रविवार, 8 जनवरी 2012

मकर संक्रांति : उत्तरायण प्रारंभ : अंधकार घटने और प्रकाश बढ़ने का दिन...



इस साल १५ जनवरी को मनाई जायेगी मकर संक्रांती 


आकाश के दक्षिण हिस्से से सूर्य का रथ उत्तरी हिस्से की और बढ़ रहा है। 14 जनवरी की मध्य रात्रि को सूर्यदेव का रथ उत्तरायण होगा। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ ही संक्रांति का पुण्यकाल भी शुरू हो जाएगा। स्नान-दान की मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाई जाएगी। ज्योतिष पंडित जितेन्द्र दवे के मुताबिक 14 जनवरी 2012 की शाम 4.50 बजे मकर राशि की सीमा को छुएगा। रात में 12.25 बजे से संक्रांति का पुण्यकाल शुरू होगा। मान्यताओं के मुताबिक पुण्यकाल 16 घंटे का होता है। इस लिहाज से पुण्यकाल 15 जनवरी की शाम 4.25 बजे तक रहेगा। उदयतिथि के सिद्धांत के मुताबिक मकर संक्रांति का पर्व 15 जनवरी को मनाया जाएगा।
क्या होता है सूर्य का उत्तरायण होना
आकाश की 12 राशियों में सूर्य के भ्रमण से ऋतु चक्र पूरा होता है। एक राशि से दूसरी राशि में सूर्य के संक्रमण को ही संक्रांति कहते हैं। सूर्य की मकर से मिथुन राशि में रहने तक 6 महीने की अवधि उत्तरायण कही जाती है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक यह देवों का प्रभात काल होती है। कर्क से धनु राशि में सूर्य के रहने के 6 महीने को दक्षिणायन कहते हैं। इसे आसुरी काल भी कहते हैं।
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मकर संक्रांति : अंधकार घटने और प्रकाश में बढ़ोतरी का दिन...
1- महाभारत युद्ध में अर्जुन के बाणों से बिंधे शर शय्या में लेटे भीष्म पितामह ने मकर संक्रांति के दिन तक प्राण न छोड़ने का संकल्प लिया था। सूर्य उत्तरायण में गति करने लगता है। इसे सौरमास भी कहा जाता है। ज्योतिषानुसार इस दिन से सूर्य मकर राशि में...- उत्तरायण छह माह का और दक्षिणायन भी छह मास का। 
2- इस दिन गंगा सागर में स्नान का माहात्म्य है। कहा जाता है कि मकर संक्रांति के दिन देवता भी धरा पर उतर आते हैं। 
3- मकर संक्रांति का पर्व जीवन में संकल्प लेने का दिन भी कहा गया है। संक्रांति यानी सम्यक क्रांति। इस दिन से सूर्य की कांति में परिवर्तन शुरू हो जाता है। वह दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर अभिमुख हो जाता है। उत्तरायण प्रारंभ से रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं। अंधकार घटने लगता है और प्रकाश में बढ़ोतरी शुरू हो जाती है। जब प्रकृति शीत ऋतु के बाद वसंत के आने का इंतजार कर रही होती है, तो हमें भी अज्ञान के तिमिर से ज्ञान के प्रकाश की ओर मुड़ने और कदम तेज करने का मन बनाना चाहिए। 
4- माघ मास में पड़ने वाला मकर संक्रांति का पर्व असम में बिहू कहलाता है। पंजाब में इसे लोहड़ी, बंगाल में संक्रांति और समस्त भारत में मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। सर्दी का प्रकोप शांत करने के लिए सूर्य भगवान की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस ऋतु में रोजाना प्रात:काल सूर्य को एक लोटा जल चढ़ाने से सारे रोग दूर हो जाते हैं। आज के दिन मन और इंद्रियों पर अंकुश लगाने के संकल्प के रूप में भी यह पर्व मनाया जाता है। लोग नदी, सरोवर या तीर्थ में स्नान करने जाते हैं। इस दिन तिल, गुड़ के व्यंजन, ऊनी वस्त्र, काले तिल आदि खाने और दान करने का विधान है। मकर संक्रांति ही एक ऐसा त्योहार है, जिसमें तिल का प्रयोग किया जाता है। कहीं-कहीं काले कपड़े पहनने का भी रिवाज है। आज के दिन गंगा स्नान का विशेष पुण्य बखान किया गया है।
5- जम्मू-कश्मीर और पंजाब में यह पर्व लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है, जो संक्रांति के एक दिन पहले संपन्न होती है। सिंधी लोग इसे लाल लोही के नाम से जानते हैं। तमिलनाडु में लोग कृषि देवता के प्रति कृतज्ञता दर्शाने के लिए नई फसल के चावल और तिल के भोज्य पदार्थ से विधिपूर्वक पोंगल मनाते हैं। दक्षिण भारत में पोंगल, पश्चिम यूपी में संकरात, पूवीर् यूपी और बिहार में खिचड़ी के रूप में यह त्योहार मनाया जाता है। 
6- भारतीय ज्योतिष में 12 राशियों में से एक मकर राशि में सूर्य के प्रवेश को मकर संक्रांति कहते हैं। इसे हिंदुओं का बड़ा दिन भी कहा जाता है। मकर संक्रांति शिशिर ऋतु की समाप्ति और वसंत के आगमन का प्रतीक है। इसे भगवान भास्कर की उपासना एवं स्नान-दान का पवित्रतम पर्व माना गया है। 
7- हालाँकि अन्य प्रदेशों में इस दिन गली-गली गिल्ली-डंडा खेला जाता है, मगर गुजरात में घर-घर लोग पतंगबाजी का मजा लेते हैं।
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उत्तरायण सूर्य को प्रणाम!
[मकर संक्रांति पर विशेष]
[डॉ. अतुल टंडन]
भारतीय संस्कृति में मकर-संक्रांति को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है, क्योंकि इसी दिन से देवताओं का दिन कहा जाने वाला उत्तरायण प्रारंभ होता है, जो छह मास कर्क-संक्रांति तक रहता है। संक्रांति का अर्थ है सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश। मकर-संक्रांति का पर्व वस्तुत:सूर्य के उत्तरायण होने का उत्सव ही है। महाभारत में उल्लेख है कि भीष्म पितामह ने युद्ध में घायल हो जाने के बाद बाणों की शय्यापर पडे-पडे प्राण त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की ही प्रतीक्षा की थी।
मकर-संक्रांति मूलत:स्नान-दान का महापर्वमाना जाता है। धर्मग्रंथों के अनुसार, इस दिन प्रयाग में स्नान का विशेष माहात्म्य है। असंख्य श्रद्धालु मकर-संक्रांति को स्नान करने प्रयागराज पहुंचते हैं। संयोगवश मकर-संक्रांति का पर्व अधिकांशत:माघ के महीने में होता है। ऐसी मान्यता है कि इस मास में प्रयागराज में भू-मंडल के समस्त तीर्थो का आगमन होता है, अत:प्रयाग में माघ-मेला प्रतिवर्ष आयोजित होता है।
मकर-संक्रांति में जरूरतमंदों को दान करने की प्रथा है। इस पर्व के शीतकाल में पडने के कारण इसमें उन वस्तुओं को दान देने का विशेष महत्व होता है, जो कि सर्दी में जाडे से बचाने में सहायक होती हैं, जैसे ऊनी वस्त्र, कंबल तथा अलाव हेतु लकडी। इसके अतिरिक्त मकर-संक्रांति में तिल से बने पदार्थो का दान भी आवश्यक माना गया है, क्योंकि तिल पौष्टिक होता है और उसकी तासीर भी गर्म होती है। तिल का दान करने के कारण देश के पूर्वाचल तथा मिथिलांचलमें इसे तिल-संक्रांति भी कहा जाने लगा है।
मकर-संक्रांति को उत्तर भारत में खिचडी के नाम से जाना जाता है। इस दिन लोग खिचडी बनाकर भगवान को भोग लगाते हैं। मकर-संक्रांति के दिन ज्यादातर लोग खिचडी बनाने की सामग्रियों जैसे- दाल, चावल, नमक एवं घी आदि का दान भी करते हैं। दक्षिण भारत में मकर-संक्रांति का पर्व पोंगल के रूप में मनाया जाता है। महाराष्ट्र में विवाहित स्त्रियां शादी के बाद पहली मकर-संक्रांति पर तेल, कपास, नमक आदि वस्तुएं सुहागिनों को देती हैं। बंगाल में इस दिन पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करके तिल का दान करने का प्रचलन है। असम में मकर-संक्रांति को बिहू के नाम से मनाया जाता है। राजस्थान में इस दिन स्त्रियां तिल के लड्डू, घेवर तथा माठ को रुपयों के साथ अपनी सास को भेंट देती हैं। लोग मकर-संक्रांति पर स्नान करने गंगासागर पहुंचते हैं।
मकर-संक्रांति से प्रकृति भी करवट बदलती है। इस दिन लोग पतंग भी उडाते हैं। उन्मुक्त आकाश में उडती पतंगें देखकर स्वतंत्रता का अहसास होता है।

नन्हा मुन्ना राही हूँ, देश का सिपाही हूँ




गाना / Title: नन्हा मुन्ना राही हूँ, देश का सिपाही हूँ
- nanhaa munnaa raahii huu.N, desh kaa sipaahii huu.N

चित्रपट / फिल्म : सन  ऑफ़  इंडिया

संगीतकार / म्यूजिक  डिरेक्टर :  नौशाद अली-( नौशाद )

गीतकार / शकील 

गायक :  शांति   माथुर   ,   chorus  

नन्हा मुन्ना राही हूँ, 

नन्हा मुन्ना राही हूँ, देश का सिपाही हूँ
बोलो मेरे संग, जय हिंद, जय हिंद, जय हिंद ...

रस्ते पे चलूंगा न डर\-डर के
चाहे मुझे जीना पड़े मर\-मर के
मंज़िल से पहले ना लूंगा कहीं दम
आगे ही आगे बढ़ाउंगा कदम
दाहिने बाएं दाहिने बाएं, थम!  नन्हा ...

धूप में पसीना बहाउंगा जहाँ
हरे\-भरे खेत लहराएंगे वहाँ
धरती पे फ़ाके न पाएंगे जनम
आगे ही आगे ...

नया है ज़माना मेरी नई है डगर
देश को बनाउंगा मशीनों का नगर
भारत किसी से न रहेगा कम
आगे ही आगे ...

बड़ा हो के देश का सितारा बनूंगा
दुनिया की आँखों का तारा बनूंगा
रखूँगा ऊंचा तिरंगा हरदम
आगे ही आगे ...

शांति कि नगरी है मेरा ये वतन
सबको सिखाऊंगा प्यार का चलन
दुनिया में गिरने न दूंगा कहीं बम
आगे ही आगे ...

अच्छी खबर : अन्ना हजारे की अस्पताल से छुट्टी



- अरविन्द  सिसोदिया 

एक अच्छी खबर आ रही है कि अन्ना हजारे की अस्पताल से छुट्टी हो गई है वे अब एक माह अपने गांव में ही स्वास्थय लाभ प्राप्त करेंगें। देश को उनकी बहुत जरूरत है। सच यह है कि बडी जरूरत के रूप में अन्ना उभरे हैं। उनक भ्रष्टाचार विरोधी अभियान से , लाभ यह हुआ है कि एक नैतिक अंकुश भ्रष्टाचार के विरूद्ध लग रहा है । जो कम ज्यादा करके भ्रष्टाचार को रोकता तो है ही । इसलिये देशहित के उनके अभियान और उनके आर्शीवाद की हम सभी को जरूरत है।
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दैनिक जागरण
अन्ना को मिली अस्पताल से छुट्टी
 समाजसेवी अन्ना हजारे को रविवार को अस्पताल से छुट्टी मिल गई। वह अपने गांव रालेगण सिद्धि में एक माह आराम करेगे। उन्हे 31 दिसंबर को सीने में संक्रमण के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया था। संचेती अस्पताल से बाहर निकलते हुए अन्ना ने कहा कि भूख हड़ताल के कारण मेरा स्वास्थ्य प्रभावित हुआ है। अब मैं ठीक हूं। डाक्टरों की सलाह के अनुसार, मैं एक माह तक रालेगण सिद्धि में आराम करूंगा। 
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Jagran Hindi News

अन्ना को मिली पुणे के अस्पताल से छुट्टी
08 Jan 2012 

http://www.jagran.com

पुणे। समाजसेवी अन्ना हजारे को रविवार को अस्पताल से छुट्टी मिल गई। वह अपने गांव रालेगण सिद्धि में एक माह आराम करेगे। उन्हे 31 दिसंबर को सीने में संक्रमण के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
संचेती अस्पताल से बाहर निकलते हुए अन्ना ने कहा कि भूख हड़ताल के कारण मेरा स्वास्थ्य प्रभावित हुआ है। अब मैं ठीक हूं। डाक्टरों की सलाह के अनुसार, मैं एक माह तक रालेगण सिद्धि में आराम करूंगा।
एक माह पहले सभी चिकित्सकों की सलाह को नकारने वाले अन्ना ने बिल्कुल अलग रवैया अपनाते हुए कहा कि मैंने पिछले 25 साल में बहुत सी लड़ाइयां लड़ीं, लेकिन शरीर इस बार मेरा साथ नहीं दे रहा। मैं कमजोरी महसूस कर रहा हूं। इसलिए अब मैं अपने स्वास्थ्य के बारे में सोचूंगा। डाक्टरों की अनुमति और खुद स्वस्थ महसूस करने के बाद ही मैं बाहर जाऊंगा।
पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव के दौरान आंदोलन के अपने पूर्ववर्ती फैसले के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि इस बारे में फैसला तभी होगा जब मेरा स्वस्थ ठीक होगा। यह एक या दो महीने का आंदोलन नहीं है यह वर्षो तक चलेगा।



क्रिकेट बोर्ड की देश के साथ बेईमानी ,धारदार बोलिंग की जरूरत






धारदार बोलिंग की जरूरत
- अरविन्द  सिसोदिया 
एक तेज आती बाल..... हमारे खिलाडियों को भयभीत इसलिए कर देती है की हमें घरेलू क्रिकेट में तेज बाल का सामना ही नही करना पड़ता, हमारी  तेज  बालिग़ विदेशी जमीन पर भी वैसी ही रहेगी इस बात की कभी हमनें चिंता ही नहीं की .., यदी हम अपने यहाँ विदेशों जैसे मैदान नहीं बना सकते तो अभ्यास हेतु अपने खिलाडियों को विदेश भेज तो सकते हें...मगर लगातार ३० साल से इस कमजोरी को झेलने के बाबजूद इसका मुकाबला नहीं करना चाहते ..यह बोर्ड की देश के साथ बेईमानी ही कही जायेगी .. पहले हमनें कुछ जीतें स्पीनरों के सहारे या कपिल सरीखे मीडियम तेज गेंदबाजों के सहारे ही प्राप्त की हें ..तेज बोलर नहीं होना हमारी कमजोरी रही हे , जो इक्के दुक्के तेज बोलर आते हें उनकी ले नहीं रहती और वे विदेशों में पिटते हैं..कमी का मूल कारण प्रशिक्षण का आभाव और जरुरी संशाधनों की कमी... 


भारतीय क्रिकेट की सबसे बडी कमजोरी,बोलिंग है..., भारतीय टीम में बढिया तेज बोलर नहीं हैं। एक पारी में तीन अस्ट्रेलियन शतक बनाते हैं जिनमें एक तीहरा शतक बना....बल्लेबाजी भी दोषी हो सकती है। मगर सही यह है कि हमारी बोलिंग में वह धार ही नहीं है जिसकी जरूरत है। हम कमजोर बोलिंग के कारण ही इग्लैंण्ड में हारे थे और इसी के कारण अब अस्ट्रेलिया में हार रहे है। बल्लेबाज बहुत ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। इसलिये बोलिंग में तेज बोलरों को तलाशें और उन्हे टीम में सम्मिलित करें।
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Jagran Hindi News



मुद्दा: घर में शेर, बाहर क्यों ढेर?
 08 Jan 2012
तमाम उपलब्धियों और गौरवगाथाओं के बावजूद यह एक मुद्दा भारतीय क्रिकेट पर भारी पड़ जाता है। आखिर क्यों उसका सारा शौर्य विदेशी सरजमीं पर शर्मसार हो जाता है? क्या उसकी और उसके महान खिलाड़ियों की दुनिया को वशीभूत करने वाली छवि महज छलावा है? शेर होने का छलावा। लेकिन बस घर में। जब तक यह नहीं मिटेगा, तब तक क्रिकेट जगत का सिरमौर बनने का हक उसे नहीं मिल सकेगा।

..घर में शेर, बाहर ढेर। यह जुमला हमारे धुरंधर क्रिकेटरों के गौरवशाली इतिहास पर एक धब्बे के समान कायम है। क्रिकेट की दुनिया में हमारे दिग्गज बल्लेबाजों का नाम बाअदब लिया जाता रहा है। लेकिन गावस्कर से लेकर तेंदुलकर तक और सहवाग से लेकर कोहली तक, एक ही कहानी चलती आ रही है। माना कि एक-दो बेहतर व्यक्तिगत प्रदर्शन होते रहे हैं, लेकिन यह जीत के कारक नहीं बनते।

टीम प्रदर्शन मायने रखता है, जो विदेश जाकर बिखर जाता है। गत 64 साल से हमारी टीम कभी ऑस्ट्रेलिया में टेस्ट सीरीज नहीं जीत सकी। इस बार भी खाली हाथ लौटने को बाध्य है। इससे पहले इंग्लैंड में हम शर्मसार हुए। भारतीय क्रिकेट की यह कड़वी सच्चाई एक

अनसुलझा मुद्दा है। आखिर क्यों है ऐसा? हर पहलू पर प्रकाश डालती अतुल भानु पटैरिया की यह रिपोर्ट:-

पट्टी बदली, बदला मंजर

न अनुभव, ना ही आंकड़े, क्रिकेट में और कुछ भी मायने नहीं रखता, सिवाय इसके कि 22 गज की पट्टी पर बल्ला गेंद का सामना कैसे करता है। भारतीय क्रिकेट के लिहाज से देखें तो पूरी कवायद में सबसे अहम यदि कोई चीज है तो वह है 22 गज की पट्टी। नामी-गिरामी धुरंधर। दुनिया का सबसे शक्तिशाली बल्लेबाजी क्रम। लेकिन बेनाम से गेंदबाजों के आगे ढेर। बार बार। ठीक है, क्रिकेट तो है ही अनिश्चितताओं का खेल। लेकिन भारत के इन महानायकों का घर के बाहर ढेर हो जाना निश्चित सा क्यों है? क्रिकेट में भविष्यवाणी की कोई गुंजाइश नहीं। लेकिन हमारी टीम के विदेश दौरे पर निकलने से पहले ही दुनियाभर के विशेषज्ञ कर डालते हैं। ढेर हो जाएगी। हो जाती है। जैसे इंग्लैंड में। और अब ऑस्ट्रेलिया में। करने वाले कैसे कर देते हैं इतनी सटीक भविष्यवाणी? इसके पीछे कुछ और नहीं बस 22 गज की पट्टी है। भारत [उपमहाद्वीप] और भारत के बाहर यही एक बड़ा अंतर पैदा करती है। भारतीय पिचों पर खेलने के आदी हैं हमारे क्रिकेटर। यहां पिचें सपाट होती हैं। इनमें टर्न तो होता है, तेजी और उछाल नहीं। ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका और कैरेबिया में पिच पर जबरदस्त तेजी और भरपूर उछाल होता है। शॉर्ट गेंदों को न खेल पाना भारतीय बल्लेबाजों की कमजोरी रही है, क्योंकि भारतीय पिचों का मिजाज शॉर्ट गेंदों का नहीं बल्कि टर्न करती गेंदों का मुफीद है। शॉर्ट नहीं बल्कि गुड और फुल लेंथ गेंदों का मुफीद। यही वजह है कि भारतीय बल्लेबाज फ्रंट फुट पर शॉट्स खेलने के अभ्यस्त हो जाते हैं। वहीं विदेशी पिचों पर, जहां तेजी और उछाल पाकर शॉर्ट गेंदें कहर बरपाती हैं, भारतीय बल्लेबाजों का फुट वर्क थम जाता है। बैक फुट पर शॉट्स खेलने की उन्हें आदत ही नहीं है। यहीं वे मात खा जाते हैं।

मानसिक मजबूती नहीं

हम में से जिसने भी 'लगान' देखी है, वो आसानी से समझ सकेगा देसी-विदेशी के द्वंद्व को। फिल्म का ताना-बाना भले ही फिल्मी था, लेकिन समझाने में सफल रही कि क्रिकेट हमारा नहीं, अंग्रेजों का, जेंटलमैन का खेल था। कब-कैसे और क्यों था, यह भी। हमने तो उनसे ही देख कर सीखा। फिर एक समय आया कि उनके ही खिलाफ खेलने लगे। उन्हें अपने घर में हराना, अपने ही लोगों के सामने, हमारे लिए शगल बना रहा। इसमें ज्यादा मजा था। नुमाइश भी भरपूर। उन्हें उनके घर में हराना, प्रतिष्ठा का प्रश्न और हद पार करने का माद्दा। लिहाजा एक तरह का मानसिक दबाव अपने आप जुड़ता गया। विदेश दौरों में भारतीय खिलाड़ियों को अरसे तक 'दब्बू' और 'कमजोर' माना-कहा जाता रहा। ऐसे तमाम वाकये इतिहास में दफन हैं। कुछ ने यह छवि तोड़ी। उन्हें 'हीरो', 'एंग्री यंग मेन', 'भारत का आत्मविश्वास'.. जैसी उपमाएं मिलीं। यही वजह है कि मंसूर अली ख्रान पटौदी, सुनील गावस्कर, सौरव गांगुली और महेंद्र सिंह धौनी जैसे दबंग भारतीय कप्तानों को ट्रेंड-सेटर कहा जाता है। मानसिक दृढ़ता एक अहम तथ्य है। विदेश में इसके बूते जीत दर्ज की जाती है। मौजूदा भारतीय टीम में सचिन, द्रविड़, लक्ष्मण, सहवाग, धौनी और जहीर जैसे बेहद अनुभवी खिलाड़ी शामिल हैं। क्या इनमें वह आत्मविश्वास और मानसिक दृढ़ता नहीं है? विराट कोहली जैसे युवा भी हैं, जो ऑस्ट्रेलियाई दर्शकों को उन्हीं की स्टाइल में भद्दा जवाब देकर अपनी मैच फीस कटवा लेते हैं। मानसिक दृढ़ता नहीं, यह तो कमजोरी है, जो आपा खोने और झल्लाने का कारक बन जाती है।

प्रारूप का उलझाव

पिछले एक दौर में भारतीय क्रिकेट ने जिस तेजी से वनडे और टी-20 प्रारूप के क्रिकेट में खुद को ढाला, बुलंदियां हासिल कीं, वह वाकई उत्साहित कर देने वाला रहा। हमें फटाफट क्रिकेट का मौलिक चैंपियन कहा जाने लगा। आइपीएल हमारी ही पिचों पर और हर साल होता है। इसमें ढेर सारे मैच खेले जाते हैं। हर साल टेस्ट की अपेक्षा वनडे मुकाबलों की संख्या भी कहीं अधिक ही रहती है। भारतीय टीम फटाफट में तो माहिर हो गई, विश्व चैंपियन भी है, लेकिन टेस्ट क्रिकेट में उसका हाथ तंग होता गया है। आप कहेंगे कि टेस्ट में नंबर एक कैसे बन गई? पन्ने पलटेंगे तो पता चल जाएगा कि घरेलू टेस्ट सीरीज में नंबर बढ़ा बढ़ा कर। भारतीय खिलाड़ी जब अपनी पिचों पर टेस्ट खेलते हैं तो फटाफट स्टाइल में ही सामने वाली टीम पर भारी पड़ जाते हैं। लेकिन विदेश में तेज पिचों पर फटाफट स्टाइल उन्हें ले डूबती है। उनके हाथ में कुछ नहीं है क्योंकि फटाफट स्टाइल अब उनकी फितरत ही बन गई है। यह भी एक कारण है कि टेस्ट की बजाय वनडे में भारतीय टीम का विदेश में प्रदर्शन बेहतर रहा है।

कोचिंग प्रणाली में खामी

भारतीय क्रिकेट की मुख्य प्रशिक्षण संस्था कोई और नहीं बल्कि मोहल्ले की गलियां और बिना आइडियल पिच वाले छोटे-मोटे मैदान रहे हैं। वही सपाट पिचें और वही फ्रंट फुट का फंडा। राष्ट्रीय टीम में पहुंचने पर किसी युवा खिलाड़ी का सामना इसी रंग में रंगे सीनियर खिलाड़ियों और विदेशी कोच से होता है, जो थोड़ी सी और बातें सिखाते चलते हैं। गैरपरंपरागत सच्चाई का सामना उसे अपने पहले विदेशी दौरे पर तेज और उछालभरी पिचों पर ही होता है। उलझन शुरू हो जाती है। पहले सीखे या पहले बेरहम सच्चाई का सामना करे। दोनों साथ में करना पड़ता है। खामियाजा पूरी टीम भुगतती है। सीनियर सच्चाई पहले से ही जानते हैं, लेकिन सीखने की प्रक्रिया में फंसे रहते हैं। लिहाजा, कोचिंग प्रणाली को ऐसा बनाना होगा, जो इस तरह के हर पहलू का, कमजोरी का समाधान कर सके। कृत्रिम पिचें विकसित करनी होंगी।

ओवरऑल प्रदर्शन की कमी

भारत के पास पटौदी, बेदी, विश्वनाथ, गावस्कर, श्रीकांत, अमरनाथ, कपिल, वेंगसरकर से लेकर गांगुली, तेंदुलकर, द्रविड़, लक्ष्मण और सहवाग जैसे स्तरीय खिलाड़ी रहे हैं, लेकिन टीम विदेश में ओवरऑल प्रदर्शन कर कभी भी उतनी सफलता हासिल नहीं कर सकी। ताजा उदाहरण हमारे सामने है।

44 साल में यह पहला अवसर है, जबकि विदेशी सरजमीं पर लगातार छह टेस्ट हारे

चौंकाने वाला तथ्य : 'द डेली टेलीग्राफ' ने लिखा, 'गर्त के भी गर्त में ऑस्ट्रेलियाई टीम।' सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड ने लिखा था, 'एक समय विश्व क्रिकेट का बादशाह रहा ऑस्ट्रेलिया अब आठवीं रैंकिंग के न्यूजीलैंड को भी हराने के काबिल भी नहीं रहा।' भारत का पलड़ा इस बार भारी माना जा रहा था। कहा जा रहा था कि उसके पास इस बार ऑस्ट्रेलिया को ऑस्ट्रेलिया में हराने का स्वर्णिम मौका है। लेकिन तमाम उलझनों में उलझे भारतीय खिलाड़ियों ने अपने पैर पर कुल्हाड़ा दे मारा।

0-4 इससे पहले इंग्लैंड में हुआ था सफाया

9वीं धौनी की कप्तानी में विदेश में हार 


माया की मूर्ती पुराण




माया की मूर्तियां
बाबा साहब अम्बेडकर और बसपा के संस्थापक काशीराम जी की मूर्तियों की स्थापना तो समझ में आती है, मगर जनता के पैसे को गरीबों पर खर्च करने के बजाये खुद मायावती की और चुनाव चिन्ह हाथी की मूर्तियों पर अनाप सनाप खर्च करना तो, उन मतदाताओं से भी धोका है जिन्होने मायावती को मत दिया था।
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मायावती की मूर्तियों को ढकने पर बसपा नाराज
लखनऊ. 7 जनवरी २०१२
http://raviwar.com/dailynews
उत्तर प्रदेश में चुनाव तक राज्य की मुख्यमंत्री मायावती और हाथियों की मूर्तियों को पर्दे में रखने के चुनाव आयोग के निर्णय की बसपा ने आलोचना की है. बसपा ने कहा है कि चुनाव आयोग का यह निर्णय तर्कसंगत नहीं है.
शनिवार को देश के मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने उत्तर प्रदेश में चुनाव तक बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो और राज्य की मुख्यमंत्री मायावती और उनकी पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी की तमाम मूर्तियों को ढकने का आदेश दिया है. चुनाव आयोग का तर्क है कि पार्कों में लगी मूर्तियां और पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी प्रचार का एक तरीका है. चुनाव आयोग के अनुसार ये मूर्तियां फरवरी तक ढके रहेंगी.
मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी का कहना था कि हाथी बहुजन समाज पार्टी का चुनाव निशान है और मुख्यमंत्री मायावती की प्रतिमा से राजनीतिक संदेश जाता है, इसलिए इन दोनों का ढका जाना जरुरी है. हालांकि दूसरी प्रतिमाओं के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी को छोड़कर दूसरी तमाम प्रतिमाओं को लेकर समीक्षा की जाएगी.
गौरतलब है लखनऊ में मायावती की डेढ़ करोड़ रुपये की लागत वाली 24 फीट की मूर्ति प्रतिबिंब स्थल में, वहीं की गैलरी में 47.25 लाख रुपये की लागत से 18 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा, परिवर्तन स्थल में ही 20.25 लाख रुपये की लागत से 12 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा, नौ लाख की लागत वाली सात फीट उंची प्रतीमा, मान्यवर कांशीराम स्मारक स्थल पर 47 लाख की लागत वाली 18 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा, डॉ. बी आर अम्बेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल पर पौन करोड़ की लागत वाली तीन प्रतिमायें, कानपुर रोड योजना में 47.25 लाख रुपये की लागत से 15 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा लगी हुई हैं. राज्य के अलग-अलग इलाकों में मायावती की मूर्तियों की संख्या हजारों में है.
चुनाव आयोग द्वारा मुख्यमंत्री मायावती और हाथियों की मूर्तियों को ढकने के आदेश पर टिप्पणी करते हुये बहुजन समाज पार्टी के महासचिव सतीशचंद्र मिश्र ने कहा है कि मूर्तियों को ढ़कने का आदेश तर्कसंगत नहीं जान पड़ता. उन्होंने कहा कि हाथी की मूर्ति तो नॉर्थ ब्लाक और सउथ ब्लॉक में भी लगी है, क्या उसे भी ढ़का जाएगा. उन्होंने आरोप लगाया कि निर्णय लेने से पहले उनकी पार्टी का पक्ष तक नहीं लिया गया.
बसपा ने चुनाव आयोग के निर्णय की आलोचना करते हुये कहा कि क्या चुनाव आयोग साइकिल के चलने पर रोक लगाएगी? क्या चुनाव आयोग राज्य के सरोवरों के कमल के फूल और लोगों के पंजों को भी ढ़ंकने की बात करेगी. बसपा ने चुनाव आयोग से फैसले पर पुनर्विचार का अनुरोध किया है.


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http://www.webvarta.com 

अमरीका की एक पत्रिका,
” फारेन पालिसी “ में दुनिया की सबसे कुरूप मूर्तियों में मायावती की 6ठे स्थान पर रखा है।
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यूपी की सियासत में आया भूचाल, 
मायावती ने दिया मूर्तियों को वोट डालने का अधिकार
http://hindi.fakingnews.com 
Sunday, January 08, 2012
लखनऊ. उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने 2012 के विधानसभा चुनावों से ऐन पहले राज्य की सभी मूर्तियों को वोट डालने का अधिकार दे दिया है। जिसके बाद यूपी में आम आदमी के साथ-साथ अब से मूर्तियां भी वोट डाल पाएंगी।
फैसले की जानकारी देते हुए खुद उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने बताया कि कुछ मनु और मनमोहनुवादी ताकतें लगातार मूर्तियां लगवाने के लिए मेरी सरकार की आलोचना कर रही थीं। मूर्तियां लगाने को पैसे की बरबादी बता रही थीं।
लिहाजा मेरी सरकार ने सोचा कि क्यों न इन मूर्तियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जाए। इनका कुछ रचनात्मक इस्तेमाल किया जाए। आख़िरकार लंबे विचार-विमार्श के बाद हमने तय किया कि मूर्तियों को भी वोट डालने का अधिकार दिया जाए। वैसे भी मूर्ति को ईश्वर मान हम उससे इतना कुछ मांग सकते हैं तो क्या उसे एक वोट डालने का हक़ नहीं दे सकते।
माया ने आगे बताया कि आगामी एक नंवबर से आम आदमी के साथ-साथ राज्य की सभी मूर्तियों के वोटर आईडी कार्ड बनाने का काम शुरू कर दिया जाएगा।
मूर्तियां वोट कैसे डालेंगी?
मायावती का कहना था कि मूर्तियां खुद चलकर तो कहीं वोट डालने जा नहीं सकती, इसलिए जो मूर्ति जिस पार्टी के नेता या समाज की होगी, उसका वोट उसी पार्टी के खाते में जोड़ा जाएगा। मसलन बाबा साहेब अम्बेडकर की मूर्ति का वोट बीएसपी में जोड़ा जाएगा और लाल बहादुर शास्त्री का वोट कांग्रेस में।
वैसे भी यूपी में जब जाति अपना दल नहीं बदलती, ये तो फिर भी मूर्तियां हैं। इस बात की संभावना बहुत कम है कि खड़े-खड़े कोई मूर्ति पार्टी बदल ले, जब तक कि वो मूर्ति अजीत सिंह की न हो।
मूर्तिप्रदेश बनाया जाएगा
ऐसे में एक सवाल ये भी उठा कि अगर मूर्तियों को वोट डालने का अधिकार दिया गया तो क्या इससे राज्य में मूर्तियां लगवाने की होड़ नहीं बढ़ेगी?
माया ने तपाक से कहा कि हमने उसका भी हल खोज निकाला है। लंबे समय ये ये मांग उठ रही है कि राज्य के तीन टुकड़े कर इससे दो और राज्य बनाए जाएं। मेरी सरकार ने तय किया है कि अगर हम दोबारा सत्ता में आए तो राज्य के
तीन के बजाए चार टुकड़े करेंगे और एक चौथा राज्य मूर्तिप्रदेश बनाया जाएगा। एक ऐसा राज्य जहां सिर्फ मूर्तियां ही मूर्तियां होंगी।
ऐसे में यूपी पुलिस को भी वहां अपराध रोकने में मदद मिलेंगी। क्योंकि इस बात की संभावना बहुत कम है कि एक मूर्ति दूसरे की तलवार छीन ले या फिर कोई मूर्ति दूसरी किसी मूर्ति का हैंडबैग छीनकर भाग जाए।
हालांकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि यूपी पुलिस का कोई सिपाही किसी मूर्ति से छेड़खानी न कर बैठे।
राहुल बाबा की सलाह
वहीं माया के इस फैसले के बाद सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव का कहना है कि मूर्तियां ही क्यों, चुनाव चिन्हों के वोट भी पार्टी के वोट में जोड़े जाएं। बसपा चाहे तो राज्य के सभी हाथियों और हाथियों की मूर्तियों के वोट अपने में जोड़ ले और हम राज्य की सभी साइकिलों को अपना वोट मान लेंगे!
इस पर कांग्रेस के युवा महासचिव श्री राहुल गांधी का कहना था कि अगर ‘हाथी’ और ‘साइकिल’ को वोट डालने का हक दिया जा रहा है तो ‘हाथ’ को भी वोट डालने का अधिकार मिलना चाहिए। हालांकि तभी किसी वरिष्ठ कांग्रेसी ने उनके कान में बताया कि वोट तो पहले ही हाथ से डाला जाता है!