शुक्रवार, 23 मार्च 2012

नवरात्र : 9 दिन, 9 देवी स्वरूपों की उपासना


नवरात्र : 9 दिन, 9 देवी
पं. केवल आनंद जोशी






नवरात्र के 9 दिन देवी के विभिन्न स्वरूपों की उपासना के लिए निर्धारित हैं। ये देवियां भक्तों की पूजा से प्रसन्न होकर उनकी कामनाएं पूर्ण करती हैं।

शैलपुत्री: पहले स्वरूप में मां पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में विराजमान हैं। नंदी नामक वृषभ पर सवार 'शैलपुत्री' के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प है। शैलराज हिमालय की कन्या होने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा गया। इन्हें समस्त वन्य जीव-जंतुओं की रक्षक माना जाता है। दुर्गम स्थलों पर स्थित बस्तियों में सबसे पहले शैलपुत्री के मंदिर की स्थापना इसीलिए की जाती है कि वह स्थान सुरक्षित रह सके।

उपासना मंत्र : वन्दे वांछितलाभाय चन्दार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।।

ब्रह्मचारिणी: दूसरी दुर्गा 'ब्रह्मचारिणी' को समस्त विद्याओं की ज्ञाता माना गया है। इनकी आराधना से अनंत फल की प्राप्ति और तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम जैसे गुणों की वृद्धि होती है। 'ब्रह्मचारिणी' का अर्थ हुआ, तप की चारिणी यानी तप का आचरण करने वाली। यह स्वरूप श्वेत वस्त्र पहने दाएं हाथ में अष्टदल की माला और बाएं हाथ में कमंडल लिए हुए सुशोभित है। कहा जाता है कि देवी ब्रह्मचारिणी अपने पूर्व जन्म में पार्वती स्वरूप में थीं। वह भगवान शिव को पाने के लिए 1000 साल तक सिर्फ फल खाकर रहीं और 3000 साल तक शिव की तपस्या सिर्फ पेड़ों से गिरी पत्तियां खाकर की। कड़ी तपस्या के कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी कहा गया।

उपासना मंत्र: दधाना कपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

चंद्रघंटा: शक्ति के रूप में विराजमान मां चंद्रघंटा मस्तक पर घंटे के आकार के चंद्रमा को धारण किए हुए हैं। देवी का यह तीसरा स्वरूप भक्तों का कल्याण करता है। इन्हें ज्ञान की देवी भी माना गया है। बाघ पर सवार मां चंद्रघंटा के चारों तरफ अद्भुत तेज है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। यह तीन नेत्रों और दस हाथों वाली हैं। इनके दस हाथों में कमल, धनुष-बाण, कमंडल, तलवार, त्रिशूल और गदा जैसे अस्त्र-शस्त्र हैं। कंठ में सफेद पुष्पों की माला और शीर्ष पर रत्नजडि़त मुकुट विराजमान हैं। यह साधकों को चिरायु, आरोग्य, सुखी और संपन्न होने का वरदान देती हैं। कहा जाता है कि यह हर समय दुष्टों के संहार के लिए तैयार रहती हैं और युद्ध से पहले उनके घंटे की आवाज ही राक्षसों को भयभीत करने के लिए काफी होती है।

उपासना मंत्र: पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते महयं चन्दघण्टेति विश्रुता।।

कुष्मांडा: चौथे स्वरूप में देवी कुष्मांडा भक्तों को रोग, शोक और विनाश से मुक्त करके आयु, यश, बल और बुद्धि प्रदान करती हैं। यह बाघ की सवारी करती हुईं अष्टभुजाधारी, मस्तक पर रत्नजडि़त स्वर्ण मुकुट पहने उज्जवल स्वरूप वाली दुर्गा हैं। इन्होंने अपने हाथों में कमंडल, कलश, कमल, सुदर्शन चक्र, गदा, धनुष, बाण और अक्षमाला धारण किए हैं। अपनी मंद मुस्कान हंसी से ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इनका नाम कुष्मांडा पड़ा। कहा जाता है कि जब दुनिया नहीं थी, तो चारों तरफ सिर्फ अंधकार था। ऐसे में देवी ने अपनी हल्की-सी हंसी से ब्रह्मांड की उत्पत्ति की। वह सूरज के घेरे में रहती हैं। सिर्फ उन्हीं के अंदर इतनी शक्ति है, जो सूरज की तपिश को सहन कर सकें। मान्यता है कि वह ही जीवन की शक्ति प्रदान करती हैं।

उपासना मंत्र: सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कुष्मांडा शुभदास्तुमे।।

स्कन्दमाता: भगवान स्कन्द (कार्तिकेय) की माता होने के कारण इस पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाता के नाम से जाना जाता है। यह कमल के आसन पर विराजमान हैं, इसलिए इन्हें पद्मासन देवी भी कहा जाता है। इनका वाहन भी सिंह है। इन्हें कल्याणकारी शक्ति की अधिष्ठात्री कहा जाता है। यह दोनों हाथों में कमलदल लिए हुए और एक हाथ से अपनी गोद में ब्रह्मस्वरूप सनतकुमार को थामे हुए हैं। स्कन्द माता की गोद में उन्हीं का सूक्ष्म रूप छह सिर वाली देवी का है। अत: इनकी पूजा-अर्चना में मिट्टी की 6 मूर्तियां सजाना जरूरी माना गया हैं।

उपासना मंत्र: सिंहासानगता नितयं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।।

कात्यायनी: यह दुर्गा देवताओं और ऋषियों के कार्यों को सिद्ध करने लिए महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट हुईं। उनकी पुत्री होने के कारण इनका नाम कात्यायनी पड़ा। देवी कात्यायनी दानवों तथा पापी जीवियों का नाश करने वाली हैं। वैदिक युग में ये ऋषि-मुनियों को कष्ट देने वाले दानवों को अपने तेज से ही नष्ट कर देती थीं। यह सिंह पर सवार, चार भुजाओं वाली और सुसज्जित आभा मंडल वाली देवी हैं। इनके बाएं हाथ में कमल और तलवार व दाएं हाथ में स्वस्तिक और आशीर्वाद की मुद्रा है।

उपासना मंत्र: चंद्रहासोज्जवलकरा शाइलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी।।

कालरात्रि: सातवां स्वरूप देखने में भयानक है, लेकिन सदैव शुभ फल देने वाला होता है। इन्हें 'शुभंकरी' भी कहा जाता है। 'कालरात्रि' केवल शत्रु एवं दुष्टों का संहार करती हैं। यह काले रंग-रूप वाली, केशों को फैलाकर रखने वाली और चार भुजाओं वाली दुर्गा हैं। यह वर्ण और वेश में अर्द्धनारीश्वर शिव की तांडव मुद्रा में नजर आती हैं। इनकी आंखों से अग्नि की वर्षा होती है। एक हाथ से शत्रुओं की गर्दन पकड़कर दूसरे हाथ में खड्ग-तलवार से उनका नाश करने वाली कालरात्रि विकट रूप में विराजमान हैं। इनकी सवारी गधा है, जो समस्त जीव-जंतुओं में सबसे अधिक परिश्रमी माना गया है।

उपासना मंत्रः एक वेधी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता। लम्बोष्ठी कणिर्काकणी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।।
वामपदोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा। वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी।।

महागौरी: आठवें दिन महागौरी की उपासना की जाती है। इससे सभी पाप धुल जाते हैं। देवी ने कठिन तपस्या करके गौर वर्ण प्राप्त किया था। उत्पत्ति के समय 8 वर्ष की आयु की होने के कारण नवरात्र के आठवें दिन इनकी पूजा की जाती है। भक्तों के लिए यह अन्नपूर्णा स्वरूप हैं, इसलिए अष्टमी के दिन कन्याओं के पूजन का विधान है। यह धन, वैभव और सुख-शांति की अधिष्ठात्री देवी हैं। इनका स्वरूप उज्जवल, कोमल, श्वेतवर्णा तथा श्वेत वस्त्रधारी है। यह एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू लिए हुए हैं। गायन और संगीत से प्रसन्न होने वाली 'महागौरी' सफेद वृषभ यानि बैल पर सवार हैं।

उपासना मंत्र: श्वेते वृषे समरूढ़ा श्वेताम्बराधरा शुचि:। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।

सिद्धिदात्री: नवीं शक्ति 'सिद्धिदात्री' सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाली हैं। इनकी उपासना से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। कमल के आसन पर विराजमान देवी हाथों में कमल, शंख, गदा, सुदर्शन चक्र धारण किए हुए हैं। भक्त इनकी पूजा से यश, बल और धन की प्राप्ति करते हैं। सिद्धिदात्री की पूजा के लिए नवाहन का प्रसाद, नवरस युक्त भोजन तथा नौ प्रकार के फल-फूल आदि का अर्पण करना चाहिए। इस तरह नवरात्र का समापन करने वाले भक्तों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। सिद्धिदात्री देवी सरस्वती का भी स्वरूप हैं, जो श्वेत वस्त्रालंकार से युक्त महाज्ञान और मधुर स्वर से भक्तों को सम्मोहित करती हैं।

उपासना मंत्र : सिद्धगंधर्वयक्षाद्यैरसुरैररमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।

अंग्रेज ए.ओ. ह्यूम : भारतीयों की चिन्ता क्यों ?


ह्यूम को भारतीयों के हित की ऐसी क्या चिन्ता हो गई जो उसने कांग्रेस बनायी ?


आप जानते ही होंगे कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना किसी भारतीय ने नहीं बल्कि एक अंग्रेज ए.ओ. (अलेन ऑक्टेवियन) ह्यूम ने सन् 1885 में, ब्रिटिश शासन की अनुमति से, किया था। कांग्रेस एक राजनैतिक पार्टी थी और इसका उद्देश्य था अंग्रेजी शासन व्यवस्था में भारतीयों की भागीदारी दिलाना। ब्रिटिश पार्लियामेंट में विरोधी पार्टी की हैसियत से काम करना। अब प्रश्नयह उठता है कि ह्यूम ,सिविल सर्विस से अवकाश प्राप्त अफसर था, को ही भारतीयों के राजनैतिक हित की चिन्ता क्यों जाग गई?
सन् 1885 से पहले अंग्रेज अपनी शासन व्यवस्था में भारतीयों का जरा भी दखलअंदाजी पसंद नहीं करते थे। तो फिर एक बार फिर प्रश्न उठता है कि आखिर क्यों दी ब्रिटिशशासन ने एक भारतीय राजनैतिक पार्टी बनाने की अनुमति?
यदि उपरोक्त दोनों प्रश्नों का उत्तर खोजें तो स्पष्ट हो जाता है कि भारतीयों को अपनी राजनीति में स्थान देना अंग्रेजों की मजबूरी बन गई थी। सन् 1857 की क्रान्ति ने अंग्रेजों की आँखें खोल दी थी।अपने ऊपर आए इतनी बड़ी आफत का विश्लेषण करने पर उन्हें समझ में आया कि यह गुलामी से क्षुब्ध जनता का बढ़ता हुआ आक्रोश ही था जो आफत बन कर उन पर टूटा था। यह ठीक उसी प्रकार था जैसे कि किसी गुब्बारे का अधिक हवा भरे जाने के कारण फूट जाना।
समझ में आ जाने पर अंग्रेजों ने इस आफत से बचाव के लिए तरीका निकाला और वह तरीका था सेफ्टी वाल्व्ह का। जैसे प्रेसर कूकर में प्रेसर बढ़ जाने पर सेफ्टी वाल्व्ह के रास्ते निकल जाता है और कूकर को हानि नहीं होती वैसे ही गुलाम भारतीयों के आक्रोश को सेफ्टी वाल्व्ह के रास्ते बाहर निकालने का सेफ्टी वाल्व्ह बनाया अंग्रेजों ने कांग्रेस के रूप में। अंग्रेजों ने सोचा कि गुलाम भारतीयों के इस आक्रोश को कम करने के लिए उनकी बातों को शासन समक्ष रखने देने में ही भलाई है। सीधी सी बात है कि यदि किसी की बात को कोई सुने ही नहीं तो उसका आक्रोश बढ़ते जाता है किन्तु उसकी बात को सिर्फ यदि सुन लिया जाए तो उसका आधा आक्रोश यूँ ही कम हो जाता है। यही सोचकर ब्रिटिश शासन ने भारतीयों की समस्याओं को शासन तक पहुँचने देने का निश्चय किया। और इसके लिए उन्हें भारतीयों को एक पार्टी बना कर राजनैतिक अधिकार देना जरूरी था। एक ऐसी संस्था का होना जरूरी था जो कि ब्रिटिश पार्लियामेंट में भारतीयों का पक्ष रख सके। याने कि भारतीयों की एक राजनैतिक पार्टी बनाना अंग्रेजों की मजबूरी थी।
किसी भारतीय को एक राजनैतिक पार्टी का गठन करने का गौरव भी नहीं देना चाहते थे वे अंग्रेज। और इसीलिए बड़े ही चालाकी के साथ उन्होंने ह्यूम को सिखा पढ़ा कर भेज दिया भारतीयों के पास एक राजनैतिक पार्टी बनाने का ढ़ोँग करने के लिए। इसका एक बड़ा फायदा उन्हें यह भी मिला कि एक अंग्रेज हम भारतीयों के नजर में महान बन गया, हम भारतीय स्वयं को अंग्रेजों का एहसानमंद भी समझने लगे। ये था अंग्रेजों का एक तीर से दो शिकार!
इस तरह से कांग्रेस की स्थापना हो गई और अंग्रेजों को गुलाम भारतीयों के आक्रोश को निकालने के लिए एक सेफ्टी वाल्व्ह मिल गया।
आज भी काग्रेस की चोटी पर विदेशी ही बैढ़े हैँ जो की A O HUME से भी बड़ा ढ़ोँग रच कर बैढ़े हैँ
हम उनकी गुलामी कर रहैँ उन्हैँ महान बता रहैँ
उस वक़्त के वायसराय लोर्ड डफरिन के निर्देशन, मार्गदर्शन और सलाह पर ही AO HUME ने इस संगठन को जन्म दिया था, ताकि उस समय भारतीय जनता में पनपते बढ़ते आक्रोश और असंतोष को हिंसा के रूप मों फूटनेसे रोका जा सके. मतलब एक हिंसक क्रांति दस्तक दे रही थी, जो की कांग्रेस की स्थापना के कारण टल गयी. Young India में १९१६ में प्रकाशित अपने लेख में गरमपंथी नेता लाला लाजपत राय ने सुरक्षा वाल्व की इस परिकल्पना का इस्तेमाल कांग्रेस के नरमपंथी पक्ष पर प्रहार करने के लिए किया था. और कांग्रेस लोर्ड डफरिन के दिमाग की उपज है यह कहा था. और यह भी कहा था की कांग्रेस अपने आदर्श के प्रति इमानदार नहीं है, और आज भी नहीं है......
काश उस समय काग्रेस ना बनायी जाती तो भारतीयोँ का आक्रोश अंग्रेजोँ को कबका खदेड़ देता
और आज हम सेफ्टी वाल्व की मानसिक गुलामी ना कर रहे होते

काकोरी काण्ड : सजाये-मौत : अशफाक


अशफ़ाक उल्ला ख़ाँ वारसी हसरत

यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है कि काकोरी काण्ड का फैसला ६ अप्रैल १९२६ को सुना दिया गया था। अशफाक उल्ला खाँ और शचीन्द्रनाथ बख्शी को पुलिस बहुत बाद में गिरफ्तार कर पायी थी अत: स्पेशल सेशन जज जे०आर०डब्लू० बैनेट[3] की अदालत में ७ दिसम्बर १९२६ को एक पूरक मुकदमा दायर किया गया। मुकदमे के मजिस्ट्रेट ऐनुद्दीन ने अशफाक को सलाह दी कि वे किसी मुस्लिम वकील को अपने केस के लिये नियुक्त करें किन्तु अशफाक ने जिद करके कृपाशंकर हजेला को अपना वकील चुना। इस पर एक दिन सी०आई०डी० के पुलिस कप्तान खानबहादुर तसद्दुक हुसैन ने जेल में जाकर अशफाक से मिले और उन्हें फाँसी की सजा से बचने के लिये सरकारी गवाह बनने की सलाह दी। जब अशफाक ने उनकी सलाह को तबज्जो नहीं दी तो उन्होंने एकान्त में जाकर अशफाक को समझाया-

"देखो अशफाक भाई! तुम भी मुस्लिम हो और अल्लाह के फजल से मैं भी एक मुस्लिम हूँ इस बास्ते तुम्हें आगाह कर रहा हूँ। ये राम प्रसाद बिस्मिल बगैरा सारे लोग हिन्दू हैं। ये यहाँ हिन्दू सल्तनत कायम करना चाहते हैं। तुम कहाँ इन काफिरों के चक्कर में आकर अपनी जिन्दगी जाया करने की जिद पर तुले हुए हो। मैं तुम्हें आखिरी बार समझाता हूँ, मियाँ! मान जाओ; फायदे में रहोगे।"
इतना सुनते ही अशफाक की त्योरियाँ चढ गयीं और वे गुस्से में डाँटकर बोले-

"खबरदार! जुबान सम्हाल कर बात कीजिये। पण्डित जी (राम प्रसाद बिस्मिल) को आपसे ज्यादा मैं जानता हूँ। उनका मकसद यह बिल्कुल नहीं है। और अगर हो भी तो हिन्दू राज्य तुम्हारे इस अंग्रेजी राज्य से बेहतर ही होगा। आपने उन्हें काफिर कहा इसके लिये मैं आपसे यही दरख्वास्त करूँगा कि मेहरबानी करके आप अभी इसी वक्त यहाँ से तशरीफ ले जायें वरना मेरे ऊपर दफा ३०२ (कत्ल) का एक केस और कायम हो जायेगा।"
इतना सुनते ही बेचारे कप्तान साहब (तसद्दुक हुसैन) की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी और वे अपना सा मुँह लेकर वहाँ से चुपचाप खिसक लिये। बहरहाल १३ जुलाई १९२७ को पूरक मुकदमे (सप्लीमेण्ट्री केस) का फैसला सुना दिया गया - दफा १२० (बी) व १२१ (ए) के अन्तर्गत उम्र-कैद और ३९६ के अन्तर्गत सजाये-मौत अर्थात् फाँसीका दण्ड।

भारतीय नव-वर्ष दिन - चैत्र शुक्ला प्रतिपदा की महिमा







सन २०१४ में ३१ मार्च  को है भारतीय नव संवत्सर विक्रम २०७१
! नए वर्ष की बधाइयाँ !!
भारतीय नव-वर्ष दिन - चैत्र शुक्ला प्रतिपदा की महिमा ध्यान से पढ़ने की कृपा कीजिये -
१- यह भारतीय काल गणना का प्रथम दिन है !
भारतीय काल गणना संसार की सब से प्राचीन काल गणना है जो कि पूर्णतः वैज्ञानिक भी है !
इसलिए भारतीय नव वर्ष -
हमें स्वतन्त्र हिन्दुस्थान में अपने गौरव पूर्ण स्वत्व का स्मरण दिलाता है !
जब कि '' अंगरेजी न्यू इयर '' पूर्णतः अवैज्ञानिक भी है और अपनी '' गुलामी '' को भी दर्शाता है !
२- यह सृष्टि के प्रारम्भ का दिन है ! ब्रह्मा जी ने इसी दिन से सृष्टि रचना प्रारम्भ की थी !
यह सृष्टि संवत का प्रथम दिन है
इसलिए यह सारे ससार का प्रथम दिन है, चाहे कोई माने या ना माने !
वैसे भी जिनको बाद में काल गणना की सूझ आयी और जो काल गणना आज तक भी अवैज्ञानिक है,
उनके '' न्यू इयर '' को महत्व देना कोई बुद्धिमानी नहीं है !
हमारा अपना नव वर्ष इसलिए भी सही है कि हमारी यह सृष्टि संवत की गणना पृथ्वी की आयु की वैज्ञानिक गणना से मेल खाती है !
३- महान दिग्विजयी राजा विक्रमादित्य ने भी इसी दिन से नया संवत प्रारम्भ किया, यह इस दिन की महत्ता भी बताता है और राजा विक्रमादित्य का अपने राष्ट्र के गौरव के प्रति अपना समर्पण भी दर्शाता है !
हम भी विक्रमादित्य के प्रति अपनी श्रद्धा को व्यक्त करने के लिए इस सृष्टि संवत को ही '' विक्रम संवत '' कहते हैं !
४- यह दिन दिग्विजयी राजा विक्रमादित्य की शकों पर विजय का स्मरण दिलाता है और ईस्वी सन का '' न्यू इयर '' पराधीनता का !
५- अन्य किसी गणना के प्रथम दिन को नव वर्ष मानना अज्ञानता का द्योतक है
क्योंकि
हिजरी और ईस्वी वर्ष गणना स्थूल, अपूर्ण और अल्प वैज्ञानिक है, ----
हिजरी गणना केवल चन्द्रमा के आधार पर और ईस्वी गणना केवल सूर्य के आधार पर की जाती है,
जब कि भारतीय गणना सूर्य, चन्द्र, और नक्षत्रों के आधार पर की जाती है,
इसलिए भारतीय काल गणना पद्धति सूक्ष्म, सम्पूर्ण, शुद्ध वैज्ञानिक और पूर्ण प्राकृतिक है ! ,
६- भारतीय काल गणना के मासों के नाम नक्षत्राधारित हैं ! किसी मास का नाम चैत्र इसलिए है कि इस मास की पूर्णिमा को चन्द्रमा चित्रा नक्षत्र में होता है, वैशाख में विशाखा नक्षत्र में, ज्येष्ठ में ज्येष्ठा नक्षत्र में, आषाढ़ में उतराषाढ़ा नक्षत्र में, आदि आदि
दूसरी और ईस्वी महीनों के नाम तो बहुत हास्यास्पद हैं -----
जिस महीने सेप्टेम्बर का अर्थ सातवाँ होता है वह नवां है,
आठवां अर्थ वाला ओक्टोम्बर दसवां महीना है,
नवां अर्थ वाला नवम्बर ग्यारहवां महीना है
और दसवां अर्थ वाला दिसंबर बारहवां महीना है
७- सब जानते हैं कि अभी कुछ शताब्दी पूर्व तक अंग्रेजी वर्ष दस महीनों का होता था,
भारत से संपर्क आने पर भूल सुधार की कि बारह महीनों का वर्ष बनाया,
किन्तु दो नए महीने जोड़ते समय वे फिर भूल कर गए ---
यदि उनको ग्यारहवें और बारहवें स्थान पर रखते तो उनकी ही भाषा उनकी फजीहत तो न करती !
८- इसलिए -
'' एक जनवरी को नव वर्ष मनाना मूर्खता है ''
क्योंकि उस दिन कोई नयी बात नहीं हुई थी, न तो इतिहास में और न प्रकृति में !
जब कि
'' चैत्र शुक्ला प्रतिपदा ''
देव निर्मित है,
शुद्ध रूप से प्राकृतिक व ऐतिहासिक नव वर्ष पर्व का दिन है !
यह हम भारतीयों की गौरव गाथा कह रहा है !