शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

वैशाखी : विशेष गौरव : जलियांवाला बाग नरसंहार : शहीद ए आजम उधम सिंह


गुरु गोविंद सिंह जी, वैशाखी दिवस को विशेष गौरव देना चाहते थे। इसलिए उन्होंने ने 1699 ई. को वैशाखी पर श्री आनंदपुर साहिब में विशेष समागम किया। इसमें देश भर की संगत ने आकर इस ऐतिहासिक अवसर पर अपना सहयोग दिया। गुरु गोविंद सिंह जी ने इस मौके पर संगत को ललकार कर कहा- 'देश को ग़ुलामी से आज़ाद करने के लिए मुझे एक शीश चाहिए। गुरु साहिब की ललकार को सुनकर पांच वीरों 'दया सिंह खत्री, धर्म सिंह जट, मोहकम सिंह छीवां, साहिब सिंह और हिम्मत सिंह' ने अपने अपने शीश गुरु गोविंद सिंह जी को भेंट किए। ये पांचो सिंह गुरु साहिब के 'पंच प्यारे' कहलाए। गुरु साहिब ने सबसे पहले इन्हें अमृत पान करवाया और फिर उनसे खुद अमृत पान किया। इस प्रकार 1699 की वैशाखी को 'खालसा पंथ' का जन्म हुआ, जिसने संघर्ष करके उत्तर भारत में मुग़ल साम्राज्य को समाप्त कर दिया। हर साल वैशाखी के उत्सव पर 'खालसा पंथ' का जन्म दिवस मनाया जाता है।
----
जलियांवाला बाग


जब डायर ने किया दो हजार हिन्दुस्तानियों का कत्ल...






सरकारी आंकड़ों में मरने वालों की संख्या 379 बताई गई, जबकि पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार कम से कम 1300 लोग मारे गए थे. स्वामी श्रद्धानंद के मुताबिक मरने वालों की संख्या 1500 से अधिक थी. अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन के मुताबिक मौत का यह आंकड़ा 1800 से ज्यादा था.
इस घटना की दुनियाभर में निन्दा हुई, लेकिन जनरल डायर ने कहा कि लोगों को सबक सिखाने के लिए यह जरूरी था. ब्रिटेन के एक अखबार ने इसे आधुनिक इतिहास का सबसे नृशंस हत्याकांड करार दिया.
डायर ने आजादी के दीवानों की जान तो ले ली, लेकिन इस नरसंहार के बाद लोगों का आजादी पाने का जज्बा और भी बुलंद हो गया. आजादी के दीवानों के मन में इतनी आग भर गई कि वे जान की परवाह किए बिना स्वतंत्रता के हवनकुंड में कूदने लगे.
घटना से गुस्साए उधम सिंह ने कसम खाई कि वे माइकल ओडवायर को मारकर इस घटना का बदला लेंगे. 13 मार्च 1940 को उनकी यह प्रतिज्ञा पूरी हुई और उन्होंने लंदन के कॉक्सटन हाल में ओडवायर को गोलियों से भून डाला. वहीं दूसरी ओर जनरल डायर कई तरह की बीमारियों से तड़प-तड़पकर मर गया.
जलियांवाला बाग की दीवारों पर आज भी गोलियों के निशान मौजूद हैं, जो ब्रितानिया हुकूमत के जुल्मों की कहानी कहते नजर आते हैं.सभा को विफल करने के लिए हुकूमत ने तरह-तरह के हथकंडे अपनाए. सभा में भाग लेने मुम्बई से अमृतसर आ रहे महात्मा गांधी को पलवल रेलवे स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया गया.
हुकूमत की कारगुजारियों से गुस्साए लोग हजारों की संख्या में 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग पहुंच गए.
इस सभा से तिलमिलाए पंजाब के तत्कालीन गवर्नर माइकल ओडवायर ने ब्रिगेडियर जनरल रेजीनल्ड डायर को आदेश दिया कि वह हिन्दुस्तानियों को सबक सिखा दें. इस पर जनरल डायर ने 90 सैनिकों को लेकर जलियांवाला बाग को घेर लिया और जैसे ही सभा शुरू हुई मशनीगनों से अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी गई. वे लगभग 10 मिनट तक निहत्थे लोगों पर गोलियां बरसाते रहे. उनकी बंदूकें तब तक खामोश नहीं हुई, जब तक कि उनकी गोलियां खत्म नहीं हो गईं.
बाग तीन ओर से उंची-उंची दीवारों से घिरा था और इसमें आने-जाने का एक ही रास्ता होने की वजह से लोग भाग भी नहीं पाए. जान बचाने के लिए बहुत से लोगों ने पार्क में मौजूद कुएं में छलांग लगा दी, लेकिन वे भी नहीं बचे और पानी में डूबने से उनकी मौत हो गई. बहुत से लोग भगदड़ में मारे गए. बाग में लगी पट्टिका पर लिखा है कि 120 शव तो सिर्फ कुएं से ही मिले
सरकारी आंकड़ों में मरने वालों की संख्या 379 बताई गई, जबकि पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार कम से कम 1300 लोग मारे गए थे. स्वामी श्रद्धानंद के मुताबिक मरने वालों की संख्या 1500 से अधिक थी. अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन के मुताबिक मौत का यह आंकड़ा 1800 से ज्यादा था.
इस घटना की दुनियाभर में निन्दा हुई, लेकिन जनरल डायर ने कहा कि लोगों को सबक सिखाने के लिए यह जरूरी था. ब्रिटेन के एक अखबार ने इसे आधुनिक इतिहास का सबसे नृशंस हत्याकांड करार दिया.
डायर ने आजादी के दीवानों की जान तो ले ली, लेकिन इस नरसंहार के बाद लोगों का आजादी पाने का जज्बा और भी बुलंद हो गया. आजादी के दीवानों के मन में इतनी आग भर गई कि वे जान की परवाह किए बिना स्वतंत्रता के हवनकुंड में कूदने लगे.
घटना से गुस्साए उधम सिंह ने कसम खाई कि वे माइकल ओडवायर को मारकर इस घटना का बदला लेंगे. 13 मार्च 1940 को उनकी यह प्रतिज्ञा पूरी हुई और उन्होंने लंदन के कॉक्सटन हाल में ओडवायर को गोलियों से भून डाला. वहीं दूसरी ओर जनरल डायर कई तरह की बीमारियों से तड़प-तड़पकर मर गया.
जलियांवाला बाग की दीवारों पर आज भी गोलियों के निशान मौजूद हैं, जो ब्रितानिया हुकूमत के जुल्मों की कहानी कहते नजर आते हैं. (13 अप्रैल को जलियांवाला बाग नरसंहार पर विशेष)

------------


ड्वायर को मारकर लिया जलियांवाला बाग का बदला


भाषा | नई दिल्‍ली, 30 जुलाई 2010
शहीद ए आजम उधम सिंह एक ऐसे महान क्रांतिकारी थे जिन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लेने के लिए अपना जीवन देश के नाम कुर्बान कर दिया. लंदन में जब उन्होंने माइकल ओ. ड्वायर को गोली से उड़ाया तो पूरी दुनिया में इस भारतीय वीर की गाथा फैल गई.
तेरह अप्रैल 1919 को अमृतसर में बैसाखी के दिन हुए नरसंहार के समय ओ.ड्वायर ही पंजाब प्रांत का गवर्नर था. उसी के आदेश पर ब्रिगेडियर जनरल रेजीनाल्ड डायर ने जलियांवाला बाग में सभा कर रहे निर्दोष लोगों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाईं थीं.
26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गांव में जन्मे उधम सिंह ने जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार का बदला लेने की प्रतिज्ञा की थी जिसे उन्होंने अपने सैकड़ों देशवासियों की सामूहिक हत्या के 21 साल बाद खुद अंग्रेजों के घर जाकर पूरा किया.
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर चमन लाल का कहना है कि उधम सिंह एक ऐसे निर्भीक योद्धा थे जिन्होंने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर दुनिया में भारतीयों की वीरता का परचम फहराया.
सन 1901 में उधम सिंह की मां और 1907 में उनके पिता का निधन हो गया. इस घटना के चलते उन्हें अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में शरण लेनी पड़ी. उधम सिंह के बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्ता सिंह था, जिन्हें अनाथालय में क्रमश: उधम सिंह और साधु सिंह के रूप में नए नाम मिले.
अनाथालय में उधम सिंह की जिन्दगी चल ही रही थी कि 1917 में उनके बड़े भाई का भी देहांत हो गया और वह दुनिया में एकदम अकेले रह गए. 1919 में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए.
डॉ. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी तथा रोलट एक्ट के विरोध में अमृतसर के जलियांवाला बाग में लोगों ने 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन एक सभा रखी जिसमें उधम सिंह लोगों को पानी पिलाने का काम कर रहे थे.
इस सभा से तिलमिलाए पंजाब के तत्कालीन गवर्नर माइकल ओ.ड्वायर ने ब्रिगेडियर जनरल रेजीनल्ड डायर को आदेश दिया कि वह भारतीयों को सबक सिखा दे. इस पर जनरल डायर ने 90 सैनिकों को लेकर जलियांवाला बाग को घेर लिया और मशीनगनों से अंधाधुंध गोलीबारी कर दी जिसमें सैकड़ों भारतीय मारे गए. जान बचाने के लिए बहुत से लोगों ने पार्क में मौजूद कुएं में छलांग लगा दी. बाग में लगी पट्टिका पर लिखा है कि 120 शव तो सिर्फ कुएं से ही मिले.
आधिकारिक रूप से मरने वालों की संख्या 379 बताई गई जबकि पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार कम से कम 1300 लोग मारे गए थे. स्वामी श्रद्धानंद के अनुसार मरने वालों की संख्या 1500 से अधिक थी, जबकि अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन डाक्टर स्मिथ के अनुसार मरने वालों की संख्या 1800 से अधिक थी. राजनीतिक कारणों से जलियांवाला बाग में मारे गए लोगों की सही संख्या कभी सामने नहीं आ पाई.
इस घटना से वीर उधम सिंह विचलित हो उठे और उन्होंने जलियांवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर माइकल ओ.ड्वायर को सबक सिखाने की शपथ ली. उधम सिंह अपने काम को अंजाम देने के उद्देश्य से 1934 में लंदन पहुंचे. वहां उन्होंने एक कार और एक रिवाल्वर खरीदी तथा उचित समय का इंतजार करने लगे.
भारत के इस योद्धा को जिस मौके का इंतजार था, वह उन्हें 13 मार्च 1940 को उस समय मिला जब माइकल ओ.ड्वायर लंदन के काक्सटन हाल में एक सभा में शामिल होने के लिए गया. उधम सिंह ने एक मोटी किताब के पन्नों को रिवाल्वर के आकार में काटा और उनमें रिवाल्वर छिपाकर हाल के भीतर घुसने में कामयाब हो गए.
सभा के अंत में मोर्चा संभालकर उन्होंने ओ.ड्वायर को निशाना बनाकर गोलियां दागनी शुरू कर दीं. ओ.ड्वायर को दो गोलियां लगीं और वह वहीं ढेर हो गया. इस मामले में 31 जुलाई 1940 को पेंटविले जेल में उधम सिंह को फांसी पर चढ़ा दिया गया जिसे उन्होंने हंसते हंसते स्वीकार कर लिया. 31 जुलाई 1974 को ब्रिटेन ने उनके अवशेष भारत को सौंप दिए.

-----------

खुशी की फुहार लाई बैसाखी  

- गोविन्द बल्लभ जोशी
कैलेंडर और मान्यताएँ : बैसाखी प्रत्येक वर्ष अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 13 अप्रैल को मनाई जाती है। कभी 12-13 वर्ष में 14 तारीख की भी हो जाती है। इस वर्ष 14 अप्रैल को यह रंगीला एवं छबीला पर्व मनाया जाएगा। अतः बैसाखी आकर पंजाब के तरुण वर्ग को याद दिलाती है। वह याद दिलाती है उस भाईचारे की जहाँ माता अपने दस गुरुओं के ऋण को उतारने के लिए अपने पुत्र को गुरु के चरणों में समर्पित करके सिख बनाती थी। ऐसी वंदनीय भूमि को सादर नमन करते हैं।

बैसाखी का पर्व भारत वर्ष में सभी जगह मनाया जाता है। इसे खेती का पर्व भी कहा जाता है। किसान इसको बड़े आनंद के साथ मनाते हुए खुशियाँ का इजहार करते हैं। संक्रांति का दिन होने से इस कृषि पर्व को आध्यात्मिक पर्व के रूप में भी मान्याता मिली है। उत्तर भारत में विशेष कर पंजाब वैशाखी पर्व को बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाता है। ढोल-नगाड़ों के साथ युवक और युवतियाँ प्रकृति के इस उत्सव का स्वागत करते हुए गीत गाते हैं एक-दूसरे को बधाइयाँ देते हैं और झूम-झूमकर नाच उठते हैं। इससे कहा जा सकता है कि कृषि प्रधान देश का यह ऋषि और कृषि पर्व है।


ND
भारतीय ज्योतिष में चंद्र गणना के अनुसार चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा वर्ष का प्रथम दिन है और सौर गणना के अनुसार बैसाखी (मेष संक्रांति) होती है। भारत में महीनों के नाम नक्षत्रों पर रखे गए हैं। बैसाखी के समय आकाश में विशाखा नक्षत्र होता है। विशाखा युवा पूर्णिमा में होने के कारण इस मास को वैशाखी कहते हैं। इस प्रकार वैशाख मास के प्रथम दिन को वैशाखी कहा गया और पर्व के रूप में स्वीकार किया गया।

बैसाखी के दिन सूर्य मेष राशि में संक्रमण करता है अतः इसे मेष संक्रांति भी कहते हैं। इस दिन समस्त उत्तर भारत की पवित्र नदियों एवं सरोवरों में स्नान करने का माहात्म्य माना जाता है। अतः सभी नर-नारी चाहे खालसा पंथ के अनुयायी हों अथवा वैष्णव धर्म के प्रातःकाल नदी अथवा सरोवरों में स्नान करना अपना धर्म समझते हैं। इस दिन गुरुद्वारों में विशेष उत्सव मनाए जाते हैं। खेत में खड़ी फसल पर हर्षोल्लास प्रकट करने का दिन है।

बैसाखी मुख्यतः कृषि पर्व है। पंजाब की शस्य-श्यामला भूमि से जब रबी की फसल पककर तैयार हो जाती है और वहाँ का बाँका-छैला जवान उस अन्न-धन रूपी लक्ष्मी को संग्रहीत करने के लिए लालायित हो उठता है, 'बल्लिए कनक दिए ओनू स्वांणजे नसीबा वालै।' इस गीत को ढोल की थाप के साथ पंजाब की युवतियाँ गा उठती हैं, 'हे प्रीतम, मैं सोने की दाँती बनवाकर गेहूँ के पचास पूले काटूँगी। मार्ग में झोपड़ी बनवा लेंगे। ईश्वर इच्छा पूरी करेगा।'

वह इस प्रकार गाती हैं-

दांता बनायां सार दी पलू बड़स पंगाह।
राह विच पाले कुल्ली करवां दी।
तेरी रब मचाऊं आस गबरुआ ओए आस।

बैसाखी पर्व केवल पंजाब में ही नहीं बल्कि उत्तर भारत के अन्य प्राँतों में भी उल्लास के साथ मनाया जाता है। सौर नव वर्ष या मेष संक्रांति के कारण पर्वतीय अंचल में इस दिन अनेक स्थानों पर मेले लगते हैं। लोग इस दिन श्रद्धापूर्वक देवी की पूजा करते हैं। उत्तर में नहीं बल्कि उत्तर-पूर्वी सीमा के असम प्रदेश में भी मेष संक्रांति आने पर बिहू का पर्व मनाया जाता है। वैशाख माह में वसंत ऋतु अपने पूर्ण यौवन पर होती है।