गुरुवार, 28 जून 2012

एक और पाकिस्तान






कश्‍मीर के वार्ताकार बनवाएंगे एक और पाकिस्तान
जम्मू-कश्मीर को भारतीय संविधान के दायरे से बाहर करने (1952) तुष्टीकरण की प्रतीक और अलगाववाद की जनक अस्थाई धारा 370 को विशेष कहने, भारतीय सुरक्षा बलों की वफादारी पर प्रश्नचिन्ह लगाने, पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दे पर एक पक्ष बनाने, पाक अधिकृत कश्मीर को पाक प्रशासित मानने और प्रदेश के 80 प्रतिशत देशभक्त नागरिकों की अनदेखी करके मात्र 20 प्रतिशत पृथकतावादियों की ख्वाइशों/ जज्बातों की कदर करने जैसी सिफारिशें किसी देशद्रोह से कम नहीं हैं।

लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त वार्ताकारों ने कश्मीर समस्या के समाधान के लिए एक रपट तैयार की है। यदि मुस्लिम तुष्टीकरण में डूबी सरकार ने उसे मान लिया तो देश के दूसरे विभाजन की नींव तैयार हो जाएगी। यह रपट जम्मू-कश्मीर की अस्सी प्रतिशत जनसंख्या की इच्छाओं, जरूरतों की अनदेखी करके मात्र बीस प्रतिशत संदिग्ध लोगों की भारत विरोधी मांगों के आधार पर बनाई गई है। तथाकथित प्रगतिशील वार्ताकारों द्वारा प्रस्तुत यह रपट स्वतंत्र कश्मीर राष्ट्र का रोड मैप है।

रपट का आधार अलगाववाद

1952-53 में जम्मू केन्द्रित देशव्यापी प्रजा परिषद महाआंदोलन के झंडे तले डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने के लिए अपना बलिदान देकर जो जमीन तैयार की थी उसी जमीन को बंजर बनाने के लिए अलगाववादी मनोवृत्ति वाले वार्ताकारों ने यह रपट लिख दी है। इस रपट के माध्यम से भारत के राष्ट्रपति, संसद, संविधान, राष्ट्र ध्वज, सेना के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिए गए हैं। देश के संवैधानिक संघीय ढांचे अर्थात एक विधान, एक निशान और एक प्रधान की मूल भावना को चुनौती दी गई है।

आईएसआई के एक एजेंट गुलाम नबी फाई के हमदर्द दोस्त दिलीप पडगांवकर, वामपंथी चिंतक एम. एम. अंसारी और मैकाले परंपरा की शिक्षाविद् राधा कुमार ने अपनी रपट में जो सिफारिशें की हैं वे सभी कश्मीर केन्द्रित राजनीतिक दलों, अलगाववादी संगठनों, आतंकी गुटों और कट्टरपंथी मजहबी जमातों द्वारा पिछले 64 वर्षों से उठाई जा रहीं भारत विरोधी मांगें और सरकार, सेना विरोधी लगाए जा रहे नारे हैं। स्वायत्तता, स्वशासन, आजादी, पाकिस्तान में विलय, भारतीय सेना की वापसी, सुरक्षा बलों के विशेषाधिकारों की समाप्ति, जेलों में बंद आतंकियों की रिहाई, पाकिस्तान गए कश्मीरी आतंकी युवकों की घर वापसी, अनियंत्रित नियंत्रण रेखा और जम्मू-कश्मीर एक विवादित राज्य इत्यादि सभी अलगाववादी जज्बातों, ख्वाइशों को इस रपट का आधार बनाया गया है।

तुष्टीकरण की पराकाष्ठा

रपट के अनुसार एक संवैधानिक समिति का गठन होगा जो 1953 के पहले की स्थिति बहाल करेगी। 1952 के बाद भारतीय संसद द्वारा बनाए गए एवं जम्मू-कश्मीर में लागू सभी कानूनों को वापस लिया जाएगा जो धारा 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को दी गई स्वायत्तता का हनन करते हैं। इस सीमावर्ती प्रदेश के विशेष दर्जे को स्थाई बनाए रखने के लिए धारा 370 के साथ जुड़े अस्थाई शब्द को विशेष शब्द में बदल दिया जाएगा, ताकि स्वायत्तता कायम रह सके।

रपट में स्पष्ट कहा गया है कि प्रदेश में तैनात भारतीय सेना और अर्द्धसैनिक बलों की टुकडि़यां कम की जाएं और उनके विशेषाधिकारों को समाप्त किया जाए। वार्ताकार कहते हैं कि राज्य सरकार के मनपसंद का राज्यपाल प्रदेश में होना चाहिए। जम्मू-कश्मीर में कार्यरत अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों की संख्या पहले घटाई जाए और बाद में समाप्त कर दी जाए। जिन्होंने पहली बार अपराध किया है उनके केस (एफ आई आर) रद्द किए जाएं। अर्थात् एक-दो विस्फोट माफ हों, भले ही उनमें सौ से ज्यादा बेगुनाह मारे गए हों।

पाकिस्तान का समर्थन

रपट की यह भी एक सिफारिश है कि कश्मीर से संबंधित किसी भी बातचीत में पाकिस्तान, आतंकी कमांडरों और अलगाववादी नेताओं को भी शामिल किया जाए। रपट में पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) को पाक प्रशासित जम्मू-कश्मीर (पीएजेके) कहा गया है। वार्ताकारों के अनुसार कश्मीर विषय में पाकिस्तान भी एक पार्टी है और पाकिस्तान ने दो तिहाई कश्मीर पर जबरन अधिकार नहीं किया, बल्कि पाकिस्तान का वहां शासन है, जो वास्तविकता है।

ध्यान से देखें तो स्पष्ट होगा कि वार्ताकारों ने पूरे जम्मू-कश्मीर को आजाद मुल्क की मान्यता दे दी है। इसी मान्यता के मद्देनजर रपट में कहा गया है कि पीएजेके समेत पूरे जम्मू-कश्मीर को एक इकाई माना जाए। इसी एक सिफारिश में सारे के सारे जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान के हवाले करने के खतरनाक इरादे की गंध आती है। पाकिस्तान के जबरन कब्जे वाले कश्मीर को पाक प्रशासित जम्मू-कश्मीर मानकर वार्ताकारों ने भारतीय संसद के उस सर्वसम्मत प्रस्ताव को भी अमान्य कर दिया है जिसमें कहा गया था कि सम्पूर्ण जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न भाग है। 1994 में पारित इस प्रस्ताव में पाक अधिकृत कश्मीर को वापस लेने का संकल्प भी दुहराया गया था।

राष्ट्रद्रोह की झलक

कश्मीर विषय पर पाकिस्तान को भी एक पक्ष मानकर वार्ताकारों ने जहां जम्मू-कश्मीर में सक्रिय देशद्रोही अलगाववादियों के आगे घुटने टेके हैं, वहीं उन्होंने पाकिस्तान द्वारा कश्मीर को हड़पने के लिए 1947, 1965, 1972 और 1999 में भारत पर किए गए हमलों को भी भुलाकर पाकिस्तान के सब गुनाह माफ कर दिए हैं। भारत विभाजन की वस्तुस्थिति से पूर्णतया अनभिज्ञ इन तीनों वार्ताकारों ने महाराजा हरिसिंह द्वारा 26 अक्तूबर, 1947 को सम्पूर्ण जम्मू-कश्मीर का भारत में किया गया विलय, शेख अब्दुल्ला के देशद्रोह को विफल करने वाला प्रजा परिषद् का आंदोलन, 1972 में हुआ भारत-पाक शिमला समझौता, 1975 में हुआ इन्दिरा-शेख समझौता और 1994 में पारित भारतीय संसद का प्रस्ताव इत्यादि सब कुछ ठुकराकर जो रपट पेश की है वह राष्ट्रद्रोह का जीता-जागता दस्तावेज है।

केन्द्र सरकार के इशारे और सहायता से लिख दी गई 123 पृष्ठों की इस रपट में केवल अलगाववादियों की मंशा, केन्द्र सरकार का एकतरफा दृष्टिकोण और पाकिस्तान के जन्मजात इरादों की चिंता की गई है। जो लोग भारत के राष्ट्र ध्वज को जलाते हैं, संविधान फाड़ते हैं और सुरक्षा बलों पर हमला करते हैं, उनकी जी-हुजूरी की गई है। यह रपट उन लोगों का घोर अपमान है, जो आज तक राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को थामकर भारत माता की जय के उद्घोष करते हुए जम्मू-कश्मीर के लिए जूझते रहे, मरते रहे।

कांग्रेस और एनसी की मिलीभगत

वार्ताकारों ने जम्मू-कश्मीर की आम जनता के अनेक प्रतिनिधिमंडलों से वार्ता करने का नाटक तो जरूर किया है, परंतु महत्व उन्हीं लोगों को दिया है जो भारत के संविधान की सौगंध खाकर सत्ता पर काबिज हैं (कांग्रेस के समर्थन से) और भारत के संविधान और संसद को ही धता बताकर स्वायत्तता की पुरजोर मांग कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अनेक बार अपने दल नेशनल कांफ्रेंस (एन.सी.) के राजनीतिक एजेंडे श्पूर्ण स्वायत्तता की मांग की है। स्वायत्तता अर्थात् 1953 के पूर्व की राजनीतिक एवं संवैधानिक व्यवस्था। इस रपट से पता चलता है कि इसे केन्द्र की कांग्रेसी सरकार, नेशनल कांफ्रेंस, आईएसआई के एजेंटों और तीनों वार्ताकारों की मिलीभगत से घढ़ा गया है।

अगर यह मिलीभगत न होती तो जम्मू-कश्मीर की 80 प्रतिशत भारत-भक्त जनता की जरूरतों और अधिकारों को नजरअंदाज न किया जाता। देश विभाजन के समय पाकिस्तान, पीओके से आए लाखों लोगों की नागरिकता का लटकता मुद्दा, तीन- चार युद्धों में शरणार्थी बने सीमांत क्षेत्रों के देशभक्त नागरिकों का पुनर्वास, जम्मू और लद्दाख के लोगों के साथ हो रहा घोर पक्षपात, उनके राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक अधिकारों का हनन, पूरे प्रदेश में व्याप्त आतंकवाद, कश्मीर घाटी से उजाड़ दिए गए चार लाख कश्मीरी हिन्दुओं की सम्मानजनक एवं सुरक्षित घरवापसी और प्रांत के लोगों की अनेकविध जातिगत कठिनाइयां इत्यादि किसी भी समस्या का समाधान नहीं बताया इन सरकारी वार्ताकारों ने।

फसाद की जड़ धारा 370

इसे देश और जनता का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि पिछले छह दशकों के अनुभवों के बावजूद भी अधिकांश राजनीतिक दलों को अभी तक यही समझ में नहीं आया कि एक विशेष मजहबी समूह के बहुमत के आगे झुककर जम्मू-कश्मीर को धारा 370 के तहत दिया गया विशेष दर्जा और अपना अलग प्रांतीय संविधान ही वास्तव में कश्मीर की वर्तमान समस्या की जड़ है। संविधान की इसी अस्थाई धारा 370 को वार्ताकारों ने अब विशेष धारा बनाकर जम्मू-कश्मीर को पूर्ण स्वायत्तता देने की सिफारिश की है। क्या यह भारत द्वारा मान्य चार सिद्धांतों, राजनीतिक व्यवस्थाओं-पंथ निरपेक्षता, एक राष्ट्रीयता, संघीय ढांचा और लोकतंत्र का उल्लंघन एवं अपमान नहीं है?

यह एक सच्चाई है कि भारतीय संविधान की धारा 370 के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर के अलग संविधान ने कश्मीर घाटी के अधिकांश मुस्लिम युवकों को भारत की मुख्य राष्ट्रीय धारा से जुड़ने नहीं दिया। प्रादेशिक संविधान की आड़ लेकर जम्मू-कश्मीर के सभी कट्टरपंथी दल और कश्मीर केन्द्रित सरकारें भारत सरकार द्वारा संचालित राष्ट्रीय महत्व के प्रकल्पों और योजनाओं को स्वीकार नहीं करते। भारत की संसद में पारित पूजा स्थल विधेयक, दल बदल कानून और सरकारी जन्म नियंत्रण कानून को जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं किया जा सकता।

देशघातक और अव्यवहारिक सिफारिश

सरकारी वार्ताकारों ने आतंकग्रस्त प्रदेश से सेना की वापसी और अर्धसैनिक सुरक्षा बलों के उन विशेषाधिकारों को समाप्त करने की सिफारिश की है जिनके बिना आधुनिक हथियारों से सुसज्जित प्रशिक्षित आतंकियों का न तो सफाया किया जा सकता है और न ही सामना। आतंकी अड्डों पर छापा मारने, गोली चलाने एवं आतंकियों को गिरफ्तार करने के लिए सामूहिक कार्रवाई के अधिकारों के बिना सुरक्षा बल स्थानीय पुलिस के अधीन हो जाएंगे जिसमें पाक समर्थक तत्वों की भरमार है। वैसे भी जम्मू-कश्मीर पुलिस इतनी सक्षम और प्रशिक्षित नहीं है जो पाकिस्तानी घुसपैठियों से निपट सके।

अलगाववादी, आतंकी संगठन तो चाहते हैं कि भारतीय सुरक्षा बलों को कानून के तहत इतना निर्बल बना दिया जाए कि वे मुजाहिद्दीनों (स्वतंत्रता सेनानियों) के आगे एक तरह से समर्पण कर दें। विशेषाधिकारों की समाप्ति पर आतंकियों के साथ लड़ते हुए शहीद होने वाले सुरक्षा जवान के परिवार को उस आर्थिक मदद से भी वंचित होना पड़ेगा जो सीमा पर युद्ध के समय शहीद होने वाले सैनिक को मिलती है।

क्या आजाद मुल्क बनेगा कश्मीर?

1953 से पूर्व की राज्य व्यवस्था की सिफारिश करना तो सीधे तौर पर देशद्रोह की श्रेणी में आता है। इस तरह की मांग, सिफारिश का अर्थ है कश्मीर में भारतीय प्रभुसत्ता को चुनौती देना, देश के किसी प्रदेश को भारतीय संघ से तोड़ने का प्रयास करना और भारत के राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय गान, संविधान एवं संसद का विरोध करना। सर्वविदित है कि 1953 से लेकर आज तक भारत सरकार ने अनेक संवैधानिक संशोधनों द्वारा जम्मू-कश्मीर को भारत के साथ जोड़कर ढेरों राजनीतिक एवं आर्थिक सुविधाएं दी हैं। जम्मू-कश्मीर के लोगों द्वारा चुनी गई संविधान सभा ने 14 फरवरी, 1954 को प्रदेश के भारत में विलय पर अपनी स्वीकृति दे दी थी। 1956 में भारत की केन्द्रीय सत्ता ने संविधान में सातवां संशोधन करके जम्मू-कश्मीर को देश का अभिन्न हिस्सा बना लिया।

इसी तरह 1960 में जम्मू-कश्मीर के उच्च न्यायालय को भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में लाया गया। 1964 में प्रदेश में लागू भारतीय संविधान की धाराओं 356-357 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन की संवैधानिक व्यवस्था की गई। 1952 की संवैधानिक व्यवस्था में पहुंचकर जम्मू-कश्मीर पाकिस्तान के जबड़े में फंस जाएगा। पाक प्रेरित अलगाववादी संगठन यही तो चाहते हैं। तब यदि राष्ट्रपति शासन, भारतीय सुरक्षा बल और सर्वोच्च न्यायालय की जरूरत पड़ी तो क्या होगा? क्या जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान के हवाले कर देंगे?

भारत की अखण्डता से खिलवाड़

पाकिस्तान का अघोषित युद्ध जारी है। वह कभी भी घोषित युद्ध में बदल सकता है। जम्मू-कश्मीर सरकार अनियंत्रित होगी। हमारी फौज किसके सहारे लड़ेगी। जब वहां की स्वायत्त सरकार, सारी राज्य व्यवस्था, न्यायालय सब कुछ भारत सरकार के नियंत्रण से बाहर होंगे तो उन्हें भारत के विरोध में खड़ा होने से कौन रोकेगा? अच्छा यही होगा कि भारत की सरकार इन तथाकथित प्रगतिशील वार्ताकारों के भ्रमजाल में फंसकर जम्मू-कश्मीर सहित सारे देश की सुरक्षा एवं अखंडता के साथ खिलवाड़ न करे।

कश्मीर घाटी से हिन्दू संहारक अफगान शासन को उखाड़ फेंकने में सफल हुआ एक हिन्दू नेता पंडित बीरबल धर






गौरवशाली इतिहास-9
कश्मीर घाटी से हिन्दू संहारक अफगान शासन को उखाड़ फेंकने में सफल हुआ एक हिन्दू नेता
 पंडित बीरबल धर -नरेन्द्र सहगल
तारीख: 6/23/2012
कश्मीर प्रदेश की अंतिम हिन्दू साम्राज्ञी कोटा रानी के आत्म बलिदान के पश्चात् सत्ता पर काबिज हुए प्रथम मुस्लिम शासक शाहमीर के राज्यकाल से प्रारंभ हुआ बलात् मतान्तरण का सिलसिला अंतिम सुल्तान सूबेदार आजम खान के राज्य तक निरंतर 500 वर्षों तक अबाध गति से चलता रहा। पूर्व का हिन्दू कश्मीर अब तलवार के जोर से मुस्लिम कश्मीर में बदल दिया गया। इस कालखंड में हिन्दू समाज और संस्कृति को समाप्त करने के लिए सभी प्रकार के घृणित एवं नृशंस उपायों का इस्तेमाल किया गया। क्रूरतम और अमानवीय हथकंडों के बावजूद ये विधर्मी विदेशी शासक कश्मीर के मूल समाज को पूर्णतया समाप्त नहीं कर सके। कश्मीर के हिन्दू समाज ने लगातार पांच सौ वर्षों तक बलिदानों की अद्भुत परंपरा को बनाए रखते हुए भारतीय जीवन मूल्यों की रक्षा की।
हिन्दू रक्षा का संकल्प
सूबेदार आजम खान के कालखंड में भी कश्मीर के संभ्रांत पंडितों ने कश्मीर एवं हिन्दू समाज को बचाने का निर्णय किया। किसी भी ढंग से अपने देश और समाज को बचाने के पवित्र राष्ट्रीय उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण गुप्त बैठक का आयोजन किया गया। इस समय पड़ोसी राज्य पंजाब में एक शक्तिशाली सिख महाराजा रणजीत सिंह का राज्य था। पंडित नेताओं ने गहरे विचार-विमर्श के बाद महाराजा रणजीत सिंह से वार्तालाप करने और सैनिक सहायता प्राप्त करने का फैसला किया। राजनीतिक दृष्टि से चतुर हिन्दू नेता पंडित बीरबल धर को यह कार्य सम्पन्न करने की जिम्मेदारी सौंपी गई।
इस योजना की कुछ धुंधली सी जानकारी किसी तरीके से सूबेदार को मिल गई। उसने तुरंत अपने एक विश्वस्त हिन्दू नेता मिर्जा पंडित को बुलाकर पूछताछ की। परंतु मिर्जा पंडित ने अत्यंत चतुराई से काम लेकर सूबेदार को शांत कर दिया। उस समय तक पंडित बीरबल धर अपने युवा बेटे राजा काक के साथ अपने ध्येय की पूर्ति हेतु घर से निकल चुका था। महाराजा रणजीत सिंह के दरबार में पहुंचना उसका उद्देश्य था। उस समय पंजाब की राजधानी लाहौर थी।
देशभक्त मुसलमानों का योगदान
श्रीनगर से थोड़ी दूर देवसर नामक स्थान पर थोड़ी देर रुककर दोनों पिता पुत्र आगे की यात्रा पर निकले। स्थानीय मुस्लिम समाज की सहायता से दोनों पीर पंजाल पर्वत को पार करने में सफल हो गए। इस राष्ट्रीय कार्य के लिए स्थानीय मुस्लिम बंधुओं ने सहायता करके अपने राष्ट्रीय कर्तव्य को निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इन देशभक्त मुसलमानों का नाम भी कश्मीर के इतिहास में उज्ज्वल है।
पंडित बीरबल और उसके पुत्र का इस प्रकार सूबेदार को चकमा देकर सुरक्षित निकल जाना और वह भी स्थानीय मुसलमानों की मदद से, यह बात सूबेदार और उसके दरबारियों के कलेजे पर सांप की तरह लोटने लगी। समाचार प्राप्त होते ही सूबेदार ने चारों ओर अपने सैनिक छोड़ दिए। उन्होंने बीरबल धर और उसके पुत्र काक को पकड़ने के लिए प्रदेश का कोना-कोना छान मारा। परंतु तीर धनुष से छूट चुका था।
वीर पत्नी की देशभक्ति
सूबेदार आजम खान पागलों की तरह छटपटाने लगा। उसने हिन्दुओं और मतान्तरित मुसलमानों पर जुल्मों की चक्की चला दी। जिसने भी विरोध किया, तलवार की भेंट चढ़ा दिया गया। इस एकतरफा विनाशलीला से जब वह थक गया तो उसने पंडित बीरबल धर के परिवार की स्त्रियों को जबरदस्ती पकड़कर उसके हरम में लाने का आदेश अपने सैनिकों को दिया। परंतु यहां भी उसको मुंह की खानी पड़ी। कुछ हिन्दुओं ने अपनी चतुराई से उनके घर की स्त्रियों के सम्मान को आजम खान की हवस का शिकार होने से बचा लिया। सूबेदार हाथ मलता रह गया।
पंडित बीरबल ने घर से निकलने से पूर्व अपनी पत्नी से भेंट की। पत्नी ने सहर्ष पति को राष्ट्र पथ पर बढ़ने की प्रेरणा और अश्रुपूर्ण मौन स्वीकृति दे दी। इस वीर पत्नी ने स्वयं सब प्रकार के कष्ट सह लेने परंतु कर्तव्य से विमुख न होने का आश्वासन अपने राष्ट्रसेवी पति को दिया। उसने अपने पति के हाथ को अपने हाथ में लेकर भीष्म प्रतिज्ञा की कि वह किसी भी विधर्मी को अपने शरीर को छूने से पहले अपने प्राण त्यागने में संकोच नहीं करेगी। राष्ट्रीय कार्य के लिए जाते हुए पति के समक्ष पत्नी द्वारा भी समय आने पर आत्मबलिदान का निश्चय किया गया। कितना भावुक और प्रेरणास्पद  रहा होगा वह ऐतिहासिक क्षण।
फिर सामने आया देशद्रोह
पास ही खड़े युवा बेटे काक ने भी मां के चरण छूकर आशीर्वाद मांगा। मां ने बेटे को सीने से लगा लिया। उसने मालूम था कि बेटे के साथ भी उसका यह अंतिम मिलन है। वीर माता ने वीर पुत्र की अंगुली वीर पिता के हाथ में थमा दी। जाने से पूर्व पंडित बीरबल ने अपने परिवार की सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने एक विश्वस्त मुसलमान मित्र कादिस खान को सौंप दी। दोनों महिलाएं सास और बहू (बेटे काक की पत्नी) कादिस खान के घर चली गईं।
सूबेदार आजम खान ने इन दोनों महिलाओं को ढूंढने में साम दाम दंड भेद का सब नीतियों का इस्तेमाल करके देख लिया, परंतु कुछ भी हाथ न लगा। कादिस खान ने भी इनकी रक्षा करने में पूरी बुद्धि और शक्ति झोंक दी। परंतु भाग्य ने साथ नहीं दिया। कादिस खान के एक नजदीकी दोस्त की स्वार्थलिप्सा और अराष्ट्रीय मनोवृत्ति के कारण यह खबर सूबेदार तक पहुंच गई। सूबेदार के आदेश से कादिस के घर को घेर लिया गया। कादिस ने पूरी ताकत के साथ दोनों स्त्रियों को छिपाने और बचाने की कोशिश की। परंतु लड़ते-लड़ते शहीद हो गया। सास-बहू को गिरफ्तार कर लिया गया।
सास-बहू का बलिदान
जब सूबेदार आजम खान के सैनिक पंडित बीरबल की पत्नी और युवा बहू को ले जा रहे थे, तो रास्ते में मौका देखकर सास ने अपनी हीरे की अंगूठी निगलकर अपने पेट में उतार ली। परंतु बहू ऐसा न कर सकी। इन दोनों को जब सूबेदार के सामने उपस्थित किया गया तो पंडित बीरबल की पत्नी ने नफरत भरी निगाहों से आजम खान को देखा और शेरनी की तरह दहाड़ते हुए कहा कि 'मेरा पति और बेटा महाराजा रणजीत सिंह के दरबार में पहुंच चुके हैं। शीघ्र ही विधर्मी और नीच शासकों द्वारा कश्मीर के हिन्दुओं पर ढाए जा रहे अत्याचारों का अंत होगा और अफगान शासन भी तबाह होगा।' उसकी यह बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि उसकी मृत्यु हो गई।
इस तरह बीरबल पंडित की पत्नी द्वारा आत्मबलिदान देने के बाद उसकी बहू को जालिमों ने एक अफगान सूबेदार के साथ काबुल भेज दिया। वहां उसके साथ मजहबी उन्मादियों ने क्या किया होगा इसकी कल्पना से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
दो सभ्यताओं में अंतर
कितना अंतर है दोनों सभ्यताओं और जीवन मूल्यों में। सर्वविदित है कि जब मराठा सैनिकों ने कल्याण (पुणे के पास) के मुस्लिम सूबेदार को एक युद्ध में पराजित कर दिया तो सूबेदार का तोपखाना और महिलाओं का हरम मराठा सैनिकों के हाथ लगा। मराठा सैनिकों ने सूबेदार की जवान बेटी को लाकर छत्रपति शिवाजी महाराज के समक्ष उपस्थित कर दिया।
शिवाजी ने अपने सैनिकों को डांटा और भविष्य में फिर कभी ऐसा घृणित कार्य न करने की आज्ञा दी। फिर शिवाजी ने सूबेदार की बेटी को मां जैसा सम्मान देकर उसे स्वर्ण आभूषण देकर सुरक्षित सूबेदार के पास भिजवा दिया। बस यही अंतर है दोनों सभ्यताओं में।
रणजीत सिंह ने बदला इतिहास
उधर पंडित बीरवल धर और उसका युवा पुत्र राजा काक जम्मू के महाराजा गुलाब सिंह के दरबार में पहुंचने में सफल हो गए। राजा गुलाब सिंह ने महाराजा रणजीत सिंह के प्रधानमंत्री राजा ध्यान सिंह के नाम एक परिचय पत्र देकर उन्हें लाहौर भेजने की व्यवस्था कर दी। लाहौर पहुंचने पर राजा ध्यान सिंह ने प्रयासपूर्वक इन्हें महाराजा रणजीत सिंह से मिलवा दिया। पंडित बीरबल ने सारी व्यथा महाराजा को सुना दी।
महाराजा रणजीत सिंह ने सारी बात ध्यान से सुनी। उन्हें लगा कि इस समय कश्मीर में हिन्दुओं की समस्या को राष्ट्रीय संदर्भ में देखा जाना चाहिए। वे एक सच्चे सिख थे। महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी शरण में आए कश्मीरी पंडितों की रक्षा करने का निश्चय किया। इस महापुरुष ने अफगानी शासन को शक्ति के साथ जड़मूल से समाप्त करके कश्मीर प्रदेश और वहां के हिन्दुओं की रक्षा करने का सीधा फैसला कर लिया। महाराजा ने अपनी विशाल सिख सेना को कश्मीर की ओर कूच करने के आदेश दे दिए।
अत्याचारी शासन समाप्त
महाराजा रणजीत सिंह ने अपने पांच सर्वश्रेष्ठ वीर सेनाधिकारियों के साथ पचास हजार चुने हुए सैनिकों को पंडित बीरबल के मार्गदर्शन में भेजा। पंडित बीरबल धर ने बाकायदा सैन्याधिकारियों के साथ रहकर उन्हें पूरी भौगोलिक जानकारी दी। इस समाचार को सुनते ही कश्मीर का शासक सूबेदार आजम खान काबुल भाग गया। उसके बेटे जबर खान ने शासन संभाला। ठीक इसी समय रणजीत सिंह की सेना ने धावा बोल दिया।
जम्मू के राजा गुलाब सिंह, लाहौर के हरिसिंह नलवा, फिरोजपुर के ज्वाला सिंह, अमृतसर के हुकुम सिंह और अटारी के श्याम सिंह इत्यादि सेनापतियों ने अपनी पूरी शक्ति से जबर खान की सेना के पांव उखाड़ दिए। जबर खान भी अपने बाप की तरह दुम दबाकर भाग गया। सिख सेना की विजय हुयी। 20 जून 1819 ई.को पंडित बीरबल ने सिख फौज के साथ श्रीनगर में प्रवेश किया।
पंडित बीरबल अगर चाहते तो अपनी विजय के बाद बदला ले सकते थे। पांच सौ वर्षों में बर्बाद कर दिए गए मठ, मंदिरों, जला दिए गए शिक्षा केन्द्रों और अपनी पत्नी और बहू सहित लाखों हिन्दू महिलाओं के अपमान का बदला मस्जिदों, मकबरों और मुस्लिम समाज से ले सकते थे परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। वे हिन्दुओं को वापस अपने धर्म में लाकर राष्ट्रवाद का धरातल भी तैयार कर सकते थे, परंतु ऐसा भी नहीं किया गया।
फिर लौट आया वैभव काल
महाराजा रणजीत सिंह की कश्मीर विजय के बाद कश्मीर पर सत्ताईस वर्ष तक उनका आधिपत्य रहा। इस कालखंड में कश्मीर में दस गवर्नर नियुक्त किए गए। शासन की नीतियां उदार थीं। हिन्दुओं पर जुल्मों का दमनचक्र पूर्णतया थम गया। मुस्लिम जागीरदार जो हिन्दुओं पर एकतरफा अत्याचार करते थे, सभी काबुल भाग गए। हिन्दू स्त्रियां अब सम्मान एवं स्वतंत्रता-पूर्वक कश्मीर घाटी में आने जाने लगीं। मंदिरों में आरती वंदन के स्वर फिर गूंजने लगे। ऐसा आभास होने लगा कि वैभवकाल पुन: लौट आया है। परंतु इस वैभव को स्थाई बनाने के लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को पुनर्जीवित करने के ठोस प्रयास नहीं हुए। बस अल्पकाल के लिए कहीं छिप गया विधर्मी कट्टरवाद।
ऐतिहासिक मापदंड, राजनीतिक चातुर्य और भविष्य के लिए विदेशी ताकतों को खबरदार करने की दृष्टि से पंडित बीरबल को शठे शाठ्यं समाचरेत की नीति पर चलते हुए कश्मीर की धरती से विदेशी आक्रांताओं और उनके सभी चिन्हों तक को पूर्णतया समाप्त करना चाहिए था या नहीं, इस बात को आज की कश्मीर समस्या के संदर्भ में सोचना अत्यंत जरूरी है। आखिर हिन्दुओं की उदारता कब तक अपने भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर पड़ने वाली चोटों को बर्दाश्त करती रहेगी?