गुरुवार, 6 अक्तूबर 2011

रावण नहीं मरा....



- अरविन्द सीसौदिया, 
एक व्यंग - रावण नहीं मरा....
आज रावणों को मारा जा रहा है। मगर आज सायंकाल सारे रावण एक साथ अट्हास कर राम को चुनौती दे बैठे....., बहुत हो चुका हमें अब नहीं मरना...... हमें नहीं मरना..........तुम्हे जो करना है करलो ..., तुम हमारे सामने न पिद्दी .., न पिद्दी के शेरबा....!! हमारे सामने तुम लगते कहां हो.....,कहां तुम पांच फिट छै इंच के राम - लक्षमण और कहां मेरा खानदान 80 फीट , 90 फीट और हर साल 5-10 फीट और बड जाता हूं ...तुम त्रेता से अभी तक वहीं के वहीं हो...!! मेरा हर तरह का कद तुम से कई गुणा भारी है। यह तो मेरा ही अहसान था जो में बिना प्रतिरोध जल जाता हूं। ....राम बहुत सकुचाये ....यह कैसी बगावत ....सरे आम तौहीन होगी ...!! उन्होने संकट मोचक हनुमानजी को लगाया...कुछ करो अन्यथा..., अनर्थ हो जायेगा । हनुमानजी ने जाकर रावणों से बात की ...भई तुम्हे हम मारते ही कब हैं बल्की अगले साल आने का नौता ही तो देते हैं। तुम दिखावटी ही तो मरते हो । रावणों ने कहा हमारी भी कोई इज्जत है..! जिन्दा सारे रावण जिन्दा ही घूम रहे हैं माल उडा रहे हैं , शासन चला रहे हैं ...हम मरे हुए रावणों को मारने हर साल आप आ जाते हो....!! राम ने कहलावा अगले साल में नहीं आउंगा अभी तो मेरी इज्जत रखलो...रावण ने कहा ए राजा जितना माल हो तो बात करो, एस कलमाडी जितना कुंभकरण को भी देना पडेगा...,मेघनाथ को भी कनीमोझी जितना देना होगा.....नहीं दे सकते तो लोट जाओ......राम पर कहां माल और रावण नहीं मरा.......

आज ही जन्म लिया था: राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने.....











- अरविन्द सीसौदिया , कोटा, राजस्थान

      राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की उपस्थिति भारतीय समाज के हर क्षेत्र में महसूस की जा सकती है, माना जाता है कि यह विश्व का सबसे बडा स्वंयसेवी संगठन है। जिसकी शुरुआत प्रखर स्वतंत्रता सेनानी डाॅ. केशव बलीराम हेडगेवार ने सन १९२५ में विजया दसमी के दिन की थी। इसके महत्व के उदाहरण के तौर पर, सन १९६२ के भारत-चीन युद्ध में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू संघ की भूमिका से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने संघ को सन १९६३ के गणतंत्र दिवस की परेड में सम्मिलित होने का निमन्त्रण दिया। सिर्फ दो दिनों की पूर्व सूचना पर तीन हजार से भी ज्यादा स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में वहाँ उपस्थित हो गये। मा.माधव सदाशिवराव गोलवलकर अर्थात गुरूजी इस संगठन के दूसरे सरसंघचालक हुये, जिन्हे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समकक्ष लोकप्रिय, बी बी सी लंदन नें एक सर्वे के उपरांत माना था। 
     वर्तमान समय में संघ के दर्शन का पालन करने वाले कतिपय लोग देश के सर्वोच्च पदों तक पहुँचने मे भीं सफल रहे हैं। ऐसे प्रमुख व्यक्तियों में उपराष्ट्रपति पद पर स्व.भैरोंसिंह शेखावत, प्रधानमंत्री पद पर अटल बिहारी वाजपेयी एवं उपप्रधानमंत्री व गृहमंत्री के पद पर लालकृष्ण आडवाणी जैसे लोग शामिल हैं। वहीं मजदूर क्षैत्र में स्व. दत्तोपंत जी थेगडी सहित अनेक राज्यपाल,मु,ख्यमंत्री,पत्रकार और समाज के सभी क्षैत्रों में प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं। मुरलीमनोहर जोशी, मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी, शिराजसिंह चैहान,रमनसिंह और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरूण जेटली आदी भी स्वंयसेवक ही है।
    भारतीय मजदूर संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद,विश्व हिन्दू परिषद,भारतीय किसान संघ,स्वदेशी जागरण मंच,विद्या भारती और सेवा भारती जैसे अनेकों संगठनों का प्रेरक भी यही संगठन है।

इस वर्ष का दसहरा कांग्रेस नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के अवगुणों को जलाने के लिए





- अरविन्द सीसौदिया , कोटा, राजस्थान
हलाकि अंहकार के दसों अवगुणों पर विजय के लिए हम प्रतिवर्ष दसहरा पर्व मानते हैं .., रावण अवगुणों का प्रतीक है..., मगर इस वर्ष का दसहरा कांग्रेस  नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के अवगुणों को जलाने के लिए लोक तांत्रिक  तरीके से जन प्रतिरोध के  संकल्प  के साथ  मनाएं...पूरा देश कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार और महंगाई के महा अहंकार में जल रहा है..इससे मुक्ति ही प्रथम आवश्यकता है....

प्रश्न: दशहरा हमारे जीवन में क्या सन्देश लेकर आता है? 
-राकेश तिवारी, लखनऊ 
योग गुरु सुरक्षित गोस्वामी: भगवान् श्रीराम द्वारा रावण का वध जिस दिन किया गया उसको दशहरा कहा जाता है! इस दिन रावण का पुतला जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत सिद्ध करते है! लेकिन भारतीय संस्कृति में प्रत्येक त्योहार का आध्यात्मिक अर्थ होता है, इसी को जीवन में लगाना होता है! रावण और कुछ नहीं बल्कि हमारा अहंकार ही है, जब तक ये अहंकार है तब तक हमारे अन्दर अनेक विकार पनपते रहते है ये ही हमारे सारे दुखों की जड़ है, जितना ज्यादा अहंकार होता है उतना ही ज्यादा दुःख होता है, ये अहंकार ही हमें अपने सत चित आनंद स्वरुप से दूर किए रखता है! 

दशहरे का अर्थ यही है कि अहंकार रूपी दसों सिरों का नाश हो जाए! असलियत में अहंकार ऐसे ही नष्ट नहीं होता इसके लिए गुरु चाहिए और गुरु के प्रति हमारा समर्पण भाव चाहिए फिर गुरु मुख से निकले ब्रह्मज्ञान के द्वारा अहंकार का नाश होता हैं, जिस क्षण ज्ञान का उदय होता है उसी क्षण अज्ञान रूपी अहंकार का नाश स्वतः ही होने लगता है! जैसे सूरज के निकलने पर अंधेरा गायब हो जाता है! लेकिन यह अहंकार इतना जिद्दी होता है कि जाता ही नहीं है, बार- बार मौका मिलते ही खड़ा हो जाता है, शिष्य जब गुरु के सामने सिर झुकाता है तो उसका उद्देश्य यही होता है कि अहंकार का नाश हो लेकिन जैसे ही सिर उठता है अहंकार भी साथ-साथ उठ जाता है! इसलिए रावण रूपी अहंकार के अनेक सिर बताए गए है! 

जो सब जगह रमा है वही राम है लेकिन हम कण-कण में रमे राम को इसी अहंकार के कारण नहीं देख पाते! दशहरा इसी अहंकार रूपी रावण के नाश के लिए होता है! फिर दशहरा साल में एक बार नहीं बल्कि प्रतिदिन होगा क्योंकि ये तो प्रतिदिन की साधना है, जब तक राम रूपी आत्म प्रकाश जीवन में प्रकट न हो जाए!