गुरुवार, 23 जून 2011

पोप राष्ट्राध्यक्ष , तो सत्य सांई या बाबा रामदेव के करोडपति होनें पर क्या आपत्ति ...?



भारतीय मीडिया सच को  देखे..... 
- अरविन्द सिसोदिया 
  भारतीय मीडिया के द्वारा बाबा राम देव और सत्य सांई की संपत्तियों को समाज के सामने पेश करते हुए , निम्न स्तरीय नजरिया अपनाया, जबकी इसाई धर्मगुरु पोप को तो एक राष्ट्राध्यक्ष का दर्जा दिया हुआ , इन राशियों से कहीं अधिक तो कई चर्चों के पास है ..., दुनिया भर में धर्म परिवर्तन पर चर्च जो खर्च करता है यह  उसके सामने राई भर भी नहीं है ! सही विश्लेष्ण तुलनात्मक होना चाहिए . किसी दुर्भावना से प्रेरित नहीं ...!!! बाबा की सम्पत्ति की तुलना किसी एलोपर्थिक दावा निर्माता कंपनी से क्यों नहीं करते ..!! भारत को परोक्ष गुलाम बनाने वालों की गुलामी में भारतीय मीडिया का होना घातक है ..!! 
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घोषणा के अनुसार 1995 से अस्तित्व में आये बाबा रामदेव के पहले ट्रस्ट दिव्य योग मंदिर के पास वर्तमान पूंजी 249 करोड़ रुपये की है और यह ट्रस्ट अब तक 685 करोड़ 25 लाख रुपये जनसेवा के कार्यों पर खर्च कर चुका है।
दूसरे ट्रस्ट पतंजलि योग पीठ के पास 164 करोड़ 80 अस्सी लाख रुपये की वर्तमान पूंजी है तथा इस योगपीठ ने अब तक 53 करोड़ 92 लाख रुपये जनसेवा पर खर्च किये हैं। तीसरा ट्रस्ट भारत स्वाभिमान ट्रस्ट की वर्तमान पूंजी 9 करोड़ 97 लाख है और अब तक 11 करोड़ 51 लाख रुपये जनसेवा पर खर्च किया जा चुके हैं।
चौथे ट्रस्ट आचार्य कुल शिक्षण संस्थान की वर्तमान पूंजी एक करोड़ 79 लाख रुपये है तथा ट्रस्ट अब तक 64 लाख रुपये खर्च कर चुका है। इसके अलावा दो अन्य ट्रस्ट जो 2011 में शुरू हुये हैं उनका ब्यौरा 2012 में इंटरनेट पर डाल दिया जायेगा।
वर्तमान में बाबा रामदेव करीब 500 करोड़ की पूंजी वाले चार ट्रस्टों के मालिक हैं, लेकिन बाबा की कितनी कंपनियां हैं उन्होंने इसका ब्यौरा नहीं दिया। बाबा रामदेव ने कहा कि कंपनियां भी जनसेवा के लिये खोली गयी हैं। जिन कार्यों को ट्रस्ट के माध्यम से नहीं किया जा सकता था उन्हें कंपनियां खोलकर पूरा किया गया। उन्होंने कहा कि कंपनियों का ब्यौरा रजिस्ट्रार आफ कंपनी से लिया जा सकता है। बाबा ने कहा हमने देश में पहली बार ऐसी व्यवस्था की है जिससे कोई व्यक्ति ट्रस्ट के बारे में जानकारी ले सकता है।
उन्होंने कहा कि मेरा अनुरोध है देश के शासकों के चलाये जा रहे ट्रस्ट भी अपने यहां ऐसी व्यवस्था कर पारदर्शिता का परिचय दे। बाबा ने कहा कि मेरी कंपनियां भी दवायें और अन्य सामान बाजार भाव से पचास से सौ प्रतिशत तक कम मूल्य में वस्तु उपल्ब्ध कराती है और उससे होने वाली आय को जनोपयोगी कार्यों में खर्च किया जाता है।
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नई दिल्ली। सत्य साईं के निधन के 52 दिन बाद उनका कमरा खुला तो सामने आया एक खजाना। सत्य साईं ट्रस्ट की मानें तो कमरे से करीब 38 करोड़ की संपत्ति मिली है जिसमें साढ़े 11 करोड़ के नोट भी थे। लेकिन क्या आप जानते हैं साईं जिस कमरे में रहते थे उसकी कीमत ही थी 35 करोड़ रुपए।
आधुनिक तकनीक से लैस इस कमरे में जाने की इजाजत किसी को नहीं थी। सत्य साईं के अलावा उनके सबसे करीबी सत्यजीत ही इस कमरे में जा सकते थे। साईं के भतीजे रत्नाकर को भी इस कमरे में जाने की इजाजत नहीं थी। सुरक्षा के लिहाज से कमरे में बायोमैट्रिक लॉक सिस्टम लगाया गया था। दरवाजों को खोलने के लिए सत्य साईं अपनी उंगलियों का इस्तेमाल करते थे।
जी हां, नोट और हीरे-जवाहरात के बीच नींद लेते थे सत्य साईं। ये कमरा कोई मामूली कमरा नहीं, यजुर मंदिर नाम का ये कमरा एक से एक आधुनिक तकनीक से लैस है। 2006 में सत्य साईं के लिए खासतौर पर इस कमरे का निर्माण कराया गया था। साईं का बेडरूम 35 करोड़ रुपए का है और उसमें था 38 करोड़ का खजाना, यानि 72 करोड़ के बीच सत्य साईं को आती थी चैन की नींद।
साईं की मौत के बाद ट्रस्ट ने इस कमरे पर ताला लगा दिया था और सत्यजीत की मदद से शुक्रवार को जब कमरा खोला गया तो लोगों की आंखें फटी की फटी रह गईं। सत्य साईं के कमरे में भरा पड़ा था करोड़ों रुपया। विदेशी करेंसी, सोना, चांदी, हीरे, बेशकीमती पत्थर से अटा पड़ा था साईं का बेडरूम।
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रोमन कैथोलिक चर्च के सर्वोच्च धर्म गुरु, रोम के बिशप एवं वैटिकन के राज्याध्यक्ष को पोप कहते हैं। 'पोप' का शाब्दिक अर्थ 'पिता' होता है। यह लैटिन के "पापा" (papa) से व्युत्पन्न हा है जो स्वयं ग्रीक के पापास् (πάπας, pápas) से व्युत्पन्न है। इस समय (फरवरी, २००९) बेनेडिक्ट सोलहवें (Benedict XVI) इस पद पर आसीन हैं जिन्हें १९ अप्रैल २००५ को चुना गया था। वे २६५वें पोप हैं।
रोमन काथलिक चर्च के परमाधिकारी को संत पापा (पिता) 'होली फादर' अथवा पोप कहते हैं। ईसा से अपने महाशिरूय संत पीटर को अपने चर्च का आधार तथा प्रधान 'चरवाहा' नियुक्त किया था और उनको यह भी सुस्पष्ट आश्वासन दिया था कि उनपर आधारित चर्च शताब्दियों तक बना रहेगा। अत: ईसा के विधान से संत पीटर का देहांत रोम में हुआ था, इसलिये प्रारंभ ही से संत पीटर के उत्तराधिकारी होने के कारण रोम के बिशप समूचे चर्च के अध्यक्ष तथा पृथ्वी पर ईसा के प्रतिनिधि माने गए थे। इतिहास इसका साक्षी है कि रोम के बिशप के अतिरिक्त किसी ने कभी संत पीटर का उत्तराधिकारी होने का दावा नहीं किया। किंतु प्राच्य चर्च के अलग होते जाने से तथा प्रोटेस्टैंट धर्म के उद्भव से पोप के अधिकारी के विषय में शताब्दियों तक वाद विवाद होता रहा, अंततोगत्वा वैटिकन की प्रथम अधिकार रखते हैं। वे ईसा की शिक्षा के सर्वोच्च व्याख्याता हैं और चर्च के परमाधिकारी की हैसियत से धर्मशिक्षा की व्याख्या करते समय भ्रमातीत अर्थात्‌ अचूक हैं। पोप वैटिकन राज्य के अध्यक्ष हैं तथा उनके देहांत पर कार्डिनल उनके उत्तराधिकारी को चुनते हैं
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Vatican City is the smallest independent state in the world in terms of inhabitants and size. It occupies an area of 44 hectares. The borders are represented by its walls and the travertine pavement curve that joins the two wings of the colonnades in St Peter’s Square. Beyond the proper territory of the State, Vatican jurisdiction also covers some extraterritorial areas within and outside Rome.

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Government Ecclesiastical,
sacerdotal-monarchical
 -  Pope Benedixt XVI
 -  President of the Pontifical Commission Giovanni Lajolo
Vatican City or Vatican City State, in Italian officially Stato della Città del Vaticano (pronounced [ˈstaːto della tʃitˈta del vatiˈkaːno]), which translates as State of the Vatican City, is a landlocked sovereign city-state whose territory consists of a walled enclave within the city of Rome, Italy. It has an area of approximately 44 hectares (110 acres), and a population of just over 800. 

Vatican City was established in 1929 by the Lateran Treaty, signed by Cardinal Secretary of State Pietro Gasparri, on behalf of the Holy See and by Prime Minister Benito Mussolini on behalf of the Kingdom of Italy. Vatican City State is distinct from the Holy See, which dates back to early Christianity and is the main episcopal see of 1.2 billion Latin and Eastern Catholic adherents around the globe. Ordinances of Vatican City are published in Italian; official documents of the Holy See are issued mainly in Latin. The two entities even have distinct passports: the Holy See, not being a country, issues only diplomatic and service passports; Vatican City State issues normal passports. Very few passports are issued by either authority.

The Lateran Treaty in 1929, which brought the city-state into existence, spoke of it as a new creation (Preamble and Article III), not as a vestige of the much larger Papal States (756-1870) that had previously encompassed much of central Italy. Most of this territory was absorbed into the Kingdom of Italy in 1860, and the final portion, namely the city of Rome with Lazio, ten years later, in 1870.

Vatican City is an ecclesiastical or sacerdotal-monarchical state, ruled by the Bishop of Rome—the Pope. The highest state functionaries are all Catholic clergymen of various national origins. It is the sovereign territory of the Holy See (Sancta Sedes) and the location of the Pope's residence, referred to as the Apostolic Palace.

The Popes have generally resided in the area that in 1929 became Vatican City since the return from Avignon in 1377, but have also at times resided in the Quirinal Palace in Rome and elsewhere. Previously, they resided in the Lateran Palace on the Caelian Hill on the far side of Rome from the Vatican. Emperor Constantine gave this site to Pope Miltiades in 313. The signing of the agreements that established the new state took place in the latter building, giving rise to the name of Lateran Pacts, by which they are known.

डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी : राष्ट्रहित के अमर बलिदानी





- अरविन्द सिसोदिया 
             जवाहर लाल नेहरु ने देश की गद्दी पर बैठते ही जम्मू और कश्मीर राज्य के प्रति पूर्वाग्रह  से ग्रस्त देश विरोधी  नीति पर अमल किया जिसके  कारण आज तक देश को भयंकर हानी भुगतनी पड़ रही है | उन्होंने जहाँ पाकिस्तान से अपनी पूरी जमीं वापस लिए बिना युद्ध विराम किया , उसके कारण एक बड़ा भूभाग आज भी पाकिस्तान के कब्जे में है , वहीँ सीमा विवाद को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गए सो यह भूमि युद्ध के द्वारा भी नहीं जीती जा सकती |
                 वही इस प्रान्त को सह राष्ट्र जैसा अस्तित्व देकर वहां स्वतंत्रता की गुन्जाईस  रख कर मुसीवत पैदा करदी !  नेहरु जी ने शेख से जो समझौता किया था उसमें जम्मू और कश्मीर राज्य  का अलग झंडा , अलग संविधान , अलग प्रधान मंत्री बनता था | भारत के सर्वोच्च न्यायलय सहित तमाम उच्च संस्थान
के अधिकार क्षेत्र से यह राज्य बहार था |  भारतीय जनसंघ के राष्ट्रिय अध्यक्ष डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के इस धारा  ३७० के विरोध और बलिदान के बाद पूरा देश जगा | बाद में शेख अब्दुल्ला जेल में बंद किये गए , धारा ३७० के काफी कुछ असर कम हुए हैं | अब इस धारा को पूरी तरह से हटाना शेष है | सच यह है की आज जम्मू और कश्मीर राज्य सिर्फ  डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी  के  बलिदान के कारण ही है |    

* ८ मई १९५३ को प्रातः साढ़े ६ बजे पंजाब जाने वाली ट्रेन दिल्ली रेलवे  स्टेशन  से चली , स्टेशन पर मुखर्जी को विदाई देने आये हजारों लोगों को मालूम नहीं था की यह विदाई उन्हें अंतिम विदाई है !!!
भारत माता की जय !
भारत केशरी डाक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी जिंदाबाद !
फूलमालाओं से उस डिब्बे को सजा दिया गया , उनके साथ गुरुदत्त ,अटलबिहारी वाजपेयी , डा. बर्मन , टेकचंद और बलराज मधोक थे ! रास्ते में रुकते  हुए  ११ मई को अमृतसर से पठान कोट पहुचे और वहां से रवि पुल जो जम्मू और कश्मीर राज्य का बार्डर है पहुचे !
*  ११ मई १९५३ सांय ४ बजे माधोपुर चेक पोस्ट से आगे जब वे पुल के मध्य में पह्चें , उनकी जीप रोक ली गई और जम्मू और कश्मीर राज्य पुलिस नें उन्हें गिरिफ्तर कर लिया गया , उनके साथ गुरुदत्त और टेकचंद  भी गिरिफ्तर किये गए | शेष साथियों को उन्होंने वापस यह कह कर भेज  दिया कि " देशवासियों को बता देना कि हमनें जम्मू और कश्मीर राज्य में प्रवेश कर लिया है , भले ही यह एक कैदी के रूप में हो, जम्मू और कश्मीर हमारा था और हमारा ही रहेगा | " वापसी करनें वालों में से एक अटल विहारी वाजपेयी भी थे जो बाद में देश के प्रधानमंत्री बनें ||
* गिरिफ्तर मुखर्जी १२ मई को श्री नगर पहुंचे ,उन्हें शहर से ८ मील दूर निशात बाग़ नाम के छोटे से बंगले में जिसे जेल का रु दे दिया गया था में ठहराया गया | जिसमें उनके जीवन के शेष ४० दिन गुजरे |
* देश में उनकी गिरफ्तारी पर विरोध प्रदर्शन हुए | 
* मुखर्जी के पुत्र को भी बीमार पिता से मिलने के लिए  जम्मू और कश्मीर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई |
* मुखर्जी डायरी लिखते थे  जम्मू और कश्मीर की शेख सरकार नें वह डायरी भी गायब कर अपने पासा ही रखली ताकि सच बहार नहीं जा सके | 
* २६ मई को नेहरूजी और काटजू श्री नगर में विश्राम करनें गए मगर वे अपने पूर्व मन्त्र मंडल के साथी और सदन के प्रमुख सांसद मुखर्जी से मिलाने का शिष्टचार तक नहीं निभा पाए | 
* सच यह है की १८ मई से ही मुखर्जी अस्वस्थ हो गए थे , सरकार ने उनके स्वास्थ्य को उपेक्षा जानबूझ  कर की ताकि वह अपने षड्यंत्र में सफल हो सके | 
* लोकसभा की कार्यवाहियां बताती हैं की नेहरू  को निरुत्तर करनें की क्षमता मुखर्जी में थी | मुखर्जी से शेख से कहीं अधिक भयग्रस्त नेहरु रहते थे | 
* २२ जून को मुखर्जी को चिकित्सालय में भर्ती कर क्या किया गया यह अभी तक पता नहीं है , उन्हें २३ जून के प्रातः ३ बज कर ४५ मिनिट पर मृत घोषित कर दिया गया , क्यों की २४ जून को कश्मीर हाईकोर्ट उन्हें मुक्त कर सकत था !!  
* मुखर्जी की मृत्यु को पुरे देश ने हत्या माना, देश के कोनें कोनें में हड़तालें हुई , शोक सभाएं हुई और जम्मू - कश्मीर के पूर्ण विलय की मांग उठी ! 
* जब हवाई जहाज से मुखर्जी का शव कलकत्ता पंहुचा तो विशाल लाखों की संख्या में जन समूह हवाई अड्डे के बहर मोजूद था , हवाई अड्डे से १४ मील की दुरी पर  दक्षिण कलकत्ता में उनका निवास था , वहां तक शव पहचानें में रात्रि के १० बजे से सुबह की ५ बज गई थी ! सड़कों और छतों पर लोगों का अपार जन समूह जमा था !!
मुखर्जी की शहादत बेकार नहीं गई .., 
देश की अखंडता पर वह पहली बली थी ,
नेहरु की राष्ट्रघाती निति का वह पहला प्रखर विरोध था ,
हम सभी उन्हें युग युग तक नमन करते रहेंगे | 
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युग युग तव गान चले 
- कमला मधोक 
हिमालय के आँगन में ,ज्योतिष्कर अस्त हुआ ,
कुच्क्रियों के ह्रदय खिले , देश समस्त त्रस्त हुआ | 
-१-
वह था अकलंक संत , उज्जवल परिधान रहा ,
साधक था अविचल वह , सत्य महा प्राण रहा |
-२-
पावित्र्य पौरुषपूर्ण जीवन , हो यही चिर कामना थी |
जिससे ही निस्सृत हुई, उत्सर्ग की निज भावना थी |
-३- 
वाणी का वह भक्त अनन्य,ब्राह्यण वह तेजोमय ,
जगमंगल हेतु सदा ,कटिबद्ध था यशोमय |  
-४- 
वह दीप बुझा एक , किन्तु अगणित दीप जले ,
धरती नभ ज्योतित कर , युग युग तव गान चले ||