शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

'सब्जी मंडी' बनी सियासत :अश्विनी कुमार

आज पंजाब केसरी का संपादकीय ,
देश के राजनैतिक वातावरण में आई
नैतिक पतन के ऊपर बड़ा सच है ।
हम संपादक जी अश्विनी कुमार को धन्यवाद देते हुए
साभार सहित संपादकीय को यथावत यहाँ प्रस्तुत करते हें :-
सम्पादकीय पंजाब केसरी अश्विनी कुमार
http://www.punjabkesari.com/Article_Minnaji/Main_Article.htm
विशेष लेख
'सब्जी मंडी' बनी सियासत
अश्विनी कुमार

क्या कमाल किया है एक गैर राजनीतिज्ञ कहे जाने वाले प्रधानमन्त्री ने कि पूरे मुल्क की सियासत को 'सब्जी मंडी' में बदल दिया है। क्या आंखें बन्द करके यह मुल्क बाजारवाद के साथ चला कि अब सभी को लग रहा है कि हम महान भारत के नागरिक हैं या दुनिया के सबसे बड़े बाजार के? क्या हिसाब से खुले बाजार की नीतियों के साथ भारत में अराजकता को बढ़ावा दिया जा रहा है? सरकार को कार्पोरेट घराने चला रहे हैं और सरकार उनकी एजैंट बनी हुई है। हम भूल रहे हैं कि यह मुल्क उस पं. नेहरू का है जिसने इस देश की भूखी और गरीब जनता से यह कहा था कि घबराने की जरूरत नहीं है, हम गरीब मुल्क नहीं हैं, हमारे अन्दर वह ताकत है जिसके बूते पर पूरी दुनिया में हम आगे बढ़ सकते हैं। हम भूल गये कि यह देश उस इन्दिरा गांधी का है जिसने डंके की चोट पर ऐलान किया था कि भारत को पूर्वी पाकिस्तान (अब बंगलादेश) के लोगों की मदद करने से दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती। हम यह भी भूल गये कि हमने अपने बूते पर इन्दिरा जी के शासनकाल में ही पैट्रोलियम पदार्थों के उत्पादन में आत्मनिर्भर होने की पूरी योजना तैयार कर ली थी। हम यह भी भूल गये कि जमशेदपुर में स्टील कारखाना लगाने के लिए किस प्रकार टाटा समूह के संस्थापक जमशेद टाटा ने स्वयं लन्दन जाकर ब्रिटेन की महारानी से वहां की जमीन के पट्टे अपने नाम लिखाये थे। हमने 1991 में आम खाने के लालच में बबूल का पौधा अपनी जमीन में इस प्रकार रोपा कि आज पूरे देश में कांटे-कांटे ही बिखरे पड़े हैं। यह अर्थशास्त्र का सिद्धान्त है कि वह सीधे राजनीति को प्रभावित करता है। हमने एक अर्थशास्त्री को गद्दी पर बैठा कर सोचा कि वह राजनीति में कोरा होने की वजह से इस देश की राजनीतिक प्रणाली को प्रभावित नहीं कर पायेगा मगर उसने ऐसी नीतियों का जाल बनाया कि पूरी राजनीति उसी के जंजाल में फंस कर रह गई और आज आलम यह है कि इस देश की 70 प्रतिशत जनता से कहा जा रहा है कि रोजाना सिर्फ 29 रुपए कमा
कर तुम गरीब नहीं हो सकते इसलिए आराम से जियो और मौज करो। दूसरी तरफ कुछ लोग सड़कों पर निकल कर शोर मचा रहे हैं कि मुल्क की सम्पत्ति को लूटा जा रहा है। निजी कम्पनियों ने लूट का बाजार गर्म कर रखा है मगर कोई इनसे यह तो पूछे कि ऐसा सब हो किस वजह से रहा है? इसका जवाब देने के लिए इनके पास अल्फाज नहीं हैं क्योंकि ये खुद भी किसी न किसी कम्पनी के हाथ के खिलौने बने हुए हैं। ये लोग स्वयं मौजूदा प्रणाली के पक्के और पुख्ता तौर पर समर्थक हैं तभी तो चुन-चुन कर केवल यही उजागर कर रहे हैं कि रिलायंस या टाटा समूह राजनीतिज्ञों से मिल कर नाजायज फायदा उठा रहे हैं।
सवाल यह है कि जब देश की आर्थिक नीतियां बना ही ऐसी दी गई हैं कि सरकार की जिम्मेदारी निजी कम्पनियां संभालेंगी तो राजनीति में कारोबारी को घुसने से कौन रोक सकता है। क्या पिछले वाजपेयी शासन के दौरान ऐसा नहीं हो रहा था जब देश की सार्वजनिक कम्पनियों को कौडिय़ों के दाम बेचा जा रहा था? असली सवाल तो नीतियों का है और इन नीतियों को लागू करने वाले डा. मनमोहन सिंह को केजरीवाल एंड पार्टी क्लीन चिट देकर कह रही है कि उन्हें कांग्रेसियों ने फंसा कर रखा हुआ है। सवाल यह है कि मनमोहन सिंह को फंसने के लिए कहा किसने है? जाहिर है कि खेल बहुत बड़ा है और सब कुछ इस देश की संसदीय लोकतन्त्र प्रणाली को धार पर रख कर खेला जा रहा है। अगर ऐसा न होता तो क्यों जुलाई 2008 में मनमोहन सरकार अमरीकी परमाणु करार के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त करती?
जरा ध्यान से सोचिये कि क्यों अरविन्द केजरीवाल एंड पार्टी खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश के मुद्दे पर मनमोहन सिंह का विरोध न करके केवल भ्रष्टाचार के सतही मामलों की तरफ लोगों का ध्यान आकृष्ट रखना चाहती है? क्यों यह मनमोहन सिंह की खुले बाजार की अन्तर्निहित भ्रष्ट व्यवस्था से लोगों का ध्यान हटा कर निजी व्यक्तियों के कारनामों पर ध्यान केन्द्रित करने के काम में लगी हुई है? हकीकत तो यह है कि मनमोहन सिंह की खुले बाजार की नीतियों ने राज्यों के मुख्यमन्त्रियों को 'प्रोपर्टी डीलर' बना कर रख दिया है तो फिर चाहे किसी भी पार्टी का मुख्यमन्त्री हो वह बहती गंगा में हाथ धोये बिना कैसे रहेगा? जहां तक भाजपा और कांग्रेस का सवाल है तो मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियां कांग्रेस की हैं ही नहीं। ये तो 1951 में लिखे गये जनसंघ के घोषणापत्र की नीतियां हैं जिनमें बाजारमूलक अर्थव्यवस्था की पैरवी की गई है। यही तो कमाल करती है खुली बाजार अर्थव्यवस्था कि यह सभी राजनैतिक दलों का भेद भी मिटा देती है। जरा सोचिये कि किसानों की जमीन अधिग्रहण के मुद्दे पर संसद में पेश होने वाले विधेयक के बारे में भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने वाले लोग चुप क्यों हैं?
 

कांग्रेस के गले की फांस बन सकता है 90 करोड़ का ऋण : अरुण जेटली





कांग्रेस के गले की फांस बन सकता है 90 करोड़ का ऋण : अरुण जेटली

 पंजाब केसरी का समाचार 
Date: 2012-11-02
 कांग्रेस के गले की फांस बन सकता है 90 करोड़ का ऋण : जेटली










http://www.punjabkesari.in
शिमला : एसोसिएटड जनरल प्रकाशन समूह को कांग्रेस पार्टी द्वारा कथित रूप से 90 करोड़ रुपए का ऋण दिए जाने की बात सामने आने पर एक ओर कांग्रेस पार्टी द्वारा राजनीतिक पार्टी के रूप में अपने पंजीकरण संबंधी नियमों का उल्लंघन किए जाने का मामला बन गया है, वहीं दूसरी ओर आयकर में छूट लेकर कांगे्रस पार्टी को चंदा देने वाले लोगों और संस्थाओं के लिए यह अपने आप में एक नई मुसीबत खड़ी हो गई है। यह बात शुक्रवार को पीटरहाफ होटल में आयोजित अपने एक संवाददाता सम्मेलन में भाजपा के राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली  ने कही।

भाजपा नेता ने गत दिवस जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा कांग्रेस के शीर्ष नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर लगाए आरोपों का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हीं आरोपों से जुड़े एक अन्य चौंकाने वाले मामले में कहा गया है कि कांग्रेस पार्टी द्वारा एसोसिएटड जनरल प्रकाशन समूह को 90 करोड़ रुपए की राशि का ऋण दिए जाने का उल्लेख किया गया है। जेतली ने कहा कि यदि ऋण दिए जाने वाली बात तथ्यों पर आधारित है तो कांग्रेस पार्टी तथा उसे चंदा देने वाले लोगों के लिए इसे आने वाली एक नई मुसीबत का नाम दिया जा सकता है। उन्होंने इस मामले में निष्पक्ष जांच की मांग की है।

उनका कहना था कि वर्तमान नियमों के अंतर्गत कोई भी राजनीतिक दल किसी व्यावसायिक कार्य में पूंजी निवेश नहीं कर सकता है क्योंकि राजनीतिक पार्टी अपने धन को केवल राजनीतिक कार्य पर ही खर्च कर सकती है। कांग्रेस नेता वीरभद्र सिंह पर लगाए गए आरोपों के बारे में जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने बताया कि वीरभद्र सिंह अभी तक खुद पर लगे आरोपों के बारे में एक भी स्पष्टीकरण नहीं दे
पाए हैं।

पति की लम्बी उम्र और अखंड सौभाग्य का पर्व : करवाचौथ





देशभर की महिलाओं ने आज अपने पति की दीर्घायु के लिए दिन भर भुखे -प्यासे रहते हुए करवा चौथ का व्रत रखा। बांसवाडा मे व्रती महिलाएं छलनी से चाँद का दर्शन करते हुए। फोटोः भँवर गर्ग
 

आज करवा चौथ की राम राम सा....
प्रत्येक सुहागन के लिये आज का दिन अविस्मरणीय
भारतीय नारी का अदभुद नैतिक सहास ही
हमारे समाज की पवित्र जीवन व्यवस्था का आधार है।
करवा चौथ के शुभ अवसर पर नमन् और बधाई।

पति की लम्बी उम्र और अखंड सौभाग्य का पर्व : करवाचौथ
करवाचौथ पर्व की तैयारियों को लेकर बाजारों में दिनभर चहल-पहल रही। महिलाओं में पर्व को लेकर जबरदस्त उत्साह देखा गया। कारीगरों / ब्यूटीशियन / पार्लरों के पास महिलाएं लाइन लगाकर मेहंदी लगवाने के लिए उत्साहित दिखाई दीं।
महिलाओं के अखंड सौभाग्य का प्रतीक करवा चौथ व्रत की कथा कुछ इस प्रकार है-
बहुत समय पहले की बात है, एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन करवा थी। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। यहाँ तक कि वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे। एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी। शाम को भाई जब अपना व्यापार-व्यवसाय बंद कर घर आए तो देखा उनकी बहन बहुत व्याकुल थी। सभी भाई खाना खाने बैठे और अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे, लेकिन बहन ने बताया कि उसका आज करवा चौथ का निर्जल व्रत है और वह खाना सिर्फ चंद्रमा को देखकर उसे अर्घ्‍य देकर ही खा सकती है। चूँकि चंद्रमा अभी तक नहीं निकला है, इसलिए वह भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी है।
सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं जाती और वह दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर वह ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे चतुर्थी का चाँद उदित हो रहा हो। इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि चाँद निकल आया है, तुम उसे अर्घ्य देने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर चाँद को देखती है, उसे अर्घ्‍य देकर खाना खाने बैठ जाती है।
वह पहला टुकड़ा मुँह में डालती है तो उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है तो उसमें बाल निकल आता है और जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुँह में डालने की कोशिश करती है तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। वह बौखला जाती है। उसकी भाभी उसे सच्चाई से अवगत कराती है कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं और उन्होंने ऐसा किया है।
सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है।
एक साल बाद फिर करवा चौथ का दिन आता है। उसकी सभी भाभियाँ करवा चौथ का व्रत रखती हैं। जब भाभियाँ उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से 'यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो' ऐसा आग्रह करती है, लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने का कह चली जाती है।
इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आती है तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है। यह भाभी उसे बताती है कि चूँकि सबसे छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था अतः उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है, इसलिए जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे, उसे नहीं छोड़ना। ऐसा कह के वह चली जाती है।
सबसे अंत में छोटी भाभी आती है। करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करती है, लेकिन वह टालमटोली करने लगती है। इसे देख करवा उन्हें जोर से पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिए कहती है। भाभी उससे छुड़ाने के लिए नोचती है, खसोटती है, लेकिन करवा नहीं छोड़ती है।
अंत में उसकी तपस्या को देख भाभी पसीज जाती है और अपनी छोटी अँगुली को चीरकर उसमें से अमृत उसके पति के मुँह में डाल देती है। करवा का पति तुरंत श्रीगणेश-श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है। इस प्रकार प्रभु कृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है। हे श्री गणेश माँ गौरी जिस प्रकार करवा को चिर सुहागन का वरदान आपसे मिला है, वैसा ही सब सुहागिनों को मिले।

सरकार रिलायंस के जबर्दस्त दवाब में : रिलांयस के एल पी जी सिलेंडरों को बिकवानें का मार्किट तैयार करवाने की सरकारी साजिस

मुझे लगता हे की सरकार रिलायंस के जबर्दस्त दवाब में हे और एल पी जी सिलेंडरों की सीलिंग के पीछे भी, रिलांयस के एल पी जी सिलेंडरों को बिकवानें  का मार्किट तैयार करवाने की सरकारी साजिस प्रतीत होती हे ....
इन दो खबरों को पड़ें और एनालिसिस करें ...दिमाग को खुला छोड़ें और सोचें .... 

अब रिलायंस बेचेगी सस्ते में LPG सिलेंडर!
Date:- 23-10-2012

http://www.punjabkesari.in/news
मुंबई: सरकार ने जब से सबसिडी वाले सिलेंडरों की गिनती तय कर दी है, तब से लोग इसी कोशिश में हैं कि किसी तरह उन्हें कम कीमत पर अधिक सिलेंडर मिल पाएं। हालांकि कई कुछ राज्यों में सस्ते सिलेंडरों की गिनती छह से नौ कर दी गई है, पर कुछ राज्यों में लोगों को महंगी एलपीजी से ही गुजारा करना पड़ेगा। ऐसे में इन लोगों के लिए यह खबर खुशखबरी साबित हो सकत है। सूत्रों से जानकारी मिली है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज की घरेलू रसोई गैस के रिटेल कारोबार में उतरने की तैयारी में है। सूत्रों के मुताबिक अनसब्सिडाइज्ड एलपीजी मार्केट में पकड़ बनाने के लिए रिलायंस इंडस्ट्रीज आकर्षक कीमतें तय करेगी। गुजरात और महाराष्ट्र से कंपनी एलपीजी कारोबार शुरू करेगी। कंपनी के पास बाजार भाव पर 200-300 रुपये का मार्जिन है।

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 रिलायंस को केजी-डी6 गैस दाम पर बड़ी राहत
रिलायंस को केजी-डी6 गैस दाम पर बड़ी राहत
Date:-  22-10-2012
http://www.punjabkesari.in/news
केजी-डी6 से रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड को उत्पादित गैस का बेहतर दाम मिलना लगभग तय हो गया है। हालांकि उसे गैस का बेहतर दाम अप्रैल, 2014 से मिलेगा। प्रधानमंत्री कार्यालय ने आदेश दिया है कि कंपनी को गैस का बाजार मूल्य तलाशने का मौका दिया जाए, जैसा कि कांट्रैक्ट की शर्तों में कहा गया है। हालांकि पेट्रोलियम मंत्रालय अप्रैल, 2014 से पहले केजी-डी6 से उत्पादित गैस के दाम में किसी तरह की बढ़ोतरी के सख्त खिलाफ है। प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव पुलोक चटर्जी की अध्यक्षता वाली एक बैठक में 24 सितंबर, 2012 को यह फैसला लिया गया।
इसमें कहा गया है कि कंपनी को नीलामी के जरिए गैस का उचित मूल्य तलाशने का मौका मिलना चाहिए, और यह देखना चाहिए कि उसके ग्राहक मौजूदा दाम के मुकाबले और बेहतर कीमत अदा करने को तैयार हैं या नहीं। केजी-डी6 से उत्पादित गैस के लिए आरआईएल को फिलहाल प्रति 10 लाख मीट्रिक ब्रिटिश थर्मल यूनिट के लिए 4.2 डॉलर (औसत 50 रुपए प्रति डॉलर के लिहाज से 210 रुपए) का दाम मिल रहा है। अप्रैल, 2014 में इस दाम की समीक्षा प्रस्तावित है। घटनाक्रम से जुड़े सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा है कि प्रोडक्शन शेयरिंग कांट्रैक्ट (पीएससी) में वर्णित प्रावधानों के तहत कंपनी को उचित दाम तलाशने की प्रक्रिया की अनुमति दी जानी चाहिए।
पीएससी के तहत आरआईएल जैसे कांट्रैक्टरों को खुले और पारदर्शी तरीके से गैस का उचित दाम तलाशने की छूट मिली हुई है। इस तरह से हासिल दाम को बाद में सरकार के पास मंजूरी के लिए भेजा जाता है। सूत्रों का कहना था कि इस वर्ष जनवरी में आरआईएल ने केजी-डी6 से उत्पादित गैस के दाम में तत्काल बढ़ोतरी की गुहार लगाई थी। उसके बाद जून में कंपनी ने इस मांग में थोड़ा बदलाव किया था। तब कंपनी ने कहा था कि उसे अप्रैल 2014 की पहली तारीख से भारत द्वारा लिक्वीफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) के आयात के लिए चुकाए गए दाम के बराबर दाम मिलना चाहिए।
आरआईएल प्रति 10 लाख मीट्रिक ब्रिटिश थर्मल यूनिट के लिए जापान कस्टम्सक्लयर्ड क्रूड (जेसीसी) का 12.67 फीसदी और अतिरिक्त 0.26 डॉलर की मांग कर रही है। इस हिसाब से अगर तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल हो,तो आरआईएल द्वारा गैस की मांगी गई कीमत 12.93 डॉलर प्रति 10 लाख मीट्रिक ब्रिटिश थर्मल यूनिट है। सूत्रों के मुताबिक आरआईएल को अपने ग्राहकों से निविदा आमंत्रित करने को कहा जा सकता है, कि वे इस नई कीमत के लिए तैयार हैं या नहीं। इनमें मुख्य रूप से बिजली व फर्टिलाइजर क्षेत्र के ग्राहक होंगे।