गुरुवार, 7 जुलाई 2011

याद रहे, लोकतंत्र की रक्षा का महाव्रत:26 जून: आपातकाल

अरविन्द सीसौदिया
26 जून: आपातकाल दिवस के अवसर पर
याद रहे, लोकतंत्र की रक्षा का महाव्रत

मदर इण्डिया नामक फिल्म के एक गीत ने बड़ी धूम मचाई थी:
दुख भरे दिन बीते रे भईया,
अब सुख आयो रे,
रंग जीवन में नया छायो रे!
सचमुच 1947 की आजादी ने भारत को लोकतंत्र का सुख दिया था। अंग्रेजों के षोशण और अपमान की यातना से मातृभूमि मुक्त हुई थी, मगर इसमें ग्रहण तब लग गया जब भारत की सबसे सषक्त प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगा दिया, तानाषाही का षासन लागू हो गया और संविधान और कानून को खूंटी पर टांग दिया गया। इसके पीछे मुख्य कारण साम्यवादी विचारधारा की वह छाया थी जिसमें नेहरू खानदान वास्तविक तौर पर जीता था, अर्थात साम्यवाद विपक्षहीन षासन में विष्वास करता हैं, वहां कहने को मजदूरों का राज्य भले ही कहा जाये मगर वास्तविक तौर पर येनकेन प्रकारेण जो इनकी पार्टी में आगे बढ़ गया, उसी का राज होता है।

भारतीय लोकतंत्र की धर्मजय
भारत की स्वतंत्रता के साठ वर्श होने को आये। इस देष ने गुलामी और आजादी तथा लोकतंत्र के सुख और तानाषाही के दुःख को बहुत करीब से देखा। 25 जून 1975 की रात्री के 11 बजकर 45 मिनिट से 21 मार्च 1977 का कालखण्ड इस तरह का रहा जब देष में तानाषाही का साम्राज्य रहा, सबसे बडी बात यह है कि इस देष ने तानाषाही को तुरन्त ही संघ शक्ति से पराजित कर पुनः लोकतंत्र की स्थापना की!
आपातकाल
  तत्कालीन प्रधनमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी ने आन्तरिक आपातकाल की जंजीरों में सम्पूर्ण देश को बांध दिया था। निरपराध हजारों छोटे-बड़े नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को उन्होंने कारागारों में ठूंस दिया। पर कोई भी इसके विरूद्ध किसी प्रकार की आवाज नहीं उठा सकता था। एकाधिकारवाद का क्रूर राक्षस सुरसा की तरह अपना जबड़ा अधिकाधिक पसार रहा था...।
हिन्दुत्व का मजबूत मस्तिष्क
भारतीय संस्कृति में त्रिदेव और तीन देवियों का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। त्रिदेव के रूप में ब्रह्मा, विश्णु और महेष जाने जाते हैं, जो मूलतः सृश्टीक्रम के जनक, संचालक और संहारकर्ता हैं। वहीं दैवीय स्वरूप सृश्टी संचालन का गृहस्थ पक्ष है, जिसमें सरस्वती बुद्धि की, लक्ष्मीजी अर्थव्यवस्था की और दुर्गा षक्ति की संचालिकाएं मानी जाती हैं। इन्हीं के साथ वेद, पुराण और उपनिशदों का एक समृद्ध सृष्टि इतिहास साहित्यिक रूप में उपलब्ध है। यह सब मिलकर हिन्दुत्व का मस्तिश्क बनते हैं और इसलिए हिन्दुत्व की सन्तान हमेषा ही पुरूषार्थी और विजेता के रूप में सामने आती रही है। निरंतर अस्तित्व में रहने के कारण ये सनातन कहलाई है। इसी कारण अन्य सभ्यताओं के देहावसान होने के बाद भी हिन्दू संस्कृति अटल अजर, अमर बनी हुई है। यह इसी संस्कृति का कमाल यह है कि घोर विपŸिायों में भी घबराये बगैर यह अपनी विजय की सतत प्रयत्नशील रहती है। इसी तत्वशक्ति ने आपातकाल में भी सुदृढ़ता से काम किया और विजय हासिल की।
स्वतंत्रता की रक्षा का महानायक:संघ
वर्तमान काल में देष की स्वतंत्रता का श्रेय महात्मा गांधी सहित उस विषाल स्वतंत्रता संग्राम को दिया जाना उचित है तो हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इस देष की स्वतंत्रता को तानाषाही से मुक्त कराने और जन-जन की लोकतंत्रीय व्यवस्था को अक्षुण्ण बनाये रखने में उतना ही बड़ा योगदान राश्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के और उसके तत्कालीन सरसंघचालकों का है।
मा. बालासाहब देवरस और उनका मार्गदर्षन व अनुसरण करने वाले विषाल स्वयंसेवक समूह को यह श्रैय जाता है। यदि आपातकाल में संघ के स्वयंसेवकों ने स्वतंत्रता की पुनप्र्राप्ति के लिए बलिदानी संघर्श न किया होता तो आज हमारे देष में मौजूद लोकतंत्र का वातावरण नहीं होता, जनता के मूल       अधिकार नहीं होते, लोककल्याण के कार्यक्रम नहीं होते। चन्द साम्राज्यवादी कांग्रेसियों की गुलामी के नीचे उनकी इच्छाओं के नीचे, देष का आम नागरिक दासता की काली जेल में पिस रहा होता। 
       स्मरण रहे वह संघर्ष
इसलिए आपातकाल के काले अध्याय का स्मरण करना, उसके विरूद्ध प्रभावी संघर्श का मनन करना हमें लोकतंत्र की रक्षा की प्रेरणा देता है। इन प्रेरणाओं को सतत् जागृत रखना ही हमारी स्वतंत्रता का मूल्य है। जिस दिन भी हम इन प्रेरणाओं को भूल जायेंगे, उसी दिन पुनः तानाषाही ताकतें हमको फिर से दास बना लेंगी।
नेहरू की साम्यवादिता ही मूल समस्या
कांग्रेस में महात्मा गांधी सहित बहुत सारे महानुभाव रहे हैं, जिन्होंने सदैव लोकतंत्र की तरफदारी की है, किन्तु कांग्रेस का सत्तात्मक नेतृत्व पं. जवाहरलाल नेहरू और उनके वंषजों में फंस कर रह गया है। पं. जवाहरलाल नेहरू स्वयं में घोर कम्यूनिस्ट थे, वे रूस से अत्यधिक प्रभावित थे, इसलिए कांग्रेस मूलतः एक तानाषाह दल के रूप में रहा। उसने जनता को ठगने के लिए निरन्तर छद्म लोकतंत्र को ओढ़े रखा। हमेषा कथनी व करनी में रात-दिन का अंतर रखा और यही कारण था कि इस दल ने लोकतंत्र व राश्ट्रीय हितों की रक्षा करने वाले राश्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबन्ध लगाने में हमेषा ही फुर्ती दिखाई। सबसे पहले डाॅ. हेडगेवार जी के समय में नागपुर क्षैत्र की प्रांतीय सरकार ने संघ में सरकारी लोगों को जाने पर प्रतिबन्ध लगाया, जिसमें पं. जवाहर लाल नेहरू और डाॅ. हार्डीकर का हाथ होने की बात समय समय पर आती रही थी। इसके बाद स्वतंत्र भारत में महात्मा गांधी की हत्या की ओट में संघ पर प्रतिबन्ध लगाया गया। वीर सावरकर व पूज्य श्रीगुरूजी को गिरफ्तार किया गया। इसी प्रकार आपातकाल के दौरान सरसंघचालक मा. बाला साहब देवरस को गिरफ्तार किया गया और संघ पर प्रतिबन्ध लगाया गया। इसी तरह बाबरी मस्जिद ढ़हने पर नरसिम्हा राव सरकार ने भी भाजपा शासित राज्य सरकारों को बर्खास्त कर, संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। 
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा जी से पराजित राजनारायण के द्वारा दायर याचिका पर तमाम दबावों को नकारते हुए देश की सबसे मजबूत प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी का निर्वाचन रद्द कर दिया तथा 6 वर्ष तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। उन्होंने 20 दिन के समय पश्चात यह निर्णय लागू करने के निर्देश भी दिये। 
20 जून 1975: कांग्रेस की समर्थन रैली
श्रीमति इंदिराजी न्यायालय के निर्णय का सम्मान करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर स्थगन ले सकतीं थीं, मगर न्यायालय के इस निर्णय के विरूद्ध जनशक्ति का दबाव बनाने के लिए कांग्रेस पार्टी की ओर से एक विशाल रैली आयोजित की गई ओर कांग्रेस ने उन्हे प्रधनमंत्री पद पर बने रहने का आग्रह किया, जिसमें एक नारा दिया गया:
इंदिरा तेरी सुबह को जय, शाम की जय
तेरे काम की जय, तेरे नाम की जय
उन्होंने अपनी जिद को प्राथमिकता देते हुए संवैधानिक व्यवस्था को नकार दिया। इसी का परिणाम ‘आपातकाल’ था।
25 जून 1975: आपातकाल
निर्वाचन रद्द करने के मुद्दे पर पूरे देष में आन्दोलन प्रारम्भ हो गया और प्रधानमंत्री पद से इंदिरा जी का इस्तीफा मांगा जाने लगा। उनके पक्ष कर 20जून को रैली हुई उसका जवाब 25 जून को दिया गया।
हालांकी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के तानाषाह रवैये के विरोध में एक लोक संघर्श समिति पहले ही बन चुकी थी, जिसके मोरारजी भाई देसाई संगठन कांग्रेस अध्यक्ष और सचिव नानाजी देषमुख (जनसंघ) थे। इसी समिति के द्वारा 25 जून 1975 को इसी क्रम में रामलीला मैदान दिल्ली में विषाल आमसभा आयोजित हुई थी। उसमें उमड़ी विषाल जन भागेदारी ने इन्दिरा सरकार को झकझोर कर रख दिया। इस आमसभा में जयप्रकाष नारायण ने मांग की थी कि ‘‘प्रधानमंत्री त्यागपत्र दें, उन्हें प्रधानमंत्री पद पर रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। वास्तविक गणतंत्र की परम्परा का पालन करें।’’ इसी सभा में सचिव नानाजी देषमुख ने घोशणा कर दी थी कि 29 जून से राष्ट्रपति के सम्मुख सत्याग्रह किया जायेगा, जो प्रतिदिन चलेगा।
राश्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद का आपातकाल
ठीक इसी समय इंदिरा जी के बंगले पर उनके अति विष्वस्त सिद्धार्थ षंकर राय, बंषीलाल, आर.के.धवन और संजय गांधी की चैकड़ी कुछ और ही शडयंत्र रच रहे थे, जिससे 28 वर्शीय लोकतंत्र का गला घोंटा जाना था।
उसी समय राश्ट्रपति भवन भी इस शडयंत्र में प्रभावी भूमिका निभाने की तैयारी कर रहा था। राश्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद, संविधान की पुस्तकों और आपातकाल लागू करने के प्रारूपों पर परामर्ष ले रहे थे। कई तरह के असमंजस इसलिये थे कि ऐसा क्रूर कदम देष के इतिहास में पहली बार होना था।
श्रीमति गांधी, सिद्धार्थ षंकर राव और आर.के. धवन रात्रि में राश्ट्रप्रति भवन पहुंच गये और रात्रि 11 बजकर 45 मिनट पर आपातकाल लगा दिया।
राज्यों के मुख्यमंत्रियों, प्रषासनिक अधिकारियों को, पुलिस प्रषासन को निर्देष जारी कर दिये गये कि देषभर के प्रमुख राजनेताओं को बंदी बना लिया जाये, जहां से विरोध का स्वर उठ सकता है, उसे धर दबोचा जाये और सींखचों के पीछे डाल दिया जाये।
मीसा
न दलील, न वकील, न अपील
पूरा देष कारागार में बदल दिया
1970 में पूर्वी पाकिस्तान में चल रहे जन विद्रोह के चलते, 1971 में श्रीमती गांधी ने संसद से एक कानून पारित करवा लिया,जो ‘‘मीसा’’ के नाम से जाना जाता है। तब संसद में यह कहा गया था कि देष में बढ़ रहे भ्रश्टाचार, तस्करी और आसामाजिक गतिविधियों पर नियंत्रण हेतु इसे काम में लाया जायेगा। परन्तु यह प्रतिपक्ष को कुचलने के काम लिया गया। इसे नौवीं सूची में डालकर न्यायालय के क्षैत्राधिकारी से बाहर रखा गया। हालांकि इस तरह का कानून 1950 में ही पं. नेहरू ने निरोध नजरबंदी कानून के रूप में लागू कर दिया था, जो निरंतर बना रहा।
जयप्रकाष नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृश्ण आडवाणी, राजमाता सिंधिया, मधु दण्डवते, ष्यामनंदन मिश्र, राजनारायण, कांग्रेस के युवा तुर्क चन्द्रषेखर, चैधरी चरण सिंह, मदरलैण्ड के सम्पादक के आर. मलकानी, 30 जून को संघ के सरसंघचालक बालासाहब देवरस को नागपुर स्टेषन पर बंदी बना लिया गया।
आपातकाल के इन्दिरा लक्ष्य
श्रीमती गांधी के आक्रमण की छः प्रमुख दिशायें थीं:
1. विपक्ष की गतिविधियों को अचानक ठप्प कर देना।
2. आतंक का वातावरण तैयार कर देना।
3. समाचार व अन्य प्रकार के सभी सम्पर्क व जानकारी के सूत्रों को पूरी तरह नियंत्रित कर देना।
4. प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों को ही नहीं, सर्व सामान्य जनता को भी यह आभास कराना कि विपक्ष ने भारत विरोध विदेशी शक्तियों के साथ सांठ-गांठ कर श्रीमती गांधी का तख्ता पलटने का व्यापक हिंसक षडयंत्र रचा था जिसे श्रीमती गांधी ने समय पर कठोर पग उठाकर विफल कर दिया।
5. कोई न केाई आकर्षक जादुई कार्यक्रम घोषित कर बदले वातावरण में कुछ ठोस काम करके जनता को अपने पक्ष में करना और 
6. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शक्ति को तोड़कर देशव्यापी संगठित प्रतिरोध की आशंका को समाप्त कर देना।
इन सभी दिशाओं में उन्होंने एक साथ आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण को प्रभावी व सफल बनाने हेतु वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ अपने पास ओम मेहता, बंसीलाल, विद्याचरण शुक्ल, एच.आर. गोखले, सिद्धार्थ शंकर राय और देवकान्त बरूआ के समान लोगों का गिरोह भी संगठित कर लिया। संजय तो था ही।
आपातकाल का समापन
19 महीने बाद 18 जनवरी 1977 को अचानक इंदिरा जी ने आम चुनाव की घोषणा कर दी। वे यह समझ रही थीं कि अब अन्य राजनैतिक दलों का धनी- धोरी कोई बचा नहीं है, कार्यकर्ताओं का जीवट समाप्त हो चुका है, कुल मिलाकर कोई चुनौती सामने नहीं है। इसी कारण उन्होंने राजनैतिक नेताओं की मुक्ति प्रारम्भ कर दी गई।
चुनावों की घोषणा के दूसरे दिन चारों प्रमुख राष्ट्रीय जनतांत्रिक दल जो कांग्रेस के विरूद्ध थे, ने अपने अपने दलों का विलय कर एक दल बनाने का निर्णय लिया। नये दल का नाम नेता, ध्वज, चुनाव चिन्ह सभी तय हो गये। इस दल की राजनैतिक और आर्थिक नीतियों को भी लिपिबद्ध कर लिया गया। उस वक्त मौजूद अन्य विपक्षी दलों ने भी इस दल के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने का फैसला लिया। देश भर में दबा हुआ जनस्वर विस्फोटित होने लगा, कांग्रेस में घबराहट बढ़ने लगी, तमाम छोटे-बड़े सहारे लिये जाने लगे। यहां तक कि बाॅबी जैसी हल्की फिल्म का दूरदर्शन पर प्रसारण करवाकर विपक्ष की रैली विफल करने की कोशिश हुई। किन्तु अंततः 20 मार्च 1977 की रात्रि में ही आम चुनावों में इंदिरा गांधी के पिछड़ने के समाचार दिल्ली पहुंच चुके थे। उनके करीबी अशोक मेहता और आर.के. धवन सक्रीय हो चुके थे और उन्होंने रायबरेली कलक्टर को टेलीफोन किया कि मतगणना  धीमी कर दो और पुनर्मतगणना के आदेश दो। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के माध्यम से भी दबाव डाला गया। किन्तु चुनाव अधिकारी ने कोई दखल नहीं दिया और अंततः इंदिरा गांधी रायबरेली सहित पूरे देश में चुनाव हार गई।
21 मार्च की सुबह आपात स्थिति समाप्ति की घोषणा हो गई, जेलों के द्वार खुल गये और संघ के सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस सहित देश की तमाम जेलों से 15,000 के लगभग निर्दोष बंदियों को मुक्ति मिली। मोरारजी देसाई पहली बार लोकसभा में गैर कांग्रेसी सरकार के प्रधानमंत्री बने, 30 वर्ष का कांग्रेस का एकछत्र शासन समाप्त हो गया। भारतीय जनसंघ के अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री और लालकृष्ण आडवाणी सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने। इसी सरकार ने नीलम संजीव रेड्डी को पहला गैर कांग्रेसी राष्ट्रपति भी निर्वाचित किया। भले ही यह सरकार बाद में बिखर गई, इंदिरा गांधी स्वयं भी वापस सत्ता में आ गई, मगर आपातकाल के संघर्ष ने जो परिणाम दिये तथा जनता ने जिस तरह का राजनैतिक न्याय किया उसका एक सुखद परिणाम यह है कि अब किसी भी राजनैतिक दल में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह आपातकाल जैसे तानाशाही कदम उठाने की बात भी सोच सके। मगर इस चीज को हमेशा स्मरण में रखकर न्याय प्राप्त करने की प्रतिबद्धता दृढ़ करते रहना आवश्यक है अन्यथा ‘सावधानी हटी और दुर्घटना घटी’ की तरह जैसे ही ‘सतत् सतर्कता कम हुई कि तानाशाही फिर हावी’ हो जायेगी।
राधाकृष्ण मंदिर रोड़, डडवाड़ा, कोटा जंक्शन 

       

सम्पूर्ण हिन्दू समाज का मनोबल बडा है- राजेन्द्र प्रसाद द्विवेदी


          कोटा 10 जून।राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की 85 वषों की साधना के फलस्वरूप हिन्दू समाज जाग्रत , क्रियाशील और संगठित हुआ है। संघ कार्य में प्रभावीवृद्धि हुई है। समाज के प्रत्येक क्षैत्र में संघ के स्वंयसेवक प्रभावी भूमिका निभा रहे है। हिन्दू समाज ने श्रीराम जन्मभूमि , रामसेतु और बाबा अमरनाथ से जुडे तीन बडे संर्घषों में संगठन शक्ति के बल पर सफलता पाई है।यह तथ्य राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के राजस्थान क्षैत्र के क्षैत्रीय सम्पर्क प्रमुख राजेन्द्र प्रसाद द्विवेदी ने कोटा में प्रथम वर्ष ,संघ शिक्षा वर्ग के समापन समारोह को सम्बोधित करते हुए कहे।
          उन्होने कहा “ जिस हिन्दू समाज का संगठन करना मजाक का विषय समक्षा जाता था,उस सोये हिन्दू समाज को जाग्रत कर एक जुट करने का चमत्कार संघ ने कर दिखया है। संघ की स्थापना से लेकर आज तक 85 साल की साधना में सफलता के कई आयाम जुडे हैं। संघ देश में अनुशासन और देशभक्ती का वातावरण देखना चाहता है और इस दिशा में उसका अभियान जारी है।” मुख्यवक्ता ने कहा संघ की साधना व्यर्थ नहीं जा रही ,बल्कि परिणाम खडे कर रही हे।
         द्विवेदी ने विस्तारपूर्वक बताया कि अयोध्या में बाबरीढाचा हिन्दू समाज को गर्दन झुकाने को मजबूर करता था,आंख झुका कर वहां जाना होता था। अब वहां बाबरी ढांचा नहीं है,श्रीराम मंदिर है, उसे भव्य बनाने का कार्य भी आगे पूरा हो ही जायेगा। यह हिन्दू समाज के संगठित होनें से ही संभव हुआ। इसी प्रकार हिन्दुओं का पवित्र आस्था केन्द्र रामसेतु तोडा जाना प्रारम्भ हो गया था,पूरे देश में दो घंटे का चक्काजाम हुआ और रामसेतु तोडा जाना बंद हो गया । इसी प्रकार जम्मू-कश्मीर सरकार ने पवित्र बाबा अमरनाथ यात्रा से जुडी शाइनबोर्ड को दी गईं विकास सुविधाओं की योजना कुछ कटटरपंथियों के दबाव में वापस ले ली गईं थी, तब 2 महीनें तक कर्फयू में वहां हिन्दू समाज ने संर्घष किया, 2-2 लाख महिलायें बच्चे संर्घष में जुटे,अभूतपूर्व आंदोलन के द्वारा सफलता हांसिल की गई। उन्होने कहा इन सफलताओं से सम्पूर्ण हिन्दू समाज का मनोबल बडा है।
          उन्होने कहा समाज को दुष्टों की दुष्टता से कहीं अधिक क्षति सज्जनों की उदासीनता से पहुचती है। सज्जन समाज में 90 प्रतिशत होते हैं जबकि दुर्जनों की संख्या 10 प्रतिशत से भी कम होती है। किन्तु वे अधिक सक्रीयता से प्रभावित करते है। समाज को सबल होने के लिये सज्जनों की प्रभावी सक्रीयता होनी चाहिये, इसमें निरंतर क्रियाशीलता की आवश्यकता है। द्विवेदी ने कहा देशभक्ती की आग जलती रहनी चाहिये , स्वंयसेवक वही जो निरंतर क्रियाशील हो। क्रियाशीलता को जगायें और मातृभूमि को परम वैभव पर पहुवानें कर स्वप्न साकार करें।
         उन्होने कहा हमेशा सत्य की विजय होती है, दुर्जन हमेशा हारता है,श्रीराम ने रावण को , श्रीकृष्ण ने कंस को और प्रहलाद ने हिरण्यकश्यपु को पराजित किया । रावण , कंस और हिरण्यकश्यपु राजा थे ,सत्ताशीन थे , सभी शक्तियां उनके पास थीं। जबकि राम,कृष्ण और प्रहलाद उनके सामने कुछ भी नहीं थे मगर वे सत्य के मार्ग पर थे और ध्येय के प्रति सक्रीयता से अंन्ततः उनकी विजय हुई। 
द्विवेदी ने संघ कार्यों के विस्तार के वारे में बताते हुये कहा “ संघ के कार्या का आंकलन मात्र संघ की शाखायें गिनने से नहीं हो सकता,संघ कार्य का अब अनेकों क्षैत्रों में विस्तार हुआ है और यह वट वृक्ष की तरह विशाल और बहुआयामी हुआ है। शिक्षा, वनवासी कल्याण,चिकित्सा, सेवा प्रकल्प,श्रमिक, किसान और विद्यार्थी क्षैत्रों सहित बहु आयामी हुआ हे। कार्य का कई गुना विस्तार हुआ है।”
       उन्होने कहा “ एक समय था जब हिन्दु समाज का संगठित करना दुर्लभ कार्य माना जाता था , हिन्दू कहलाने में भी शर्म महसूस की जाती थी। संघ की 85 वर्षों की साधना अब सफल हो रही है, हिन्दू हिन्दू के नाम के साथ स्वाभिमान के साथ खडा हुआ है। हिन्दु समाज के संगठन कार्य में समय तो लगा है जिस तरह बडे भगोनें में उवाल आने में समय लगता है यह कार्य बडे समाज को संगठित करने सेे जुडा हुआ था, अब बोइलिंग प्वाइंट की ओर हम बड रहे है।अब वह दिन दूर नहीं है जब यह जाग्रह समाज देशहित की भूमिकाओं को प्रभावी ढग से निभानें में सक्षम होगा।” कार्यक्रम के मुख्यअथिति प्रमोद पालीवाल और वर्गाधिकारी चांदमल सोमानी थे। इससे पूर्व में वर्ग कार्यवाह महेन्द्र जैन ने प्रतिवेदन पढ कर सुनाया ।

दयानिधि मारन का इस्तीफा

 ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) ने गुरुवार को केंद्रीय कपड़ा मंत्री दयानिधि मारन द्वारा अपना इस्तीफा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंपने का स्वागत किया। पार्टी ने मारन के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल करने के साथ ही उनकी गिरफ्तारी की भी मांग की।

एआईएडीएमके के सांसद वी. मैत्रेयन ने आईएएनएस से कहा, "यह अच्छी बात है कि मारन ने अब इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने पहले इस्तीफा दिया होता तो और बेहतर होता। अब कानून अपना काम तेजी से करेगा। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को अपनी जांच में तेजी लाते हुए उनके खिलाफ आरोपपत्र दायर कर उन्हें गिरफ्तार करना चाहिए।"
सूत्रों ने बताया कि 2जी स्पेक्ट्रम मामले में मारन द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) के दूसरे नेता हैं जिन्हें मंत्रिमंडल से हटना पड़ा है। माना जाता है कि उन्होंने अपना इस्तीफा मंत्रिमंडल की बैठक के बाद प्रधानमंत्री को सौंपा।

मारन के इस्तीफे पर राजनीतिक टीकाकार चो रामास्वामी ने कहा, "कभी नहीं के बजाय उन्होंने देरी से ही इस्तीफा दिया जो कि अच्छी बात है।"

चो ने आईएएनएस से कहा, "डीएमके अपना गठबंधन कांग्रेस के साथ जारी रखेगा..इस बीच कांग्रेस चाहती है कि डीएमके खुद ही गठबंधन से अलग हो जाए।"

उल्लेखनीय है कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच कर रही सीबीआई ने बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय में अपनी स्थिति रिपोर्ट दाखिल की। रिपोर्ट में उसने वर्ष 2006 में केंद्रीय दूरसंचार मंत्री रहे मारन की भूमिका पर अंगुली उठाई। इसके बाद मारन ने केंद्रीय कपड़ा मंत्री के पद से इस्तीफा दिया है 

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केंद्रीय कपड़ा मंत्री दयानिधि मारन भी 2जी घोटाले मामले में सीबीआई के रडार में आ गए हैं.
सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में पेश अपनी स्टेटस रिपोर्ट में कहा है कि पूर्व टेलीकॉम मंत्री दयानिधि मारन ने वर्ष 2006 में एअरसेल टेलीकॉम कंपनी के मालिक शिवशंकरन पर अपनी कंपनी को मलेशिया की एक कंपनी मैक्सिस को बेचने के लिए कथित तौर पर दबाव डाला था.
सीबीआई ने जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस एके गांगुली से कहा कि उसे जाँच पूरी करने के लिए तीन महीने का वक्त चाहिए. हालांकि सीबीआई की तरफ़ से मारन का नाम नहीं लिया गया.
सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय ने अदालत को बताया कि उसने सात देशों में जाँच की है और उसे 2जी घोटाले के पैसे को ढूंढने में 18 से ज़्यादा महीने लग जाएंगे.
दयानिधि मारन पर आरोप है कि उन्होंने वर्ष 2004 और 2007 के अपने टेलीकॉम मंत्री के कार्यकाल के दौरान एअरसेल के मालिक सी शिवशंकरन पर कथित तौर पर दबाव डाला कि वो अपनी कंपनी एअरसेल को मैक्सिस के मालिक और मारन के मित्र टी आनंद कृष्णन को बेच दें.
शिवशंकरन टेलीकॉम लाईसेंसे लेने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद उनकी मेहनत रंग नहीं लाई. मजबूरन उन्होंने अपनी कंपनी मैक्सिस को बेच दी.
मैं खुश हैं कि सीबीआई नेक कदम उठाया है. दयानिधि मारन से ये उम्मीद करना कि वो मामले की नैतिक ज़िम्मेदारी लेकर पद से इस्तीफ़ा दे दें. वक्त आ गया है कि प्रधानमंत्री उन्हें अपने कैबिनट से निकाल दें
जयललिता, एआएडीएमके प्रमुख
इस सौदे के कुछ हफ़्तों के अंदर ही मैक्सिस की एक दूसरी कंपनी ने मारन की कंपनी में निवेश किया था.
सीबीआई को दिए गए अपने वक्तव्य में शिवशंकन ने इस आरोप को दोहराया था कि उन पर अपनी कंपनी को बेचने का दबाव डाला गया था.
मारन ने इन आरोपों से इंकार किया था. मारन ने कहा था कि शिवशंकरन खुद अपनी कंपनी को बेचने के इच्छुक थे.
सीबीआई के वक्तव्य के बाद मारन पर इस्तीफ़ा देना का दबाव बढ़ेगा.
उधर तमिलनाडु की मुख्यमंत्री और एआईडीएमस प्रमुख जयललिता ने मारन के इस्तीफ़े की मांग की है.
जयललिता ने कहा कि सीबीआई वही कर रही है जो देश के लोग उससे उम्मीद कर रहे हैं, वक्त आ गया था कि सीबीआई इस बारे में कार्रवाई करे.
उन्होंने कहा "मैं खुश हूँ कि सीबीआई ने ये कदम उठाया है. दयानिधि मारन से ये उम्मीद करना कि वो मामले की नैतिक ज़िम्मेदारी लेकर पद से इस्तीफ़ा दे दें. वक्त आ गया है कि प्रधानमंत्री उन्हें अपनी कैबिनेट से निकाल दें."

एंग्री यंग मैन:'बुढ्ढा होगा तेरा बाप'

'बुढ्ढा होगा तेरा बाप' में अमिताभ बच्चन स्टाइलिश दिखने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। अपने डिज़ाइनर स्कार्व्स, डेनिम्स और ब्रैंडेड ग्लेयर्स के साथ इन दिनों उन्हें बेहद कूल लुक में देखा जा सकता है। वैसे इसी स्टाइल के चलते उन्होंने फ़िल्म में एक साथ दो घडि़यां पहनी हैं। देखते हैं, स्टाइल के साथ बिग बी की यह 'डबल डोज़' स्क्रीन पर कैसी रहती है!

ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी और अमिताभ बच्चन ने साथ में नसीब, सत्ते पे सत्ता, बाग़बान और बाबुल जैसी फ़िल्मों में साथ काम किया. अब दोनों फिर नज़र आएंगे एबी कॉर्प की अगली फ़िल्म 'बुड्ढा होगा तेरा बाप' में.
हेमा, अमिताभ को शानदार अभिनेता होने के साथ-साथ काफ़ी ख़ुशकिस्मत भी मानती हैं.
मुंबई में 'बुड्ढा होगा तेरा बाप' के प्रमोशन पर हेमा ने कहा, "इस उम्र में भी उन्हें इतने बढ़िया और चैलेंजिंग रोल करने को मिल रहे हैं. जो मेरे जैसी अभिनेत्री को अब नहीं मिलते. इसलिए मुझे उनसे जलन होती है."
इस उम्र में भी अमिताभ को इतने बढ़िया और चैलेंजिंग रोल करने को मिल रहे हैं. जो मेरे जैसी अभिनेत्री को अब नहीं मिलते. इसलिए मुझे उनसे जलन होती है.
हेमा मालिनी, अभिनेत्री
हेमा मालिनी और अमिताभ 70 के दशक की फ़िल्म 'कसौटी' में पहली बार साथ नज़र आए थे. हेमा जी के मुताबिक़ तब से लेकर अब तक अमिताभ बच्चन में कोई बदलाव नहीं आया.
वो कहती हैं, "अमिताभ अब भी उसी संजीदगी से अभिनय करते हैं. अमित जी जो रोल करते हैं उसमें जान डाल देते हैं. उनके जैसे ज़बरदस्त ऐक्टर के साथ काम करना हमेशा बेहतरीन अनुभव रहता है."
हेमा ने अमिताभ की तारीफ़ जारी रखते हुए कहा कि अच्छा अभिनय तो काफ़ी सारे कलाकार कर लेते हैं, लेकिन अमिताभ बेहतरीन अभिनय, शानदार डांसर होने के साथ-साथ ज़ोरदार गायक भी हैं. वो सब कुछ कर सकते हैं. मैंने उन्हें एक बार सितार बजाते हुए भी देखा. यक़ीन जानिए वो सितार भी बहुत अच्छा बजा रहे थे.
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फिल्म: बुड्ढा होगा तेरा बाप
कलाकार: अमिताभ बच्चन, सोनू सूद, सोनल चौहान, हेमा मालिनी
निर्देशक: पुरी जगन्नाथ
निर्माता: एबीकॉर्प
अमिताभ का एक्शन रिप्ले
रेटिंग: दो स्टार

अमिताभ बच्चन फिल्म पा के बाद पहली बार अभिनेता के तौर पर दर्शकों के सामने बुड्ढा होगा तेरा बाप में नजर आ रहे हैं। निस्संदेह ऑरो की भूमिका में उन्होंने फिल्म पा में जो छाप छोड़ी है। वह अदभुत है, लेकिन उनकी ऑरो के बाद जब फिल्म बुङ्ढा होगा तेरा बाप में उनके अभिनय की शैली को देखें तो निराशा होती है।

चूंकि अमिताभ निस्संदेह अभिनय क्षमता वाले अभिनेता हैं। वे जब भी दर्शकों के सामने आते हैं तो दर्शकों की उम्मीदें उनसे बढ़ जाती हैं, लेकिन फिल्म बुङ्ढा को देखने के बाद शायद दर्शक दुखी हों। क्‍योंकि बुङ्ढा में उन्हें जिन जिन भी रूपों व स्टइल में दिखाने की कोशिश की गयी है। वह एक तरह से अमिताभ की पुरानी फिल्मों व उनके स्टाइल का एक्शन रिप्ले है। वे सारी चीजें जो हमने अमिताभ की फिल्मों में आज से पहले कई बार देख ली है।

फिर से दर्शकों के सामने हैं। पूरी फिल्म में अमिताभ ने एकाधिकार राज किया है। फिल्म की कहानी में फिल्म की कहानी विज्जू के इर्द-गिर्द घूमती है। वह पेरिस में गैंगस्टर है। वापस लौट कर मुंबई आता है और एसीपी करण को मारने की जिम्मेदारी लेता है। इसी दौरान करण-तान्या से उनकी मुलाकात होती है। फिल्म में रवीना विज्जू को पसंद करती है और कहानी में कई मोड़ आते जाते हैं।

फिल्म के गाने अत्यधिक लाउड हैं। खासतौर से फिल्म का गीत 'गो मीरा गो' में अमिताभ कुछ भी खास असर नहीं छोड़ पा रहे। मसाला फिल्मों के रूप में भी इस फिल्म में कुछ भी नया नहीं। अमिताभ जिस स्तर पर हैं। उन्हें अब पा जैसी अधिक से अधिक फिल्में करनी चाहिए। फिल्म में प्रकाश राज ने बेहतरीन भूमिका निभाई है। हेमा मालिनी के साथ के दृश्यों में भी अमिताभ कुछ खास प्रभाव नहीं छोड़ पाते। बावजूद इसेक अमिताभ के फैन फिल्म जरूर देखना पसंद करेंगे।

सदी के महानायक लंबे अरसे के बाद फिर से बुङ्ढा होगा तेरा बाप में नजर आनेवाले हैं। पेश है उनसे बातचीत के मुख्य अंश अब तो आप दादा भी बनने जा रहे हैं, और इसके बावजूद आप मानने को तैयार नहीं कि आप बुजुर्ग हो चुके हैं। यह आपसे किसने कह दिया। मैं इस फिल्म में एक किरदार निभा रहा हूं। लेकिन सच यह है कि मैं अब बुङ्ढा हो गया हूं। और मुझे बेहद खुशी है कि हमारे घर में नया मेहमान आने जा रहा है।

उम्र के इस पड़ाव पर बुङ्ढा होगा तेरा बाप जैसी फिल्मों में अभिनय करने की खास वजह?

ऐसी कोई भी खास वजह नहीं है। मैं कलाकार हूं और कोशिश रहती है कि मेरे सामने जो भी ऑफर आये उसे सोच समझ कर देख कर ही चयनीत करूं। वही कर राह हूं। राम गोपाल वर्मा ने मुझे पुरी जगन्नाथ से मिलवाया था। उनके पास मेरे लिए विषय था। मेरे पास वक्त था। मेरे लिए यह किरदार एक चुनौती थी। सो स्वीकार लिया।

आरक्षण फिल्म भी जल्द ही रिलीज होगी।
जी हां एक बार फिर से अलग तरह के किरदार में आपलोगों के सामने होगा। उस फिल्म के बारे में कुछ दिनों में विस्तार से बातचीत करेंगे।
फिल्म के चरित्र के बारे में बतायें इसमें मैंने एक बुजुर्ग हिटमैन का चरित्र निभाया है, जो कि कई वर्षों से मुंबई छोड़ कर पेरिस में रह रहा है। अचानक उसे एक काम के सिलसिले में मुंबई आना पड़ता है। और फिर उसके साथ जो कुछ होता है उसका चित्रण है।

फिल्म के एक्शन सीन

फिल्म में तमाम बेहतरीन एक्शन सीन हैं। अच्छे नृत्य हैं। संगीत भी अच्छा है। फिल्म में डब स्टेपवाले गाने के अलावा चार गाने हैं, जिनमें से तीन गाने मैंने गाये हैं। जिसमें से एक गाना हैं हाल ए दिल जो मुझ पर और हेमाजी पर फिल्माया गया है। बुङ्ढा होगा तेरा बाप को अक्कारपेला स्टाइल में गाया है। मैंने पहली बार यह प्रयोग किया है। दरअसल, इसमें होता यह है कि जो गीत गाता है, वही अपनी आवाज में इंस्ट्रूमेंट भी बजाता है। इसके अलावा मेरी पुरानी फिल्मों के कुछ पुराने गीत भी हैं। सभी गाने अच्छे हैं।

फिल्मों में गालियों का प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है।

बिल्कुल नहीं। मैं व्यक्तिगत रूप से इस तरह के संवादों व गीतों के खिलाफ हूं। मेरी परवरिश जैसी है। मुझे अपने पूरे खानदान की मान मर्यादा का ख्याल रखना होता है। इसलिए मैं तो कम से कम ऐसा कभी नहीं करूंगा।

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अमिताभ बच्चन...वो नाम जिनके लिए किरदार लिखे जाते है। पिछले चालीस सालों से बॉलीवुड में राज कर रहे बच्चन साहब की जिंदगी में शायद ही कोई ऐसा रोल होगा जो उन्होंने नहीं निभाया होगा। संजिदा, कॉ मिक, खलनायक, चरित्र...वो सबकुछ जो एक अभिनय की लिस्ट में होता है... अमित जी ने निभा दिया है। वो चलती फिरती किताब है जिसका हर एक अंक बहुत ही दिलचस्प है।

इन दिनों अमिताभ की चर्चा उनकी आने वाली फिल्म 'बुड्ढा होगा तेरा बाप' को लेकर हो रही है। इस फिल्म में जो किरदार अमिताभ निभा रहे हैं वो बेहद ही दिलचस्प है, ये एक ऐसे बूढ़े इंसान की कहानी है जो केवल नाम का बूढ़ा है। उसका दिल आज भी नहीं मानता कि वो बूढ़ा हो चुका है। वो रंगीले कपड़े पहनता है, रसिया बनने की कोशिश करता है।

लड़कों की तरह चुहलबाजी करता है और तो और वो डांस भी करता है। सबसे दिलचस्प बात ये है कि इस रसिया की सब सुनते भी है। जीं हां ये ही मजेदार किरदार अमित जी अपनी फिल्म में निभा रहे हैं। अमित जी ने कहा है कि ये एक बहुत मजेदार फिल्म है जिसे उम्मीद करता हूं कि लोग जरूर पसंद करेगें। फिल्म 1 जूलाई को रूपहले पर्दे पर आ रही है।

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मैं बुड्ढा नहीं हूं : अमिताभ बच्चन

वे सदी के महानायक हैं, क्योंकि वे अनुशासित हैं और निर्भीक भी. उनका मानना है कि वे कलाकार वाकई भाग्यशाली हैं, जिन्हें हर बार नये-नये किरदार निभाने के मौके मिलते हैं. खासतौर से अपने बारे में उनकी यही राय है. यह उनकी कला की खासियत है, जिसने इस बुजुर्ग को अपने से कम उम्र का किरदार निभाने का मौका दिया है.
बात हो रही है बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन की. सिनेमा को कला का ही एक रूप माननेवाले महानायक अमिताभ बच्चन एक बार फ़िर से दर्शकों के सामने फ़िल्म बुड्ढा होगा तेरा बाप लेकर आ रहे हैं. आज भी अमिताभ अपने किरदारों से दर्शकों को अचंभित कर देते हैं. अपनी आनेवाली फ़िल्मों से जुड़े कई पहलुओं पर अमिताभ बच्चन से उर्मिला कोरी  ने विस्तार से बातचीत की. .
एक बार फ़िर दर्शक मुझे विजय न सही लेकिन विजू नाम वाले किरदार में देख पायेंगे. इस फ़िल्म में मेरे किरदार का नाम विजू है. जो एक रिटायर्ड गैंगस्टर है. वह दुबई में रहता है, किसी काम की वजह से उसे मुंबई आना पड़ता है. वह काम कौन-सा है यह तो मैं नहीं बताऊंगा. उसके लिए आपको फ़िल्म देखनी पड़ेगी. भले ही विजू की उम्र ज्यादा हो गयी है, लेकिन उसे गुस्सा बहुत आता है. ( हंसते हुए ) आप उसे एंग्री ओल्ड मैन का खिताब दे सकते हैं. उसका गुस्सा किस तरह से उसे एक के बाद एक मुसीबत में फ़ंसाता है इसी की कहानी है बुढ्ढा होगा तेरा बाप.
रोमांस के साथ एक्शन भी :
इस फ़िल्म में जिस तरह से मेरे कप़ड़े रंगीन हैं, उसी तरह मेरा किरदार भी काफ़ी रंगीन है. फ़िल्म में मैं तीन-तीन अभिनेत्रियों के साथ नजर आऊंगा. मीडिया में इस बात की जमकर चर्चा हो रही है. ( हंसते हुए ) अरे भाई सिर्फ़ रोमांस ही नहीं किया. काफ़ी मार-धाड़ भी की है. इस उम्र में एक्शन सीन करना बहुत मुश्किल भरा काम होता है, लेकिन किया. मुझे उम्मीद है कि रोमांस ही नहीं मेरा एक्शन भी मेरे दर्शकों को पसंद आयेगा.
सिर्फ़ कालिया का डॉयलाग है :
इस फ़िल्म के प्रोमो में कालिया का डॉयलाग-जहां से हम खड़े होते हैं, वहीं से लाइन शुरू हो जाती है, को आप लोग इन दिनों सुन रहे होंगे. यदि लोग सोचते हैं कि इस फ़िल्म में कई मेरी पुरानी फ़िल्मों से मिलते-जुलते डॉयलाग होंगे तो ऐसा बिल्कुल नहीं है. इस फ़िल्म में पुरानी फ़िल्मों के जैसा सिर्फ़ यही एक डॉयलॉग है. वैसे मैं मौजूदा दौर की फ़िल्मों की पटकथा में इस बात को मिस करता हूं. अब वैसे डॉयलाग फ़िल्मों में सुनने को नहीं मिलते हैं. अकसर लोग कहते हैं कि आजकल की युवा पीढ़ी लफ्फ़ाजी पसंद नहीं करती है. वह साधारण शब्दों में बात को सुनना पसंद करती है, लेकिन अपने वर्ल्ड टूर शोज के दौरान मैंने बिल्कुल इसके विपरीत देखा है. मेरे वर्ल्ड टूर शोज के दौरान एक सेगमेंट ऐसा होता है जब मैं प्रशंसकों के बीच अपनी फ़िल्म दीवार, अग्निपथ, सिलसिला सहित कई फ़िल्मों के डॉयलाग को आधे घंटे तक बोलता हूं. आप विश्वास नहीं करेंगे सारे दर्शक एकदम चुपचाप मेरे हर डॉयलाग को न सिर्फ़ सुनते हैं, बल्कि जमकर तालियां भी बजाते हैं. उन दर्शकों की भीड़ में ज्यादातर मौजूदा दौर की युवा पीढ़ी ही होती है.
डायरेक्टर एक्टर हूं :
इस फ़िल्म में मैंने तीन गाने गाये हैं. मैं गाऊं, यह आइडिया पुरी जगन्नाथ जी का ही था. उन्होंने मुझसे कहा कि मुझे गाना चाहिए. एक एक्टर के तौर पर मैं हमेशा से डायरेक्टर एक्टर रहा हूं. वैसे इस फ़िल्म की टाइटल धुन यूं ही बन गयी थी. वर्ल्ड टूर के दौरान यूं ही बैठे-बैठे एक दिन डिनर करते हुए विशाल शेखर ने वह धुन बना दी थी. मुंबई वापस आने के बाद हम सभी भूल गये थे, लेकिन जब पुरी जगन्नाथ जी मुझसे इस फ़िल्म के गीत-संगीत की चर्चा कर रहे थे, उस वक्त विशाल भी वहां मौजूद थे.
हमारा ध्यान अचानक उस धुन पर चला गया, जो हमने यूरोप में खाने के टेबल पर बैठे-बैठे बनायी थी और उस पर गाना बन गया. इस गाने में मैंने कई सारे वाद्य यंत्रों की आवाज भी अपने मुंह से निकाली है, जिसकी चर्चा मीडिया में भी हुई थी. मैं बता देना चाहूंगा कि मुंह से वाद्य यंत्रों की आवाज निकालना उतना मुश्किल नहीं है, जितना कि उन्हें बजाना.
मेरे घर और ऑफ़िस में आपको कई सारे ऐसे वाद्य यंत्र मिल जायेंगे. मेरे ऑफ़िस में तो बड़ा सा पियानो भी है जो हाल में किसी ने मुझे गिफ्ट किया है. लेकिन, मैं उसे बजा नहीं पाता हूं. ( हंसते हुए ) हां ऑफ़िस में खाली समय में उसे बजाने का नाटक जरूर कर लेता  हूं. वैसे मैं सोच रहा हूं कि जब फ़िल्मों में मुझे काम मिलना बंद हो जायेगा तो मैं खाली समय में उन वाद्य यंत्रों को बजाना सीखूंगा.
एंग्री यंग मैंन विजय का किरदार था :
एंग्री यंग मैन यानि अमिताभ बच्चन को इस टैग से मुक्त कीजिए. मैं आपको बता देना चाहूंगा कि मैं एंग्री यंग मैन नहीं हूं. एंग्री यंग मैन विजय का किरदार था. वह विजय जिसे सलीम -जावेद ने क्रिएट किया था. वो किरदार उस व  भारत के हर आम आदमी का प्रतिनिधित्व करता था, क्योंकि उस दौर का आदमी बेरोजगारी का शिकार था. उसी दर्द के गुस्से ने विजय को जन्म दिया. मुझे एंग्री यंग मैन के तौर पर अभिनेता उल्लास याद आते हैं.

सलवा जुड़म पर रोक से माओवाद और पनपेगा !

- अरविन्द सिसोदिया 
 सर्वोच्च न्यायालय नें हालही में दिए एक निर्णय में, आदिवासी आत्मरक्षा से जुड़े सलवा जुड्म और कोय कमांडो को भंग कर दिया है | यह गलत हुआ क्यों की माओवाद को रोकनें में सझम तरीका समाप्त हो जानें से , यह विकराल समस्या और बढेगी !! पूरे देश में आत्म रक्षा के लिए हथियार दिए जाते हैं , उसमें कहीं भी यह नहीं देखा जाता की लायसेंसी की  योग्यता क्या है , क्यों की सवाल आत्मरक्षा का होता  है ? माओवाद ने पूरे देश के लगभग आधे भूभाग पर अपना विस्तार पा लिया है , उनके पीछे कौन सी शक्तियाँ हैं यह भी बात लगभग स्पष्ट है ! मेरी स्पष्ट मान्यता है कि जो मानवाधिकार का उल्लंघन करके अन्याय; अधर्म और अत्याचार करता है वह अपने मानवाधिकार को खो देता  है ! इसी प्रकार जब कोई संगठन संविधान के मार्ग को छोड़ देता  है तो वह संवैधानिक संरक्षण भी खो देता है ! जिस तरह सेना शत्रु से लड़ते वक्त अपने विवेकाधिकार से काम लेने स्वतंत्र है उसी तरह माओवाद से रक्षा सरकार की  व्यवस्था नहीं कर सकती तो , उससे प्रभावितों को आत्म रक्षा के लिए हथियार और क़ानूनी ताकत देना ही तो एक मात्र मार्ग है ! हर घर के आगे पुलिस तो बिठाई नहीं जा सकती ! अच्छा होता सर्वोच्च न्यायालय इसमें सुधार के रास्ते सुझाता ! प्रशिक्षण की बात करते !! मगर एक ही झटके में वहां लोकतंत्र कि रक्षा कर रहे लोगों को भंग किया जाना , माओवादियों को लाभ पहुचना ही होगा !