शनिवार, 24 मार्च 2012

भावी वर के लिए,गणगौर पूजा ....


Khushboo

म्हाने पूजन द्यो गणगौर
परंपराएं हमें स्पंदित करती हैं हमारे वजूद को पुख्ता करती हैं... राजस्थान केवल रेखाओं में बंटा जमीन का टुकड़ा भर नहीं है, बल्कि हमारी अमीर विरासत का हिस्सा है। यहां परपंराएं अब भी सांसें लेती हैं। ऎसी ही एक रवायत आज के दिन की भी है। आज गणगौर है। शिव-पार्वती की जोडे से पूजा का दिन। मनचाहा पति पाने के लिए व्रत रखने का दिन। राजस्थानी परपंराओं को कलमबद्ध करने वाली पद्मश्री लक्ष्मीकुमारी चूंडावत की कलम से सवारी गणगौर की...
पुरूष वर्ग तो धूलेरी के दिन मस्त हुआ गली-गली में नाचता फिरता है और स्त्रीवर्ग समाज के आगे तो यह धूलेरी नए-नए त्योहारों की श्ृंखला लिए आती है। बड़े सवेरे ही होली की राख को गाती-जाती çस्त्रयां अपने घर लाती हैं। मिट्टी मिलाकर उससे सोलह पिंडियां बनाती हैं, शंकर-पार्वती बनाकर उनकी पूजा करना प्रारम्भ कर देती हैं। सोलह दिन तक बराबर इनकी पूजा की जाती है। कुंआरी कन्याएं इनकी नियमित रूप से पूजा करती हैं। इस पूजा के पीछे यह भावना रहती है कि शंकर उन्हें अपना मनचाहा वर देंगे। जिस प्रकार पार्वती को उसकी इच्छानुसार वर मिला वैसा ही उन्हें प्राप्त होगा। किसी स्त्री का पति अच्छा होता है तो çस्त्रयां आपस में कहती हैं तू ने ईसर जी को चित्तमन से पूजा है तो तुझे ऎसा पति मिला। पूजा करते समय कन्याएं गीत गा-गाकर ईसर गौरी से मनाचाहा वर देने की प्रार्थना करती हैं।

मैड़ी बैठ्यो मद पीवे लीली के रौ असवार
खांगी बांधे पागड़ी ए चाले राठौड़ी चाल
कड़ मोड़े घोड़े चढे ए चाल निरखतो जाए 
ओ चर देई माता गोरल ए म्हें थां ने पूजन आय

कन्याएं दस-दस बीस-बीस इकट्ठी हो पूजा के लिए फूल और दूब लेने गाती हुई जंगल में, बाग में जाती हैं। फूल लेकर लौटती हैं तो बीकानेर प्रदेश का प्रभात गेरो जी फूल गुलाब रौ की ध्वनि से गूंज उठता है। जोधपुर राज्य में लोटिया लेने जाती हैं। कन्याएं फूल लाने जाती हैं अपने को खूब सजाकर। सिर पर कलात्मक पीतल के पात्र रखती हैं। एक ऊपर एक करके सात पात्र चूड़ा उतार ढंग से सिर पर रखती हैं। ऊपर वाले पात्र में फूलों को कलापूर्ण ढंग से सजा देती हैं। कन्याओं का झुंंड धीरे-धीरे गजगति से लोटिए लिए गाता हुआ आता है। बड़ा आल्हादपूर्ण एंव सुंदर दृश्य होता है।
जोधपुर के लोटिए बड़े प्रसिद्ध होते हैं। गणगौर पर तो जोधपुर में लोटियों का मेला लगता है वह वर्णनातीत है। वस्त्राभूषणों से सुसज्जित नाना प्रकार के कलापूर्ण लोटियों की मीनार को सिर पर रखे, सहस्त्रों की संख्या में गाती हुई çस्त्रयों के कंठ स्वर से जोधपुर का गिरदीकोट मुखरित हो उठता है।
मेवाड़ और हाड़ौती में इस ऋतु में अफीम के खेतों में फूलों की बहार रहती है। अफीम के फूलों की कोमलता और रंग सुप्रसिद्ध हैं। कौनसा ऎसा रंग है जो आफू के फूलों में नहीं होता। आफू के खेतों के आगे बाग फीके नजर आते हैं।
कन्याएं पूजा के लिए फूल लेने जाती हैं। नि:संदेह आफू के खेत उन्हें अपनी ओर आने को आकर्षित करते हैं। कन्याएं पूजा के लिए फूल लाने को, उसके गहने बनाकर पहनने को उतावली हो जातीं। लड़कियों की टोलियों की टोलियां फूल बीनने को निकल पड़ती, तो माताएं उन्हें समझातीं।

बाई ऎ आफू रा फूल थोड़ा ही चूंटजो
जुवानां ने देख मती मुलकजो
बूढ़ा ने देख मती हंसज्यो
बाई, तुम आफू के फूल बहुत ज्यादा मत तोड़ना, जवानों को देख उनकी ओर मुस्कुराना मत। बूढ़ों को देख हंसना मत।
इन दिनों गुलाब के फूल खिलते हैं। पलाश पुष्पों से वनराजि रंगीन हो उठती है। सेवंती और चंपा के फूल अपनी सुगंधि बिखेरते हैं, कडुआ नीम भी अपनी कडुवी मंजरियों की मीठी सुंगधि से वायु को शीतल एवं सुगंधित कर देता है। कन्याएं फूल तोड़ती हैं, खेलती हैं, पानी से लबालब भरे सरोवरों में, उनके किनारे पर बने छज्जे वाले गोखड़ों के प्रतिबिंब को पानी में देखती हैं।
इस सौंदर्य सुषमा में अपने आपको भूलकर वे गा उठती हैं। क्या सुंदर भौगोलिक वर्णन है:

ऊंचा राणाजी थांरा गोखड़ा रे लाल
नी पीछोला री पाल व्हाला जी
अठीने उदियाणों उठी ने जोधाणों
बीच में देसूरी नाल
व्हालो लागे राणाजी रो देसड़ो रे लाल
ऎसे सुंदर, पर्वतों की गोदी में खेलते, पानी पर तैरते, अपने जन्म स्थान को छोड़ ससुराल चले जाने की कल्पना अनजाने में ही उनके मनोभावों को संगीत में ढाल कंठ स्वर में निकल पड़ती है।
कींकर जावूं रे परदेस व्हाला जी
म्हाने आछो लागे राणाजी रो देसड़ो रे लाल

दियाड़ी पूजा 

गौर पूजा के बाद दसामाता और दियाड़ीजी की पूजा की जाती है। ये पीपल के पेड़ के नीचे बैठे हुए भित्ति चित्र में अंकित किए जाते हैं। यह चित्र भी गौर के चित्र की भांति भव्य और बड़े आकार में होता है। दसामाता की दस दिन पूजा होती है। दशमी के दिन पीपल की डाली लगा पूजा कर सूत के दस धागों का डोरा गले में पहनती हैं। हल्दी में रंग कर डोरे को दस गांठे लगा दी जाती हैं। विवाहिताएं दशमी के दिन व्रत रखती हैं। दसा माता की पूजा केवल विवाहिताएं ही करती हैं तथा पूजा के साथ सवेरे पूजा कर सत्रहवें दिन अर्थात दूज को संध्या समय पूजा की जाती है। इसे "दांतण हेला" कहते हैं। बबूल का दंतून लेकर गौरी को दांतुन कराते हैं। ईसर जी की बारात गौरी के ब्याह के लिए चढ़ती है।
"केसरियो उम्हायो हे लाल बनी रा देस में" गाती हुई çस्त्रयां ही बारात चढ़ाने का दस्तूर करती हैं। पूजा के लिए बेसन को गूंधकर पूरी चतुराई लगा राज परिवार की महिलाएं जेवर बनाती हैं। सिर से पैर तक सभी आभूषण बनाए जाते हैं। बेसन के जेवर सोने से लगते हैं। उनमें मोतियों, नवरत्नों का जड़ाव भी इसी प्रकार की सामग्री से सजाकर अलंकृत करती हैं। चावल भिगोकर पीस लिया जाता है। उसे गूंधकर छोटी बड़ी साइज के मोती, लालें, रत्न कण, आदि बना लेती हैं। उनको जड़ाव की तरह बेसन के आभूषणों में जड़ती हैं। मिट्टी के दीयों में चित्रकार के यहां से रंग, तूलिकाएं मंगा लेती हैं। चावल से बनाए गए रत्नों के मोती, माणक, पन्ना, हरा,सल के रंगों जैसा रंग देती हैं। ईसर जी के पहनने के आभूषणों के साथ उनके लिए भांग घोटने की रत्न जडित कुंडी और घोटा भी बनाया जाता है। पूजा के बाद ये आभूष्ाण दूब-फूल लाने वाली मालिन को दे दिए जाते हैं।



 

गणगौर तीज करें , शिव-पार्वती का पूजन



25 फरवरी 2012 को....
गणगौर तीज  करें :  शिव-पार्वती का पूजन
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को गणगौर तीज का उत्सव मनाया जाता है। इस दिन विशेष रूप से माता पार्वती व भगवान शंकर की पूजा की जाती है। इन्हें ईसर-गौर भी कहा जाता है जिसका अर्थ है(ईश्वर-गौरी)। यह कुंवारी और विवाहिता स्त्रियों का त्योहार है। इस बार यह पर्व 24 मार्च, रविवार को है। यह पर्व 16 दिनों तक मनाया जाता है।
गणगौर मुख्य रूप से राजस्थान का लोकपर्व है लेकिन देश के अन्य हिस्सों में भी इसे मनाया जाता है। राजस्थान में कन्याओं के लिए विवाह के बाद प्रथम चैत्र शुक्ल तृतीया तक गणगौर का पूजन आवश्यक माना जाता है। वे चैत्र कृष्ण प्रतिपदा के दिन होलिकादहन की भस्म और तालाब की मिट्टी से ईसर-गौर(शंकर-पार्वती) की प्रतिमाएं बनाती हैं। 16 दिनों तक माता पार्वती के गीत गाए जाते हैं। कुंवारी कन्याएं उत्तर वर के लिए तथा विवाहिता महिलाएं सौभाग्य की कामना के लिए इनका पूजन करती हैं।
चैत्र शुक्ल तृतीया को सुबह पूजा के बाद तालाब, सरोवर, बावड़ी या कुएं पर जाकर मंगलगीत गाते हुए गणगौर(ईसर-गौर) की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। गणगौर का विसर्जन देखने योग्य होता है।
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गणगौर
गणगौर का यह त्योहार चैत्र शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है। होली के दूसरे दिन (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा) से जो नवविवाहिताएँ प्रतिदिन गणगौर पूजती हैं, वे चैत्र शुक्ल द्वितीया के दिन किसी नदी, तालाब या सरोवर पर जाकर अपनी पूजी हुई गणगौरों को पानी पिलाती हैं और दूसरे दिन सायंकाल के समय उनका विसर्जन कर देती हैं। यह व्रत विवाहिता लड़कियों के लिए पति का अनुराग उत्पन्न कराने वाला और कुमारियों को उत्तम पति देने वाला है। इससे सुहागिनों का सुहाग अखंड रहता है।
नवरात्र के तीसरे दिन यानि कि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तीज को गणगौर माता (माँ पार्वती) की पूजा की जाती है। पार्वती के अवतार के रूप में गणगौर माता व भगवान शंकर के अवतार के रूप में ईशर जी की पूजा की जाती है। प्राचीन समय में पार्वती ने शंकर भगवान को पति (वर) रूप में पाने के लिए व्रत और तपस्या की। शंकर भगवान तपस्या से प्रसन्न हो गए और वरदान माँगने के लिए कहा। पार्वती ने उन्हें ही वर के रूप में पाने की अभिलाषा की। पार्वती की मनोकामना पूरी हुई और पार्वती जी की शिव जी से शादी हो गयी। तभी से कुंवारी लड़कियां इच्छित वर पाने के लिए ईशर और गणगौर की पूजा करती है। सुहागिन स्त्री पति की लम्बी आयु के लिए यह पूजा करती है। गणगौर पूजा चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि से आरम्भ की जाती है। सोलह दिन तक सुबह जल्दी उठ कर बगीचे में जाती हैं, दूब व फूल चुन कर लाती है। दूब लेकर घर आती है उस दूब से दूध के छींटे मिट्टी की बनी हुई गणगौर माता को देती है। थाली में दही पानी सुपारी और चांदी का छल्ला आदि सामग्री से गणगौर माता की पूजा की जाती है।
आठवें दिन ईशर जी पत्नी (गणगौ ) के साथ अपनी ससुराल आते हैं। उस दिन सभी लड़कियां कुम्हार के यहाँ जाती हैं और वहाँ से मिट्टी के बरतन और गणगौर की मूर्ति बनाने के लिए मिट्टी लेकर आती है। उस मिट्टी से ईशर जी, गणगौर माता, मालिन आदि की छोटी छोटी मूर्तियाँ बनाती हैं। जहाँ पूजा की जाती है उस स्थान को गणगौर का पीहर और जहाँ विसर्जन किया जाता है वह स्थान ससुराल माना जाता है।
राजस्थान का तो यह अत्यंत विशिष्ट त्योहार है। इस दिन भगवान शिव ने पार्वतीय को तथा पार्वतीय ने समस्त स्त्री समाज को सौभाग्य का वरदान दिया था। गणगौर माता की पूरे राजस्थान में पूजा की जाती है। राजस्थान से लगे ब्रज के सीमावर्ती स्थानों पर भी यह त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है। चैत्र मास की तीज को गणगौर माता को चूरमे का भोग लगाया जाता है। दोपहर बाद गणगौर माता को ससुराल विदा किया जाता है, यानि कि विसर्जित किया जाता है। विसर्जन का स्थान गाँव का कुँआ या तालाब होता है। कुछ स्त्रियाँ जो विवाहित होती हैं वो यदि इस व्रत की पालना करने से निवृति चाहती हैं वो इसका अजूणा करती है (उद्यापन करती हैं) जिसमें सोलह सुहागन स्त्रियों को समस्त सोलह श्रृंगार की वस्तुएं देकर भोजन करवाती हैं |
इस दिन भगवान शिव ने पार्वती जी को तथा पार्वती जी ने समस्त स्त्री समाज को सौभाग्य का वरदान दिया था। सुहागिनें व्रत धारण से पहले रेणुका (मिट्टी) की गौरी की स्थापना करती है एवं उनका पूजन किया जाता है। इसके पश्चात गौरी जी की कथा कही जाती है। कथा के बाद गौरी जी पर चढ़ाए हुए सिंदूर से स्त्रियाँ अपनी माँग भरती हैं। इसके पश्चात केवल एक बार भोजन करके व्रत का पारण किया जाता है। गणगौर का प्रसाद पुरुषों के लिए वर्जित है।
गौरी पूजन का यह त्योहार भारत के सभी प्रांतों में थोड़े-बहुत नाम भेद से पूर्ण धूमधाम के साथ मनाया जाता हैं। इस दिन स्त्रियां सुंदर वस्त्र औ आभूषण धारण करती हैं। इस दिन सुहागिनें दोपहर तक व्रत रखती हैं। व्रत धारण करने से पूर्व रेणुका गौरी की स्थापना करती हैं। इसके लिए घर के किसी कमरे में एक पवित्र स्थान पर चौबीस अंगुल चौड़ी और चौबीस अंगुल लम्बी वर्गाकार वेदी बनाकर हल्दी, चंदन, कपूर, केसर आदि से उस पर चौक पूरा जाता है। फिर उस पर बालू से गौरी अर्थात पार्वती बनाकर (स्थापना करके) इस स्थापना पर सुहाग की वस्तुएं- कांच की चूड़ियाँ, महावर, सिंदूर, रोली, मेंहदी, टीका, बिंदी, कंघा, शीशा, काजल आदि चढ़या जाता है।
चंदन, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से गौरी का विधिपूर्वक पूजन करके सूहाग की इस सामग्री का अर्पण किया जाता है। फिर भोग लगाने के बाद गौरी जी की कथा कही जाती है। कथा के बाद गौरीजी पर चढ़ाए हुए सिंदूर से महिलाएं अपनी मांग भरती हैं। गौरीजी का पूजन दोपहर को होता है। इसके पश्चात केवल एक बार भोजन करके व्रत का पारण किया जाता है। गनगौर का प्रसाद पुरुषों के लिए निषिद्ध है।
गनगौर पर विशेष रूप से मैदा के गुने बनाए जाते हैं। लड़की की शादी के बाद लड़की पहली बार गनगौर अपने मायके में मनाती है और इन गुनों तथा सास के कपड़ो का बायना निकालकर ससुराल में भेजती है। यह विवाह के प्रथम वर्ष में ही होता है, बाद में प्रतिवर्ष गनगौर लड़की अपनी ससुराल में ही मनाती है। ससुराल में भी वह गनगौर का उद्यापन करती है और अपनी सास को बायना, कपड़े तथा सुहाग का सारा सामान देती है। साथ ही सोलह सुहागिन स्त्रियों को भोजन कराकर प्रत्येक को सम्पूर्ण श्रृंगार की वस्तुएं और दक्षिण दी जाती है। गनगौर पूजन के समय स्त्रियों गौरीजी की कथा भी कहती हैं।
मस्ती का पर्व
होली के दूसरे दिन से ही गणगौर का त्योहार आरंभ हो जाता है जो पूरे सोलह दिन तक लगातार चलता रहता है। गणगौर के त्योहार को उमंग, उत्साह और जोश से मनाया जाता है। यह उत्सव मस्ती का पर्व है। इसमें कन्याएँ और विवाहित स्त्रियाँ मिट्टी के इसर और गौर बनाती है। और उनको सुन्दर पोशाक पहनाती है और उनका श्रृंगार करती हैं। स्त्रियाँ और कन्याएँ भी इस दिन गहने और कपड़ों से सजी-धजी रहती हैं। और गणगौर के दिन कुँआरी कन्याएँ एक खेल भी खेलती है जिसमें एक लड़की दूल्हा और दूसरी दूल्हन बनती हैं। जिन्हें वे इसर और गौर कहते हैं। और उनके साथ सखियाँ गीत गाती हुई उन दोनों को लेकर अपने घर से निकलती है और सब मिलकर एक बगीचे पर जाती है वहाँ पीपल के पेड़ के जो इसर और गौर बने होते है वो दोनों फेरे लेते हैं। जब फेरे पूरे हो जाते है तब ये सब नाचती और गाती है। उसके बाद ये घर जाकर उनका पूजन करती हैं, और भोग लगाती हैं। और शाम को उन्हें पानी पिलाती हैं। अगले दिन वे उन मिट्टी के इसर और गौर को ले जाकर किसी भी नदी में उनका विसर्जन कर देती हैं।

जोधपुर का मेला

जोधपुर में लोटियों का मेला लगता है। वस्त्र और आभूषणों से सजी-धजी, कलापूर्ण लोटियों की मीनार को सिर पर रखे, हज़ारों की संख्या में गाती हुई नारियों के स्वर से जोधपुर का पूरा बाज़ार गूँज उठता है। राजघरानों में रानियाँ और राजकुमारियाँ प्रतिदिन गवर की पूजा करती हैं। चित्रकार पूजन के स्थान पर दीवार पर ईसर और गवरी के भव्य चित्र अंकित कर देता है। केले के पेड़ के पास ईसर और गवरी चौपड़ खेलते हुए अंकित किए जाते हैं। ईसर के सामने गवरी हाथ जोड़े बैठी रहती हैं। ईसरजी काली दाढ़ी और राजसी पोशाक में तेजस्वी पुरुष के रूप में अंकित किए जाते हैं। मिट्टी की पिंडियों की पूजा कर दीवार पर गवरी के चित्र के नीचे सोलह कुंकुम और काजल की बिंदिया लगाकर हरी दूब से पूजती हैं। साथ ही इच्छा प्राप्ति के गीत गाती हैं। एक बुजुर्ग औरत फिर पाँच कहानी सुनाती है। ये होती हैं शंकर-पार्वती के प्रेम की, दाम्पत्य जीवन की मधुर झलकियों की।

गणगौर माता की पूरे राजस्थान में जगह जगह सवारी निकाली जाती है जिसमें ईशरदास जीव गणगौर माता की आदम क़द मू्र्तियाँ होती है। उदयपुर की धींगा, बीकानेर की चांदमल गणगौर प्रसिद्ध हैं। राजस्थानी में कहावत भी है तीज तींवारा बावड़ी ले डूबी गणगौर अर्थ है कि सावन की तीज से त्योहारों का आगमन शुरू हो जाता है और गणगौर के विसर्जन के साथ ही त्योहारों पर चार महीने का विराम आ जाता है।
कथा
भगवान शंकर तथा पार्वती जी नारद जी के साथ भ्रमण को निकले। चलते-चलते वे चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन एक गाँव में पहुँच गए। उनके आगमन का समाचार सुनकर गाँव की श्रेष्ठ कुलीन स्त्रियाँ उनके स्वागत के लिए स्वादिष्ट भोजन बनाने लगीं। भोजन बनाते-बनाते उन्हें काफ़ी विलंब हो गया किंतु साधारण कुल की स्त्रियाँ श्रेष्ठ कुल की स्त्रियों से पहले ही थालियों में हल्दी तथा अक्षत लेकर पूजन हेतु पहुँच गईं। पार्वती जी ने उनके पूजा भाव को स्वीकार करके सारा सुहाग रस उन पर छिड़क दिया।
वे अटल सुहाग प्राप्ति का वरदान पाकर लौटीं। बाद में उच्च कुल की स्त्रियाँ भांति भांति के पकवान लेकर गौरी जी और शंकर जी की पूजा करने पहुँचीं। उन्हें देखकर भगवान शंकर ने पार्वती जी से कहा, 'तुमने सारा सुहाग रस तो साधारण कुल की स्त्रियों को ही दे दिया। अब उन्हें क्या दोगी?'
पार्वत जी ने उत्तर दिया, 'प्राणनाथ, आप इसकी चिंता मत कीजिए। उन स्त्रियों को मैंने केवल ऊपरी पदार्थों से बना रस दिया है। परंतु मैं इन उच्च कुल की स्त्रियों को अपनी उँगली चीरकर अपने रक्त का सुहागरस दूँगी। यह सुहागरस जिसके भाग्य में पड़ेगा, वह तन-मन से मुझ जैसी सौभाग्यशालिनी हो जाएगी।'
जब स्त्रियों ने पूजन समाप्त कर दिया, तब पार्वती जी ने अपनी उँगली चीरकर उन पर छिड़क दिया, जिस जिस पर जैसा छींटा पड़ा, उसने वैसा ही सुहाग पा लिया। अखंड सौभाग्य के लिए प्राचीनकाल से ही स्त्रियाँ इस व्रत को करती आ रही हैं।
इसके बाद भगवान शिव की आज्ञा से पार्वती जी ने नदी तट पर स्नान किया और बालू के महादेव बनाकर उनका पूजन करने लगीं। पूजन के बाद बालू के ही पकवान बनाकर शिवजी को भोग लगाया। इसके बाद प्रदक्षिणा करके, नदी तट की मिट्टी के माथे पर टीका लगाकर, बालू के दो कणों का प्रसाद पाया और शिव जी के पास वापस लौट आईं।
इस सब पूजन आदि में पार्वती जी को नदी किनारे बहुत देर हो गई थी। अत: महादेव जी ने उनसे देरी से आने का कारण पूछा। इस पर पार्वती जी ने कहा- 'वहाँ मेरे भाई-भावज आदि मायके वाले मिल गए थे, उन्हीं से बातें करने में देरी हो गई।'
परन्तु भगवान तो आख़िर भगवान थे। वे शायद कुछ और ही लीला रचना चाहते थे। अत: उन्होंने पूछा- 'तुमने पूजन करके किस चीज़ का भोग लगाया और क्या प्रसाद पाया?'
पार्वती जी ने उत्तर दिया- 'मेरी भावज ने मुझे दूध-भात खिलाया। उसे ही खाकर मैं सीधी यहाँ चली आ रही हूँ।' यह सुनकर शिव जी भी दूध-भात खाने के लालच में नदी-तट की ओर चल पड़े। पार्वती जी दुविधा में पड़ गईं। उन्होंने सोचा कि अब सारी पोल खुल जाएगी। अत: उन्होंने मौन-भाव से शिव जी का ध्यान करके प्रार्थना की, 'हे प्रभु! यदि मैं आपकी अनन्य दासी हूँ तो आप ही इस समय मेरी लाज रखिए।'
इस प्रकार प्रार्थना करते हुए पार्वती जी भी शंकर जी के पीछे-पीछे चलने लगीं। अभी वे कुछ ही दूर चले थे कि उन्हें नदी के तट पर एक सुंदर माया महल दिखाई दिया। जब वे उस महल के भीतर पहुँचे तो वहाँ देखते हैं कि शिव जी के साले और सलहज आदि सपरिवार मौजूद हैं। उन्होंने शंकर-पार्वती का बड़े प्रेम से स्वागत किया।
वे दो दिन तक वहाँ रहे और उनकी खूब मेहमानदारी होती रही। तीसरे दिन जब पार्वती जी ने शंकर जी से चलने के लिए कहा तो वे तैयार न हुए। वे अभी और रूकना चाहते थे। पार्वती जी रूठकर अकेली ही चल दीं। तब मजबूर होकर शंकर जी को पार्वती के साथ चलना पड़ा। नारद जी भी साथ में चल दिए। तीनों चलते-चलते बहुत दूर निकल गए। सायंकाल होने के कारण भगवान भास्कर अपने धाम को पधार रहे थे। तब शिव जी अचानक पार्वती से बोले- 'मैं तुम्हारे मायके में अपनी माला भूल आया हूँ।'
पार्वती जी बोलीं -'ठीक है, मैं ले आती हूँ।' किंतु शिव जी ने उन्हें जाने की आज्ञा नहीं दी। इस कार्य के लिए उन्होंने ब्रह्मापुत्र नारद जी को वहाँ भेज दिया। नारद जी ने वहाँ जाकर देखा तो उन्हें महल का नामोनिशान तक न दिखा। वहाँ तो दूर-दूर तक घोर जंगल ही जंगल था।
इस अंधकारपूर्ण डरावने वातावरण को देख नारद जी बहुत ही आश्चर्यचकित हुए। नारद जी वहाँ भटकने लगे और सोचने लगे कि कहीं वह किसी ग़लत स्थान पर तो नहीं आ गए? सहसा बिजली चमकी और नारद जी को माला एक पेड़ पर टंगी हुई दिखाई दी। नारद जी ने माला उतार ली और उसे लेकर भयतुर अवस्था में शीघ्र ही शिव जी के पास आए और शिव जी को अपनी विपत्ति का विवरण कह सुनाया।
इस प्रसंग को सुनकर शिव जी ने हंसते हुए कहा- 'हे मुनि! आपने जो कुछ दृश्य देखा वह पार्वती की अनोखी माया है। वे अपने पार्थिव पूजन की बात को आपसे गुप्त रखना चाहती थीं, इसलिए उन्होंने झूठ बोला था। फिर उस को सत्य सिद्ध करने के लिए उन्होंने अपने पतिव्रत धर्म की शक्ति से माया महल की रचना की। अत: सचाई को उभारने के लिए ही मैंने भी माला लाने के लिए तुम्हें दुबारा उस स्थान पर भेजा था।'
इस पर पार्वतीजी बोलीं- 'मैं किस योग्य हूँ।'
तब नारद जी ने सिर झुकाकर कहा- 'माता! आप पतिव्रताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं। आप सौभाग्यवती आदिशक्ति हैं। यह सब आपके पतिव्रत धर्म का ही प्रभाव है। संसार की स्त्रियाँ आपके नाम का स्मरण करने मात्र से ही अटल सौभाग्य प्राप्त कर सकती हैं और समस्त सिद्धियों को बना तथा मिटा सकती हैं। तब आपके लिए यह कर्म कौन-सी बड़ी बात है?
हे माता! गोपनीय पूजन अधिक शक्तिशाली तथा आर्थक होता है। जहाँ तक इनके पतिव्रत प्रभाव से उत्पन्न घटना को छिपाने का सवाल है। वह भी उचित ही जान पड़ती है क्योंकि पूजा छिपाकर ही करनी चाहिए। आपकी भावना तथा चमत्कारपूर्ण शक्ति को देखकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई है।
मेरा यह आशीर्वचन है- 'जो स्त्रियाँ इस तरह गुप्त रूप से पति का पूजन करके मंगल कामना करेंगी उन्हें महादेव जी की कृपा से दीर्घायु पति का संसर्ग मिलेगा तथा उसकी समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति होगी। फिर आज के दिन आपकी भक्तिभाव से पूजा-आराधना करने वाली स्त्रियों को अटल सौभाग्य प्राप्त होगा ही।'
यह कहकर नारद जी तो प्रणाम करके देवलोक चले गए और शिव जी-पार्वती जी कैलाश की ओर चल पड़े। चूंकि पार्वती जी ने इस व्रत को छिपाकर किया था, उसी परम्परा के अनुसार आज भी स्त्रियाँ इस व्रत को पुरुषों से छिपाकर करती हैं। यही कारण है कि अखण्ड सौभाग्य के लिए प्राचीन काल से ही स्त्रियाँ इस व्रत को करती आ रही हैं।
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पश्चिम बंगाल में गणगौर की तैयारियां जोरों पर
पश्चिम बंगाल में गणगौर की तैयारियां जोरों पर
शंकर जालान,
कोलकाता। वृहत्तर बड़ाबाजार के बांसतला, बड़तला, ढाकापट्टी, गणेश टाकीज, मालापाड़ा, हंसपुकुर, नींबूतला, कलाकार स्ट्रीट के अलावा हावड़ा, अलीपुर, साल्टलेक व वीआईपी रोड में तीन दिवसीय गणगौर मेले की तैयारियां शुरू हो गई है। राजस्थान के बीकानेर की तर्ज पर तीन दिनों तक लगने वाले गणगौर मेले का उद्घाटन का क्रम से शुरू होगा। गणगौर मेले को आकर्षक बनाने के लिए विभिन्न कमिटियों की ओर से बड़ाबाजार की कई सड़कों व गलियों को जगमगाती रोशनी, तोरणद्वार और फूल-मालाओं से दुल्हन की तरह सजाया गया है। गणगौर उत्सव के मद्देनजर एक ओर जहां गणगौर मिलन और पानी पिलाने की रस्म जोरों पर है, वहीं दूसरी ओर गणगौर मेला कमिटी के सदस्य गीत-गायन के रिहर्सल में जुटे हैं।
गवर माता, गवर माता खोल ए किवाड़ी, ये बायां आयी पूजन..., जैसे गीतों की स्वरलहरी के साथ राजस्थान के प्रमुख पर्व गणगौर को लेकर यहां के राजस्थानियों में काफी उत्साह है। गणगौर मेले को लेकर यहां की नौ गणगौर मंडलियां श्री श्री गवरजा माता पारख कोठी, बांसतला, नींबूतला, गोवर्धननाथजी, बलदेवजी, हंसपुकुर, गांगुली लेन, कलाकार स्ट्रीट और मनसापुरण मंडलियों के सदस्य अपने-अपने काम में जुटे हैं। इसके अलावा श्री श्री गवरजा माता वीआईपी अंचल, हावड़ा, साल्टलेक और अलीपुर में भी गणगौर उत्सव की धूम चल रही है।
गणगौर मेले के उद्घाटन के बाद से भजन-संध्या, सांस्कृतिक कार्यक्रम और शोभायात्राओं दौर चलेगा। बड़ाबाजार के अलावा वीआईपी रोड, साल्टलेक और अलीपुर क्षेत्र में भी बीते कुछ सालों से गणगौर मेले की धूम मचने लगी है, लेकिन बड़ाबाजार के मेले की रौनक कुछ और ही रहती है। बड़ाबाजार अंचल में रहनेवाले राजस्थानियों में गणगौर मेले के प्रति उत्साह देखते ही बनता है। तीन दिवसीय मेले में विभिन्न गवरजा मंडलियों द्वारा निकाली जानेवाली झांकियों के प्रति भी उत्साह कम नहीं है।
वैसे तो गणगौर पूजन कुंवारी कन्याएं श्रेष्ठ वर (पति) पाने के लिए करती हैं। जहां होलिका दहन के दूसरे दिन से ही कन्याएं होलिका दहन की राख से 16 पिंडियां बनाकर विधिवत गणगौर पूजन शुरू कर देती हैं। वहीं, यहां की सभी गणगौर मंडलियां माता गवरजा की अगवानी में लग जाती हैं।
तीन दिवसीय मेले का मुख्य आकर्षण होता है नवगीतों की प्रस्तुति। प्रत्येक मंडली द्वारा गीत पेश किया जाता है और इस प्रस्तुति की विशेष बात यह रहती है कि गीत बिल्कुल नया रचित होता है। गीत-गायन में शामिल लोग पूर्ण राजस्थानी परिधान जैसे साफा, धोती और सिल्क का कुर्त्ता पहन कर बड़ाबाजार में बीकानेर जैसे माहौल तैयार कर देते हैं।
मंडलियों द्वारा निकाली जाने वाली झांकियों को देखने के लिए देर रात तक भारी तादाद में स्थानीय लोग रास्ते के दोनों किनारे खड़े रहते हैं। कहीं-कहीं तो लोग आरती, पुष्पवर्षा या गर्म-शीतल पेयजल से शोभायात्रा में शामिल लोगों का स्वागत करते नजर आते हैं। रात सात बजे से शुरू होने वाला उत्सव देर रात तक जारी रहता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रार्थना : नमस्ते सदा वत्सले




नमस्ते सदा वत्सले, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रार्थना है। यह प्रार्थना संस्कृत में है। प्रार्थना की अन्तिम पंक्ति हिन्दी में है। संघ की शाखा या अन्य कार्यक्रमों में इस प्रार्थना को अनिवार्यतः गाया जाता है और ध्वज के सम्मुख नमन किया जाता है।

अनेक भारतीय भाषाओं में , 
राष्ट्रीय स्यंवसेवक संघ की प्रार्थना


प्रार्थना / देवनागरी

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम् ।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते ।।१।।
प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता
इमे सादरं त्वां नमामो वयम्
त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयं
शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये ।
अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं
सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्
श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं
स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत् ।।२।।
समुत्कर्षनिःश्रेयस्यैकमुग्रं
परं साधनं नाम वीरव्रतम्
तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा
हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्रानिशम् ।
विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्
विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम् ।
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं
समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम् ।।३।।
भारत माता की जय ।।

गुजराती
નમસ્તે સદા વત્સલે માતૃભૂમે
ત્વયા હિન્દુભૂમે સુખં વર્ધિતોહમ્
મહામઙ્ગલે પુણ્યભૂમે ત્વદર્થે
પતત્વેષ કાયો નમસ્તે નમસ્તે
પ્રભો શક્તિમન્‌ હિન્દુરાષ્ટ્રાઙ્ગભૂતા
ઇમે સાદરં ત્વાં નમામો વયમ્
ત્વદીયાય કાર્યાય બધ્દા કટીયં
શુભામાશિષં દેહિ તત્પૂર્તયે
અજય્યાં ચ વિશ્વસ્ય દેહીશ શક્તિં
સુશીલં જગદ્યેન નમ્રં ભવેત્
શ્રુતં ચૈવ યત્કણ્ટકાકીર્ણ માર્ગં
સ્વયં સ્વીકૃતં નઃ સુગં કારયેત્
સમુત્કર્ષનિઃશ્રેયસ્યૈકમુગ્રં
પરં સાધનં નામ વીરવ્રતમ્
તદન્તઃ સ્ફુરત્વક્ષયા ધ્યેયનિષ્ઠા
હૃદન્તઃ પ્રજાગર્તુ તીવ્રાનિશમ્‌
વિજેત્રી ચ નઃ સંહતા કાર્યશક્તિર્
વિધાયાસ્ય ધર્મસ્ય સંરક્ષણમ્‌
પરં વૈભવં નેતુમેતત્‌ સ્વરાષ્ટ્રં
સમર્થા ભવત્વાશિશા તે ભૃશમ્
ભારત માતા કી જય

गुरुमुखी
ਨਮਸ੍ਤੇ ਸਦਾ ਵਤ੍ਸਲੇ ਮਾਤ੃ਭੂਮੇ
ਤ੍ਵਯਾ ਹਿਨ੍ਦੁਭੂਮੇ ਸੁਖਂ ਵਰ੍ਧਿਤੋਹਮ੍
ਮਹਾਮਙ੍ਗਲੇ ਪੁਣ੍ਯਭੂਮੇ ਤ੍ਵਦਰ੍ਥੇ
ਪਤਤ੍ਵੇ਷ ਕਾਯੋ ਨਮਸ੍ਤੇ ਨਮਸ੍ਤੇ
ਪ੍ਰਭੋ ਸ਼ਕ੍ਤਿਮਨ੍‌ ਹਿਨ੍ਦੁਰਾ਷੍ਟ੍ਰਾਙ੍ਗਭੂਤਾ
ਇਮੇ ਸਾਦਰਂ ਤ੍ਵਾਂ ਨਮਾਮੋ ਵਯਮ੍
ਤ੍ਵਦੀਯਾਯ ਕਾਰ੍ਯਾਯ ਬਧ੍ਦਾ ਕਟੀਯਂ
ਸ਼ੁਭਾਮਾਸ਼ਿ਷ਂ ਦੇਹਿ ਤਤ੍ਪੂਰ੍ਤਯੇ
ਅਜਯ੍ਯਾਂ ਚ ਵਿਸ਼੍ਵਸ੍ਯ ਦੇਹੀਸ਼ ਸ਼ਕ੍ਤਿਂ
ਸੁਸ਼ੀਲਂ ਜਗਦ੍ਯੇਨ ਨਮ੍ਰਂ ਭਵੇਤ੍
ਸ਼੍ਰੁਤਂ ਚੈਵ ਯਤ੍ਕਣ੍ਟਕਾਕੀਰ੍ਣ ਮਾਰ੍ਗਂ
ਸ੍ਵਯਂ ਸ੍ਵੀਕ੃ਤਂ ਨਃ ਸੁਗਂ ਕਾਰਯੇਤ੍
ਸਮੁਤ੍ਕਰ੍਷ਨਿਃਸ਼੍ਰੇਯਸ੍ਯੈਕਮੁਗ੍ਰਂ
ਪਰਂ ਸਾਧਨਂ ਨਾਮ ਵੀਰਵ੍ਰਤਮ੍
ਤਦਨ੍ਤਃ ਸ੍ਫੁਰਤ੍ਵਕ੍਷ਯਾ ਧ੍ਯੇਯਨਿ਷੍ਠਾ
ਹ੃ਦਨ੍ਤਃ ਪ੍ਰਜਾਗਰ੍ਤੁ ਤੀਵ੍ਰਾਨਿਸ਼ਮ੍‌
ਵਿਜੇਤ੍ਰੀ ਚ ਨਃ ਸਂਹਤਾ ਕਾਰ੍ਯਸ਼ਕ੍ਤਿਰ੍
ਵਿਧਾਯਾਸ੍ਯ ਧਰ੍ਮਸ੍ਯ ਸਂਰਕ੍਷ਣਮ੍‌
ਪਰਂ ਵੈਭਵਂ ਨੇਤੁਮੇਤਤ੍‌ ਸ੍ਵਰਾ਷੍ਟ੍ਰਂ
ਸਮਰ੍ਥਾ ਭਵਤ੍ਵਾਸ਼ਿਸ਼ਾ ਤੇ ਭ੃ਸ਼ਮ੍ ਭਾਰਤ ਮਾਤਾ ਕੀ ਜਯ

बांग्ला
নমস্তে সদা ঵ত্সলে মাতৃভূমে
ত্঵যা হিন্দুভূমে সুখং ঵র্ধিতোহম্
মহামঙ্গলে পুণ্যভূমে ত্঵দর্থে
পতত্঵েষ কাযো নমস্তে নমস্তে
প্রভো শক্তিমন্‌ হিন্দুরাষ্ট্রাঙ্গভূতা
ইমে সাদরং ত্঵াং নমামো ঵যম্
ত্঵দীযায কার্যায বধ্দা কটীযং
শুভামাশিষং দেহি তত্পূর্তযে
অজয্যাং চ ঵িশ্঵স্য দেহীশ শক্তিং
সুশীলং জগদ্যেন নম্রং ভ঵েত্
শ্রুতং চৈ঵ যত্কণ্টকাকীর্ণ মার্গং
স্঵যং স্঵ীকৃতং নঃ সুগং কারযেত্
সমুত্কর্ষনিঃশ্রেযস্যৈকমুগ্রং
পরং সাধনং নাম ঵ীর঵্রতম্
তদন্তঃ স্ফুরত্঵ক্ষযা ধ্যেযনিষ্ঠা
হৃদন্তঃ প্রজাগর্তু তী঵্রানিশম্‌
঵িজেত্রী চ নঃ সংহতা কার্যশক্তির্
঵িধাযাস্য ধর্মস্য সংরক্ষণম্‌
পরং ঵ৈভ঵ং নেতুমেতত্‌ স্঵রাষ্ট্রং
সমর্থা ভ঵ত্঵াশিশা তে ভৃশম্
ভারত মাতা কী জয

तेलुगू
నమస్తే సదా వత్సలే మాతృభూమే
త్వయా హిన్దుభూమే సుఖం వర్ధితోహమ్
మహామఙ్గలే పుణ్యభూమే త్వదర్థే
పతత్వేష కాయో నమస్తే నమస్తే
ప్రభో శక్తిమన్‌ హిన్దురాష్ట్రాఙ్గభూతా
ఇమే సాదరం త్వాం నమామో వయమ్
త్వదీయాయ కార్యాయ బధ్దా కటీయం
శుభామాశిషం దేహి తత్పూర్తయే
అజయ్యాం చ విశ్వస్య దేహీశ శక్తిం
సుశీలం జగద్యేన నమ్రం భవేత్
శ్రుతం చైవ యత్కణ్టకాకీర్ణ మార్గం
స్వయం స్వీకృతం నః సుగం కారయేత్
సముత్కర్షనిఃశ్రేయస్యైకముగ్రం
పరం సాధనం నామ వీరవ్రతమ్
తదన్తః స్ఫురత్వక్షయా ధ్యేయనిష్ఠా
హృదన్తః ప్రజాగర్తు తీవ్రానిశమ్‌
విజేత్రీ చ నః సంహతా కార్యశక్తిర్
విధాయాస్య ధర్మస్య సంరక్షణమ్‌
పరం వైభవం నేతుమేతత్‌ స్వరాష్ట్రం
సమర్థా భవత్వాశిశా తే భృశమ్
భారత మాతా కీ జయ
कन्नड़
ನಮಸ್ತೇ ಸದಾ ವತ್ಸಲೇ ಮಾತೃಭೂಮೇ
ತ್ವಯಾ ಹಿನ್ದುಭೂಮೇ ಸುಖಂ ವರ್ಧಿತೋಹಮ್
ಮಹಾಮಙ್ಗಲೇ ಪುಣ್ಯಭೂಮೇ ತ್ವದರ್ಥೇ
ಪತತ್ವೇಷ ಕಾಯೋ ನಮಸ್ತೇ ನಮಸ್ತೇ
ಪ್ರಭೋ ಶಕ್ತಿಮನ್‌ ಹಿನ್ದುರಾಷ್ಟ್ರಾಙ್ಗಭೂತಾ
ಇಮೇ ಸಾದರಂ ತ್ವಾಂ ನಮಾಮೋ ವಯಮ್
ತ್ವದೀಯಾಯ ಕಾರ್ಯಾಯ ಬಧ್ದಾ ಕಟೀಯಂ
ಶುಭಾಮಾಶಿಷಂ ದೇಹಿ ತತ್ಪೂರ್ತಯೇ
ಅಜಯ್ಯಾಂ ಚ ವಿಶ್ವಸ್ಯ ದೇಹೀಶ ಶಕ್ತಿಂ
ಸುಶೀಲಂ ಜಗದ್ಯೇನ ನಮ್ರಂ ಭವೇತ್
ಶ್ರುತಂ ಚೈವ ಯತ್ಕಣ್ಟಕಾಕೀರ್ಣ ಮಾರ್ಗಂ
ಸ್ವಯಂ ಸ್ವೀಕೃತಂ ನಃ ಸುಗಂ ಕಾರಯೇತ್
ಸಮುತ್ಕರ್ಷನಿಃಶ್ರೇಯಸ್ಯೈಕಮುಗ್ರಂ
ಪರಂ ಸಾಧನಂ ನಾಮ ವೀರವ್ರತಮ್
ತದನ್ತಃ ಸ್ಫುರತ್ವಕ್ಷಯಾ ಧ್ಯೇಯನಿಷ್ಠಾ
ಹೃದನ್ತಃ ಪ್ರಜಾಗರ್ತು ತೀವ್ರಾನಿಶಮ್‌
ವಿಜೇತ್ರೀ ಚ ನಃ ಸಂಹತಾ ಕಾರ್ಯಶಕ್ತಿರ್
ವಿಧಾಯಾಸ್ಯ ಧರ್ಮಸ್ಯ ಸಂರಕ್ಷಣಮ್‌
ಪರಂ ವೈಭವಂ ನೇತುಮೇತತ್‌ ಸ್ವರಾಷ್ಟ್ರಂ
ಸಮರ್ಥಾ ಭವತ್ವಾಶಿಶಾ ತೇ ಭೃಶಮ್
ಭಾರತ ಮಾತಾ ಕೀ ಜಯ

मलयालम
നമസ്തേ സദാ വത്സലേ മാതൃഭൂമേ
ത്വയാ ഹിന്ദുഭൂമേ സുഖം വര്ധിതോഹമ്
മഹാമങ്ഗലേ പുണ്യഭൂമേ ത്വദര്ഥേ
പതത്വേഷ കായോ നമസ്തേ നമസ്തേ
പ്രഭോ ശക്തിമന്‌ ഹിന്ദുരാഷ്ട്രാങ്ഗഭൂതാ
ഇമേ സാദരം ത്വാം നമാമോ വയമ്
ത്വദീയായ കാര്യായ ബധ്ദാ കടീയം
ശുഭാമാശിഷം ദേഹി തത്പൂര്തയേ
അജയ്യാം ച വിശ്വസ്യ ദേഹീശ ശക്തിം
സുശീലം ജഗദ്യേന നമ്രം ഭവേത്
ശ്രുതം ചൈവ യത്കണ്ടകാകീര്ണ മാര്ഗം
സ്വയം സ്വീകൃതം നഃ സുഗം കാരയേത്
സമുത്കര്ഷനിഃശ്രേയസ്യൈകമുഗ്രം
പരം സാധനം നാമ വീരവ്രതമ്
തദന്തഃ സ്ഫുരത്വക്ഷയാ ധ്യേയനിഷ്ഠാ
ഹൃദന്തഃ പ്രജാഗര്തു തീവ്രാനിശമ്‌
വിജേത്രീ ച നഃ സംഹതാ കാര്യശക്തിര്
വിധായാസ്യ ധര്മസ്യ സംരക്ഷണമ്‌
പരം വൈഭവം നേതുമേതത്‌ സ്വരാഷ്ട്രം
സമര്ഥാ ഭവത്വാശിശാ തേ ഭൃശമ്
ഭാരത മാതാ കീ ജയ

तमिल
நமஸ்தே ஸ஦ா வத்ஸலே மாத௃஭ூமே
த்வயா ஹிந்஦ு஭ூமே ஸு஖ஂ வர்஧ிதோஹம்
மஹாமங்஗லே புண்ய஭ூமே த்வ஦ர்஥ே
பதத்வேஷ காயோ நமஸ்தே நமஸ்தே
ப்ர஭ோ ஶக்திமந்‌ ஹிந்஦ுராஷ்ட்ராங்஗஭ூதா
இமே ஸா஦ரஂ த்வாஂ நமாமோ வயம்
த்வ஦ீயாய கார்யாய ஬஧்஦ா கடீயஂ
ஶு஭ாமாஶிஷஂ ஦ேஹி தத்பூர்தயே
அஜய்யாஂ ச விஶ்வஸ்ய ஦ேஹீஶ ஶக்திஂ
ஸுஶீலஂ ஜ஗஦்யேந நம்ரஂ ஭வேத்
ஶ்ருதஂ சைவ யத்கண்டகாகீர்ண மார்஗ஂ
ஸ்வயஂ ஸ்வீக௃தஂ நஃ ஸு஗ஂ காரயேத்
ஸமுத்கர்ஷநிஃஶ்ரேயஸ்யைகமு஗்ரஂ
பரஂ ஸா஧நஂ நாம வீரவ்ரதம்
த஦ந்தஃ ஸ்஫ுரத்வக்ஷயா ஧்யேயநிஷ்஠ா
ஹ௃஦ந்தஃ ப்ரஜா஗ர்து தீவ்ராநிஶம்‌
விஜேத்ரீ ச நஃ ஸஂஹதா கார்யஶக்திர்
வி஧ாயாஸ்ய ஧ர்மஸ்ய ஸஂரக்ஷணம்‌
பரஂ வை஭வஂ நேதுமேதத்‌ ஸ்வராஷ்ட்ரஂ
ஸமர்஥ா ஭வத்வாஶிஶா தே ஭௃ஶம் ஭ாரத மாதா கீ ஜய

IAST
namaste sadā vatsale mātṛbhūme
tvayā hindubhūme sukhaṁ vardhitoham
mahāmaṅgale puṇyabhūme tvadarthe
patatveṣa kāyo namaste namaste ||
prabho śaktiman hindurāṣṭrāṅgabhūtā
ime sādaraṁ tvāṁ namāmo vayam
tvadīyāya kāryāya badhdā kaṭīyaṁ
śubhāmāśiṣaṁ dehi tatpūrtaye
ajayyāṁ ca viśvasya dehīśa śaktiṁ
suśīlaṁ jagadyena namraṁ bhavet
śrutaṁ caiva yatkaṇṭakākīrṇa mārgaṁ
svayaṁ svīkṛtaṁ naḥ sugaṁ kārayet ||
samutkarṣaniḥśreyasyaikamugraṁ
paraṁ sādhanaṁ nāma vīravratam
tadantaḥ sphuratvakṣayā dhyeyaniṣṭhā
hṛdantaḥ prajāgartu tīvrāniśam
vijetrī ca naḥ saṁhatā kāryaśaktir
vidhāyāsya dharmasya saṁrakṣaṇam
paraṁ vaibhavaṁ netumetat svarāṣṭraṁ
samarthā bhavatvāśiśā te bhṛśam || bhārata mātā kī jaya

सरलार्थ :-
हे मातृभूमि, तुम्हें प्रणाम! इस मातृभूमि ने हमें अपने बच्चों की तरह स्नेह और ममता दी है। इस हिन्दू भूमि पर सुखपूर्वक मैं बड़ा हुआ हूँ। यह भूमि महा मंगलमय और पुण्यभूमि है। इस भूमि की रक्षा के लिए मैं यह नश्वर शरीर मातृभूमि को अर्पण करते हुए इस भूमि को बार-बार प्रणाम करता हूँ।
हे सर्व शक्तिमान परमेश्वर, इस हिन्दू राष्ट्र के घटक के रूप में मैं तुमको सादर प्रणाम करता हूँ। आपके ही कार्य के लिए हम कटिबद्ध हुवे है। हमें इस कार्य को पूरा करने किये आशीर्वाद दे। हमें ऐसी शक्ति दीजिये कि हम इस पूरे विश्व को जीत सकें और ऐसी नम्रता दें कि पूरा विश्व हमारे सामने नतमस्तक हो सके। यह रास्ता काटों से भरा हुवा है, इस कार्य को हमने स्वयँ स्वीकार किया है और इसे सुगम कर काँटों रहित करेंगे।
ऐसा उच्च आध्यात्मिक सुख और ऐसी महान ऐहिक समृद्धि को प्राप्त करने का एकमात्र श्रेष्ट साधन उग्र वीरव्रत की भावना हमारे अन्दर सदेव जलती रहे। तीव्र और अखंड ध्येय निष्ठा की भावना हमारे अंतःकरण में जलती रहे। आपकी असीम कृपा से हमारी यह विजयशालिनी संघठित कार्यशक्ति हमारे धर्म का सरंक्षण कर इस राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने में समर्थ हो।
भारत माता की जय।

हिन्दी काव्यानुवाद :-
हे परम वत्सला मातृभूमि! तुझको प्रणाम शत कोटि बार।
हे महा मंगला पुण्यभूमि ! तुझ पर न्योछावर तन हजार।।
हे हिन्दुभूमि भारत! तूने, सब सुख दे मुझको बड़ा किया;
तेरा ऋण इतना है कि चुका, सकता न जन्म ले एक बार।
हे सर्व शक्तिमय परमेश्वर! हम हिंदुराष्ट्र के सभी घटक,
तुझको सादर श्रद्धा समेत, कर रहे कोटिशः नमस्कार।।
तेरा ही है यह कार्य हम सभी, जिस निमित्त कटिबद्ध हुए;
वह पूर्ण हो सके ऐसा दे, हम सबको शुभ आशीर्वाद।
सम्पूर्ण विश्व के लिये जिसे, जीतना न सम्भव हो पाये;
ऐसी अजेय दे शक्ति कि जिससे, हम समर्थ हों सब प्रकार।।
दे ऐसा उत्तम शील कि जिसके, सम्मुख हो यह जग विनम्र;
दे ज्ञान जो कि कर सके सुगम, स्वीकृत कन्टक पथ दुर्निवार।
कल्याण और अभ्युदय का, एक ही उग्र साधन है जो;
वह मेरे इस अन्तर में हो, स्फुरित वीरव्रत एक बार।।
जो कभी न होवे क्षीण निरन्तर, और तीव्रतर हो ऐसी;
सम्पूर्ण ह्र्दय में जगे ध्येय, निष्ठा स्वराष्ट्र से बढे प्यार।
निज राष्ट्र-धर्म रक्षार्थ निरन्तर, बढ़े संगठित कार्य-शक्ति;
यह राष्ट्र परम वैभव पाये, ऐसा उपजे मन में विचार।।