गुरुवार, 10 मई 2012

महाराणा प्रताप

महाराणा प्रताप

महाराणा प्रताप
वीर विनोद के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ला 13 संवत 1596 विक्रम अर्थात 31 मई 1539 है । नैनसी के अनुसार  4 मई 1540 और कर्नल टाड  के अनुसार 9 मई 1549 है ......
(जन्म- 9 मई, 1540, राजस्थान, कुम्भलगढ़; मृत्यु- 19 जनवरी, 1597) उदयपुर, मेवाड़ में शिशोदिया राजवंश के राजा थे। वह तिथि धन्य है, जब मेवाड़ की शौर्य-भूमि पर मेवाड़-मुकुट मणि प्रताप का जन्म हुआ। उनका नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है।

जीवन परिचय
राजस्थान के कुम्भलगढ़ में प्रताप का जन्म महाराणा उदयसिंह एवं माता राणी जीवत कँवर (  जैवंता  बाई    ) के घर हुआ था। बप्पा रावल के कुल की अक्षुण्ण कीर्ति की उज्ज्वल पताका, राजपूती आन एवं शौर्य का वह पुण्य प्रतीक, राणा साँगा का वह पावन पौत्र जब (वि. सं. 1628 फाल्गुन शुक्ल 15) तारीख 1 मार्च सन् 1573 को सिंहासनासीन हुआ। शौर्य की मूर्ति प्रताप एकाकी थे। अपनी प्रजा के साथ और एकाकी ही उन्होंने जो धर्म एवं स्वाधीनता के लिये ज्योतिर्मय बलिदान किया, वह विश्व में सदा परतन्त्रता और अधर्म के विरुद्ध संग्राम करनेवाले, मानधनी, गौरवशील मानवों के लिये मशाल सिद्ध होगा।

'धर्म रहेगा और पृथ्वी भी रहेगी, (पर) मुग़ल-साम्राज्य एक दिन नष्ट हो जायगा। अत: हे राणा! विश्वम्भर भगवान के भरोसे अपने निश्चय को अटल रखना।'-अब्दुलरहीम खानखाना [1]
महाराणा का वह निश्चय लोकविश्रुत है—भगवान एकलिंग की शपथ है, प्रताप के इस मुख से अकबर तुर्क ही कहलायेगा। मैं शरीर रहते उसकी अधीनता स्वीकार करके उसे बादशाह नहीं कहूँगा। सूर्य जहाँ उगता है, वहाँ पूर्व में ही उगेगा। सूर्य के पश्चिम में उगने के समान प्रताप के मुख से अकबर को बादशाह निकलना असम्भव है। [2]
सम्राट अकबर की कूटनीति व्यापक थी, राज्य को जिस प्रकार उन्होंने राजपूत-नरेशों से सन्धि एवं वैवाहिक सम्बन्ध द्वारा निर्भय एवं विस्तृत कर लिया था, धर्म के सम्बन्ध में भी वे अपने 'दीन इलाही' के द्वारा हिन्दू-धर्म की श्रद्धा थकित करने के प्रयास में नहीं थे- कहना कठिन है। आज कोई कुछ कहे, किंतु उस युग में सच्ची राष्ट्रियता थी हिंदुत्व, और उसकी उज्ज्वल ध्वजा गर्व पूर्वक उठाने वाला एक ही अमर सेनानी था- प्रताप। अकबर का शक्ति सागर इस अरावली के शिखर से व्यर्थ ही टकराता रहा- नहीं झुका।
अकबर के महासेनापति मानसिंह शोलापुर विजय करके लौट रहे थे। उदय सागर पर महाराणा ने उनके स्वागत का प्रबन्ध किया। हिन्दू नरेश के यहाँ, भला अतिथि का सत्कार न होता, किंतु महाराणा प्रताप ऐसे राजपूत के साथ बैठकर भोजन कैसे कर सकते थे, जिसकी बुआ मुग़ल-अन्त:पुर में हो। मानसिंह को बात समझने में कठिनाई नहीं हुई। अपमान से जले वे दिल्ली पहुँचे। उन्होंने सैन्य सज्जित करके चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया।

वीरता के परिचायक
महाराणा प्रताप ने एक प्रतिष्ठित कुल के मान—सम्मान और उसकी उपाधि को प्राप्त किया। परन्तु उसके पास न तो राजधानी थी और न ही वित्तीय साधन। बार—बार की पराजयों ने उसके स्वबन्धुओं और जाति के लोगों को निरुत्साहित कर दिया था। फिर भी उसके पास अपना जातीय स्वाभिमान था। उसने सत्तारूढ़ होते ही चित्तौड़ के उद्धार, कुल के सम्मान की पुनर्स्थापना तथा उसकी शक्ति को प्रतिष्ठित करने की तरफ़ अपना ध्यान केन्द्रित किया। इस ध्येय से प्रेरित होकर वह अपने प्रबल शत्रु के विरुद्ध जुट सका। उसने इस बात की चिन्ता नहीं की कि परिस्थितियाँ उसके कितने प्रतिकूल हैं। उसका चतुर विरोधी एक सुनिश्चित नीति के द्वारा उसके ध्येय का परास्त करने में लगा हुआ था। धूर्त्त मुग़ल प्रताप के धर्म और रक्त बंधुओं को ही उसके विरोध में खड़ा करने में जुटा था। मारवाड़, आमेर, बीकानेर और बूँदी के राजा लोग अकबर की सार्वभौम सत्ता के सामने मस्तक झुका चुके थे। इतना ही नहीं, प्रताप का सगा भाई सागर[3] भी उसका साथ छोड़कर शत्रु—पक्ष से जा मिला और अपने इस विश्वासघात की क़ीमत उसे अपने कुल की राजधानी और उपाधि के रूप में प्राप्त हुई।

बलिदान भूमि हल्दीघाटी
 मुख्य लेख : हल्दीघाटी
राजपूताने की वह पावन बलिदान-भूमि, विश्व में इतना पवित्र बलिदान स्थल कोई नहीं। इतिहास के पृष्ठ रंगे हैं उस शौर्य एवं तेज़ की भव्य गाथा से। भीलों का अपने देश और नरेश के लिये वह अमर बलिदान, राजपूत वीरों की वह तेजस्विता और महाराणा का वह लोकोत्तर पराक्रम— इतिहास का, वीरकाव्य का वह परम उपजीव्य है। मेवाड़ के उष्ण रक्त ने श्रावण संवत 1633 वि0 में हल्दीघाटी का कण-कण लाल कर दिया। अपार शत्रु सेना के सम्मुख थोड़े–से राजपूत और भील सैनिक कब तक टिकते? महाराणा को पीछे हटना पड़ा और उनका प्रिय अश्व चेतक-उसने उन्हें निरापद पहुँचाने में इतना श्रम किया कि अन्त में वह सदा के लिये अपने स्वामी के चरणों में गिर पड़ा।



महाराणा प्रताप की प्रतिमा, हल्दीघाटी, उदयपुर
Statue Of Maharana Pratap, Haldighati, Udaipur
दिल्ली का उत्तराधिकारी, युवराज सलीम मुग़ल सेना के युद्ध के लिए चढ़ आया। उसके साथ राजा मानसिंह और सागरजी का जातिभ्रष्ट पुत्र मोहबत ख़ाँ भी था। प्रताप ने अपने पर्वतों और बाईस हज़ार राजपूतों में विश्वास रखते हुए अकबर के पुत्र का सामना किया। अरावली के पश्चिम छोर तक शाही सेना को किसी प्रकार के विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। परन्तु इसके आगे का मार्ग प्रताप के नियन्त्रण में था।

प्रताप अपनी नई राजधानी के पश्चिम की ओर पहाड़ियों में आ डटा। इस इलाक़े की लम्बाई लगभग अस्सी मील थी और इतनी ही चौड़ाई थी। सारा इलाक़ा पर्वतों और वनों से घिरा हुआ है। बीच—बीच में कई छोटी—छोटी नदियाँ बहती हैं। राजधानी की तरफ़ जाने वाले मार्ग इतने तंग और दुर्गम हैं कि बड़ी कठिनाई से दो गाड़ियाँ आ—जा सकती हैं। उस स्थान का नाम हल्दीघाटी है। जिसके द्वार पर खड़े पर्वत को लाँघकर उसमें प्रवेश करना संकट को मोल लेना है। उनके साथ विश्वासी भील लोग भी धनुष और बांण लेकर डट गए। भीलों के पास बड़े—बड़े पत्थरों के ढेर पड़े थे। जैसे ही शत्रु सामने से आयेगा वैसे ही पत्थरों को लुढ़काकर उनके सिर को तोड़ने की योजना थी।

हल्दीघाटी के इस प्रवेश द्वार पर अपने चुने हुए सैनिकों के साथ प्रताप शत्रु की प्रतीक्षा करने लगा। दोनों ओर की सेनाओं का सामना होते ही भीषण रूप से युद्ध शुरू हो गया और दोनों तरफ़ के शूरवीर योद्धा घायल होकर ज़मीन पर गिरने लगे। प्रताप अपने घोड़े पर सवार होकर द्रुतगति से शत्रु की सेना के भीतर पहुँच गया और राजपूतों के शत्रु मानसिंह को खोजने लगा। वह तो नहीं मिला परन्तु प्रताप उस जगह पर पहुँच गया जहाँ पर सलीम अपने हाथी पर बैठा हुआ था। प्रताप की तलवार से सलीम के कई अंगरक्षक मारे गए और यदि प्रताप के भाले और सलीम के बीच में लोहे की मोटी चादर वाला हौदा नहीं होता तो अकबर अपने उत्तराधिकारी से हाथ धो बैठता। प्रताप के घोड़े चेतक ने अपने स्वामी की इच्छा को भाँपकर पूरा प्रयास किया और तमाम ऐतिहासिक चित्रों में सलीम के हाथी के सूँड़ पर चेतक का एक उठा हुआ पैर और प्रताप के भाले द्वारा महावत का छाती का छलनी होना अंकित किया गया है।[4] महावत के मारे जाने पर घायल हाथी सलीम सहित युद्ध भूमि से भाग खड़ा हुआ। इस समय युद्ध अत्यन्त भयानक हो उठा था। सलीम पर प्रताप के आक्रमण को देखकर असंख्य मुग़ल सैनिक उसी तरफ़ बढ़े और प्रताप को घेरकर चारों तरफ़ से प्रहार करने लगे। प्रताप के सिर पर मेवाड़ का राजमुकुट लगा हुआ था। इसलिए मुग़ल सैनिक उसी को निशाना बनाकर वार कर रहे थे। राजपूत सैनिक भी उसे बचाने के लिए प्राण हथेली पर रखकर संघर्ष कर रहे थे। परन्तु धीरे—धीरे प्रताप संकट में फँसता जा रहा था। स्थिति की गम्भीरता को परखकर झाला सरदार ने स्वामिभक्ति का एक अपूर्व आदर्श प्रस्तुत करते हुए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। झाला सरदार मन्नाजी तेज़ी के आगे बढ़ा और प्रताप के सिर से मुकुट उतार कर अपने सिर पर रख लिया और तेज़ी के साथ कुछ दूरी पर जाकर घमासान युद्ध करने लगा। मुग़ल सैनिक उसे ही प्रताप समझकर उस पर टूट पड़े और प्रताप को युद्ध भूमि से दूर निकल जाने का अवसर मिल गया। उसका सारा शरीर अगणित घावों से लहूलुहान हो चुका था। युद्धभूमि से जाते—जाते प्रताप ने मन्नाजी को मरते देखा। राजपूतों ने बहादुरी के साथ मुग़लों का मुक़ाबला किया, परन्तु मैदानी तोपों तथा बन्दूकधारियों से सुसज्जित शत्रु की विशाल सेना के सामने समूचा पराक्रम निष्फल रहा। युद्धभूमि पर उपस्थित बाईस हज़ार राजपूत सैनिकों में से केवल आठ हज़ार जिवित सैनिक युद्धभूमि से किसी प्रकार बचकर निकल पाये।

व्यक्तित्व

महाराणा का वनवास
महाराणा चित्तौड़ छोड़कर वनवासी हुए। महाराणी, सुकुमार राजकुमारी और कुमार घास की रोटियों और निर्झर के जल पर किसी प्रकार जीवन व्यतीत करने को बाध्य हुए। अरावली की गुफ़ाएँ ही आवास थीं और शिला ही शैया थी। दिल्ली का सम्राट सादर सेनापतित्व देने को प्रस्तुत था, उससे भी अधिक- वह केवल चाहता था प्रताप अधीनता स्वीकार कर लें, उसका दम्भ सफल हो जाय। हिंदुत्व पर दीन-इलाही स्वयं विजयी हो जाता। प्रताप-राजपूत की आन का वह सम्राट, हिंदुत्व का वह गौरव-सूर्य इस संकट, त्याग, तप में अम्लान रहा- अडिंग रहा। धर्म के लिये, आन के लिये यह तपस्या अकल्पित है । कहते हैं महाराणा ने अकबर को एक बार सन्धि-पत्र भेजा था, पर इतिहासकार इसे सत्य नहीं मानते। यह अबुल फजल की गढ़ी हुई कहानी भर है। अकल्पित सहायता मिली, मेवाड़ के गौरव भामाशाह ने महाराणा के चरणों में अपनी समस्त सम्पत्ति रख दी। महाराणा इस प्रचुर सम्पत्ति से पुन: सैन्य-संगठन में लग गये। चित्तौड़ को छोड़कर महाराणा ने अपने समस्त दुर्गों का शत्रु से उद्वार कर लिया। उदयपुर उनकी राजधानी बना। अपने 24 वर्षों के शासन काल में उन्होंने मेवाड़ की केशरिया पताका सदा ऊँची रक्खी।

महाराणा की प्रतिज्ञा
प्रताप को अभूतपूर्व समर्थन मिला। यद्यपि धन और उज्ज्वल भविष्य ने उसके सरदारों को काफ़ी प्रलोभन दिया, परन्तु किसी ने भी उसका साथ नहीं छोड़ा। जयमल के पुत्रों ने उसके कार्य के लिये अपना रक्त बहाया, पत्ता के वंशधरों ने भी ऐसा ही किया और सलूम्बर के कुल वालों ने भी चूण्डा की स्वामिभक्ति को जीवित रखा। इनकी वीरता और स्वार्थ—त्याग का वृत्तान्त मेवाड़ के इतिहास में अत्यन्त गौरवमय समझा जाता है। उसने प्रतीज्ञा की थी कि वह 'माता के पवित्र दूध को कभी कलंकित नहीं करेगा।' इस प्रतिज्ञा का पालन उसने पूरी तरह से किया। कभी मैदानी प्रदेशों पर धावा मारकर जन—स्थानों को उजाड़ना तो कभी एक पर्वत से दूसरे पर्वत पर भागना और इस विपत्ति काल में अपने परिवार का पर्वतीय कन्दमूल फल द्वारा भरण-पोषण करना और अपने पुत्र अमर का जंगली जानवरों और जंगली लोगों के मध्य पालन करना-अत्यन्त कष्टप्राय कार्य था। इन सबके पीछे मूल मंत्र यही था कि बप्पा रावल का वंशज किसी शत्रु अथवा देशद्रोही के सम्मुख शीश झुकाये - यह असम्भव बात थी। क़ायरों के योग्य इस पापमय विचार से ही प्रताप का हृदय टुकड़े-टुकड़े हो जाता था। तातार वालों को अपनी बहन-बेटी समर्पण कर अनुग्रह प्राप्त करना, प्रताप को किसी भी दशा में स्वीकार्य न था। 'चित्तौड़ के उद्धार से पूर्व पात्र में भोजन, शय्यापर शयन दोनों मेरे लिये वर्जित रहेंगे।' महाराणा की प्रतिज्ञा अक्षुण्ण रही और जब वे (वि0 सं0 1653 माघ शुक्ल 11) ता0 29 जनवरी सन् 1597 में परमधाम की यात्रा करने लगे, उनके परिजनों और सामन्तों ने वही प्रतिज्ञा करके उन्हें आश्वस्त किया। अरावली के कण-कण में महाराणा का जीवन-चरित्र अंकित है। शताब्दियों तक पतितों, पराधीनों और उत्पीड़ितों के लिये वह प्रकाश का काम देगा। चित्तौड़ की उस पवित्र भूमि में युगों तक मानव स्वराज्य एवं स्वधर्म का अमर सन्देश झंकृत होता रहेगा।
माई एहड़ा पूत जण, जेहड़ा राण प्रताप।
अकबर सूतो ओधकै, जाण सिराणै साप॥

कठोर जीवन निर्वाह
चित्तौड़ के विध्वंस और उसकी दीन दशा को देखकर भट्ट कवियों ने उसको 'आभूषण रहित विधवा स्त्री- की उपमा दी है। प्रताप ने अपनी जन्मभूमि की इस दशा को देखकर सब प्रकार के भोग—विलास को त्याग दिया, भोजन—पान के समय काम में लिये जाने वाले सोने-चाँदी के बर्तनों को त्यागकर वृक्षों के पत्तों को काम में लिया जाने लगा, कोमल शय्या को छोड़ तृण शय्या का उपयोग किया जाने लगा। उसने अकेले ही इस कठिन मार्ग को नहीं अपनाया अपितु अपने वंश वालों के लिये भी इस कठोर नियम का पालन करने के लिये आज्ञा दी थी कि जब तक चित्तौड़ का उद्धार न हो तब तक सिसोदिया राजपूतों को सभी सुख त्याग देने चाहिएँ। चित्तौड़ की मौजूदा दुर्दशा सभी लोगों के हृदय में अंकित हो जाय, इस दृष्टि से उसने यह आदेश भी दिया कि युद्ध के लिये प्रस्थान करते समय जो नगाड़े सेना के आगे—आगे बजाये जाते थे, वे अब सेना के पीछे बजाये जायें। इस आदेश का पालन आज तक किया जा रहा है और युद्ध के नगाड़े सेना के पिछले भाग के साथ ही चलते हैं।

राणा साँगा नेता के रूप में

प्रताप को प्रायः यह कहते सुना गया कि, "यदि उदयसिंह पैदा न होते अथवा संग्रामसिंह और उनके बीच में कोई सिसोदिया कुल में उत्पन्न न होता तो कोई भी तुर्क राजस्थान पर अपना नियम लागू न कर पाता।" सौ वर्ष के बीच में हिन्दू जाति का एक नया चित्र दिखलाई देता है। गंगा और यमुना का मध्यवर्ती देश अपने विध्वंस को भुलाकर एक नवीन बल से बलवान होकर धीरे—धीरे अपना मस्तक उठा रहा था। आमेर और मारवाड़ इतने बलवान हो गये थे कि अकेले मारवाड़ ने ही सम्राट शेरशाह के विरुद्ध संघर्ष किया था और चम्बल के दोनों किनारों पर अनेक छोटे—छोटे राज्य बल संग्रह करके उन्नति की ओर बढ़ रहे थे। कमी थी तो केवल एक ऐसे नेता की जो उन सब शक्तियों को संगठित करके मुसलमानों की सत्ता को छीन सके। ऐसा नेता उन्हें राणा साँगा के रूप में मिला था। हिमालय से लेकर रामेश्वर तक सब ने ही साँगा के गुणों की प्रशंसा की थी। साँगा के स्वर्ग सिधारने के पश्चात जातीय जीवन धीरे—धीरे नष्ट होता गया और हिन्दू लोग अपने पैतृक राज्य से हाथ धो बैठे। यदि साँगा के पीछे उदयसिंह का जन्म न होता अथवा अकबर की अपेक्षा कम समर्थ वाले मुसलमान के हाथ में भारत का शासन होता तो भारत की ऐसी दुर्दशा कभी न होती।


1 महाराणा प्रताप: सूरवीर राष्ट्रभक्त
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2 वीर सपूत महाराणा प्रताप
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3 महाराणा प्रताप की जयंती
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महाराणा प्रताप कठे
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5 महाराणा प्रताप
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महाराणा प्रताप की प्रतिमा, उदयपुर

Statue Of Maharana Pratap, Udaypur
महाराणा द्वारा तैयार ढाँचा
अपने कुछ अनुभवी और बुद्धिमान सरदारों की सहायता से प्रताप ने सीमित साधनों और समय की आवश्यकता को समझते हुए अपनी सरकार का नया ढाँचा निर्मित किया। आवश्यक सैनिक सेवा की स्पष्ट व्याख्या के साथ नई-नई जागीरें प्रदान की गई। सरकार के मौजूदा केन्द्र कमलमीर की सुरक्षा को मज़बूत बनाया गया तथा गोगुन्दा और अन्य पर्वतीय दुर्गों की मरम्मत की गई। मेवाड़ के समतल मैदान की रक्षा करने में असमर्थ प्रताप ने अपने पूर्वजों की नीति का अनुसरण करते हुए दुर्गम पहाड़ी स्थानों में अपने मोर्चे क़ायम किए तथा मैदानी क्षेत्रों के लोगों को परिवार सहित पर्वतों में आश्रय लेने को कहा गया। ऐसा न करने वालों को प्राणदण्ड देने की घोषणा की गई। कुछ ही दिनों में बनास और बेड़स नदियों के सिंचित क्षेत्र भी सूने हो गये अर्थात् "बे-चिराग़" हो गए। प्रताप ने अपनी प्रजा को कठोरता के साथ अपने आदेशों का पालन करने के लिए विवश कर दिया था। उसकी आज्ञा के फलस्वरूप मेवाड़ की सुन्दर भूमि श्मशान के समान हो गई और उस पर यवनों के दाँत पड़ने की कोई आशंका न रही। उस समय यूरोप के साथ मुग़लों का व्यापार-वाणिज्य मेवाड़ के भीतर होकर सूरत या किसी और बन्दरगाह से होता था। प्रताप तथा उसके सरदार अवसर पाकर उस समस्त सामग्री को लूटने लगे।

मारवाड़ का राज्य
अजमेर को अपना केन्द्र बनाकर अकबर ने प्रताप के विरुद्ध सैनिक अभियान शुरू कर दिया। मारवाड़ का मालदेव जिसने शेरशाह का प्रबल विरोध किया था, मेड़ता और जोधपुर में असफल प्रतिरोध के बाद, आमेर के भगवान दास के समान ही अकबर की शरण में चला गया।[5] उसने अपने पुत्र उदयसिंह को अकबर की सेवा में भेजा। अकबर ने अजमेर की तरफ़ जाते हुए नागौर में उससे मुलाक़ात की और इस अवसर पर मंडौर के राव को "राजा" की उपाधि प्रदान की।[6]उसका उत्तराधिकारी उदयसिंह स्थूल शरीर का था, अतः आगे चलकर वह राजस्थान के इतिहास में 'मोटा राजा' के नाम से विख्यात हुआ। इस समय से कन्नौज के वंशज मुग़ल बादशाह के 'दाहिने हाथ' पर स्थान पाने लगे। परन्तु अपनी कुल मर्यादा की बलि देकर मारवाड़ नरेश ने जिस सम्मान को प्राप्त किया था, वह सम्मान क्या मारवाड़ के राज के सन्तान की ऊँचे सम्मान की बराबरी कर सकता है।

मोटा राजा उदयसिंह पहला व्यक्ति था जिसने अपनी कुल की पहली कन्या का विवाह तातार से किया था।[7]इस सम्बन्ध के लिए जो घूस ली गई वह महत्त्वपूर्ण थी। उसे चार समृद्ध परगने प्राप्त हुए। इनकी सालान आमदनी बीस लाख रुपये थी। इन परगनों के प्राप्त हो जाने से मारवाड़ राज्य की आय दुगुनी हो गई। आमेर और मारवाड़ जैसे उदाहरणों की मौजूदगी में, और प्रलोभन का विरोध करने की शक्ति की कमी के कारण, राजस्थान के छोटे राजा लोग अपने असंख्य पराक्रमी सरदारों के साथ दिल्ली के सामंतों में परिवर्तित हो गए और इस परिवर्तन के कारण उनमें से बहुत से लोगों का महत्त्व भी बढ़ गया। मुग़ल इतिहासकारों ने सत्य ही लिखा है कि वे 'सिंहासन के स्तम्भ और अलंकार के स्वरूप थे।' परन्तु उपर्युक्त सभी बातें प्रताप के विरुद्ध भयजनक थीं। उसके देशवासियों के शस्त्र अब उसी के विरुद्ध उठ रहे थे। अपनी मान-मर्यादा बेचने वाले राजाओं से यह बात सही नहीं जा रही थी कि प्रताप गौरव के ऊँचे आसमान पर विराजमान रहे। इस बात का विचार करके ही उनके हृदय में डाह की प्रबल आग जलने लगी। प्रताप ने उन समस्त राजाओं (बूँदी के अलावा) से अपना सम्बन्ध छोड़ दिया जो मुसलमानों से मिल गए थे।

सीसोदिया वंश

सीसोदिया वंश के किसी शासक ने अपनी कन्या मुग़लों को नहीं दी। इतना हि नहीं, उन्होंने लम्बे समय तक उन राजवंशों को भी अपनी कन्याएँ नहीं दीं जिन्होंने मुग़लों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध किये थे। इससे उन राजाओं को काफ़ी आघात पहुँचा। इसकी पुष्टि मारवाड़ और आमेर के राजाओं - बख़्त सिंह और जयसिंह के पुत्रों से होती है। दोनों ही शासकों ने मेवाड़ के सिसोदिया वंश के साथ वैवाहिक सम्बन्धों को पुनः स्थापित करने का अनुरोध किया था। लगभग एक शताब्दी के बाद उनका अनुरोध स्वीकार किया गया और वह भी इस शर्त के साथ कि मेवाड़ की राजकन्या के गर्भ से उत्पन्न होने वाला पुत्र ही सम्बन्धित राजा का उत्तराधिकारी होगा।

सीसोदिया घराने ने अपने की रक्त की पवित्रता को बनाये रखने के लिए जो क़दम उठाये उनमें से एक का उल्लेख करना आवश्यक है क्योंकि उस घटना ने आने वाली घटनाओं को काफ़ी प्रभावित किया है। आमेर का राजा मानसिंह अपने वंश का अत्यधिक प्रसिद्ध राजा था और उसके समय से ही उसके राज्य की उन्नति आरम्भ हुई थी। अकबर उसका फूफ़ा था। वैसे मानसिंह एक साहसी, चतुर और रणविशारद् सेनानायक था और अकबर की सफलताओं में आधा योगदान भी रहा था, परन्तु पारिवारिक सम्बन्ध तथा अकबर की विशेष कृपा से वह मुग़ल साम्राज्य का महत्त्वपूर्ण सेनापित बन गया था। कच्छवाह भट्टकवियों ने उसके शौर्य तथा उसकी उपलब्धियों का तेजस्विनी भाषा में उल्लेख किया है।

राणा प्रताप से मानसिंह का मिलाप


चित्तौड़गढ़ का क़िला
Fort Of Chittorgarh
शोलापुर की विजय के बाद मानसिंह वापस हिन्दुस्तान लौट रहा था तो उसने राणा प्रताप से जो इन दिनों कमलमीर में था, मिलने की इच्छा प्रकट की। प्रताप उसका स्वागत करने के लिए उदयसागर तक आया। इस झील के सामने वाले टीले पर आमेर के राजा के लिए दावत की व्यवस्था की गई। भोजन तैयार हो जाने पर मानसिंह को बुलावा भेजा गया। राजकुमार अमर सिंह को अतिथि की सेवा के लिए नियुक्त किया गया था। राणा प्रताप अनुपस्थित थे। मानसिंह के पूछने पर अमरसिंह ने बताया कि राणा को सिरदर्द है, वे नहीं आ पायेंगे। आप भोजन करके विश्राम करें। मानसिंह ने गर्व के साथ सम्मानित स्वर में कहा कि, "राणा जी से कहो कि उनके सिर दर्द का यथार्थ कारण समझ गया हूँ। जो कुछ होना था, वह तो हो गया और उसको सुधारने का कोई उपाय नहीं है, फिर भी यदि वे मुझे खाना नहीं परोसगें तो और कौन परोसेगा।" मानसिंह ने राणा के बिना भोजन स्वीकार नहीं किया तब प्रताप ने उसे कहला भेजा कि जिस राजपूत ने अपनी बहन तुर्क को दी हो, उसके साथ कौन राजपूत भोजन करेगा।

राजा मानसिंह ने इस अपमान को आहूत करने में बुद्धिमता नहीं दिखाई थी। यदि प्रताप की तरफ़ से उसे नियंत्रित किया गया होता तब तो उसका विचार उचित माना जा सकता था, परन्तु इसके लिए प्रताप को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। मानसिंह ने भोजन को छुआ तक नहीं, केवल चावल के कुछ कणों को जो अन्न देवता को अर्पण किए थे, उन्हें अपनी पगड़ी में रखकर वहाँ से चला गया। जाते समय उसने कहा, 'आपकी ही मान-मर्यादा बचाने के लिए हमने अपनी मर्यादा को खोकर मुग़लों को अपनी बहिन-बेटियाँ दीं। इस पर भी जब आप में और हम में विषमता रही, तो आपकी स्थिति में भी कमी आयेगी। यदि आपकी इच्छा सदा ही विपत्ति में रहने की है, तो यह अभिप्राय शीघ्र ही पूरा होगा। यह देश हृदय से आपकों धारण नहीं करेगा।' अपने घोड़े पर सवार होकर मानसिंह ने राणा प्रताप, जो इस समय आ पहुँचे थे, को कठोर दृष्टि से निहारते हुए कहा, 'यदि मैं तुम्हारा यह मान चूर्ण न कर दूँ तो मेरा नाम मानसिंह नहीं।'

प्रताप ने उत्तर दिया कि आपसे मिलकर मुझे खुशी होगी। वहाँ पर उपस्थित किसी व्यक्ति ने अभद्र भाषा में कह दिया कि अपने साथ फूफ़ा को लाना मत भूलना। जिस स्थान पर मानसिंह के लिए भोजन सजाया गया था उसे अपवित्र हुआ मानकर खोद दिया गया और फिर वहाँ गंगा जल छिड़का गया और जिन सरदारों एवं राजपूतों ने अपमान का यह दृश्य देखा था, उन सभी ने अपने को मानसिंह का दर्शन करने से पतित समझकर स्नान किया तथा वस्त्रादि बदले।[8]मुग़ल सम्राट को सम्पूर्ण वृत्तान्त की सूचना दी गई। उसने मानसिंह के अपमान को अपना अपमान समझा। अकबर ने समझा था कि राजपूत अपने पुराने संस्कारों को छोड़ बैठे होंगे, परन्तु यह उसकी भूल थी। इस अपमान का बदला लेने के लिए युद्ध की तैयारी की गई और इन युद्धों ने प्रताप का नाम अमर कर दिया। पहला युद्ध हल्दीघाटी के नाम से प्रसिद्ध है। जब तक मेवाड़ पर किसी सीसोदिया का अधिकार रहेगा अथवा कोई भट्टकवि जीवित रहेगा तब तक हल्दीघाटी का नाम कोई भुला नहीं सकेगा।

पराक्रमी चेतक
महाराणा प्रताप के पास एक सबसे प्रिय घोड़ा था। जिसका नाम चेतक था। हल्दी घाटी के युद्ध में बिना किसी सहायक के प्रताप अपने पराक्रमी चेतक पर सवार हो पहाड़ की ओर चल पड़ा। उसके पीछे दो मुग़ल सैनिक लगे हुए थे, परन्तु चेतक ने प्रताप को बचा लिया। रास्ते में एक पहाड़ी नाला बह रहा था। घायल चेतक फुर्ती से उसे लाँघ गया परन्तु मुग़ल उसे पार न कर पाये। चेतक, नाला तो लाँघ गया पर अब उसकी गति धीरे—धीरे कम होती गई और पीछे से मुग़लों के घोड़ों की टापें भी सुनाई पड़ीं। उसी समय प्रताप को अपनी मातृभाषा में आवाज़ सुनाई पड़ी, "हो, नीला घोड़ा रा असवार।" प्रताप ने पीछे मुड़कर देखा तो उसे एक ही अश्वारोही दिखाई पड़ा और वह था, उसका भाई शक्तिसिंह। प्रताप के साथ व्यक्तिगत विरोध ने उसे देशद्रोही बनाकर अकबर का सेवक बना दिया था और युद्धस्थल पर वह मुग़ल पक्ष की तरफ़ से लड़ रहा था। जब उसने नीले घोड़े को बिना किसी सेवक के पहाड़ की तरफ़ जाते हुए देखा तो वह भी चुपचाप उसके पीछे चल पड़ा, परन्तु केवल दोनों मुग़लों को यमलोक पहुँचाने के लिए।

शक्तिसिंह द्वारा प्रताप की सुरक्षा
जीवन में पहली बार दोनों भाई प्रेम के साथ गले मिले। इस बीच चेतक ज़मीन पर गिर पड़ा और जब प्रताप उसकी काठी को खोलकर अपने भाई द्वारा प्रस्तुत घोड़े पर रख रहा था, चेतक ने प्राण त्याग दिए। बाद में उस स्थान पर एक चबूतरा खड़ा किया गया जो आज तक उस स्थान को इंगित करता है, जहाँ पर चेतक मरा था। प्रताप को विदा करके शक्तिसिंह खुरासानी सैनिक के घोड़े पर सवार होकर वापस लौट आया। सलीम को उस पर कुछ सन्देह पैदा हुआ जब शक्तिसिंह ने कहा कि प्रताप ने न केवल पीछा करने वाले दोनों मुग़ल सैनिकों को मार डाला अपितु मेरा घोड़ा भी छीन लिया। इसलिए मुझे खुरासानी सैनिक के घोड़े पर सवार होकर आना पड़ा। सलीम ने वचन दिया कि अगर तुम सत्य बात कह दोगे तो मैं तुम्हें क्षमा कर दूँगा। तब शक्तिसिंह ने कहा, 'मेरे भाई के कन्धों पर मेवाड़ राज्य का बोझा है। इस संकट के समय उसकी सहायता किए बिना मैं कैसे रह सकता था।' सलीम ने अपना वचन निभाया परन्तु शक्तिसिंह को अपनी सेवा से हटा दिया। राणा प्रताप की सेवा में पहुँचकर उसे अच्छी नज़र भेंट की जा सके, इस ध्येय से उसने भिनसोर नामक दुर्ग पर आक्रमण कर उसे जीत लिया। उदयपुर पहुँचकर उस दुर्ग कों भेंट में देते हुए शक्तिसिंह ने प्रताप का अभिवादन किया। प्रताप ने प्रसन्न होकर वह दुर्ग शक्तिसिंह को पुरस्कार में दे दिया। यह दुर्ग लम्बे समय तक उसके वंशजों के अधिकार में बना रहा।[9] संवत् 1632 (जुलाई, 1576) के सावन मास की सप्तमी का दिन मेवाड़ के इतिहास में सदा स्मरणीय रहेगा। उस दिन मेवाड़ के अच्छे रुधिर ने हल्दीघाटी को सींचा था। प्रताप के अत्यन्त निकटवर्ती पाँच सौ कुटुम्बी और सम्बन्धी, ग्वालियर का भूतपूर्व राजा रामशाह और साढ़े तीन सौ तोंवर वीरों के साथ रामशाह का बेटा खाण्डेराव मारा गया। स्वामिभक्त झाला मन्नाजी अपने डेढ़ सौ सरदारों सहित मारा गया और मेवाड़ के प्रत्येक घर ने बलिदान किया।



मान सिंह पर हमला करते हुए महाराणा प्रताप और चेतक
कमलमीर का युद्ध
विजय से प्रसन्न सलीम पहाड़ियों से लौट गया क्योंकि वर्षा ऋतु के आगमन से आगे बढ़ना सम्भव न था। इससे प्रताप को कुछ राहत मिली। परन्तु कुछ समय बाद शत्रु पुनः चढ़ आया और प्रताप को एक बार पुनः पराजित होना पड़ा। तब प्रताप ने कमलमीर को अपना केन्द्र बनाया। मुग़ल सेनानायकों कोका और शाहबाज ख़ाँ ने इस स्थान को भी घेर लिया। प्रताप ने जमकर मुक़ाबला किया और तब तक इस स्थान को नहीं छोड़ा जब तक पानी के विशाल स्रोत नोगन के कुँए का पानी विषाक्त नहीं कर दिया गया। ऐसे घृणित विश्वासघात का श्रेय आबू के देवड़ा सरदार को जाता है, जो इस समय अकबर के साथ मिला हुआ था। कमलमीर से प्रताप चावंड चला गया और सोनगरे सरदार भान ने अपने मृत्यु तक कमलमीर की रक्षा की।

कमलमीर के पतन के बाद राजा मानसिंह ने धरमेती और गोगुन्दा के दुर्गों पर भी अधिकार कर लिया।
इसी अवधि में मोहब्बत ख़ाँ ने उदयपुर पर अधिकार कर लिया और अमीशाह नामक एक मुग़ल शाहज़ादा ने चावंड और अगुणा पानोर के मध्यवर्ती क्षेत्र में पड़ाव डाल कर यहाँ के भीलों से प्रताप को मिलने वाली सहायता रोक दी।
फ़रीद ख़ाँ नामक एक अन्य मुग़ल सेनापति ने छप्पन पर आक्रमण किया और दक्षिण की तरफ़ से चावंड को घेर लिया।
इस प्रकार, प्रताप चारों तरफ़ से शत्रुओं से घिर गया और बचने की कोई उम्मीद न थी। वह रोज़ाना एक स्थान से दूसरे स्थान, एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी के गुप्त स्थानों में छिपता रहता और असवर मिलने पर शत्रु पर आक्रमण करने से भी न चूकता। फ़रीद ने प्रताप को पकड़ने के लिए चारों तरफ़ अपने सैनिकों का जाल बिछा दिया परन्तु प्रताप की छापामार पद्धति ने असंख्य मुग़ल सैनिकों को मौत के घाट पहुँचा दिया। वर्षा—ऋतु ने पहाड़ी नदियों और नालों को पानी से भर दिया जिसकी वजह से आने जाने के मार्ग अवरुद्ध हो गए। परिणामस्वरूप मुग़लों के आक्रमण स्थगित हो गए।

परिवार की सुरक्षा
इस प्रकार, समय गुज़रता गया और प्रताप की कठिनाइयाँ भयंकर बनती गईं। पर्वत के जितने भी स्थान प्रताप और उसके परिवार को आश्रय प्रदान कर सकते थे, उन सभी पर बादशाह का आधिकार हो गया। राणा को अपनी चिन्ता न थी, चिन्ता थी तो बस अपने परिवार की ओर से छोटे—छोटे बच्चों की। वह किसी भी दिन शत्रु के हाथ में पड़ सकते थे। एक दिन तो उसका परिवार शत्रुओं के पँन्जे में पहुँच गया था, परन्तु कावा के स्वामिभक्त भीलों ने उसे बचा लिया। भील लोग राणा के बच्चों को टोकरों में छिपाकर जावरा की खानों में ले गये और कई दिनों तक वहीं पर उनका पालन—पोषण किया। भील लोग स्वयं भूखे रहकर भी राणा और परिवार के लिए खाने की सामग्री जुटाते रहते थे। जावरा और चावंड के घने जंगल के वृक्षों पर लोहे के बड़े—बड़े कीले अब तक गड़े हुए मिलते हैं। इन कीलों में बेतों के बड़े—बड़े टोकरे टाँग कर उनमें राणा के बच्चों को छिपाकर वे भील राणा की सहायता करते थे। इससे बच्चे पहाड़ों के जंगली जानवरों से भी सुरक्षित रहते थे। इस प्रकार की विषम परिस्थिति में भी प्रताप का विश्वास नहीं डिगा।

अकबर द्वारा प्रशंसा

अकबर ने भी इन समाचारों को सुना और पता लगाने के लिए अपना एक गुप्तचर भेजा। वह किसी तरक़ीब से उस स्थान पर पहुँच गया जहाँ राणा और उसके सरदार एक घने जंगल के मध्य एक वृक्ष के नीचे घास पर बैठे भोजन कर रहे थे। खाने में जंगली फल, पत्तियाँ और जड़ें थीं। परन्तु सभी लोग उस खाने को उसी उत्साह के साथ खा रहे थे जिस प्रकार कोई राजभवन में बने भोजन को प्रसन्नता और उमंग के साथ खाता हो। गुप्तचर ने किसी चेहरे पर उदासी और चिन्ता नहीं देखी। उसने वापस आकर अकबर को पूरा वृत्तान्त सुनाया। सुनकर अकबर का हृदय भी पसीज गया और प्रताप के प्रति उसमें मानवीय भावना जागृत हुई। उसने अपने दरबार के अनेक सरदारों से प्रताप के तप, त्याग और बलिदान की प्रशंसा की। अकबर के विश्वासपात्र सरदार ख़ानख़ाना ने भी अकबर के मुख से प्रताप की प्रशंसा सुनी थी। उसने अपनी भाषा में लिखा, "इस संसार में सभी नाशवान हैं। राज्य और धन किसी भी समय नष्ट हो सकता है, परन्तु महान् व्यक्तियों की ख्याति कभी नष्ट नहीं हो सकती। पुत्तों ने धन और भूमि को छोड़ दिया, परन्तु उसने कभी अपना सिर नहीं झुकाया। हिन्द के राजाओं में वही एकमात्र ऐसा राजा है, जिसने अपनी जाति के गौरव को बनाए रखा है।

परन्तु कभी-कभी ऐसे अवसर आ उपस्थित होते, जब अपने प्राणों से भी प्यारे लोगों को भयानक आवाज़ से ग्रस्त देखकर वह भयभीत हो उठता। उसकी पत्नी किसी पहाड़ी या गुफ़ा में भी असुरक्षित थी और उसके उत्तराधिकारी जिन्हें हर प्रकार की सुविधाओं का अधिकार था, भूख से बिलखते उसके पास आकर रोने लगते। मुग़ल सैनिक इस प्रकार उसके पीछे पड़ गए थे कि भोजन तैयार होने पर कभी-कभी खाने का अवसर न मिलता था और सुरक्षा के लिए भोजन छोड़कर भागना पड़ता था। एक दिन तो पाँच बार भोजन पकाया गया और हर बार भोजन को छोड़कर भागना पड़ा। एक अवसर पर प्रताप की पत्नी और उसकी पुत्र—वधु ने घास के बीजों को पीसकर कुछ रोटियाँ बनाई। उनमें से आधी रोटियाँ बच्चों को दे दी गई और बची हुई आधी रोटियाँ दूसरे दिन के लिए रख दी गईं। इसी समय प्रताप को अपनी लड़की की चिल्लाहट सुनाई दी। एक जंगली बिल्ली लड़की के हाथ से उसके हिस्से की रोटी को छीनकर भाग गई और भूख से व्याकुल लड़की के आँसू टपक आये।[10] जीवन की इस दुरावस्था को देखकर राणा का हृदय एक बार विचलित हो उठा। अधीर होकर उसने ऐसे राज्याधिकार को धिक्कारा जिसकी वज़ह से जीवन में ऐसे करुण दृश्य देखने पड़ें और उसी अवस्था में अपनी कठिनाइयों को दूर करने के लिए उसने एक पत्र के द्वारा अकबर से मिलने की माँग की।

पृथ्वीराज द्वारा प्रताप का स्वाभिमान जाग्रत करना
प्रताप के पत्र को पाकर अकबर की प्रसन्नता की सीमा न रही। उसने इसका अर्थ प्रताप का आत्मसमर्पण समझा और उसने कई प्रकार के सार्वजनिक उत्सव किए। अकबर ने उस पत्र को पृथ्वीराज नामक एक श्रेष्ठ एवं स्वाभीमानी राजपूत को दिखलाया। पृथ्वीराज बीकानेर नरेश का छोटा भाई था। बीकानेर नरेश ने मुग़ल सत्ता के सामने शीश झुका दिया था। पृथ्वीराज केवल वीर ही नहीं अपितु एक योग्य कवि भी था। वह अपनी कविता से मनुष्य के हृदय को उन्मादित कर देता था। वह सदा से प्रताप की आराधना करता आया था। प्रताप के पत्र को पढ़कर उसका मस्तक चकराने लगा। उसके हृदय में भीषण पीड़ा की अनुभूति हुई। फिर भी, अपने मनोभावों पर अंकुश रखते हुए उसने अकबर से कहा कि यह पत्र प्रताप का नहीं है। किसी शत्रु ने प्रताप के यश के साथ यह जालसाज़ की है। आपको भी धोखा दिया है। आपके ताज़ के बदले में भी वह आपकी आधीनता स्वीकार नहीं करेगा। सच्चाई को जानने के लिए उसने अकबर से अनुरोध किया कि वह उसका पत्र प्रताप तक पहुँचा दे। अकबर ने उसकी बात मान ली और पृथ्वीराज ने राजस्थानी शैली में प्रताप को एक पत्र लिख भेजा।

अकबर ने सोचा कि इस पत्र से असलियत का पता चल जायेगा और पत्र था भी ऐसा ही। परन्तु पृथ्वीराज ने उस पत्र के द्वारा प्रताप को उस स्वाभीमान का स्मरण कराया जिसकी खातिर उसने अब तक इतनी विपत्तियों को सहन किया था और अपूर्व त्याग व बलिदान के द्वारा अपना मस्तक ऊँचा रखा था। पत्र में इस बात का भी उल्लेख था कि हमारे घरों की स्त्रियों की मर्यादा छिन्नत-भिन्न हो गई है और बाज़ार में वह मर्यादा बेची जा रही है। उसका ख़रीददार केवल अकबर है। उसने सीसोदिया वंश के एक स्वाभिमानी पुत्र को छोड़कर सबको ख़रीद लिया है, परन्तु प्रताप को नहीं ख़रीद पाया है। वह ऐसा राजपूत नहीं जो नौरोजा के लिए अपनी मर्यादा का परित्याग कर सकता है। क्या अब चित्तौड़ का स्वाभिमान भी इस बाज़ार में बिक़ेगा।[11]

एक कुशल शासक



महाराणा प्रताप का डाक टिकट
Maharana Pratap Stamp
वे प्रजा के आज से शासक नहीं, हृदय पर शासन करने वाले थे। एक आज्ञा हुई और विजयी सेना ने देखा उसकी विजय व्यर्थ है । चित्तौड़ भस्म हो गया, खेत उजड़ गये, कुएँ भर दिये गये और ग्राम के लोग जंगल एवं पर्वतों मं अपने समस्त पशु एवं सामग्री के साथ अदृश्य हो गये। शत्रु के लिये इतना विकट उत्तर, यह उस समय महाराणा की अपनी सूझ है। अकबर के उद्योग में राष्ट्रीयता का स्वप्न देखने वालों को इतिहासकार बदायूँनी आसफ ख़ाँ के ये शब्द स्मरण कर लेने चाहिये- 'किसी की ओर से सैनिक क्यों न मरे, थे वे हिन्दू ही और प्रत्येक स्थिति में विजय इस्लाम की ही थी।' यह कूटनीति थी अकबर की और महाराणा इसके समक्ष अपना राष्ट्रगौरव लेकर अडिग भाव से उठे थे।

खुशरोज़
राठौर पृथ्वीराज के ओजस्वी पत्र ने प्रताप के मन की निराशा को दूर कर दिया और उसे लगा जैसे दस हज़ार राजपूतों की शक्ति उसके शरीर में समा गई हों। उसने अपने स्वाभिमान को क़ायम रखने का दृढ़संकल्प कर लिया। पृथ्वीराज के पत्र में "नौरोजा के लिए मर्यादा का सौदा" करने की बात कही गई। इसका स्पष्टीकरण देना आवश्यक है। नौरोजा का अर्थ "वर्ष का नया दिन" होता है और पूर्व के मुसलमानों का यह धार्मिक त्योहार है। अकबर ने स्वयं इसकी प्रतिष्ठा की और इसका नाम रखा "खुशरोज़" अर्थात् खुशी का दिन और इसकी शुरुआत अकबर ने की थी। इस अवसर पर सभी लोग उत्सव मनाते और राजदरबार में भी कई प्रकार के आयोजन किए जाते थे। इस प्रकार के आयोजनों में एक प्रमुख आयोजन स्त्रियों का मेला था। एक बड़े स्थान पर मेले का आयोजन किया जाता था जिसमें केवल स्त्रियाँ ही भाग लेती थीं। वे ही दुकानें लगाती थीं और वे ही ख़रीददारी करती थीं। पुरुषों का प्रवेश निषिद्ध था। राजपूत स्त्रियाँ भी दुकानें लगाती थीं। अकबर छद्म वेष में बाज़ार में जाता था और कहा जाता है कि कई सुन्दर बालाएँ उसकी कामवासना का शिकार हो अपनी मर्यादा लुटा बैठतीं। एक बार राठौर पृथ्वीराज की स्त्री भी इस मेले में शामिल हुई थी और उसने बड़े साहस तथा शौर्य के साथ अपने सतीत्व की रक्षा की थी। वह शाक्तावत वंश की लड़की थी। उस मेले में घूमते हुए अकबर की नज़र उस पर पड़ी और उसकी सुन्दरता से प्रभावित होकर अकबर की नियत बिगड़ गई और उसने किसी उपाय से उसे मेले से अलग कर दिया। पृथ्वीराज की स्त्री ने जब क़ामुक अकबर को अपने सम्मुख पाया तो उसने अपने वस्त्रों में छिपी कटार को निकालकर कहा, "ख़बरदार, अगर इस प्रकार की तूने हिम्मत की। सौगन्ध ख़ा कि आज से कभी किसी स्त्री के साथ में ऐसा व्यवहार न करेगा।" अकबर के क्षमा माँगने के बाद पृथ्वीराज की स्त्री मेले से चली गई। अब्बुल फ़ज़ल ने इस मेले के बारे में अलग बात लिखी है। उनके अनुसार बादशाह अकबर वेष बदलकर मेले में इसलिए जाता था कि उसे वस्तुओं के भाव—ताव मालूम हो सकें।

भामाशाह द्वारा प्रताप की शक्तियाँ जाग्रत होना
पृथ्वीराज का पत्र पढ़ने के बाद राणा प्रताप ने अपने स्वाभिमान की रक्षा करने का निर्णय कर लिया। परन्तु मौजूदा परिस्थितियों में पर्वतीय स्थानों में रहते हुए मुग़लों का प्रतिरोध करना सम्भव न था। अतः उसने रक्तरंजित चित्तौड़ और मेवाड़ को छोड़कर किसी दूरवर्ती स्थान पर जाने का विचार किया। उसने तैयारियाँ शुरू कीं। सभी सरदार भी उसके साथ चलने को तैयार हो गए। चित्तौड़ के उद्धार की आशा अब उनके हृदय से जाती रही थी। अतः प्रताप ने सिंध नदी के किनारे पर स्थित सोगदी राज्य की तरफ़ बढ़ने की योजना बनाई ताकि बीच का मरुस्थल उसके शत्रु को उससे दूर रखे। अरावली को पार कर जब प्रताप मरुस्थल के किनारे पहुँचा ही था कि एक आश्चर्यजनक घटना ने उसे पुनः वापस लौटने के लिए विवश कर दिया। मेवाड़ के वृद्ध मंत्री भामाशाह ने अपने जीवन में काफ़ी सम्पत्ति अर्जित की थी। वह अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति के साथ प्रताप की सेवा में आ उपस्थित हुआ और उससे मेवाड़ के उद्धार की याचना की। यह सम्पत्ति इतनी अधिक थी कि उससे वर्षों तक 25,000 सैनिकों का खर्चा पूरा किया जा सकता था।[12] भामाशाह का नाम मेवाड़ के उद्धारकर्ताओं के रूप में आज भी सुरक्षित है। भामाशाह के इस अपूर्व त्याग से प्रताप की शक्तियाँ फिर से जागृत हो उठीं।

दुर्गों पर अधिकार


युद्धभूमि पर महाराणा प्रताप के चेतक (घोड़े) की मौत
महाराणा प्रताप ने वापस आकर राजपूतों की एक अच्छी सेना बना ली जबकि उसके शत्रुओं को इसकी भनक भी नहीं मिल पाई। ऐसे में प्रताप ने मुग़ल सेनापति शाहबाज़ ख़ाँ को देवीर नामक स्थान पर अचानक आ घेरा। मुग़लों ने जमकर सामना किया परन्तु वे परास्त हुए। बहुत से मुग़ल मारे गए और बाक़ी पास की छावनी की ओर भागे। राजपूतों ने आमेट तक उनका पीछा किया और उस मुग़ल छावनी के अधिकांश सैनिकों को भी मौत के घाट उतार दिया गया। इसी समय कमलमीर पर आक्रमण किया गया और वहाँ का सेनानायक अब्दुल्ला मारा गया और दुर्ग पर प्रताप का अधिकार हो गया। थोड़े ही दिनों में एक के बाद एक करके बत्तीस दुर्गों पर अधिकार कर लिया गया और दुर्गों में नियुक्त मुग़ल सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया गया। संवत् 1586 (1530 ई.) में चित्तौड़, अजमेर और मांडलगढ़ को छोड़कर सम्पूर्ण मेवाड़ पर प्रताप ने अपना पुनः अधिकार जमा लिया।[13] राजा मानसिंह को उसके देशद्रोह का बदला देने के लिए प्रताप ने आमेर राज्य के समृद्ध नगर मालपुरा को लूटकर नष्ट कर दिया। उसके बाद प्रताप उदयपुर की तरफ़ बढ़ा। मुग़ल सेना बिना युद्ध लड़े ही वहाँ से चली गई और उदयपुर पर प्रताप का अधिकार हो गया। अकबर ने थोड़े समय के लिए युद्ध बन्द कर दिया।

सम्पूर्ण जीवन युद्ध करके और भयानक कठिनाइयों का सामना करके प्रताप ने जिस तरह से अपना जीवन व्यतीत किया उसकी प्रशंसा इस संसार से मिट न सकेगी। परन्तु इन सबके परिणामस्वरूप प्रताप में समय से पहले ही बुढ़ापा आ गया। उसने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे अन्त तक निभाया। राजमहलों को छोड़कर प्रताप ने पिछोला तालाब के निकट अपने लिए कुछ झोपड़ियाँ बनवाई थीं ताकि वर्षा में आश्रय लिया जा सके। इन्हीं झोपड़ियों में प्रताप ने सपरिवार सहित अपना जीवन व्यतीत किया। अब जीवन का अन्तिम समय आ पहुँचा था। प्रताप ने चित्तौड़ के उद्धार की प्रतीज्ञा की थी, परन्तु उसमें सफलता न मिली। फिर भी, उसने अपनी थोड़ी सी सेना की सहायता से मुग़लों की विशाल सेना को इतना अधिक परेशान किया कि अन्त में अकबर को युद्ध बन्द कर देना पड़ा।

मृत्यु

अकबर के युद्ध बन्द कर देने से प्रताप को महादुःख हुआ। कठोर उद्यम और परिश्रम सहन कर उसने हज़ारों कष्ट उठाये थे, परन्तु शत्रुओं से चित्तौड़ का उद्धार न कर सके। वह एकाग्रचित्त से चित्तौड़ के उस ऊँचे परकोटे और जयस्तम्भों को निहारा करते थे और अनेक विचार उठकर हृदय को डाँवाँडोल कर देते थे। ऐसे में ही एक दिन प्रताप एक साधारण कुटी में लेटे हुए काल की कठोर आज्ञा की प्रतीज्ञा कर रहे थे। उनके चारों तरफ़ उनके विश्वासी सरदार बैठे हुए थे। तभी प्रताप ने एक लम्बी साँस ली। सलूम्बर के सामंन्त ने कातर होकर पूछा, 'महाराज! ऐसे कौन से दारुण दुःख ने आपको दुःखित कर रखा है और अन्तिम समय में आपकी शान्ति को भंग कर रहा है।" प्रताप का उत्तर था--'सरदार जी! अभी तक प्राण अटके हुए हैं, केवल एक ही आश्वासन की वाणी सुनकर यह अभी सुखपूर्वक देह को छोड़ जायेगा। यह वाणी आप ही के पास है।

आप सब लोग मेरे सम्मुख प्रतिज्ञा करें की जीवित रहते अपनी मातृभूमि किसी भी भाँति तुर्कों के हाथों में नहीं सौंपेंगे। पुत्र राणा अमर सिंह हमारे पूर्वजों के गौरव की रक्षा नहीं कर सकेगा। वह मुग़लों के ग्रास से मातृभूमि को नहीं बचा सकेगा। वह विलासी है, वह कष्ट नहीं झेल सकेगा।" इसके बाद राणा ने अमरसिंह को बातें सुनाते हुए कहा, "एक दिन उस नीचि कुटिया में प्रवेश करते समय अमरसिंह अपने सिर से पगड़ी उतारना भूल गया था। द्वार के एक बाँस से टकराकर उसकी पगड़ी नीचे गिर गई। दूसरे दिन उसने मुझसे कहा कि यहाँ पर बड़े-बड़े महल बनवा दीजिए।" कुछ क्षण चुप रहकर प्रताप ने कहा, "इन कुटियों के स्थान पर बड़े—बड़े रमणीक महल बनेंगे, मेवाड़ की दुरवस्था भूलकर अमरसिंह यहाँ पर अनेक प्रकार के भोग-विलास करेगा। अमर के विलासी होने पर मातृभूमि की वह स्वाधीनता जाती रहेगी, जिसके लिए मैंने बराबर पच्चीस वर्ष तक कष्ट उठाए, सभी भाँति की सुख-सुविधाओं को छोड़ा। वह इस गौरव की रक्षा न कर सकेगा, और तुम लोग—तुम सब उसके अनर्थकारी उदाहरण का अनुसरण करके मेवाड़ के पवित्र यश में कलंक लगा लोगे।" प्रताप का वाक्य पूरा होते ही समस्त सरदारों ने उससे कहा, "महाराज! हम लोग बप्पा रावल के पवित्र सिंहासन की शपथ करते हैं कि जब तक हम में से एक भी जीवित रहेगा, उस दिन तक कोई तुर्क मेवाड़ भूमि पर अधिकार न कर सकेगा। जब तक मेवाड़ भूमि की पूर्व-स्वाधीनता का पूरी तरह उद्धार हो नहीं पायेगा तब तक हम लोग इन्हीं कुटियों में निवास करेंगे।" इस संतोषजनक वाणी को सुनते ही प्रताप के प्राण निकल गए।[14]

इस प्रकार एक ऐसे राजपूत के जीवन का अवसान हो गया जिसकी स्मृति आज भी प्रत्येक सीसोदिया को प्रेरित कर रही है। इस संसार में जितने दिनों तक वीरता का आदर रहेगा, उतने ही दिन तक प्रताप की वीरता, माहात्म्य और गौरव संसार के नेत्रों के सामने अचल भाव से विराजमान रहेगा। उतने दिन तक वह हल्दीघाट मेवाड़ की थर्मोपोली और उसके अंतर्गत देवीर क्षेत्र मेवाड़ का मराथान नाम से पुकारा जाया करेगा।

पंडित नरेन्द्र मिश्र की कविता इस प्रकार है-

महाराणा प्रताप की कविता
राणा प्रताप इस भरत भूमि के, मुक्ति मंत्र का गायक है।
राणा प्रताप आज़ादी का, अपराजित काल विधायक है।।
वह अजर अमरता का गौरव, वह मानवता का विजय तूर्य।
आदर्शों के दुर्गम पथ को, आलोकित करता हुआ सूर्य।।
राणा प्रताप की खुद्दारी, भारत माता की पूंजी है।
ये वो धरती है जहां कभी, चेतक की टापें गूंजी है।।
पत्थर-पत्थर में जागा था, विक्रमी तेज़ बलिदानी का।
जय एकलिंग का ज्वार जगा, जागा था खड्ग भवानी का।।
लासानी वतन परस्ती का, वह वीर धधकता शोला था।
हल्दीघाटी का महासमर, मज़हब से बढकर बोला था।।
राणा प्रताप की कर्मशक्ति, गंगा का पावन नीर हुई।
राणा प्रताप की देशभक्ति, पत्थर की अमिट लकीर हुई।
समराँगण में अरियों तक से, इस योद्धा ने छल नहीं किया।
सम्मान बेचकर जीवन का, कोई सपना हल नहीं किया।।
मिट्टी पर मिटने वालों ने, अब तक जिसका अनुगमन किया।
राणा प्रताप के भाले को, हिमगिरि ने झुककर नमन किया।।
प्रण की गरिमा का सूत्रधार, आसिन्धु धरा सत्कार हुआ।
राणा प्रताप का भारत की, धरती पर जयजयकार हुआ।।
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Surendra Singh Sisodia

मान्यता है कि सिसोदिया क्षत्रिय भगवान राम के कनिष्ठ पुत्र लव के वंशज हैं। सूर्यवंश के आदि पुरुष की 65 वीं पीढी में भगवान राम हुए 195 वीं पीढी में वृहदंतक हुये। 125 वीं पीढी में सुमित्र हुये। 155 वी. पीढीअर्थात सुमित्र की 30 वीं पीढी में गुहिल हु जो गहलोत वंश की संस्थापक पुरुष कहलाये। गुहिल से कुछपीढी पहले कनकसेन हुए जिन्होंने सौराष्ट्र में सूर्यवंश के राज्य की स्थापना की। गुहिल का समय 540 ई० था।बटवारे में लव को श्री राम द्वाराउत्तरी पश्चिमी क्षेत्र मिला जिसकी राजधानी लवकोट थी। जो वर्तमान में लाहौर है। ऐसा कहा जाता है कि कनकसेन लवकोट से ही द्वारका आये। हालांकि वोश्वस्त प्रमाण नहीं है। टाड मानते है कि 145 ई० में कनकसेन द्वारका आयेतथा वहां अपने राज्य की परमार शासक को पराजित कर स्थापना की जिसे आज सौराष्ट्र क्षेत्र कहा जाता है। कनकसेन की चौथी पीढी में पराक्रमी शासक सौराष्ट्र के विजय सेनहुए जिन्होने विजय नगर बसाया। विजय सेन ने विदर्भ की स्थापना की थी। जिसे आज सिहोर कहते हैं तथा राजधानी बदलकर बल्लभीपुर ( वर्तमान भावनगर ) बनाया।


इस वंश के शासकों की सूची कर्नल टाड देते हुए कनकसेन, महामदन सेन, सदन्त सेन, विजय सेन, पद्मादित्य,सेवादित्य, हरादित्य, सूर्यादित्य, सोमादित्य और शिला दित्य बताया। 524 ई० में बल्लभी का अन्तिम शासक शिलादित्य थे। हालांकि कुछ इतिहासकार 766 ई० के बाद शिलादित्य के शासन का पतन मानते हैं। यह पतन पार्थियनों के आक्रमण से हुआ।

शिलादित्य की राजधानी पुस्पावती के कोख से जन्मा पुत्र गुहादित्य की सेविका ब्रहामणी कमलावती ने लालन पालन किया। क्योंकि रानी उनके जन्म के साथ ही सती हो गई। गुहादित्य बचपन से ही होनहार था और ईडर के भील मंडालिका की हत्या करके उसके सिहांसनपर बैठ गया तथा उसके नाम से गुहिल, गिहील या गहलौत वंश चल पडा।

कर्नल टाड के अनुसार गुहादित्य की आठपीढियों ने ईडर पर शासन किया ये निम्न हैं -

गुहादित्य,नागादित्य,भागादित्य,दैवादित्य,आसादित्य,कालभोज,गुहादित्य,नागादित्य।

जेम्स टाड के अनुसार शिकार के बहाने भीलों द्वारा नागादित्य की हत्या कर दी। इस समय इसके पुत्र बप्पा की आयु मात्र तीन वर्ष की थी। बप्पा की भी एकब्राहमणी ने संरक्षण देकर अरावली के बीहड में शरण लिया। गौरीशंकर ओझा गुहादित्य और बप्पा के बीच की वंशावली प्रस्तुत की वह सर्वाधिक प्रमाणिक मानी गई है, जो निम्न है -

गुहिल,भोज,महेन्द्र,नागादित्य,शिलादित्य,अपराजित,महेन्द्र द्वितीय औरकालभोज बप्पा आदि।

यह एक संयोग ही है कि गुहादित्य और मेवाड राज्य में गहलोत वंश स्थापित करने वाले बप्पा का बचपन अरावली के जंगल में उन्मुक्त, स्वच्छन्द वातावरण मेंव्यतीत हुआ। बप्पा के एक लिंग पूजा के कारण देवी भवानी का दर्शन उन्हे मिला और बाबा गोरखनाथ का आशिर्वाद भी। बडे होने पर चित्तौड के राजा से मिल कर, बप्पा ने अपना वंश स्थापित किया और परमार राजा ने उन्हेपूरा स्नेह दिया। इसी समय विदेशी आक्रमणकारियों के आक्रमण को बप्पा नेविफ़ल कर चित्तोड से उन्हे गजनी तक खदेड कर अपने प्रथम सैन्य अभिमान में ही सफ़लता प्राप्त की। बप्पा द्वारा धारित रावल उपाधि रावल रणसिंह( कर्ण सिंह ) 1158 ई० तक निर्वाध रुप से चलती रही। रावण रण सिंह के बाद रावल गहलोत की एक शाखा और हो गई। जो सिसोदिया के जागीर पर आसीन हुई जिसके संस्थापक माहव एवं राहप दो भाई थे। सिसोदा में बसने के कारण ये लोग सिसोदिया कहलाऐ।


महाराणा प्रताप
महाराणा प्रताप
पूरा नाम‌‌‌‌‌‌‌महाराणा प्रताप
जन्म9 मई, 1540
जन्म भूमिराजस्थानकुम्भलगढ़
मृत्यु तिथि19 जनवरी, 1597
पिता/मातापिता- महाराणा उदयसिंह एवं माता- राणी जीवत कँवर
राज्य सीमामेवाड़
शासन काल1568–1597 ई.
शा. अवधि29 वर्ष
युद्धहल्दीघाटी का युद्ध
राजधानीउदयपुर
पूर्वाधिकारीमहाराणा उदयसिंह
उत्तराधिकारीराणा अमर सिंह
राजघरानाराजपूताना
अन्य जानकारीमहाराणा प्रताप के पास एक सबसे प्रिय घोड़ा था। जिसका नाम चेतक था।

10 मई, 1857 की क्रांति की वर्षगांठ के अवसर पर : जनक्रांति: 1857


10 मई, 1857 की क्रांति की वर्षगांठ के अवसर पर
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 जनक्रांति: 1857 

- अरविंद सीसौदिया 
उस दिन देखा था तारों ने, 
हिन्दुस्तानी विश्वास नया,
जिस दिन लिखा था रणवीरों ने, 
खूं से अपना इतिहास नया।।
    : गोपाल प्रसाद व्यास
ईस्ट इंडिया कम्पनी की फौजी हुकूमत के विस्तारवादी मंसूबों के विरूद्ध 1857 की जनक्रांति को वीर विनायक दामोदर सावरकर ने ‘‘भारतीय स्वतंत्रता का युद्ध’’ नामक पुस्तक लिख कर प्रथम स्वतंत्रता संग्राम नाम दिया है, तो अशोक मेहता ने ‘‘1857 का महान विद्रोह’’ पुस्तक में इस संघर्ष की राष्ट्रीय विशेषताओं को उजागर किया है। मेरा मत सिर्फ इतना है कि भारतीय प्रायद्वीप पर दो हजार वर्षों से चल रहे पश्चिमी दिशा के हमलों के विरूद्ध इस हिन्दुत्व की माटी के सपूतों की संघर्ष यात्रा का एक महत्वपूर्ण पुरूषार्थ 1857 भी था। इस संघर्ष ने हिन्दुत्व के स्वाभिमान के सामने ब्रिटिश कम्पनी सरकार को झुकाया था।
हिमालय की हिम नदियों के तटों पर उपजी हिन्दू मानव सभ्यता की यह संस्कृति रही है कि वह शांतिपूर्ण शिष्टाचारमय जीवन को जिये,जीने दे और उसे सृष्टा से जोड़कर परमात्मा से सीधे संवाद करे। दूसरे के हक हड़पने में इस सभ्यता ने कभी कोई रूचि नहीं दिखाई। मगर विश्व की अन्यान्य अशिष्ट सभ्यताओं ने इस पर निरंतर आक्रमण कर निगल जाने के प्रयास किये। हूण, कुषाण, शक, यूनानी, इस्लामी और ईसाईयों के घोर अमानवीय आक्रमण इस सभ्यता पर हुए और उनका दृढ़ता से प्रतिकार भी हुआ। दो हजार वर्षों के इस महासमर में हिन्दुत्व का पुरूषार्थ निरंतर आहुती देकर अपने जीवन मूल्यों के साथ खड़ा रहा है, जबकि अन्य सभ्यताओं का आज दुनिया में अता-पता नहीं है। इसीलिए कवि इकबाल ने कहा है:
यूनां, रोमां, मिस्र सब मिट गये जहां से,
    बाकी मगर है फिर भी नामो निशां हमारा।
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
    सदियों रहा है दुश्मन दौर ए जहां हमारा।।

दो कमजोरियां
हमारी दो कमजोरियां हैं कि एक आपस में फूट, दूसरी बिना सोचे समझे विश्वास कर लेना। इस्लामिक आक्रमणकारियों को भी इन्हीं दो कमजोरियों ने विजेता बनाया। ईसाई आक्रमणकारी यथा पुर्तगाली, फ्रांसिसी और ब्रिटिशों को भी इन्हीं दो कमजोरियों ने विजेता बनाया। जब-जब भी हममें से थोड़े बहुत एकजुट होकर जंगे मैदान में उतरे, दुश्मन के न केवल दांत खट्टे कर दिये, बल्कि उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
यह सच है कि भारत में हिन्दू-मुस्लिम विभाजित रहे, मगर इनका मूल तत्व हिन्दुत्व ही है, चाहे वह हिन्दू हो, चाहे हिन्दू से जबरिया बना मुसलमान हो। इसलिये भारतीय प्रायद्वीप का मुसलमान ”राष्ट्रीयता व भौगौलिक दृष्टि से ‘‘हिन्दुत्व’’ में ही समाहित है।“
हिन्दुस्तान के जिस स्वतंत्रता संग्राम ने हिन्दुत्व के शौर्य, पराक्रम और पुरूषार्थ को अपने बलिदान से लिखा, जिसे पढ़कर गर्व से आंखें छलक जाती हैं, उस महासमर का नाम है ‘‘स्वतंत्रता संग्राम 1857’’ है।
सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भुकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई, फिर से नई जवानी थी।
गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में,वह तलवार पुरानी थी
  : सुभद्रा कुमारी चौहान
बहुत ही अल्प ज्ञात जिस सच्चे कथानक को पढ़कर, रोम-रोम खड़ा हो जाता है, स्वाभिमान से छाती फूल जाती है, शौर्य से ललाट चमक उठता है, जिस युद्ध में अपनी बलि चढ़ाने निकला हर व्यक्ति परमवीर था और हर महिला मर्दानी थी। जिनका नायकत्व हमें सतत पुरूषार्थ की प्रेरणा देता रहेगा।
बरछी,ढ़ाल,कृपाण,कटारी,उसकी यही सहेली थी, 
वीर शिवाजी की गाथाएं, उसको याद जुबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुंह, हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी, वो तो झांसी वाली रानी थी।।  
  : सुभद्रा कुमारी चौहान
यदि हम अपनी मातृभूमि की गौरवगाथा को देखें तो सहज शब्दबाण निकल पड़ते हैं:
‘‘यह वह धरती है, जहां वीर उगाये जाते हैं,
तलवारों की धारों पर, शीश चढ़ाये जाते हैं।
क्या कोई जीतेगा इसको, हार सुलाई जाती है,
शौय-तेज की हर सुबह,रक्त सींच  बुलाई जाती है।
युद्ध मृत्यु का सतत् मंजर, सारे जग ने देखा है,
अथक हिन्दू पथ है निरंतर, यह सब को संदेशा हैं।
    : अरविंद सीसौदिया
1857 का असर
सन् 1857 के स्वतंत्रता आन्दोलन को ब्रिटिश सरकार तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भले ही मामूली सा विद्रोह कहकर इतिहास से इस बड़े संघर्ष को बाहर करने की कोशिश की हो, मगर सच यह है कि इस विद्रोह के कारण ईस्ट इण्डिया कम्पनी का साम्राज्य भारत से समाप्त हो गया था और ब्रिटिश सरकार ने भारत मंत्री और भारत कौंसिल के रूप में सीधे अपने हाथ में सत्ता ले ली। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिए यह कभी पूरी न होने वाली अपूरणीय क्षति हुई। भारतीय रियासतों के प्रति दृष्टिकोण बदला, महारानी विक्टोरिया ने 1858 में वचन दिया कि भारतीय रियासतों की स्वायत्तता बरकरार रखी जायेगी।
1857 से पहले
गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी 1948 से 1956 तक भारत में बतौर शासक रहा। वह क्रूरतम साम्राज्यवादी और घोर निकृष्ट मुनाफाखोर था। उसने भारत की प्रजा के साथ पशु जैसा दुर्व्यवहार किया। उन्होंने बिना किसी अधिकार-औचित्य के स्वयंभू कानून बना दिया कि जिस राजा के संतान नहीं होगी, वह राज्य उसके मरते ही ब्रिटिश कम्पनी का हो जायेगा। इसे व्यपगत का सिद्धान्त ;क्वबजतपदम व् िस्ंचेमद्ध कहा गया। यह स्वयंभू कानून मात्र विस्तारवादी साजिश थी, आपराधिक षडयंत्र था, जिसके कारण इस प्रकार के कई राजघराने ब्रिटिश कम्पनी के विरूद्ध लामबंद हुए, उनकी म्यानों में तलवार निकल आई।
1848 में सतारा, 1849 में जैतपुर और सम्बलपुर, 1850 में बघाट, 1852 में उदयपुर, 1853 में झांसी, 1854 में नागपुर और 1855 में कर्नाटक व तंजौर को इसी कानून से हड़पा गया। निजाम वसूली का धन नहीं दे पाया और उसका 1853 में बरार छीन लिया गया। इसी तरह अव्यवस्था के नाम पर 1856 में अवध को हथिया लिया गया।
क्रांति से पूर्व पांच वर्षों में इनाम आयोग ने अकेले बम्बई प्रांत में 20,000 जायदादों को जप्त किया। अवध में ही ज्यादातर ताल्लुकेदारों की जायदादें छीन ली और वे बिना किसी आजीविका के रह गये।
कुल मिलाकर जब भी कोई नया प्रदेश अंग्रेजी राज्य में मिलाया जाता तो उसमें भूमि संबंधी झगड़े पैदा होते थे। जमींदारों को भी गोद लेने के अधिकारों से वंचित कर उनकी जायदादें भी हड़प ली जाती थी।
सैनिकांे का अपमान
कम्पनी राज में हिन्दुस्तानी सैनिकों और अंग्रेजी सैनिकों में वेतन और मान सम्मान में भारी अन्तर रहता था जबकि बलिदान की बली हिन्दुस्तानी सैनिकों को ही देनी पड़ती थी। उन्नति के अवसर कम होते थे, उन्हें अपमान भरे शब्दों और गाली-गलौच से सम्बोधित किया जाना आम था। समुद्र पार युद्धों में लड़ने भेजा जाता था, सैनिकों को ईसाई बनाने के प्रयत्न हुए और जो ईसाई बन गये उन्हें लाभ दिये गये।
अवध को अंग्रेजी कम्पनी राज्य में हड़पने के साथ वहां के 60 हजार सैनिकों को हटा दिया गया। बंगाल सेना के सैनिकों के अधिकार वापस ले लिये गये।

धार्मिक बेहुदगी
ईस्ट इण्डिया कम्पनी के डायरेक्टरों के प्रधान मैग्लीज ने ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स में वक्तव्य देते हुए कहा ‘‘परमेश्वर ने भारत के विस्तृत साम्राज्य को इंग्लैण्ड को इसलिये सौंपा है कि ईसा का झण्डा भारत के एक कोने से दूसरे कोने तक सफलतापूर्वक लहराता रहे। प्रत्येक व्यक्ति को इस बात का पूर्ण प्रयत्न करना चाहिये कि समस्त भारतीयों को ईसाई बनाने के महान कार्य को इस देश में जारी रखने में किसी प्रकार की बाधा उपस्थित नहीं होनी चाहिए।’’
अंग्रेजों ने मिशनरियों की प्रगति को देश के प्रत्येक भाग में फैला दिया था। कई अवसरों पर मिशनरियों की सभाएं जिलों के मुख्य स्थानों पर की जाती थी, जिनकी कलेक्टर अध्यक्षता करते थे। सम्पत्ति के संबंध में हिन्दू कानून में परिवर्तन किया गया, जिससे हिन्दुओं को ईसाई बनाने में सुविधा प्राप्त हो। इस तरह ईसाई बने हिन्दुस्तानियों को नौकरियों में आगे बढ़ाकर प्रतिष्ठा प्रदान की जाती थी।
जहां-जहां भी यूरोपियन गये, ईसाई धर्म प्रचारक उनकी एक अतिरिक्त फौज के रूप में साथ गये। वही भारत में भी हुआ, सन् 1813 के पश्चात ईसाई पादरियों का भारत में वृहद पैमाने पर आगमन हुआ, इन पादरियों ने हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही धर्मों को निशाना बनाया, धर्मान्तरण की प्रवृत्ति को बढ़ाया, इसका असर हिन्दुओं पर अधिक हुआ। हालांकि इसके मुकाबले के लिए धार्मिक आंदोलन भी प्रतिक्रिया स्वरूप उत्पन्न हुए। ब्रह्य समाज, आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन, थियोसोफिकल सोसायटी, प्रार्थना समाज, वेद समाज इस तरह के अनेकानेक आंदोलन ईसाई धर्मान्तरण नीति की ही प्रतिक्रिया थे।
सबसे घृणित तथ्य यह था कि हिंदू और मुसलमानों को अपमानित करने के लिए अहंकार में चूर ब्रिटिश कम्पनी सरकार ने गाय और सुअर की चर्बी से युक्त कारतूसों को चलाने के लिए हिंदुस्तान सैनिकों को मजबूर किया। इस सैनिक क्रांति का यह भी एक अहम घटक तत्व था।
स्वतंत्रता का मूल सतत् सतर्कता
1857 का स्वतंत्रता संग्राम भले ही दबा दिया गया हो, मगर इस संघर्ष ने भारतीयों को सिखा दिया था कि जमकर लड़ो तो अंग्रेज भी झुकेगा, इस बिगुल की आवाज शांत होते होते, बाल गंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल और लाला लाजपतराय के रूप में ‘‘स्वराज हमारा  जन्मसिद्ध अधिकार’’ के रूप में नये बिगुल बजने लगे। बंगभंग के विरूद्ध हुए जनआंदोलन ने एक बार फिर अंग्रेजों को झुकाया। क्रांतिकारी युग आया, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद से वीर सावरकर तक अनन्त श्रृंखला बनी। हिन्दू तत्ववेत्ता महात्मा गांधी और परम राष्ट्रभक्त सुभाषचन्द्र बोस ने नई आजादी को अपने कर्म कौशल से लिखा।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने संविधान सभा में हमें सावधान करते हुए कहा है ‘‘हमने अपनी फूट से कई बार आजादी खोई है, यदि अब भी आजादी खोती है तो शायद फिर कभी स्वतंत्रता न मिले।’’ इसलिए सावधान भी रहें।
मां तो जन्म देती है,
मगर मातृभूमि देती जीवन है।
दोनों का ऋण रोम-रोम पर, श्वांस-श्वांस पर,
आओ ऐसा कुछ कर जायें,
जो ये मातायें हर्षायें,
कहें गर्व से, यह मेरा सपूत है,
जिसने नई दिशायें,
नई बुलंदी से,
हम सबको नवाजा है...!
आओ ऐसा कुछ कर जायें,
जो मातृभूमि को याद में आये।
पुरूषार्थ का ऐसा तत्व बना जाये,
जो सबको युग-युग राह दिखाये।।
    : अरविंद सीसौदिया
      राधाकृश्ण मंदिर रोड़, डडवाड़ा, कोटा जंक्षन



अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति की घटनाओं का ब्यौरा
2 फरवरी 1857 19वीं स्थानीय पैदल सेना का बहरामपुर में विद्रोह
29 मार्च 1857 बैरकपुर में सैनिकों ने चर्बीयुक्त कारतूसों के प्रयोग करने से इन्कार कर दिया, मंगल पाण्डेय नामक सैनिक ने अपने एजुटेंट पर आक्रमण कर उसकी हत्या कर दी
10 मई 1857 मेरठ में सैनिकों का विद्रोह
10-30मई 1857 दिल्ली, फिरोजपुर, बम्बई, अलीगढ़, इटावा, बुलन्दशहर, नसीराबाद, बरेली, मुरादाबाद, शाहजहांपुर एवं अन्य उत्तर प्रदेश के शहरों में विद्रोह का भड़कना
12 मई 1857 बहादुर शाह द्वितीय को भारत का सम्राट घोषित किया गया,दिल्ली पर अधिकार
जून 1857 ग्वालियर, भरतपुर, झांसी, इलाहाबाद, फैजाबाद, सुल्तानपुर, लखनऊ आदि में विद्रोह
5 जून 1857 नाना साहिब को कानपुर का पेशवा घोषित किया गया
जुलाई 1857 इन्दौर, सागर, महू, जेहलम एवं स्यालकोट के कुछ स्थानों पर विद्रोह
अगस्त 1857 सागर एवं नर्मदा घाटी के सम्पूर्ण प्रदेश में असैन्य विद्रोह
20 सितम्बर 1857 दिल्ली पर अंग्रेजों का निकलसन के नेतृत्व में पुनः अधिकार हो गया
अक्टूबर 1857 कोटा में विद्रोह का विस्तार
नवम्बर 1857 क्रांति वीरों ने जनरल विण्डहम को कानपुर के निकट परास्त किया
6 दिसम्बर 1857 कानपुर का युद्ध सर कॉलिन कैम्बल ने जीता, तांत्या टोपे बच निकले और झांसी की रानी से जा मिले
मार्च 1858 लखनऊ पर अंग्रेजों का पुनः अधिकार हो गया
3 अप्रैल 1858 सर ह्यूरोज ने झांसी पर आक्रमण कर पुनः अपने अधिकार में कर लिया
अप्रैल 1858 जगदीशपुर (बिहार) के कुंवर सिंह ने विद्रोह किया
मई 1858 अंग्रेजों ने बरेली, जगदीशपुर, काल्पीको पुनः जीता, भारतीय क्रांतिवीरों ने
रूहेलखण्ड में छापामार आक्रमण प्रारम्भ किया
जून 1858 ग्वालियर पर अंग्रेजों का पुनः अधिकार
जुलाई-दिसम्बर1858 सम्पूर्ण भारत में अंग्रेजी सत्ता पुनः स्थापित

कहां, किसने स्वातंत्र्य संग्राम का नेतृत्व किया

दिल्ली बहादुर शाह जफर (प्रमुख नेतृत्वकर्ता)
लखनऊ बेगम हजरत महल वक्त खां (सैन्य नेतृत्व)
कानपुर नाना साहब, अजीमुल्ला
झांसी रानी लक्ष्मी बाई
इलाहाबाद लियाकत अली
बिहार पटना, दानापुर, शाहबाद, जगदीशपुर,
ग्वालियर, तात्यां टोपे
छोटा नागपुर कुंवर सिंह
कालपी
मथुरा देवी सिंह
हरियाणा राव तुलाराम
मेरठ कदम सिंह
सम्बलपुर सुरेन्द्र सांई
फैजाबाद मौलवी मुहम्मद अल्ला
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1857 से 1947 तक अंगेजों ने अपनाई,फूट डालो राज करो की कूटनीति।
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1857 से पूर्व के पुरूषार्थपूर्ण संघर्ष
आन्दोलन  समय सम्बन्धित क्षेत्र सम्बन्धित नेता
सन्यासी विद्रोह 1760-1800 ई. बिहार, उत्तर बंगाल केना सरकार, दिर्जिनारायण
चोपाड़ विद्रोह 1798 ई. बांकुडा (बंगाल) दुर्जन सिंह
पालिगार विद्रोह 1799-1801 तमिलनाडु वीर पी. काट्टावाम्मान
थाम्पी विद्रोह 1808-09 ई. ट्रावनकोर मेलू थाम्पी
लायेक विद्रोह 1816 ई. मेदिनीपुर (बंगाल) दुर्जन सिंह
भील विद्रोह 1817-19 ई.
1825-31 ई. पश्चिमी घाट सेवा राम
पाइक अभ्युदय 1817-25 ई. उड़ीसा बक्शी जगबंधु
रामोसी विद्रोह 1822,25,28,29 ई. पश्चिमी घाट चित्तर सिंह
पागलपंथी विद्रोह 1825-27 ई. असम टीपू (गारो)
अहोम विद्रोह 1828 ई असम गोमधर कुंवर
वहाबी आन्दोलन 1831 उ.प्र., बिहार, बंगाल सैयद अहमद, तूती मीर
कोल आन्दोलन 1831-32 ई. छोटा नागपुर (बिहार) गोमधर कुंवर
खासी विद्रोह 1833 ई. असम तिरूत सिंह
फरायजी आन्दोलन 1838-48 बंगाल शरीयातुल्ला, दूदू मियां
नील विद्रोह 1854-62 ई. बंगाल/बिहार तिरूत सिंह
संथाल विद्रोह 1855-56 ई. बंगाल, बिहार सिंधु, कानू



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1857 की क्रांति का महत्व
-डा. अमित कुमार शर्मा

29मार्च 1857 को मंगल पांडे ने ईस्ट इंडिया कंपनी के विरूद्ध बैरकपुर में जो बिगुल फूंका, उसकी परिणति 10 मई 1857 को मेरठ में हुई। मेरठ के सैनिकों ने कंपनी राज के खिलाफ एक अभियान छेड़ दिया।
11 मई 1857 को मेरठ छावनी के सैनिक दिल्ली पहुंच गए और उन्होंने बूढ़े मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को अपना नेता और हिन्दुस्तान का बादशाह घोषित कर दिया। इतिहासकारों का कहना है कि यह कंपनी सरकार और इंग्लैंड के शासकों के लिए यह जितना अप्रत्याशित था उतना ही बहादुरशाह के लिए भी अप्रत्याशित था।
11 मई 1857 से 20 सितम्बर 1857 तक अंग्रेजों की स्थिति कमजोर थी। उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में कंपनी राज छावनियों तक सीमित हो गया और लगा कि कंपनी राज समाप्त हो जाएगा। किन्तु 20 सितम्बर 1857 से स्थिति बदलने लगी।
20 सितम्बर 1857 को बहादुरशाह जफर बंदी बना लिए गए। अक्टूबर 1857 में कलकत्ता में ब्रिटिश सिपाहियों का बड़ा जत्था आया और 18 अप्रैल 1859 तक अंग्रेजी प्रभुता का विरोध करने वाले सभी नेता या तो बंदी बना लिए गए या वीर गति को प्राप्त हो गए या फिर नेपाल के जंगलों के रास्ते पलायन कर गए। 2 अगस्त, 1858 को ब्रिटिश संसद ने एक कानून पास कर भारत में कंपनी राज को समाप्त कर दिया। फलस्वरूप 2 अगस्त, 1858 से भारत ब्रिटिश साम्राज्य का अंग बन गया।
1 नवम्बर 1858 को भारत की साम्राज्ञी के रूप में लंदन से महारानी विक्टोरिया ने एक घोषणापत्र जारी किया, जिससे भारत का शासन चलने लगा। अंग्रेज इतिहासकारों ने घोषणा की कि अब अंग्रेज भारत में ‘बाहरी’ नहीं रहे बल्कि भारत ब्रिटिश साम्राज्य के ‘भीतर’ आ गया और अभिन्न अंग बन गया। 1885 में कांग्रेस की स्थापना की गई।
ए.ओ. ह्यूम द्वारा स्थापित कांग्रेस में भारतीय मध्यवर्ग, जमींदार और अंग्रेजों के साझीदार भारतीय व्यवसायी ‘नरम दल’ के अंतर्गत अंग्रेजी राज को मानवीय, उत्तरदायी और न्यायपूर्ण बनाने के लिए प्रार्थना, आवेदन और संवाद करने लगे। 1885 से 1906 तक यही सब चलता रहा। 1906 के बाद कांग्रेस का ‘नरम दल’ कमजोर पड़ने लगा और ‘गरम दल’ का प्रभुत्व बढ़ा।
बाल गंगाधार तिलक, बिपिनचन्द्र पाल और लाला लाजपतराय के साथ श्री अरविन्दो गरमदल के प्रमुख नेता बने। 1906 से 1920 तक गरम दल भारतीय राजनीति का केंद्र रहा। इसी दौरान 1909 में दो महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन हुआ। वीर सावरकर लिखित ‘भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857)’ और महात्मा गांधी द्वारा गुजराती में लिखित पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ और इसी का महात्मा गांधी द्वारा ही अंग्रेजी में किया गया अनुवाद।
दोनों पुस्तकों में कांग्रेस के गरम दल और नरम दल की दृष्टि से भारत में अंग्रेजी राज और इससे मुक्ति के उपाय पर विमर्श प्रस्तुत किया गया है। सावरकर को गरमदल का और महात्मा गांधी को नरम दल का तत्कालीन प्रतिनिधि माना गया था। सावरकर की पुस्तक 1857 पर केंद्रित है और वे गरम दल के समर्थक थे।
महात्मा गांधी ने 1857 की सीधी चर्चा तो नहीं की है लेकिन 1857-59 के संदर्भ को ध्यान में रखे बिना हिन्द स्वराज में वर्णित गरम दल के प्रतिनिधि ‘पाठक’ और नरमदल के प्रतिनिधि ‘संपादक’ के संवाद को ठीक से समझा नहीं जा सकता। ‘हिन्द स्वराज’ में पहली बार 1857 की असफल क्रांति को परम्परा और आधुनिकता के द्वन्द्व के रूप में सभ्यतामूलक दृष्टि से देखा गया है।
महात्मा गांधी ने पारम्परिक भारतीय सभ्यता और आधुनिक पाश्चात्य सभ्यता के संघर्ष का जो खाका प्रस्तुत किया है उसकी पहली ऐतिहासिक अभिव्यक्ति 1857 के संग्राम में ही हुई थी। 1757 (प्लासी) या 1764 (बक्सर) की हार को गांधी जी न तो हार मानते हैं (उन्होंने कहा कि हम अंग्रेजों से पराजित नहीं हुए हैं, हमने अंग्रेजों को भारत उपहार या दान के रूप में दिया है, वे हमारे अतिथि हैं), न वे इसे सभ्यतामूलक संघर्ष मानते हैं। 1857 को वे सभ्यतामूलक संघर्ष तो मानते हैं लेकिन उस संघर्ष की रणनीति (हिंसा का सहारा) को वे दोषपूर्ण मानते हैं।
जब वे पाठक को यह कहते हें कि ”अंग्रेज गोला-बारूद से पूरी तरह लैस हैं, उसे इससे डर नहीं लगता । परंतु हिन्दुस्तानियों के पास अंग्रेजों से लड़ने के लिए हथियार आएगा कहां से? और किस तरह? और अगर उनके हथियारों से उन्हीं के खिलाफ लड़ना हो तो इसमें कितने साल लगेंगे? और तमाम हिन्दुस्तानियों को हथियारों से लैस करना हो तो हिन्दुस्तान को भी यूरोप की सभ्यता अपनानी होगी।” इसका संदर्भ सीधे-सीधे 1857-59 का समर है।
गांधीजी की स्पष्ट मान्यता थी कि शिवाजी का गुरिल्ला युद्ध औरंगजेब को हराने के लिए भले कारगर रहा हो परंतु रामचंद्र पांडुरंग (तात्या टोपे) का गुरिल्ला युद्ध (19 जून 1858- 18 अप्रैल 1859) अंग्रेजों को हराने के लिए पर्याप्त नहीं था। गांधी जी  कहते हैं कि हर सभ्यता पर आफतें आती हैं। जो सभ्यता अचल है यानी जो सनातनी मूल्यों पर टिकी हुई है वह आखिरकार आफतों को दूर कर देती है।
हिन्दुस्तान की सभ्यता में कमी आ गई थी, इसलिए यह सभ्यता आफतों से घिर गई। लेकिन इस घेरे से छूटने की ताकत उसमें है। सारा हिन्दुस्तान गुलामी में घिरा हुआ नहीं है। जिन्होंने पश्चिमी शिक्षा पाई है और जो उसके पाश में फंस गए हैं, वे ही गुलामी में घिरे हुए हैं हमारा स्वराज हमारी हथेली में है। स्वराज का आधार संकल्प शक्ति एवं नैतिक बल है, न कि आर्थिक, राजनैतिक या सैनिक स्थिति।
अंग्रेजों को यहां लाने वाले हम लोग ही हैं और वे हमारी बदौलत ही यहां रहते हैं। जिस दिन एक देश के रूप में हिन्दुस्तान का स्वाभिमान जाग गया और हमने आधुनिक शैतानी सभ्यता का आकर्षण त्याग दिया उसी क्षण हमें आजादी मिल जाएगी। अंग्रेजों की सेना धरी की धरी रह जाएगी। उन्हें इस देश में रहने का कोई आधार ही नहीं बचेगा। और वे तो व्यापारी लोग हैं। व्यावसायिक नुकसान सहने का तो उनमें साहस ही नहीं है। बिना लोभ-लालच की प्रेरणा के वे कहीं भी कुछ नहीं करते। अत: हमें अंग्रेजों को नहीं, उनके स्वार्थ को नुकसान पहुंचाना चाहिए। हमें अंग्रेजों से नहीं, उनकी सभ्यता से नफरत करनी चाहिए।
गांधीजी की उपरोक्त दृष्टि अंग्रेजी राज के दौरान और अंग्रेजी राज से पहले के भारतीय इतिहास के तुलनात्मक अध्ययन की उपज थी। गांधीजी की रणनीति तत्कालीन भारत में हिन्दू-मुस्लिम एकता और किसानों तथा कारीगरों में जागरुकता की संभावना पर आधारित थी। वे इसी रणनीति को 1920 से 1947 के दौरान अपने अभियानों के माध्यम से परखते हैं। हिन्दू-मुस्लिम एकता की सबसे पहली सभ्यतामूलक अभिव्यक्ति 1857 की क्रांति में दिखी। उस वक्त के ज्यादातर सिपाही किसान परिवारों से आए थे। समकालीन इतिहासकारों ने उन्हें ‘वर्दी वाले किसान’ के रूप में संबोधित भी किया है।
1857 की क्रांति का नेतृत्व न बहादुशाह जफर के हाथ में था, न नाना साहब के, न रानी झांसी के हाथ में था और न ही अवध की बेगम के हाथ में। जैसा कि शेखर बंद्योपाध्याय जैसे इतिहासकारों ने कहा है, यह पूरी तरह आम सैनिकों, किसानों, कारीगरों एवं सामान्य जन का विद्रोह था, जिसमें कुछ नवाबों, जागीरदारों एवं सेनापतियों ने भी भाग लिया था। यह अपने समय से पहले शुरू हुए जन आंदोलन का प्रारंभिक रूप था जो 1906 के स्वदेशी आंदोलन और तिलक महाराज के उत्सवों से होता हुआ महात्मा गांधी के आंदोलनों में परिपक्व होता गया। संविद सरकारों या गठबंधन की राजनीति के बीज 1857 की क्रांति में ही छिपे हुए हैं।
महात्मा गांधी के जाने के बाद भी 1967 से गठबंधन की राजनीति और संविद सरकारों के गैर उपनिवेशवादी प्रयोग लगातार होते रहे हैं। इस राजनीति की प्रेरणा 1857 की क्रांति में ही निहित है, लेकिन खुद 1857 की क्रांति को भक्ति आंदोलन की अभिव्यक्ति माना जा सकता है। भक्ति आंदोलन ने मध्यकालीन भारतीय समाज को राजनीतिक उथल-पुथल के जमाने में भी स्थिरता एवं गतिशीलता का संतुलन सिखलाया।
देसी भाषाओं को क्षेत्रीय संस्कृति का समर्थ वाहक बनाया तथा हिन्दू-मुस्लिम अखण्डता एवं छुआछूत जैसी कुप्रथाओं से मुक्ति दिलाने का प्रयास किया। भक्ति आंदोलन ने ही क्षेत्रीय स्तर पर हुए सामाजिक परिवर्तनों के फलस्वरूप मराठों, जाटों, गूजरों, लिंगायतों, खत्रियों, सतनामियों, मुंडाओं और पिंडारियों जैसे समुदायों को नई ऊर्जा एवं नए उत्साह से भर दिया। भक्ति आंदोलन ने ही हैदर अली और टीपू सुलतान को श्रृंगेरी मठ एवं लिंगायत मठों से सहयोग करना सिखलाया।
भक्ति आंदोलन ने ही सिखों और मराठों में सांसारिक युक्ति का नया मंत्र भरा। यह भक्ति आंदोलन ही था जिसने 29 मार्च, 1857 और 10 मई 1857 के बीच ‘चपातियों’ की कूट भाषा में क्रांतिकारियों के बीच संदेशों का सांकेतिक आदान-प्रदान किया। आज भी ‘चपातियों का संदेश’ इतिहासकारों के लिए एक रहस्य बना हुआ है।
एक अर्थ में 1885 में कांग्रेस की स्थापना से शुरू हुआ स्वतंत्रता संग्राम अंग्रेजों द्वारा नियोजित संग्राम था। यह 1857 की आत्मा का निषेध था। लेकिन 1906 के स्वदेशी आंदोलन से गाड़ी फिर पटरी पर आ गई। 1947 में देश का बंटवारा और 1947 से 1966 तक की भारतीय राजनीति 1857 की आत्मा का निषेध था, लेकिन 1967 से भारतीय राजनीति धीरे-धीरे पटरी पर आ रही है। भारतीय सभ्यता के अनुकूल राजनीति, विकेन्द्रित राजनीति और स्वदेशी अर्थव्यवस्था ही हो सकती है। भारतीय एकता का आधार सांस्कृतिक भौगोलिक कारकों में रहा है।
राजनैतिक एकता सांस्कृतिक एकता की अभिव्यक्ति रही है। भक्ति आंदोलन ने इसे संभव बनाया था। आज भी गठबंधन की राजनीति का सैद्धांतिक आधार भक्ति आंदोलन के सूत्रों को विकसित करके ही मिल सकता है। महात्मा गांधी इसको बखूबी समझते थे। ‘हिन्द स्वराज’ इसी समझ की उपज थी। 1857 की स्मृति का उत्सव मनाने के लिए इस सूत्र को समझना आवश्यक है।