शनिवार, 28 जनवरी 2012

वसंत पंचमी : विद्या की देवी सरस्वती की पूजा



**** " वसंत पंचमी एक भारतीय त्योहार : विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है " ****
-हेमा निरजेश वर्मा
वसंत पंचमी एक भारतीय त्योहार है, इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। यह पूजा पूर्वी भारत में बड़े उल्लास से मनायी जाती है। इस दिन स्त्रियाँ पीले वस्त्र धारण करती हैं।
प्राचीन भारत में पूरे साल को जिन छह मौसमों में बाँटा जाता था उनमें वसंत लोगों का सबसे मनचाहा मौसम था।जब फूलों पर बहार आ जाती, खेतों मे सरसों का सोना चमकने लगता, जौ और गेहूँ की बालियाँ खिलने लगतीं, आमों के पेड़ों पर बौर आ जाता और हर तरफ़ रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराने लगतीं। वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ महीने के पाँचवे दिन एक बड़ा जश्न मनाया जाता था जिसमें विष्णु और कामदेव की पूजा होती, यह वसंत पंचमी का त्यौहार कहलाता था। शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है।
बसन्त पंचमी कथा
सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य योनि की रचना की। अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे। उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों आ॓र मौन छाया रहता है। विष्णु से अनुमति लेकर ब्रह्मा ने अपने कमण्डल से जल छिड़का, पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही उसमें कंपन होने लगा। इसके बाद वृक्षों के बीच से एक अद्भुत शक्ति का प्राकट्य हुआ। यह प्राकट्य एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा। सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसन्त पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है- प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु। अर्थात ये परम चेतना हैं। सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से ख़ुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी और यूँ भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी जो कि आज तक जारी है। पतंगबाज़ी का वसंत से कोई सीधा संबंध नहीं है। लेकिन पतंग उड़ाने का रिवाज़ हज़ारों साल पहले चीन में शुरू हुआ और फिर कोरिया और जापान के रास्ते होता हुआ भारत पहुँचा।
पर्व का महत्व
वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। हर दिन नयी उमंग से सूर्योदय होता है और नयी चेतना प्रदान कर अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला जाता है। यों तो माघ का यह पूरा मास ही उत्साह देने वाला है, पर वसंत पंचमी (माघ शुक्ल 5) का पर्व भारतीय जनजीवन को अनेक तरह से प्रभावित करता है। प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है। जो शिक्षाविद भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वे इस दिन मां शारदे की पूजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं। कलाकारों का तो कहना ही क्या? जो महत्व सैनिकों के लिए अपने शस्त्रों और विजयादशमी का है, जो विद्वानों के लिए अपनी पुस्तकों और व्यास पूर्णिमा का है, जो व्यापारियों के लिए अपने तराजू, बाट, बहीखातों और दीपावली का है, वही महत्व कलाकारों के लिए वसंत पंचमी का है। चाहे वे कवि हों या लेखक, गायक हों या वादक, नाटककार हों या नृत्यकार, सब दिन का प्रारम्भ अपने उपकरणों की पूजा और मां सरस्वती की वंदना से करते हैं।
पौराणिक महत्व
इसके साथ ही यह पर्व हमें अतीत की अनेक प्रेरक घटनाओं की भी याद दिलाता है। सर्वप्रथम तो यह हमें त्रेता युग से जोड़ती है। रावण द्वारा सीता के हरण के बाद श्रीराम उसकी खोज में दक्षिण की ओर बढ़े। इसमें जिन स्थानों पर वे गये, उनमें दंडकारण्य भी था। यहीं शबरी नामक भीलनी रहती थी। जब राम उसकी कुटिया में पधारे, तो वह सुध-बुध खो बैठी और चख-चखकर मीठे बेर राम जी को खिलाने लगी। प्रेम में पगे झूठे बेरों वाली इस घटना को रामकथा के सभी गायकों ने अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत किया। दंडकारण्य का वह क्षेत्र इन दिनों गुजरात और मध्य प्रदेश में फैला है। गुजरात के डांग जिले में वह स्थान है जहां शबरी मां का आश्रम था। वसंत पंचमी के दिन ही रामचंद्र जी वहां आये थे। उस क्षेत्र के वनवासी आज भी एक शिला को पूजते हैं, जिसके बारे में उनकी श्रध्दा है कि श्रीराम आकर यहीं बैठे थे। वहां शबरी माता का मंदिर भी है।
ऐतिहासिक महत्व
वसंत पंचमी का दिन हमें पृथ्वीराज चौहान की भी याद दिलाता है। उन्होंने विदेशी हमलावर मोहम्मद गौरी को 16 बार पराजित किया और उदारता दिखाते हुए हर बार जीवित छोड़ दिया, पर जब सत्रहवीं बार वे पराजित हुए, तो मोहम्मद गौरी ने उन्हें नहीं छोड़ा। वह उन्हें अपने साथ अफगानिस्तान ले गया और उनकी आंखें फोड़ दीं।
इसके बाद की घटना तो जगप्रसिध्द ही है। गौरी ने मृत्युदंड देने से पूर्व उनके शब्दभेदी बाण का कमाल देखना चाहा। पृथ्वीराज के साथी कवि चंदबरदाई के परामर्श पर गौरी ने ऊंचे स्थान पर बैठकर तवे पर चोट मारकर संकेत किया। तभी चंदबरदाई ने पृथ्वीराज को संदेश दिया।
चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान॥
पृथ्वीराज चौहान ने इस बार भूल नहीं की। उन्होंने तवे पर हुई चोट और चंद्रबरदाई के संकेत से अनुमान लगाकर जो बाण मारा, वह गौरी के सीने में जा धंसा। इसके बाद चंदबरदाई और पृथ्वीराज ने भी एक दूसरे के पेट में छुरा भौंककर आत्मबलिदान दे दिया। (1192 ई) यह घटना भी वसंत पंचमी वाले दिन ही हुई थी।
वसंत पंचमी का लाहौर निवासी वीर हकीकत से भी गहरा संबंध है। एक दिन जब मुल्ला जी किसी काम से विद्यालय छोड़कर चले गये, तो सब बच्चे खेलने लगे, पर वह पढ़ता रहा। जब अन्य बच्चों ने उसे छेड़ा, तो दुर्गा मां की सौगंध दी। मुस्लिम बालकों ने दुर्गा मां की हंसी उड़ाई। हकीकत ने कहा कि यदि में तुम्हारी बीबी फातिमा के बारे में कुछ कहूं, तो तुम्हें कैसा लगेगा? बस फिर क्या था, मुल्ला जी के आते ही उन शरारती छात्रों ने शिकायत कर दी कि इसने बीबी फातिमा को गाली दी है। फिर तो बात बढ़ते हुए काजी तक जा पहुंची। मुस्लिम शासन में वही निर्णय हुआ, जिसकी अपेक्षा थी। आदेश हो गया कि या तो हकीकत मुसलमान बन जाये, अन्यथा उसे मृत्युदंड दिया जायेगा। हकीकत ने यह स्वीकार नहीं किया। परिणामत: उसे तलवार के घाट उतारने का फरमान जारी हो गया।
कहते हैं उसके भोले मुख को देखकर जल्लाद के हाथ से तलवार गिर गयी। हकीकत ने तलवार उसके हाथ में दी और कहा कि जब मैं बच्चा होकर अपने धर्म का पालन कर रहा हूं, तो तुम बड़े होकर अपने धर्म से क्यों विमुख हो रहे हो? इस पर जल्लाद ने दिल मजबूत कर तलवार चला दी, पर उस वीर का शीश धरती पर नहीं गिरा। वह आकाशमार्ग से सीधा स्वर्ग चला गया। यह घटना वसंत पंचमी (23.2.1734) को ही हुई थी। पाकिस्तान यद्यपि मुस्लिम देश है, पर हकीकत के आकाशगामी शीश की याद में वहां वसंत पंचमी पर पतंगें उड़ाई जाती है। हकीकत लाहौर का निवासी था। अत: पतंगबाजी का सर्वाधिक जोर लाहौर में रहता है।
वसंत पंचमी हमें गुरू रामसिंह कूका की भी याद दिलाती है। उनका जन्म 1816 ई. में वसंत पंचमी पर लुधियाना के भैणी ग्राम में हुआ था। कुछ समय वे रणजीत सिंह की सेना में रहे, फिर घर आकर खेतीबाड़ी में लग गये, पर आध्यात्मिक प्रवष्त्ति होने के कारण इनके प्रवचन सुनने लोग आने लगे। धीरे-धीरे इनके शिश्यों का एक अलग पंथ ही बन गया, जो कूका पंथ कहलाया।
गुरू रामसिंह गोरक्षा, स्वदेशी, नारी उध्दार, अंतरजातीय विवाह, सामूहिक विवाह आदि पर बहुत जोर देते थे। उन्होंने भी सर्वप्रथम अंग्रेजी शासन का बहिश्कार कर अपनी स्वतंत्र डाक और प्रशासन व्यवस्था चलायी थी। प्रतिवर्ष मकर संक्रांति पर भैणी गांव में मेला लगता था। 1872 में मेले में आते समय उनके एक शिष्य को मुसलमानों ने घेर लिया। उन्होंने उसे पीटा और गोवध कर उसके मुंह में गोमांस ठूंस दिया। यह सुनकर गुरू रामसिंह के शिष्य भड़क गये। उन्होंने उस गांव पर हमला बोल दिया, पर दूसरी ओर से अंग्रेज सेना आ गयी। अत: युध्द का पासा पलट गया।
इस संघर्ष में अनेक कूका वीर शहीद हुए और 68 पकड़ लिये गये। इनमें से 50 को सत्रह जनवरी 1872 को मलेरकोटला में तोप के सामने खड़ाकर उड़ा दिया गया। शेष 18 को अगले दिन फांसी दी गयी। दो दिन बाद गुरू रामसिंह को भी पकड़कर बर्मा की मांडले जेल में भेज दिया गया। 14 साल तक वहां कठोर अत्याचार सहकर 1885 ई. में उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया।
जन्म दिवस
वसंत पंचमी हिन्दी साहित्य की अमर विभूति महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्मदिवस (28.02.1899) भी है। निराला जी के मन में निर्धनों के प्रति अपार प्रेम और पीड़ा थी। वे अपने पैसे और वस्त्र खुले मन से निर्धनों को दे डालते थे। इस कारण लोग उन्हें 'महाप्राण' कहते थे। एक बार नेहरूजी ने शासन की ओर से कुछ सहयोग का प्रबंध किया, पर वह राशि उन्होंने महादेवी वर्मा को भिजवाई। उन्हें भय था कि यदि वह राशि निराला जी को मिली, तो वे उसे भी निर्धनों में बांट देंगे। जहां एक ओर वसंत ऋतु हमारे मन में उल्लास का संचार करती है, वहीं दूसरी ओर यह हमें उन वीरों का भी स्मरण कराती है, जिन्होंने देश और धर्म के लिए अपने प्राणों की बलि दे दी। -हेमा निरजेश वर्मा —

हिंदुओं के कानून ही बदलती है सरकारः सुप्रीम कोर्ट




हिंदुओं के कानून ही बदलती है सरकारः सुप्रीम कोर्ट
10 Feb 2011
नई दिल्ली ।। सुप्रीम कोर्ट ने अल्पसंख्यक समुदायों के पर्सनल लॉज में बदलाव न करने को लेकर सरकार की खिंचाई करते हुए कहा है कि सरकार सिर्फ हिंदुओं से जुड़े कानूनों में ही बदलाव करती है। इससे सरकार की धर्मनिरपेक्षता पर भी सवाल उठते हैं। 
अदालत ने मंगलवार को कहा कि पर्सनल लॉज में सुधार की सरकार की कोशिशें हिंदू समुदाय से आगे नहीं बढ़तीं। अदालत ने कहा कि हिंदू समुदाय परंपरागत कानूनों में सरकार की तरफ से होने वाली इन कोशिशों को लेकर सहिष्णु रहा है। लेकिन, इस मामले में धर्मनिरपेक्ष नजरिए की कमी दिखती है। ऐसा सुधार दूसरे धार्मिक समुदायों से जुड़े कानूनों में नहीं किया जा रहा।
जस्टिस दलवीर भंडारी और जस्टिस एक.के. गांगुली ने राष्ट्रीय महिला आयोग की एक याचिका पर सुनवाई के दौरान ये बातें कहीं। याचिका में कहा गया था कि विवाह की उम्र को लेकर अलग-अलग कानूनों से काफी उलझन है। इसलिए याचिका में शादी की न्यूनतम उम्र पर एक समान कानून की जरूरत बताई गई थी। 
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Friday, February 11, 2011
सारे कानून सिर्फ हिन्दुओं के लिए ?
---अनिल बिहारी श्रीवास्तव
सुप्रीम कोर्ट ने अल्पसंख्यकों के पर्सनल लॉ में बदलाव न करने को लेकर एक बार फिर केंद्र सरकार की खिंचाई की है। अदालत ने यह सही सवाल उठाया है कि आखिर क्यों सरकार सिर्फ हिन्दुओं के कानून ही बदलती है? जस्टिस दलबीर भंडारी और जस्टिस ए.के. गांगुली ने राष्ट्रीय महिला आयोग की याचिका पर सुनवाई के दौरान बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा, ‘‘पर्सनल लॉ में सुधार की कोशिशें हिन्दू समुदाय से आगे नहीं बढ़तीं। ऐसा सुधार दूसरे धार्मिक समुदायों से जुड़े कानूनों में नहीं हो रहा।’’ सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से एक बार पुन: देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की जरूरत महसूस हो रही है। इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट ने भी पिछले दो दशक से अधिक समय में अनेक बार जोर दिया है। खास बात यह है कि १९८५ में शाहबानो मामले में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश जस्टिस वाय.वी. चंद्रचूढ़ तक ने राष्ट्रीय एकीकरण के लिए समान नागरिक संहिता को जरूरी बताया था। जस्टिस कुलदीप सिंह ने साफ शब्दों में कहा था, ‘‘संविधान के अनुच्छेद-४४ को कोल्ड स्टोरेज से बाहर निकाला जाना चाहिए।’’ इसी अनुच्छेद में जोर देकर कहा गया है कि धर्म, जाति और जनजाति से हटकर सभी के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। इस तर्क से असहमत नहीं हुआ जा सकता कि सभ्य समाज में धार्मिक और पर्सनल लॉ के बीच किसी प्रकार का संबंध नहीं हो सकता है। अत: एक राष्ट्र में रहने वाले सभी लोगों, चाहे वे किसी भी धार्मिक समुदाय से संबंध रखते हों, एक ही या यह कहें कि समान कानून लागू किया जाना चाहिए। 
हमारे यहां अधिकांश परिवार कानून का निर्धारण धर्म के द्वारा किया जाता है। हिन्दू, सिख, जैन और बौद्धों को हिन्दू कानून के तहत रखा गया है। मुसलमानों और ईसाइयों के अपने कानून हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि एक ही देश में रहने वालों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ लागू हैं। ऐसी स्थिति में सभी के साथ समान व्यवहार, उनके बीच भावनात्मक लगाव और राष्ट्रीय एकता की कल्पना किस हद तक की जा सकती है? इस देश में समान नागरिक संहिता को लेकर बहस आजादी के पूर्व से चली आ रही है। १९४९ में संविधान में अनुच्छेद-४४ के प्रावधानों का उद्देश्य भी एकरूपता लाना रहा है, लेकिन स्वतंत्रता के बाद से ही शुरू हो गई तुष्टिकरण की कांग्रेसी राजनीति इस सकारात्मक सुधार की राह में सबसे बड़ा अड़ंगा बन गई। कालान्तर में वामदल धर्मनिरपेक्षता का मुखौटा लगाकर अप्रत्यक्ष रूप से मुस्लिम तुष्टिकरण की राह पर चल पड़े। शाहबानो तलाक मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए राजीव गांधी की अगुआई वाले कांग्रेसी सरकार ने कानून में संशोधन कर तुष्टिकरण का निकृष्टतम उदाहरण पेश किया। 
न्यायपालिका की चिंता अपनी जगह वाजिब है। समस्या वोट बैंक की गंदी राजनीति के कारण जटिल हो रही स्थिति की है। पिछले दो दशकों में राजनीति में ऊग आई स्वयंभू सेकुलरिस्टों की खरपतवार एक नई मुसीबत है। यह धारणा बनाने की कोशिशें देखी और सुनी गईं कि समान नागरिक संहिता अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों के निजी और धार्मिक कानूनों में हस्तक्षेप जैसी बात है। देश की सियासत में सड़ांध मारती नकारात्मक और स्वार्थ पूर्ण सोच के चलते जो नुकसान हो रहा है उसकी ओर किसी का ध्यान ही नहीं है। विद्वान न्यायाधीश-जस्टिस भंडारी और जस्टिस गांगुली का यह सवाल उचित और गंभीरतापूर्वक विचार करने योग्य है कि ‘‘ पर्सनल लॉ में सुधार की कोशिश हिंदू समुदाय से आगे क्यों नहीं बढ़ती?’’ विचार करें यही बात अन्य क्षेत्रों में तक देखी जाती है। बात कड़वी है किन्तु परिवार नियोजन अभियान को ले लें। आंकड़े स्वयं ही गवाह हैं ऐसा लगता है कि मानो इस कार्यक्रम की सफलता की जिम्मेदारी सिर्फ हिन्दुओं पर थोप दी गई है। हर क्षेत्र में इतना भेदभाव राष्ट्र को गंभीर स्थिति की ओर निरंतर धकेल रहा है।
Posted by Anil Bihari Shrivastava