शनिवार, 15 सितंबर 2012

नवीन सोच के धनी थे सुदर्शन जी


 नवीन सोच के धनी थे सुदर्शन जी 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक श्री कुप्.सी. सुदर्शन मूलतः तमिलनाडु और कर्नाटक की सीमा पर बसे कुप्पहल्ली (मैसूर) ग्राम के निवासी थे। कन्नड़ परम्परा में सबसे पहले गांव, फिर पिता और फिर अपना नाम बोलते हैं।

उनके पिता श्री सीतारामैया वन-विभाग की नौकरी के कारण अधिकांश समय मध्यप्रदेश में ही रहे और वहीं रायपुर (वर्तमान छत्तीसगढ़) में १८ जून, १९३१ को श्री सुदर्शन जी का जन्म हुआ। तीन भाई और एक बहन वाले परिवार में सुदर्शन जी सबसे बड़े थे। रायपुर, दमोह, मंडला तथा चन्द्रपुर में प्रारम्भिक शिक्षा पाकर उन्होंने जबलपुर (सागर विश्वविद्यालय) से १९५४ में दूरसंचार विषय में बी.ई की उपाधि ली तथा तब से ही संघ-प्रचारक के नाते राष्ट्रहित में जीवन समर्पित कर दिया। सर्वप्रथम उन्हें रायगढ़ भेजा गया।
प्रारम्भिक जिला, विभाग प्रचारक आदि की जिम्मेदारियों को सफलतापूर्वक निभाने के बाद १९६४ में वे मध्य भारत के प्रान्त-प्रचारक बने। श्री सुदर्शन जी ज्ञान के भंडार, अनेक विषयों एवं भाषाओं के जानकार तथा अद्भुत वक्तृत्व कला के धनी थे। किसी भी समस्या की गहराई तक जाकर, उसके बारे में मूलगामी चिन्तन कर उसका सही समाधान ढूंढ निकालना उनकी विशेषता थी।
पंजाब की खालिस्तान समस्या हो या असम का घुसपैठ विरोधी आन्दोलन, अपने गहन अध्ययन तथा चिन्तन की स्पष्ट दिशा के कारण उन्होंने इनके निदान हेतु ठोस सुझाव दिये। साथ ही संघ के कार्यकर्ताओं को उस दिशा में सक्रिय कर आन्दोलन को गलत दिशा में जाने से रोका।
पंजाब के बारे में उनकी यह सोच थी कि प्रत्येक केशधारी हिन्दू है तथा प्रत्येक हिन्दू दसों गुरुओं व उनकी पवित्र वाणी के प्रति आस्था रखने के कारण सिख है। इस सोच के कारण खालिस्तान आंदोलन की चरम अवस्था में भी पंजाब में गृहयुद्ध नहीं हुआ। इससे आंदोलन के विदेशी आकाओं को बहुत निराशा हुई।

इसी प्रकार बंगलादेश से असम में आने वाले मुसलमान षड्यन्त्रकारी घुसपैठिये हैं। उन्हें वापस भेजना ही चाहिए, जबकि वहां से लुट-पिट कर आने वाले हिन्दू शरणार्थी हैं, अतः उन्हें सहानुभूतिपूर्वक शरण देनी चाहिए। ऐसे ही पूरे देश से नौकरी अथवा व्यवसाय के नाते पूर्वांचल में गये हिन्दुओं को घुसपैठिया कहकर उनका तिरस्कार नहीं किया जा सकता।
सुदर्शन जी के चिन्तन एवं अध्ययन से प्राप्त इन निष्कर्षों को जब स्वयंसेवकों तथा देशभक्त नागरिकों ने बोलना शुरू किया, तो पंजाब तथा असम आन्दोलन की दिशा ही बदल गयी। असम में पिछले दिनों बंगलादेशी घुसपैठियों तथा उनके भारत में बसे समर्थकों द्वारा जो हिंसक उपद्रव किये गये, उससे सुदर्शन जी की गहरी सोच का सत्यता प्रमाणित होती है। खालिस्तान आन्दोलन के दिनों में ‘राष्ट्रीय सिख संगत’ नामक संगठन की नींव रखी गयी, जो आज विश्व भर के सिखों का एक सशक्त मंच बन चुका है।
श्री सुदर्शन जी को संघ-क्षेत्र में जो भी दायित्व दिया गया, उसमें अपनी नव-नवीन सोच के आधार पर उन्होंने नये-नये प्रयोग किये। १९६९ से १९७१ तक उन पर अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख का दायित्व था। इस दौरान ही खड्ग, शूल, छुरिका आदि प्राचीन शस्त्रों के स्थान पर नियुद्ध, आसन, तथा खेल को संघ शिक्षा वर्गों के शारीरिक पाठ्यक्रम में स्थान मिला। आज तो प्रातःकालीन शाखाओं पर आसन तथा विद्यार्थी शाखाओं पर नियुद्ध एवं खेल का अभ्यास एक सामान्य बात हो गयी है।
आपातकाल के अपने वन्दीवास में उन्होंने योगचाप (लेजम) पर नये प्रयोग किये तथा उसके स्वरूप को बिलकुल बदल डाला। योगचाप की लय और ताल के साथ होने वाले संगीतमय व्यायाम से १५ मिनट में ही शरीर का प्रत्येक जोड़ आनन्द एवं नवस्फूर्ति का अनुभव करता है। १९७७ में उनका केन्द्र कोलकाता बनाया गया तथा शारीरिक प्रमुख के साथ-साथ वे पूर्वोत्तर भारत के क्षेत्र प्रचारक भी रहे। इस दौरान उन्होंने वहां की समस्याओं का गहन अध्ययन करने के साथ-साथ बंगला और असमिया भाषा पर भी अच्छा अधिकार प्राप्त कर लिया।
१९७९ में वे अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख बने। शाखा पर बौद्धिक विभाग की ओर से होने वाले दैनिक कार्यक्रम (गीत, सुभाषित, अमृतवचन) साप्ताहिक कार्यक्रम (चर्चा, कहानी, प्रार्थना अभ्यास), मासिक कार्यक्रम (बौद्धिक वर्ग, समाचार समीक्षा, जिज्ञासा समाधान, गीत, सुभाषित, एकात्मता स्तोत्र आदि की व्याख्या) तथा शाखा के अतिरिक्त समय से होने वाली मासिक श्रेणी बैठकों को सुव्यवस्थित स्वरूप १९७९ से १९९० के कालखंड में ही मिला। शाखा पर होनेवाले ‘प्रातःस्मरण’ के स्थान पर नये ‘एकात्मता स्तोत्र’ एवं ‘एकात्मता मन्त्र’ को भी उन्होंने प्रचलित कराया। १९९० में उन्हें सह सरकार्यवाह की जिम्मेदारी दी गयी।
सुदर्शन जी अच्छे वक्ता के साथ ही अच्छे लेखक भी थे। यद्यपि प्रवास के कारण उन्हें लिखने का समय कम ही मिल पाता था, फिर भी उनके कई लेख विभिन्न पत्रों ने प्रमुखता से प्रकाशित किये। अपने धाराप्रवाह उद्बोधन में दोहे, कुंडली, श्लोक तथा कविताओं के उद्धरण देकर वे श्रोताओं के मन पर अमिट छाप छोड़ते थे।
देश का बुद्धिजीवी वर्ग, जो कम्युनिस्ट आन्दोलन की विफलता के कारण वैचारिक संभ्रम में डूब रहा था, उसकी सोच एवं प्रतिभा को राष्ट्रवाद के प्रवाह की ओर मोड़ने हेतु ‘प्रज्ञा-प्रवाह’ नामक वैचारिक संगठन भी आज देश के बुद्धिजीवियों में लोकप्रिय हो रहा है। इसकी नींव में श्री सुदर्शन जी ही थे। संघ-कार्य तथा वैश्विक हिन्दू एकता के प्रयासों की दृष्टि से उन्होंने ब्रिटेन, हालैंड, केन्या, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, हांगकांग, अमेरिका, कनाडा, त्रिनिडाड, टुबैगो, गुयाना आदि देशों का प्रवास भी किया।
इस्लाम और ईसाइयों से प्रभावित अधिकांश संस्थाएं प्रायः राष्ट्र की मुख्य धारा से कटी रहती हैं। मीडिया भी प्रायः उनके मजहबी स्वरों को ही प्रमुखता से छापता है। ऐसे में अल्पसंख्यकों तक संघ को पहुंचाने के लिये सुदर्शन जी ने वरिष्ठ कार्यकर्ता श्री इन्द्रेश कुमार जी को इस क्षेत्र में काम करने को कहा। जिससे कुछ संस्थाएं ऐसी बनी जिनमें राष्ट्रवादी मुसलमान और ईसाईयों को जुड़ा गया।
सुदर्शन जी का आयुर्वेद पर बहुत विश्वास था। लगभग २० वर्ष पूर्व भीषण हृदयरोग से पीड़ित होने पर चिकित्सकों ने बाइपास सर्जरी ही एकमात्र उपाय बताया; पर सुदर्शन जी ने लौकी के ताजे रस के साथ तुलसी, काली मिर्च आदि के सेवन से स्वयं को ठीक कर लिया। कादम्बिनी के तत्कालीन सम्पादक राजेन्द्र अवस्थी सुदर्शन जी के सहपाठी थे। उन्होंने इस प्रयोग को दो बार कादम्बिनी में प्रकाशित किया। अतः इस प्रयोग की देश भर में चर्चा हुई।
संघ कार्य में सरसंघचालक की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण है। चौथे सरसंघचालक श्री रज्जू भैया को जब लगा कि स्वास्थ्य खराबी के कारण वे अधिक सक्रिय नहीं रह सकते, तो उन्होंने वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से परामर्श कर १० मार्च, २००० को अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में श्री सुदर्शन जी को यह जिम्मेदारी सौंप दी। नौ वर्ष बाद सुदर्शन जी ने भी इसी परम्परा को निभाते हुए २१ मार्च, २००९ को सरकार्यवाह श्री मोहन भागवत को छठे सरसंघचालक का कार्यभार सौंप दिया।
आज देश में जितनी भी सामाजिक, राजनीतिक या धार्मिक संस्थाएं हैं, वहां छोटे-छोटे पदों के लिए कितनी मारामारी होती है, यह सब देखते ही हैं। ऐसे में विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन के सर्वोच्च पद से इस प्रकार निवृत होना सामान्य लोगों को बड़ा आश्चर्यजनक लगता है; पर जो लोग संघ की कार्यप्रणाली को गहराई से जानते हैं, उनके लिए यह सामान्य बात है। इतना ही नहीं, तो दायित्व से स्वैच्छिक निवृत्ति के बाद भी सक्रिय रहना और अपने सहयोगी रहे कार्यकर्ता के आदेशानुसार काम करना, यह अजूबा संघ शाखा की भट्टी में तपे हुए लोगों के लिए ही संभव है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्थितप्रज्ञ की चर्चा की है। श्री सुदर्शन जी भी ऐसे ही स्थितप्रज्ञ महानुभावों की विराट श्रृंखला की एक कड़ी थे।
पिछले कुछ समय से वे आयुवृद्धि संबंधी अनेक समस्याओं से पीड़ित थे। फिर भी वे प्रतिदिन प्रातःकालीन भ्रमण पर जाते थे। यह भी एक संयोग है कि १५ सितम्बर, २०१२ को अपने जन्मस्थान रायपुर में ही उनका देहांत हुआ।
- विजय कुमार

former Sar Sanghchalak of RSS KS Sudarshanji no more


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RSS former Sarasanghachalak KS Sudarshanji no more
Raipur, September 15, 2012 : Former Sarsanghachalak Shri. Sudarshanji breathed his last this morning at 6.55 am at Raipur in Chattisgarh state. He was 81. He went for a morning walk as usual today, returned and was doing his usual course of Yogasana and Pranayama exercise, when he suffered from a massive cardiac attack. The funeral will be held at Nagpur on 16th September 2012 at 3 pm.
Shri. Kupahalli Sitaramayya Sudarshan ji was born on 18 June 1931 at Raipur. He started working as a Pracharak [full time worker of RSS] in 1954. In year 2000 he became Sarsanghachalak. In 2009 he handed over the responsibility to Shri. Mohan ji Bhagwat because of receding health and advancing age.

About Sudarshan ji :
Born on June 18, 1931 in Raipur, it was then part of Madhya Pradesh, at the age of 9, Sudarshan ji joined RSS. He did his Bachelor of Engineering in Telecommunications (honours) from Sagar University. He became RSS- pracharak in 1954. His first posting as a pracharak was in Raigarh district. In 1964, he was become Prant Pracharak of Madhya Bharat at a fairly young age. This was followed by a stint in the North-East (1977) and then, he took over as the Akhil Bharaiya Boudhik Pramukh (chief of RSS think-tank) 2 years later. In 1990, he was appointed Sah-Sarakaryavah (Joint General Secretary) of the organisation. He has the rare distinction of having held both posts of sharirik (physical exercises) and baudhik (intellectual) pramukh on different occasions.
On March 10, 2000 KS Sudarshan ji became 5th Sarsanghachalak (Supreme Chief) of the RSS. He succeeded Prof. Rajendra Singh. He then stepped down on due to ill-health in March 2009. Mohan ji Bhagwat is presently heading the organisation since March 2009.
Condolence message by Shri Bhayyaji Joshi :
With utmost sadness I inform the Swamsevaks and the people of the country about the sad demise of Man. K.S. Sudarshan Ji (former Sar Sanghchalak of RSS). He was 81 years old.
Man. Sudarshan Ji was at Raipur on his routine pravaas. After his morning walk he experienced severe unease and soon his life mission came to an abrupt end.
Man. Sudarshan Ji was an engineer by training. He spent more than five decades in the service of our Motherland as Pracharak. He was Sar Sanghchalak of RSS between 2000 and 2009.
His body will be brought to Nagpur today evening and will be kept for darshan at the Resham Bagh Ground in Nagpur till afternoon tomorrow.
The final journey of his mortal remains will commence at 3 PM tomorrow (September 16, 2012) from Resham Bagh grounds.

-Suresh (Bhayyaji) Joshi
Sar Karyavah, RSS
15 September 2012

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक पूजनीय श्री सुदर्शन जी का निधन


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15 सितंबर 2012 :  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक पूजनीय श्री. सुदर्शन जी का आज, शनिवार सुबह 6:50 पर हृदयाघात से रायपुर प्रवास के दौरान निधन हो गया। वे 81 वर्ष के थे। स्व. श्री. सुदर्शन जी का अंतिम संस्कार कल, रविवार  दिनांक 16 सितंबर 2012  को अपरान्ह 3:00 बजे नागपुर में होगा।
स्व. श्री. सुदर्शन संघ प्रमुख के पद से हटने के बाद से भोपाल में रह रहे थे और संघ के विभिन्न कार्यों में मार्गदर्शक की भूमिका में थे। कल शाम वह एक पुस्तक के विमोचन के सिलसिले में रायपुर गए थे। संयोग से उनका जन्म भी रायपुर में ही हुआ था।
आज सुबह जब अपना नित्य का टहलने का क्रम पूरा कर सुदर्शन जी वापस लौटे तभी उन्हें कुछ थकावट और बैचेनी महसूस हुई। उसके कुछ देर बाद ही उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।
संक्षिप्त परिचयबाल्यकाल से ही अद्भुत प्रतिभा संपन्न तथा अनेक विषयों का गहन अध्ययन अन्वेषक वृत्ति से करनेवाले, कई भाषाओं के मर्मज्ञ, प्रभावी वक्ता, तथा कई पुस्तकों के रचयिता निवर्तमान सरसंघचालक श्री. सुदर्शन जी का जन्म छत्तीसगढ़ प्रान्त के रायपुर नगर में १८ जून १९३१ को हुआ था। आपका पूरा नाम कुप्पहल्ली सीतारामय्या सुदर्शन है। उनका परिवार कर्नाटक प्रान्त का रहने वाला माना जाता है। परन्तु वास्तव में उनके पूर्वज तमिलनाडु के संकेती के रहने वाले है और इसलिए उनकी मातृभाषा तमिल और तेलुगु मिश्रित शकैटी है। सुदर्शन जी के पिताजी श्री. सीतारामय्या मध्य प्रदेश शासन के वन विभाग में सेवारत होने के कारण मध्य प्रदेश आये थे। अपने सेवाकाल में प्रान्त के कई स्थानों पर रहे। उनके साथ रहते हुए ही दमोह, मंडला, रायपुर आदि स्थानों पर सुदर्शन जी की प्राथमिक शिक्षा पूरी हुई। आज के महाराष्ट्र का चंद्रपुर उस समय मध्य प्रदेश में ही हुआ करता था। अत: जब पिता जी चंद्रपुर में पदस्थ थे तब वहां से उन्होंने अपनी हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके पश्चात सन १९५४ में जबलपुर से दूरसंचार विषय में अभियांत्रिकी स्नातक की उपाधि प्राप्त की।
तीन भाई व एक बहन में सबसे बड़े सुदर्शन जी ही थे। बचपन से ही उनका सम्बन्ध संघ से हो गया था। परिणाम यह हुआ की अभियांत्रिकी उपाधि प्राप्त करते ही उन्होंने जीवनभर अविवाहित रहते हुए संघ के माध्यम से समाज कार्य करने के लिए प्रचारक जीवन स्वीकार कर लिया और उनकी पहली नियुक्ति छत्तीसगढ़ प्रान्त के रायगढ़ जिला प्रचारक के रूप में हुई। वे रीवा विभाग प्रचारक भी रहे। १९६४ में ही उन की गुणवत्ता को ध्यान में रखकर उन्हें मध्य भारत के प्रान्त प्रचारक की जिम्मेदारी सौंपी गई।
मध्य भारत के प्रान्त प्रचारक रहते हुए ही सन १९६९ में उन्हें अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख का दायित्व भी दिया गया। सन १९७५ में आपातकाल की घोषणा हुई और पहले ही दिन इंदौर में उन को गिरफ्तार कर लिया गया। पुरे उन्नीस माह उन्होंने कारावास में बिताये। आपातकाल समाप्ति के पश्चात सन १९७७ में उन्हें पूर्वांचल [असम, बंगाल और पूर्वोत्तर राज्य] का क्षेत्र प्रचारक बनाया गया। क्षेत्र प्रचारक के रूप में उन्होंने वहाँ के समाज में सहज रूप से संवाद करने के लिए असमिया, बंगला भाषाओँ पर प्रभुत्व प्राप्त किया तथा पूर्वोत्तर राज्यों के जनजातियों की अलग अलग भाषाओँ का भी पर्याप्त ज्ञान प्राप्त किया। कन्नड़, बंगला, असमिया, हिंदी, इंग्लिश, मराठी, इत्यादि कई भाषाओँ में उन्हें धाराप्रवाह बोलते हुए देखना यह कई लोगों के लिए एक आश्चर्य तथा सुखद अनुभूति का विषय होता था।
सन १९७९ में उन्हें अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख व १९९० में सह-सरकार्यवाह का दायित्व सौंपा गया। अपनी लंबी शारीरिक अस्वस्थता के कारण श्री. राजेंद्र सिंह जी ने १० मार्च २००० को अवकाश लेने की घोषणा करते हुए अपने स्थान पर सुदर्शन जी को सरसंघचालक मनोनीत किया। इतनी प्रतिभा और संघ के सर्वोच्च स्थान पर होने के बावजूद उनकी सहजता व सरलता के कारण समाज के विभिन्न स्तरों के लोग तथा स्वयंसेवक उन्हें विना संकोच मिलकर अपनी अपनी बात रखते थे।
उनके ९ वर्ष के कार्यकाल में संघ के ७५ वर्ष की पूर्ति के निमित्त राष्ट्र जागरण अभियान, द्वितीय सरसंघचालक श्री. गुरूजी की जन्मशती, आदि कई अभियानों के माध्यम से संघ कार्य का विस्तार हुआ। ग्रामविकास के कार्य, स्वदेशी तंत्रज्ञान, आदि विषयों के माध्यम से साम्यवाद तथा पाश्चिमात्य जगत के भौतिकवाद से अलग हटकर हिंदू समग्र चिंतनपर आधारीत विकासपथ के अन्वेषण को उन्होंने प्रोत्साहित किया।
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पूर्व संघचालक माननीय सुदर्शन जी का निधन


कोटा प्रवास के दौरान,पत्रकारवार्ता सम्बोधित करते हुये, माननीय सुदर्शन जी !
माननीय सुदर्शन जी के निधन का समाचार बहुत दुखद है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांती प्रदान करे।
वे प्रखर राष्ट्रवादी और सच्चे वक्ता थे। उन्होने देशहित में कई येशे सत्य कथन कहने का साहस किया जिस पर मीडिया भी मौन था। उन्हे बहुत बहुत श्रृद्धांजली ।


  पूर्व संघचालक के एस सुदर्शन का शनिवार सुबह साढ़े छह बजे छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले में निधन हो गया। नागपुर में रविवार को उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। आरएसएस के प्रवक्ता राम राघव ने बताया कि वह सुबह जब मॉर्निग वॉक से लौट कर आए थे, तभी वह कुछ थकावट और बैचेनी महसूस कर रहे थे। कुछ देर बाद उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। राघव ने बताया कि उनकी पार्थिव देह को अंतिम संस्कार से पूर्व जनता के दर्शनों के लिए रखा जाएगा। उनके निधन पर भाजपा ने शोक जताया है।
सुदर्शन आरएसएस में एक हार्डलाइनर के तौर पर जाने जाते थे। अपने फैसले और कड़े बयानों की वजह से वह हमेशा सुर्खियों में रहे। संघ प्रमुख पद पर रहने के दौरान ही उन्होंने लाल कृष्ण आडवाणी और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पार्टी में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए जगह खाली करने की भी हिदायत दी थी।
सुदर्शन उन संघ प्रमुखों में एक थे, जिन्होंने कभी किसी की परवाह नहीं की और सरकार और पार्टी पर बेबाक टिप्पणी भी की। एनडीए की सरकार के दौरान वह तब सुर्खियों में आए थे, जब उन्होंने सरकार की उसकी गलत नीतियों के चलते कड़ी आलोचना की थी। इसके अलावा भी वह सरकार और पार्टी को समय-समय पर नसीहत देते दिखाई दिए थे।
सर संघचालक पद पर बने रहने के दौरान उन्होंने एक बार कहा था कि वह अपना काम इसलिए बेहतर तरीके से कर पाते हैं, क्योंकि उनके वरिष्ठ उनका पूरा साथ देते हैं।
जीवन परिचय रू-
के एस सुदर्शन का पूरा नाम कुप्पाली सीतारमैया सुदर्शन था। उनका जन्म 18 जून 1931 में तत्कालीन मध्यप्रदेश मौजूदा छत्तीसगढ, के रायपुर जिले में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने सागर विश्वविद्यालय से टेलीकम्यूनिकेशन में बीटेक की डिग्री हासिल की। लेकिन हिंदुत्व की ओर ज्यादा झुकाव होने की वजह से अपनी पढ़ाई से इतर आरएसएस में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए इसमें शामिल हो गए।
सुदर्शन और  आरएसएस
1954 में वह पहली बार आरएसएस से प्रचारक के तौर पर जुड़े थे। इसके दस वर्ष बाद 1964 में उन्हें आरएसएस में मध्य भारत का प्रांत प्रचारक बना दिया गया। 1969 में उन्हें ऑल इंडिया आर्गेनाइजेशन का कंवेनर बनाया गया। वह इस पद पर करीब उन्नीस वर्ष तक रहे। 1990 में उन्हें संघ का  कार्यवाह  नियुक्त किया गया। के एस सुदर्शन 10 मार्च 2000 को आरएसएस के सर संचालक पद के लिए चुने गए थे। वह राजेंद्र सिंह की जगह इस पद के लिए चुने गए थे, उन्हें अपनी खराब सेहत के चलते इस पद से हटना पड़ा था।