शनिवार, 12 मई 2012

'' कीका राणा '' महाराणा प्रताप




!! प्रताप जयन्ती पर विशेष !!
लेखक - बाबा निरंजननाथ, कोटा
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!! बचाओ बचाओ !!
झील में से चिल्लाहट आयी -
'' बचाओ बचाओ '' !
उदयपुर का प्रसिद्ध '' पीछोला '' सरोवर !
चारों और निःस्तब्ध शान्ति !
पीछोला का जल भी स्थिर !
पवनदेव भी रात्रि में विश्राम कर रहे थे न, इसलिए !
सब ओर शान्ति !
पश्चिम में जल शान्त और पूर्व में जन शान्त !
जल थल सहित पूरा उदयपुर शान्त !
छोटा सा उदयपुर !
उदयपुर को बसाए हुए अभी कोई तीन वर्ष हुए होंगे !
चित्तोड़ सुरक्षित नहीं रहा था !
एक जौहर की विभीषिका वह अजेय गढ़ देख चुका था !
इसलिए नीतिमान महाराणा-श्री उदयसिंह ने गिरवा पर्वत माला के मध्य सुरक्षित स्थान के रूप में नयी राजधानी उदयपुर नाम से बसायी !
चैत्र शुक्ला एकादशी विक्रम संवत १६२७ को उदयपुर स्थापित हुआ है, यह घोषणा हो चुकी थी ! महाराणा उदय सिंह ने वहां निवास करना प्रारंभ कर दिया था ! कभी चित्तोड़ कभी उदयपुर !
अभी नगर बहुत बड़ा नहीं था !
कुछ साधारण दो चार भवन राज-प्रासाद के नाम पर ! कुछ साधारण ही भवन राज-कार्य के लिए और कुछ झोंपडे व कच्चे-पक्के स्थायी-अस्थायी भवन राज-कर्मचारियों, सैनिकों, सेवकों, पशुपालकों, वनवासियों आदि के लिए !
बस इतना सा ही उदयपुर !
आज जैसा भव्य नहीं था वह !
नगर बसने ही तो लगा था !
''बस्ती बसाना सरल नहीं वह बसते बसते बसती है'' !
भव्य नहीं तो भी दिव्य अवश्य थी वह बस्ती !
नगर का बसना प्रारंभ हो गया था जहां हिदुआ सूर्य महाराणा रहने लगेंगे वहां इतनी बस्ती तो हो ही जायेगी !
सब शान्त !
सब गहन रात्रि में गाढ़ निद्रा में !
प्रहरी सजग, किन्तु शान्त !
चारों ओर वन्य प्रान्तर !
वहां भी आश्चर्यजनक शान्ति !
हिंदुआ सूर्य के राज में अशान्ति का क्या काम !
फिर भय किसका !
'' मेवाड़े त्रि रत्नानि - काँटा, भाटा च पर्वता ''
और चौथी रहती शूरता !!
फिर भय किसका !
फिर '' बचाओ बचाओ '' चिल्लाने के नारी स्वर का क्या अर्थ ?
युवराज प्रताप, बाईस वर्षीय युवा प्रताप अपनी कुटज से तुरन्त बाहर आये !
झील की ओर देखा ! पलक झपकते ही समझ गए वे सब कुछ !
हिंदुआ सूर्य की पटरानी, युवराज प्रताप की वीर-प्रसूता माता-श्री '' जयवंती देवी सोनगरा '' भी चिल्लाहट सुन कर अपने आवास से बाहर निकली ! बाहर खड़ीं थीं युवरानी-श्री ''अजवां देवी परमार'' !
पटरानी ने पूछा - ' बेटा प्रताप कहाँ है ' ?
''जी, माता जी, उनके बाहर आते ही मैं बाहर आयी और उनको देखने लगी तो आप के राजपुत्र तो नाव घाट से नाव खोल कर दमदमा प्रासाद की ओर नाव में जाते ही दिखे ! किसी सेवक अथवा केवट को जगाने, बुलाने वा आने की प्रतीक्षा भी उन्होंने नहीं की !''
दोनों ने पीछोला की ओर देखा ! युवा प्रताप पीछोला में उठ रही उत्ताल लहरों को अपनी पतवार से काटने का प्रयास करते हुए लहरों के साथ उतरती चढ़ती नाव को बल पूर्वक आगे बढाते जा रहे थे !
चाँद तो अपनी शान्त, शीतल चांदनी बिखेर रहा था ! किन्तु प्रकम्पित वायु ने शान्त जल को आन्दोलित कर दिया था ! झील का पानी लगातार बढ़ता भी जा रहा था !
इधर तो वर्षा का कोई समाचार ही नहीं था ! न आकाश में बादल, न बिजली, और न वर्षा की ऋतु !
दोनों ही लगभग दौड़ती हुई सी नाव घाट पर आयीं ! बचाओ-बचाओ की पुकार से जग कर प्रायः सारी ही जनता नाव घाट पर आ गयी थी !
सब को समझ में आ गया था कि पीछोला को पूरने वाली '' सिसारमा नदी '' के जल संग्रहण क्षेत्र में अचानक भारी वर्षा हुई है ! उसके कारण झील का जल स्तर बढ़ने लगा और लगातार बढ़ता ही जा रहा था ! बढ़ते-बढ़ते पानी झील में बने दमदमा प्रसाद के कक्षों में घुस गया ! पानी और भी बढ़ रहा था ! तब प्रसाद की सेविका ने ऊपर छत पर चढ़ कर सहायता के लिए '' बचाओ-बचाओ '' की पुकार लगाई !
माता-श्री ने और किसी को उफनती झील में नहीं जाने दिया ! उन्हें अपने दूध पर विश्वास ! जैसा दूध वैसा पूत ! अपनी शिक्षा पर विश्वास था ! जैसी शिक्षा वैसी दीक्षा !
झील के बीच दक्षिणी तट के निकट के टापू पर बने ''दमदमा प्रासाद'' में महाराणा उदयसिंह अपनी छोटी महारानी ''भटियानीजी'' के साथ रह रहे थे ! वे पानी में घिर गए !
''भटियानीजी'' प्रताप-माता से सौतिया डाह रखती थी ! इसलिए वह प्रताप और उनकी माता को महाराणा के निकट नहीं फटकने देती थी ! चित्तोड़ में भी उनको नहीं रखा जाता था ! एक प्रकार से अघोषित निर्वासित जीवन जी रहे थे दोनों माता-पुत्र ! चित्तोड़ के नीचे एक छोटी सी भीलों की बस्ती में उन्हें रखा गया था ! राजकुमार अथवा युवराज जैसी अथवा पटरानी जैसी कोई सुविधा उनको नहीं थी ! भोजन सामग्री भी उनको एक निश्चित मात्रा में ही दी जाती थी !
किन्तु प्रताप की महान माताश्री ने अपने राजपुत्र को कभी भी डाह में नहीं फंसने दिया ! उनकी शिक्षा में महाराणा उदयसिंह उनके पूज्य पिताश्री थे और विमाता थीं पूज्या माताश्री !
प्रताप ने भी अपने दूध की शिक्षा की लाज रखी ! '' पूत सिखावै पालणे मरण बड़ाई माय ! ''
पीछोला का पानी बहुत भी बहुत उद्दण्ड हुआ जा रहा था ! पश्चिम से आने वाली सिसारमा नदी और भी वेग से झील में घुसपैठ कर रही थी ! आकाश भी काली काली घटाओं से घिर गया था ! बिजलियाँ बादलों को छोड़ कर धरती पर आ जाने को उतावली हो रही थी ! सब लोग सांस रोके खड़े थे !
**** वीर काल के वश में नहीं होते, काल ही उनके वश में होता है ! एकलिंग नाथ के भक्तों का, महाकाल के पुजारियों का काल बेचारा क्या करे !
**** उत्ताल लहरों पर प्रताप ने विजयश्री प्राप्त की !
दूर दक्षिणी तट के निकट थे पिताश्री और विमाताश्री ! पूर्वी तट पर बसा था उदयपुर ! वहीँ के नावघाट से दूर झील के दक्षिण तट के निकट जाना और आना ! वह भी उफनती झील में और रात्रि में ! असंभव नहीं तो टेढ़ी खीर अवश्य था !
नाव के सकुशल नाव-घाट पर लगते ही जनता ने एकलिंगनाथ जी की जय के निनाद से गगन-गर्जना को चुनौती दी !
महाराणा ने अपनी पटरानी को कहा - '' आप के राजपुत्र के सक्षम हाथों ने ही हमारी नाव को पार लगाया महारानी ! ''
सदा द्वेषाक्रोश में रहने वाली विमाता भटियानी जी ने श्रद्धावनत होते हुए कहा - '' ऐसा न कहें अन्नदाता, प्रताप आपके भी राजपुत्र हैं और युवराज भी हैं, उनके सक्षम हाथों में तो पूरे राष्ट्र की नाव सुरक्षित रहेगी ! ''
महाराणा उदयसिंह ने प्रताप की पीठ पर प्यार से हाथ फेरते हुए भटियानी जी को सम्बोधित करते हुए कहा - '' तो अब तो आपके इस सबसे बड़े पुत्र को चित्तोड़ में रहने की अनुमति दी जाए महारानी ? ''
' जी, जी अन्नदाता ! '' अपने पुराने कृत्यों पर लजाते हुए से भटियानी जी ने कहा !
आकाश भी भटियानी जी की इस टिप्पणी को सुनने के लिए कुछ थम सा गया था !
शान्त हुए वातावरण में एक भील बालक प्यार के उत्साह में चिल्लाते हुए सा बोला - '' कीका राणा की जय ! ''
प्रताप ने उस छोटे से बालक को तुरन्त अपनी गोद में उसी प्रकार उठा लिया जिस प्रकार उस बालक के वृद्ध दादा जी कुम्भल गढ़ में अपनी गोद में खिलाते थे और प्यार से '' कीका राणा '' नाम से पुकारते थे ! कीका अर्थात प्यारा बच्चा !
उस बच्चे के लिए युवा प्रताप भी अभी कीका ही थे ! कीका राणा !
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लेखक - बाबा निरंजननाथ, कोटा
लेखकीय - यह कथा प्रसिद्ध इतिहासकार डा. हुकमसिंह भाटी के नए शोध के आधार पर लिखी गयी है !
सन्दर्भ ग्रन्थ - ''महाराणा प्रताप ऐतिहासिक अध्ययन'', राजस्थानी शोध संस्थान, चौपासनी, जोधपुर,
 पृष्ठ - २८


1 महाराणा प्रताप: सूरवीर राष्ट्रभक्त
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2 वीर सपूत महाराणा प्रताप
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3 महाराणा प्रताप की जयंती
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