सोमवार, 28 मई 2012

बुंदेलखंड के प्रतापी शासक : महाराजा छत्रसाल


महाराजा छत्रसाल
ज्येष्ठ शुक्ल ३ संवत १७०७

बुंदेलखंड में कई प्रतापी शासक हुए हैं। बुंदेला राज्‍य की आधारि‍शला रखने वाले चंपतराय के पुत्र छत्रसाल महान शूरवीर और प्रतापी राजा थे। छत्रसाल का जीवन मुगलों की सत्ता के खि‍लाफ संघर्ष और बुंदेलखंड की स्‍वतंत्रता स्‍थापि‍त करने के लि‍ए जूझते हुए नि‍कला। महाराजा छत्रसाल अपने जीवन के अंतिम समय तक आक्रमणों से जूझते रहे। बुंदेलखंड केशरी के नाम से वि‍ख्‍यात महाराजा छत्रसाल के बारे में ये पंक्तियां बहुत प्रभावशाली है:
इत यमुना, उत नर्मदा, इत चंबल, उत टोंस ।
छत्रसाल सों लरन की, रही न काहू हौंस ।।
चंपतराय जब समय भूमि मे ंजीवन-मरण का संघर्ष झेल रहे थे उन्हीं दिनों ज्येष्ठ शुक्ल 3 संवत 1707 (सन 1641) को वर्तमान टीकमगढ़ जिले के लिघोरा विकास खंड के अंतर्गत ककर कचनाए ग्राम के पास स्थित विंध्य-वनों की मोर पहाड़ियों में इतिहास पुरुष छत्रसाल का जन्म हुआ। अपने पराक्रमी पिता चंपतराय की मृत्यु के समय वे मात्र 12 वर्ष के ही थे। वनभूमि की गोद में जन्में, वनदेवों की छाया में पले, वनराज से इस वीर का उद्गम ही तोप, तलवार और रक्त प्रवाह के बीच हुआ। पांच वर्ष में ही इन्हें युद्ध कौशल की शिक्षा हेतु अपने मामा साहेबसिंह धंधेर के पास देलवारा भेज दिया गया था। माता-पिता के निधन के कुछ समय पश्चात ही वे बड़े भाई अंगद राय के साथ देवगढ़ चले गये। बाद में अपने पिता के वचन को पूरा करने के लिए छत्रसाल ने पंवार वंश की कन्या देवकुंअरि से विवाह किया। जिसने आंख खोलते ही सत्ता संपन्न दुश्मनों के कारण अपनी पारंपरिक जागीर छिनी पायी हो, निकटतम स्वजनों के विश्वासघात के कारण जिसके बहादुर मां-बाप ने आत्महत्या की हो, जिसके पास कोई सैन्य बल अथवा धनबल भी न हो, ऐसे 12-13 वर्षीय बालक की मनोदशा की क्या आप कल्पना कर सकते हैं? परंतु उसके पास था बुंदेली शौर्य का संस्कार, बहादुर मां-माप का अदम्य साहस और ‘वीर वसुंधरा’ की गहरा आत्मविश्वास। इसलिए वह टूटा नहीं, डूबा नहीं, आत्मघात नहीं किया वरन् एक रास्ता निकाला। उसने अपने भाई के साथ पिता के दोस्त राजा जयसिंह के पास पहुंचकर सेना में भरती होकर आधुनिक सैन्य प्रशिक्षण लेना प्रारंभ कर दिया। राजा जयसिंह तो दिल्ली सल्तनत के लिए कार्य कर रहे थे अतः औंरगजेब ने जब उन्हें दक्षिण विजय का कार्य सौंपा तो छत्रसाल को इसी युद्ध में अपनी बहादुरी दिखाने का पहला अवसर मिला। मइ्र 1665 में बीजापुर युद्ध में असाधारण वीरता छत्रसाल ने दिखायी और देवगढ़ (छिंदवाड़ा) के गोंडा राजा को पराजित करने में तो छत्रसाल ने जी-जान लगा दिया। इस सीमा तक कि यदि उनका घोड़ा, जिसे बाद में ‘भलेभाई’ के नाम से विभूषित किया गयाउनकी रक्षा न करता तो छत्रसाल शायद जीवित न बचते पर इतने पर भी जब विजयश्री का सेहरा उनके सिर पर न बांध मुगल भाई-भतीजेवाद में बंट गया तो छत्रसाल का स्वाभिमान आहत हुआ और उन्होंने मुगलों की बदनीयती समझ दिल्ली सल्तनत की सेना छोड़ दी। इन दिनों राष्ट्रीयता के आकाश पर छत्रपति का सितारा चमचमा रहा था। छत्रसाल दुखी तो थे ही, उन्होंने शिवाजी से मिलना ही इन परिस्थितियों में उचित समझा और सन 1668 में दोनों राष्ट्रवीरों की जब भेंट हुई तो शिवाजी ने छत्रसाल को उनके उद्देश्यों, गुणों और परिस्थितियेां का आभास कराते हुए स्वतंत्र राज्य स्थापना की मंत्रणा दी एवं समर्थ गुरु रामदास के आशीषों सहित ‘भवानी’ तलवार भेंट की- करो देस के राज छतारे हम तुम तें कबहूं नहीं न्यारे। दौर देस मुगलन को मारो दपटि दिली के दल संहारो। तुम हो महावीर मरदाने करि हो भूमि भोग हम जाने। जो इतही तुमको हम राखें तो सब सुयस हमारे भाषंे।
शिवाजी से स्वराज का मंत्र लेकर सन 1670 में छत्रसाल वापस अपनी मातृभूमि लौट आयी परंतु तत्कालीन बुंदेल भूमि की स्थितियां बिलकुल मिन्न थीं। अधिकाश रियासतदार मुगलों के मनसबदार थे, छत्रसाल के भाई-बंधु भी दिल्ली से भिड़ने को तैयार नहीं थे। स्वयं उनके हाथ में धन-संपत्ति कुछ था नहीं। दतिया नरेश शुभकरण ने छत्रसाल का सम्मान तो किया पर बादशाह से बैर न करने की ही सलाह दी। ओरछेश सुजान सिंह ने अभिषेक तो किया पर संघर्ष से अलग रहे। छत्रसाल के बड़े भाई रतनशाह ने साथ देना स्वीकार नहीं किया तब छत्रसाल ने राजाओं के बजाय जनोन्मुखी होकर अपना कार्य प्रारंभ किया। कहते हैं उनके बचपन के साथी महाबली तेली ने उनकी धरोहर, थोड़ी-सी पैत्रिक संपत्ति के रूप में वापस की जिससे छत्रसाल ने 5 घुड़सवार और 25 पैदलों की छोटी-सी सेना तैयार कर ज्येष्ठ सुदी पंचमी रविवार वि.सं. 1728 (सन 1671) के शुभ मुहूर्त में शहंशाह आलम औरंगजेब के विरूद्ध विद्रोह का बिगुल बजाते हुए स्वराज्य स्थापना का बीड़ा उठाया।



बुंदेल केसरी महाराजा छत्रसाल

            मध्यकालीन भारत में विदेशी आतताइयों से सतत संघर्ष करने वालों में छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप और बुंदेल केसरी छत्रसाल के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं । बुंदेल केसरी छत्रसालको ‘शत्रु और संघर्ष’ ही विरासत में मिले थे । उन्होंने अपने पूरे जीवनभर स्वतंत्रता और सृजन के लिए ही सतत संघर्ष किया । उन्होंने विस्तृत बुंदेलखंड राज्य की गरिमामय स्थापना ही नहीं की थी, वरन साहित्य सृजन कर जीवंत काव्य भी रचे । छत्रसालने अपने ८२ वर्षके जीवन और ४४ वर्षीय राज्यकालमें ५२ युद्ध किये थे । उनके पिता चंपतरायने पूरे जीवनभर विदेशी मुगलों से संघर्ष करते हुए अपने ही विश्वासघातियों के कारण सन् १६६१ में अपनी वीरांगना पत्नी रानी लालकुंआरि के साथ आत्माहुति दी ।

इतिहास पुरुष : महाराजा छत्रसाल
             इतिहास पुरुष छत्रसाल का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल ३ संवत १७०७ (सन् १६४१) को वर्तमान टीकमगढ जिलेमें हुआ । अपने पराक्रमी पिता चंपतराय की मृत्युके समय वे मात्र १२ वर्ष के ही थे । वनभूमिकी गोदमें जन्में, वनदेवोंकी छायामें पले, वनराजसे इस वीरका उद्गम ही तोप, तलवार और रक्त प्रवाहके बीच हुआ । उनका जन्म होते ही परिस्थिति अत्यंत विकट थी । पारंपरिक सत्ता शत्रुओंने छीन ली थी, निकटतम स्वजनोंके विश्वासघातके कारण उनके वीर मां-पिताजीको आत्महत्या करनी पडी, उनके पास कोई सैन्य बल अथवा धनबल भी नहीं था, ऐसे १२-१३ वर्षीय बालक की मनोदशा वैâसी होगी ? परंतु उनके पास बुंदेली शौर्यका संस्कार, वीर मां- पिताका अदम्य साहस और आत्मविश्वास था । इसलिए वे निराश न होकर अपने भाईके साथ पिताके मित्र राजा जयसिंहके पास पहुंचकर सेनामें भरती होकर आधुनिक सैन्य प्रशिक्षण लेना प्रारंभ कर दिया ।
           अपने पिताके वचनको पूरा करनेके लिए छत्रसालने पंवार वंश की कन्या देवकुंअरि से विवाह किया । उस समय छत्रपति शिवाजी महाराज हिंदवी राज्यके लिए कृत्यशील थे । छत्रसालजी मुगल सत्ताके कारण दुखी थे,  इन परिस्थितियोंमें उन्होंने शिवाजीसे मिलना उचित समझा और सन १६६८ में दोनों राष्ट्रवीरों की जब भेंट हुई तो शिवाजीने छत्रसालको उनके उद्देश्यों, गुणों और परिस्थितियोंका आभास कराते हुए स्वतंत्र राज्य स्थापनाकी मंत्रणा दी एवं समर्थ गुरु रामदासके आशीषों सहित ‘भवानी’ तलवार भेंट की-
करो देस के राज छतारे
हम तुम तें कबहूं नहीं न्यारे।
दौर देस मुगलन को मारो
दपटि दिली के दल संहारो।
तुम हो महावीर मरदाने
करि हो भूमि भोग हम जाने।
जो इतही तुमको हम राखें
तो सब सुयस हमारे भाषे।

             शिवाजी से स्वराज का मंत्र लेकर सन १६७० में छत्रसाल वापस अपनी मातृभूमि लौट आए परंतु तत्कालीन बुंदेल भूमि की स्थितियां बिलकुल भिन्न थीं । अधिकांश रियासतदार मुगलों के मनसबदार थे, छत्रसालके भाई-बंधु भी दिल्लीसे लडनेको तैयार नहीं थे । छत्रसालजीके बचपनके साथी महाबली तेलीने उनकी धरोहर, थोडी-सी पैत्रिक संपत्तिके दी जिससे छत्रसालजीने ५ घुडसवार और २५ पैदलोंकी छोटी-सी सेना तैयार कर ज्येष्ठ सुदी पंचमी रविवार वि.सं. १७२८ (सन १६७१) के शुभ मुहूर्त में औरंगजेब के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजाते हुए स्वराज्य स्थापनाका बीडा उठाया ।
संघर्ष का शंखनाद
                छत्रसाल की प्रारंभिक सेना में सैन्य, राजा नहीं थे अपितु तेली बारी, मुसलमान, मनिहार आदि जातियों से आनेवाले सेनानी ही थे । चचेरे भाई बलदीवान उनके साथ थे । छत्रसालने अपने माता-पिताके साथ विश्वासघात करने वाले सेहराके धंधेरों पर पहला आक्रमण किया । कुंअरसिंहको कैद किया तथा उसकी मददको आये हाशिम खांकी धुनाई की और सिरोंज एवं तिबरा लूटे गये । लूट की सारी संपत्ति छत्रसालने अपने सैनिकों में बांटकर पूरे क्षेत्र के लोगों को उनकी सेना में सम्मिलित होने के लिए आवाहन किया । कुछ ही समय में छत्रसाल की सेना में भारी वृद्धि होने लगी और उन्होंने अनेक क्षेत्र जीत लिए । सन १६७१ में ही कुलगुरु नरहरि दास ने भी विजय का आशीष छत्रसाल को दिया।
              ग्वालियर की लूट से छत्रसाल को सवा करोड रुपये प्राप्त हुए । इस कारण औरंगजेबने आठ सवारों सहित तीस हजारी सेना भेजकर गढाकोटा के पास छत्रसालपर धावा बोल दिया । घमासान युद्ध हुआ । दणदूल्हा (रुहल्ला खां)पराजित हुआ तथा भरपूर युद्ध सामग्री छोडकर जान बचाकर उसे भागना पडा । सन १६७१-८० की अवधि में छत्रसालजीने चित्रकूटसे लेकर ग्वालियर तक और कालपी से गढाकोटा  तक प्रभुत्व स्थापित कर लिया । सन १६७५ में छत्रसाल की भेंट संत प्राणनाथसे हुई जिन्होंने छत्रसाल को आशीर्वाद दिया- छत्ता तोरे राज में धक धक धरती होय जित जित घोड़ा मुख करे तित तित फत्ते होय।

बुंदेले राज्यकी स्थापना
            आतंक के कारण अनेक मुगल फौजदार स्वयं ही छत्रसाल को राज्य देने लगे । बघेलखंड, मालवा, राजस्थान और पंजाब तक छत्रसाल ने युद्ध जीते । परिणामतः यमुना, चंबल, नर्मदा और टोंस क्षेत्रमें बुंदेला राज्य स्थापित हो गया । सन १७०७ में औरंगजेबकी मृत्यु हो गई । उसके पुत्र आजमने छत्रसालजीको मात्र सूबेदारी देनी चाही पर छत्रसालने स्वाभिमानीसे इसे अस्वीकार कर दिया ।
           महाराज छत्रसालपर इलाहाबादके नवाब मुहम्मद बंगस का ऐतिहासिक आक्रमण हुआ । इस समय छत्रसाल लगभग ८० वर्ष के वृद्ध हो चले थे और उनके दोनों पुत्रोंमें अनबन थी । जैतपुरमें छत्रसाल पराजित हो रहे थे । ऐसी परिस्थितियोंमें उन्होंने बाजीराव पेशवाको पुराना संदर्भ देते हुए सौ छंदों का एक काव्यात्मक पत्र भेजा जिसकी दो पंक्तियां थीं जो गति गज और ग्राह की सो गति भई है आज बाजी जात बुंदेल की राखौ बाजी लाज।
         फलतः बाजीरावकी सेना आनपर बंगश की पराजय हुई तथा उसे प्राण बचाकर अपमानित हो, भागना पडा । छत्रसाल युद्धमें क्षीण हो गए थे, लेकिन मराठोंके सहयोगसे उन्होंने  सम्मानसे मुगलोंसे युद्ध किया और विजयी हुए । छत्रसालजीने अपने अंतिम समय में राज्यके बंटवारेमें बाजीरावको तीसरा पुत्र मानते हुए बुंदेलखंड झांसी, सागर, गुरसराय, काल्पी, गरौठा, गुना, सिरोंज और हटा आदि हिस्सेके साथ राजनर्तकी मस्तानी भी उपहार में दी । छत्रसालजीने अपने दोनों पुत्रों ज्येष्ठ जगतराज और कनिष्ठ हिरदेशाहको जनता को समृद्धि और शांति से राज्य-संचालन हेतु बांटकर अपना दायित्व निभाया । यही कारण था कि छत्रसाल को अपने अंतिम दिनों में वृहद राज्य के सुप्रशासनसे (उस समय) एक करोड आठ लाख रुपये की आय होती थी । उनके एक पत्र से स्पष्ट होता है कि उन्होंने अंतिम समय १४ करोड रुपये राज्य के खजाने में (तब) शेष छोडे थे । प्रतापी छत्रसाल ने पौष शुक्ल तृतीया भृगुवार संवत् १७८८ (दिसंबर १७३१) को छतरपुर (नौ गांव) के निकट अपना शरीर त्यागा और भारतीय आकाश पर सदा-सदा के लिए जगमगाते सितारे बन गये।
कलाका सम्मान करनेवाले
           छत्रसाल की तलवार जितनी धारदार थी, कलम भी उतनी ही तीक्ष्ण थी । वे स्वयं कवि तो थे ही कवियों का श्रेष्ठतम सम्मान भी करते थे । अद्वितीय उदाहरण है कि कवि भूषणके बुंदेलखंडमें आने पर आगवानीमें जब छत्रसालने उनकी पालकीमें अपना कंधा लगाया था । बुंदेलखंड ही नही संपूर्ण भारत देष ऐसे महान व्यक्तित्व के प्रति कृतज्ञ रहेगा ।


गौ हत्या की आधुनिक मशीनें क्यों...?



गौ हत्या की आधुनिक मशीनें क्यों...?
भारत में गौ काटने के लिये ऐसे ही आधुनिक मशीनें लाई गई है जिसमें एक संकरी गली में गौ को बेजा जाता है जिसमें सामने शीशा लगा होता है और जब गाय अन्दर जाती है तो ये मशीन उसकी गर्दन जकड लेती है और एक सैकेण्ड में अलग कर देती है..........अगर ऐसा भारत में भी होने लगा तो हर रोज लाखों गायों को मारा जायेगा और एक दिन ये भारत से खत्म हो जायेगी और उसे मां कहने वाले लोग उसे क्या चुप चाप कटता देखना चाहेंगे........ ????????

जगनमोहन रेड्डी गिरफ्तार : सीबीआई दुरउपयोग


कांग्रेस सी बी आई की कार्यवाही के द्वारा राजनैतिक विरोधियों को किस तरह नीचा दिखाते हैं इसका उदाहरण जगन रेड्डी की आय से अधिक सम्पती के आधार पर गिरफतारी है। जबकि आय से अधिक सम्पती के मामले में मुलायम सिंह यादव, लालूप्रसाद यादव और मायावती सिरमौर हैं,इन्हे क्यों सीबीआई गिरफतार नहीं कर रही .......???? इन दलों से कांग्रेस ने अपना समर्थन हांसिल किया हुआ हे। आय से अधिक सम्पती के मामलों के कारण ही ये दल कांग्रेस की हां में हां मिलाते रहते हें। जगन ने येसा नहीं किया तो उसे गिरफतार कर लिया गया .......लगातार सीबीआई दुरउपयोग की यह ताजा मिसाल है.....सवाल यह नहीं कि जगन को क्यों गिरिफतार किया ? सवाल है जगन से बडे आय से अधिक सम्पती के मामलों में गिरफतारी क्यों नहीं......
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जगनमोहन रेड्डी को CBI ने किया गिरफ्तार

भाषा | हैदराबाद, 27 मई 2012कांग्रेस से विद्रोह कर राजनीति में तेजी से कदम बढ़ाने वाले कडप्पा के सांसद वाईएस जगनमोहन रेड्डी को आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक सम्पत्ति मामले में सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया.सीबीआई प्रवक्ता ने बताया, ‘जगनमोहन रेड्डी को शाम सवा सात बजे गिरफ्तार कर लिया गया.’ सीबीआई की ओर से तीन दिनों तक सघन पूछताछ के बाद 39 वर्षीय जगन को राज्य में विधानसभा की 18 सीटों और लोकसभा की एक सीट के लिए होने वाले उपचुनाव से पहले गिरफ्तार किया गया.
एजेंसी के अधिकारियों ने बताया कि जगन से तीन दिनों तक लगातार पूछताछ की गई और उनके स्वामित्व वाले साक्षी टेलीविजन एवं जागृति पब्लिकेशन को कुछ कंपनियों से निवेश के बारे में उनका जवाब संतोषजनक नहीं था.सीबीआई सूत्रों ने बताया कि जगन को कथित रूप से आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति जमा करने के मामले में गिरफ्तार किया गया है. उन्होंने कहा कि मॉरिशस जैसे कर चोरों के पनाहगार देशों के रास्ते धनराशि भेजे जाने का पता चला है जो इस बात का संकेत है कि आंध्र प्रदेश औद्योगिक विकास पार्क में निवेश करना चाह रही कंपनियों ने जमीन के बदले उनके टीवी चैनल और प्रकाशन कंपनी में निवेश किया.

गिरफ्तारी के बाद जगन ने पार्टी नेताओं से कहा कि उनके समर्थक शांति बनाये रखें और आगामी उप चुनाव को देखते हुए कोई हिंसा नहीं करें. उन्होंने कहा, ‘मैं अदालत में कानूनी लड़ाई लडूंगा और मुझे विश्वास है कि सकारात्मक परिणाम आयेगा.’हैदराबाद के पुलिस आयुक्त अनुराग शर्मा ने कहा कि जगन की गिरफ्तारी के कारण कानून एवं व्यवस्था के समक्ष समस्या आने की आशंका के बावजूद सुरक्षा स्थिति नियंत्रय में है. जगन के वित्तीय सलाहकार विजय साइ रेड्डी (मामले में एक अन्य आरोपी) उनके साथ दिलखुश गेस्ट हाउस में थे, जहां उनसे आज करीब नौ घंटे तक पूछताछ की गई.

कडप्पा के सांसद से सीबीआई 25 मई से ही वीएएनपीआईसी परियोजना और विभिन्न फर्मो से अपने कारोबार में कथित तौर पर करोड़ों रूपये का निवेश प्राप्त करने के बारे पूछताछ कर रही थी. यह मामला उस समय का है तब जगन के पिता वाई एस राजशेखर रेड्डी आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री थे.वाईएसआई कांग्रेस के प्रमुख के साथ पिछले दो दिनों में आठ और सात घंटे पूछताछ की गई थी. जगन की जमानत याचिका पर कल आगे सुनवाई होगी.बहरहाल, हैदराबाद पुलिस ने शहर में धारा 144 के तहत निषेधाज्ञा लगा दिया है. इसके अलावा आंध्र प्रदेश विशेष पुलिस और आरएएफ के जवानों को राजभवन रोड और दिलखुश गेस्ट हाउस के आसपास तैनात किया गया है.सीबीआई अब तक इस मामले में तीन आरोपपत्र दायर कर चुकी है. इसमें जगन और उनके पिता पर कुछ निवेशकों के पक्ष में साजिश रचने का आरोप लगाया है.


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कौन हैं जगनमोहन रेड्डी?

http://www.bbc.co.uk/hindi/india

उमर फ़ारूक़/ बीबीसी संवाददाता, हैदराबाद / शुक्रवार, 25 मई, 2012गत लगभग ढाई वर्ष से आंध्र प्रदेश की पूरी राजनीति केवल एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूम रही है और वो है वाईएस जगमोहन रेड्डी. जब से मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी का सितम्बर 2009 में एक हवाई दुर्घटना में निधन हुआ, जगन सबके ध्यान का केंद्र बने हुए हैं.पिता की जगह खुद मुख्यमंत्री बनने का दावा करने से लेकर अब तक जगमोहन रेड्डी ने काफी लंबा राजनीतिक सफर तय किया है जिसमें वो न केवल पूरी तरह से कांग्रेस के विरोधी बन गए हैं बल्कि उन्होंने खुद अपनी अलग पार्टी वाईएसआर कांग्रेस भी बना ली है.उसके टिकट पर वो खुद लोक सभा के लिए चुने गए और उन्होंने बहुत ही कम समय में वाईएसआर कांग्रेस को कांग्रेस की मुख्य विरोधी पार्टी बना दिया है.
दूसरी और उनकी बगावत ने कांग्रेस को आंध्र प्रदेश के सुरक्षित किले में काफी कमजोर कर दिया है और कांग्रेस लगातार राज्य पर अपनी पकड़ खोती जा रही है.कांग्रेस से दूरी के साथ साथ खुद जगनमोहन रेड्डी के लिए काफी कानूनी समस्याएँ भी खड़ी हो गई हैं और अब वो गिरफ्तारी का सामना कर रहे हैं.
संपत्ति में बढ़ोतरी
आंध्र प्रदेश उच्य न्यायालय के आदेश पर केन्द्रीय जांच ब्यूरो और एन्फोर्समेंट निदेशालय इस बात की छानबीन कर रहे हैं कि किस तरह जगनमोहन रेड्डी की संपत्ति पांच वर्ष से भी कम समय में 24 करोड़ रुपये से 470 करोड़ रूपए तक पहुंच गई और उनकी कई कंपनियों में पूँजी कहाँ से और कैसे आई.साथ ही यह सवाल भी सबके ध्यान का केंद्र है कि आखिर जगनमोहन रेड्डी और वाईएसआर परिवार कौन है और वो आंध्र प्रदेश की राजनीति में इतने महत्वपूर्ण क्यों बन गए हैं.जगन के व्यक्तित्व और उनके महत्व को समझने के लिए उनके पिता वाई एस राजशेखर रेड्डी को समझना बहुत ज़रूरी है.
साल 1970 के दश्क से लगातार कांग्रेस के साथ रहे वाईएसआर कई बार विधानसभा और लोक सभा के लिए चुने गए. कडप्पा जिले से संबंध रखने वाले वाईएसआर रायल सीमा क्षेत्र के शक्तिशाली गुटबाज नेता थे जिन से उन के सभी विरोधी डरते थे.
शक्तिशाली नेता
जब राज्य में कांग्रेस तेलुगु देसम से लगातार हार रही थी, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने वाईएसआर को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया. हालाँकि 1999 के विधान सभा चुनाव में वो कांग्रेस को जीत नहीं दिला सके लेकिन वो एक शक्तिशाली विपक्ष नेता साबित हुए.साल 2003 में वाईएसआर और कांग्रेस की किस्मत ने पलटी खाई जब उन्होंने किसानों के समर्थन में कड़ी गर्मी में पूरे राज्य में 1600 किलोमीटर तक पदयात्रा की और किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के लिए एक हीरो बन गए.साल 2004 के चुनाव में इस नारे के साथ उन्होंने राज्य में कांग्रेस को सत्ता में पहुंचाया कि उनकी सरकार किसानों को मुफ्त बिजली देगी और उनके ऋण माफ करेगी.

साथ ही वो राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस के लिए बहुत अहम नेता बन गए क्योंकि कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश से 27 लोक सभा सीटें जीतीं और कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनाने में एक अहम भूमिका निभाई.अगले पांच वर्षों तक बिना किसी चुनाव का सामना किए अपनी सरकार चलाने वाले वाईएसआर की शक्ति लगतार बढती गई.
भ्रष्टाचार के आरोप
हालाँकि विपक्षी दल उन पर बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे थे और कह रहे थे कि उनका परिवार भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरूपयोग द्वारा करोड़ों की संपत्ति लूट रहा था लेकिन कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व ने उनका समर्थन जारी रखा.विपक्ष और विशेषकर तेलगु देसम ने यहाँ तक कहना शुरू कर दिया की कांग्रेस आला कमान केवल इसलिए वाईएसआर का समर्थन कर रही है क्योंकि वो अपनी भ्रष्ट कमाई का एक हिस्सा केंद्र के नेताओं के साथ बाँट रहे हैं.विपक्ष का कहना था कि वाईएसआर परिवार और उनके दूसरे समर्थक सिंचाई परियोजनाओं के कार्यक्रम की आड़ में हजारो करोड़ रुपये कमा रहे हैं. इसी तरह औद्योगिक कंपनियों को भूमि आबंटन करने और खनन की अनुमति देने के मामले में भी वाईएसआर पर बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे.
इस बीच वाईएसआर ने अपने इकलौते पुत्र जगन को अपना राजनैतिक वारिस बनाने की तैयारियाँ शुरू कर दीं. अगले विधान सभा और लोक सभा चुनाव के आते आते वाईएस की स्थिति इतनी मज़बूत हो गई थी कि पार्टी के अधिकतर टिकट उन्हीं के समर्थकों को मिले.जगनमोहन रेड्डी को कांग्रेस ने कडप्पा लोक सभा सीट के लिए अपना उम्मीदवार बनाया. उस समय उन्होंने अपनी जो संपत्ति घोषित की वो 24 करोड़ थी. इस पर विपक्ष ने सवाल उठाया कि उन के पास इतना पैसा कहाँ से आया.वाईएसआर ने इस के जवाब में कहा कि उनके पुत्र उद्योगपति हैं और वो एक सीमेट और एक बिजली बनाने वाली कंपनी के मालिक हैं.

समाचार पत्र
साल 2008 में जगनमोहन रेड्डी के प्रभाव में और भी वृद्धि हुई जबकि उन्होंने एक बहुत बड़ा तेलुगु दैनिक समाचार पत्र साक्षी शुरू किया. तेइस एडिशन पर आधारित यह समाचार पत्र शुरू करने के लिए कई सौ करोड़ रुपये की पूँजी लगे गई.बाद में यह बात सामने आई कि आंध्र प्रदेश की कई ऐसी कंपनियों ने इसमें पैसा लगाया था जिन्हें वाईएसआर सरकार के कई फैसलों से लाभ मिला था.इसके अलावा वाईएसआर सरकार ने इस अखबार को दिल खोल कर सरकारी विज्ञापन देने शुरू किये और पहले एक वर्ष में ही उसे 80 करोड़ रुपये के विज्ञापन मिले.साल 2009 में मीडिया में जगन की ताकत और भी बढ़ी जब उन्होंने 'साक्षी' के नाम से एक टीवी चैनल शुरू किया और एक बार फिर विपक्ष ने आरोप लगाया की यह चैनल भ्रष्ट पैसे से शुरू किया गया है.साथ ही जगन की कंपनियों की संख्या और उनमें पूँजी निवेश भी बढ़ता चला गया.

साल 2009 के चुनाव हैरान करने वाले रहे. जहाँ कांग्रेस को सबसे ज्यादा यानी 33 लोक सभा सीटें आंध्र प्रदेश में मिलीं वहीं विधान सभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन बहुत खराब रहा. उसे मुश्किल से एक साधारण बहुमत मिल सका.अभी दूसरे कार्यकाल के लिए वाईएसआर अपनी स्थिति बेहतर बनाने की कोशिश कर ही रहे थे कि एक हेलीकाप्टर दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई.जानकारों का कहना है की वाईएसआर के समर्थकों और कई कम्पनियों के मालिकों ने इसलिए जगनमोहन रेड्डी को पिता की जगह मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश की थी कि वाईएसआर सरकार की अनियमताएं सामने न आ सकें और उन के समर्थकों को फायदा मिलता रहे.

बगावत की स्थिति
उस समय तक आंध्र प्रदेश में कांग्रेस सरकार पर वाईएसआर परिवार की पकड़ इतनी मज़बूत हो गई थी की 177 में से 170 विधायकों ने जगन के समर्थन की घोषणा कर दी और पार्टी में बगावत की स्थिति पैदा हो गई.लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने वाईएसआर परिवार की इस शक्ति से परेशान हो कर जगन की बात मानने से इंकार कर दिया और उन की जगह एक वरिष्ठ नेता के रोसैय्या को मुख्यमंत्री बनाया.इस बीच जगन और उनके समर्थकों की गतिविधियां बढती गईं और यह स्पष्ट हो गया कि रोसैय्या कांग्रेस को संभाल नहीं सकेंगे. साल 2010 के अंत में कांग्रेस ने एक युवा रेड्डी नेता - एन किरण कुमार रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाया.इसके साथ ही जगन और उनकी माँ ने कांग्रेस से त्याग पत्र दे दिया और वो स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में कडप्पा लोक सभा और पुलिवेंदुला विधान सभा सीट से चुने गए.

कानूनी मुश्किलें
जैसे जैसे जगन की राजनैतिक शक्ति बढ़ रही थी वैसे वैसे उनके लिए कानूनी मुश्किलें बढ़ने लगीं. लेकिन इसमें सरकार या कांग्रेस के नेतृ्त्व से ज्यादा न्यायपालिका का दखल था.कांग्रेस के ही एक मंत्री शंकर राव और तेलुगु देसम के दो नेताओं की एक याचिका पर आंध्र प्रदेश उच्य न्यालय ने सीबीआई को जगनमोहन रेड्डी की संपत्ति की छानबीन का आदेश दिया और उसी के परिणाम स्वरुप इस समय जगनमोहन रेड्डी की गिरफ्तारी का सामना है.लेकिन इससे जितना नुक्सान जगन को हो सकता है उतना ही नुकसान कांग्रेस को भी हुआ है क्योंकि अब वाईएसआर की छवि "गरीबों के मसीहा" से ज्यादा एक भ्रष्ट नेता की है जिसने अपने परिवार के फायदे के लिए राज्य के साधनों का दुरुपयोग किया.

साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि जब वाईएसआर यह सब कुछ कर रहे थे तो कांग्रेस की आलाकमान क्या कर रही थी.जगन के साथ साथ कांग्रेस सरकार के कई मंत्रियों को भी कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड रहा है. इन में से एम वेंकट रमन्ना को गिरफ्तार कर लिया गया है.