शनिवार, 14 मई 2011

महंगाई डायन खाए जात है


  कांग्रेस  कितनी  खुदगर्ज पार्टी है .., पांच राज्यों के चुनाव में वोट लेने से पहले चुप रही और जैसे ही वोट झटके और अपनी लूट की आदत पर फिर आगई ..!  आज पेट्रोल के दम बड़ा दिए .. आगे पीछे डीजल और रसोई गैस के दाम भी बढायेंगे ..! जनता को इस ठग पार्टी के सच को पहचानना होगा ..! फिर वह गीत ....महंगाई डायन खाए जात है, याद आगया ......
- अरविन्द सिसोदिया 
यह गीत आमिर खान द्वारा निर्मित और अनुषा रिज़वी द्वारा निर्देशित फिल्म "पीपली लाइव" में शामिल किया गया है। मध्य प्रदेश के निवासी श्री गयाप्रसाद प्रजापति ने दावा किया है कि उन्होने इस लोकगीत की रचना की है।
अभिनेता श्री रघुवीर यादव ने इस कोरस गीत में मुख्य गायक के तौर पर योगदान दिया है और पर्दे पर वे ही इसे गाते हैं। आमिर खान के मुताबिक, रघुवीर यादवने इस लोक गीत में फिल्म की जरुरत के हिसाब से वहीं शूटिंग स्थल पर ही बदलाव किये और इसे फिल्म में उपयोग करने लायक बनाया।

सखी सैयां तो खूब ही कमात हैं
महंगाई डायन खाए जात है
हर महीना उछले पेट्रोल
डीजल का - उछ्ला है रोल/ (भी बढ़ गया मोल)
शक्कर बाई के का हैं बोल
हर महीना उछले पेट्रोल
डीजल का - उछला है रोल/ (भी बढ़ गया मोल)
शक्कर बाई के का हैं बोल
रुसा बासमती धान मरी जात है
महंगाई डायन खाए जात है
सखी सैयां.......
सोया बान को है बेहाल,
गर्मी से पिचके हैं गाल
घिर गए पत्ते,
पक गए बाल
सोया बान का का बेहाल ,
गर्मी में पिचके हैं गाल
घिर गए पत्ते,
पक गए बाल
और मक्का जीजी भी खाए गयी मात है
महंगाई डायन खाए जात है
सखी सैयां ....
अरे कददू की हो गयी भरमार
ककड़ी कर गयी हाहाकार
मटर जी को लगो बुखार
अरे कददू की हो गयी भरमार
ककड़ी कर गयी हाहाकार
मटर जी को लगो बुखार
और आगे का कहूँ
कही नहीं जात है
महंगाई डायन खाए जात है
सखी सैयां ....
साल घसीटत आ गव जून
महँगाई पी गयी खून
हाफ पैंट हो गयी पतलून
पड़े खटिया पे
यही बड़बड़ात है
महंगाई डायन खाए जात है
सखी सैयां .....
ए सैयां , ए सैयां रे ... मोरे सैयां रे खूब कमावें, सैयांजी ..
अरे कमा कमा के मर गए सैयां
पहले तकड़े तकड़े थे
अब दुबले पतले हो गए सैयां
अरे कमा कमा के मर गए सैयां
मोटे सैयां पतले सैयां
अरे सैयां मर गए हमारे खिसियाये के
महंगाई डायन मारे जात है
सखी सैयां तो खूब ही कमात है
महंगाई डायन खाए जात है

भैरों सिंह - भैरों सिंह ; राजस्थान का एक ही सिंह

राष्ट्रपति महोदया श्रीमती प्रतिभा देवी पाटिल के साथ 


तत्कालीन राष्ट्रपति महामहिम कलम साहब , प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह और लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी के साथ ......
भैरों सिंह शेखावत : यह शख्सियत राजनीती का दर्शन शास्त्र  थी..!
१५ मई उनकी प्रथम  पुन्य तिथि है  , कोटि कोटि नमन ..!!

शेखावत: एक जीवन परिचय


भैरों सिंह शेखावत: सांस्कृतिक मूल्यों के संवाहक



भैरों सिंह शेखावत: शेर ए राजस्थान



भैंरोसिंह - भैंरोसिंह , राजस्थान का एक ही सिंह 



महाराणा प्रताप




भैरों सिंह शेखावत : शेर - ए - राजस्थान


भैरों सिंह शेखावत : शेर - ए - राजस्थान 

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= रामबहादुर राय
- यह १५ मई २०१० को लिखा गया लेख है .......... 
भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति और देश के एक कद्दावर राजनेता भैरो सिंह शेखावत नहीं रहे.   87 साल के भैरोसिंह शेखावत ने लगभग छह दशक तक भारतीय राजनीति में अपना सशक्त हस्ताक्षर बनाये रखा.
आज उनके जाने के बाद उन्हें याद करें तो हम उन्हें ऐसे राजनेता के रूप में पाते हैं जिन्होंने सार्वजनिक जीवन में आदर्श और व्यवहार का बहुत ही बेहतर समन्वय किया और लोक राजनीति का मार्ग प्रशस्त किया.
भैरो सिंह शेखावत उन चंद नेताओं में से एक रहे हैं जो अपनी विचारधारा से बिना समझौता किये हुए निजी संबंधों को बनाये रखने में माहिर थे. उनके संबंध हर दल के नेताओं में थे और वे संबंध केवल औपचारिक नहीं बल्कि गहरे रिश्ते थे. इसकी कई बार परीक्षा भी हुई. 1993 में राजस्थान विधानसभा में दोबारा चुनाव हुआ तो मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश इन जगहों पर भाजपा की सरकार वापस नहीं आयी. लेकिन राजस्थान में भैरो सिंह शेखावत के नेतृत्व में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी होकर उभरी. हालांकि उन्हें स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था लेकिन भैरोसिंह के कारण ही वहां भाजपा उनके नेतृत्व में सरकार बना सकी. कांग्रेस ने उस सरकार को उखाड़ने, गिराने और तोड़ने की हर चाल चली. उसी तरह से प्रयोग करने की कोशिश की जैसा कि गुजरात में किया गया था. राजेश पायलट उस कोशिश के सूत्रधार थे. लेकिन भैरोसिंह शेखावत की सरकार पांच साल चली. और अपने निजी संबंधों के कारण ही वे समय समय पर नरसिंहराव का समर्थन प्राप्त कर लेते थे.
भैरो सिंह शेखावत के पिता कम उम्र में ही चले गये थे और पूरे परिवार की जिम्मेदारी उनके ऊपर आ गयी थी. पहले कोई छोटी मोटी नौकरी की और बतौर पुलिस के सब इस्पेक्टर काम भी किया. लेकिन जब जनसंघ का गठन हुआ तो शुरुआती तौर पर ही वे जनसंघ से ही जुड़ गये. अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक विकास की प्रक्रिया के कारण उनके मन में गरीबों के लिए गहरी पीड़ा थी. 1977 में जब वे मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने सबसे पहले गरीबी रेखा के नीचे जीनेवाले लोगों के लिए जो कार्यक्रम शुरू किया उसको नाम दिया अन्त्योदय योजना. अन्त्योदय योजना के बारे में जैसे ही जयप्रकाश नारायण ने सुना तो उन्हें पटना बुलाया और उनकी सार्वजनिक सराहना की.
भैरों सिंह शेखावत राजनीति के व्यावहारिक और आदर्शवाद में समन्वय करना बखूबी जानते थे. उनके जीवन में कई मौके ऐसे आये जब उनके सामने निजी संबंधों और राजनीति के आदर्श का टकराव उपस्थित हुआ लेकिन हर मौके पर उन्होंने न तो निजी संबंधों को बिगड़ने दिया और न ही अपने राजनीतिक आदर्श से कोई समझौता किया. बीते दिनों में उन्होंने एक ऐसा ही उदाहरण उस वक्त पेश किया जब जयप्रकाश नारायण के नाम पर बने ट्रस्ट में कई तरह की गड़बड़ियां की जा रही थीं. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से उनके संबंध बहुत प्रगाढ़ थे और चंद्रशेखर जी चाहते थे कि वे जयप्रकाश की जन्मस्थली जाएं. लेकिन भैरो सिंह शेखावत ने मना कर दिया. उनका तर्क था कि अगर जय प्रकाश जी के नाम पर कुछ लोग धांधली कर रहे हैं तो वे उन सबके बीच सिताब दियारा नहीं जाएंगे. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि आदर्शों के लिए वे निजी संबंधों का ख्याल नहीं रखते थे. जीवन में बहुत सारे मौके ऐसे आये जब उन्होंने निजी संबंधों को महत्व दिया और कौन क्या कह रहा है इसके बारे में कभी विचार नहीं किया.
1951 में जब वे जनसंघ के जरिए राजनीति में आये उससे पहले वे राजस्थान पुलिस में बतौर सब-इंस्पेक्टर कार्यरत थे. उनकी राजनीतिक अभिरुचि और सक्रियता का ही परिणाम था कि राजनीति में आते ही 1952 में वे पहली बार विधायक बने. उस साल राजस्थान विधानसभा में जनसंघ के सात विधायक चुनकर आये थे. पहली बार विधायक बनते ही उन्होंने जमीनी राजनीति को जनसंघ का व्यावहारिक राजनीतिक कर्म बना दिया. जब केन्द्र सरकार ने जमींदारी प्रथा उन्मूलन का ऐलान किया तो भैरो  सिंह शेखावत ने उसका समर्थन कर दिया. भैरो सिंह शेखावत का यह समर्थन कई लोगों को नागवार गुजरा क्योंकि उन दिनों जनसंघी सामंती विचारवाले लोगों की पार्टी हुआ करती थी. लेकिन भैरो सिंह शेखावत ने साफ कर दिया कि अगर कोई पार्टी छोड़कर जाना चाहता है तो जा सकता है लेकिन पार्टी अपना स्टैण्ड नहीं बदलेगी और बाद में सबको भैरों सिंह का समर्थन करना पड़ा.
भैरो सिंह शेखावत बहुत ही सामान्य परिवार से आते थे. पूरे जीवन उन्होंने राजनीतिक ऊंचाई कुछ भी हासिल कर ली हो लेकिन वे एक आम इंसान ही बने रहे. आम आदमी के हक और हित की चिंता उनकी राजनीति के केन्द्र में हमेशा बना रहा. ऐतिहासिक रूप से भैरों सिंह शेखावत ने दो काम ऐसे किये हैं जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि भैरों सिंह न होते तो शायद ये दोनों पहल कभी नहीं होती. इसमें पहला काम था बतौर मुख्यंत्री राजस्थान में अन्त्योदय योजना की शुरूआत. 1977 में जब वे पहली बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बने तो पहली दफा उन्होंने गरीबों के लिए जिन योजनाओं की शुरूआत की उसे अन्त्योदय योजना का नाम दिया. इन योजनाओं से खुद जयप्रकाश नारायण इतने प्रभावित हुए कि उन्हें पटना बुलाकर उनका सार्वजनिक सम्मान किया. इसी तरह भैरो सिंह शेखावत ही ऐसे पहले मुख्यंत्री थे जिन्होंने सूचना का अधिकार आंदोलन को आधार प्रदान किया. 1993 में जब वे एक बार फिर राजस्थान के मु्ख्यमंत्री बने तो उन्होंने अनिवार्य कर दिया कि ग्राम पंचायतों में जो भी विकास का काम किया जा रहा है उसका शिलापट लगाया जाए और किसी भी नागरिक द्वारा जानकारी मांगे जाने पर अधिकारी उसे जानकारी मुहैया कराएं. हालांकि शुरूआत में अधिकारियों ने आनाकानी की लेकिन मुख्यमंत्री की सख्ती के कारण उनको ऐसा करना पड़ा. इसी का परिणाम है कि राजस्थान में हुई इस शुरूआत को अरुणा राय ने सूचना अधिकार का आंदोलन बनाया और उसे केन्द्र सरकार द्वारा लागू किया गया.
भैरों सिंह शेखावत आम आदमी की राजनीति करते थे लेकिन पार्टी के स्तर पर भी वे हमेशा एक योद्धा की भांति ही राजनीति करते रहे. जब वे बतौर उपराष्ट्रपति दिल्ली आ गये और राजस्थान में विधानसभा के चुनाव होनेवाले थे तो उन्होंने ही कोशिश करके वसुंधरा राजे को राजस्थान की राजनीति में अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाया. लेकिन पांच साल के शासनकाल में जब उन्हें लगा कि वसुंधरा राजे ने आम आदमी के हकों कि रक्षा नहीं की तो उन्हीं भैरों सिंह शेखावत ने वसुंधरा राजे का विरोध करना शुरू कर दिया. यह बात अलग है कि उस वक्त वसुंधरा राजे को भाजपा के ऐसे नेता का संरक्षण मिल गया जिसके सामने भैरो सिंह एक तरह से कमजोर पड़ गये. फिर भी उन्होंने अपनी मांग बनाये रखी. पार्टी फोरम पर भी वे आम आदमी के लिए राजनीति का मुद्दा उठाते रहते थे और समय समय पर पार्टी को सचेत करते रहते थे कि आम आदमी की राजनीति ही असली राजनीति है.
भैरो सिंह शेखावत राजनीति मे बेदाग व्यक्तित्व थे. अपने निजी संबंधों के लिए कभी विचारधारा से समझौता नहीं किया लेकिन निजी संबंधों में राजनीतिक विचारधारा को भी कभी आड़े नहीं आने दिया. उनके निधन से सिर्फ भारतीय जनता पार्टी का ही नुकसान नहीं हुआ है बल्कि भारतीय राजनीति का एक बेदाग व्यक्तित्व हमारे बीच से चला गया है.
और  लिक : -

शेखावत: एक जीवन परिचय



भैरों सिंह शेखावत: सांस्कृतिक मूल्यों के संवाहक



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भैंरोसिंह - भैंरोसिंह , राजस्थान का एक ही सिंह 



महाराणा प्रताप


भावी सत्ता परिवर्तन की आहट के संकेत .....

- अरविन्द सिसोदिया 
      कुल मिला कर अभी तक जो सत्ता में वापसी का ट्रेंड था वह बदल गया है , अब सत्ता परिवर्तन का ट्रेंड फिरसे आगया है , कांग्रेस को अभी तो ख़ुशी हो रही होगी मगर यही उन्हें आगे चल कर सत्ता से बाहर करने वाला  है |  इन चुनाव में भाजपा को खोनें को कुछ  नहीं था ..,  वामपंथी हार गए मगर अगली वापसी से उन्हें भी कोई नहीं रोक पायेगा ! अब खतरा कांग्रेस को बड़ा है | उप चुनाव ही कांग्रेस के फेवर के नहीं हैं एक भी सीट उन्हें नहीं मिली | 


       हाल ही में हुए ५ राज्यों के चुनाव और ५ राज्यों में हुए उप चुनाव के परिणाम ..भावी सत्ता परिवर्तन की आहट लेकर आये हैं ..! पांच राज्यों में से ४ राज्यों में सत्ता परिवर्तन हो गया है ! बंगाल  में ३४ साल से जमें वाम पंथी एतिहासिक हार को प्राप्त हुए हैं .., मगर इसमें कांग्रेस की जीत नहीं है , यह जीत ममता के संघर्ष की जीत है , अन्यथा कुछ साल पहले तक कांग्रेस तो वाम पंथियों के सहारे सरकार चला रही थी ..!! सोनिया जी और सोमनाथजी की गुड्डी गुड्डी किसनें नहीं देखी..! केरल में सत्ता परिवर्तन एक परंपरा है , सत्ता में आनें की बारी कांग्रेस गठ बंधन की ही थी , लोकसभा चुनाव में यहाँ कांग्रेस को भारी सफलता मिली थी यदि सही दृष्टिकोण से देखा जाये तो , केरल में कांग्रेस ने मात्र १ सीट बहुमत से अधिक प्राप्त की है ..! वहां सत्ता पक्ष और विपक्ष में मात्र ४ सीटों का अंतर है ! तमिलनाडू में कांग्रेस  और सहयोगी डी एम् के का पूरी तरह से सफाया हो गया है | भ्रष्टाचार वहां मुद्दा ही बना और २ जी स्पेक्ट्रम के घोटालेबाजों  को सत्ता से बाहर कर दिया गया ! पांडिचेरी में कांग्रेस की सत्ता थी वह वहां बुरी तरह हार गए ..! असम में सच यही है वहां विपक्ष नहीं है .., वहां अवैध्य रूप से घुसे बंगलादेशी नागरिक अब इअतनी बड़ी संख्या में हैं की हिन्दू विपक्ष कभी नहीं जीत सकता , वहां भी ममता की तरह ही कोई स्थानीय नेत्रित्व जन्मेंगा तब असम कांग्रेस से मुक्त होगा ! कुल मिला कर ५ में से ४ राज्यों में सत्ता परिवर्तन हो गया ..! अन्य पांच राज्यों के उप चुनाव में कांग्रेस को एक भी जगह सफलता नहीं मिली ! 
१- छत्तीसगढ़ में बस्तर लोकसभा की एक सीट का उप चुनाव भाजपा  ने जीता है |
२- कर्णाटक में तीन विधानसभा उप चुनाव भाजपा ने जीतें हैं | इन तीन सीटों के साथ 224 सदस्यों वाली कर्नाटक विधानसभा में अब बीजेपी के 109 सदस्य हो गए हैं। जबकि उसे एक निर्दलीय सदस्य का भी समर्थन हासिल है। वहीं कांग्रेस की 71 और जेडीएस की 26 सीटें हैं।
३- आंध्र प्रदेश में एक लोकसभा और एक विधान सभा उप चुनाव कांग्रेस , जगनमोहन रेड्डी की पार्टी से हार गई है |
४- उत्तर प्रदेश  में भी पिपराइच विधानसभा सीट का उप चुनाव समाजवादी पार्टी ने जीता है , वहां कांग्रेस प्रथम तीन में नहीं है | 
५- नागालैंड में भी कांग्रेस पर नागा लैंण्ड पीपुल्स फ्रंट ने जीत दर्ज की है | 
   * जगनमोहन ने अपने नजदीकी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस उम्मीदवार डीएल रविंद्र रेड्डी को 5.45 लाख वोटों से शिकस्त दे दी। रेड्डी राज्य के स्वास्थ्य मंत्री हैं। जगन की मां विजय लक्ष्मी पुलीवेंदुला विधानसभा सीट पर 81 हजार वोटों से जीतीं। उन्होंने यहां अपने रिश्तेदार और कांग्रेस प्रत्याशी वाईएस विवेकानंद रेड्डी को मात दी। आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी के पुत्र जगनमोहन ने कांग्रेस हाईकमान के साथ मतभेद होने के बाद पार्टी को अलविदा कह दिया था।
*  पांच मौकों पर नागालैंड के मुख्यमंत्री रह चुके कांग्रेस के दिग्गज नेता एस.सी. जमीर उपचुनाव में नागा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) के उम्मीदवार तोसीकोपबा लोंगकुमेर से हार गए। वर्ष 2011 में कांग्रेस के विधायक एन. लोंगकुमेर के निधन के बाद उपचुनाव कराए गए थे। कांग्रेस ने हालांकि जमीर की हार को 'बड़ा अपमान' करार दिया है। राज्य में कांग्रेस पार्टी नेतृत्व को लेकर विवादों का शिकार रही है।