रविवार, 17 जून 2012

शौर्य और पराक्रम की शौर्यगाथा रानी दुर्गावती




24 जून पुण्यतिथि पर विशेष

शौर्य और पराक्रम की देवी रानी दुर्गावती 

- अरविन्द सिसोदिया 
शौर्य का सिर ऊंचा रहा हमेशा जबलपुर के निकट बारहा गांव है,महारानी दुर्गावती यहीं घायल हो गई थीं,एक तीर उनकी आंख में व एक गर्दन में लगा था,बाढ़ के कारण मार्ग अवरूद्ध थे तथा सुरक्षित स्थान पर पहुचना असम्भव था, सो उन्होने अपनी ही कटार को छाती में घोंप कर अपनी जीवन लीला समाप्त करली थी। इस महान बलिदान की स्मृति में एक सुन्दर स्तम्भ खडा किया गया है। जो आज सीना तान कर भारत मॉं की कोख से जन्मी गौंडवाने की शेरनी रानी दुर्गावती के शौर्य और पराक्रम को
कामुक  अकबर
क्रूर और कामुक मुगल शासक अकबर जिसकी लिप्सा मात्र भारतीय राजघरानों की स्त्रिीयों से अपने हरम को सजानेे की रही, उसने 34 विवाह किए जिसमें से 21 रानियां राजपूत परिवारों की राजकुमारियां थीं।
तीन सपूत
अकबर के शासनकाल के समय जिन तीन महान राष्ट्रभक्तों को भारतमाता ने देश सेवा हेतु जन्म दिया, उनमें प्रथम रानी दुर्गावती  दूसरे शूरवीर महाराणा प्रताप थे और तीसरे हिन्दु धर्म की आधुनिक ध्वजा गोस्वामी तुलसीदास थे। रानी दुर्गावती का शासनकाल सन1550 से 1564 तक का है। तो महाराणा प्रताप का शासनकाल 1572 से 1597 तक का है। तुलसीदास 1497 में जन्म और 1623 में परलोक गमन किया, मगर तीनों ने अपने अपने तरह से देश की महान सेवा की जिसे देशवासी लम्बे समय तक याद रखेंगें और प्रेरणास्त्रोत के रूप में उन्हे स्मरण करते रहेंगें।
जन्मभूमि
रानी दुर्गावती चन्देल वंशीय राजपूत  राजा कीर्तीराय की एक मात्र पुत्री थीं,उनका जन्म कलंजर किले (वर्तमान में बांदा जिला,उत्तरप्रदेश में ) में 5 अक्टूबर1524 को हुआ था,तब उनके पिता तत्कालीन महोवा राज्य के राजा थे। चंदेल इतिहास प्रशिद्ध राजवंश रहा है। कलिंजर और खुजराहों के विशाल किले इसी राजवंश के प्रशाद रहे है।
उनका विवाह पडौसी राज्य गौंडवाने के सूर्यवंशी राजगौैैड़ राजा दलपतशाह से 1542 में हुआ था तथा प्रथम व एकमात्र संतान पुत्र वीरनारायण का जन्म 1545 में हुआ। रानी का सुख अधिक दिन टिक नहीं सका और अज्ञात रोग से दलपतशाह की मृत्यु हो गई। वे 1550 में विधवा  हो गई। पुत्र वीरनारायण को सिंहासन पर बिठा कर उन्होने राज्यशासन संभाला,मालवा और दिल्ली के मुस्लिम शासकों से निरंतर संघर्ष करते हुए उन्होने 24 जून 1564 को युद्ध भूमि में  वीरगति प्राप्त की।
समाज ने दिया सम्मान
चन्देलों की बेटी थी,
गौंडवाने की रानी थी,
चण्डी थी रणचण्डि थी,
वह दुर्गावती भवानी थी।
रानी दुर्गाावती कीर्ति स्तम्भ,रानी दुर्गाावती पर डाकचित्र,रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय,रानी दुर्गावती अभ्यारण,रानी दुर्गावती सहायता योजन,रानी दुर्गावती संग्रहालय एवं मेमोरियल,रानी दुर्गावती महिला पुलिस बटालियन आदि न जाने कितनी र्कीती आज बुन्देलखण्ड से फैलते हुए सम्पूर्ण देश को प्रकाशित कर रही है।
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से रानी दुर्गावती का शौर्य किसी भी प्रकार से कम नहीं रहा है,दुर्गावती के वीरतापूर्ण चरित्र को लम्बे समय तक इसलिए दबाये रखा कि उसने मुस्लिमों शासकों के विरूद्ध संर्घष किया और उन्हे इनेकों वार पराजित किया। क्यों कि सरकार इतिहास की सत्यता को भी वोटों के मोलतौल पर तौलती रही । देर सबेर ही सही मगर आज वे तथ्य सम्पूर्ण विश्व के सामने हैं कि तथाकथित अकबर महान ने अपनी कामुक लिप्सा के लिए,एक विधवा पर किसी तरह के जुल्मों की कसर नहीं छोडी थी और धन्य ही रानी का पराक्रम जिसने अपने मान सम्मान,धर्म की रक्षा और स्वतंत्रता के लिए युद्ध भूमि को चुना और अनेकों बार शत्रुओं को पराजित करते हुए बलिदान दे दिया।
जन जन में रानी ही रानी
वह तीर थी,तलवार थी,
भालों और तापों का वार थी,
फुफकार थी, हुंकार थी,
शत्रु का संहार थी!
आल्हा-ऊदल के शौर्य से रचीपटी बुन्देलखण्ड की वीर भूमि यंू तो मेवाड जैसी है, जिसमें रानी की कीर्ती बुन्देलखण्ड की बेटी और गौंडवाने की बहू होने से कई प्रदेशों में फैली हुई है।
उप्र के महोवा कालिंजर मप्र जबलपुर दमोह मंडला नरसिंहपुर होते हुए चंद्रपुर महाराष्ट्र तक इसका विस्तार हे। कहा जाता है कि गौंडवाने में 52 गढ और 35 हजार गांव थे। जिनमें चौरागढ,सिंगौरगढ
बहुत ही विशाल गढ थे। बुन्देलखण्ड के बारे में कवियों ने कुछ पंक्तियों लिखि हैं-
भैंस बंधी ओरछे,पडा होसंगाबाद।
लगवैया है सागरे,चपिया रेवा पार।।
रेवा नाम नर्मदा नदी का है। यह बुन्देंलखण्ड के क्षैत्रफल का वर्णन है। झांसी,बांदा,हमीरपुर,
जालौन,ग्वालियर,दतिया,विदिशा,बीना,भोपाल,सागर,दमोह, टीकमगढ,पन्ना,जबलपुर,होसंगावाद लगभग 28-30 जिलों का विशाल भूभाग बुन्देलखण्ड कह लाता है। महाराष्ट्र का एकीकरण तो हो गया मगर राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव में बुन्देलखण्ड का एकीकरण नहीं हो सका।
इस महान धरा ने गाैंडवाने की रानी दुर्गावती (महोबा,बांदा) के साथ-साथ तुलसीदास (बांदा) दिये जिनकी अमर कृति रामचरित्र मानस हमारे देश व धर्म की ध्वजा बन गयी। वीर चम्पतराय और धर्म वीर छत्रशाल की यह भूमी अनंत गौरवों से युक्त है।
मालवा की पराजय
1555 से 1560 तक मालवा के मुस्लिम शासक बाजबहादुर और मियानी अफगानी के आक्रमण गौंडवाने पर कई वार हुए, हर बार रानी की सेना की ही विजय हुई। रानी स्वंय युद्धभूमि में रह कर युद्ध करती थी। जिससे वे सैनिकों व आम जन में बहुत लोकप्रिय थीं।
अकबर से संघर्ष और बलिदान
थर-थर दुश्मन कांपे,
पग-पग भागे अत्याचार,
नरमुण्डो की झडी लगाई,
लाशें बिछाई कई हजार,
जब विपदा घिर आई चहुंओर,
सीने मे खंजर लिया उतार।
अकबर के कडा मानिकपूर के सूबेदार ख्वाजा अब्दुल मजीद खां जो आसफ खां के नाम से जाना जाता था ने रानी दुर्गावती के विरूद्ध  अकबर को उकसाया,अकबर अन्य राजपूत घरानों की तरह दुर्गावती को भी रानवासे की शोभा बनाना चाहता था। रानी दुर्गावती ने अपने धर्म और देश की दृडता पूर्वक रक्षा की ओर रण क्षैत्र में अपना बलिदान 1564 में कर दिया,उनकी मृत्यु के पश्चात उनका देवर चंन्द्र शाह शासक बना व उसने मुगलों की आधीनता स्वीकार कर ली,,जिसकी हत्या उन्ही के पुत्र मधुकर शाह ने कर दी। अकबर को कर नहीं चुका पाने के कारण मधुकर शाह के दो पुत्र प्रेमनारायण और हदयेश शाह बंधक थे। मधुकरशाह की मृत्यु के पश्चात 1617 में  प्रेमनारायण शाह को राजा बनाया गया।
चौरागढ का जौहर
आसफ खां रानी की मृत्यु से बौखला गया,वह उन्हे अकबर के दरबार में पेश करना चाहता था, उसने राजधानी चौरागढ (हाल में जिला नरसिंहपुर में) पर आक्रमण किया,रानी के पुत्र राजा वीरनारायण ने वीरतापूर्वक युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त की, इसके साथ ही चौरागढ में पवित्रा को बचाये रखने का महान जौहर हुआ,जिसमें हिन्दुओं के साथ-साथ मुस्लिम महिलाओं ने भी अपने आप को जौहर के अग्नि कुंड में छलांग लगा दी थी।
किंवदंतीयों में है कि आसफखां ने अकबर को खुश करने के लिये दो महिलाओं को यह कहते हुए भेंट किया कि एक राजा वीरनारायण की पत्नि है तथा दूसरी दुर्गावती की बहिन कलावती है। राजा वीरनायायण की पत्नि ने जौहर का नेतृत्व करते हुए बलिदान किया था और रानी दुर्गावती की कोई बहिन थी ही नहीं,वे एक मात्र संतान थीं। बाद में आसफखां से अकबर नराज भी रहा,मगर मेवाड के युद्ध में वह मुस्लिम एकता नहीं तोडना चाहता था।
बदला पूरा हुआ
धर्म का प्राण थी,
कर्म का मान थी,
आजादी की शान थी,
शौर्य का अनुसंधान थी!
सिर्फ दुर्गावती नहीं वह दुर्गा का मान थी।
रानी दुर्गावती के नाती निजामशाह ने घोषणा की, कि जो आसफ खां ( रानी दुर्गावती की वीरगती का जो कारण था) का सिर लायेगा उसको इनाम दिया जायेगा। खलौटी के महाबली ने आसफ खां का सिर काट दिया और उसे बदले में कर्वधा का राज्य दिया गया। आसफ खां का सिर गढा मंढला में और बांकी धड मडई भाटा में गढा हुआ है।
......
नमन् कर रहा है।
सुनूगीं माता की आवाज,
रहूंगीं मरने को तैयार।
कभी भी इस वेदी पर देव,
न होने दूंगी अत्याचार।
मातृ मंदिर में हुई पुकार,
चलो में तो हो जाऊ बलिदान,
चढा दो मुझको हे भगवान!!
स्वतंत्रता संग्राम की महान महिला सेनानी व ” खूब लडी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी “ की शौर्यगाथा काव्य को लिखने वाली, वीररस की महान कवियित्री श्रीमति सुभद्रा कुमारी चौहान के ये शब्द ही,अद्वितीय शौर्य का प्रदर्शन करते हुए अमर बलिदान करने वाली रानी दुर्गावती की सच्ची कहानी कहते हुए महसूस होते हैं।


राधाकृष्ण मंदिर रोड,
डडवाडा,कोटा, राजस्थान।
09414180151


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रानी दुर्गावती 'एक वीरांगना'
रानी दुर्गावती ने मुगल साम्राज्य अधीन आने से मना कर दिया की मुगल सम्राट अकबर मध्यभारत में अपने पैर जमाना चाहता था। 5 गोंड़ों राज्य में से एक पर रानी दुर्गावती का साम्राज्य था। सम्राट अकबर ने रानी दुर्गावती को शांतिपूर्वक अपने साम्राज्य में मिलाने पर दबाव डाला, लेकिन महारानी दुर्गावती ने मुगल साम्राज्य के खिलाफ जंग लड़ना पसंद किया। हालांकि रानी दुर्गावती की सेना की तादाद बहुत ज्यादा नहीं थी, इसके विपरीत अकबर के पास एक बहुत बड़ी सेना थी। रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 में कालांजर जो कि अब बांदा (उत्तर प्रदेश) में हुआ, वह चंदेल वंश की थीं। जिसने मोहम्मद गजनवी की अधीनता अस्वीकार कर दी। चंदेल वंश जिन्होंने खजुराहो में 85 मंदिर बनवाये थे, जिनमें से 22 अभी अच्छी स्थिति में हैं। 1542 में दुर्गावती का विवाह दलपतशाह से हुआ। दलपतशाह गोंड राजा संग्राम शाह के सबसे बड़े पुत्र थे। विवाह के उपरांत रानी दुर्गावती ने अपने वीर पति दलपतशाह के साथ राज्य के प्रशासन और विस्तार में सक्रिय भागीदारी निभायी थी। दुर्भाग्य से कुछ वर्षों में ही दलपतशाह की मृत्यु हो गयी। उस समय उनके पुत्र वीरनारायण बहुत छोटे थे, ऐसे में रानी दुर्गावती को राजगद्दी संभालनी पड़ी। रानी ने अपने प्रशासन को वीरतापूर्वक चलाया। महिला शासक को कमजोर समझ कर बहुत से शासकों ने उन पर आक्रमण किये, परंतु रानी के रणकौशल के आगे उन्हें सिर पर पैर रखकर भागना पड़ा। रानी दुर्गावती ने अपने शासन में आर्थिक और सांस्कृतिक पहलू को विशेष महत्व दिया। वह एक मजबूत और समझदार शासिका साबित हुईं। रानी अपनी राजधानी सिंगौरगढ़ से चौरागढ़ ले गयीं। गढ़ा राज्य अपनी वैभव समृद्धि के लिए दूर-दूर तक चर्चित था। बाजबहादुर की तरह कड़ा मानिकपुर का सूबेदार आसफ खां ललचाई हुई दृष्टि से इस प्राकृतिक संपदा से लबालब राज्य को हड़पना चाहता था। उसने अचानक गढ़ा राज्य पर सन् 1564 के मध्य में 10 हजार घुड़सवार, सशस्त्र सेना और तोपखाने के साथ आक्रमण किया तो दुर्गावती ने तत्काल 2000 सैनिक एकत्र कर आक्रमण का सामना किया। यह मुकाबला सिंगौरगढ़ के शहर के एक मैदान में हुआ, जहां अब एक गांव गिरामपुर है। गोंड सेना के साथ रानी दुर्गावती ने भी हाथी पर बैठकर इस युद्ध का सामना किया था। यह युद्ध तोप का सामना तलवार से उिक्त की तरह ही था। आसफ खां का तोपखाना साथ था। रानी और रानी की गोंड सेना तोप का मुकाबला करती रही। इस साहस की कथा और गाथा का अन्त कारूणिक ही होना था। रानी अपने जंगी हाथी शर्मन पर सवार युद्ध के मैदान में डटी रही। 21 साल का राजा वीर नारायण भी बहादुरी से लड़ते हुए घायल हो गया था। रानी ने राजकुमार वीरनारायण को सुरक्षित स्थान पर भेजा और स्वयं डटी रहीं। आंख और गले में तीर लगने के बाद रानी मूर्छित हो गयी थी। महावत को रानी ने घायलावस्था में आदेश दिया था कि उन्हें अपनी कटार से मार डाले पर महावत ने ऐसा न करके उन्हें बचाना चाहा। वह सुरक्षित स्थान पर ले जाने का प्रयास करने लगा। मैदान में दुश्मनों की जीत को देखते हुए रानी ने स्वयं को दुश्मनों के हाथों में जाकर दास बनने से बेहतर मरना स्वीकार कर लिया था। रानी दुर्गावती एक वीरांगना थी।
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24 जून/बलिदान-दिवस

महारानी दुर्गावती का बलिदान

महारानी दुर्गावती कालिंजर के राजा कीर्तिसिंह चंदेल की एकमात्र संतान थीं। महोबा के राठ गांव में 1524 ई0 की दुर्गाष्टमी पर जन्म के कारण उनका नाम दुर्गावती रखा गया। नाम के अनुरूप ही तेज, साहस और शौर्य के कारण इनकी प्रसिद्धि सब ओर फैल गयी।

उनका विवाह गढ़ मंडला के प्रतापी राजा संग्राम शाह के पुत्र दलपतशाह से हुआ। 52 गढ़ तथा 35,000 गांवों वाले गोंड साम्राज्य का क्षेत्रफल67,500 वर्गमील था। यद्यपि दुर्गावती के मायके और ससुराल पक्ष की जाति भिन्न थी। फिर भी दुर्गावती की प्रसिद्धि से प्रभावित होकर राजा संग्राम शाह ने उसे अपनी पुत्रवधू बना लिया।

पर दुर्भाग्यवश विवाह के चार वर्ष बाद ही राजा दलपतशाह का निधन हो गया। उस समय दुर्गावती की गोद में तीन वर्षीय नारायण ही था। अतः रानी ने स्वयं ही गढ़मंडला का शासन संभाल लिया। उन्होंने अनेक मंदिर,मठ, कुएं, बावड़ी तथा धर्मशालाएं बनवाईं। वर्तमान जबलपुर उनके राज्य का केन्द्र था। उन्होंने अपनी दासी के नाम पर चेरीताल, अपने नाम पर रानीताल तथा अपने विश्वस्त दीवान आधारसिंह के नाम पर आधारताल बनवाया।

रानी दुर्गावती का यह सुखी और सम्पन्न राज्य उनके देवर सहित कई लोगों की आंखों में चुभ रहा था। मालवा के मुसलमान शासक बाजबहादुर ने कई बार हमला किया; पर हर बार वह पराजित हुआ। मुगल शासक अकबर भी राज्य को जीतकर रानी को अपने हरम में डालना चाहता था।

उसने विवाद प्रारम्भ करने हेतु रानी के प्रिय सफेद हाथी (सरमन) और उनके विश्वस्त वजीर आधारसिंह को भेंट के रूप में अपने पास भेजने को कहा। रानी ने यह मांग ठुकरा दी। इस पर अकबर ने अपने एक रिश्तेदार आसफ खां के नेतृत्व में सेनाएं भेज दीं। आसफ खां गोंडवाना के उत्तर में कड़ा मानकपुर का सूबेदार था।

एक बार तो आसफ खां पराजित हुआ; पर अगली बार उसने दुगनी सेना और तैयारी के साथ हमला बोला। दुर्गावती के पास उस समय बहुत कम सैनिक थे। उन्होंने जबलपुर के पास नरई नाले के किनारे मोर्चा लगाया तथा स्वयं पुरुष वेश में युद्ध का नेतृत्व किया। इस युद्ध में 3,000 मुगल सैनिक मारे गये। रानी की भी अपार क्षति हुई। रानी उसी दिन अंतिम निर्णय कर लेना चाहती थीं। अतः भागती हुई मुगल सेना का पीछा करते हुए वे उस दुर्गम क्षेत्र से बाहर निकल गयीं। तब तक रात घिर आयी। वर्षा होने से नाले में पानी भी भर गया।

अगले दिन 24 जून, 1564 को मुगल सेना ने फिर हमला बोला। आज रानी का पक्ष दुर्बल था। अतः रानी ने अपने पुत्र नारायण को सुरक्षित स्थान पर भेज दिया। तभी एक तीर उनकी भुजा में लगा। रानी ने उसे निकाल फेंका। दूसरे तीर ने उनकी आंख को बेध दिया। रानी ने इसे भी निकाला; पर उसकी नोक आंख में ही रह गयी। तभी तीसरा तीर उनकी गर्दन में आकर धंस गया।

रानी ने अंत समय निकट जानकर वजीर आधारसिंह से आग्रह किया कि वह अपनी तलवार से उनकी गर्दन काट दे; पर वह इसके लिए तैयार नहीं हुआ। अतः रानी अपनी कटार स्वयं ही अपने सीने में भोंककर आत्म बलिदान के पथ पर बढ़ गयीं। गढ़मंडला की इस जीत से अकबर को प्रचुर धन की प्राप्ति हुई। उसका ढहता हुआ साम्राज्य फिर से जम गया। इस धन से उसने सेना एकत्र कर अगले तीन वर्ष में चित्तौड़ को भी जीता।

जबलपुर के पास जहां यह ऐतिहासिक युद्ध हुआ था, वहां रानी की समाधि बनी है। देशप्रेमी वहां जाकर अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।      (संदर्भ   : दैनिक स्वदेश 24.6.2011)

1 टिप्पणी:

  1. आखिरी कथा वस्तु मे 1) राजा संग्राम शाह को गढ़ा मंडला का शासक बताया गया है , जो पूर्णतः गलत है , मेरे विचार से वे चौरागढ, सिंगोरगढ़़ के शासक थे, 2) आसफ खाॅ से युद्ध सिंगोरगढ़़ के पास आज के सिंगरामपुर के मैदान से आरंभ होकर जबलपुर के पास नर्रई नाले के किनारे उनके आत्मबलिदान तक चला.

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