सोमवार, 27 अगस्त 2012

श्रृद्धांजली:मुकेश: दुनिया से जाने वाले जाने चले जाते हैं कहां...



श्रृद्धांजली
दुनिया से जाने वाले जाने चले जाते हैं कहां................
प्रसिद्ध गायक मुकेश ( मुकेशचन्द्र माथुर, दिल्ली ) हमारे बीच से वर्षों पहले ( 27 अगस्त 1976) से जा चुके हैं। मगर ऐसा लगता है जैसे कल की तो बात है। उनकी पुण्यतिथि 27 अगस्
त होती है। यह दिन उनको चाहने वालों के लिये खास होता है। उने गाये गीत होंगें और उनकी मीठी मीठी यादें होंगीं...उनका एक गीत “ओ जाने वाले हो सके तो लौटके आना...“ एवं दुनिया से जाने वाले जाने चले जाते हैं कहां, तथा सब कुछ सीखा हमनें न सीखी होशयारी, सच है दुनिया वालों कि हम हैं अनाडी, सारे दिन बजेगें। उनके गम भरे नगमों ने तो झाूम मचा दी थी। राजकपूर और मुकेश की आवाज एक दूसरे की पर्याय थी। पुण्यतिथि पर उन्हे शत शत नमन..!!!

इक दिन बिक जाएगा, माटी के मोल
जग में रह जाएंगे, प्यारे तेरे बोल
दूजे के होंठों को, देकर अपने गीत
कोई निशानी छोड़, फिर दुनिया से डोल
इक दिन बिक जायेगा ...


अनहोनी पग में काँटें लाख बिछाए
होनी तो फिर भी बिछड़ा यार मिलाए 
ये बिरहा ये दूरी, दो पल की मजबूरी
फिर कोई दिलवाला काहे को घबराये, तरम्पम,
धारा, तो बहती है, बहके रहती है
बहती धारा बन जा, फिर दुनिया से डोल
एक दिन


परदे के पीछे बैठी साँवली गोरी
थाम के तेरे मेरे मन की डोरी
ये डोरी ना छूटे, ये बन्धन ना टूटे
भोर होने वाली है अब रैना है थोड़ी, तरम्पम,
सर को झुकाए तू, बैठा क्या है यार
गोरी से नैना जोड़, फिर दुनिया से 
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सुभाष चन्द्र बोस धर्मपत्नी एमिली स्चेंक्ल

सुभाष चन्द्र बोस जी उनकी धर्मपत्नी श्री एमिली स्चेंक्ल के साथ एक दुर्लभ फोटो ..उनकी पत्नी काफी समय तक उनकी सेकेट्री रही थी जब सुभाष जी रशिया में थे वही उन होने उनके साथ सन 1937 में शादी की उनकी पुत्री अनीता बोस जी का जन्म सन 1942 में विएन्ना में हुआ ,विएअन...ऑस्ट्रिया की राजधानी हैं




http://nazehindsubhash.blogspot.in/2010/06/12.html

ब्लॉग   नाज़-ए-हिन्द सुभाष से  


जयदीप शेखर

नाज़-ए-हिन्द सुभाष
1.2: ‘विश्वयुद्ध’ की पटकथा और 1.2 (क) एमिली शेंकेल प्रसंग
पिताजी का मन रखने के लिए 1920 में आई.सी.एस. (आज का आई.ए.एस.) अधिकारी बने नेताजी 1921 में ही नौकरी छोड़कर राजनीति में उतरते हैं। ग्यारह बार गिरफ्तार करने के बाद ब्रिटिश सरकार उन्हें 1933 में ‘देश निकाला’ ही दे देती है।
यूरोप में निर्वासन बिताते हुए वे अपनी यकृत की थैली की शल्य-चिकित्सा भी कराते हैं। 1934 में पिताजी की मृत्यु पर तथा 1936 में काँग्रेस के (लखनऊ) अधिवेशन में भाग लेने के लिए वे दो बार भारत आते हैं, मगर दोनों ही बार ब्रिटिश सरकार उन्हें गिरफ्तार कर वापस देश से बाहर भेज देती है।1933 से ’38 तक यूरोप में रहते हुए नेताजी ऑस्ट्रिया, बुल्गारिया, चेकोस्लोवाकिया, फ्राँस, जर्मनी, हंगरी, आयरलैण्ड, इटली, पोलैण्ड, रूमानिया, स्वीजरलैण्ड, तुर्की और युगोस्लाविया की यात्राएँ करते हैं और यूरोप की राजनीतिक हलचल का गहन अध्ययन करते हैं।
नेताजी भाँप लेते हैं कि एक दूसरे विश्वयुद्ध की पटकथा यूरोप में लिखी जा रही है। वे इस ‘भावी’ विश्वयुद्ध में ब्रिटेन के शत्रु देशों से हाथ मिलाकर देश को आजाद कराने के बारे में सोचते हैं। 
       एक स्थान पर नेताजी लिखते हैं:
"“विश्व में पिछले दो सौ वर्षों में आजादी पाने के लिए जितने भी संघर्ष हुए हैं, उन सबका मैंने गहन अध्ययन किया है, और पाया है कि एक भी ऐसा उदाहरण कहीं नहीं है, जहाँ आजादी बिना किसी बाहरी मदद के मिली हो।"” 
जाहिर है, नेताजी की नजर में भारत को भी अपनी आजादी के लिए किसी और देश से मदद लेनी चाहिए। आखिर किस देश से?
नेताजी की पहली पसन्द हैं- स्तालिन, सोवियत संघ के राष्ट्रपति। नेताजी अनुभव करते हैं कि सोवियत संघ निकट भविष्य में ब्रिटिश साम्राज्यवाद को चुनौती देने वाला है। (वैसे भी, दोनों परम्परागत शत्रु थे।) उनका यह भी मानना है कि भारत को आजाद कराने के बाद सोवियत संघ भारत में पैर नहीं जमायेगा।
मगर नेताजी को सोवियत संघ जाने के लिए वीसा नहीं दिया जाता है। उन्हें ब्रिटेन भी नहीं जाने दिया जाता है।
        यूरोप में ब्रिटिश सरकार ने कोई एक दर्जन जासूस नेताजी की निगरानी में लगा रखे हैं। नेताजी क्या खाते हैं, कहाँ जाते हैं, किन लोगों से मिलते हैं- हर खबर सरकार को मिल रही है।

1.2 (क) एमिली शेंकेल प्रसंग
    यहाँ एमिली शेंकेल का जिक्र करना अनुचित नहीं होगा, हालाँकि यह नेताजी का व्यक्तिगत प्रसंग है। 
       1934 में नेताजी वियेना (ऑस्ट्रिया) में एमिली शेंकेल से मिलते हैं। दरअसल नेताजी को अपनी पुस्तक ‘द इण्डियन स्ट्रगल’ के लिए एक स्टेनोग्राफर की जरुरत है, जो अँग्रेजी जानती हो। इस प्रकार एमिली पहले नेताजी की स्टेनो, फिर सेक्रेटरी बनती है, और फिर दोनों एक-दूसरे से प्रेम करने लगते हैं।
अपनी पुस्तक की भूमिका में नेताजी सिर्फ एमिली को ही नाम लेकर धन्यवाद देते हैं (दिनांक 29 नवम्बर 1934)। कई यात्राओं में एमिली नेताजी की हमसफर होती हैं।
       26 दिसम्बर 1937 को- एमिली के जन्मदिन पर- नेताजी बैडगैस्टीन में उनसे विवाह करते हैं।
       1938 में भारत लौटने के बाद से नेताजी एमिली को नियमित रुप से चिट्ठियाँ लिखते हैं। उनके 162 पत्रों का संकलन पुस्तक के रुप में प्रकाशित हुआ है। हालाँकि दक्षिण-पूर्व एशिया से लिखे गये उनके पत्र इनमें शामिल नहीं हैं- इन पत्रों को द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त होने के बाद ब्रिटिश अधिकारी जब्त कर लेते हैं- वियेना में एमिली के घर की तलाशी के दौरान। ये पत्र अब तक अज्ञात ही हैं।
       1941-43 में जर्मनी प्रवास के दौरान नेताजी एमिली शेंकेल के साथ ही बर्लिन में रहते हैं।
       1942 के अन्त में एमिली और नेताजी माता-पिता बनते हैं। वे अपनी बेटी का नाम अनिता रखते हैं।
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1944 की बरसात में, जब इम्फाल-कोहिमा युद्ध में हार निश्चित जान पड़ती है, तब नेताजी यह महसूस करते हैं वे शायद अब एमिली और अपनी नन्हीं बेटी से कभी न मिल पायें, क्योंकि अगले साल हार तय है और इस हार का मतलब है- उन्हें कहीं अज्ञातवास में जाना पड़ेगा, या जेल में रहना पड़ेगा, या फिर मृत्यु को गले लगाना पड़ेगा।
       एक शाम, जब आसमान काले बादलों से घिरा है, वे एकान्त पाकर कैप्टन लक्ष्मी विश्वनाथन से कहते हैं, “यूरोप में मैंने कुछ ऐसा किया है, जिसे पता नहीं भारतवासी कभी समझ पायेंगे या नहीं।” उनका ईशारा एमिली की ओर है, कि पता नहीं भारतीय कभी उन्हें ‘नेताजी की पत्नी’ का दर्जा देंगे या नहीं।
कितना भी तो भारतीयों के लिए यह एक ‘गन्धर्व विवाह’ है।
लक्ष्मी कहती हैं, “जरूर समझेंगे।”
एमिली शेंकेल बोस तो खैर कभी भारत नहीं आतीं; मगर 1945 में नेहरूजी तथा नेताजी के परिवारजनों के प्रयासों से बाकायदे एक ट्रस्ट बनाकर एमिली को नियमित आर्थिक मदद दी जाती है, जिसके लिए एमिली नेहरूजी का आभार व्यक्त करती हैं।
एमिली शेंकेल बोस का निधन वर्ष 1996 में होता है।
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नेताजी की बेटी अनिता बोस बाद के दिनों में ऑग्सबर्ग विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की प्राध्यापिका बनती हैं। जर्मन संसद में ग्रीन पार्टी के सदस्य मार्टिन पाफ (Martin Pfaff) से वे विवाह करती हैं और उनकी तीन सन्तानों- यानि नेताजी के नाती-नतनियों- के नाम होते हैं- थॉमस कृष्णा, माया कैरिना और पीटर अरूण।
अनिता बोस पहली बार 18 वर्ष की उम्र में 1960 में भारत आती हैं और फिर 2005-06 में 63 वर्ष की उम्र में दुबारा भारत आती हैं। दोनों बार देश उन्हें ‘नेताजी की बेटी’ का सम्मान देता है।आज हार्वर्ड विश्वविद्यालय में सामुद्रिक इतिहास के प्राध्यापक सुगत बोस (Sugata Bose)  नेताजी के पड़पोते- भतीजे के पुत्र- हैं।