रविवार, 29 जनवरी 2012

गीता राष्‍ट्रीय धर्मशास्‍त्र घोषित हो : इलाहाबाद उच्च न्यायालय


गीता राष्‍ट्रीय धर्मशास्‍त्र घोषित हो - हाईकोर्ट
11 सितंबर 2007 वार्ता |
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इलाहाबाद। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 ए (बी) व (एफ) के तहत राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान, राष्ट्रीय पक्षी और राष्ट्रपुष्प की तरह भगवद्गीता को भी राष्ट्रीय धर्म शास्त्र घोषित किया जाए।
न्यायालय ने कहा है कि चूंकि देश की आजादी के आन्दोलन की प्रेरणा स्रोत रही गीता भारतीय जीवन पद्धति का आईना है, इसलिए देश के हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह इसके आदर्शों पर अमल करके इस राष्ट्रीय धरोहर की रक्षा करे।
न्यायालय ने कहा कि गीता के उपदेश मन के आंतरिक और बाह्य सत्य को उजागर करते हैं और यह किसी खास सम्प्रदाय की नहीं, बल्कि यह सभी सम्प्रदायों की गाइडिंग फोर्स है।
यह आदेश न्यायमूर्ति एस. एन. श्रीवास्तव ने वाराणसी के श्यामल राजन मुखर्जी की याचिका पर हाल में दिया है। न्यायालय ने भगवत गीता के श्लोकों और इसके बारे में विद्वानों के विचारों का उद्धरण देते हुए कहा है कि धर्म भगवद्गीता की आत्मा है, जिसे भक्ति योग, कर्मयोग व ज्ञान योग के जरिए प्राप्त किया जा सकता है।
न्यायालय ने कहा है कि भारत में जन्म लेने वाले सभी सम्प्रदायों के लोगों को इसका पालन करना चाहिए। गीता के उपदेश बिना परिणाम की परवाह किए धर्म के लिए सघंर्ष करने की प्रेरणा देते हैं। यह भारत का धर्मशास्त्र है जिसे सम्प्रदायों के बीच जकड़ा नहीं जा सकता। न्यायालय ने कहा है कि संविधान के मूलकर्तव्यों के तहत राज्य का यह दायित्व है कि गीता को राष्ट्रीय धर्मशास्त्र की मान्यता दे। न्यायालय ने कहा है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत अन्य धर्मों के अनुयायियों की तरह हिन्दुओं को भी अपने सम्प्रदाय का संरक्षण प्राप्त करने का अधिकार है। न्यायालय ने कहा है कि भगवद्गीता हमारे नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों की संवाहक है। यह हिन्दू धर्म के हर सम्प्रदाय का प्रतिनिधित्व करती है इसलिए हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह इसके आदर्शों को अमल में लाए।

गीता भारतीय दर्शन : मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय


गीता धार्मिक पुस्तक नहीं – उच्च न्यायालय January 28, 2012
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि गीता कोई धार्मिक पुस्तक नहीं बल्कि भारतीय दर्शन पर आधारित ग्रंथ है। कोर्ट ने कहा कि इसलिए स्कूलों में इसको पढ़ाए जाने पर रोक नहीं लगाई जा सकती।  मध्य प्रदेश के स्कूली पाठ्यक्रम में गीता-सार को शामिल किए जाने के विरोध में दायर जनहित याचिका को जस्टिस अजित सिंह और जस्टिस संजय यादव की बेंच खारिज कर दिया। बेंच ने कहा कि ‘गीता’ में दर्शन है न कि धार्मिक सीख। कैथलिक बिशप काउंसिल के प्रवक्ता आनंद मुत्तंगल ने याचिका में कहा था कि यह फैसला अनुच्छेद 28 (1) का उल्लंघन है।
हाई कोर्ट ने कहा कि धार्मिक पुस्तक की जगह स्कूलों में सभी धर्मों का सारांश पढ़ाया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 28 (1) नैतिक शिक्षा, सांप्रदायिक सिद्धांतों और सामाजिक एकता बनाए रखने वाले किसी प्रशिक्षण पर पाबंदी नहीं लगाता, जो नागरिकता व राज्य के विकास का जरूरी हिस्सा हैं। हाईकोर्ट ने अरुणा रॉय विरूद्ध केन्द्र सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का भी उल्लेख किया।
उसमें कहा गया है कि ‘ संविधान के अनुच्छेद 28 (1) में धार्मिक शिक्षा का उपयोग एक सीमित अर्थ में किया गया है। इसका मतलब है कि शैक्षणिक संस्थाओं में पूजा, आराधना, धार्मिक अनुष्ठान की शिक्षा देने के लिए राज्य सरकार के धन का उपयोग नहीं किया जा सकता। ‘
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने राज्य सरकार के उस आदेश की प्रति भी पेश नहीं की, जिसमें गीता-सार को स्कूलों में शामिल करने का निर्णय किया गया था। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील राजेश चंद को गीता पढ़ने के लिए दो महीने की मोहलत दी थी, ताकि वे इस बात को समझ सकें कि गीता जीवन का दर्शन है न कि किसी धर्म से संबंधित। याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि हालांकि उन्होंने गीता का अध्ययन किया लेकिन उन्हें यह पूरी तरह से समझ में नहीं आई। सुनवाई के बाद कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।