रविवार, 8 मई 2011

भावी माँ को बचाओ ...


- अरविन्द सिसोदिया 
आज मदर्स डे है .., पश्चिमी शब्द और माता के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अभिव्यक्ति का दिन ..!
भारतीय संस्कृति में माँ का सम्मान सर्वोपरी  है ..! यही वह समाज है जिसनें नारी सम्मान की एक श्रंखला रची है ! इसी कारण वर्तमान  भारतीय राजनीती में स्त्री युग कहा जा सकता है !  महामहिम राष्ट्रपति महोदया श्रीमती प्रतिभा  पाटिल , वर्तमान केंद्र सरकार यूं पी ए की तथा कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गाँधी , लोकसभा की अध्यक्षा मीरा कुमार , लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज , उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री मायावती , पश्चिम बंगाल में तृण  मूल  कांग्रेस की अध्यक्षा और रेल मंत्री ममता बनर्जी , राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष वसुधरा राजे ,ए आई डी एम् के की अध्यक्षा जयललिता .....आदि सहित अनगिनित महिला शखशियतें येशी हैं जिन के नाम गिनाये जा सकते हैं , जिन पर चर्चा की जा सकती है | 
   मगर दूसरा पक्ष ........यह भी है की आने वाली पीढ़ियों  को जन्म देने वाली माँ सत्ता  जबर्दस्त खतरे में हैं .., जनसँख्या के आंकड़े चीख चीख कर कहरहे हैं कि..भावी माँ को बचाओ ...आने वाले सिर्फ दस वर्षों में ही ज्यादर जातियों में लड़कियों कि भयंकरतम कमी होगी , बहुतसारे पुरुष कुवारे ही मरेंगे .., समाज में व्यभिचार बढेगा ! आनेवाला असंतुलन पांच पतियों कि एक पत्नी कि दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति कि और बढ़ रहा है |  महिला सशक्तिकरण  का सर्वोत्तम समय होनें के बावजूद यही सत्य है कि सम्पूर्ण महिला जाती का भविष्य अंधकारमय है !  और यही सर्वोत्तम समय है कि महिला वर्ग कि सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सकता है | समाज में उनके अनुपात को बढानें के लिए कानून से लेकर सुलभ सुरक्षा कवच तक व्यवस्थित किया जा सकता है |
   - भ्रूण हत्या , विधवा , परित्यकता , दहेज़ ,घरेलू हिंषा आदि शब्द नारी जाती का अपमान और अभिशाप  हैं , इनसे मुक्ति के लिए जरुरी है कि नारी का रोजगार परक सामाजिक संरक्षण इतना अधिक हो कि नारी के गर्भ  में होने पर माता पिता को डर या भय न हो ..!! बच्ची के भावी जीवन  के कष्टों के कारण ही जो भय उत्पन्न होता है वही भ्रूण हत्या का कारण है ! इस लिए जन्म से लेकर मरन तक कि सुनिश्चितता सरकार के स्तर पर व्यवस्थित होनी चाहिए ! जैसे कि उनकी शिक्षा बिलकुल मुफ्त , इलाज बिलकुल मुफ्त , नौकरी या  रोजगार की गारंटी , विवाह के साथ ही सम्पत्ति में बिना बिलम्ब ५० प्रतिशत की हिस्सेदारी , शोषण मुक्ति की देखरेख के लिए मोहल्ला या गाँव समितियां ..! बलात्कार पर मृत्यु दंड , अन्य महिला हितों से सम्बद्ध मामलों की सुनिश्चित अवधि में निर्णय ! दहेज़ प्रताणना , विवाह विच्छेद , घरेलु हिंषा आदि में एक माह में ही प्रारंभिक निर्णय और छैः माह में निर्णय हो ..! गुजरा भत्ता व्यवहारिक और सुनिश्चित भुगतान की व्यवस्था हो ..!! वर्तमान में नारी संरक्षण के सैंकड़ों उपायों की व्यवहारिक पालना के बजाये बेंचाखोची और उपेक्षा भाव बहुत अधिक है ! जो नारी के साथ उसके सम्पूर्ण परिवार की मानसिक वेदना और सामाजिक अपमान का कारण बनीं हुई है ! इसमें सुधर अवश्यसंभावी है !!  
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माँ एक अनुभूति, एक विश्वास, एक रिश्ता नितांत अपना सा। गर्भ में अबोली नाजुक आहट से लेकर नवागत के गुलाबी अवतरण तक, मासूम किलकारियों से लेकर कड़वे निर्मम बोलों तक, आँगन की फुदकन से लेकर नीड़ से सरसराते हुए उड़ जाने तक, माँ मातृत्व की कितनी परिभाषाएँ रचती है। स्नेह, त्याग, उदारता और सहनशीलता के कितने प्रतिमान गढ़ती है? कौन देखता है? कौन गिनता है भला? और कैसे गिने? ऋण, आभार, कृतज्ञता जैसे शब्दों से परायों को नवाजा जाता है। माँ तो अपनी होती है, बहुत अपनी सी।