सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

देवास-एंट्रिक्स घोटाले : सरकार है सौदे की जिम्मेदार




- अरविन्द सिसोदिया 
2 जी  स्पेक्ट्रम  से भी कई गुना बड़ा घोटाला , एस बैंड  स्पेक्ट्रम आबंटन है  तथा  स्वंय  प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अंतर्गत रहने वाले अन्तरिक्ष विभाग का यह मामला बेहद गंभीर है और केंद्र सरकार पूरी तरह से इसमे  लिप्त है .... इसकी पूरी जाँच पड़ताल संसद की लोक  लेखा समिति से होनी चाहिए...
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2जी से बड़ा एस-बैंड घोटाला, घेरे में पीएम
मंगलवार, फरवरी 8, 2011
http://hindi.oneindia.in/news
नई दिल्ली। 1.76 लाख करोड़ के घोटाले के बाद पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा चारों तरफ से घिर गए। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है, जिसमें राजा से भी बड़े बेताज बादशाह के होने की खबर आयी है। घोटालों का यह बादशाह कौन है, यह तो अभी नहीं पता चला है, लेकिन हां इस बार घोटाले की रकम 2जी से ज्‍यादा 2 लाख करोड़ रुपए है। यह है एस-बैंड स्‍पेक्‍ट्रम घोटाला। खास बात यह है कि इस घोटाले के घेर में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी आ गए हैं। 
कैग की रिपोर्ट एस-बैंड स्पेक्ट्रम की बिक्री में हुए 2 लाख करोड़ रुपये का यह घोटाला देश की सुरक्षा को ताक पर रखकर किया गाय। वर्ष 2005 में भारतीय अंतरिक्ष शोध संस्थान (इसरो) के व्यवसायिक धड़े एंट्रिक्स कॉपोरेशन लिमिटेड और देवास मल्टी मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के बीच 70 मेगा हर्ट्ज स्पेक्ट्रम आवंटन को लेकर 20 वर्ष का करार हुआ था। 
इस स्‍पेक्‍ट्रम के माध्‍यम से अपनी पहुंच दूर-दराज़ के इलाकों तक बढ़ाई जा सकती है। दूरदर्शन ने देश के दूरदराज के इलाकों में अपना प्रसारण पहुंचाने के लिए इस स्‍पेक्‍ट्रम और तकनीक का इस्तेमाल किया था। इस स्पेक्ट्रम के जरिए तकरीबन पूरे देश में संपर्क किया जा सकता है। आरोप है कि एंट्रिक्‍स ने देश के सुरक्षा नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए देवास मल्‍टीमीडिया को बिना नीलामी के स्‍पेक्‍ट्रम आवंटित कर दिया। 
सीएजी को संदेह है कि एस-बैंड स्पेक्ट्रम आवंटन में सरकारी खजाने को करीब दो लाख करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचा है। इस घोटाले के उजागर होते ही इसरो ने जांच शुरू कर दी है। खास बात यह है कि यह विभाग सीधे प्रधानमंत्री के नियंत्रण में आता है। इस लिहाज से इस घोटाले में पीएम मनमोहन सिंह भी घेरे में आ गए हैं। यही नहीं भारतीय जनता पार्टी ने अपनी कमान से निकले तीर प्रधानमंत्री पर चलाने शुरू भी कर दिए हैं। 
भाजपा ने इस मामले को हाथों-हाथ लेते हुए इसे 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले से भी बड़ा घोटाला करार दिया और सीधे मनमोहन सिंह से सफाई मांगी। भाजपा प्रवक्ता निर्मला सीतारमन ने सोमवार को संवाददाताओं को सम्बोधित करते हुए कहा, "सीएजी ने एस-बैंड स्पेक्ट्रम की बिक्री में हुए कथित घोटाले को लेकर जो अनुमान लगाया है उससे प्रतीत होता है कि यह 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले से भी बड़ा घोटाला है। यह अंतरिक्ष मंत्रालय का मामला है और यह मंत्रालय सीधे तौर पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अधीन है। इसलिए हम चाहते हैं प्रधानमंत्री सीधे इस मामले पर अपना बयान दें।"

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वैज्ञानिक नहीं, सरकार है सौदे की जिम्मेदार
उपमिता वाजपेयी / बेंगलुरु 
http://www.bhaskar.com
दो लाख करोड़ रुपए के देवास-एंट्रिक्स घोटाले में देश के चार शीर्ष अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को काली सूची में डालने के मामले में दो अहम मोड़ आए हैं। इसरो के पूर्व चेयरमैन जी. माधवन नायर ने कहा कि मैंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है। मुझे उम्मीद है कि वे मेरे साथ न्याय करेंगे। अगर यहां मुझे न्याय नहीं मिला तो मेरे सामने दूसरे विकल्प भी हैं। दूसरी ओर सरकार ने अटॉर्नी जनरल वाहनवती से राय मांगी है। उनसे पूछा गया है कि चारों वैज्ञानिकों को काली सूची में डालने से कहीं प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन तो नहीं हुआ। 


इन विवादों के बीच भास्कर ने पड़ताल की तो सामने आई हकीकत। सरकार की तरफ से वैज्ञानिकों को ब्लैकलिस्टेड करने के जो कारण बताए गए, वे संदिग्ध हैं। आहत माधवन कह रहे हैं 'सरकार ने चार वैज्ञानिकों को अछूत बना दिया। ऐसा फैसला तो तानाशाह करते थे।' डील की जांच कर रही प्रत्युष सिन्हा कमेटी ने डील में घोटाले के बजाय सिर्फ प्रक्रिया की खामी मानी। 
कमेटी की आप कहती  है कि पूरी प्रक्रिया सरकार की जानकारी में लाए बिना पूरी की गई। जबकि हकीकत कुछ और है। भास्कर के पास सबूत मौजूद हैं। जिनसे पता चलता है कि एक या दो नहीं, पांच बार ऐसे मौके आए जब डील की प्रक्रिया सरकार के पांच-पांच मंत्रालयों, कैबिनेट बैठकों से गुजरी। 


सरकार ने जनवरी 2012 में ४ वैज्ञानिकों (माधवन नायर, इसरो के पूर्व वैज्ञानिक सचिव ए. भास्करनारायण, एंट्रिक्स के पूर्व कार्यकारी निदेशक केआर श्रीधर मूर्ति और इसरो सैटेलाइट सेंटर के पूर्व निदेशक केएन शंकरा) को काली सूची में डाल दिया था। डील 2005 में हुई। सरकार ने इसे सुरक्षा के लिए खतरा बताया। वहीं कैग ने इसमें दो लाख करोड़ के घोटाले की बात कही। 


चार-चार कमेटियां बनीं। 
जांच हुई। रिपोर्ट भी आई। 
खुद इसरो प्रमुख राधाकृष्णन ने भी प्रत्युष सिन्हा की अध्यक्षता में कमेटी बनाई।
हाल में इसने अपनी रिपोर्ट में घोटाले की बात को खारिज करते हुए सिर्फ प्रक्रिया की खामी मानी। दूसरी ओर पीएमओ में राज्यमंत्री नारायणसामी भी मानते हैं कि 'सरकार के पास इन चारों के खिलाफ कोई सबूत नहीं हैं। स्पेक्ट्रम आवंटन का काम दूरसंचार विभाग के दायरे में आता है। इसरो की भूमिका उपग्रहों को प्रक्षेपित करने और उन पर काम करने तक ही सीमित है। यह सौदा तकनीकी सुधार के क्षेत्र में अहम कदम हो सकता था।' माधवन नायर और अन्य तीन वैज्ञानिक भी तो यही कह रहे हैं। फिर उन्हें अपनी बात रखने का मौका क्यों नहीं दिया जा रहा? एंट्रिक्स की ओर से डील पर हस्ताक्षर करने वाले श्रीधर मूर्ति का कहना है कि सैटेलाइट मोबाइल संचार के प्रयोग किए जाने वाले एस बैंड स्पेक्ट्रम का आवंटन करने के लिए हमने पहले से मौजूद नीति का ही पालन किया। आप हमें उसके लिए दोषी कैसे ठहरा सकते हैं। सरकार की मंशा पर सवाल इससे भी उठते हैं कि एंट्रिक्स-देवास डील 28 जनवरी 2005 को हुई। लेकिन इसका खुलासा 27 नवंबर 2005 तक अंतरिक्ष आयोग या कैबिनेट नोट में नहीं किया गया जिसमें जीसैट-6 को लांच करने की मंजूरी मांगी गई थी। 


नीयत पर शक क्यों? राधाकृष्णन के नेतृत्व वाली प्रत्युष सिन्हा कमेटी की नीयत पर सवाल उठाते हुए माधवन कहते हैं कि कमेटी ने रिपोर्ट के उन्हीं अंशों को जारी किया जिससे हमें दोषी ठहराया जा सके। लेकिन वो अंश नहीं बताए जिनमें हमारी कोशिशों की तारीफ की गई थी। रिपोर्ट में भाग 6 के केवल 9 पन्ने ही सार्वजनिक किए। इससे साफ होता है कि यह कपटपूर्ण कार्रवाई थी। अगर आप एक रिपोर्ट जारी करते हैं तो यह पूरी होनी चाहिए। डील की तारीफ करने वाली बीके चतुर्वेदी और रोद्दम नरसिम्हा कमेटी की पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक हुई थी। 
स्टोर रूम में सड़ रही सैटेलाइट 
डील रद्द हो गई। जो सैटेलाइट तैयार हो गई थी वे तीन साल से स्टोर रूम में पड़ी हैं। एक सैटेलाइट की उम्र औसतन 6 साल होती है। यानी इनकी आधी उम्र खत्म हो चुकी है। देश को इससे हर साल 10 बिलियन डॉलर का नुकसान हो रहा है। इंटरनेशनल टेलीकम्यूनिकेशन यूनियन से भारत को मिला ऑर्बिटल स्लॉट मई 2011 में एक्सपायर हो चुका है। पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर 200 ट्रांस्पांडर काम कर रहे हैं। लेकिन विवाद केवल दो ट्रांस्पांडर पर हुआ। 
शेयर में आए उछाल ने चौंकाया 
देवास के दो शेयरहोल्डर वेणुगोपाल और उमेश के पास 1 लाख रुपए के 10 हजार शेयर थे। जिन्हें उन्होंने डील साइन होने के ाद ७.४ करोड़ रुपए में बेच दिया। विदेशी निवेशकों के साथ हुई इस सौदेबाजी ने देश की जांच एजेंसियों को चौंका दिया। मामला अब भी कंपनी मामलों के मंत्रालय के पास है। 
सुरक्षा के नाम पर डील रद्द, सजा घोटाले की 
देवास और एंट्रिक्स के बीच डील को जुलाई 2010 में सरकार ने री-एसेस्मेंट के लिए स्पेस कमिशन भेजा। देश की सुरक्षा के लिए खतरा मानते हुए सरकार ने फरवरी 2011 में इसे रद्द कर दिया। कैग की रिपोर्ट में दो लाख करोड़ के घोटाले की भी बात कही गई। सरकार ने जांच कमेटी बना दी। घोटाले को आधार मानते हुए ही चारों वैज्ञानिकों को काली सूची में डालने का फैसला लिया गया।