions should take place with those who have power to take decisions.

"When did we say no to dialogue. Dialogue should take place with those who have power to take decisions, whether (Congress chief) Sonia Gandhi or Prime Minister (Manmohan Singh),"he said.

Hazare was of the view that there was no point in talking to any committee which has no power to take major decisions.

"They cannot take major decisions,"he said in an apparent reference to the Group of Ministers on corruption.

"What we demand is a joint committee with 50 percent representation from our side. Set up a joint committee and start drafting the Lokpal Bill,"he said.

Meanwhile, RTI activist Arvind Kejriwal said Hazare's blood pressure was a little high today and doctors have advised him not to speak too much.

"He has been asked to take rest. Otherwise he is fine,"he said, adding some of the activists on hunger strike along with Hazare have been taken to hospital for check-up.

अन्ना हजारे कौन है ..?


- अरविन्द सिसोदिया 
* अन्ना हजारे कौन है यह प्रश्न हर शख्स के मन में गूँज सकता है , ये छोटे महात्मा गांधी के नाम से जाने जाते  हैं , इनका नाम महाराष्ट्र में बहुत है !इन पर प्रकाशित सामग्री के आधार पर एज परिचय., प्रस्तुत है ..!!
(आज तक के साभार से ....) अन्ना  हजारे का वास्‍तविक नाम किसन बाबूराव हजारे है.15 जून 1938 को महाराष्ट्र के अहमद नगर के भिंगर कस्बे में जन्मे अन्ना हजारे का बचपन बहुत गरीबी में गुजरा. पिता मजदूर थे, दादा फौज में थे. दादा की पोस्टिंग भिंगनगर में थी. अन्ना के पुश्‍तैनी गांव अहमद नगर जिले में स्थित रालेगन सिद्धि में था. दादा की मौत के सात साल बाद अन्ना का परिवार रालेगन आ गया. अन्ना के 6 भाई हैं.
परिवार में तंगी का आलम देखकर अन्ना की बुआ उन्हें मुम्बई ले गईं. वहां उन्होंने सातवीं तक पढ़ाई की. परिवार पर कष्टों का बोझ देखकर वह दादर स्टेशन के बाहर एक फूल बेचनेवाले की दुकान में 40 रुपये की पगार में काम करने लगे. इसके बाद उन्होंने फूलों की अपनी दुकान खोल ली और अपने दो भाइयों को भी रालेगन से बुला लिया.
छठे दशक के आसपास वह फौज में शामिल हो गए. उनकी पहली पोस्टिंग बतौर ड्राइवर पंजाब में हुई. यहीं पाकिस्तानी हमले में वह मौत को धता बता कर बचे थे. इसी दौरान नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से उन्होंने विवेकानंद की एक पुस्‍तक 'कॉल टु दि यूथ फॉर नेशन' खरीदी और उसको पढ़ने के बाद उन्होंने अपनी जिंदगी समाज को समर्पित कर दी. उन्होंने गांधी और विनोबा को भी पढ़ा.
1970 में उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प किया. मुम्बई पोस्टिंग के दौरान वह अपने गांव रालेगन आते-जाते रहे. जम्मू पोस्टिंग के दौरान 15 साल फौज में पूरे होने पर 1975 में उन्होंने वीआरएस ले लिया और गांव में आकर डट गए. उन्होंने गांव की तस्वीर ही बदल दी. उन्होंने अपनी जमीन बच्चों के हॉस्टल के लिए दान कर दी.
आज उनकी पेंशन का सारा पैसा गांव के विकास में खर्च होता है. वह गांव के मंदिर में रहते हैं और हॉस्टल में रहने वाले बच्चों के लिए बनने वाला खाना ही खाते हैं. आज गांव का हर शख्स आत्मनिर्भर है. आस-पड़ोस के गांवों के लिए भी यहां से चारा, दूध आदि जाता है. गांव में एक तरह का रामराज है. गांव में तो उन्होंने रामराज स्थापित कर दिया है. अब वह अपने दल-बल के साथ देश में रामराज की स्थापना की मुहिम में निकले हैं.
(आज तक के साभार से ....)
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अन्ना हजारे ने 1975 से सूखा प्रभावित रालेगांव सिद्धि में काम शुरू किया। वर्षा जल संग्रह, सौर ऊर्जा, बायो गैस का प्रयोग और पवन ऊर्जा के उपयोग से गांव को स्वावलंबी और समृद्ध बना दिया। यह गांव विश्व के अन्य समुदायों के लिए आदर्श बन गया है।
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* सन् १९९२ में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था।
* इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र पुरस्कार (१९८६)
* महाराष्ट्र सरकार का कृषि भूषण पुरस्कार (१९८९)
* पद्मश्री (१९९०)
* विश्व बैंक का 'जित गिल स्मारक पुरस्कार' (२००८)
* सूचना के अधिकार के लिये कार्य करने वालों में वे प्रमुख थे। 
* वे भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई करने के लिये भी प्रसिद्ध हैं।
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अन्ना हजारे ... बेचारे ..!
By
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 http://visfot.com/ Anna 
अन्ना हजारे ने अपने पूर्व घोषित निर्णय के अनुसार जन लोकपाल विधेयक लाने हेतु सरकार पर दबाव बनाने और जन समर्थन को जुटाने के लिए 5 अप्रैल से दिल्ली के जंतर मंतर पर आमरण अनशन शुरू कर दिया। उनके बैनरों पर लिख हुआ है- भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनयुद्ध। अन्ना हजारे ने इससे पहले भी महाराष्ट्र राज्य में भ्रष्टाचार के विरोध में इस गान्धीवादी तरीके का सफल प्रयोग किया है और उस राज्य के कई मंत्रियों को उनके पद से हटने के लिए मजबूर किया है। श्री हजारे सत्ता की राजनीति नहीं करते और उनका साफ सुथरा जीवन इतिहास उनको गान्धीवाद का सच्चा प्रतिनिधि दर्शाता है। लेकिन पता नहीं कि उनके अहिंसक आन्दोलन के बैनरों पर जनयुद्ध लिखवाने वाले कौन हैं और क्या चाहते हैं?
पिछले अभियानों के विपरीत, इस बार अन्ना हजारे का उक्त अनशन किसी व्यक्ति विशेष के भ्रष्टाचार या किसी काण्ड विशेष के खिलाफ नहीं है, अपितु यह अनशन भ्रष्टाचार के पहचाने गये आरोपियों को सजा सुनिश्चित करने के लिए है। उनकी माँगों के मुख्य बिन्दु हैं– (1) निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट की तरह सरकार से स्वतंत्र केन्द्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन जो किसी भी मुकदमे की जाँच को एक साल में पूरी करके दो साल के अन्दर सम्बन्धित को जेल भेजना सुनिश्चित करे। इनके सदस्यों की नियुक्ति पारदर्शी तरीके से नागरिकों और संवैधानिक संस्थाओं द्वारा की जाये। वर्तमान की संस्थाएं जैसे सीवीसी, सीबीआई, भ्रष्टाचार निरोधक विभाग, आदि का विलय भी लोकपाल में कर दिया जाये। (2) अपराध सिद्ध होने पर सरकार को हुए घाटे को सम्बन्धित से वसूल किया जाये। और (3) किसी सरकारी कार्यालय से अगर किसी नागरिक का काम तय समय सीमा में नहीं हो तो दोषी पर जुर्माना लगाया जाये जो पीड़ित को मुआवजे के रूप में मिले।

दरअसल अन्ना हजारे की ये माँगें ऐसी जरूर हैं जिनके पूरे होने की इच्छा आज देश के सभी नागरिकों के मन में है किंतु ये माँगें एक शुभेक्षा से अधिक कुछ भी सिद्ध नहीं होने जा रही हैं, क्योंकि ये भ्रष्टाचार की जड़ पर कोई विचार नहीं करतीं अपितु हो चुके भ्रष्टाचार के पकड़ में आये अपराधियों को सजा दिलाने के लिए एक नया कानून और एक नयी संस्था के गठन से आगे नहीं जातीं। ऐसा लगता है कि वे मानते हैं कि जाँच एजेंसियों के काम करने के सुस्त तरीके और दण्ड प्रक्रिया की त्रुटियों के कारण भ्रष्टाचार हो रहा है, जबकि ऐसा नहीं है। उन्होंने महाराष्ट्र राज्य में कतिपय मंत्रियों को पद त्याग का जो दण्ड दिलवाया क्या उससे महाराष्ट्र में मंत्री स्तर का भ्रष्टाचार रुक गया? सूचनाएं बताती हैं कि उसके बाद भी भ्रष्टाचार यथावत रहा अपितु कई मामलों में तो और बढ गया। सीबीआई जैसी जाँच एजेंसी के बारे में भी आरोप लगता है कि वो केन्द्र सरकार के हाथ का खिलोना होकर रह गयी है। परमाणु विधेयक पास होने के दौरान सदन में जो नोटों के बण्डल दिखाये जाने की शर्मनाक घटना हुयी थी  उसकी जाँच के लिए संसदीय जाँच समिति बनी थी जो किसी निर्णय पर नहीं पहुँच सकी थी।
किसी भी लोकतंत्र में कानून बनाने और उन कानूनों को पालन कराने के लिए सरकार के गठन का काम जनता से चुने हुए जनप्रतिनिधि करते हैं, और जब तक जनता सही और ईमानदार प्रतिनिधि चुनने के लिए सुशिक्षित, संकल्पित और सक्षम नहीं होती तब तक न तो सही कानून बन सकते हैं और ना ही उनको पालन कराने वाली संस्थाएं ही सही काम कर सकती हैं। अदालत में वकीलों के द्वारा प्रत्येक घटना की व्याख्या अपने मुवक्किल के हितानुसार की जा सकती है, और न्यायालय एक पसंदीदा बहस के पक्ष में फैसला सुना सकता है। सबूत तो सरकार की एजेंसियाँ ही जुटाती और प्रस्तुत करती हैं तथा गवाहों को किसी भी स्तर पर अपने बयानों से मुकरने की सुविधा उपलब्ध है। लाखों  मुकदमों में गवाहों ने कहा होगा कि जो बयान पुलिस ने प्रस्तुत किया है वह उसने दिया ही नहीं या पुलिस ने उससे दबाव डालकर जबरदस्ती दिलवा दिया था। रोचक यह होता है कि गवाह की बात को स्वीकार करने वाली अदालतें सम्बन्धित पुलिस अधिकारी के खिलाफ कोई आदेश पारित नहीं करतीं जिसके द्वारा ऐसा गैर कानूनी काम अगर किया गया है तो एक गम्भीर अपराध है। पिछले दिनों एक सच्ची घटना पर बनी फिल्म का नाम अदालती व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य करने वाला था। फिल्म का नाम था- नो वन किल्लड् जेसिका। देश की राजधानी में सैकड़ों सम्भ्रांत लोगों के बीच एक काम करने वाली लड़की की हत्या हो जाती है। हत्यारे के प्रभाव के कारण उपस्थित सम्भ्रांत लोग गवाही नहीं देते और जिन साधरण लोगों ने दी होती है वे बदल जाते हैं, परिणामस्वरूप अदालत किसी को भी जिम्मेवार नहीं ठहरा पाती। इसलिए फिल्मकार उसका नाम देता है, नो वन किल्ल्ड जेसिका।

हमारी अदालतों में एक नहीं अपितु किसी को भी जिम्मेवार न ठहराने वाले हजारों फैसले प्रति माह होते हैं। गुजरात में सरे आम हजारों मुसलमानों का नरसंहार कर दिया गया किंतु अदालत से किसी को भी सजा नहीं मिल सकी। मध्य प्रदेश में टीवी कैमरों के सामने हुए सव्वरवाल हत्याकाण्ड के प्रकरण में मुकदमे को प्रदेश से बाहर ले जाकर भी न्याय नहीं हो सका क्योंकि प्रकरण को प्रस्तुत करने वाले सजा दिलाना ही नहीं चाहते थे। इसलिए सवाल एक नये कानून के बनने या नई जाँच एजेंसी खड़ी करने भर का नहीं है अपितु एक जन चेतना पैदा करने और उस चेतना के लोकतांत्रिक प्रभाव को सफल बनाने का भी है। अन्ना हजारे का उक्त अभियान उस दिशा में कुछ नहीं कर रहा। सत्त्ता और विपक्ष दोनों ही अपने चुनावी मुद्दे के रूप में एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाते हैं किंतु सरकार बदलने के बाद नई सरकार पिछली सरकार के खिलाफ कुछ भी नहीं करती।  पूर्व सता पक्ष जो अब विपक्ष में आ चुका होता है तत्कालीन सत्तापक्ष पर वैसे ही आरोप दुहराने लगता है। वे सत्ता में रहते हुए एक जैसे काम करते हैं। विपक्ष में बैठे हुए जो लोग भी अन्ना हजारे के पक्ष में दिखने की कोशिश कर रहे हैं। वे भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए नहीं अपितु उसके नाम पर अपने लिए सत्ता का रास्ता सुगम करने के लिए ऐसा कर रहे हैं।

भ्रष्टाचार इस व्यवस्था का सहज उत्पादन है और जब तक व्यवस्था को आमूलचूल बदलने का अभियान नहीं छेड़ा जायेगा तब तक भ्रष्टाचार का कुछ नहीं बिगड़ने वाला। अन्ना हजारे का यह अभियान भले ही वह लक्ष्य न प्राप्त कर सके जिसके लिए यह छेड़ा गया है किंतु व्यवस्था परिवर्तन के लिए होने वाले भावी आन्दोलन की पहली सीड़ी तो बन ही सकता है। इसकी असफलता यदि उत्साह को कम नहीं करे तो अगले अभियान का सूत्रपात करेगी। अभी यह जनयुद्ध नहीं है किंतु जनयुद्ध की शुरुआत ऐसे भी हो सकती है।
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गणगौर



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गोर गोर गोमती
ईश्वर पूजे पार्वती 
पार्वती का आला लीला
गोर को सोना का टीला
टीला दे टपका रानी
व्रत करे गोरा दे रानी
करते-करते आस आयो मास आयो
खेडे खाण्डे लाडू आए 
लाडू ने बीरा ने दियो बीरो लेम्हेन साड़ी
साड़ी में सिंगोड़ा बाड़ी में बिजोरा
राण्या पूजे राज मेंन्हका सवाग में
स्वाग भाग कीड़ी ये, कीड़ी थारी जात है
जात पड़े गुजरात है
गुजरात्यारो पाणी आयो
दे दे खूटया ताणी आयो
आँखा फूल कमल की डोरी

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खेलन देओ गणगौर, पूजन देओ गणगौर, भँवर म्हाने पूजन खेलन देओ गणगौर। राजस्थान में आजकल हर गली-मोहल्ले चौबारे में यह गीत सुनने को मिल जाएगा। यह है रंग-रंगीले राजस्थान की लोक संस्कृति की एक बानगी। जब मेले-त्योहार की बात चले और राजस्थान का नाम जुबाँ पर नहीं आए, यह तो हो नहीं सकता। आखिर राजस्थान का दूसरा नाम है ही लोक संगीत, त्योहार और मेले। 

चैत्र मास में रंगों का त्योहार होली दहन के दूसरे दिन से ही सजी-धजी चहकती नवयौवनाएँ सोलह श्रृंगार किए नवविवाहिताएँ उमंग उल्लास से एक-दूसरी सहेली से हँसी- मजाक ठिठोली करते हुए 'बाड़ी ताला बाड़ी की किवाड़ी खोल, छोरियाँ आई दूब ने, थे कुणजी री बेटी हो, थे कुणजी री भैणा हो, काई थारो नाम है, म्हे बिरया दासजी री बेटी हूँ, रोवा म्हारो नाम है' लोकसंगीत गाती हुई मिल जाएँगी। 

नवयौवनाएँ कन्याएँ तथा विवाहिताएँ अपने कलश को दूब और रंगीले फूलों से सजाते हुए अपने अंदाज में अपने भँवर को लेकर मजाक करती हुई गीत गुनगुनाती रहती हैं। पानी भरे कलश को हरी-हरी दूब से सजाकर इठलाती हुई बगीचे से गौर (पार्वती) और ईसर (शिव) को पूजने के लिए चल पड़ती हैं। 

किंवदंती है कि युवती जिस भावना के साथ गणगौर की पूजा करेगी, उसको वैसा ही प्रियतम मिलेगा। नवविवाहित महिलाएँ अखंड सौभाग्य व सुहाग और नवयौवनाएँ इच्छित वर प्राप्ति के लिए सोलह दिन तक गणगौर पूजती हैं। गणगौर पूजने के पहले दिन महिलाएँ, नवयौवनाएँ मिट्टी के एक बर्तन में जौ और गेहूँ बोती हैं। सोलहवें दिन वे इन्हीं ज्वारों से गौर व ईसर की पूजा करती हैं। 

एक पखवाड़े तक नियत समय पर ईसर-गौर की पूजा करके महिलाएँ अपने अमर सुहाग और नवयौवनाएँ मनचाहा पति पाने की कामना करती हैं। नवयौवनाएँ गौरा को अपनी बहन और ईसर को अपना जीजासा मानकर पूजा करती हैं।

गणगौर से एक दिन पहले लड़कियों एवं महिलाओं का सिंजारा होता है। इस दिन महिलाएँ सोलह श्रृंगार में सजी-धजी नजर आती हैं। सिंजारे पर नवविवाहितों के मायके से कपड़े और मिठाई आती है तो सगाई हो चुकी युवतियों के ससुराल से कपड़े और मिठाई, गुणे, घेवर भेजने का प्रचलन है।

गणगौर के दिन सजी-धजी कुँवारियाँ, सोलह श्रृंगार किए नवविवाहिताएँ एवं महिलाएँ गौरा-ईसर की पूजा करती हैं। गणगौर के दिन आम प्रचलित लोकगीत गाया जाता है, जिसमें नायिका अपने प्रियतम (भँवर) से गणगौर पूजने जाने का अनुरोध करती हुई गाती हैं 'खेलन देओ गणगौर, भँवर म्हाने खेलन देओ गणगौर, म्हारी सहेल्याँ जोवै बाट, भँवर म्हाने खेलन देओ गणगौर.... 

राजस्थान में जोधपुर, जयपुर, किशनगढ़, उदयपुर, नाथद्वारा में गणगौर मनाए जाने की अलग- अलग परंपराएँ हैं। गुलाबी नगरी जयपुर में अकेली गौर (गणगौर) की सवारी निकलती है। इतिहासविदों के अनुसार रजवाड़ों के शासन में जयपुर में ईसर गणगौर की सवारी निकलते समय किशनगढ़ के नरेश नीले अश्व पर ईसर की प्रतिमा जबरन उठाकर ले गए थे। तभी से जयपुर में गणगौर की अकेली सवारी निकलती है।

किशनगढ़ में ईसर-गणगौर की सवारी निकलती है। करीब दो दशक पूर्व किशनगढ़ में गणगौर पर्व पर एक पखवाड़े तक घूमर सहित अन्य सांस्कृतिक आयोजन होते थे, लेकिन पूर्व महाराजा सुमेरसिंह की हत्या के बाद से अब केवल गणगौर-ईसर की सवारी ही निकलती है।

जयपुर में गणगौर की सवारी देखते ही बनती है। पूरे शाही लबाजमे में कड़े सुरक्षा प्रबंधन के बीच गणगौर की सवारी निकलती है। भारत की संस्कृति से रूबरू होने के लिए हर साल हजारों देशी एवं विदेशी पर्यटक गणगौर के पर्व पर जयपुर आते हैं। 

इतिहासविदों के अनुसार उदयपुर में राज परिवार की ओर से गणगौर का पर्व शानदार ढंग से मनाया जाता है। पूरे लबाजमे से पूर्व राज परिवार के निवास से गणगौर की सवारी निकलकर पिछौला झील तक जाती है। पिछौला झील पहुँचने पर गणगौर को नौका विहार करवाया जाता है। 

नाथद्वारा में एक सप्ताह तक गणगौर समारोह मनाया जाता है। हर दिन गणगौर अलग श्रृंगार में नजर आती है वहीं जोधपुर में गणगौर पर्व पर ईसर गौर की सवारी निकलती है। नाथद्वारा में गणगौर पर्व की खासियत है कि गणगौर प्रतिमा को जिस रंग के वस्त्र धारण कराए जाते हैं उसी रंग के कपड़े में आम जन भी नजर आएँगे। 

इतिहासविदों के अनुसार गरासिया भील जाति में मौजूदा समय भी गणगौर पर्व पर स्वतंत्र रूप से अपना जीवन साथी चुनने की परंपरा है। यह परंपरा अभी भी जारी है। भील समाज की जाति पंचायत भी इसको स्वीकार करती है। 

सोलहवें दिन गणगौर की पूजा के बाद शाम को गणगौर को विसर्जन करने के बाद लौटते हुए 'गोरल ए तू आच्छी आ पाछी आ तनै बासई बिमला याद करे'। उदास मन से गाती हुई अपने घरों को लौट जाती हैं। 

प्रदेशभर में गणगौर पूर्व रियासत काल से मनाए जाने की परंपरा चल रही है। राज्य सरकार के पर्यटन विभाग ने कुछ साल पूर्व धूमधाम से इसे मनाए जाने की योजना तैयार की, लेकिन यह योजना अमली जामा नहीं ले सकी।

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राजसमन्द। राजसमन्द नगरपालिका के तत्वावधान में आयोजित राजस्थान के प्रमुख लोक पर्व गणगौर महोत्सव के पहले दिन राजसमन्द जिला मुख्यालय पर चून्दडी गणगौर सवारी परम्परागत रूप से पूरी शान-शौकत एवं धूमधाम से निकाली गई। सवारी देखने नर-नारियों की भीड उमड पडी।
गोधुली वेला से पूर्व ढलते सूरज की लाल, पीली रोशनी के बीच प्रभु द्वारिकाधीश मंदिर से श्रंृगारित गणगौर एवं सुखपाल में बिराजित भगवान श्री द्वारिकाधीश की सवारी ने मेला स्थल के लिए प्रस्थान किया तो वहां उपस्थित हजारों श्रद्धालुओं ने जयघोष कर वातावरण को गुंजायमान कर दिया।
शोभायात्रा में सबसे आगे ढोल नंगाडे, हाथी एवं उसके पीछे ऊंट पर स्थापित नंगाडे की गूंज सवारी देखने की प्रतिक्षा में मार्ग में खडे आबाल नर-नारियों को अधीर कर रहे थे। सवारी में सम्मिलित बडी संख्या में नन्हीं विद्यालयी बालिकाएं लहंगा लुंगडी पहने सिर पर जल कलश लिए होले-होले डग भरती शोभायात्रा को शोभायमान कर रही थी। वहीं शिव-पार्वती व राधा कृष्ण सहित विभिन्न देवी-देवताओं की आकर्षक झांकिया लोगो की धार्मिक आस्था को प्रगाढ बना रही थी। सवारी में ऊंट गाडियों पर सजी इन झांकियों ंमें धार्मिक एवं लोक संस्कृति को भी प्रदर्शित किया गया। सवारी के मध्य बग्गी एवं रथ पर कास्ट से बनी विभिन्न गणगौर प्रतिमाएं चून्दडी परिधानों में सजी अपनी अलग ही छटा बिखेर रही थी। परम्परानुसार सवारी में मंदिर निशान लिए घुडसवार, फौज पलटन थी जो रियासत काल की परम्परागत शाही गणगौर सवारी की याद ताजा कर रही थी वहीं दूसरी ओर ढोल नंगाडे एवं कच्छी घोडी नृतक अपनी नृत्यकला प्रदर्शनी से विशेष कौतूहल का नजारा लिए हुए थे।
सुखपाल में बिराजित भगवान द्वारिकाधीश को कंधे पर उठा चंवर ढुलाते श्रृद्धालु साथ चल रहे थे। नगर के वृद्धजन एवं युवा सहित चून्दडी की मेवाडी पाग व अंगर की पहने गले में गमछा डाले चल रहे श्रृद्धालु के रह रहकर गिरिराज धरण की जय, जय बोल श्री राधे.. पूछडी के लौठे की हूक बोल मेरे प्यारे.. के जयघोष से वातावरण गूंज रहा था। सवारी को देखने के लिए मार्ग के दोनो ओर तथा मकानों की छतों पर श्रृद्धालुओं की भीड जमा थी।
शोभायात्रा में पारंपरिक वेशभूषा में नगरपालिका चैयरमेन श्रीमती आशा पालीवाल, कांग्रेस के वरिष्ठ जिला उपाध्यक्ष प्रदीप पालीवाल, नगरपालिका उपाध्यक्ष अर्जुन मेवाड़ा नगरपालिका आयुक्त दिनेश कुलश्रेष्ठ सहित पार्षद एवं विभिन्न समाजों के प्रतिनिधि एवं नगरवासी साथ चल रहे थे। सवारी के कांकरोली सब्जी मंडी पहुंचने पर वहां स्थित सुखपाल की छतरी में प्रभु द्वारिकाधीश ने कुछ पल के लिए विश्राम किया। इस छतरी को विशेष रंगोली व विद्युत साज सज्जा में सजाया था। सवारी में शामिल घुडसवार, पालकी, एवं नृत्य रत घोडे के अलावा सेठ-सेठानी के प्रतिकों ने भी दर्शकों को मोहित किया। रंग-बिरंगी आकर्षक रोशनी से लकदक मेला प्रांगण में सवारी के पहुंचने पर धर्मप्राण महिलाओं ने गणगौर की पूजा कर झाले दिए तथा पारंपरिक गीत भंवर म्हाने पूजन दो गणगौर .. एवं म्हारी घूरम छै नखराली ओ माय घूमर रमवा ने जास्या के साथ .. घूमर नृत्य किया। मंच पर बिराजित प्रभु द्वारिकाधीश की पूजा अर्चना के बाद सवारी ने पुन: मंदिर के लिए प्रस्थान किया। सवारी के स्वागत में कांकरोली मुख्य चौपाटी पर विशाल स्वागत द्वार बनाया गया। इसके अतिरिक्त मेला प्रांगण के मुख्य द्वार तथा जगह-जगह कई स्वागत द्वार बनाए गए । मेला स्थल पर लगे हवाई झूले, डोलर व जादू खिलौने तथा चाट पकोडी का भी लोगों ने आनन्द उठाया।