बुधवार, 4 अप्रैल 2012

6 अप्रैल: भाजपा का जन्म दिवस,शून्य से शिखर तक : भाजपा



6 अप्रैल: भाजपा का जन्म दिवस

शून्य से शिखर तक: भाजपा             

- अरविन्द सीसौदिया
भाजपा ने भारतीय जनसंघ के नाम से 1951 में, जब अपना सफर प्रारम्भ किया था,तब कोई भी राजनैतिक विश्लेषक यह उम्मीद नहीं कर सकता था कि यह पार्टी कभी अपना प्रधानमंत्री,उप प्रधानमंत्री और उपराष्ट्रपति बना लेगी, राष्ट्रपति और लोकसभा के अध्यक्ष इस दल के सहयोग से बनेंगे। इसके कई-कई राज्यपाल, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री तथा नेता प्रतिपक्ष होंगे।  कई-कई जिला प्रमुख और महापौर होंगें,हजारों की संख्या में स्थानीय शासन तथा पंचायती राज में इस दल के जनप्रतिनिधि होंगे। तब कोई यह भी नहीं सोच सकता था , कि इस दल में काम कर रहे नेताओं के नाम पर बस्तियां बस जायेंगीं,चौराहों पर मूर्तियां लग जायेगीं,आयोजनों के स्थान इनके नाम पर होंगें,इनकी लिखी पुस्तकें बिकेगीं और उन पर शोध प्रबंध होंगें । मगर यह सब हुआ ,क्योंकि इस दल के पास राष्ट्रहित की विचारधारा का शिक्षण था,देश के लिये क्या सही है,यह सिखाने वाली राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का मार्गदर्शन तथा आशीर्वाद था।

उन्हे तब यह उम्मीद भी नहीं थी कि यह पार्टी कभी कोई राजनैतिक दर्शन दे पायेगी, क्योंकि तब पाश्चात्य विचारधारा आधारित एकल समस्या विशेष के समाजवाद और साम्यवाद फैशन थे,मगर इस दल के विचारक पं.दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद के नाम से पूर्ण सामाजिक सनातन दर्शन रखा और विचारधारा के मोर्चे पर अपने श्रैष्ठ स्वदेशी दर्शन को तथ्यों के साथ पुनःस्थापित किया। इसका  भी मुख्य कारण राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का वैचारिक आशीवार्द  ही था ,जिसे उपाध्यायजी ने संघ स्थान पर शाखाओं के माध्य से सीखा था। यद्यपि स्वतंत्रता के दौरान महात्मा गांधी ने जिस हिन्दुत्व के सहारे स्वतंत्रता आन्दोलन लडा था उसमें वे जिन श्रीराम को रघुपति राघव राजाराम भजते हुये एक-एक पंक्ति में ही तीन - तीन वार स्मरण करते थे । उन्हे आजादी के बाद पं.जवरहरलाल नेहरूजी ने तुरंत ही भुला दिया था। इतना ही नहीं गांधीजी के ग्रामीण उत्थान और गौरक्षा के स्वप्न को भी नकार दिया गया।

1925 में संघ ने हिन्दुत्व के आत्मोत्थान का कार्य हाथ में लिया था,उसी हिन्दुत्व की ध्वजा को भारतीय जनसंघ ने राजनैतिक क्षैत्र में संभाला और आगे बडे, देश इनके साथ खडा हुआ। अब यह दल कभी प्रथम तो कभी नम्बर दो की पोजीशन पर निरंतर रह रहा है। जो कि इसमें जन विश्वास को दर्शाता है। चाहे जनसंघ रहा हो,चाहे भाजपा , विचार मिला राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से, संघ के संस्थापक डॉ.केशव बलीराम हेडगेवार स्वतंत्रता सेनानी थे,उन पर लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की कांग्रेस का गहरा प्रभाव था जिसमें प्रखर हिन्दुत्व था, दूरी बडी खिलाफत आन्दोलन से,संघ स्थापना के विचार का कारण बना, मोपला में हिन्दूओं का साम्प्रदायिकता के आधार पर नरसंहार और कांग्रेस की चुप्पी। अंग्रेज सरकार ने तो मुस्लिम तुष्टिकरण की निति फूट डालो राज करों के लिये की थी,मगर उसका अनुसरण गांधी - नेहरू कांग्रेस ने भी किया  जिसके कारण देश बंट गया। असल में साम्प्रदायिकता  यही है, कि कांग्रेस फिर देश में एक नया विभाजन बो रही है।

संघ में, जनसंघ में और आज भाजपा में बात अखण्ड भारत की बात होती हैं, यही शपथ तो रावी के तट पर महात्मा गांघी ,सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू ने भी हजारों कांग्रेस के लोगों के साथ खाई थी। कांग्रेस ने देश की अखण्डता को स्वतंत्रतता के नाम पर तोड दिया। जल्दबाजी में देश का विभाजन करवा बैठे! मयमांर और लंका भी आजाद हुये मगर विभाजित नहीं पूरे - पूरे आजाद हुये। इन पर भी तो ब्रिटिश सरकार का ही कब्जा था। कहीं न कहीं तत्कालीन कांग्रेस नेताओं की दृडता में ही कमी रही। नेवी विद्रोह की अनुकूल परिस्थितियां थी उसका नेतृत्वकर्ता एक मुस्लिम सैनिक था जोे देश को अखण्ड रखना चाहता था,इसके बाद भी देश बंटा!  देश आजाद कांग्रेस ने करवाया तो देश विभाजित भी कांग्रेस ने ही करवाया हे।

जम्मू और कश्मीर के पूर्ण विलय में तो बाधा ही नेहरूजी बनें,वहां के महाराजा ने जब पूर्ण विलय के हस्ताक्षार कर दिये थे तो अन्य रजवाडों की ही तरह इस क्षैत्र का पूर्ण विलय होना चाहिये था,मगर नेहरूजी ने अपने मित्र शेख अब्दुल्लाह का मान बडाने के लिये तथा पुरानी कुंठा से ग्रस्त हो कर महाराजा हरीसिंह को अपमानित करने के लिये,एक सहराष्ट्र का दर्जा दे दिया,फौजें पाकिस्तान द्वारा कब्जा किये गये क्षैत्र को जीत रहीं थीं,पाकिस्तान हार के भय से कांप रहा था,तब अपनी तरफ से बिना पूरा अपना क्षैत्र लिये युद्ध विराम करना या अपना भूभाग छोड देना नेहरूजी की गलती थी,तबसे आज तक देश कश्मीर समस्या के नाम पर खामियाजा भुगत रहा है। इसीलिये तब धारा 370 के विरूद्ध जनसंघ ने संर्घष किया, राष्ट्रहित की पहली बली के रूप में अपने अध्यक्ष श्यामाप्रशाद मुखर्जी को बलिदान किया। आज तक जो भी शिथिलीकरण इस धारा में हुये वह जनसंघ के संघर्श की बदौलत ही हुये हैं। यह गलती नेहरूजी ने नहीं की होती और मामला पटेल पर ही छोड दिया होता तो कश्मीर समस्या होती ही नहीं ।

आजादी की लडाई ज्यों - ज्यों निर्णायक मोड की तरफ  बड रही थी,नेहरूजी विभाजन की समस्याओं के बजाये,अपना महत्वपूर्ण समय ब्रिटिश गवर्नर माउन्ट बैटन के  हाउस पर अधिक बिताने लगे थे, लगता है ब्रिटिश गवरमेंट अंग्रेज हिन्दू नेहरू और अंग्रेज मुसलमान जिन्ना को पहले से ही तय कर चुकी थी।  सरदार पटेल का पक्ष प्रबल होते हुये भी नेहरू को प्रधानमंत्री बनाने का गांधीजी का फरमान किस विवशता में आया , यह तो शोध का विषय है। मगर संघ समझ चुका था कि स्वतंत्र भारत का हित कांग्रेस से नहीं होने वाला। इसमें गांधी वध की ओट से जिस तरह के प्रखर प्रहार संघ पर हुये और पूरे देश में एक भी राजनैतिक दल ने संघ पर हो रहे अन्यायों की आवाज किसी भी सदन में नहीं उठाई , तब ही तय हो गया था कि देश की राजनीति में न्याय के पक्ष के लिये, संघ के कुछ स्वंयसेवक जायें मार्गदर्शन करें,अनुवाई करें।

मार्च 1949 में ही सरकार्यवाह भैय्याजी दाणी ने पत्र लिख कर एकनाथ जी रानाडे को संविधान आदि बनाने का निर्देष दे दिया थे ।  उस दौर में संघ की आजाद भारत में भूमिका को लेकर भी बहस छिड गई थी,एक विचार था संघ स्वंय राजनिति में आये,सी.परमेश्वरन,बलराज मधोक,के. आर. मलकानी,दादाराव परमार्थ,ध्रुवनारायाण सिंह के लेख छपे थे , जिनसे इतना निकल रहा था कि संघमार्ग पर चलने वाले राजनैतिक दल की आवश्यकता हे। गुरूजी ने स्पष्टता  से संघ को राजनैतिक दल बनाने से इंकार कर दिया ।  1950 में नेहरू-लियाकत समझौते से नाराज होकर हिन्दू महासभा के तत्कालीन अध्यक्ष श्यामाप्रशाद मुखर्जी केन्द्र सरकार से त्यागपत्र दे कर बाहर आ चुके थे। उनकी अध्यक्षता में जनसंघ का निर्माण किया गया,जिसमें संघ ने अपने कुछ प्रखर प्रचारकों को राजनिति में कार्य करने हेतु भेजा,जिनमें नानाजी देखमुख,भाई महावीर,पं.दीनदयाल उपाध्याय,सुन्दरसिंह भंण्डारी, अटलबिहारी वाजपेयी,लालकृष्ण आडवाणी आदि प्रमुख थे,जिन्होने जनसंघ चलाया,जनता पार्टी में रहे और फिर भारतीय जनता पार्टी को आगे बढाया।

चीन ने तिब्बत को पंडित नेहरू की सहमति से हडपा,हमने अपने तिब्बत के अधिकारों को छोडा, तब से ही संघ और जनसंघ ने कहा चीन की नियत ठीक नहीं है। नेहरूजी साम्यवाद प्रेम में हिन्दू-चीनी भाई-भाई करते रहे, 1962 मे जब चीन का हमला हो चुका था तब भी पहली सूचना संघ के प्रमुख गोलवलकर जी ने दी थी।ं सवाल यह है कि आजादी के समय कई अन्य पार्टियां भी बनीं थीं,पहले चुनाव में 3,दूसरे चुनाव में 4 और तीसरे चुनाव में मात्र 14 सीटें ही प्राप्त करने के बाद भी, आगे जनसंघ ही क्या बडा..! क्यों कि संघ की प्रेरणा और आर्शीवाद के साथ - साथ इसे सही मार्गदर्शन भी तो प्राप्त होता रहा, इसलिये यह आगे बडा । क्यों कि तब बी. बी. सी. लंदन कहता था कि भारत में नेहरू के बाद कौन सबसे अधिक जनस्विकार्य व्यक्तित्व है,तो वह नाम संघ के सरसंघचालक गुरूजी का है।

कुल मिलाकर कांग्रेस ने जनता की वह आकांक्षायें पूरी नहीं की, जिन्हे सामान्यतः इस देश की जनता पूरी होते देखना चाहती थी, जैसे गुजरात में सोमनाथ की मुक्ति का स्वप्न कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के माध्यम से सम्पूर्ण गुजरात ने देखा था, महात्मा गांधी की अनुमति से सोमनाथ पुर्नउद्धार कार्य को,उपप्रधानमंत्री सरदार पटेल व राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रशाद व अन्य ने पूरा करवाया। मगर नेहरूजी की तनिक भी इच्छा नहीं थी। उन्होने ही अयोध्या में दखल देकर मामला उलझाया। श्रीराम मंदिर का पुर्नउद्धार तब ही हो जाता कोई विवाद भी नहीं था। गुलामी के दौर में जो कुछ नष्ट हुआ और अब ठीक हो सकता था,उस ओर भी ध्यान नहीं दिया गया। नेहरूजी ने देश को अपनी जायदाद के रूप में इस्तेमाल किया और उसके स्वतंत्रता के अन्य प्रश्नों को टाल दिया। श्रीराम जन्म भूमि की मुक्ति और श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति इसी तरह के प्रश्न थे,जिनका तब तत्काल निदान संभव था। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की जरूरत ही नहीं रहती मगर हिन्दु को लगा कि वह ठगा गया,इसी कारण इस मामले में पूरा देश कांग्रेस के खिलाफ था। 1984 में 404 का प्रचण्ड बहूमत के बाद कांग्रेस को हिन्दू उपेक्षा के कारण 114 सीटों पर सिमटने के दिन भी देखने पडे।

आज जब वंशवाद,आंतरिक लोकतंत्र और नैतिकता की बात आती है,तब सिर्फ एक दल सबके सामने आता है,जिसमें आंतरिक लोकतंत्र है,वंशवाद कतई नहीं है और जिसमें देश का अपना स्वदेशी विचार है तो वह भाजपा ही है। इस समय भारतीय राजनीति में अन्य दलों ने पार्टी और विचार को दफन कर दिया है वहां व्यक्ति केन्द्र बन गया है जैसे सोनिया गांधी या फिर राहुल गांधी या फिर प्रियंका गांधी...! कोई विचार दर्शन देशहित नहीं नहीं..!! यही हाल मुलायम सिंह या फिर अखिलेश प्रताप सिंह, इसी तरह लालूप्रशाद या राबडी देवी..,डीएमके का मतलब करूणानिधि या उनका पुत्र स्टालिन! यही कश्मीर से कन्याकुमारी ज्यादातर दलों में है। कम्युनिष्ट विदेशी विचारधारा के भटकन मात्र हैं। एक-दो दल और भी हैं जो विचारधारा नहीं है या फिर कोई व्यक्ति अपरोक्ष केन्द्र में है। इस परिदृश्य में आनेवाला कल किसी में दिख रहा है तो वह भाजपा ही है।

एक दौर फिर से आया,भारतमाता फिर परोक्ष गुलाम हो गई,1975 से 77 तक का आपातकाल, बिना कसूर विपक्ष के नेतागण जेलों  में बंद कर दिये गये, जो आवाज इंदिराजी को नहीं भाती वह आवाज जेल के सींखचों के पीछे होती थी। संघ सहित अनेक संगठनों पर प्रतिबंध लग गये। देश में हवा इंदिराजी से पूछ कर बहने लगी! इस अत्याचार के विरूद्ध किसी संगठन के पास विरोध की ताकत नहीं थी। संघ की तरूणाई सडकों पर उतरी,विरोध हुआ,नौजवानों ने जीवन खतरे में डालकर डी आई आर में गिरफतारियां  दीं,जेलों में बंद रहे,तमाम विश्व में आपातकाल की निंदा होने लगी। आपातकाल हटा ,देश के 35 साल के इतिहास में केन्द्र से कांग्रेस सरकार भी पहलीवार हारी और हटी। यदि संघ की शक्ति स्थानीय स्तर पर नहीं होती तो यह नहीं हो पाता। जहां संघ कमजोर था वहां कांग्रेस तमाम जुल्मों के बाद भी आई थी।

किसी देश का राजनैतिक परिदृश्य कुछ दसकों में नहीं होता,बल्कि शताब्दियां बता पाती हैं कि उस देश की दिशा क्या है। 1984 के बाद से आज तक कांग्रेस पर स्पष्ट बहूमत नहीं है। नरसिंहराव सरकार अल्पमत थी,गत मनमोहनसिंह सरकार और वर्तमान मनमोहनसिंह सरकार भी अल्पमत है। देश में कुल मिला कर अब कांग्रेस में बहुत अधिक समर्थन नहीं रहा है,उसका विकल्प भाजपा है यह तो 1984 में भी साबित हुआ था तब कांग्रेस के 404 के मुकाबले भाजपा 2 सीटों पर होकर भी मत प्रतिशत में कांग्रेस के बाद दूसरे ही पायदान पर थी। वहीं 15वीं लोकसभा के चुनाव में भाजपा 433 स्थानों पर लडी तो कांग्रेस 440 स्थानों पर,भाजपा को 116 स्थान मिले तो कांग्रेस को 206 स्थान और भाजपा का मत प्रतिशत 18.80 है तो कांग्रेस का 28.55 है। भाजपा की अभी तक सबसे अधिक सीटें 182 रहीं हैं तथा मत प्रतिशत की अधिकतम 25.59 प्रतिशत रहा है। कांग्रेेस अभी तक सबसे अधिक 404 सीटें जीती है और उसका मत प्रतिशत 49.10 प्रतिशत रहा है। नम्बर दो के लिये जो आंकडे भाजपा के हैं उन्हे कांग्रेस के अलावा अन्य कोई दल पिछले 20 वर्षों की राजनिति में छू नहीं पाया है। पाश्चात्य आक्रमण के दौर में भाजपा देश की आवश्यकता बन कर उभरी है।
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