सोमवार, 1 अगस्त 2011

फिर गुलामी न आये....!


- अरविन्द सीसौदिया
शहीदों को सलाम....!
न फूल चढ़े, न दीप जले,
न नाम तुम्हारे जानें हैं।
पर लक्ष्य तुम्हारा गंगा सा पावन,
साहस तुम्हारा हिमालय से ऊंचा।
तुम बलिदान हुए, देश आजाद हुआ,
शत-शत तुम्हें प्रणाम हमारा है।।
आत्मनिरीक्षण अवश्य हो....!
आजादी की बात यहीं से शुरू होगी। क्योंकि कंगुरों पर किसने ध्वज लहराये, सत्ता का सुख किसने भोगा, उसका महत्त्व नहीं है। महत्त्व इसका है कि इस मजबूत नींव में कौन-कौन समाये हैं। किनके बलिदान पर यह स्वतंत्रता की इमारत खड़ी है। इस इमारत में कौन से रंग भरने के सपने देखे थे, कौन-कौन पूरे हुए और कौन-कौन अधूरे हैं....।
फिर गुलामी न आये....!
तथ्य की बात यह हे कि यह आजादी एक बहुत बड़ी कीमत अदा करके मिली है, इसे अक्ष्क्षुण्ण रखना होगा और यह भी याद रखना होगा कि अबके अगर गुलाम हुए तो शायद फिर आजाद नहीं हो पायेंगे।
पिछले साठ साल की उपलब्धि है कि हम आजाद हैं, हमारी सीमायें काफी हद तक यथावत है। पड़ौसी चीन और पाकिस्तान ने हमारे कुछ भू भाग दबा रखे हैं, उन्हें मुक्त करवाना है। सत्ता की अदला बदली हो गई, मगर शेष स्वतंत्रतायें बाकी हैं, गुलामी के अवशेष हटाने हैं। पश्चिम से आ रहा सांस्कृतिक प्रदूषण रोकना है।
हिन्दुत्व की सनातन यात्रा
हिमालय की हिम नदियों के किनारे पनपी और दुनियाभर में छा गई इस सभ्यता का नाम ‘हिन्दुत्व’ है। इस सभ्यता की यात्रा को ‘सनातन’ कहा जाता है क्योंकि यह सदा नूतनता से भरी हुई है। इसीलिये संविधान सभा में पहले ही दिन अस्थायी अध्यक्ष डा. सच्चिदानन्द सिन्हा ने इस अमर सभ्यता को कवि इकबाल के शेर से सुशोभित किया था:
‘यूनान, मिस्र, रोमां सब मिट गये जहां से,
बाकी अभी तलक है नामो निशां हमारा।
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
सदियों रहा है दुश्मन दौर ए जहां हमारा।।’
नई विजय : 15 अगस्त 1947
हमारी हिन्दू संस्कृति पर आक्रमण होते रहे, क्रूर, असभ्य और बलशाली जातियां आती रहीं और कुछ संघर्ष, कुछ ज्यादतियों के बाद वे हममें ही गुम हो गई, पच गई। क्योंकि वे सब हमसे ही उपजी, हमसे ही बिछुड़ी और श्रेष्ठतायें भूल गईं थी, जिसके चलते अन्ततः हमारी विजय हुई। ऐसी नवीनतम विजय का दिन 15 अगस्त 1947 है, जिसे हम प्रतिवर्ष स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते हैं। 
सत्य को पहचानो और आगे बढो...!
किसी भी बात को सोचने के दो तरीके हैं, पहला है गिलास आधा भरा हुआ है, यानि कि सकारात्मक विचारधारा और दूसरा है यह गिलास आधा खाली है यानि कि नकारात्मक विचाराधारा...! मगर दोनों का अपना-अपना महत्त्व है।
स्वतंत्रता के पश्चात सकारात्मक तथ्य यह है कि आज हम परमाणु शक्ति सम्पन्न देश हैं। प्रक्षेपास्त्र प्रणाली में भी लगातार आगे बढ़ रहे हैं, कम्प्यूटर क्षेत्र में भी आगे हैं, उन्नति की महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। कुल मिलाकर आधुनिक जमाने के साथ, विकसित देशों की बराबरी से चलने की कोशिश कर रहे हैं।
नकारात्मक पहलू यह है कि गुलामी के तमाम अवशेष बने हुए हैं, मातृभाषायें गुलाम हैं। बिजली, पानी में अव्यवस्था है, 60 फीसदी क्षैत्रफल अभी भी वर्षा पर निर्भर है, कृषक आत्महत्यायें कर रहे हैं। गरीब और गरीब हो रहा है, अमीर और अमीर हो रहा है, दोनों की बीच खाई निरंतर चैड़ी होती जा रही है। अपराध बढ़ रहे हैं, पूरा देश संगठित अपराधियों की चपेट में आ रहा है, जनसंख्या आक्रमण हो चुका है, घुसपैठ जारी है, आतंकवाद और नक्सलवादी हिंसा से देश लहुलुहान है, साम्प्रदायिकता को सरकारी शह दी जा रही है। विदेशी षडयंत्र आसानी से फलफूल रहे है। विदेशी धर्मान्तरण की साम्प्रदायिकता अट्टाहस कर रही है।
अच्छी-बुरी दोनों तरह की बातें हैं, मगर देश में लोकतंत्र है, स्वतंत्रता है और मूल अधिकार हैं। जिम्मेवार और लोकतंत्र रक्षक विपक्ष और अन्य दल है। आज देश अपनी प्रगति को स्वतंत्र हैं।
गांधीजी: अहिंसा से आजादी की ओर
महात्मा गांधी ने आजादी की लडाई में जिस अहिंसा के मार्ग को चुना, उसे आज संयुक्त राष्ट्र महासंघ ने भी स्वीकार किया और उनके जन्म दिन 2 अक्टूबर को विश्व शांंित दिवस घोषित किया है। यह कोई नया अविष्कार नहीं था, वरन् यही सनातन सभ्यता है और यह उसका एक पड़ाव है। इससे पूर्व भी हिन्दुत्व ने हमेशा ही विश्व कल्याण और मानव कल्याण की बात की है, क्योंकि यह संस्कृति जानती है कि असली राजा तो परमपिता परमेश्वर ही है और उसकी आज्ञायें ही अक्ष्क्षुण्य है और यह पृथ्वी प्राणियों की विभिन्न प्रजातियों का एक कुटुम्ब है। महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा का प्रयोग किया जो सनातन विशेषता की ही विजय है।
शौर्य शिरोमणि: नेताजी सुभाषचंद्र बोस
स्वतंत्र भारत की पहली सरकार सही मायने में, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में 21 अक्टूबर 1943 में बनी। इसका एक मंत्रीमण्डल भी था, इसे विश्व के 9 देशों ने मान्यता दे दी थी। नेताजी के भाषण रेडियो से प्रसारित होते थे। नवम्बर 1943 में जापान ने अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह इस सरकार को सौंप दिये। 31 दिसम्बर 1943 को इस सरकार ने इन द्वीपों पर अधिकार कर लिया और इनका नाम ‘शहीद’ और ‘स्वराज’ रख दिया। आजाद हिन्द फौज ने कोहिमा में भी तिरंगा फहरा दिया।
इस बीच जापान का पतन हो गया,18 अगस्त 1945 को टोकियो जाते हुए विमान दुर्घटना में सुभाषचन्द बोस की कथित मृत्यु हो गई। नेताजी विश्व में हिन्दुत्व के शौर्य पुरूष बनें।
पटेल: 565 रियासतों का विलय
यूं तो सारी कांग्रेस पार्टी और देश सरदार पटेल प्रधानमंत्री के रूप में चाहता था किंतु गांधीजी की जिद के कारण पं. जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बने। अंग्रेजों ने और विशेषकर नेहरू जी के खासमखास लाॅर्ड माउंटबैटन ने अपना पिण्ड छुड़ाने के लिए रियासतों को पूरी तरह स्वतंत्रता दी थी कि वह अलग स्वतंत्र राष्ट्र रहें अथवा भारत अथवा पाकिस्तान में से किसी में भी सम्मिलित हो जायें। ऐसी स्थिति में 565 रियासतें 565 लघु राष्ट्र हो गये थे, किंतु यह सरदार वल्लभ भाई पटेल का ही पुरूषार्थ था तथा यह उन रियासतों का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद था कि जो विशाल भारत के रूप में एक क्षैत्रफल और एक झण्डे के नीचे खड़े हुए। जिन्होंने एक नेता और एक संविधान को राज्यसत्ता और तमाम सम्मानों को त्याग कर स्वीकार किया।
आजादी के बहाने,  भागे अंग्रेज..
अंग्रेजों ने आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें बड़ी सजा देने दिल्ली लाये। सैनिक विद्रोह हो गया, अंग्रेज समझ गये कि अब भागे नहीं तो हिन्दुस्तानी भगा-भगा कर मार देंगे और आजादी का असल कारक तत्व भी यही घटनाक्रम बना। सच यह है कि भारत तो आजाद 1948 में करना था, मगर1947 में ही आजादी देकर अंग्रेज भारत से भाग चुके थे। इसका एक ही कारण था कि फौज विद्रोही हो चुकी थी, जिसका मूल कारण नेताजी सुभाषचंद्र बोस की शहादत थी !!
पश्चिमी भाषा में, आजादी की गाथा
कोलम्बिया विश्वविद्यालय के प्रो. सी.डी. हेजन ने अपनी पुस्तक आधुनिक यूरोप का इतिहास में लिखा है कि  ‘‘..1857 में सशस्त्र क्रांति की असफलता के पश्चात अंग्रेजों ने अपनी स्थिति को वहां पर ;भारत में अत्यंत सुदृढ़ कर लिया था किन्तु राष्ट्रीय भावना पूर्णतः दबाई नहीं जा सकती थी। 
.....अंग्रेजों ने 1935 के अधिनियम के अनुसार प्रांतों को स्वाधीनता प्रदान की किन्तु भारतीय उससे संतुष्ट नहीं हुए।’’
उन्होंने आगे लिखा है कि ‘‘..इसके पश्चात 1939 में द्वितीय विश्वयु( प्रारम्भ होने पर भारत में स्वतंत्रता की भावना और अधिक बलवती हुई। जनता ने अंग्रेजी शासन के साथ उसकी यु( सम्बन्धी नीति में पूर्ण सहयोग नहीं किया, किन्तु महात्मा गांधी विदेशी सहायता से भारत को मुक्त नहीं कराना चाहते थे। फलतः नेताजी सुभाषचन्द्र बोस भारत छोड़कर चले गये और उन्होंने जापानी संरक्षण में आजाद हिन्द सरकार की स्थापना की। उधर महात्मा गांधी ने 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन प्रारम्भ किया।
‘‘....मुस्लिम लीग देश की स्वतंत्रता में बाधा उत्पन्न करती रही, किन्तु 1945 में यु( समाप्ति के पश्चात इंग्लैंड की श्रमिक सरकार ने भारत को स्वतंत्र करने का वास्तविक प्रयत्न किया। फलतः 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हो गया किन्तु उसका विभाजन हुआ और पाकिस्तान की भी स्थापना हुई।’’
अंत में मैं सिर्फ एक ही बात कहूंगा कि इस विश्व का सर्वोत्तम ग्रंथ जो मानव चेतना का एक महाभियान है 

श्रीमद् भगवद् गीता--अध्याय-(4) (ज्ञानकर्मसन्यासयोग) में एक प्रेरणा है, एक मार्गदर्शन हैः

यदा-यदा ही धर्मस्य:,ग्लानिर्भवतिभारत:।
अभ्युत्थानमअध
र्मस्य,तदात्मानमसृजाम्यहम:।।
( हे भारत ! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने रूपको रचता हूँ (अर्थात् साकाररूपसे प्रकट होता हूँ ।  )
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ 

सरल (साधु) पुरुषोंके उद्धारार्थ, दुष्कर्मीयोंके विनाशार्थ और सच्चे धर्मकी पुनःस्थापना करनेके लिए मैं युग-युगमें प्रकट हुआ करता हूँ ।)

उस तेजस्वी ईश्वर की हम तेजस्वी संतान हैं। हजारों अवसरों पर हमने यह सिद्ध किया है, अब हमारे सामने फिर चुनौतियां हैं और उन पर विजय प्राप्त करने के लिये हम ईश्वर के सेनापति बनकर, दो-दो हाथ करें। आगे बढ़े, हीनता को परास्त करें, समस्याओं को परास्त करें और उठ कर आसमान छू लें। ताकि मातृभूमि को परम वैभव पर बिठाने का स्वप्न पूरा हो सके।

- राधाकृष्णमंदिर रोड़, डडवाड़ा, कोटा जं.

जनता के प्रति जबावदेही के लिए ; राष्ट्रपति का निर्वाचन जनता करे..!


- अरविन्द सीसौदिया
हमारी स्वतंत्रता के लिये राष्ट्रपति पद का कितना महत्व है, यह समझने के लिए हमें 25 जून 1975 की रात्रि 11 बजकर 45 मिनिट पर, तत्कालीन राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इन्दिरा गांधी के कहने पर, लगाये गये आपातकाल को समझना होगा। जिसमें राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत आंतरिक आपातकाल लगा दिया था। जेलों में डाले गये निर्दोषों को न्यायालय मुक्त न कर पाये, इसलिये ‘मीसा’ कानून को न्यायालय के क्षैत्राधिकार से बाहर कर दिया गया था। 

लोगों की जबरिया नसबंदी कर दी गई थी, जबरिया मकान तोड़ दिये गये थे। कोई भी अखबार सरकार के खिलाफ लिख नहीं सकता था, विपक्ष नाम की कोई चीज नहीं रही थी। व्यक्तिगत स्वतंत्रता समाप्त हो गई थी।
सोचने समझने वाली बात यह है कि ऐसा क्यों हुआ! राष्ट्रपति ने बिना जनता की परवाह किये आपातकाल क्यों लगा दिया! इसके दो कारण थे, पहला कारण तो राष्ट्रपति जनता के द्वारा चुना नहीं जाता जो वह जनता के प्रति जवाबदेह होता........, क्योंकि उसको चुनने वाला निर्वाचक मण्डल सांसद और    विधायक होते हैं। जनता इस चुनाव की महज दर्शक होती है! दूसरा कारण राष्ट्रपति पुनर्निवाचन के लिए उन दलों पर निर्भर रहता है जिस पर निर्वाचक मण्डल के सदस्यों का संख्या बल हो, इसलिये वह उस दल को संतुष्ट रखता है। इसी कारण राष्ट्रपति पद महत्वपूर्ण होते हुए भी एक प्रकार से दलगत राजनीति का दास होता है । इन दो कारणों से राष्ट्रपति सबसे महत्वपूर्ण  पदाधिकारी होते हुय भी न तो जनता के प्रति जबाव देह हो पाता और न ही राष्ट्र के प्रति..!! राष्ट्रपति को इस दासता से मुक्ति का एक ही उपाय है कि राष्ट्रपति का निर्वाचन सीधे ‘जनता’ करे, ताकि वह जनता और राष्ट्र के प्रति जबाव देह हो सके।
केशवानन्द भारती प्रकरण में न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना ने चेतावनी दी थी ;24 अप्रैल 1973द्ध कि ‘‘जर्मनी के संविधान के आपातकाल सम्बन्धी अधिकारों की धारा 48 का दुरूपयोग कर हिटलर ने नाजी तानाशाही स्थापित कर ली थी। भारतीय         संविधान की आपातकालीन धाराओं 352 व 357 का किसी प्रकार का संशोधन किये बिना इस प्रकार प्रयोग किया जा सकता है कि जनतंत्र दिखावा मात्र रह जाये। शक्ति के इस दुरूपयोग पर अंकुश जागृत व जन विद्रोह का भय ही हो सकता है।’’
19 जुलाई 1947 को संविधान सभा में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रपति से संदर्भित प्रस्ताव रखे थे। संक्षिप्त में संघ का प्रधान राष्ट्रपति होगा, उसका निर्वाचन संघ की लोक प्रतिनिधि सभा पार्लियामेंट की दोनों सभाओं के सदस्य (संसद सदस्य) तथा सभी प्रदेशों की इकाईयों की व्यवस्थापिकाओं (विधानसभाओं) के सदस्य, जहां व्यवस्थापिका द्विसदनीय होंगी, उनमें नीचे वाली सभा के सदस्य (विधायक) करेंगें। तीसरी बात थी निवार्चन गुप्त मतपत्र द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त के आधार पर एकाकी हस्तान्तरित मत पद्धति से होगा।
तब नेहरू जी ने संविधान सभा में राष्ट्रपति की शक्तियों के संदर्भ में कहा था कि ‘‘हम इस बात पर जोर देना चाहते हैं कि वस्तुतः शक्ति मंत्रीमण्डल और व्यवस्थापिका में सन्निहित है न कि राष्ट्रपति में! पर साथ ही हम यह भी नहीं चाहते थे कि अपना राष्ट्रपति केवल काठ की मूरत हो, यानी नाममात्र का प्रधान हो जैसा कि फ्रांस का होता है। हमने उसे कोई वास्तविक क्षमता तो नहीं दी है पर उसके पद को बड़ा ही मर्यादा और क्षमता सम्पन्न बनाया है। विधान के इस मसविदे में आप देखेंगे कि अमेरिका के राष्ट्रपति की तरह यह समूची रक्षा सेना का प्रधान नायक है।’’
उन्होंने आम नागरिक को मताधिकार देने के पक्ष का   विरोध करते हुए कहा था ‘‘.....राष्ट्रपति के चुनाव में भारत का हर वयस्क नागरिक भाग लेगा तो यह बड़ा ही भारी बोझ हो जायेगा। आर्थिक दृष्टि से यह एक बड़ा ही कठिन काम होगा तथा इससे वर्ष भर के लिए सारे कार्य अव्यवस्थित हो जायेंगे। अमेरिका में राष्ट्रपति के निर्वाचन से वस्तुतः कई महीनों तक बहुत से काम बन्द हो जाते हैं।’’
‘‘.......इस देश में इस पद्धति (अमेरिका) को ही अपनाने की कोशिश करेंगे तो मंत्रीमण्डल मूलक शासन व्यवस्था को यहां विकसित होने से रोकेंगे तथा अपने समय और शक्ति की बड़ी बर्बादी करेंगे। कहा जाता है कि राष्ट्रपति के निर्वाचन में सम्पूर्ण अमेरिका की सारी शक्ति और सारा ध्यान निर्वाचन में केन्द्रित हो जाता है और इससे देश की एकता को हानि पहुंचती है। एक व्यक्ति समस्त राष्ट्र का प्रतीक बन जाता है। हमारे देश में भी राष्ट्रपति राष्ट्र का प्रतीक होगा, परन्तु मैं समझता हूं कि हमारे राष्ट्रपति का ऐसा निर्वाचन हमारे लिए बुरी बात होगी।’’
राष्ट्रपति के चुनाव सम्बन्धी चर्चा में बहुत सी बातें उठीं। श्री टी. चनय्या (मैसूर राज्य) चाहते थे कि राष्ट्रपति एक बार उत्तर भारत का हो तो दूसरी बात दक्षित भारत का हो। तो राय बहादुर श्यामनन्दन सहाय (बिहार) ने यह आपत्ति दर्ज की थी कि जब संघीय पालिर्यामेंट में दोनों सभाओं के सदस्यों मताधिकार दिया जा रहा है तो राज्य के द्विसदनीय सदनों में विधान परिषद को बाहर क्यों रखा जा रहा है। एक सदस्य श्री एच. चन्द्रशेखरिया (मैसूर) चाहते थे कि एक बार राष्ट्रपति रियासतों का हो और एक बार गैर रियासतों का..!
मगर शिब्बन लाल सक्सेना ने अपने संशोधन में स्पष्ट कहा कि ‘‘जनता राष्ट्रपति का चुनाव सीधे बालिग मताधिकार से करे।’’ उन्होंने तर्क दिया था कि ‘‘.......सारे देश के वोटर (वयस्क मतदाता) जिस व्यक्ति को अपना राष्ट्रपति चुनेंगे, उसकी नैतिक शक्ति और प्रतिभा सारे देश में अद्वितीय होगी। वह सचमुच जनता का आदमी और उनका सच्चा प्रतिनिधि होगा।’’ उन्होंने संविधान सभा में अपना मत व्यक्त करते हुए कहा था ‘‘हमारे देश की एकता, जो आज टूट गई है और कुछ रियासतों के वर्तमान प्रयत्नों को देखते हुए जिस एकता के और भी अधिक टूटने का भय है, उस एकता को फिर से कायम करने के लिए हम प्रतिज्ञाबद्ध हैं। उसमें बालिग मताधिकार से राष्ट्रपति का चुनाव होगा, बहुत मदद करेगा। तब ट्रावनकोर से लेकर कश्मीर तक और कलकत्ता से लेकर बम्बई तक देश के कोने-कोने में गरीब से गरीब व्यक्ति भी यह महसूस करेगा कि वह भारत वर्ष के राष्ट्रपति को चुनने का अधिकारी है। अपने भारतीय होने के गौरव को तब वह पूरी तौर पर अनुभव करेगा और भारतीय एकता की जड़ इस प्रकार मजबूत हो जायेगी और आजकल (1946) हैदराबाद, कश्मीर, ट्रावनकोर इत्यादी में जो भारत से अलग होने की भावना है, उसकी जनता में भी फिर से भारत वर्ष में मिल जाने की इच्छा प्रबल होती जायेगी। इसलिये विशेषकर इस वर्तमान अवस्था में मैं राष्ट्रपति के बालिग मताधिकार से चुने जाने को अत्यंत आवश्यक व लाभदायक समझता हूं।’’
सैय्यद काजी करीमुद्दीन (मध्यप्रांत-बरार) भी चाहते थे कि राष्ट्रपति का चुनाव वयस्क मताधिकार पद्धति से हो, उन्होंने पं. नेहरू का प्रतिवाद करते हुए कहा था कि उन्होंने केवल एक तर्क पेश किया है कि ‘‘बहुत बड़ी व्यवस्था करनी पड़ेगी।’’ उन्होंने संविधान में अपने भाषण में कहा ‘‘अमरीका जैसे देश में राष्ट्रपति का निर्वाचन वयस्क मताधिकार से होता है और मेरा विचार है कि यदि राष्ट्रपति का चुनाव हर पांचवे या चैथे वर्ष वयस्क मताधिकार से हो तो उससे आम जनता को जागृत करने का अवसर मिल सकेगा।’’ उन्होंने आशंका व्यक्त की थी कि इससे तो राष्ट्रपति केवल बहुसंख्यक दल की कठपुतली बन जायेगा।’’ लगभग यही विचार मोहम्मद शरीफ (मैसूर) ने भी रखे थे। 
असल में हमारे देश में जनता को बहुत से चुनावों में भाग लेने का अधिकार मिलता है जैसे ग्रामीण क्षैत्र की जनता पंच, सरपंच, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य, विधायक और सांसद का निर्वाचन करती है, शहरी क्षैत्र में पार्षद, मेयर,  विधायक और सांसद का चुनाव करती है। ये सारे चुनाव देश के एक अंश मात्र से जुड़े हैं। जैसे पंच वार्ड से, सरपंच पंचायत से, विधायक विधानसभा क्षैत्र से, सांसद लोकसभा क्षैत्र से, कोई भी एक चुनाव नहीं है जो देश के नागरिक को पूरे देश से जोड़ता हो! यानि कि हम जिस निर्वाचन पद्धति से चल रहे हैं उसमें ही हमने ‘‘राष्ट्र’’ और ‘‘राष्ट्रवाद’’ को छोटा किया है। भारत का सबसे महत्वपूर्ण पद राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पदों में से एक भी पद ऐसा नहीं है जिसे पूरा देश चुनता हो। जिससे  सीधे जनता जुडती हो।
गुणवत्ता और व्यक्तित्व के अनुबंधन भी होने चाहिए 
वर्तमान में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री आदी के लिए अनुभव सम्बन्धी, कार्य गुणवत्ता सम्बन्धी और विशिष्ट शैक्षणिक स्तर सम्बन्धी कोई भी बन्धन नहीं है जिनसे अनेकों बार इन पदों का अवमूल्यन हुआ, आलोचनायें हुई, समय-समय पर आरोप-प्रत्यारोप उछलते रहते हैं। इसका मुख्य कारण यही है कि जैसे-जैसे पद की उच्च स्तरता बढ़ती जाये, वैसे-वैसे उसकी विशिष्टता सम्बन्धी कुछ बन्धनों का भी होना आवश्यक है। देश में सरकारी कर्मचारी को चपरासी, क्लर्क या कण्डक्टर जैसे बहुत मामूली पदों पर भी योग्यता और स्तर के मापदण्डों पर खरा उतरना पड़ता है, मामूली सा आपराधिक प्रकरण दर्ज हो तो सरकारी नौकरी नहीं मिलती, मगर उपरोक्त पदों पर यह सब बड़ी आसानी से पदासीन हो सकते हैं। सामान्य सी सैद्धान्तिक बात है कि चालक के लिये वाहन चलाना आना जरूरी है, इसी तरह इन पदों पर पहुंचने वाले व्यक्तियों के लिए कार्यक्षमताओं के मामले में दक्ष होना अनिवार्य है। उनकी जरा सी अकुशलता से पूरे देश को दुख भोगना पड़ता है।
गणित कहता है कि वर्तमान पद्धति खराब है..
देश की जनता के बजाये दल को महत्वपूर्ण बनाया गया !
जब सीधे जनता के हाथ में निर्वाचन होता है तो जनता के प्रति बहुत अधिक जवाबदेह बनना पड़ता है। जरा सी जन उपेक्षा में जनता पद से बाहर कर सकती है, अर्थात जो चुनाव सीधे जनता से होता है वह अधिक लोकतंत्रीय होता है, जनता के प्रति जवाबदेह होता है। 
इसलिये कम मेहनत व जोड़तोड़ से पद प्राप्ति की पद्धति हमने अपनाई। उदाहरण के तौर पर 100 वोटर हैं उनमें से मान लो 60 ने वोट डाले, बहुमत सिद्धांत 51 प्रतिशत के  आधार पर, 60 वोटों का बहूमत लगभग 31 हुआ! अर्थात 31 वोट पर तो हम सांसद या विधायक चुन लिये गये अब इनके 51 प्रतिशत पर सरकार बन गई! यानि कि लगभग 16 प्रतिशत मत शक्ति की सरकार बन गई और उस पर भी स्वतंत्रता यह कि हम किसी को भी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बना दें। वह सदन का सदस्य हो न हो। वर्तमान में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक बार भी लोकसभा चुनाव नहीं जीते है। कुल मिला कर यह सब इसलिये हुआ कि देश की जनता के बजाये सारे निर्णय राजनैतिक दल के कार्यालय में होते रहें।
दलगत हित की निर्वाचन पद्धति
वर्तमान निर्वाचन पद्धति मूलतः जनता के हित के बजाय राजनीतिक दलों के हित की रणनीति पर टिकी हुई है। इस पद्धति से जनता को पूरा लोकतंत्र नहीं मिला है बल्कि सारा मामला अर्द्ध लोकतंत्र पर अटक गया है। हम अपने देश में सामान्य तौर पर अपनी पसन्द के व्यक्ति को मुख्यमंत्री नहीं बना पाते। इसका दल के मुखिया की पसन्द होना जरूरी है और इस देश में लगभग पहले तीस वर्ष तक मुख्यमंत्री दल की पसन्द की आधार पर ही बनते और बदलते रहे। वर्तमान में सम्भवतः जनता ने दलों की मनमर्जी की इस प्रवृत्ति के कारण ही क्षैत्रीय दलों के व्यक्तियों को मुख्यमंत्री के रूप में चुनना प्रारम्भ कर दिया। इसी प्रकार राज्यों में राज्यपाल भी वही होते हैं जो किसी दल की पसन्द हों। राज्यपाल जैसे महत्वपूर्ण पद पर उस प्रदेश की जनता की राय कोई मायने नहीं रखती है। कई बार तो जनता द्वारा लोकसभा अथवा विधानसभा चुनाव में हराये गये व्यक्ति को  राज्यसभा सांसद निर्वाचित कर मंत्री बना दिया जाता है। वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृह मंत्री शिवराज पाटिल वर्तमान लोकसभा के सदस्य नहीं है अर्थात्् जनता द्वारा निर्वाचित नहीं है किंतु फिर भी मंत्री परिषद में प्रथम और द्वितीय पायदान पर बैठे हैं। लोकतंत्र का इससे बड़ा मखौल और क्या हो सकता है। 
कुल मिलाकर देश की निर्वाचन पद्धति में बदलाव और जनता को सीधे अपने शासक नियुक्त करने के अधिकार पर पुनर्विचार आवश्यक है। वहीं देश की राष्ट्रवादी सोच और समझ को बढ़ाने के लिए देश के राष्ट्रपति का निर्वाचन सीधे आम जनता से होना चाहिए ताकि जनता का जुड़ाव सीधा राष्ट्र से बने। आज ऐसी कोई मतपद्धति नहीं है, जिससे अरूणाचल प्रदेश के नागरिक, मणिपुर के नागरिक, नागालेण्ड के नागरिक, असम के नागरिक, जम्मू कश्मीर के नागरिक राष्ट्रीय स्तर के किसी पद के लिए मतदान करें।
- राधाकृष्ण मंदिर रोड़, डडवाड़ा, कोटा जंक्शन




3 अगस्त : भाजपा किसान मोर्चा की ओर से नई दिल्ली में संसद पर प्रदर्शन किया जाएगा


कोटा | भाजपा किसान मोर्चा की ओर से किसानों की समस्याओं और कृषि भूमि अवाप्ति को लेकर नई नीति बनाने की मांग को लेकर 3 अगस्त 2011को नई दिल्ली में संसद पर प्रदर्शन किया जाएगा। मोर्चा के राजस्थान प्रदेश उपाध्यक्ष डा.एल. एन. शर्मा ने पत्रकार वार्ता में बताया कि इस प्रदर्शन में हाडोती से भी कार्यकर्ता शामिल होंगे हैं। वार्ता में मौजूद भाजपा कोटा जिला उपाध्यक्ष अरविन्द सिसोदिया , मोर्चा के प्रदेश मंत्री ब्रजराज सिंह गावड़ी,प्रदेश प्रवक्ता केवलकृष्ण बांगड़ ,मोर्चा अध्यक्ष रामलाल माली , मोर्चा महामंत्री मुकुट  नागर , मोर्च के जिला उपाध्यक्ष डा. आर. सी. गौतम इत्यादि !   



इस रैली को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज, किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओमप्रकाश धनकड़ सहित वरिष्ठ नेता संबोघित करेंगे।
शिमला— बीज विधेयक-भूमि अधिग्रहण बिल पारित करने को देश भर के किसान दिल्ली में जुटेंगे। भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा की प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक भाजपा प्रदेश कार्यालय दीपकमल में प्रदेशाध्यक्ष प्यारे लाल शर्मा की अध्यक्षता में हुई। बैठक में किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओमप्रकाश धनकड़, प्रदेश महामंत्री चंद्रमोहन ठाकुर, प्रदेश भाजपा प्रवक्ता गणेश दत्त, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुरेश चंदेल, राष्ट्रीय सचिव सुखमिंद्रपाल सिंह ग्रेवाल, राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बलदेव भंडारी विशेष रूप से उपस्थित थे। बैठक के बारे में जानकारी देते हुए किसान मोर्चा के प्रदेश महामंत्री सुभाष शर्मा ने बताया कि बैठक में राष्ट्रीय अध्यक्ष ओपी धनकड़ ने कहा कि प्रदेश किसान मोर्चा बहुत अच्छा काम कर रहा है और किसानों के ज्वलंत मुद्दों बीज बिल विधेयक और भूमि अधिग्रहण बिल को इसी मानसून सत्र में देश की संसद में पारित करवाने के लिए जो जिला स्तर पर धरना व प्रदर्शन किए, वे काफी प्रभावी रहे। इसी बीज तथा भूमि अधिग्रहण बिल विधेयक को इसी सत्र में पारित करवाने के लिए तीन अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंतर पर देश भर से हजारों किसान धरना देंगे और प्रदेश से भी काफी संख्या में किसान इस कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे। उन्होंने कहा कि किसान मोर्चा को अपनी अलग पहचान बनाने के लिए किसानों की समस्याओं को हल करवाने के लिए सरकार से सामंजस्य बिठाकर बातचीत करनी चाहिए। किसान मोर्चा यह लक्ष्य ले कि प्रदेश भर से एक लाख किसानों को टोपी पहनाए, ताकि किसान मोर्चा का संदेश आम किसानों तक पहुंच सके तथा यह सुनिश्चित करें कि प्रत्येक मतदान केंद्र पर अपना किसान प्रहरी नियुक्त हो और उनका एक सम्मेलन नवंबर माह तक प्रदेश में आयोजित होना चाहिए तथा एक बड़ी किसान रैली का आयोजन किसान मोर्चा को करना चाहिए। प्रदेशाध्यक्ष प्यारे लाल शर्मा ने कहा कि किसान मोर्चा को यह गर्व है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री एक किसान हैं और उन्होंने प्रदेश के किसानों के लिए 1096 करोड़ रुपए की सबसिडी की व्यवस्था की है। बैठक को संबोधित करते हुए प्रदेश भाजपा महामंत्री चंद्रमोहन ठाकुर ने कहा कि इस बार किसान मोर्चा ने सही मायने में धरातल पर जाकर काम किया है तथा प्रदेश में किसान मोर्चा का एक संगठनात्मक ढांचा खड़ा हुआ है। किसान मोर्चा को प्रदेश के किसानों की ऐसी मांग को मुख्यमंत्री प्रो प्रेम कुमार धूमल के पास रखना चाहिए।