मंगलवार, 30 अक्तूबर 2012

केजरीवाल के पीछे : कहीं विदेशी करेंसी ( धन ) का खेल तो नहीं








केजरीवाल के पीछे : कहीं विदेशी करेंसी ( धन ) का खेल तो नहीं
अन्ना आंदोलन को धूलधूसरित कर अपनी धधकती इच्छाओं की ज्वालामुखी में देश के
‘लोकतंत्र’ के प्रति अविश्वास पैदा करने की साजिश में लगी अरविंद केजरीवाल की
टीम निश्चित ही उन लोगों के इशारे पर खेल रही है जिसे भारतमाता से प्यार नहीं है।
केन्द्र सरकार को इस आशय की गंभीर छानबीन करनी चाहिए। केजरीवाल का खेल करेंसी का हो
सकता है। अब जानना यह है कि यह करेंसी भारत की है या फिर भारत को कमजोर करने वाली
शक्तियों की। ‘सुपारी’ किसने दी है यह पता तो डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार को लगाना ही चाहिए।
‘केजरीवाल’ को शायद यह नहीं पता कि जिस दिन उन्होंने राजनीति में आने और चुनाव लड़ने
की घोषणा की उसी दिन उसका सेंसेक्स लुढका ही नहीं, जमीन पर आ गया। स्थिति ध्ाीरे-ध्ाीरे स्पष्ट
होती जा रही है। मुझे ध्यान है कि एक दिन अन्ना ने मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह
के बारे में कहा था कि इन्हें तो पूना भेज देना चाहिए। लेकिन आज हम कहना चाह रहे हैं कि अन्ना
‘‘अरविंद केजरीवाल’’ को कहां रखना चाहेंगे! कहा जाता है कि व्यक्ति को अपने गुणों से समाज
और राष्टन्न् में पूजनीय बनना चाहिए, पर कुछ लोगों की गलतफहमी रहती है कि वे दूसरों के दुर्गुणों
का बखान कर समाज में सत् पुरुष बनना चाहते हैं। आजकल केजरीवाल यही कह रहे हैं। उन्होंने
स्वयं को निष्पक्ष बनाने के लिए जब कांग्रेस के ‘वाडन्न्ा’ के मुंह पर कालिख पोती तो उन्हें लगने
लगा कि कांग्रेस के लोग कहीं यह न कहें कि वह भाजपा के हाथ में खेल रहा है? बस! यह सोचकर
भाजपा के राष्टन्न्ीय श्री अध्यक्ष नितिन गडकरी की जायज बातें, जो वे स्वयं अपने भाषणों में कहते
हैं, को उन्होंने नमक-मिर्च और मसाला लगाकर बताना शुरू कर दिया!
यहां से शुरू हुआ केजरीवाल के निष्पक्ष बनने का सिलसिला। श्री नितिन गडकरी जिस दिन
भाजपा के अध्यक्ष बने, उसी दिन से अपने बारे में, अपने कार्यों के बारे मंे स्वयं बताते हुए सहकारिता
के माध्यम से सहयोग करने और सहकारिता आंदोलन को मजबूत करने की बातें बताने लगे।
‘‘केजरीवाल’’ ने कौन सी नई बातें बतायीं? जो भी बातें अरविंद केजरीवाल ने नितिनजी के बारे
में कहीं, उसकी हवा तो स्वयं केन्द्रीय मंत्री शरद पवार ने यह कहकर निकाल दी कि ‘‘नितिन गडकरी
ने कोई गलत काम नहीं किया।’’ यह टिप्पणी केजरीवाल के मुंह पर करारा तमाचा था। वहीं नितिनजी
ने यह कहकर कि उन पर लगाए गए आरोपों की जांच हो जाए, केजरीवाल की अनैतिकता और साजिश
की पोल खोल दी।
श्री शरद पवार ने सच कहा तो उनकी बेटी सुप्रिया को कठघरे में खड़ा कर दिया। यहां यह
बात साफ हो गई कि राजा हरिश्चन्द्र की भूमिका वाले ‘केजरीवाल’, जिसे हम पहले दिन से समझ
रहे थे, की पोल खुल गई। केजरीवाल वैसे निकले जैसे- सौ-सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली।
अरे, जो अन्ना का नहीं वह देश का क्या होगा? विदेशी ध्ान से देशी लोकतंत्र का गड्ढ़ा खोदने में
लगे केजरीवाल शायद यह भूल गए कि भारत के जन-गण-मन की आत्मा की लोकतंत्र के प्रति
गहरी आस्था है। अतः ऐसे परिपक्व नागरिकों को अरविंद केजरीवाल इन छोटे-मोटे अनर्गल निराध्ाार
आरोपों से कमजोर नहीं कर सकते।
‘‘केजरीवाल’’ है क्या? क्या उनके बारे में लोगों को नहीं मालूम कि वह है अन्ना आंदोलन
का ‘ब्लैक मेलर’’ या यूं कहें कि अन्ना के साथ विश्वासघात करने वाला! जिस ‘अन्ना’ ने अरविंद
केजरीवाल को अपने आंदोलन के आंचल का दूध्ा पिलाकर बड़ा किया, उसने उसी ‘अन्ना’ का साथ
छोड़ अपना नाम निश्चित ही देश के विश्वासघातियों में शामिल कर लिया। एक विश्वासघाती को

केजरीवाल के पीछे कहीं विदेशी करेंसी का खेल तो नहीं क्या दूसरों पर आरोप लगाने का कोई नैतिक अध्ािकार है?‘‘अरविंद केजरीवाल’ चाहता है कि उसकी हरकतों पर देश के लोग गुस्सा उतारंे
और जाने-अनजाने में उसकी कहीं पिटाई हो जाए, जिससे भारत की जनता की उसे भावनात्मक समर्थन मिलना शुरू हो जाए। वह उसी बात की बाट जोह रहा है। लेकिन उसे शायद यह नहीं पता कि उन जैसे कितने आए और कितने गए पर भारत का परिपक्व लोकतंत्र कभी ओछी हरकतें नहीं करता। यह गांध्ाी (सोनिया गांध्ाी का नहीं) का देश है जहां लंगोटी लगाकर बापू ने अंग्रेजों को जनशक्ति के बूते भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। संगीन आरोपों और साजिशों के ढेर पर बैठकर विदेशी ध्ान से स्वदेशी भावना की लड़ाई नहीं की जा सकती। वो तो भला हो उन चैनलों का जिन्होंने समाज के इन ‘‘कुकुरमुŸाों’’ को मुंह लगाकर अपने चैनलों का कीमती समय बर्बाद किया और जनता को भी गुमराह किया। पर भला हो इस देश की जनता जनार्दन का जो सच और साजिश में, भ्रम और यथार्थ में, भ्रांति और भांति में, अनशन- आंदोलन और प्रोपगंडा में अंतर समझती है। ‘‘खुल गई पोल और पिट गई ढोल!’’ खाल ओढ़कर शेर की भूमिका अदा करना और जमीन पर जंगल में रहते हुए अपना खौफ़ बनाए रखना, सामान्य बातें नहीं होतीं। ‘‘शेर की खाल में... निकला’’ खोदा पहाड़ निकली चुहिया। पर देश का कीमती समय, अमूल्य मानव संसाध्ान और देश को भावनात्मक ब्लैकमेल करने वाला भांडा बहुत शीघ्र फूट गया। यह व्यक्ति के लिये, राजनीति के लिये, राजनैतिक दलों के लिए कितना अच्छा हुआ, यह तो पता नहीं पर इतना अवश्य गर्व से कहा जा सकता है कि भारतीय लोकतंत्र के लिये, उसकी मर्यादा के लिये ‘‘केजरीवाल’’ की पोल खुलना अच्छा ही रहा।

30 अक्टूबर 1990 : शहीद कारसेवको शत-शत नमन


याद रहे कारसेवक शहीदों का बलिदान  

 
!! 30 अक्टूबर 1990 !!
कुंवर ऋतेश सिंह (विश्व हिन्दू परिषद्)
आज ही के दिन अयोध्या में मुल्ला-यम सरकार ने निहत्थे कारसेवकों पर गोलिया चलवाई थी जिसमे ६ कारसेवक शहीद हो गए थे.
आइये अब आप सब को
बताते है की उस दिन अयोध्या में हुआ क्या था ???
३० अक्टूबर १९९० को विश्व हिन्दू परिषद् ने गुम्बद नुमा ईमारत को हटाने के लिए कारसेवा की शुरुआत की.
आल इंडिया बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ,कांग्रेस पार्टी,मार्क्सवादी पार्टी और कुछ छद्म धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के द्वारा इस कारसेवा को समूचे विश्व में मस्जिद के लिए खतरा बताया गया.
जबकि ये सर्वविदित है की अयोध्या "राम लला" की जन्मस्थली है और उस जन्मस्थली को तोड़कर वह एक अवैध मस्जिद नुमा ईमारत का निर्माण किया गया था.
परन्तु मुस्लिम वोटो के लालच में तत्कालीन प्रधानमंत्री "विपी सिंह" और उस समय के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री "मुल्ला-यम सिंह" मस्जिद बचाने की दौड़ में शामिल हो गए.
लगभग ४० हजार CRPF के जवान और २ लाख ६५ हजार सुरक्षा बलों के भारी भरकम सुरक्षा के बावजूद लगभग १ लाख कारसेवक सुबह के ७ बजे अयोध्या पहुँच गए. कारसेवकों ने सरयू नदी के पुल पर चलना शुरू किया और तभी पुलिस वालो ने उन पर लाठी चार्ज शुरू कर दिया. बावजूद इसके कारसेवक तनिक भी ना डरे और नहीं भागे.
दिन के लगभग ११ बजे तक अयोध्या जैसे छोटे से शहर में कारसेवको की संख्या ३ लाख को पार कर गयी. पुलिस के जवानों ने कारसेवको पर हमला करने के बजाय उनका सम्मान सुरु कर दिया.
पुलिस महानिदेशक ने पुलिस के जवानों को कारसेवको पर हमला करने के लिए उकसाया और पुलिस ने कारसेवको के ऊपर अश्रु गैस के गोलों से हमला करना शुरू किया.
और तभी पुलिस महानिदेशक ने खुद निहत्थे साधुओं पर लाठी चार्ज शुरू कर दिया .
ये देख कर कारसेवक भड़क गए और वे सारे बैर केडिंग को तोड़कर जन्मस्थान तक पहुंचा गए और तभी पुलिस ने बिना किसी सुचना के उन पर गोली चलानी शुरू कर दिया. बावजूद इसके कारसेवक अपने लक्ष्य तक पहुँच चुके थे. और तब पुलिस ने उन पर सीधे गोलिया बरसानी सुरु कर दी.
इस गोलीबारी में कम से कम १०० कारसेवक शहीद हो गए और कई लापता हो गए. बाद में कई कारसेवकों की लाशे सरयू नदी में तैरती मिली. उनकी लाशों को बालू के बोरो से बांध दिया गया था ताकि वो तैर कर ऊपर ना आ सके.यजा तक की औरतो और साधुओं तक को नहीं छोड़ा गया.
"मुल्ला-यम" सिंह ने एक ऐसा घृणित कार्य किया जो उसे बाबर,औरंगजेब और गजनवी के समक्ष ला कर खड़ा कर दे.
हर हिन्दू अपनी अंतिम साँस तक मुल्ला-यम जैसे गद्दार को कभी नहीं माफ़ करेगा जिसने मुस्लिम वोटो के लिए अपने धर्म से गद्दारी की और निहत्थे कारसेवकों की हत्या की ..!!

!! उन शहीद कारसेवको शत-शत नमन !!
!! राम लला हम आएंगे मंदिर वही बनायेंगे !!
जय श्री राम

ख़म ठोक ठेलता हे जब नर, पर्वत के जाते पांव उखड





श्री कृष्ण का दूत कार्य
(समय निकाल कर अवश्य पड़े )
हे कौन विघ्न ऐसा जग में,टिक सके आदमी के मग में |
ख़म ठोक ठेलता हे जब नर, पर्वत के जाते पांव उखड ||१ ||
मानव जब जोर लगाता हे, पत्थर पानी बन जाता हे |
गुण बड़े एक से एक प्रखर ,हे छिपे मानव के भीतर ||२||
मेहंदी में जैसे लाली हो , वर्तिका बीच उजियारी हो |
बत्ती जो नहीं जलाता है रौशनी नहीं वो पता हे ||३||
पीसा जाता जब इक्षुदंड बहती रस की धरा अखंड |
मेहंदी जब सहती प्रहार बनती ललनाओ का श्रृंगार ||४||
जब फूल पिरोये जाते है हम उनको गले लगाते है |
कंकड़िया जिनकी सेज सुघर छाया देता केवल अम्बर ||५||
विपदाए दूध पिलाती है लोरी आंधिया सुनाती है |
जो लाक्षाग्रह में जलते है वही सूरमा निकलते है ||६||
वर्षो तक वन में घूम घूम , बाधा विघ्नों को चूम चूम |
सह धुप छाँव पानी पत्थर,पांडव आये कुछ और निखर ||७||
सोभाग्य न सब दिन सोता है, देखे आगे अब क्या होता है |
मैत्री की रह बताने को सबको सुमार्ग पर लाने को ||८||
दुर्योधन को समझाने को भीषण विध्वंश बचाने को |
भगवान हस्तिनापुर आये पांडवो का संदेशा लाये |
दो न्याय अगर तो आधा दो पर इसमे भी यदि बाधा हो |
दे दो हमको पांच ग्राम रखो अपनी भूमि तमाम |
हम वही ख़ुशी से खायेंगे परिजन पर असी न उठाएंगे |
दुर्योधन वह भी दे न सका आशीष समाज की ले न सका |
उलटे हरी को बाँधने चला जो था असाध्य साधने चला |
जब नाश मनुज पर छाता है पहले विवेक मर जाता |
हरी ने भीषण हुंकार किया अपना स्वरुप विस्तार किया |
डगमग डगमग दिग्गज बोले भगवान् कुपित होकर बोले |
जंजीर बड़ा आ बाँध मुझे हाँ हाँ दुर्योधन साध मुझे |
यह देख गगन मुझमे लय है ये देख पवन मुझमे लय है |
मुझमे विलीन संसार सकल मुझमे लय है झंकार सकल |
अमरत्व फूलता है मुंह में, संहार झूलता है मुझमे
उदयाचल मेरे दीप्त भाल ,भू–मंडल वक्ष–स्थल विशाल
भुज परिधि बाँध को घेरे है, मीनाक मेरु पग मेरे है
दीप्त जो ग्रह नक्षत्र निखर, सब है मेरे मुह के अन्दर
दृग हो तो दृश्य अखंड देख, मुझमे सारा ब्रह्माण्ड देख
चर –अचर जीव,जग क्षर अक्षर, नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर
शत कोटि सूर्य ,शत कोटि चन्द्र, शत कोटि सरित सर सिन्धु मन्द्र
शत कोटि ब्रह्मा विष्णु महेश, शत कोटि जलपति जिष्णु धनेश
शत कोटि रूद्र शत कोटि काल, शत कोटि दंड धर लोकपाल
जंजीर बड़ा कर साध इन्हें, हाँ हाँ दुर्योधन बाँध इन्हें
भूतल अतल पाताल देख, गत और अनागत काल देख
यह देख जगत का आदि सृजन, यह देख महाभारत का रण
मृतकों से पटी हुई भू है, पहचान कहा इसमें तू है ?
अम्बर का कुंतल जाल देख ,पद के निचे पातळ देख
मुट्ठी में तीनो काल देख, मेरा स्वरुप विकराल देख
सब जन्म मुझी से पाते है फिर लौट मुझी में जाते है |
जिह्वा से कोंधती ज्वाल सघन, साँसों से पाता जन्म पवन
पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर, हंसने लगती है सृष्टि उधर
मै जब मोड़ता हूँ लोचन, छा जाता चारो ओर मरण
बाँधने मुझे तू आया है, जंजीर बड़ी क्या लाया है ?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन, पहले तू बाँध अनंत गगन
शुन्य को साध न सकता है, वो मुझे बाँध कब सकता है ?
हितवचन नहीं तुने माना मैत्री का मूल्य नहीं पहचाना |
तो ले में भी अब जाता हूँ अंतिम संकल्प सुनाता हूँ |
याचना नहीं अप रण होगा भीषण विध्वंश प्रबल होगा |
टकरायेंगे नक्षत्र निखर बरसेगी भू पर व्ही प्रखर |
फन शेषनाग का डोलेगा विकराल काल मुह खोलेगा |
दुर्योधन रण ऐसा हो फिर कभी नहीं जैसा होगा |
भाई पर भाई टूटेंगे विष बाण बूँद से छूटेंगे |
सोभाग्य मनुज के फूटेंगे वायस श्रगाल सुख लूटेंगे |
आखिर तो भूशाई होगा हिंसा का परिचायी होगा |
थी सभा सन्न सब लोग डरे ,चुप थे या थे बेहोश पड़े |
केवल दो नर न अघाते थे भीष्म विदुर सुख पाते थे |
कर जोड़ खड़े प्रमुदित्त निर्भय, दोनों पुकारते थे जय जय || इति ||