गुरुवार, 29 सितंबर 2011

राष्ट्रहित के लिए : राष्ट्रपति का निर्वाचन जनता करे


अरविन्द सीसौदिया
हमारी पद्यति प्रतिनिधि पद्यति होनें से , जनता  और शासन के बीच  में जन प्रतिनिधि नामक एक बिचोलिय आ खड़ा हुआ .., यह कभी बहुत देश भक्त ही था.., मगर अभी हम इसे दयानिधि मारन और ए राजा के रूप में समर्थन की वसूली करते हुए देख रहे हैं .., अब तो पंच  भी बिकते देखे गये हैं .. जन प्रतिनिधि स्तर पर आई गिरावट का सुधार सीधे जनता के द्वारा प्रमुख पद को चुनने में ही है | यदि सरपंच की ही तरह या महापौर की ही तरह जनता को मुख्यमंत्री या राज्यपाल और प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति का चुनाव का अधिकार मिल जाये तो काफी समस्या का हल निकल आये और ये बेशर्म बिका बिकी समाप्त हो जाये.....  


हमारी स्वतंत्रता के लिये राष्ट्रपति पद का कितना महत्व है, यह समझने के लिए हमें 25 जून 1975 की रात्रि 11 बजकर 45 मिनिट पर, तत्कालीन राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इन्दिरा गांधी के कहने पर, लगाये गये आपातकाल को समझना होगा। जिसमें राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत आंतरिक आपातकाल लगा दिया था। जेलों में डाले गये निर्दोषों को न्यायालय मुक्त न कर पाये, इसलिये कि ‘मीसा’ कानून को न्यायालय के क्षैत्राधिकार से बाहर कर दिया गया था। लोगों की जबरिया नसबंदी कर दी गई थी, जबरिया मकान तोड़ दिये गये थे। कोई भी अखबार सरकार के खिलाफ लिख नहीं सकता था, विपक्ष नाम की कोई चीज नहीं रहने दी गई थी। व्यक्तिगत स्वतंत्रता समाप्त हो गई थी।


सोचने समझने वाली बात यह है कि ऐसा क्यों हुआ! राष्ट्रपति ने बिना जनता की परवाह किये आपातकाल क्यों लगा दिया! इसके दो कारण थे, पहला कारण तो राष्ट्रपति जनता के द्वारा चुना नहीं जाता जो वह जनता के प्रति जवाबदेह होता........, क्योंकि उसको चुनने वाला निर्वाचक मण्डल सांसद और विधायक होते हैं। जनता इस चुनाव की महज दर्शक होती है! दूसरा कारण राष्ट्रपति पुनर्निवाचन के लिए उन दलों पर निर्भर रहता है जिस पर निर्वाचक मण्डल के सदस्यों का संख्या बल हो, इसलिये वह उस दल को संतुष्ट रखता है। इसी कारण राष्ट्रपति पद महत्वपूर्ण होते हुए भी एक प्रकार से दलगत राजनीति का दास होता है । इन दो कारणों से राष्ट्रपति सबसे महत्वपूर्ण पदाधिकारी होते हुए भी न तो जनता के प्रति जबाव देह हो पाता और न ही राष्ट्र के प्रति..!! वह मात्र दल के प्रति दासत्व में कैद रहता है। राष्ट्रपति को इस दासता से मुक्ति का एक ही उपाय है कि राष्ट्रपति का निर्वाचन सीधे ‘जनता’ करे, ताकि वह जनता और राष्ट्र के प्रति जबाव देह हो सके।


केशवानन्द भारती प्रकरण में न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना ने चेतावनी दी थी ( 24 अप्रैल 1973 ) कि ‘‘जर्मनी के संविधान के आपातकाल सम्बन्धी अधिकारों की धारा 48 का दुरूपयोग कर हिटलर ने नाजी तानाशाही स्थापित कर ली थी। भारतीय संविधान की आपातकालीन धाराओं 352 व 357 का किसी प्रकार का संशोधन किये बिना इस प्रकार प्रयोग किया जा सकता है कि जनतंत्र दिखावा मात्र रह जाये। शक्ति के इस दुरूपयोग पर अंकुश जागृत व जन विद्रोह का भय ही हो सकता है।’’


19 जुलाई 1947 को संविधान सभा में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रपति से संदर्भित प्रस्ताव रखे थे। संक्षिप्त में संघ का प्रधान राष्ट्रपति होगा, उसका निर्वाचन संघ की लोक प्रतिनिधि सभा पार्लियामेंट की दोनों सभाओं के सदस्य (संसद सदस्य) तथा सभी प्रदेशों की इकाईयों की व्यवस्थापिकाओं (विधानसभाओं) के सदस्य, जहां व्यवस्थापिका द्विसदनीय होंगी, उनमें नीचे वाली सभा के सदस्य (विधायक) करेंगें। तीसरी बात थी निवार्चन गुप्त मतपत्र द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त के आधार पर एकाकी हस्तान्तरित मत पद्धति से होगा।


तब नेहरू जी ने संविधान सभा में राष्ट्रपति की शक्तियों के संदर्भ में कहा था कि ‘‘हम इस बात पर जोर देना चाहते हैं कि वस्तुतः शक्ति मंत्रीमण्डल और व्यवस्थापिका में सन्निहित है न कि राष्ट्रपति में ! पर साथ ही हम यह भी नहीं चाहते थे कि अपना राष्ट्रपति केवल काठ की मूरत हो, यानी नाममात्र का प्रधान हो जैसा कि फ्रांस का होता है। हमने उसे कोई वास्तविक क्षमता तो नहीं दी है पर उसके पद को बड़ा ही मर्यादा और क्षमता सम्पन्न बनाया है। विधान के इस मसविदे में आप देखेंगे कि अमेरिका के राष्ट्रपति की तरह यह समूची रक्षा सेना का प्रधान नायक है।’’


उन्होंने आम नागरिक को मताधिकार देने के पक्ष का विरोध करते हुए कहा था ‘‘.....राष्ट्रपति के चुनाव में भारत का हर वयस्क नागरिक भाग लेगा तो यह बड़ा ही भारी बोझ हो जायेगा। आर्थिक दृष्टि से यह एक बड़ा ही कठिन काम होगा तथा इससे वर्ष भर के लिए सारे कार्य अव्यवस्थित हो जायेंगे। अमेरिका में राष्ट्रपति के निर्वाचन से वस्तुतः कई महीनों तक बहुत से काम बन्द हो जाते हैं।’’


‘‘.......इस देश में इस पद्धति (अमेरिका) को ही अपनाने की कोशिश करेंगे तो मंत्रीमण्डल मूलक शासन व्यवस्था को यहां विकसित होने से रोकेंगे तथा अपने समय और शक्ति की बड़ी बर्बादी करेंगे। कहा जाता है कि राष्ट्रपति के निर्वाचन में सम्पूर्ण अमेरिका की सारी शक्ति और सारा ध्यान निर्वाचन में केन्द्रित हो जाता है और इससे देश की एकता को हाॅनि पहुंचती है। एक व्यक्ति समस्त राष्ट्र का प्रतीक बन जाता है। हमारे देश में भी राष्ट्रपति राष्ट्र का प्रतीक होगा, परन्तु मैं समझता हूं कि हमारे राष्ट्रपति का ऐसा निर्वाचन हमारे लिए बुरी बात होगी।’’


राष्ट्रपति के चुनाव सम्बन्धी चर्चा में बहुत सी बातें उठीं। श्री टी. चनय्या (मैसूर राज्य) चाहते थे कि राष्ट्रपति एक बार उत्तर भारत का हो तो दूसरी बात दक्षित भारत का हो। तो राय बहादुर श्यामनन्दन सहाय (बिहार) ने यह आपत्ति दर्ज की थी कि जब संघीय पालिर्यामेंट में दोनों सभाओं के सदस्यों मताधिकार दिया जा रहा है तो राज्य के द्विसदनीय सदनों में विधान परिषद को बाहर क्यों रखा जा रहा है। एक सदस्य श्री एच. चन्द्रशेखरिया (मैसूर) चाहते थे कि एक बार राष्ट्रपति रियासतों का हो और एक बार गैर रियासतों का..!


मगर शिब्बन लाल सक्सेना ने अपने संशोधन में स्पष्ट कहा कि ‘‘जनता राष्ट्रपति का चुनाव सीधे बालिग मताधिकार से करे।’’ उन्होंने तर्क दिया था कि ‘‘.......सारे देश के वोटर (वयस्क मतदाता) जिस व्यक्ति को अपना राष्ट्रपति चुनेंगे, उसकी नैतिक शक्ति और प्रतिभा सारे देश में अद्वितीय होगी। वह सचमुच जनता का आदमी और उनका सच्चा प्रतिनिधि होगा।’’ उन्होंने संविधान सभा में अपना मत व्यक्त करते हुए कहा था ‘‘हमारे देश की एकता, जो आज टूट गई है और कुछ रियासतों के वर्तमान प्रयत्नों को देखते हुए जिस एकता के और भी अधिक टूटने का भय है, उस एकता को फिर से कायम करने के लिए हम प्रतिज्ञाबद्ध हैं। उसमें बालिग मताधिकार से राष्ट्रपति का चुनाव होगा, बहुत मदद करेगा। तब ट्रावनकोर से लेकर कश्मीर तक और कलकत्ता से लेकर बम्बई तक देश के कोने-कोने में गरीब से गरीब व्यक्ति भी यह महसूस करेगा कि वह भारत वर्ष के राष्ट्रपति को चुनने का अधिकारी है। अपने भारतीय होने के गौरव को तब वह पूरी तौर पर अनुभव करेगा और भारतीय एकता की जड़ इस प्रकार मजबूत हो जायेगी और आजकल (1946) हैदराबाद, कश्मीर, ट्रावनकोर इत्यादी में जो भारत से अलग होने की भावना है, उसकी जनता में भी फिर से भारत वर्ष में मिल जाने की इच्छा प्रबल होती जायेगी। इसलिये विशेषकर इस वर्तमान अवस्था में मैं राष्ट्रपति के बालिग मताधिकार से चुने जाने को अत्यंत आवश्यक व लाभदायक समझता हूं।’’


सैय्यद काजी करीमुद्दीन (मध्यप्रांत-बरार) भी चाहते थे कि राष्ट्रपति का चुनाव वयस्क मताधिकार पद्धति से हो, उन्होंने पं. नेहरू का प्रतिवाद करते हुए कहा था कि उन्होंने केवल एक तर्क पेश किया है कि ‘‘बहुत बड़ी व्यवस्था करनी पड़ेगी।’’ उन्होंने संविधान में अपने भाषण में कहा ‘‘अमरीका जैसे देश में राष्ट्रपति का निर्वाचन वयस्क मताधिकार से होता है और मेरा विचार है कि यदि राष्ट्रपति का चुनाव हर पांचवे या चैथे वर्ष वयस्क मताधिकार से हो तो उससे आम जनता को जागृत करने का अवसर मिल सकेगा।’’ उन्होंने आशंका व्यक्त की थी कि इससे तो राष्ट्रपति केवल बहुसंख्यक दल की कठपुतली बन जायेगा।’’ लगभग यही विचार मोहम्मद शरीफ (मैसूर) ने भी रखे थे।


असल में हमारे देश में जनता को बहुत से चुनावों में भाग लेने का अधिकार मिलता है जैसे ग्रामीण क्षैत्र की जनता पंच, सरपंच, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य, विधायक और सांसद का निर्वाचन करती है, शहरी क्षैत्र में पार्षद, मेयर, विधायक और सांसद का चुनाव करती है। ये सारे चुनाव देश के एक अंश मात्र से जुड़े हैं। जैसे पंच वार्ड से, सरपंच पंचायत से, विधायक विधानसभा क्षैत्र से, सांसद लोकसभा क्षैत्र से, कोई भी एक चुनाव नहीं है जो देश के नागरिक को पूरे देश से जोड़ता हो! यानि कि हम जिस निर्वाचन पद्धति से चल रहे हैं उसमें ही हमने ‘‘राष्ट्र’’ और ‘‘राष्ट्रवाद’’ को छोटा किया है। भारत का सबसे महत्वपूर्ण पद राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पदों में से एक भी पद ऐसा नहीं है जिसे पूरा देश चुनता हो। जिससे सीधे जनता जुडती हो।


गुणवत्ता और व्यक्तित्व के अनुबंधन भी होने चाहिए


वर्तमान में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री आदी के लिए अनुभव सम्बन्धी, कार्य गुणवत्ता सम्बन्धी और विशिष्ट शैक्षणिक स्तर सम्बन्धी कोई भी बन्धन नहीं है जिनसे अनेकों बार इन पदों का अवमूल्यन हुआ, आलोचनायें हुई, समय-समय पर आरोप-प्रत्यारोप उछलते रहते हैं। इसका मुख्य कारण यही है कि जैसे-जैसे पद की उच्च स्तरता बढ़ती जाये, वैसे-वैसे उसकी विशिष्टता सम्बन्धी कुछ बन्धनों का भी होना आवश्यक है। देश में सरकारी कर्मचारी को चपरासी, क्लर्क या कण्डक्टर जैसे बहुत मामूली पदों पर भी योग्यता और स्तर के मापदण्डों पर खरा उतरना पड़ता है, मामूली सा आपराधिक प्रकरण दर्ज हो तो सरकारी नौकरी नहीं मिलती, मगर उपरोक्त पदों पर यह सब बड़ी आसानी से पदासीन हो सकते हैं। सामान्य सी सैद्धान्तिक बात है कि चालक के लिये वाहन चलाना आना जरूरी है, इसी तरह इन पदों पर पहुंचने वाले व्यक्तियों के लिए कार्यक्षमताओं के मामले में दक्ष होना अनिवार्य है। उनकी जरा सी अकुशलता से पूरे देश को दुख भोगना पड़ता है।


गणित कहता है कि वर्तमान पद्धति खराब है..
देश की जनता के बजाये दल को महत्वपूर्ण बनाया गया !



जब सीधे जनता के हाथ में निर्वाचन होता है तो जनता के प्रति बहुत अधिक जवाबदेह बनना पड़ता है। जरा सी जन उपेक्षा में जनता पद से बाहर कर सकती है, अर्थात जो चुनाव सीधे जनता से होता है वह अधिक लोकतंत्रीय होता है, जनता के प्रति जवाबदेह होता है।


इसलिये कम मेहनत व जोड़तोड़ से पद प्राप्ति की पद्धति हमने अपनाई। उदाहरण के तौर पर 100 वोटर हैं उनमें से मान लो 60 ने वोट डाले, बहुमत सिद्धांत 51 प्रतिशत के आधार पर, 60 वोटों का बहूमत लगभग 31 हुआ! अर्थात 31 वोट पर तो हम सांसद या विधायक चुन लिये गये अब इनके 51 प्रतिशत पर सरकार बन गई! यानि कि लगभग 16 प्रतिशत मत शक्ति की सरकार बन गई और उस पर भी स्वतंत्रता यह कि हम किसी को भी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बना दें। वह सदन का सदस्य हो न हो। वर्तमान में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक बार भी लोकसभा चुनाव नहीं जीते है। कुल मिला कर यह सब इसलिये हुआ कि देश की जनता के बजाये सारे निर्णय राजनैतिक दल के कार्यालय में होते रहें। जाने अनजाने जनता बाहर हो गई और लोकतंत्र पर दल तंत्र का कब्जा हो गया ।


दलगत हित की निर्वाचन पद्धति


वर्तमान निर्वाचन पद्धति मूलतः जनता के हित के बजाय राजनीतिक दलों के हित की रणनीति पर टिकी हुई है। इस पद्धति से जनता को पूरा लोकतंत्र नहीं मिला है बल्कि सारा मामला अर्द्ध लोकतंत्र पर अटक गया है। हम अपने देश में सामान्य तौर पर अपनी पसन्द के व्यक्ति को मुख्यमंत्री नहीं बना पाते। इसका दल के मुखिया की पसन्द होना जरूरी है और इस देश में लगभग पहले तीस वर्ष तक मुख्यमंत्री दल की पसन्द की आधार पर ही बनते और बदलते रहे। वर्तमान में सम्भवतः जनता ने दलों की मनमर्जी की इस प्रवृत्ति के कारण ही क्षैत्रीय दलों के व्यक्तियों को मुख्यमंत्री के रूप में चुनना प्रारम्भ कर दिया। इसी प्रकार राज्यों में राज्यपाल भी वही होते हैं जो किसी दल की पसन्द हों। राज्यपाल जैसे महत्वपूर्ण पद पर उस प्रदेश की जनता की राय कोई मायने नहीं रखती है। कई बार तो जनता द्वारा लोकसभा अथवा विधानसभा चुनाव में हराये गये व्यक्ति को राज्यसभा सांसद निर्वाचित कर मंत्री बना दिया जाता है। वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृह मंत्री रहे शिवराज पाटिल लोकसभा के सदस्य नहीं अर्थात्् जनता द्वारा निर्वाचित नहीं है किंतु फिर भी मंत्री परिषद में प्रथम और द्वितीय पायदान पर बैठे । लोकतंत्र का इससे बड़ा मखौल और क्या हो सकता है।


कुल मिलाकर देश की निर्वाचन पद्धति में बदलाव और जनता को सीधे अपने शासक नियुक्त करने के अधिकार पर पुनर्विचार आवश्यक है। वहीं देश की राष्ट्रवादी सोच और समझ को बढ़ाने के लिए देश के राष्ट्रपति का निर्वाचन सीधे आम जनता से होना चाहिए ताकि जनता का जुड़ाव सीधा राष्ट्र से बने। आज ऐसी कोई मतपद्धति नहीं है, जिससे अरूणाचल प्रदेश के नागरिक, मणिपुर के नागरिक, नागालेण्ड के नागरिक, असम के नागरिक, जम्मू कश्मीर के नागरिक राष्ट्रीय स्तर के किसी पद के लिए मतदान करें।
- बेकरी के सामनें,राधाकृष्ण मंदिर रोड़, डडवाड़ा,कोटा जंक्शन


प्रथम युद्ध विजेता प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री



- अरविन्द सीसौदिया , कोटा, राजस्थान ।

हम महात्मा गांधी की जयंती 2 अक्टूबर को मनाते हैं और उसमें भारत के प्रथम युद्ध विजेता प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जी का व्यक्तित्व दवा बैठते है। याद रहे भारत की आजादी के बाद पाकिस्तान को सीधे युद्ध के मैदान में हरानें का गौरव हमें लम्बे समय के इंतजार के बाद मिला । इससे पहले हम हारने वाले लोग मानें जाते थे। 2 अक्टूबर को हमें शास्त्रीजी की जयंती भी व्यापक और उत्साह पूर्वक मनानी चाहिये। एक प्रकार से विजय दिवस के रूप में मनानी चाहिए..!

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लालबहादुर शास्त्री (2 अक्तूबर, 1904 - 11 जनवरी, 1966),भारत के दूसरे स्थायी प्रधानमंत्री थे । वह 1963-1965 के बीच भारत के प्रधान मन्त्री थे। शास्त्री का जन्म 1904 में मुगलसराय, उत्तर प्रदेश में लाल बहादुर श्रीवास्तव के रुप में हुआ था। उनके पिता शारदा प्रसाद एक गरीब शिक्षक थे, जो बाद में राजस्व कार्यालय में लिपिक (क्लर्क) बने।
भारत की स्वतंत्रता के पश्चात शास्त्रीजी को उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव के रुप में नियुक्त किया गया था। वो गोविंद बल्लभ पंत के मुख्यमंत्री के कार्यकाल में प्रहरी एवं यातायात मंत्री बने।1951 में, जवाहर लाल नेहरु के नेतृत्व मे वह अखिल भारत काँग्रेस कमेटी के महासचिव नियुक्त किये गये। उन्होने 1952, 1957 व 1962 के चुनावों मे कांग्रेस पार्टी को भारी बहुमत से जिताने के लिए बहुत परिश्रम किया। जवाहरलाल नेहरू का उनके प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान 27 मई, 1964 को देहावसान हो जाने के बाद, शास्त्री जी ने 9 जुन 1964 को प्रधान मंत्री का पद भार ग्रहण किया। उन्हे वर्ष 1966 मे भारत रत्न से सम्मनित किया गया
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५ अगस्त १९६५ को २६००० से ३०००० के बीच पाकिस्तानी सैनिको ने कश्मीर की स्थानीय आबादी की वेषभूषा मे नियंत्रण रेखा को पार कर भारतीय कश्मीर मे प्रवेश कर लिया । भारतीय सेना ने स्थानीय आबादी से इसकी सूचना पाकर १५ अगस्त को नियंत्रण रेखा को पार किया |शुरुवात मे भारतीय सेना को अच्छी सफलता मिली उसने तोपखाने की मदद से तीन महत्वपूर्ण पहाड़ी ठिकानो पर कब्जा जमा लिया । पाकिस्तान ने टिथवाल उरी और पुंछ क्षेत्रो मे महत्वपूर्ण बढत कर ली पर १८ अगस्त पाकिस्तानी अभियान की ताकत मे काफी कमी आ गयी थी भारतीय अतिरिक्त टुकड़िया लाने मे सफल हो गये भारत ने पाकिस्तान के क्ब्जे वाले कश्मीर मे ८ किलोमीटर अंदर घुस कर हाजी पीर दर्रे पर कब्जा कर लिया । इस कब्जे से पाकिस्तान सकते मे आ गया अभियान जिब्राल्टर के घुसपठिये सनिको का रास्ता भारतीयो के कब्जे मे आ गया था और अभियान विफल हो गया यही नही पाकिस्तान की कमान को लगने लगा कि पाकिस्तानी कश्मीर का महत्वपूर्ण शहर मुजफ्फराबाद अब भारतीयो के कब्जे मे जाने ही वाला है | मुजफ्फराबाद पर दबाव कम करने के लिये पाकिस्तान ने एक नया अभियान ग्रैंड स्लैम शुरू किया ।

१ सितम्बर १९६५ को पाकिस्तान ने ग्रैंड स्लैम नामक एक अभियान के तहत सामरिक द्रुष्टी से महत्वपूर्ण शहर अखनूर जम्मू और कश्मीरपर कब्जे के लिये आक्रमण कर दिया । इस अभियान का उद्देश्य कश्मीर घाटी का शेष भारत से संपर्क तोड था ताकि उसकी रसद और संचार वय्वस्था भंग कर दी जाय । पाकिस्तान के इस आक्रमण के लिये भारत तैयार नही था और पाकिस्तान को भारी संख्या मे सैनिको और बेहतर किस्म के टैंको का लाभ मिल रहा था । शुरूवात मे भारत को भारी क्षती उठानी पड़ी इस पर भारतीय सेना ने हवाई हमले का उपयोग किया इसके जवाब मे पाकिस्तान ने पंजाब और श्रीनगर के हवाई ठिकानो पर हमला कर दिया । युद्ध के इस चरण मे पाकिस्तान अत्यधिक बेहतर स्थिती मे था और इस अप्रत्याशित हमले से भारतीय खेमे मे घबराहट फैल गयी थी । अखनूर के पाकिस्तानी सेना के हाथ मे जाने से भारत के लिये कश्मीर घाटी मे हार का खतरा पैदा हो सकता था ।ग्रैंड स्लैम के विफल होने की दो वजहे थी सबसे पहली और बड़ी वजह यह थी कि पाकिस्तान की सैनिक कमान ने जीत के मुहाने मे पर अपने सैनिक कमांडर को बदल दिया ऐसे मे पाकिस्तानी सेना को आगे बढने मे एक दिन की देरी हो गयी और उन २४ घंटो मे भारत को अखनूर की रक्षा के लिये अतिरिक्त सैनिक और सामान लाने का मौका मिल गया खुद भारर्तीय सेना के स्थानीय कमांडर भौचक्के थे कि पाकिस्तान इतनी आसान जीत क्यों छोड़ रहा है । एक दिन की देरी के बावजूद भारत के पश्चिमी कमान के सेना प्रमुख यह जानते थे कि पाकिस्तान बहुत बेहतर स्थिती मे है और उसको रोकने के लिये उन्होने यह प्रस्ताव तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल चौधरी को दिया कि पंजाब सीमा मे एक नया मोर्चा खोल कर लाहौर पर हमला कर दिया जाय । जनरल चौधरी इस बात से सहमत नही थे लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शाष्त्री ने उनकी बात अनसुनी कर इस हमले का आदेश दे दिया ।
भारत ने ६ सितम्बर को अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा कॉ पार कर पश्चिमी मोर्चे पर हमला कर युद्ध की आधिकारिक शुरूवात कर दी[12] । ६ सितम्बर को भारत की १५वी पैदल सैन्य इकाई ने द्वितीय विश्व युद्ध के अनुभवी मेजर जनरल प्रसाद के नेत्रत्व मे इच्छोगिल नहर के पश्चिमी किनारे मे पाकिस्तान के बड़े हमले का सामना किया । इच्छोगिल नहर भारत और पाकिस्तान की वास्तविक सीमा थी । इस हमले मे खुद मेजर जनरल प्रसाद के काफिले पर भी हमला हुआ और उन्हे अपना वाहन छोड़ कर भागना पड़ा । भारत ने प्रतिआअक्रमण मे बरकी गांव के समीप नहर को पार करने मे सफलता अर्जित कर ली । इससे भारतीय सेना लाहौर के हवाई अडडे पर हमला करने की सीमा मे पहुच गयी इसके परिणामस्वरूप अमेरिका ने अपने नागरिको को लाहौर से निकालने के लिये कुछ समय के लिये युद्धविराम की अपील की । इसी बीच पाकिस्तान ने लाहौर पर दबाव को कम करने के लिये खेमकरण पर हमला कर उस पर कब्जा कर लिया बदले मे भारत ने बेदियां और उसके आस पास के गावों पर हमला कर दिया ।
६ सितम्बर कॉ लाहौर पर हमले मे भारतीय सेना के प्रथम पैदल सैन्य खन्ड (इनफैंट्री डिविजन) के साथ द्वितीय बख्तरबंद उपखन्ड(ब्रिगेड) के तीन टैंक दस्ते शामिल थे । वे तुरंत ही सीमा पार करके इच्छोगिल नहर पहुच गये पाकिस्तानी सेना ने पुलियाओं पर रक्षा दस्ते तैनात कर दिये जिन पुलो को बचाया नही जा सकता था उनको उड़ा दिया गया पाकिस्तान के इस कदम से भारतीय सेना का आगे बढना रुक गया । जाट रेजीमेंट की एक इकाई 3 जाट ने नहर पार करके डोगराई और बातापोर पर कब्जा कर लिया[13] । उसी दिन पाकिस्तानी सेना ने बख्तरबंद इकाई और वायुसेना की मदद से भारतीय सेना की १५वे खन्ड पर बड़ा प्रतिआक्रमण किया हालाकि इससे ३ जाट को मामूली नुकसान ही हुआ लेकिन १५वे खन्ड को पीछे हटना पड़ा और उसके रसद और हथियारो के वाहनो को काफी क्षती पहुची । भारतीय सेना के बड़े अधिकारियो को जमीनी हालात की सही जानकारी नही थी अतः उन्होने इस आशंका से कि ३ जाट को भी भारी नुकसान हुआ है उसे पीछे हटने का आदेश दे दिया इससे ३ जाट के कमान आधिकारी को बड़ी निराशा हुई [14] और बाद मे उन्हे डोगराई पर फिर कब्जा करने के लिये बड़ी कीमत चुकानी पड़ी ।
८ दिसम्बर १९६५ को ५ मराठा लाईट इनफ़ैन्ट्री का एक दस्ता रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कस्बे मुनाबाव मे तैनात राजस्थान सैन्य बल कॊ मजबूती प्रदान करने के लिये भेजा गया । उनको पाकिस्तानी सेना के पैदल द्स्ते को आगे बढने से रोकने का आदेश मिला था पर वे केवल अपनी चौकी की रक्षा ही कर पाये पाकिस्तानी सेना के तोपखाने से हुई भारी बमबारी और हवाई और पैदल सैन्य आक्रमण के बीच ५ मराठा के जवानो ने बड़ी वीरता का परिचय दिया परिणाम स्वरूप आज उस चौकी कॊ मराठा हिल के नाम से जाना जाता है । ५ मराठा की मदद के लिये भेजे गये ३ गुरखा और ९५४ भारी तोपखाना का दस्ता पाकिस्तानी वायु सेना के भारी हमले के कारण पहुच नही पाया और रसद ले कर बारमेर से आ रही ट्रैन भी गर्दा रोड रेल अड्डे के पास हमले का शिकार हो गयी १० सितम्बर को मुनाबाओ पर पाकिस्तान का कब्जा हो गया ।[17]
९ सितम्बर के बाद की घटनाओं ने दोनो देशो की सेनाओ के सबसे गर्वित खन्डो का दंभ चूर चूर कर दिया । भारत के १ बख्तरबंद खन्ड जिसे भारतीय सेना की शान कहा जाता था ने सियालकोट कि दिशा मे हमला कर दिया । छाविंडा मे पाकिस्तान की अपेक्षाक्रुत कमजोर ६ बख्तरबंद खन्ड ने बुरी तरह हरा दिया भारतीय सेना को करीब करीब १०० टैंक गवाने पड़े और पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा । इससे उत्साहित होकर पाकिस्तान की सेना ने भारतीयो पर प्रतिआक्रमण कर दिया और भारतीय सीमा मे आगे घुस आयी । दूसरे मोर्चे पर पाकिस्तान की शान माने जाने वाले १ बख्तरबंद खन्ड ने अमृतसर पर कब्जे के इरादे से खेमकरण पर हमला कर दिया । पाकिस्तानी सेना खेमकरण से आगे ही नही बढ पायी और उसे भारत के ४ पैदल खण्ड के हाथो करारी शिकस्त मिली करीब ९७ टैंक असल उत्तर नामक भारतीय अभियान मे भारतीयो के कब्जे मे आ गये थे जबकि भारत के केवल ३० टैंक क्षतिग्रस्त हुए थे । इसके बाद यह जगह अमेरिका मे बने पैटन नाम के पाकिस्तानी टैंको के उपर पैटन नगर के नाम से जानी जाने लगी । इस लड़ाई के बाद पाकिस्तान की शान माने जाने वाले १ बख्तरबंद खन्ड ने १९६५ के युद्ध मे आगे भाग नही लिया ।
इस समय तक युद्ध मे ठहराव आ गया था और दोनो देश अपने द्वारा जीते हुए इलाको की रक्षा मे ज्यादा ध्यान दे रहे थे । लड़ाई मे भारतीय सेना के ३००० और पाकिस्तानी सेना के ३८०० जवान मारे जा चुके थे । भारत ने युद्ध मे ७१० वर्ग किलोमीटर इलाके मे और पाकिस्तान ने २१० वर्ग किलोमीटर इलाके मे कब्जा कर लिया था । भारत के क्ब्जे मे सियालकोट , लाहौर और कश्मीर के उपजाऊ इलाके थे.और पाकिस्तान के कब्जे मे सिंध और छंब के अनुपजाऊ इलाके थे .

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वर्ष 1965 के भारत-पाक युद्ध के 44 साल बाद पाकिस्तान ने स्वीकार किया है कि उनके देश की ‘घुसपैठ’ के कारण ही भारत को युद्ध के लिए मजबूर होना पड़ा था. पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सेवानिवृत मेजर जनरल महमूद अली दुर्रानी ने एक टीवी समाचार चैनल से कहा ‘‘हमने सीमा पर से घुसपैठ की शुरुआत की और मुझे लगता है कि हमें उस समय भारत की ओर से आने वाली प्रतिक्रिया के बारे में सोचना चाहिए था.’’

दुर्रानी ने युद्ध में भाग लिया था, जिसके बाद पूर्व राष्ट्रपति जिया उल-हक के कार्यकाल में वह सैन्य सचिव थे. उन्होंने कहा कि भारतीय सेना ने 1965 में युद्ध शुरू किया क्योंकि ‘‘छोटे स्तर की झड़पें पाकिस्तान की ओर से शुरू हुई थीं.’’ उन्होंने कहा कि उच्चस्तरीय सैन्य शासन ‘भारत को परेशान करने की रणनीति’ में शामिल नहीं था, लेकिन राजनेता जानते थे कि सीमा पर क्या हो रहा है. तत्कालीन विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को भी अंदाजा नहीं था कि भारत अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करेगा.

इसी दौरान उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को अतीत में भारत के साथ युद्ध करके ‘कुछ नहीं मिला.’ उन्होंने कहा ‘‘हमें भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाना चाहिए और लंबित मुद्दों को सुलझाने के लिए शांति वार्ता शुरू करनी चाहिए.’’ इसके पहले दुर्रानी ने पत्रकारों के सामने स्वीकार किया था कि मुंबई हमलों में गिरफ्तार अजमल कसाब पाकिस्तानी नागरिक है, जिसके बाद उन्हें प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने बर्खास्‍त कर दिया था.

हिंदू ही सृष्टि, गणित और कालगणना के प्रथम ज्ञाता हैं...


- अरविंद सीसौदिया
महर्षि दयानन्द सरस्वती ने ऋग्वेद के सृष्टि संदर्भ ऋचाओं का भाष्य करते हुए ‘‘कार्य सृष्टि’’ शब्द का प्रयोग किया है, अर्थात् सृष्टि अनंत है,वर्तमान सृष्टि की उत्पत्ति से पूर्व भी सृष्टि थी। जो सृष्टिक्रम अभी काम कर रहा है वह कार्य सृष्टि है।
बृम्हाण्ड सृष्टि का पूर्व ज्ञान...
- 5145 वर्ष पूर्व ,महाभारत का युद्ध, कौरवों की विशाल सेना के सेनानायक ‘भीष्म’..., कपिध्वज अर्थात् हनुमान जी अंकित ध्वज लगे रथ पर अर्जुन गाण्डीव (धनुष) हाथ में लेकर खड़े हैं और सारथी श्रीकृष्ण (ईश्वरांश) घोड़ों की लगाम थामें हुए है। रथ सेनाओं के मध्य खड़ा है।
- अर्जुन वहां शत्रु पक्ष के रूप में, चाचा-ताऊ, पितामहों, गुरूओं, मामाओं, भाईयों, पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, श्वसुरों और शुभचिंतकों को देख व्याकुल हो जाता है। भावनाओं का ज्वार उसे घेर लेता है, वह सोचता है, इनके संहार करने से मेरे द्वारा मेरा ही संहार तो होगा...! वह इस ‘अमंगल से पलायन’ की इच्छा श्रीकृष्ण से प्रगट करता है।
- तब श्रीकृष्ण कहते हैं ‘‘ऐसा कभी नहीं हुआ कि मैं न रहा होऊं या तुम न रहे तो अथवा ये समस्त राजा न रहे हों और न ऐसा है कि भविष्य में हम लोग नहीं रहेंगे।’’ उन्होंने कहा ‘‘जो सारे शरीर में व्याप्त है, उसे ही तुम अविनाशी समझो। उस अव्यय आत्मा को नष्ट करने में कोई भी समर्थ नहीं है अर्थात् आत्मा न तो मारती है और न मारी जाती है।’’
- अंत में योगेश्वर श्रीकृष्ण को अपना विराट स्वरूप दिखाना पड़ता है, इस विराट रूप में विशाल आकाश, हजारों सूर्य और तेज अर्जुन को दिखता है।
‘‘दिवि सूर्य सहस्रस्य भवेद्युगपदुल्पिता।
यदि भाः सदृशी सा स्याभ्दासस्तस्य।।12।।
  - श्रीमद्भगवतगीता (अध्याय 11)
-अर्जुन ने ‘‘एक ही स्थान पर स्थित हजारों भागों में विभक्त ब्रह्माण्ड के अनन्त अंशों को देखा’’
‘‘तत्रैकस्थं जगत्वृत्सनं प्रविभममनेकधा।
अपष्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा।।13।।
  - श्रीमद्भगवतगीता (अध्याय 11)
-अर्जुन आष्चर्यचकित होकर कहता है ‘‘हे विष्वेष्वर, हे विष्वरूप, आपमें न अंत दिखता है, न मध्य और न आदि।’’
-तब अर्जुन आगे कहता है ‘‘यद्यपि आप एक हैं, किंतु आप आकाश तथा सारे लोकों एवं उनके बीच के समस्त अवकाश में व्याप्त हैं।’’
‘‘द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः।
दृष्टाभ्दुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्।।20।।
  - श्रीमद्भागवतगीता (अध्याय 11)
-भयातुर अर्जुन परम् ईश्वर को अपने ऊपर कृपा करने की प्रार्थना करता है। तब भगवान कहते हैं ‘‘समस्त जगत को विनष्ट करने वाला काल मैं हूं।’’
  ‘‘कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो’’
   - श्रीमद्भागवतगीता (अध्याय 11)
- ब्रह्माण्ड दर्शन की दूसरी बड़ी घटना, इससे पूर्व की है और वह भी श्रीकृष्ण से जुड़ी हुई है, जिसका वर्णन हमें श्रीमद्भागवत के दशम् स्कन्ध में मिलता है    एक दिन बलराम जी आदी ग्वाल-बाल श्रीकृष्ण के साथ खेल रहे थे। उन लोगों ने माता यषोदा के पास आकर कहा ‘‘मां! कन्हैया ने मिट्टी खायी।’’ हितैषिणी यशोदा ने श्रीकृष्ण का हाथ पकड़ लिया और मिट्टी खाने की बात पर डांटा। तब श्रीकृष्ण ने कहा आरोप झूठा है, तो यशोदा ने मुंह खोलकर दिखाने को कहा। श्रीकृष्ण ने मुंह खोल कर दिखाया। यशोदा जी ने देखा कि श्रीकृष्ण के मुंह में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशायें, पहाड़, द्वीप और समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल,जल, तेज, पवन, वियत्, वैकारिक अहंकार के देवता, मन-इन्द्रिय, पञ्चतन्मात्राएं और तीनों गुण श्रीकृश्ण के मुख में दीख पड़े। यहां तक कि स्वयं यशोदा ने अपने आपको भी श्रीकृष्ण के मुख में देखा, वे बड़ी शंका में पड़ गई.....!
- आज भी वह स्थान ‘‘ब्रह्माण्ड’’ के नाम से बृज में तीर्थ रूप में स्थित है।
इसका सीधा सा अर्थ इतना ही है कि जिस ब्रह्माण्ड को आज वैज्ञानिक खोज रहे हैं, वह हजारों-लाखों वर्श पूर्व हिन्दूओं को मालूम थे। 
  जीवसŸाा के विनाश का ज्ञान.
‘‘ततो दिनकरैर्दीप्तै सप्तभिर्मनुजाधिय।
पीयते सलिलं सर्व समुद्रेशु सरित्सु च।।’’
  -महाभारत (वन पर्व 188-67)
   इसका अर्थ है कि ‘‘एक कल्प अर्थात् 1 हजार चतुर्युगी की समाप्ति पर आने वाले कलियुग के अंत में सात सूर्य एक साथ उदित हो जाते हैं और तब ऊश्मा इतनी बढ़ जाती है कि पृथ्वी का सब जल सूख जाता है। हमारी कालगणना से एक कल्प का मान 4 अरब 32 करोड़ वर्ष है।
देखिये आज का विज्ञान क्या कहता है ‘‘नोबल पुरूस्कार से सम्मानित चन्द्रशेखर के चन्द्रशेखरसीमा सिद्यांत के अनुसार यदि किसी तारे का द्रव्यमान 1.4 सूर्यों से अधिक नहीं है, तो प्रारम्भ में कई अरब वर्ष तक उसका हाईड्रोजन, हीलियम में संघनित होता रहकर, अग्नि रूपी ऊर्जा उत्पन्न करता रहेगा। हाईड्रोजन की समाप्ति पर वह तारा फूलकर विशाल लाल दानव (रेड जायन्ट) बन जायेगा। फिर करीब दस करोड़ साल तक लाल दानव की अवस्था में रहकर तारा अपनी शेष नाभिकीय ऊर्जा को समाप्त कर देता है और अन्त में गुठली के रूप में अति सघन द्रव्यमान का पिण्ड रह जाता है। जिसे श्वेत वामन (व्हाईट ड्वार्फ) कहा जाता है। श्वेत वामन के एक चम्मच द्रव्य का भार एक टन से भी  अधिक होता है। फिर यही धीरे-धीरे कृष्ण वामन (ब्लेक हाॅल) बन जाता है।
   लगभग 5 अरब वर्ष में हमारा सूर्य भी लाल दानव बन जायेगा, इसके विशाल ऊश्मीय विघटन की चपेट में बुध और शुक्र समा जायेंगे। भीषण तापमान बढ़ जाने से पृथ्वी का जीवन जगत लुप्त हो जायेगा और सब कुछ जलकर राख हो जायेगा। 
   महाभारत युग में यह कल्पना कर लेना कितना कठिन था मगर इस पुरूषार्थ को हमारे पूर्वजों ने सिद्ध किया।
वैज्ञानिक गणना
मूलतः सूर्य सिद्धांत ग्रंथ सत्युग में लिखा माना जाता है, वह नष्ट भी हो गया, मगर उस ग्रन्थ के आधार पर ज्योतिष गणना कर रहे गणनाकारों के द्वारा पुनः सूर्य सिद्धान्त गं्रथ लिखवाया गया, इस तरह की मान्यता है।
अस्मिन् कृतयुगस्यान्ते सर्वे मध्यगता ग्रहाः।
बिना तु पाद मन्दोच्चान्मेशादौ तुल्य तामिताः।।
इस पद का अर्थ है ‘कृतयुग’ (सतयुग) के अंत में मन्दोच्च को छोड़कर सब ग्रहों का मध्य स्थान ‘मेष’ में था। इसका अर्थ यह हुआ कि त्रेता के प्रारम्भ में सातों ग्रह एक सीध में थे। मूलतः एक चतुर्युगी में कुल 10 कलयुग होते हैं, जिनमें सतयुग का मान 4 कलयुग, त्रेतायुग का मान 3 कलयुग, द्वापरयुग का मान दो कलयुग और कलयुग का मान एक कलयुग है।
वर्तमान कलियुग,महाभारत युद्ध के 36 वर्ष पश्चात प्रारम्भ हुआ,  (19मार्च 2007 से)  5109 कलि संवत् है। (अर्थात् इ्र्र.पू. 3102 वर्ष में 20 फरवरी को रात्रि 2 बजकर 27 मिनिट, 30 सेकेण्ड पर कलियुग प्रारम्भ हुआ।)
‘संवतसर बहुत पुराना’’
-ऋग्वेद के 7वें मण्डल के 103वें सूक्त के मंत्र क्रमांक 7 में संवतसर की चर्चा है।
‘‘ब्राह्मणासो अतिरात्रे ने सोमे सरो न पूर्णमभितो वदन्तः।
संवत्सरस्य तदहः परिश्ठः यन्मण्डूका प्रावृषीणं बभूव।।
गणित से ही गणना 
- काल को कितना ही जानने समझने के बाद भी उसका इकाई निर्धारण करना और गिनना एक अत्यंत कठिन कार्य था। यह शून्य और दशमलव के बिना सम्पन्न नहीं था।
- आधुनिक गणित के मूर्धन्य विद्वान प्रो. जी.पी. हाल्स्टेंड ने अपनी पुस्तक ‘गणित की नींव तथा प्रक्रियाएं’ के पृष्ठ 20 पर लिखा है कि ‘‘शून्य के संकेत के आविष्कार की महत्ता कभी बखानी नहीं जा सकती। ‘कुछ नहीं को न केवल एक नाम तथा सत्ता देना वरन् एक शक्ति देना, हिंदू जाति का लक्षण है, जिनकी यह उपज है। यह निर्वाण को डायनमों की शक्ति देने के समान है। अन्य कोई भी एक गणितीय आविष्कार बुद्धिमता तथा शक्ति के सामान्य विकास के लिए इससे अधिक प्रभावशाली नहीं हुआ।’’
- इसी प्रकार हिंदुओं के द्वारा गणित क्षैत्र में दूसरी महान खोज दशमल का आविष्कार था, जिसने सोच और समझ के सभी दरवाजे खोल दिये।
‘हिन्दू गणना में बहुत आगे रहे...’
(क) प्राचीन ग्रीक में सबसे बड़ी ज्ञात संख्या ‘‘मीरीयड’’ अर्थात् 10,000 थी।
(ख) रोमन की सबसे बड़ी ज्ञात संख्या 1000 थी।
(ग) यजुर्वेद संहिता में सबसे बड़ी ज्ञात संख्या 1012 (दस खरब) थी।
(घ) ईसा पूर्व पहली शताब्दी में ‘ललित विस्तार’ बौद्ध ग्रंथ में 107 संख्या बोधिसत्व कोटी के नाम से बताई गई और इसके आगे प्रारम्भ कर, 1053 (तल्लक्षण) तक सामने आती है।
(ङ) जैन ग्रन्थ ‘अनुयोग द्वार’ में ‘असंख्येय’ का मान 10140 तक सामने आता है।
- अंकगणित, बीजगणित की भांति ही रेखागणित का जन्म भी भारत में ही हुआ। पाई का मान हमारे आर्यभट्ट ने बताया। 
- ऋग्वेद में नक्षत्रों की चर्चा है, राशी चक्र को अरों के रूप में सम्बोधित किया गया है। कुछ नक्षत्रों के नाम भी मिलते हैं।,अर्थववेद में,जैन ग्रन्थों में 28 नक्षत्रों के नाम आये हैं, इनमें से एक अभिजित नक्षत्र हमारी आकाशगंगा का नहीं होने से गणना में 27 नक्षत्र ही रखे जाते है। जो आज भी वैज्ञानित तथ्यों पर खरे है।
और अनंत की कालगणना...
- श्रीराम को 14 वर्षों का वनवास हुआ था,श्रीराम का समय 17 लाख 50 हजार वर्ष पूर्व का गणना से बैठता है। अर्थात तब काल गणना थी। सबसे बडी बात तो यह है कि रामेश्वरम सेतु जो समुद्र में डूबा हुआ है की आयु अमरीकी वैज्ञानिकों ने भी लगभग इतनी ही आंकी है।
- महाभारत में,विराट नगर  की चढ़ाई के समय कृष्णपक्ष की अष्टमी को जब अर्जुन,अज्ञातवास त्यागकर प्रगट हुए व कौरवों को ललकारा ,तो समस्या यह खडी हुई कि अज्ञातवास का समय पूरा हुआ अथवा नहीं । तब कर्ण और दुर्योधन ने आरोप लगाया कि ‘अभी तो तेरहवां वर्ष चल रहा है, अतएव पाण्डवों का तेरहवें वर्ष का प्रण पूर्ण नहीं हुआ अर्थात वे तय समय से पूर्व प्रगट हो गये हें सो तय  प्रतिज्ञानुसार उन्हें पुनः 12 वर्ष और वन में रहना चाहिये। इस प्रकार की मांग करते हुए, भीष्म पितामह से समय-निर्णय के लिए व्यवस्था देने को कहा, तब भीष्म ने कला-काष्ठादि से लेकर संवत्सर पर्यन्त के कालचक्र की बात कहकर व्यवस्था दी कि ‘ज्योतिषचक्र के व्यतिक्रम के कारण वेदांगज्योतिष की गणना से तो 13 वर्ष, 5 महीने और 12 दिन होते हैं; किंतु पाण्डवों ने जो प्रण की बातें सुनी थी, उनको यथावत् पूर्ण करके और अपनी प्रतिज्ञा की पूर्ति को निश्चयपूर्वक जानकर ही अर्जुन आपके समक्ष आया है।’ अर्थात तब संवतसर भी था और काल गणना भी थी।
-काल की छोटी गणनाओं के बारे में तो बहुत आता रहता है मगर बडी गणनायें,जिनका यूरोपवाले मजाक उडाते थे ,मगर हिन्दू ऋषिओं की जानकारी ने आश्चर्य से मुंह में उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया है।
- जब हमारे सामने 71 चतुर्युगी का मान 4,32,0000000 वर्ष यानि ‘कल्प’ 4 अरब 32 करोड़ वर्ष। कल्प अहोरात्र यानि 4 अरब 32 करोड़ वर्ष का दिन और इतने ही मान की रात्रि यानि कि 8 अरब 64 करोड़ वर्ष।
-ब्रह्मवर्ष: 31 खरब 10 अरब 40 करोड़ वर्ष
-ब्रह्मा की आयु: 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्ष
- आकाशगंगा की एक परिक्रमा में लगभग 25 से 27 करोड़ वर्ष का अनुमान है। संध्यांश सहित एक मन्वन्तर का काल खण्ड भी 30 करोड़ 84 लाख 28 हजार वर्ष का है।
   यूरोप के प्रसिद्ध ब्रह्माण्डवेत्ता ‘कार्ल वेगन’ ने उनकी पुस्तक "cosmo" में लिखा है कि ‘‘विश्व में हिन्दू धर्म एक मात्र ऐसा धर्म है, जो इस विश्वास पर समर्पित है कि इस ब्रह्माण्ड में उत्पत्ति और लय की एक सतत प्रक्रिया चल रही है और यही एक धर्म है जिसने समय के सूक्ष्मतम से लेकर वृहदतम नाप, जो सामान्य दिन-रात से लेकर 8 अरब 64 करोड़ वर्ष के ब्रह्मा के दिन-रात तक की गणना की है, जो संयोग से आधुनिक खगोलीय नापों के निकट है।’’
-इस संदर्भ में,नई खोजों से बहुत स्पष्टता से सामने आ रही है कि ब्रह्माण्ड में 100 से अधिक बहुत ही शक्तिशाली ”क्वासर“ स्रोत हैं जिनका नीला प्रकाश हमारे पास अरबों प्रकाश वर्ष दूर से चल कर आ रहा है। जिसका सीधा गणितीय अर्थ यह है कि वह प्रकाश इतने ही वर्ष पूर्व अपने स्रोत से हमारी ओर चला..., अर्थात् हमें मिल रही किरणों की आयु मार्ग में लगे प्रकाशवर्ष जितनी है। 
- ‘‘‘क्वासर’3 सी 273’’ से 3 अरब वर्ष, ‘‘क्वासर’3 सी 47’’ से 5 अरब वर्ष और ‘‘क्वासर ओएच 471’’ से 16 अरब वर्ष पूर्व चलीं किरणें प्राप्त हो रही हैं। अर्थात् आकाश में जो कुछ हो रहा है, उसके मायनों में हमारे कल्पों की गणना, ब्रह्मा के वर्ष, ब्रह्मा की आयु की गणना ! ब्रह्मा की आयु जो विष्णु के पलक झपकने (निमेश) मात्र होती है तथा फिर विष्णु के बाद रूद्र का प्रारम्भ होना आदी आदी सच के कितने करीब खडे है।
-इसी प्रकार वैदिक ऋषियों के अनुसार वर्तमान सृष्टि पंचमण्डल क्रम वाली हैः-1.चन्द्र मण्डल 2.पृथ्वी मण्डल 3. सूर्य मण्डल 4.परमेष्ठी मण्डल (आकाशगंगा का ) 5.स्वायम्भू मण्डल (आकाशगंगाओं से परे )..!आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि यह सभी मण्डल वास्तविक तौर पर हैं ,पूरी गति व लय के साथ गतिशील हैं,चलायमान हैं..!!
बृम्हांण्ड,गणित और काल की विश्व में इतनी विशाल प्रमाणिक जानकारी हिन्दूओं के अलावा कोई नहीं कर सका...! और आज विज्ञान उन बातों की बेमन से ही सही मगर हां भरने को मजबूर है।
      
-बेकरी के सामनें,राधाकृष्ण मंदिर रोड़, डडवाड़ा, कोटा जं.