मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

१३ अप्रेल : जालियाँवाला बाग हत्याकांड और उधम सिंह ने लिए थे बदला

- अरविन्द सिसोदिया
भारत के पंजाब प्रान्त के अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर के निकट जलियाँवाला बाग में १३ अप्रैल १९१९ (बैसाखी के दिन) हुआ था। रौलेट एक्ट का विरोध करने के लिए एक सभा हो रही थी जिसमें जनरल ओ. डायर नामक एक अँगरेज ऑफिसर ने अकारण उस सभा में उपस्थित भीड़ पर गोलियाँ चलवा दीं जिसमें १००० से अधिक व्यक्ति मरे और २००० से अधिक घायल हुए।

१३ अप्रैल १९१९ को डॉ. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी तथा रोलेट एक्ट के विरोध में अमृतसर के जलियाँवाला बाग में लोगों ने एक सभा रखी जिसमें उधमसिंह लोगों को पानी पिलाने का काम कर रहे थे। इस सभा से तिलमिलाए पंजाब के तत्कालीन गवर्नर माइकल ओ डायर ने अपने ही उपनाम वाले जनरल डायर को आदेश दिया कि वह भारतीयों को सबक सिखा दे। इस पर जनरल डायर ने ९० सैनिकों को लेकर जलियाँवाला बाग को चारों ओर से घेर लिया और मशीनगनों से अंधाधुँध गोलीबारी कर दी, जिसमें सैकड़ों भारतीय मारे गए। जान बचाने के लिए बहुत से लोगों ने पार्क में मौजूद कुएं में छलांग लगा दी। बाग में लगी पट्टिका पर लिखा है कि १२० शव तो सिर्फ कुए से ही मिले। आधिकारिक रूप से मरने वालों की संख्या ३७९ बताई गई जबकि पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार कम से कम १३०० लोग मारे गए। स्वामी श्रद्धानंद के अनुसार मरने वालों की संख्या १५०० से अधिक थी जबकि अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन डॉक्टर स्मिथ के अनुसार मरने वालों की संख्या १८०० से अधिक थी।
इस हत्याकाण्ड के विरोध में रवीन्द्र नाथ टागोर ने इस हत्याकाण्ड के विरोध में 'सर' की उपाधि लौटा दी और उधमसिंह ने लन्दन जाकर पिस्तौल की गोली से जनरल डायर को भून दिया और इस हत्या काण्ड का बदला लिया।

डायर को गोली मार कर उधम सिंह ने लिए थे बदला
http://hindi.webdunia.com/news/news/national/0807/30/1080730024_1.htm
जलियाँवाला बाग में निहत्थों को भूनकर अंग्रेज भारत की आजादी के दीवानों को सबक सिखाना चाहते थे, ताकि वह ब्रितानिया सरकार से टकराने की हिम्मत न कर सकें, लेकिन इस घटना ने स्वतंत्रता की चिंगारी को हवा देकर शोला बना दिया और इस बर्बर घटना को अंजाम देने वाला आतताई आजादी के मतवालों के ताप में भस्म हो गया।1899 में पंजाब में संगरूर जिले के सुनाम गाँव में जन्मे ऊधमसिंह के सिर से माँ-बाप का साया बचपन में ही उठ गया था। उनके जन्म के दो साल बाद 1901 में उनकी माँ का निधन हो गया और फिर 1907 में उनके पिता भी चल बसे।
माँ-बाप के साए से महरूम ऊधमसिंह और उनके बड़े भाई मुक्तासिंह को अमृतसर के खालसा अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। 1917 में उनके भाई का भी निधन हो गया। इस तरह ऊधमसिंह दुनिया के जुल्मों सितम झेलने के लिए बिलकुल तन्‍हा रह गए। इतिहासकार वीरेंद्र शरण के अनुसार ऊधमसिंह इन सब घटनाओं से दु:खी तो हुए, लेकिन उनकी हिम्मत और संघर्ष करने की ताकत बहुत बढ़ गई। उन्होंने शिक्षा जारी रखने के साथ ही आजादी की लड़ाई में कूदने की भी ठान ली।
उन्होंने चंद्रशेखर आजाद, राजगुरू, सुखदेव और भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ब्रिटिश हुक्मरान को ऐसी चोट दी जिसके निशान यूनियन जैक पर दशकों तक नजर आए। स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में सन 1919 का 13 अप्रैल का दिन आँसुओं से लिखा गया है, जब अंग्रेजों ने अमृतसर के जलियाँवाला बाग में सभा कर रहे भारतीयों पर अंधाधुंध गोलियाँ चलाकर सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतार दिया। मरने वालों में माओं के सीने से चिपटे दुधमुँहे बच्चे जीवन की संध्या वेला में देश की आजादी का ख्वाब देख रहे बूढ़े और देश के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार युवा सभी शामिल थे।
इस घटना ने ऊधमसिंह को झकझोर कर रख दिया और उन्होंने अंग्रेजों से इसका बदला लेने की ठानी। हिन्दू, मुस्लिम और सिख एकता की नींव रखने वाले ऊधमसिंह उर्फ राम मोहम्मद आजादसिंह ने इस बर्बर घटना के लिए माइकल ओ डायर को जिम्मेदार माना जो उस समय पंजाब प्रांत का गवर्नर था। गवर्नर के आदेश पर ब्रिगेडियर जनरल रेजीनल्ड, एडवर्ड हैरी डायर, जनरल डायर ने 90 सैनिकों को लेकर जलियांवाला बाग को चारों तरफ से घेर कर मशीनगनों से गोलियाँ चलवाईं।
ऊधमसिंह ने शपथ ली कि वह माइकल ओ डायर को मारकर इस घटना का बदला लेंगे। अपने मिशन को अंजाम देने के लिए ऊधमसिंह ने विभिन्न नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा की।
सन 1934 में ऊधमसिंह लंदन पहुँचे और वहाँ 9 एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड़ पर रहने लगे। वहाँ उन्होंने यात्रा के उद्देश्य से एक कार खरीदी और साथ में अपना मिशन पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी खरीद ली।
भारत का यह वीर क्रांतिकारी माइकल ओ डायर को ठिकाने लगाने के लिए उचित वक्त का इंतजार करने लगा। ऊधमसिंह को अपने सैकड़ों भाई बहनों की मौत का बदला लेने का मौका 40 में मिला। जलियाँवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में बैठक थी जहाँ माइकल ओ डायर भी वक्ताओं में से एक था।
ऊधमसिंह उस दिन समय से ही बैठक स्थल पर पहुँच गए। अपनी रिवाल्वर उन्होंने एक मोटी किताब में छिपा ली। इसके लिए उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवाल्वर के आकार में उस तरह से काट लिया, जिससे डायर की जान लेने वाला हथियार आसानी से छिपाया जा सके।
बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए ऊधमसिंह ने माइकल ओ डायर पर गोलियाँ दाग दीं। दो गोलियाँ डायर को लगीं, जिससे उसकी तत्काल मौत हो गई। गोलीबारी में डायर के दो अन्य साथी घायल हो गए।
ऊधमसिंह ने वहाँ से भागने की कोशिश नहीं की और अपनी गिरफ्तारी दे दी। उन पर मुकदमा चला। अदालत में जब उनसे पूछा गया कि वह डायर के अन्य साथियों को भी मार सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया।
ऊधमसिंह ने जवाब दिया कि वहाँ पर कई महिलाएँ भी थीं और भारतीय संस्कृति में महिलाओं पर हमला करना पाप है। 4 जून 1940 को ऊधमसिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फाँसी दे दी गई। इस तरह यह क्रांतिकारी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में अमर हो गया। 1974 में ब्रिटेन ने उनके अवशेष भारत को सौंप दिए। (भाषा)

झांसी की रानी की असली फोटो ...

- अरविन्द सिसोदिया