बुधवार, 7 सितंबर 2011

अनन्त चतुर्दशी महोत्सव : जनचेतना का स्वरूप

- अरविन्द सीसौदिया ,कोटा , राजस्थान ।
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भारतीय संस्कृति में निहित भक्ति एवं शक्ति का पर्व अनन्त चतुर्दशी महोत्सव, मूलतः दो प्रमुख पर्वों को जोडता  है।  यह गणेश जी के जन्मोत्सव ‘गणेश चतुर्थी‘‘ से  प्रारंभ हो कर ‘‘श्री अनन्त चतुर्दशी‘‘  तक के 10-11 दिन की अवधि में मनाया जाता है। इस दौरान गणेश चतुर्थी से घरों में गणेश जी की प्रतिमाओं तथा मोहल्लों में झांकियो की स्थापना होती है। नित्य प्रातः सायं पूजा अर्चना एवं आरती होती है, भक्ति संध्याएं आयोजित की जाती हैं तथा श्री अनन्त चतुर्दशी के दिन इन गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। अनेकानेक स्थानों पर यह विसर्जन शोभा यात्रा के रूप में सम्पन्न होता है। इन्दौर,कोटा में भी इसी तरह श्री अनन्त चतुर्दशी महोत्सव आयोजन होता है एवं शोभा यात्रा के रूप में सम्पन्न होता है।
चमत्कारिक देव
कुछ वर्ष पहले की बात है कि अचानक खबर आई कि अमेरिका में गणेश जी दूध पी रहे हैं और कुछ ही मिनटों में यह चमत्कारिक घटना पूरे विश्व में घटित हुई। भारत से लेकर अमेरिका तक प्रत्येक देश में जहां भी हिन्दू निवास करते थे और गणेश जी का मंदिर था, वहां गणेश जी ने दूध पिया। इस तरह की चमत्कारिक घटना का दूसरा कोई और उदाहरण वर्तमान समय में नहीं मिलता। इसलिए गणेश जी को न केवल पूज्य देव ही माना जाता है, बल्कि सर्वशक्तिमान, अज, अनादि और अनन्त भी माना जाता है। इसी कारण जो प्रतिमा स्थापना चतुर्थी को होती है, उसका विसर्जन अनन्त चतुर्दशी को होता है।
श्री गणेश जन्मोत्सव 
ऐसा माना जाता है कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी  ( चैथ ) को आदि शक्ति, पंच देवों में प्रथम पूज्य, गणपति का जन्म शिव-पार्वती की संतान के रूप में हुआ तथा इसी कारण यह दिन धार्मिक रूप से ‘‘गणेश चतुर्थी व्रत‘‘ के रूप में सम्पूर्ण देश में मनाया जाता है। लोक मान्यता यह भी है कि गणेश जी के जन्म के 10 दिन तक उत्सवों का आयोजन हुआ था और इसी कारण प्रतिवर्ष इस अवधि में आमजन के द्वारा श्रद्धा एवं आस्था से पूजा अर्चना की जाती है। जन मान्यता यह भी कि इस दौरान जो गणेश स्तुति करते हैं, उन पर गणपति की विशेष कृपा होती है। 
सर्व देवाध्यक्ष श्री गणेश
ऋग्वेद में एक ऋचा आती है, 
”गणनां त्वां गणपति, हवामहे कविनामुपमश्रवस्तमम्।“ अर्थात गणपति वैदिक देवता हैं। 
एक समय जापान, चीन, कम्बोडिया, इण्डोनेशिया, थाईलैंण्ड, मलाया और सुदूर मैक्सिको तक गणेश पूजा का विशेष महत्व था और इन देशों में बहुतायत में गणेश प्रतिमायें मिलती हैं।  
प्रचलित आख्यान एवं धार्मिक मान्यता यह है कि आदि महाशक्ति माता पार्वती ने अपने अंतःपुर (आवास) कैलाश पर्वत पर पुत्र गणेश को द्वारपाल नियुक्त किया और किसी को भी प्रवेश नहीं देने की आज्ञा देकर, वे स्नान करने चली गई थी। इसी दौरान भगवान शिव शंकर द्वार पर आ पहुंचे, श्री गणेश ने उन्हें समझाया कि माता अभी स्नान पर बैठी हैं। उनकी आज्ञा है कि किसी को भी प्रवेश नहीं दिया जाये, अतः आप कुछ समय पश्चात पधारें। 
शिवजी के अनेकानेक बार समझाने पर भी गणेश जी ने प्रवेश की अनुमति नहीं दी। फिर गणों और देवों के द्वारा गणेश जी को हटाने का प्रयत्न किया गया, जिसमें वे सफल नहीं हुए और अन्त में शंकर भगवान ने त्रिशुल से गणेश जी का सिर काट कर उनका वध कर दिया। 
ज्यों ही यह बात आदि महाशक्ति पार्वती को ज्ञात हुई तो वे शोक ग्रस्त होकर क्रोधित हो उठी। उन्होंने अपनी शक्तियों को प्रलय मचाने का आदेश दे दिया। ब्रह्माण्ड में हाहाकार मच गया, कोई भी देव शक्ति इस उत्पात को रोक नहीं सकी और अन्त में महर्षि नारद जी की सलाह पर माता पार्वती की शरण में पहुंच कर देव शक्तियों ने अनुनय विनय स्तुतियां की, तब माता पार्वती ने देव शक्तियों को आज्ञा दी कि 1. श्री गणेश को पुनः जीवित किया जाये, 2. सभी देवीय शक्तियां पराजित हुई है इसलिये देवगण उन्हें अपना अध्यक्ष माने एवं प्रथम पूजन का अधिकार दें, और 3. समस्त पूजाओं, अनुष्ठानों एवं मंगल आयोजनों में जब तक गणेश की पूजा न हो जाये तब तक वे फलीभूत न हों।
उपरोक्त तीनों मांगों को देवों ने स्वीकार किया भगवान विष्णु जी ने गणेश जी को नया मस्तक प्रदान किया। भगवान शिव जी ने उनमें प्राणों का संचार कर पुनः जीवित किया एवं भगवान ब्रह्मा जी ने उन्हें सभी देवों का अध्यक्ष; देवों का भी देव, देवा ओ देवाद्ध तथा प्रथम पूज्य घोषित किया। यह घटना श्वेत कल्प की मानी जाती है। ( शिवपुराण से )
गणेशोत्सव
भगवान श्री गणेश की प्रतिष्ठा सम्पूर्ण भारत में समान रूप से व्याप्त है, महाराष्ट्र में मंगलकारी देवता के रूप में ‘‘मंगल मूर्ति‘‘ के नाम से पूज्य हैै। महाराष्ट्र में अष्टगणपति के आठ तीर्थ स्थान प्रसिद्ध हैं। जहां की परिक्रमा करना प्रत्येक महाराष्ट्रीयन हिन्दू अपना पवित्र कर्म मानता है। दक्षिण भारत में भी इनकी विशेष लोकप्रियता ‘कला शिरोमणि‘ के रूप में है। मैसूर तथा तंजौर के मंदिरों में गणेश की नृत्य मुद्रा में अनेक मनमोहक प्रतिमाएं हैं। 
गणेश हिन्दुओं के आदि आराध्य देव हैं। हिन्दू धर्म में गणेश को एक विशिष्ठ स्थान प्राप्त है, कोई भी धार्मिक उत्सव हो यज्ञ पूजन इत्यादि सत्कर्म हों या फिर विवाहोत्सव हो, जन्मोत्सव हो अथवा व्यापार या किसी अन्य कार्य का शुभारंभ हो, उसे निर्विघ्न सम्पन्न करने के लिये “शुभ” के रूप में गणेश की पूजा सबसे पहले की जाती है। 
महाराष्ट्र में तो सात वाहन, राष्ट्रकूट, चालुक्य आदि राजवंशों ने गणेशोत्सव की प्रथा को विशेष रूप से प्रचलित करवाया। महाराज छत्रपति शिवाजी के शासन काल में गणेश उत्सवों तथा गणेश उपासना का विशेष विकास हुआ।
गणेश महिमा
गणेश जी पंचदेवों में प्रथम पूज्य हैं, गुरू पूजा से भी पूर्व आराधना योग्य हैं। सभी मतों व पंथों में मौखिक व आध्यात्मिक कर्मों में प्रथम पूज्य के रूप में लोकमान्य हैं। सर्वाधिक लोकप्रिय देवताओं में एक गणेश या गणपति को बुद्धि का प्रतीक और सौभाग्य लाने वाला माना जाता है। उनकी दोनों पत्नियां रिद्धि व सिद्धी हैं। रिद्धि का पुत्र लाभ है और सिद्धी का पुत्र शुभ है। दोनों पत्नियां श्रीगणेशजी के दांये - बांये विराजती हैं अनके साथ ही उनके पुत्र शुभ और लाभ हैं। इसलिये ये सुख, समृद्धि और वैभव के देव माने गये हैं, इसी कारण ये मंगल करने वाले और अमंगल हरने वाले, प्रभावशाली देव के रूप में पूज्य हैं। 
कहा जाता है कि उनका हाथीनुमा मस्तिष्क विराट ज्ञान और बुद्धि का प्रतीक हैं, नटखट आंखे, लम्बे कानों से संसार में घटित हो रहा कुछ भी उनसे बचता नहीं है। उनकी नाक रूपी लम्बी संूड अनहोनी को सूंघ लेती है। उनका लम्बा उदर हर प्रकार की बुराई को पचाने की क्षमता रखता है। उनका वाहन चूहा हमें यह बताता है कि एक बुद्धिमान व्यक्ति जीवन में छोटी से छोटी चीजों को भी बराबर महत्व देकर अपने कार्य को सिद्ध कर सकता है। 
एक मान्यता यह भी प्रचलित है कि कुकर्मों में रत बुद्धि जो चुहे की भांति व्यक्ति व समाज को कुतरती हुई सद्कार्यों में बाधा डालती है। वह केवल गणेश जैसे विराट बुद्धि बल के आरोही के ही बस में आ सकती है। 
गणेश चतुर्थी के दिन गणपति के विग्रह की स्थापना शुद्धि व बुद्धि की साधना का प्रारंभ है। यह भी मान्यता है कि दांई तरफ झुकी हुई सूंड समृद्धि एवं रिद्धि सिद्धि की दात्री है। वहीं बायीं तरफ झुकी सूंड ऐश्वर्य व शत्रु विजय देने वाली है। 
गणपति जी को सिखाने वाला देवता भी माना जाता है। उन्हें विघ्नहर्ता कह कर पुकारा जाता है, प्रवेश द्वारों पर और मार्गों पर अक्सर उनकी तस्वीर या प्रतीक चिन्ह देखने का मिलते हैं। मान्यता रही है कि उगते सूरज की तरफ जिस भी घर के सामने उनकी तस्वीर लगी होती है, वहां वास्तु दोष नहीं होता है। 
गणपति का मूल रूप से शासनाध्यक्ष के रूप में भी शासन व्यवस्था सूत्र देते हैं जो एक राष्ट्र प्रमुख की गुणवत्ताएं होनी चाहिए वह सभी गुणवत्ताएं गणेश जी के मस्तिष्क, कान, आंख, सूंड, उदर और सवारी रूपी मूषक के रूप में अपनी - अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करती हैं।
तांत्रिक क्रियाओं में भी गणेशजी के पूजन का विशेष महत्व है। वशीकरण, उच्चाटन, आकर्षण और धन लाभ तथा मोक्ष के कार्य में स्तुत्य हैं।
श्री अनन्त चतुर्दशी व्रत
भगवान श्री हरि का एक स्वरूप श्री अनन्त भगवान के रूप में सतयुग के समय से ही पूजनीय एवं फलदायी रहा है। इस दिन कच्चे सूत के लच्छे में 14 गांठ लगाकर उसे हाथ पर बांधने की परम्परा है सारे दिन व्रत रखा जाता है तथा इस दिन सतयुग में घटित महर्षि सुमंन्त की कन्या शीला और उनके पति कौंडिन्य मुनि की  कथा सुनाई जाती है। इस व्रत को श्री कृष्ण भगवान की प्रेरणा से पाण्डवों ने भी रखा था और उन्हें 14 वर्ष पश्चात राज्य एवं वैभव की प्राप्ति हुई थी। यह उपवास युगों युगों से धन, ऐश्वर्य और सद्मार्ग से संसारिक सुखों की प्राप्ति के लिये किया जाता रहा है और वर्तमान में भी एक महत्वपूर्ण उपवास है। इस पर्व के दिन ही श्री गणेश जी की प्रतिमाओं का विसर्जन भी होता है।  
पूर्वाद्ध...
यूं तो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर हुए अनेकों शोधों में माना गया है कि श्री गणेश प्राचीनतम आराध्य देवों में से एक हैं तथा उन्हें सम्पूर्ण पृथ्वी पर किसी न किसी रूप में जाना, पहचाना और पूजा जाता रहा है। वर्तमान समय में सर्वाधिक प्रतिमायें और प्रतिदिन सर्वाधिक पूजनीय देव श्री गणेश ही हैं।
कहते हैं कि पुणे में कस्बा गणपति नाम से प्रसिद्ध गणपति की स्थापना शिवाजी महाराज की मां जीजा बाई ने की थी। मराठा पेशवाओं ने गणोत्सव को बढ़ावा दिया। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव को जो विशेष स्वरूप दिया उससे गणेश राष्ट्रीय एकता के प्रतीक बन गये। तिलक जी के प्रयास से जो गणेश पूजा पहले परिवार तक सीमित थी, वह सार्वजनिक महोत्सव बन गई। इस दौर में वह केवल धार्मिक कर्मकाण्ड तक ही समिति नहीं रही, बल्कि आजादी की लड़ाई, छुआछूत दूर कर सामाजिक समरसता लाने वाली , समाज को संगठित करने और आम आदमी का ज्ञानवर्द्धन करने की विधा भी बनी। यह सम्पूर्ण महाराष्ट्र में एक आन्दोलन बन कर प्रकट हुई, इस आन्दोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींवें हिलाने का महत्वपूर्ण कार्य किया, जिसकी चर्चा रोलेट समिति रपट में भी आई है।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में गणेशोत्सव का जो सार्वजनिक पौधा रोपण किया था, वह अब विराट वट वृक्ष का रूप ले चुका है। अकेले महाराष्ट्र में ही 50 हजार से ज्यादा सार्वजनिक गणेशोत्सव मण्डल हैं। इसके अलावा आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात में भी हजारों की संख्या में गणेशोत्सवों का आयोजन होता है। इस अवसर पर सम्पूर्ण देश में कहीं ना कहीं, कोई ना कोई विशेष आयोजन/उत्सव आयोजित किया जाता है। 
रोलेट समिति रपट की रिपोर्ट में तब आया था कि गणेशोत्सव के दौरान युवकों की टोलियां सडकों पर घूम घूम कर देश की स्वतंत्रता, राष्ट्रभक्ति और अंग्रेजी शासन के विरोधी गीत गाती थी, स्कूली बच्चे पर्चे बांटते थे तथा अंग्रेजी शासन से मुक्त होने के लिये शिवाजी की तरह विद्रोह का आहृान करते थे। इसके द्वारा गुलामी से मुक्ति के लिये धार्मिक संघर्ष को जरूरी बताया जाता था। 
वीर सावरकर और कवि गोविन्द ने नासिक में मित्र मेला संस्था बनाई थी। इस संस्था का काम देश भक्तिपूर्ण लोक गीतों को सुनाना, आकर्षक ढंग से बोलकर नाट्य मंचन करना एवं राम - रावण कथा, कृष्ण - कंस कथा जैसे प्रसंगों के द्वारा समान कत्र्तव्य का भाव जागृत कर समाज में चेतना लाने का कार्य किया गया। 
इन गणेशोत्सवों में भाषण देने के लिये देश के बडे़ बड़े नेताओं और महापुरूषों ने भाग लिया है। जिनमें वीर विनायक दामोदर सावरकर, लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, डाक्टर केशवराव बलिराम हेडगवार, पंडित मदन मोहन मालवीय, श्रीमती सरोजिनी नायडू, बेरिस्टर जयकर, रेंगलर परांजपे, बेरिस्टर चक्रवर्ती, दादासाहेब खापर्डे, डाक्टर मुंजे आदि प्रमुख थे।
 जनचेतना का स्वरूप
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने झांकियों को तत्कालीन राष्ट्रीय समस्या देश को गुलामी से मुक्त करवाने से जोड़कर झांकी सजाने का प्रचलन चलाया था। तब से आज तक भी महाराष्ट्र में गणेश जी के साथ सजने वाली झांकियों में राष्ट्रीय एवं प्रांत स्तरीय महत्त्वपूर्ण समस्याओं को भी प्रदर्शित किए जाने की परम्परा चली आ रही है। जैसे कि इस वर्ष महाराष्ट्र में सजी झांकियों में सबसे ज्यादा जोर महंगाई पर है। वहीं कुछ झांकियांे में यातायात समस्या तो कुछ में परमाणु करार को प्रदर्शित किया गया है।
देश के अन्य क्षैत्रों में जो झांकियां लगती हैं, उनमें गणेशजी के अलावा अन्य देवों और भारत माता की झांकी भी सजाई जाती है। विशेषकर यह धार्मिक पर्व होते हुए भी राष्ट्रीय चेतना से जुड़ा हुआ है तथा देशभक्ति को उभारने वाले चरित्रों की झांकियां भी इनमें सम्मिलित करने की परम्परा और तेजी से बढ़ रही है।
गणेश प्रतिमायें कई तरह की वस्तुओं की भी बनाई जाती हैं,जैसे कि गुजरात में रूद्राक्ष से एक प्रतिमा बनाई गई है। इसी तरह एक राजमा की प्रतिमा भी चर्चा में हैं।
राधाकृष्ण मंदिर रोड़, डडवाड़ा, कोटा जंक्शन



कायरता के कारण आतंकवाद....





- अरविन्द सीसौदिया,कोटा,राजस्थान ।
...कायरता के कारण आतंकवाद....
मेरा बहुत स्पष्ट मत है कि देश में आतंकवाद भारत सरकार की कायरता के कारण है। आतंकवाद से इजराईल , चीन , अमेरिका और ब्रिटेन भी निबंट रहे हैं । वे आतंकवाद से सख्ती से ही नहीं बल्कि सर्वोच्च क्रूरता से निवंटते हैं । अमरीका और ब्रिटेन में एक एक आतंकी हमले के बाद दूसरा हमला नहीं हुआ । मगर हमारे देश में आये दिन का खेल बन गया आतंकवाद !!
अब स्क्रेच जारी हुए है, इस पर शंका - उस पर शंका, कोई ई मेल , कोई बहाना, गुप्तचर संस्थायें सर्तक नहीं थी, कैमरा होता तो पकडना आसान होता , बेमलतब के कई तर्क तथ्य गडे जा रहे हैं । सच यह है कि कांग्रेस सरकार ने आतंकवाद और वोट में सम्बंध बना कर देखने की राष्ट्रघाती नीति को अपना लिया है। इसीलिये वह पकडे गये आतंकवादियों तक को सजा नहीं दे पा रही है। आतंकवाद की जड पर कभी भी वार नहीं किया गया । झूठे तमासों के द्वारा देश को बेवकूफ बनाना ही सरकार का मकसद रहता हे। इसलिये यह आतंकवाद,आतंकवादियों से कहं अधिक सरकारी कायरता के कारण हे।
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नई दिल्ली. दिल्‍ली हाईकोर्ट के बाहर बुधवार सुबह हुए बम धमाके ने दिल्‍ली सहित पूरे देश को दहला दिया है। मौजूदा गृह मंत्री पी चिदंबरम के कार्यकाल में दिल्‍ली में यह तीसरा धमाका है। मुंबई में 26 नवंबर 2008 को हुए आतंकवादी हमले के बाद चिदंबरम को गृह मंत्री बनाया गया था। इसके बाद से देशभर में कम से कम आठ धमाकों में 48 लोगों की जानें गई हैं।

चिदंबरम से पहले शिवराज पाटिल गृह मंत्री थे। मुंबई हमले और इससे पहले हुई आतंकी वारदात के चलते फजीहत के बाद पाटिल को कुर्सी छोड़नी पड़ी थी। लेकिन चिदंबरम के कार्यकाल में भी आतंकवादी हमलों में कमी होती नजर नहीं आ रही है। भाजपा ने चिदंबरम पर निशाना साधते हुए कहा है कि वो अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर निशाना साधने के बजाय आतंकवादी हमलों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाएं।

हाईकोर्ट के बाहर आज हुए धमाके के बाद राज्‍यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने कहा, ‘चिदंबरम को 26/11 हमलों के बाद गृह मंत्री बनाया गया था। उस वक्‍त चिदंबरम को शिवराज पाटिल की तुलना में बेहतर गृह मंत्री होने का दावा किया गया था लेकिन नतीजा अब सबके सामने है। गृह मंत्रालय लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित कराने में बार-बार नाकाम हो रहा है।’
चिदंबरम के गृह मंत्री रहते देश में हुए बड़े धमाकों पर एक नजर ...

7 सितंबर 2011: दिल्‍ली हाईकोर्ट के बाहर बम धमाका, 11 मरे, 76 घायल (आंकड़ा और बढ़ सकता है)

25 मई 2011: दिल्ली हाईकोर्ट परिसर में धमाका, कोई घायल नहीं। एक कार क्षतिग्रस्‍त।
13 जुलाई 2011: मुंबई में तीन बम धमाके। 21 लोग मारे गए, 131 घायल।
7 दिसंबर 2010: वाराणसी में गंगा घाट पर बम धमाका, एक बच्‍ची की मौत, 25 घायल।
19 सितंबर 2010: दिल्ली में जामा मस्जिद के बाहर धमाका। दो ताईवानी नागरिक घायल।
17 अप्रैल 2010: बंगलुरू के चिन्नास्वामी स्टेडियम के बाहर दो बम धमाके, 15 घायल।
10 फरवरी 2010: पुणे में जर्मन बेकरी में धमाका, 5 महिलाओं और कुछ विदेशियों समेत 9 लोग मारे गए। 45 घायल।
6 अप्रैल 2009: गुवाहाटी के मालेगांव में ब्‍लास्‍ट, छह मरे, 32 घायल।  

पिछले सालों में हुए कुछ और आतंकी वारदात/बम धमाके

26-29 नवंबर 2008: मुंबई में तीन जगहों- ताज और ऑबराय होटलों और विकटोरिया टर्मिनस पर हुए आतंकवादी हमले तीन दिन तक चले और इनमें लगभग 170 लोग मारे गए जबकि 200 अन्य घायल हो गए।
30 अक्तूबर 2008: असम में एक साथ 18 जगहों पर हुए बम धमाकों में 70 से अधिक लोग मारे गए और सौ से अधिक घायल।
27 सितंबर 2008:  दिल्‍ली के मेहरौली में बम धमाका, चार मरे, 15 घायल।
13 सितंबर, 2008: दिल्‍ली के करोल बाग, ग्रेटर कैलाश और कनॉट प्‍लेस में हुए बम धमाकों में 24 मारे गए। 100 से अधिक घायल।
13 मई 2008: जयपुर में सात बम धमाके, कम से कम 63 लोगों की मौत।
25 जुलाई 2008: बंगलौर में हुए सात धमाके, दो की मौत, कम से कम 15 घायल।
26 जुलाई 2008: अहमदाबाद में लगातार कई धमाके, 49 लोग मारे गए।
13 सितंबर 2008: दिल्ली में हुए सिलसिलेवार धमाकों में 22 लोगों की मौत।
19 फरवरी 2007: भारत से पाकिस्तान जा रही ट्रेन में धमाका, 66 लोगों की मौत।
18 मई 2007: हैदराबाद की मशहूर मक्का मस्जिद में धमाका, 11 लोगों की मौत।
25 अगस्त 2007: हैदराबाद के एक पार्क में तीन धमाके, कम से कम 40 लोग मारे गए।

11 अक्तूबर 2007: अजमेर में गरीब नवाज की दरगाह पर धमाका, दो लोगों की मौत।
23 नवंबर, 2007: वाराणसी, फैजाबाद और लखनऊ के अदालत परिसर में सिलसिलेवार धमाके। 13 लोगों की मौत, 50 से ज़्यादा घायल।

7 मार्च 2006: वाराणसी में तीन धमाकों में कम से कम 15 लोग मारे गए, 60 से ज़्यादा घायल।

11 जुलाई 2006: मुंबई में कई ट्रेन धमाकों में 180 से ज़्यादा लोगों की मौत।
 
8 सितंबर 2006: महाराष्ट्र के मालेगांव में सिलसिलेवार धमाकों में 32 लोग मारे गए।

13 मार्च 2003: मुंबई में एक ट्रेन में हुए धमाके में 11 लोगों की मौत।
25 अगस्त 2003: मुंबई में दो कार बम धमाकों में 60 लोगों की मौत।

15 अगस्त 2003: असम में हुए धमाके में 18 लोग मारे गए।
29 अगस्त 2003: नई दिल्ली के तीन व्यस्त इलाक़ों में हुए धमाकों में 66 लोगों की मौत।