मंगलवार, 13 मार्च 2012

भारतीय काल गणना सृष्टि की सम्पूर्ण गति, लय एवं प्रभाव का महाविज्ञान है - नरूका


प्रबुद्धजन विचार गोष्ठी
भारतीय काल गणना सृष्टि की सम्पूर्ण गति, लय एवं प्रभाव का महाविज्ञान है - नरूका


कोटा 13 मार्च। नववर्ष उत्सव आयोजन समिति कोटा महानगर के तत्वाधान में मंगलवार को गुजराती समाज भवन में आयोजित ’’ भारतीय नववर्ष का वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक महत्व ’’ विषय पर आयोजित प्रबुद्धजन विचार गोष्ठी को सम्बोद्धित करते हुये मुख्य वक्ता प्रध्याापक एवं चिन्तक नन्द सिंह नरूका ने कहा ‘‘ भारतीय पंचाग की काल गणना और उसमें निहित ग्रह - नक्षत्रीय प्रभावों का समाज में व्यापक प्रभाव है। और ‘‘भारतीय नववर्ष सम्बत्सर पूरी तरह वैज्ञानिक आधारों और अनुभवों की आधारशीला पर आधारित होकर सृष्टि के विकास क्रम एवं निरन्तर प्रभाव का महान् अनुसंधान है।
उन्होने कहा ‘‘ एक समय भारत ज्ञान विज्ञान में सर्वोच्च था और हमारे पूर्वजों ने जीवन पद्धति से लेकर गतिशीलता तक गम्भीर अध्ययन किये। और उन्होने लिपिवद्ध किया तथा समाज में इस तरह समाविष्ट कर दिया कि हम आज भी उस ज्ञान विज्ञान का लाभ उठा रहे है। वह आज भी हमारे जीवन के शुभ अवसरो को मार्गदर्शित करते है।
नरूका ने कहा ‘‘ हमारे ज्ञान -विज्ञान और इतिहास का बहुत बडा हिस्सा मुस्लिम आक्रमणों के दौरान जला दिया गया। और अंग्रेजो ने भी हमारे ज्ञान विज्ञान और मौलिक जीवन पद्धति को समाप्त करने तथा अपने आप को थोपने का उपक्रम किया जिसका प्रभाव आज तक  हमें प्रभावित कर रहा है।
उन्होने बताया कि रोमन कलेण्डर कल्पना पर आधारित था। उसमें कभी मात्र 10 महीने हुआ करते थे। जिनमें कुल 304 दिन थे। बाद में उन्होने जनवरी व फरवरी माह जोडकर 12 माह का वर्ष किया। इसमें भी उन्होने वर्ष के दिनो को ठीक करने के लिये फरवरी को 28 और 4 साल बाद 29 दिन की। कुल मिलाकर ईसवी सन् पद्धति अपना कोई वैज्ञानिक प्रभाव नहंी रखती है।
उन्होने कहा कि भारतीय पंचाग में यूं तो 9 प्रकार के वर्ष बताये गये जिसमें विक्रम संवत् सावन पद्धति पर आधारित है। उन्होने बताया कि भारतीय काल गणना में समय की सबसे छोटी इकाई से लेकर ब्रहााण्ड की सबसे बडी ईकाई तक की गणना की जाती है। जो कि ब्राहाण्ड में व्याप्त लय और गति की वैज्ञानिकता को सटीक तरीके से प्रस्तुत करती है।
उन्होने कहा आज कि वैज्ञानिक पद्धति कार्बन आधार पर पृथ्वी की आयु 2 अरब वर्ष के लगभग बताती है। और यहीं गणना भारतीय पंचाग करता है। जो कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर पूरी तरह से प्रमाणिकता के साथ खडा हुआ है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि गजेन्द्र सिंह सिसोदिया ने कहा ‘‘ हमारी पृथ्वी पर जो ऋतु क्रम घटित होता है। वह भारतीय नववर्ष की संवत पद्धति से प्रारम्भ होता है। उन्होने कहा कि हमारे मौसम और विविध प्राकृतिक घटनाओं पर ग्रह नक्षत्रो का प्रभाव पडता है। जिसका गहन अध्ययन भारतीय काल गणना पद्धति मे हुआ है।
उन्होने कहा कि चीन और जापान अपनी -अपनी परम्पराओं पर चलकर विश्व मे अग्रणी बने हुये है। हमे भी अपनी भाषा अपने अंक अपने धर्म पर दृढ़ता पूर्वक विश्वास करते हुये उनका गम्भीरता पूर्वक संरक्षण करना चाहिये एवं अपने जीवन में अपनाना चाहिये।
विशिष्ट अतिथि जी.डी.पटेल ने अपने सम्बोद्धन में कहा कि भारतीय संस्कृति ने ही सबसे पहले सृष्टि रचना का चिन्तन किया वह क्यों है ? किस तरह गतिशील है ? उसका हमारी पृथ्वी पर तथा प्राणी जीवन पर क्या-क्या प्रभाव पड़ रहे है ? इनका अध्ययन भी हमारी काल गणना में समाहित है। उन्होने कहा पाश्चात् जगत हमारी प्रमाणित एवं वैज्ञानिक आधार पर आधारित धरोहर, ज्ञान-विज्ञान को नष्ट कर देना चाहता है। और अपने आप को हम पर थोपना चाहता है। इसलिये हमे अपने ज्ञान विज्ञान एवं धरोहर को संरक्षित करना चाहिये, गर्व पूर्वक हमें चेत्र शुक्ल एकम से प्रारम्भ नववर्ष को उत्सवपूर्वक मनाना चाहिये।
कार्यक्रम के अध्यक्ष आर.पी गुप्ता, ने आव्हान किया कि हमारे पूर्वजो के द्वारा दिया गया हमारा नववर्ष चेत्र शुल्का एकम् को उत्सव के रूप में प्रत्येक घर को मनाना चाहिये।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में अतिथि परिचय एवं स्वागत समिति के मंत्री बाबूलाल भाट ने किया, कार्यक्रम संयोजक प्रहलाद गोस्वामी ने समिति का संक्षिप्त परिचय दिया। संचालन समिति के संयुक्त सचिव एडवोकेट मनोज गौतम ने किया तथा धन्यवाद समिति के संरक्षक बाबूलाल रेनवाल ने किया।
कार्यक्रम में समिति के संरक्षक जटाशंकर शर्मा, खुशपाल सिंह चौहान, त्रिलोक चन्द्र जैन, चन्द्र सिंह,सहित पूर्व मंत्री हरि कुमार औदिच्य, भाजपा जिला अध्यक्ष श्याम शर्मा, अवधेश मिश्रा, अरविन्द्र सिसोदिया नेता खण्डेलवाल, दिनेश सोनी,प्रचार प्रमुख महेश शर्मा, सीमा खण्डेलवाल, कुसुम शर्मा, रामवतार सिंघल, नीता नायक, रामबाबू सोनी, नवीन शर्मा, हरिहर गौतम, दिनेश रावल, जगदीश शर्मा, राकेश भटनागर, विमल जैन, वी.के. योगी , हेमन्त विजयवर्गीय, अरविन्द्र जौहरी, ओम प्रजापति, आदि प्रमुख रूप से उपस्थित थे।
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नए चित्र भारतीय नव वर्ष विक्रम संवत २०६९
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गुड़ी पड़वा : हिन्दू नववर्ष : चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
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भारतीय काल गणना सृष्टि की सम्पूर्ण गति, लय एवं प्रभाव का महाविज्ञान है
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भारतीय नववर्ष की अनमोल वैज्ञानिकता :अरविन्द सीसौदिया
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वैज्ञानिक और प्रमाणिक : भारतीय काल गणना का महासत्य
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विक्रमी संवत 2069 : भारतीय नव वर्ष
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श्री गिरिराज जी शास्त्री (दादा भाई) : जीवन परिचय



संघ अभिलेखागार, जयपुर प्रान्त
श्री गिरिराज जी शास्त्री (दादा भाई)
जीवन परिचय
श्री गिरिराज जी शास्त्री (दादा भाई) का मूल जन्म स्थान कांमा, जिला-भरतपुर है। आपके
पूजनीय पिताजी स्वर्गीय आनन्दीनारायण जी आचार्य थे। आपका जन्म 9 सितम्बर, मंगलवार-1919
को गणेश विसर्जन, अनन्त चतुदर्शी को हुआ था।
अध्ययन
आपने 6 वीं तक आंग्ल विद्या में अध्ययन, प्रवेशिका, साहित्य उपाध्याय, शास्त्री, अंग्रेजी में एक
विषय में इन्टरमीजिएट की परीक्षा दी। वेद में भी यजुर्वेद की परीक्षा उतीर्ण की।
संघ से सम्पर्क
रथ खाना विद्यालय, जयपुर में अध्यापक थे। नथमल जी के कटले में कभी-2 संघ की शाखा
लगती थी। उसमें दादा भाई का जाना होता रहता था। सन् 1942 में श्री शिवकुमार जी (बीएस.सीके
छात्र) के कहने पर शाखा में जाना प्रारम्भ किया।
अजमेर से श्री रामेश्वर जी शर्मा (मूल निवासी-किशनगढ़ बास, जिला-अलवर) अपनी नानी के
यहाँ अजमेर में रहते थे। 10 वीं की परीक्षा देकर 1 वर्ष के लिए विस्तारक बनकर जयपुर में आये थे।
उन्होने आते ही नथमल जी के कटले में नियमित शाखा शुरू कर दी। दादा भाई ने उसी शाखा में
जाना शुरू कर दिया और जो जिम्नास्टिक और व्यायाम करते थे, उसको छोड़ दिया। दादा भाई को
शाखा में अच्छे प्रतिभावान छात्रो से मिलने पर प्रसन्नता हुई।
संघ शिक्षण
आपने सन् 1943 में मेरठ (उŸार प्रदेश) से प्रथम वर्ष, 1944 में मेरठ से ही द्वितीय वर्ष और
सन् 1945 में नागपुर से तृतीय वर्ष का शिक्षण प्राप्त किया था।
पूर्व का प्रचारक जीवन
आप जुलाई 1946 से दिसम्बर, 1946 तक सीकर के नगर प्रचारक, जनवरी 1947 से 1948
तक सीकर जिला प्रचारक, 1948 से जून, 1950 तक सीकर$झुन्झुनूं जिले के प्रचारक रहे, उसके
पश्चात आप जयपुर वापस लौट गये।
भारती पत्रिका ‘‘मासिक’’ (संस्कृत)
बाबा साहब आप्टे ने दादा भाई को संस्कृत की पत्रिका निकालने की प्रेरणा दी। तब भारती
पत्रिका निकालने के लिए पण्डितो की एक सभा बुलाई गई और सन् 1950 की दीपावली से इसका
शुभारम्भ किया गया।
संघ दायित्व
1942 में मुख्य शिक्षक, 1943 में मेरठ से प्रथम संघ शिक्षा वर्ग करके लौटने के बाद 3
शाखाओं का कार्यवाह, 1944 में द्वितीय वर्ष करके आने के बाद 4-5 शाखाओं की जिम्मेदारी,1945 में
तृतीय वर्ष कर कर आने के बाद जयपुर के नगर कार्यवाह का दायित्व दे दिया। उसके बाद विभाग
कार्यवाह बना दिया।
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बाबा साहब आप्टे ने दादा भाई को प्रचारक से वापस आने पर जयपुर का नगर कार्यवाह बना
दिया।
जुलाई 1950 से 1951 तक जयपुर नगर के नगर कार्यवाह, 1951 से 1952 तक जयपुर जिला
कार्यवाह, 1952 से 1953 तक जयपुर विभाग कार्यवाह, 1953 से 1992 तक राजस्थान के प्रान्त
कार्यवाह, 1992 से 1995 तक राजस्थान क्षेत्र के सम्पर्क प्रमुख, 1995 से 1998 तक राजस्थान क्षेत्र के
प्रचार प्रमुख और 1998 से 1999 तक क्षेत्र की कार्यकारिणी के सदस्य रहे।
दादा भाई पाथेय कण संस्थान का अध्यक्ष भी रहे है।
स्वर्गारोहण
निधन-13 मार्च, 2012 को प्रातःकाल 4.00 बजे एपेक्स अस्पताल, मालवीय नगर, जयपुर।
प्रसंग
राय जी के घेर में, जादुन जी का नोहरा (मोदी खाना) में और शाखाऐं खुली। एक बार दादा
भाई को कहीं भोजन पर जाना था। श्री रामेश्वर जी शर्मा-विस्तारक से शाखा से जाने की अनुमति
मांगी। उन्होने उनसे कहा कि यदि आप मुख्य शिक्षक होते तो ऐसे जाते क्या।
सन् 1943 में मेरठ के प्रथम वर्ष में प.पू.श्री गुरूजी ने कहा था कि संगठन और मेले में अन्तर
होता है। मेले में तो लोग आते है और चले जाते है परन्तु संगठन में अनुशासन, आज्ञा पालन,
संस्कार आदि होता है और इससे संगठन उŸारोŸार बढ़ता भी है।
1947 में पण्डित बच्छराज जी व्यास की प्रेरणा से प्रचारक गये। पण्डित बच्छराज जी व्यास
दादा भाई के चाचा के ससुर लगते थे। दादा भाई 2 महिने किशनगढ़ (अजमेर) में विस्तारक रहे।
1948 में श्री वेदप्रकाश जी के साथ एक-डेढ़ माह तक मसूरी रहे, उसके बाद वापस आ गये। बाबा
साहब आप्टे जी ने पूछा कि वापस कैसे आ गये तो दादा भाई ने माता जी के देहावसान के कारण
आना बताया। पिताजी ने उन्हें (दादा भाई) एम.एस.कटरे के पास ले जाकर कहा कि इसने शास्त्री की
पढ़ाई की है, अग्रेंजी में इन्टरमीजिएट किया है, संघ वालो के चक्कर में चढ़ गया है। उन्होने
सहानुभूति का भाव दिखाकर उन्हें 1 वर्ष के लिए नौकरी दे दी।
दादा भाई का प्रारम्भ से ही संध्या करने का नियम था जो अन्त समय तक बराबर चलता
रहा है। लगभग 38-39 साल पहले दादा भाई से एक सज्जन मिले। उन्होने शिव जी की पार्थी पूजा
का महत्व बताया, उसके बाद से दादा भाई ने वह भी लगातार प्रारम्भ कर दिया। दादा भाई का यह
प्रयास रहता था कि प्रातः के साथ-साथ सायंकाल भी संध्या हो जाये। दादा भाई शिव जी व भगवती
देवी का पाठ व स्तोत्र करते थे। प.पू.श्री गुरूजी ने उन्हें सोहन जाप का संकेत किया था, वह भी
बराबर करते रहे।
1952-53 में जलमहल, जयपुर में प्रान्तीय शिविर था। वहाँ सब लोग जब भोजन पर बैठ गये
तो दादा भाई का प.पू. श्रीगुरूजी के साथ में बैठने का रखा। दादा भाई संकोच करने लगे। तब पू.श्री
गुरूजी बोले कि चारो ओर पर्वत श्रंखला है और तुम गिरिराज क्यों संकोच करते हो। चलो बैठो और
दादा भाई बैठ गये।
प.बच्छराज जी व्यास आये तो उन्होने ही इनका नाम बदलकर दादा भाई नाम रखा, क्यों कि
ये जिम्नास्टिक और व्यायाम करते थे, इस कारण यह नाम रखा।
कभी गुप्तचर अपनी शाखा की, अपने अधिकारियों को जाकर रिर्पोट करते थे तो उनसे पूछा
जाता था कि कौन बोल रहा था-तब कहा जाता था कि दादा भाई, तब उन्हे कहा जाता था कि
दादा भाई नाम थोडे ही है। उनका असली नाम क्या है, यह पता करो।
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समाज में विरोध नही था, सर्वत्र अनुकूलता थी। हिन्दू संगठित हो, ऐसी सबकी प्रबल ईच्छा
थी। जाति पाति का भी भेद नही था। घरवालो का विरोध जरूर रहता था। एक बार जयपुर नगर का
विजयादशमी का उत्सव था, उसमें लाला हरिचन्द जी (महानगर संघचालक, दिल्ली) आये हुए थे।
लाला जी बहुत पैसे वाले भी थे। कार्यकर्Ÿााओं से जब परिचय कर रहे थे तो वहाँ उपस्थित लोगो को
भी बुला लिया। जब लोगो से परिचय हो रहा था तब मेरे पिताजी का नम्बर आया, उन्होने जब
परिचय कराया तो लाला जी ने उनके चरण छू लिए। उस घटना से पिताजी में एकदम से परिवर्तन
आ गया। फिर पिताजी ने संघ में जाने का कभी विरोध नही किया।
अजमेर से श्री लिमये जी (प्रचारक) जब आते थे तो वह दादा भाई को समाचार कर देते थे
कि फंला ट्रेन से आ रहा हूँ। ये लेने पहुँच जाता थे। वे हमेशा ऐसा ही किया करते थे। इतनी
तत्परता और जागरूकता उनमें थी। श्रद्धा बहुत थी।
प्रत्येक वर्ष 2-3 बार नगर के लोगो का कार्यक्रम होता था। एक बार आघात-प्रत्याघात ऐसा
प्रयोग किया गया। उसमें एक के ऊपर एक आघात हुए। एक बार तो दादा भाई मृत प्रायः हो गया
थे। सबको बड़ा वैसा लगा। खेलो में भी बड़े जोश से खेलते थे। उसमें दया आदि नही होती थी।
प्रान्तीय बैठक थी। उसमें पू.श्री गुरूजी आये थे। दादा भाई कार्यवाह थे। रात को गणवेश
पहनकर सोते थे। पू.श्री गुरूजी ने सबको कहा कि संघ के विचार पढ़ा करो, विचार अन्दर आयेंगे।
उस समय साहित्य में पू.डॉक्टर जी का ही साहित्य था। उन्होने कहा कि मं ै 2-4 पन्ने रोज पढ़ता
हूँ। स्वाध्याय नित्य होना चाहिए। स्वाध्याय से ही आचरण में संस्कार आते है। श्री गुरूजी तो ऐसा
कहकर चले गये।
1975 में आपातकाल के समय दादा भाई पुलिस वालों की पकड़ में नहीं आये।
1992 के बन्दी काल में दादा भाई नहरौली थाने में 15 दिन तक जेल में रहें। प्रातः से लेकर
रात्रि सोने तक सारा कार्यक्रम करते थे। यह एक तरीके का प्रशिक्षण था। छाता के विद्यायक आये
और वहाँ उपस्थित जेल अधिकारियों से कहा कि ये हमारे मेहमान है। इनको कुछ हुआ तो तुम्हारी
जेल को जला देंगे। तब जेल अधिकारियों ने कहा कि ऐसा कुछ भी नही होगा।
1952-1953 में जनसंघ की अखिल भारतीय बैठक के समय पैसा एकत्र करने की जिम्मेदारी
दादा भाई के ऊपर थी। दादा भाई और श्री रामराज जी व्यास पैसा एकत्र करने के लिए आसाम में
जोराहट, गोहाटी और दुबडी गये। 15 से 20 रूपये के लगभग एकत्र हो पाया।
संघ का काम शुरू हुआ तो उस समय पण्डित बच्छराज जी व्यास आये, आते ही उन्होने
दादा भाई सहित सबको बैठाया और कहा कि आज से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम मत बोलना।
सत्संग यह नाम बोलना। कुछ कार्यकर्Ÿााओं के नामो का भी परिवर्तन किया। मुझे (यानि प.बच्छराज
जी) भैया कहना, श्री राधाकृष्ण जी का नाम चाचाजी रखा, श्री गिरिराज जी शास्त्री का नाम दादा
भाई रखा, द्वारका प्रसाद जी का नाम-बाबू भैया रखा। एक का नाम राजा भैया रखा। शिव कुमार जी
तिवाड़ी का नाम ताऊ जी रखा।
उसी समय प.पू.श्री गुरूजी का प्रवास भी रहा। श्री नत्थीराम जी के बाग (जयपुर) में ठहराया
था। एक एकत्रीकरण भी रखा था। पू.श्री गुरूजी ने अपने भाषण में कहा कि अपना जो यह सत्संग
चलता है, उसमें अनुशासन का पालन करना चाहिए, समय से आना चाहिए।
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दादा भाई का विभिन्न दायित्व निभाते हुए जीवन में सहज ही बहुत बडे-2 लोगो से सम्पर्क
आया। एक बार जब वो भारती पत्रिका के लिए कलकŸाा गये थे। उस समय वहाँ रामकृष्ण मिशन के
उस समय के जो मंत्री रहे उनका भाषण था। दादा भाई भी भाषण सुनने गया थे, भाषण समाप्त होने
के बाद जब वो आये तो दादा भाई ने उनके चरण स्पर्श किए। ऐसा लगा कि उनके अन्दर से
बिजली प्रवेश करी हों जब भी दादा भाई उधर जाता थे तो उनसे अवश्य मिलता थे। उन्होने दादा
भाई से कहा कि श्री गिरिराज जी एक ही देवता की पूजा करना, अनेक की पूजा ठीक नही है।
माधवानन्द जी महाराज एक दो साल में जयपुर आते रहते थे। उनसे भी जब दादा भाई मिले
और पता लगा कि वो भारती पत्रिका निकाल रहे है, तो वह बडे प्रसन्न हुए। उन्होने अपने ट्रस्ट को
भी आजीवन सदस्य बना दिया।
श्रद्धान्जलि
स्वर्गीय श्री गिरिराज जी शास्त्री (दादा भाई) की पार्थिव देह प्रातः 8.00 बजे अपेक्स अस्पताल
से सिंह द्वार स्थित ‘‘भारती भवन’’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कार्यालय पर लाई गई। जहाँ सैंकड़ों की
संख्या में उपस्थित स्वयंसेवक एवं गणमान्य नागरिकों ने पूज्य दादा भाई की पार्थिव देह पर श्रद्धा
सुमन अर्पित किए।
आज दिन भर राजस्थान भर के राजनैतिक, धार्मिक एवं संस्कृत क्षेत्र के प्रमुख लोगों का
श्रद्धांजलि व्यक्त करने का क्रम बना रहा, जिनमें घनश्याम तिवाड़ी, गुलाबचन्द कटारिया, अरूण
चतुर्वेदी, कालीचरण सर्राफ, श्रीमति सुमन शर्मा, मोहनलाल गुप्ता, पूर्व मंत्री भंवरलाल शर्मा, सुरेन्द
पारीक, वीरूसिंह राठौड़, रामलाल शर्मा, अशोक परनामी, गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष राजेन्द्र सिंह
राजपुरोहित, विश्व हिन्दू परिषद के ठाकुर जयबहादुर सिंह, पंजाबी महासभा के रवि नैय्यर, संस्कृत
अकादमी के पूर्व अध्यक्ष शंकर प्रसाद शुक्ल, धार्मिक क्षेत्र के संत निरंजन नाथ अवधूत, भा.म.स. के
जयन्तीलाल, हजारी लाल गुर्जर, शिक्षक संघ (राष्ट्रीय) प्रहलाद शर्मा, पूर्व कुलपति पुरूषोŸाम लाल
चतुर्वेदी, पूर्व माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. विमल प्रसाद अग्रवाल, क्रीड़ा भारती के प्रान्तीय
सचिव रामानन्द चौधरी, हिमालय परिवार के महेन्द्र कुमार भारती, संस्कार भारती के रामेश्वर मूर्तिकार,
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र सम्पर्क प्रमुख राजेन्द्र कुमार, सह सम्पर्क प्रमुख प्रकाश चन्द्र, सेवा
प्रमुख मूलचन्द सोनी, क्षेत्र प्रचार प्रमुख संजय कुमार प्रमुख थे।
पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमति वसुंधरा राजे की ओर से पूर्व मंत्री डॉ. दिगम्बर सिंह ने दादा भाई की
पार्थिव देह को पूष्प चक्र अर्पित किया।
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विजय बहुगुणा,कांग्रेस के सिर्फ 10 विधायक,22 विधायक नदारद रहे..

- अरविन्द सिसोदिया 
कुल मिला कर एक बार फिर से सामने आगया कांग्रेस ने वास्तविक योग्यता को दफना कर चमचा वाद को चुना ..यही वह बिंदु हे जिसके कारण देश पर राज करने वाली कांग्रेस मात्र कुछ राज्यों में सिमट गई और १९८४ के बाद से आज तक हुए लोकसभा चुनावों में पूर्ण बहुमत में नहीं आई...कांग्रेस से बहार होकर सरकारें बनाने वाले नेताओं की एक लंम्बी श्रंखला है ...कांग्रेस पहले एक वंसा की और फिर चमचावाद की पार्टी के रमें उभरी है 

क्या बहुगुणा की सरकार अल्पमत में है? 
dainikbhaskar.com 13/03/12
 http://www.bhaskar.com/article
            नई दिल्ली.  उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के तौर पर विजय बहुगुणा ने देहरादून के परेड ग्राउंड में मंगलवार शाम को शपथ ले ली। राज्यपाल मारग्रेट अल्वा ने उन्हें शपथ दिलाई। लेकिन इस दौरान कांग्रेस के बीच फूट साफ नज़र आई। शपथ ग्रहण समारोह में कई कुर्सियां खाली देखी गईं और कांग्रेस के सिर्फ 10 विधायक ही समारोह के दौरान मौजूद रहे। उत्तराखंड विधानसभा में कांग्रेस के 32 विधायक हैं। शपथ ग्रहण समारोह में कांग्रेस के 22 विधायक नदारद रहे। बताया जा रहा है कि देहरादून में जब शपथ ग्रहण समारोह चल रहा था तब कांग्रेस के 17 विधायक हरीश रावत के दिल्ली स्थित आवास पर मौजूद थे।
हरीश रावत ने अपने ताजा़ बयान में कहा है कि वे आलाकमान को अपनी ताकत दिखाना चाहते हैं। उनका कहना है कि वे संगठन में रहकर काम करेंगे। रावत ने यह भी कहा है कि उत्तराखंड के नए मुख्यमंत्री का चुनाव करने गए केंद्रीय पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट गलत थी। हरीश के मुताबिक उनके समर्थन में आए विधायकों से यह बात साबित होती है कि पर्यवेक्षकों ने केंद्रीय नेतृत्व को गलत रिपोर्ट सौंपी थी। रावत ने कहा कि उन्हें इस बात का इंतजार है कि अब केंद्रीय नेतृत्व पर्यवेक्षकों पर क्या कार्रवाई करता है। कांग्रेस के सांसद और हरीश रावत के समर्थक प्रदीप टम्टा ने कहा है कि विजय बहुगुणा विधानसभा में अपना बहुमत साबित नहीं कर पाएंगे। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का उदाहरण दिया, जो लोकसभा में अपना बहुमत साबित नहीं कर पाए थे।
वहीं, पार्टी के एक अन्य प्रमुख नेता हरक सिंह रावत का भी विजय बहुगुणा को लेकर असंतोष सामने आ गया है। रावत ने मंगलवार शाम को मीडिया से बातचीत में कहा कि अगर बहुगुणा अपना बहुमत साबित कर देंगे तो वह बहुगुणा को नेता मान लेंगे। इससे पहले मंगलवार को दिन में हरक सिंह रावत ने खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बताते हुए साफ कर दिया था कि विजय बहुगुणा के नेतृत्व में बनने वाली सरकार ज़्यादा दिनों तक कायम नहीं रहेगी। उन्होंने देहरादून में मीडिया से बातचीत में कहा कि यह सरकार भानुमति का पिटारा साबित होगी।
इससे पहले मंगलवार की दोपहर में कांग्रेस ने विजय बहुगुणा को लेकर अपने तेवर कड़े कर लिए थे। कांग्रेस कोर ग्रुप ने तमाम विरोधों को दरकिनार करते हुए विजय बहुगुणा के नाम पर अंतिम मुहर लगा दी थी।
लेकिन बहुगुणा को बतौर मुख्यमंत्री चुनना कांग्रेस के लिए बड़ा 'सिरदर्द' साबित हो रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा बहुगुणा को बतौर मुख्यमंत्री चुने जाने से सबसे ज़्यादा नाराज हरीश रावत हैं। हरीश रावत पार्टी आलाकमान से इतने नाराज बताए जा रहे हैं कि उन्होंने बीजेपी से बात करनी शुरू कर दी है। मीडिया में आ रही खबरों के मुताबिक हरीश रावत ने सोमवार रात बीजेपी के अध्यक्ष नितिन गडकरी से गैर कांग्रेसी सरकार बनाने के लिए मदद मांगी है। बताया जा रहा है कि गडकरी ने हरीश को हरी झंडी दे दी है।
इससे पहले रावत ने नाराजगी में केंद्रीय संसदीय कार्य राज्य मंत्री के पद से इस्‍तीफा भी दे दिया। उन्‍होंने यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि वे पार्टी के आम कार्यकर्ता के तौर पर काम करना चाहते हैं। वह सोमवार सुबह संसदीय कार्य मंत्रालय की बैठक से भी गैरहाजिर रहे। इससे पहले उन्‍होंने कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी को एक चिट्ठी भी लिखी। इसमें उन्‍होंने अपने समर्थकों की भावनाओं को तरजीह दिए जाने की मांग की। उनके समर्थक सोमवार रात से ही प्रदर्शन कर रहे थे और सोनिया के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे।
रावत इतने नाराज थे कि उन्‍होंने कांग्रेस अध्‍यक्ष के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल का फोन तक नहीं उठाया। हालात की नजाकत को भांपते हुए सोनिया ने विजय बहुगुणा और हरीश रावत को अपने घर पर आने का संदेशा भिजवा दिया।
हरीश रावत द्वारा इस्‍तीफा प्रधानमंत्री को भेजने और हरक सिंह रावत के बगावती तेवर सामने आने के बाद कांग्रेस में हड़कंप मच गया। पार्टी आलाकमान ने बहुगुणा, हरीश रावत के अलावा सतपाल महाराज, यशपाल आर्य और हरक सिंह रावत को भी दिल्ली तलब किया है।
संभव है कि कांग्रेस आलाकमान किसी तरह रावत को समझा कर स्थिति शांत करने की फिराक में है। लेकिन भाजपा भी स्थिति का फायदा उठाने के लिए तैयार बैठी है। सूत्र बताते हैं कि रावत समर्थकों की मदद से सरकार बनाने की संभावना बनती है तो भाजपा इसे भुनाने से चूकेगी नहीं। भाजपा आलाकमान रावत से लगातार संपर्क बनाए हुए है।
कौन हैं विजय बहुगुणा
विजय बहुगुणा उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा के बेटे हैं। विजय टिहरी गढ़वाल लोकसभा सीट से संसद सदस्य हैं। वे 14वीं लोकसभा में भी सदस्य थे। रीता बहुगुणा जोशी विजय बहुगुणा की बहन हैं, जो खुद उत्तर प्रदेश कांग्रेस की प्रमुख नेता हैं। विजय बहुगुणा का जन्म इलाहाबाद में हुआ था। विजय बहुगुणा ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए और एलएलबी की पढ़ाई की थी। इसके बाद वे इलाहाबाद हाई कोर्ट में बतौर वकील प्रैक्टिस करने लगे थे। बाद में वे जज भी बने।



उत्तरा खंड में राजनैतिक धोखाधड़ी

- अरविन्द सिसोदिया 
उत्तरा खंड में विधान सभा चुनावों में जिन लोगों ने मेहनत की ..उन्हें कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने ठेंगा दिखाते हुए राहुल की करीबी रीता बहुगुणा के भाई विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री घोषित कर दिया है । जब की मुख्यमन्त्र पद के लिए स्वाभाविक दावेदारी हरीश रावत की बनती थी जिन्होनें विधानसभा चुनाव का नेतृत्व  किया है । उनके साथ यह राजनैतिक धोखाधड़ी  है ।


सांसद विजय बहुगुणा 


उत्तराखंड में शुरू हो गया विजय बहुगुणा का विरोध
Tue, 13 Mar २०१२
लिंक http://www.jagran.com/news/national-9006531.html
 नई दिल्ली। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पद के नाम पर सभी अटकलों को पीछे छोड़ते हुए पार्टी हाईकमान ने विजय बहुगुणा के नाम पर मुहर लगा दी। लेकिन इस फैसले के बाद ही पार्टी में बगावत के स्वर भी फूटने लगे हैं।
विजय बहुगुणा के नाम का खुलासा होने के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत के सर्मथकों में नाराजगी है। सोमवार देर रात रावत के समर्थकों ने एक मीटिंग कर आलाकमान के फैसले पर विरोध जताया। कांग्रेस आलाकामान की ओर से सोमवार को टिहरी से सांसद विजय बहुगुणा को उत्तराखंड का अगला मुख्यमंत्री घोषित किया गया है। इसे लेकर रावत के समर्थकों ने नारेबाजी की। उन्होंने जानना चाहा कि इस पद के लिए उनके नेता-रावत की उपेक्षा क्यों की गई।
इस दौरान उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और विजय बहुगुणा की बहन रीता बहुगुणा जोशी ने हरीश रावत से मुलाकात की। उत्तराखंड कांग्रेस के विधायकों ने दल की बैठक मुख्यमंत्री चुनने का जिम्मा पार्टी सुप्रीमो सोनिया गांधी पर छोड़ दिया था। उन्होंने प्रदेश के सभी कांग्रेसी सांसदों और विधायकों की राय लेने के बाद विजय बहुगुणा के नाम पर मुहर लगा दी।
हालांकि रीता बहुगुणा जोशी इस फैसले से काफी खुश हैं। उन्होंने कहा कि जिस सोच के साथ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उनके भाई को उत्तराखंड की कमान संभालने का जिम्मा सौंपा है वह उसपर पूरी तरह खरे उतरेंगे। उन्होंने कहा कि वह पिछले बीस वर्षो से उत्तराखंड के विकास में भागीदार रहे हैं।