शनिवार, 16 जून 2012

महान वीरांगनाः रानी लक्ष्मीबाई


1857 की क्रांति की महानायिका महारानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस 18 जून के अवसर पर
जनक्रांति 1857 की महान वीरांगनाः रानी लक्ष्मीबाई
अरविन्द सीसौदिया



शक्ति की अवतारी वीरांगना लक्ष्मी बाई
मूलतःमहाराष्ट,सतारा जिले के ‘बाई’गांव के निवासी
पिता -मोरोपंत तांबे, माता -भागीरथी देवी, स्थान-काशी ;गंगा तट
जन्मतिथि - ज्यादातर जगह 19 नवम्बर और कुछ जगह 13 नवम्बर 1835,जाति - मराठा ब्राह्मण,बलिदान -18 जून 1858; कुछ पुस्तकों में 17 जून भी लिखा है।  अंतिम संस्कारकर्ता -रघुनाथ सिंह, पठान गुल मोहम्मद और रामचन्द्रजी,बलिदान स्थल - स्वर्णनाला,ग्वालियर,अंतिम शब्द - ‘हर-हर महादेव’ ‘ऊं वासुदेवाय नमः’,गद्दार - झांसी का  दीवान दुल्हाजु, ग्वा,अंतिम साथी - जूही, मुंदर, रघुनाथ सिंह
पुत्र - दामोदर राव दत्तकपुत्र
हिन्दू वीरांगनाओं की परम्परा
भारतीय नारी की गौरव गाथा महामाया भगवती की अनन्य वीरता से प्रारम्भ होती है। बुद्धि के क्षैत्र में सरस्वती, अर्थ क्षैत्र में लक्ष्मी जी और शक्ति क्षैत्र में दुर्गा का सहज स्मरण हर हिन्दू को है। इसी वीरता, त्याग और बलिदान की परम्परा इस समाज में निरंतर बनी रही है। चाहे चित्तौड़ की महारानी पद्यमनी का जौहर हो, चाहे शिवाजी की मां जीजाबाई द्वारा दी गई स्वराज्य की प्रेरणा हो, चाहे महाराणा उदयसिंह की जीवन रक्षा के लिए अपने पुत्र का बलिदान करने वाली पन्ना धाय हो, चाहे मुगलों से लोहा लेने वाली रानी दुर्गावती हो, चाहे अंग्रेज सल्तनत को दिन में तारे दिखा देने वाली रानी लक्ष्मीबाई हो या पाकिस्तान के दो टुकडे कर देने वाली प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी हो, यह अजर-अटल परम्परा हिन्दुत्व की शौर्य सिद्धी का परियच और परिणाम है।
अंग्रेजों की विश्वव्यापी सल्तनत के विरूद्ध हुए 1857 के महानतम स्वतंत्रता आन्दोलन में नायकत्व तो कई वीरों को हासिल है, मगर जिस एक चरित्र ने महानायकत्व का शौर्य प्रदर्शन करते हुए, राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिए जीवन उत्सर्ग कर दिया उसका नाम झांसी की रानी लक्ष्मीबाई है....!
नेहरू ने मानी 1857 की महता
सामान्य तौर पर राष्ट्रवाद को सामान्य अंक भी नहीं देने वाले पं.जवाहरलाल नेहरू ने भी यह स्वीकार किया था कि 1857 के समर ने ही अंग्रेजों की जड़ें उखाड़ने का पहला साहस किया जो सम्पूर्ण विश्व में फैल कर विश्व मुक्ति का मार्ग बन गया।
अंग्रेजों के छल कपट पाखण्ड
ईस्ट इण्डिया कम्पनी, भारत में व्यापार करने आई थी। उसने हमारी आपसी फूट और मानवतावादी सोच का फायदा उठाकर, छल, कपट और पाखण्ड की तमाम अमानवीय, घृणित और अक्षम्य कृत्यों से अपनी सत्ता स्थापित कर ली थी। उसने अगले कदम के रूप में रजवाड़ों के राज्य क्षैत्र हड़पने के षडयंत्र के तहत ही एक मनमाना फरमान जारी किया कि ‘‘दत्तक ;गोद लियाद्ध पुत्र राज्य का उत्तराधिकारी नहीं बन सकता।’’ इसी के चलते, झांसी को हड़पने की साजिश प्रारम्भ हुई। झांसी के राजा गंगाधर राव और रानी लक्ष्मी बाई की संतान तो उत्पन्न हुई मगर कुछ समय पश्चात ही उसका निधन हो गया, इस कारण दामोदरराव को गोद लिया गया।
पूर्वज का शौर्य बना प्रेरणा...
महाराष्ट्र के सतारा जिले के ‘बाई’ गांव के रहने वाले बलवंतराव (ब्राह्मण) के दोनों पुत्र मोरोपंत और सदाशिव, विवता के कारण पूना में पेशवा के दरबार में कार्यरत थे। अंग्रेजों ने पूना को अपने अधिकार में लेकरे पेशवा बाजीराव को मोटी पेंशन सहित बिठुर उŸारप्रदेश  की जागीर दे दी। पेशवा पूना छोड़कर बिठुर चले गये, मगर पेशवा के छोटे भाई चिमण जी बिठुर न जाकर काशी आ गए। उनका विशेष स्नेह मोरोपंत से था, सो वे उन्हें भी अपने साथ ले आये। लक्ष्मीबाई बचपन का नाम मनु, इन्हीं मोरोपंत की इकलौती पुत्री थीं। जब लक्ष्मी बाई 4 महीने की थी, तब उनकी माता जी भागीरथी देवी का स्वर्गवास हो गया। उधर पेशवा बाजीराव ने मोरोपंत को बिठुर बुला लिया सो बालिका लक्ष्मी भी बिठुर (उतरप्रदेश) पहुंच गई। बिठुर में लक्ष्मी बाई का पालन पोषण पेशवा परिवार के नाना साहब (पेशवा बाजीराव के दत्तक पुत्र) तथाराव सहाब और  तांत्या टोपे (नाना सहाब के अंतरंग मित्र) के साथ ही हुआ।
शास्त्र और शस्त्र शिक्षा राजमहल में राजकुमारों जैसी ही हुई। यूं तो सम्पूर्ण महाराष्ट्र में, मराठाओं, छत्रपति शिवाजी की यश गाथाओं का गहरा असर था। मराठा पेशवाओं की यशोगाथाऐं भी कम नहीं था, इसी कारण अक्सर लक्ष्मी बाई कहा करती थीं, ‘‘हम वीरों की कथायें पढ़ने या सुनने के लिए नहीं है, बल्कि हमें भी विजेता बनने के लिए है।’’
महारानी लक्ष्मीबाई का विवाह 1842 में झांसी के विदुर एवं निःसन्तान राजा गंगाधर राव से हुआ। आयु का भी काफी अंतर था। मगर एक सामान्य दरबारी की बेटी रानी बने, ऐसा बहुत कम होता है। रानी बनते ही उसे पांच दासियां मिली, सुन्दर, मुन्दर,झलकारी ,जूही और काशी। रानी ने उन्हें अपनी दासी न मानते हुए सखी की तरह रखा और उन्हें भी घुड़सवारी, तलवारबाजी और शस्त्र विद्या में निपुण किया। रानी का मन इस आशंका से हमेशा ग्रस्त रहा कि उसे मैदाने जंग में उतरना ही पडेगा और उसकी हमेशा यह तैयारी भी रही कि चुनौती को आते ही निबटा जाये।
रानी को एक पुत्र रत्न प्राप्त हुआ, मगर तीन माह की अवस्था में चल बसा। गंगाधर राव का स्वास्थ्य खराब रहने लगा, राजा का अंतिम समय निकट जानकर एक स्वजातीय बालक ‘आनन्द राव’ को गोद लिया गया, उसका नया नाम ‘दामोदर राव’ रख दिया गया।
राजा जानते थे कि उनके दत्तक पुत्र को ईस्ट इण्डिया कम्पनी की अधिकारिक मान्यता दिलवाना आवश्यक है अन्यथा वे उसे झांसी राज्य का उत्तराधिकारी स्वीकार नहीं करेंगे। सो उन्होंने स्वयं कम्पनी के उच्च अधिकारी मेजर एलिस को बुलवाया, एक खरीता गोद की स्वीकृति के लिए राज्य के प्रधानमंत्री से लिखवाया और अपने हाथ से अंग्रेज अफसरों को दे दिया। कम्पनी राज ने स्वीकृति का जवाबी उत्तर कभी नहीं दिया और 21 नवम्बर 1853 को अन्ततः गंगाधर राव का निधन हो गया। रानी विधवा हो गई। लगभग 18-19 वर्ष की आयु में ही विधवा होने का दुःख और दत्तक पुत्र दामोदर राव का भार.....!
बुझा दीप झांसी का, तब डलहौजी मन में हर्षाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फौरन फौज भेज दुर्ग पर अपना झण्डा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झांसी आया
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झांसी हुई विरानी थी।
      - सुभ्रदाकुमारी चौहान
हालांकि रानी ने बड़े जीवट से झांसी का राज्य संचालन अपने हाथ में ले लिया था और वह कुशलता से चल भी रहा था। मगर झांसी स्थित अंग्रेजों की सैनिक छावनी में गतिविधियां बढ़ रही थीं, तैयारियों को नये सिरे से परखा जाने लगा था, जो भविष्य का संकेत था।
लॉर्ड डलहौजी का फरमान
27 फरवरी 1854 को लॉर्ड डलहौजी ने झांसी को अंग्रेज राज में मिलाने की घोषणा कर दी।
‘‘झांसी राज्य पेशवा का अखिल राज्य था। 1804 की संधि में शिवराव भाऊ ने इस बात को कबूल किया था। हमको ऐसे आश्रित राज्यों में गोद मानने, न मानने का अधिकार है। रामचन्द्र राव ने 1835 में, जिसको हमने सन् 1832 में राजा की उपाधि दी थी, मरने से एक दिन पहले किसी को गोद लिया था। वह गोद ब्रिटिश सरकार ने नहीं मानी थी। हम दामोदर राव की गोद को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। इसलिए झांसी राज्य खालसा किया जाता है और अंग्रेजी राज्य में मिलाया जाता है। पोलिटिकल एजेण्ट की सिफारिश के अनुसार रानी को मासिक वृत्ति दी जायेगी।’’
7 मार्च 1854 में लॉर्ड डलहौजी के निर्णय के क्रम में मेजर एलिस को कम्पनी सरकार की घोषणा भेज दी गई, जिसे मेजर ने रानी लक्ष्मीबाई को पढ़कर सुनाया ‘‘दत्तक को गवर्नर जनरल ने नामंजूर किया है। इसलिए भारत सरकार 7 मार्च 1854 की आज्ञा के अनुसार झांसी का राज्य ब्रिटिश इलाके में मिलाया जाता है। इश्तिहार के जरिए सब लोगों को सूचना दी जाती है कि सम्पत्ति झांसी प्रदेश का शासन मेजर एलिस के अधीन समझे और मेजर एलिस को कर दिया करें और सुख तथा संतोष के साथ जीवन निर्वाह करें।’’
रानी के लिए 5 हजार रूपया मासिक की वृत्ति की भी व्यवस्था कम्पनी सरकार ने की थी। रानी ने प्रथम तो इसे स्वीकार नहीं किया और झांसी राज्य देने से भी इनकार कर दिया। मगर बाद में उन्होंने चाणक्य नीति से काम लेते हुए सीधी लड़ाई टालने और आवश्यक तैयारी के लिए समय हासिल करने की ठानी और कम्पनी द्वारा तय की पेंशन लेने की स्वीकृति दे दी। जिससे मेजर एलिस ने मालकम के माध्यम से गवर्नर जनरल डलहौजी को एक सिफारिश भेजी -
‘‘रानी लक्ष्मीबाई को आजीवन पांच हजार रूपये मासिक दिये जायें और नगरवाला राजमहल उनकी सम्पत्ति समझी जाकर उन्हीं को दे दिया जाए। रानी या उनके नौकरों पर ब्रिटिश अदालतों की सत्ता न रहे। अपने नौकरों के अपराधों का वे स्वयं न्याय करें। राजा का निज का धन, रियासत के लेन-देन का हिसाब करके जो बाकी बचे वह और राज्य के सब जवाहरात रानी को दे दिए जाएं। राजा और रानी के रिश्तेदारों, नातेदारों की सूची बनाई जाये और उन लोगों के निर्वाह की व्यवस्था कर दी जाए।’’
लॉर्ड डलहौजी बहुत चतुर था, उसने सारी सिफारिशें स्वीकारते हुए भी एक सिफारिश बदल दी कि ‘‘राजा की निज सम्पत्ति और रियासत, जवाहरात रानी के हों, उन्होंने निर्णय किया कि यद्यपि दामोदर राव को कम्पनी ने आधिकारिक मान्यता नहीं दी है मगर हिन्दू शास्त्र के अनुसार गंगाधर राव की सभी निजी सम्पत्ति का अधिकार उसे है।’’
25 मार्च 1854 को डलहौजी की यह आज्ञा जारी हुई - पॉलिटिकल एजेण्ट ने झांसी के खजाने से 6 लाख रूपये निकालकर दामोदर राव के नाम से अंग्रेज खजाने में जमा करवा दिये जो दामोदर राव के बालिग होने पर लौटाने की बात कही गई। अंग्रेज सरकार ने झांसी का किला खाली करवाकर शहर का महल रानी को रहने के लिए दे दिया।
झांसी पर अंग्रेज अत्याचार
अंग्रेजों ने झांसी पर अधिकार करते ही तोपखाना नष्ट कर दिया,हथियार हडप लिए, रानी की फौज को कलमबंद बर्खास्त कर दिया, दीवानी, जागीरदारी, जमींदारी हड़प ली। उन्हें मामूली और अपमानजनक नौकरियां दी गई। रानी की फौज जो कलमबंद बर्खास्त की थी, उसमें से ज्यादातर को छः-छः महीने की तनख्वाह देकर छुट्टी कर दी। कर्मचारियों को पटवारीगिरी और कानूनगो बनाया, बहुत सारे छोटे जागीरदारों को भी पटवारी जैसे छोटे मोटे काम पर लगाया, एक जागीरदार आनन्द राव ने पटवारी बनने से इनकार कर दिया तो उसे नायब थानेदार बनाया। रोजी रोटी और बच्चों के कारण इस अपमानजनक व्यवहार को स्वीकार करना पड़ा। छोटे-मोटे पदों पर नौकरों की तरह काम करते हुए जमींदार वर्ग दुखी था।
रानी ने दामोदर राव को झांसी का उत्तराधिकारी स्वीकार किये जाने की अपील ब्रिटेन भेज रखी थी, वे इसका ही इंतजार कर रही थी, मगर 2 अगस्त 1854 को यह अपील भी खारिज हो गई। झांसी में कमिश्नरी शासन घोषित कर दिया गया। कई जिले बनाये गये और झांसी जिले का डिप्टी कमिश्नर गार्डन को नियुक्त किया गया।
गरीब जनता बेबस थी, किसानों पर अत्याचार बढ़ गये थे, खेतों में अनाज हो न हो, उगाही जबरिया होती थी। किसानों से बड़ी बेरहमी की जाती थी, पशु धन जब्त हो जाता था, जमीदारों को विशेष वेषभूषा या रहन सहन पर अपमानित किया जाता था।
काशी यात्रा की अर्जी रद्द
रानी को लोहे का टोप पहनने और उस पर साफा बांधने में बालों के कारण दिक्कत आती थी। उन्होंने सोचा, काशी जाकर बाल मुंडवा लिये जायें। जन्मभूमि के दर्शन और गंगा स्नान भी हो जायेगा। इस हेतु तब डिप्टी कमिश्नर गार्डन को काशी यात्रा की इजाजत  हेतु अर्जी दी गई, तो उसने उसे रद्द करते हुए इजाजत नहीं दी। इसी से अंदाज लगाया जा सकता है कि अंग्रेज कितने निरंकुश और अमानवीय थे।
रोटी और कमल क्रांतिदूत
सम्पूर्ण भारत में एक साथ क्रांति हेतु 31 मई 1857 को 11 बजे से तय की गई थी। पूरे देश में संदेशे भेजे जा रहे थे। गुप्त चिट्ठियां सैनिक छावनियों में पहुंच रही थीं। आमजन भी इस विद्रोह के लिए तैयार थे, एक गांव से दूसरे गांव कमल का फूल या रोटी भेजी जाती थी, जो इस बात की प्रतीक थी कि हम तैयार हैं, हमारा समर्थन है, हम पूरी ताकत से भाग लेंगे।
21 दिन पहले ही धधक उठी क्रांति की आग
मेरठ छावनी में जिन सैनिकों को व्रिदोह की जिम्मेवारी दी गई थी, वे सब्र नहीं कर सके। समय से पहले 10 मई 1857 को मंगल पाण्डे ने विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। मेरठ और दिल्ली के सैनिकों की क्रांति का फल यह रहा कि दिल्ली के लाल किले पर सैनिकों का अधिकार हो गया, बहादुर शाह जफर को भारत का सम्राट घोषित किया गया। बहादुर शाह जफर  ने ‘गौवध बंद’ करने की आज्ञा जारी कर दी।
अंगेजों ने बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर रंगून (़ बर्मा ) भेज दिया गया, मंगल पाण्डे को फांसी दे दी गई। मगर क्रांति की आग फैलती ही जा रही थी, काबू में नहीं आ रही थी। सारा उत्तर भारत क्रांति की आग से धधक उठा।
चतुर लक्ष्मी बाई
झांसी में कम्पनी सरकार के पास पर्याप्त फौज नहीं थी। उसने रानी लक्ष्मी बाई से मदद मांगी, रानी ने चतुराई से कहा हमारे पास फौज तो नहीं है यदि आप अनुमति दें तो नई फौज भर्ती कर लूं। जनता की रक्षा के लिए एक अच्छी फौज जरूरी है। उन्हें स्वीकृति मिल गई।
झांसी में विद्रोह
‘‘जून को झांसी में भी एक हवलदार गुरूबख्श सिंह ने कुछ सैनिकों के साथ विद्रोह कर कम्पनी सरकार के एक पुराने किले पर कब्जा कर लिया।
अंग्रेज अफसरों को लगा कि यह कुछ सिपाहियों का मामूली विद्रोह है, सामान्य तौर पर हिन्दुस्तानी सैनिक उनके साथ हैं। इसी चक्कर में ‘डनलप’ झांसी फौज के निरीक्षण को जा पहुंचा, ज्यों ही उसने रौब से आदेश दिया, त्यों ही एक नायक ने डनलप को गोली से उड़ा दिया। अंग्रेजों में भगदड़ मच गईं।
भड़के सैनिक बेकाबू
रानी अंग्रेजों से रणनैतिक यु( लड़ना चाहती थी, मगर झांसी में तैनात अंग्रेज पलटन के विद्रोही सैनिकों ने एक न मानी और अंग्रेज अधिकारियों के किले को घेर लिया। डिप्टी कमिश्नर गार्डन को एक तीर से भारतीय सैनिक ने मार डाला, स्कीन को भी मार डाला गया। इन विद्रोही सैनिकों ने अंग्रेजों का कत्ले आम शुरू कर दिया। समय से पहले, अनियंत्रित जंग ने झांसी को अब मुकाबले के लिए मैदान में ला खड़ा किया।
फिर झांसी की रानी
झांसी में अंग्रेजों का सर्वनाश कर ये विद्रोही सैनिक रानी लक्ष्मीबाई के महल पहुंचे, उन्हें अभिवादन की गद्दी सम्भालने का आग्रह किया और ज्यादातर सिपाही दिल्ली की ओर कूच कर गये। रानी जानती थी कि झांसी की गद्दी मिल तो गई, मगर इसकी रक्षा आसान नहीं है। मगर उन्होंने सबके सामने प्रण किया कि हमारी मातृभूमि है, इसके लिए बलिदान की आवश्यकता है तो हम बलिदान देंगे।
झांसी में भी जयचन्द
झांसी के राजा गंगाधर राव का निकटतम रिश्तेदार सदाशिव राव था, जो झांसी का वारिस बनने के लिए अनेक प्रयत्न कर चुका था। उसने मौके का फायदा उठाकर झांसी राज्य क्षैत्र के करेरा किले पर कब्जा कर लिया। जबाबी हमले में रानी की सखी सेना ने उसे पराजित कर करेरा किला खाली करवा लिया। वह भाग कर ग्वालियर के सिंधिया महाराजा की शरण में जा पहुंचा। सिंधिया ने उसे सेना उपलब्ध करवाई मगर रानी की सेना ने उसे ‘ नरवर ’ से पकड़ कर झांसी के बंदीगृह में डाल दिया।
वीरता बेमिसाल
अंग्रेजों की कैद से फरार डाकू कुंवर सागर सिंह एक राष्ट्रवादी परिवार की सन्तान था, अंग्रेज राज्य में जमकर डकैती करता था, उसका भयानक आतंक था। जब रानी पर झांसी का भार आया तो ,उसने इस डाकू को स्वंय जाकर पकड लिया। उसे माफ करते हुये फौज में भर्ती कर लिया। जो अंग्रेजों से रानी की ओर से लडते हुये  बलिदान हुआ।
झांसी के गद्दार
झांसी भी जयचन्द और मीर जाफरों से बची नहीं रही। वहां भी गद्दारों का घरौंदा था, जो झांसी की सत्ता लेना चाहते थे। इनमें प्रमुख थे नवाब अली बहादुर और उनका सेवादार पीर अली तथा दीवान दल्हाजू।
प्रथम तो टीकमगढ़ (ओरछा) के दीवान नत्थे खां से नवाब ने झांसी पर आक्रमण करवाया, रानी ने कुशल रणनीति और तेज आक्रामकता के आगे उसे पराजय मिली और भागना पड़ा। उसी के साथ नवाब अली बहादुर भी झांसी छोड़ गया। पीर अली झांसी में ही बना रहा और रानी से वफादारी की चालाकी पर चालाकी खेलता रहा।
पराजित नत्थे खां के आग्रह पर ही कम्पनी सरकार के जनरल ह्यूरोज ने ही झांसी पर आक्रमण किया। पीर खां ने झांसी के दीवान दुल्हाजू को अंग्रेजों के लिए खरीद लिया और उनसे मिलवाकर झांसी को पराजित करवाया दिया।
झांसी हारी ,रानी जीती
झलकारी बाई ने रानी का छद्म रूप धरकर अंग्रेजों को चक्कर में डाल दिया और रानी को किले से निकल दिया, झलकारी बाई और उसके पति पूरन सिंह ने अंग्रेजों से लड़ते हुए वीरगति पाई। रानी बच कर निकल गई और कालपी जा पहुंची। दुर्भाग्यवश उनके पिता मोरोपंत तांबे अंग्रेज फौज द्वारा पकड़े गये और उन्हें झांसी में ही फांसी दे दी गई।
अंग्रेजों ने झांसी पर कब्जा कर, विशालकाय पुस्तकालय जला दिया, असंख्य मकान जला दिये, बालक, युवा, वृद्धों को गोलियों से उड़ा दिया, वध कर दिया। पहले दिन अंग्रेज सिपाहियांे ने नगर की लूटपाट की दूसरे दिन मद्रासी दस्ते को लूटपाट का अवसर दिया गया। तीसरे दिन निजाम हैदराबाद की पलटन ने लूटा। मानवता का कहीं कोई नामोनिशान नहीं था, दुर्भाग्य यह था कि हिन्दुस्तान को गुलाम बने हिन्दुस्तानी रौंद रहे थे।
कालपी जा पहुंची रानी
रानी पुत्र दामोदर राव सहित कालपी जा पहुंची। वहां उसे राव साहब, तांत्या टोपे सभी मिल गये, उन्होंने रानी का स्वागत किया।जनरल ह्यूरोज ने कौंच का विद्रोह कुचल कर कालपी पर विजय प्राप्त करने के लिए सेना को कूच कर दिया।
1818 में पेशवा बाजीराव द्वितीय को कानपुर के निकट बिठुर भेज दिया गया था तथा उन्हें 8 लाख रूपये वार्षिक पेंशन देना तय किया गया। उनके कोई पुत्र नहीं था, सो उन्होंने नाना धुन्धपंत (नाना साहब) को गोद ले लिया था। पेशवा के निधन के साथ ही अंग्रेजों ने पेंशन देना बंद कर दिया, जिससे नाना साहब अंग्रेजों के कट्टर शत्रु बन गये थे।
‘ग्वालियर’ जीता
कालपी की हार  के बाद तांत्या टोपे, रानी लक्ष्मी बाई और राव साहब के संयुक्त नेतृत्व में ग्वालियर पर कब्जा कर लिया, उनका स्वागत जनता और सैनिकों ने किया। अंग्रेजों के मित्र महाराज जिवाजी राव सिंधिया को ‘ग्वालियर’ छोड़कर ‘आगरा’ भागना पड़ा। राव सहाब को ‘ग्वालियर’ का महाराजा बना दिया गया।
यमुना तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार,
अंग्रेजों के मित्र सिन्धिया ने छोड़ी राजधानी थी।
- सुभद्रा कुमारी चौहान
अंग्रेज सेनापति स्मिथ ने ग्वालियर किले पर आक्रमण किया, रानी ने उसे पीछे धकेल दिया। दूसरे दिन ह्यूरोज भी अपनी सेना लेकर ग्वालियर आ गया। भयंकर युद्ध हुआ और यह दिन भी रानी की जीत का रहा। 18 जून को निर्णायक युद्ध हुआ, रानी के साथ मुन्दर, जूही, रघुनाथ सिंह, रामचन्द्र देशमुख तथा गुल मौहम्मद ने शानदार युद्ध कौशल दिखाया। अंग्रेजों की सेना को चीरते हुए यह दल स्वर्ण रेखा नाले पर पहुंच गया।
तो भी रानी मारकाट चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, यह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार,
घायल होकर गिरी सिंहनी, उसे वीरगति पानी थी।
- सुभद्रा कुमारी चौहान
संध्या का समय था, रानी के घोड़े के सामने जो स्वर्ण नाला आया, तो उसे घोड़ा कूद नहीं सका। दोनों पैरों पर खडा हो गया,पीछे लगे अंग्रेज सैनिकों ने रानी के मस्तक पर पीछे से वार किया। रानी के मस्तक का दायां हिस्सा कट गया। वह गंभीर रूप से घायल हो गई। इस बीच पठान गुल मोहम्मद और रघुनाथ सिंह ने उन अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया। रानी को सहारा देकर बाबा गंगादास की कुटिया तक ले जाया गया ,
रानी गंगाजल लाने को कहा,गंगाा जल का पान कर हरहर महादेव बोलते हुये,रानी ने प्राण त्याग दिये। उनकी सहेली मुंदर के भी प्राण पखेरू उड़ चुके थे। उसी कुटिया की लकड़ियों से चिता सजी और अंतिम संस्कार कर दिया गया। अग्नि सी तेजस्विता अग्नि में विलीन हो गई।
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई, बन स्वतंत्रता नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई पथ,हमको जो सीख सिखानी थी।
रानी गई स्वर्ग सिधार,चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी
- सुभद्रा कुमारी चौहान
पुरूखों की वीरता ने तेजस्वी बनाया
बिठुर के राजमहल में जिन तीन बाल सखाओं ने रणकौशल साथ-साथ सीखा था, वे थे नाना साहब, लक्ष्मी बाई और तांत्या टोपे...! काश इन तीनों की ही तरह वीरता का वरण पूरे हिन्दुस्तान ने किया होता तो स्वतंत्रता 1857-58 में ही मिल गई होती और वह खण्डित न होकर अखण्ड होती।
राधाकृष्ण मंदिर रोड,
डडवाडा,कोटा, राजस्थान।
09414180151

कृष्ण भजन : हम प्रेम दीवानी हैं, वो प्रेम दीवाना।



विनोद अग्रवाल
कृष्ण भजन
हम प्रेम दीवानी हैं, वो प्रेम दीवाना।
ऐ उधो हमे ज्ञान की पोथी ना सुनाना॥

तन मन जीवन श्याम का, श्याम हम्मर काम।
रोम रोम में राम रहा, वो मतवाला श्याम।
इस तन में अब योग नहीं कोई ठिकाना॥

उधो इन असुवन को हरी सनमुख ले जाओ।
पूछे हरी कुशल तो चरणों में दीओ चढाओ ।
कहिओ जी इस प्रेम का यह तुच्छ नजराना॥

प्रेम डोर से बंध रहा जीवन का संयोग।
सुमिरन में डूबी रहें, यही हमारा योग।
कानो में रहे गूंजता वंशी का तराना॥

इक दिन नयन के निकट रहते थे आठों याम।
अब बैठे हमे विसार के, वो निर्मोही श्याम।
दीपक वो ज़माना था, और यह भी यमाना॥

सब तंत्र और मन्त्र क्रिया विधि से, मुरली ध्वनी प्रयोग बड़ा हैं
हरी कृष्ण सभी सत वयंजन में, अधरामृत मोहन भोग बड़ा है
जग में वही औषधि है ही नहीं, सब रोगों में प्रेम का रोग बड़ा है
जिसे योगी पतंजलि ने भी रचा, उस योग से कृष्ण वियोग बड़ा है

प्रेम प्रति मापे ज्ञान साधन और योग, रंग जोनसो चदेगो सोई फीको पड़ी जावेगो
धीरता अधीता को धारण करेगी रूप, त्याग अनुरागी के अंग भरी जावेगो
ध्यान धारणा की खबर पड़ेगी कब, नयन के कौरन बिंदु झारी जावेगो
एकहू वियोग की अगन चिंगारी पर, याद राखो उधो सारो योग जरी जावोगो

मेरे और मोहन की बातें, या मैं जानू या वो जाने
दिल की दुःख दर्द भरी खाते, या मैं जानू या वो जाने
जब दिल में उनकी याद हुई, एक शकल नयी इजाद हुई
पल पल यह मस्त मुलाकातें, या मैं जानू या वो जाने

नहीं हस्ते हैं, नहीं रोते हैं, नहीं जागते हैं, नहीं सोते हैं
यह दर्दे जुदाई की रातें, या मैं जानू या वो जाने
गम की घनघोर घटा गरजी, कामिनी वेदना की लरजी
द्रिग्बिंदु भरी यह बरसातें, या मैं जानू या वो जाने

शबनम गिरे चाहे पत्ती पर, वो पत्ती नम नहीं होती।
लाख जुदाई हो साजन से, मोहोबत कम नहीं होती॥

ऐ रे कारे भवर, कारे कपटी मधुकर, चल आगे ते दूर
योग सिखावन को हमे आयो, बड़ो निपट तू कर्रूर
जा घट रहत श्याम घन सुन्दर, सदा निरंतर पूज
ताहि छाड़ क्यूँ शुन्य अराधें, खोएं आपनो मूल
ब्रिज में सब गोपाल उपासी, यहान को ना लगावे धुल
अपनों नेम सदा जो निभावें, सो ही कहावे सूर

ऐ रे उधो, धन्य तुमरो वव्हार, धन्य वो ठाकुर,
धन्य वो सेवक, धन्य तुम बर्तन्हार
आम को काटि बबूल लगावत, चन्दन को कुर्वा
सूर श्याम कैसे निभेगी, अन्धं अंध सरकार

खारो से पूछिए ना किसी गुल से पूछिए
सदमा चमन की लुटने का बुलबुल से पूछिए

जा जा वे उधो तुरेआ जा, दुखिया नु सता के की लेना
जेहड़े जखम श्याम ने लाये ने, असीं जखम दिखा के की लेना
सानु घेहरे गमा विच रोड गया, सदी लगिया प्रीता तोड़ गया
ओ जींदा रहे, ओ वसदा रहे, ओहनू तडपा के की लैना

सब रिश्ते नाते चढ़ दित्ते, असी भेद भाव सब कढ दित्ते
हुन प्रेम डा भाम्बड मचेआ ए, तू पानी पा के की लेना
सपने विच आंदा रहंदा ए, सानु गल नाल लांदा रहंदा ए
हर दम वो साथ ही रहंदा ए, असी मथुरा जा के की लेना

साढ़े ते सर दा ताज है ओ, ब्रिज राज है ओ, महाराज है ओ
साढा जीवन प्राण आधार है ओ, असी होर किसे कोलो की लेना

प्रीती धन रावरे को ऋण अति भडयो सर,
जान नहीं पाऊं कर कैसे यह चुकिजिये
बार बार काहे को लजाओं हों गरीब मैं,
भावे राज त्रिबुवन तो गिरवी रख लीजिये
मूल धन देने को कदापि ना समर्थ जान,
मोको रख सूद में उरिन लिख जान लीजिये
ललित विहारिणी से ठानी ब्रिज धाम की,
यह श्याम तो गुलाम पद जोलो जग दीजिये