सोमवार, 12 नवंबर 2012

स्वामी विवेकानन्दजी की 150 वीं जयंति : ‘‘भारत जागो! विश्व जगाओ!!’’



यह जानकारी जनहित में ली गई .............
- अरविन्द सिसोदिया 09414180151

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

सहभाग का आह्वान

भारतमाता के महान सपूत जो आगे चल कर विश्व के आदर्श बने ऐसे स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, ‘‘ना तो मैं भविष्य में देखता हूँ ना ही भविष्य की चिन्ता करता हूँ। किन्तु एक दृश्य मेरे सम्मुख जीवित स्पष्टता से दिखाई देता है कि हमारी यह प्राचीन भारतमाता पुनः एक बार जागृत हो चुकी है और अपने सिंहासन पर पूर्व से भी अधिक आलोक के साथ विराजमान है। आइए! शान्ति एवं मंगल वचनों से पूरे विश्व के सम्मुख इसकी उद्घोषणा करें’’
स्वामीजी की 150 वीं जयंति हम सब के लिये राष्ट्रीय महायज्ञ में योगदान का अवसर है। हमारे समर्पण से समस्त मानवता के जागरण में सहयोग होगा और स्वामीजी का स्वप्न ‘‘भारत जागो! विश्व जगाओ!!’’ साकार होगा।
आप भी सहभागी बन सकते हैं।
  •  प्रकाशनों को प्रायोजित कर
  •  होर्डिंग, स्टीकर्स, पोस्टर, पत्रक तथा विज्ञापनों के माध्यम से समारोह का संदेश प्रचारित कर
  •  आगामी दो वर्ष पूर्णकालिक के रूप में समय देकर
  •  अपने नगर में समारोह के आयोजन हेतु कार्यकर्ता के रूप में पंजीयन कर
  •  दान देकर व संग्रह में सहयोग कर
  •  कार्यालय, कार्यक्रम, साहित्य विक्रय के लिये स्थान उपलब्ध करा कर
  •  प्रदर्शनियों तथा प्रचार सामग्री के सज्जांकन में सहयोग कर
  •  विवेक ग्राम, विवेक बस्ती को गोद ले कर
  •  
  • बृहस्पतिवार, 22 दिसम्बर 2011

    पंचमुखी कार्यक्रम

    1. युवा शक्ति:
    ‘‘मेरा विश्वास आधुनिक युवा पीढ़ी में है। उनमें से मेरे कार्यकर्ता आएंगे और सिंह के समान सभी समस्याओं का समाधान करेंगे।’’ ऐसा स्वामी विवेकानन्द का विश्वास था। आज पूरे विश्व में भारत ही एकमात्र देश है जिसकी पचपन प्रतिशत आबादी युवा है। चिरयुवा प्राचीन भारत!!
    स्वामीजी की सार्ध शती के अवसर पर 40 वर्ष की आयु से कम छात्र व गैर छात्र युवाओं द्वारा विवेकानन्द क्लब/विवेकानन्द युवा मंडली को प्रारंभ किया जाएगा। ये सेवा, आत्मविकास, अध्ययन, सुरक्षा व समरसता इन पाँच आयामों को अभिव्यक्त करते हुए कार्यक्रमों का आयोजन करेंगे।
    देश के सभी शहरों में एकसाथ सामूहिक सूर्यनमस्कार महायज्ञ तथा अखिल भारतीय निबन्ध प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जायेगा।
    2. प्रबुद्ध भारत - सामाजिक व वैचारिक नेतृत्व:
     स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, ‘‘वे ही जीवित हैं जो दूसरों के लिए जीते हैं अन्यथा तो सभी मृतप्रायः हैं।’’ समाज के अग्रणी एवं प्रबुद्ध वर्ग पर राष्ट्रनिर्माण का महान दायित्व होता है। समाज के सभी क्षेत्रों में से इन वैचारिक पुरोधाओं तथा अभिमत निर्माताओं को जोड़ने के लिये निम्न कार्यक्रम आयोजित होंगे।
    1. विमर्श व्याख्यानमाला: सामायिक विषयों पर
    2. योग प्रतिमान- वरिष्ठ व्यावसायिक, सरकारी अधिकारी, सुरक्षाबल, अर्द्धसैनिक बल, जनप्रतिनिधि, शाला प्रबंधन, धार्मिक स्थानों के व्यवस्था प्रमुख, गैर शासकीय संस्थाओं (एनजीओ) के प्रमुख आदि के लिये योग पर आधारित विशेष प्रतिमान।
    3. सेमिनार - राज्य, राष्ट्रीय, अंतर राष्ट्रीय स्तर पर स्वामी विवेकानन्द, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक मुद्दे तथा तात्कालिक महत्वपूर्ण विषयों पर सेमिनार तथा परिचर्चायें
    4. प्रबुद्धजनों और शिक्षाविदों द्वारा प्रसार माध्यमों में स्वामी विवेकानन्द के चरित्र निर्माणकारी संदेश के बारे में लेख व व्याख्यान।
    3. ग्रामायण -गाँव की ओर चलें:
    ‘‘नया भारत निकल पड़े... फिर निकले पड़े गाँववासी की झोंपड़ी से हल पकड़कर; मछुआरे की झुग्गी से निकल पड़े; . . . परचुन की दुकान से, भड़भूंजे के भाड़ से निकल पड़े नया भारत। नया भारत उभरे गुफओं और जंगलों से, पर्वतों और पहाड़ों से।’’ भारतीय व्याख्यानों में स्वामी विवेकानन्द ने यह आहवान किया था।
    ग्राम समितियों का गठन किया जायेगा। उनके द्वारा भारतमाता पूजन, कथा कीर्तन, मेला, ‘मेरा गाँव मेरा तीर्थ’ आदि कार्यक्रमों का आयोजन होगा।
    अस्पृश्यता, व्यसन, मतांतरण, पुलिस/कोर्ट तथा रासायनिक खाद पर निर्भरता से मुक्त ‘विवेक ग्राम’, ‘विवेक बस्ती’ के विकास हेतु दीर्घकालीन प्रकल्प।
    4. संवर्धिनी - महिला सहभाग:
    स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, ‘‘शक्ति के बिना विश्व का पुनरुत्थान संभव नहीं है। ऐसा क्यों है कि हमारा देश सभी देशों में कमजोर और पिछड़ा हुआ है?- क्योंकि यहां शक्ति का अपमान होता है। शक्ति की कृपा के बिना कुछ भी साध्य नहीं होगा।’’
    अतः महिलाओं के माध्यम से संस्कृति के संर्वद्धन सुरक्षा व सम्पे्रषण के लिए तथा उनकी सहभागिता को बढ़़ाने के उद्देश्य से समाज के विभिन्न स्तरों में सहभागिता, सेवा, विकास, संस्कृति तथा समरसता को प्रोत्साहित करने के लिए कार्यक्रम आयोजित हांेगे।
    1. दम्पत्ति सम्मेलन - आधे या एक दिन के सम्मेलन में महिलाआंे की समाज जागरण में भूमिका तथा पुरुषों के घर और समाज में योगदान पर चर्चा होगी।
    2. शक्ति सम्मेलन -  महिला सम्मेलनों के अन्तर्गत-
    (क) प्रदर्शनियाँ- ‘इतिहास के भिन्न-भिन्न कालखंडों में भारतीय मातृशक्ति’, ‘भारतीय वीरांगनायें’, ‘विविध क्षेत्रों में महान नारियाँ’ आदि विषयों पर।
    (ख) व्याख्यान, सेमिनार, कार्यशालाएं- विषय - महिला सहभागिता।
    5. अस्मिता - जनजातिय समाज :
    ‘‘राष्ट्र का भवितव्य जनसामान्य की दशा पर निर्भर करता है। क्या तुम उन्हें ऊपर उठा सकते हो?उनके आतंरिक आध्यात्मिक सत्व को नष्ट किए बिना क्या तुम उन्हें अपना खोया परिचय वापस दिला सकते हो?’’ स्वामी विवेकानन्द ने चुनौति दी थी।
    जनजातियों के लिये उनकी संस्कृति व उपासना परम्परायें उनका परिचय होता है। ये परमपरायें ही जनजातियों को संगठित व प्रकृति के साथ बनायें रखती हैं। इन परम्पराओं के खोने से वे अपना अस्तित्व, नैतिक मूल्य और शांति भी खो देते हैं। उन्हें समय के साथ आगे बढ़ने के लिये, सांस्कृतिक परमपराओं के माध्यम से विकास करने के लिये सम्बल आवश्यक है। अतः ‘‘संस्कृति के माध्यम से विकास‘‘ के ध्येय से जनजातियों का स्वयं में व अपनी संस्कृति में आत्मविश्वास बढ़ाने के लिये कार्यक्रमों का आयोजन होगा।
    कार्यक्रमों का केन्द्रबिन्दु ‘‘आस्था का खोना, संस्कृति का अंत और संस्कृति का खोना, अस्तित्व का अंत’’
    1. जनजाति मंच सम्मेलन  2. ग्राम प्रमुख बैठकें  3. जनजाति उत्सवों को  प्रोत्साहन
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    बुधवार, 5 अक्तूबर 2011

    समारोह का सूत्र

    भारत जागोः
    भारत प्राचीन सभ्यता वाला युवा देश है। भारत में सर्वाधिक युवा हैं। आज हम देखते है कि भारत का युवा शिक्षित है, सक्षम है, गंभीर है और अपने देश, संस्कृति व इतिहास के बारे में जानना चाहता है व पूर्ण मनोयोग से देशसेवा करना चाहता है। उसके मन में जनसामान्य की सेवा की इच्छा है। स्वामी विवेकानन्द ने जो सिंहनाद किया वह अनेक युवाओं के हृदय को छू गया और वे स्वतंत्रता आन्दोलन में कूद पड़े। आज जब युवा पुनः उंची उड़ान भरने के लिए तत्पर है तब स्वामी विवेकानन्द का संदेश उन्हें भारत को नवीन ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए प्रेरित करेगा।
    विश्व जगाओः
    स्वामी विवेकानन्द जिन्होंने भारतीय इतिहास के सबसे अन्धेरे कालखंड में भी भारत को जगत्गुरु के रूप में उभरते हुए देखा था। प्राचीन समय में सारा विश्व भारत को गुरु मानता था। आधुनिक जगत कों स्पष्ट ध्येय व गन्तव्य की आवश्यकता है, भौतिक समृद्धि के साथ आध्यात्मिक प्रबुद्धता। अन्यथा पतन निश्चित है। भारत का आलाकित नेतृत्व उभरना केवल भारत के ही नहीं अपितु विश्व के हित में हैं। स्वामी विवेकानन्द की 150 वीं जयंती सर्वाधिक उचित अवसर है जब भारत जगतगुरु के रूप में खड़ा हो अपने समस्त सामथ्र्य एवं दायित्व को समझे और विश्व प्रबोधन करे।
    सामाजिक समरसताः
                                                  स्वामीजी के संदेश को समाज के सभी वर्गों तक ले जाना समारोह का लक्ष्य है। भारतीय राष्ट्रवाद के नवजागरण का सुत्रपात करनेवाले स्वामी विवेकानन्द क्रांतिकारी चिंतक थे। उन्होने समाज की सनातन धर्म में आस्था को किसी भी प्रकार का आघात पहुँचाये बिना जनजागरण पर बल दिया था। उनकी 150 वी जयंति के अवसर पर समाज के सभी वर्ग उत्स्फूर्त सहभाग के लिये आतूर हैं। सामाजिक समरसता को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से आयोजन समिति ने समाज के सभी अंगों के सहभाग को सुनिश्चित करने के लिये पाँच विभागों में पंचमुखी कार्यक्रमों की योजना बनाई है।
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    सोमवार, 3 अक्तूबर 2011

    स्वामी विवेकानंद सार्ध शती की पुर्वतैयारी


    ‘‘आज हमारे देश की आवश्यकता है लोहे की मांसपेशियाँ और फौलाद के स्नायु तंत्र, ऐसी प्रचण्ड इच्छाशक्ति जिसे कोई न रोक सके, जो समस्त विश्व के रहस्यों की गहराई में जाकर अपने उद्देश्यों को सभी प्रकार से प्राप्त कर सके। इस हेतु समुद्र के तल तक क्यों न जाना पड़े या मृत्यु का ही सामना क्यों न करना पड़े।’’
    -स्वामी विवेकानन्द
    श्री रामकृष्ण परमहंस के प्रमुख शिष्य, स्वामी विवेकानन्द आधुनिक समय के प्रथम धर्म-प्रचारक थे जिन्होने विदेश जाकर विश्व के सम्मूख सनातन धर्म के सर्वासमावेशक, वैश्विक संदेश को पुनःप्रतिपादित किया। ऐसा संदेश जो सब को स्वीकार करता है किसी भी मत, सम्प्रदाय को नकारता नहीं। स्वामीजी एक प्रखर देशभक्त, राष्ट्र-निर्माता, समाजशास्त्री तथा महासंगठक थे। विदेशी शासन से विदीर्ण शक्ति, परास्त मन व आत्मग्लानी से परिपूर्ण राष्ट्र के पुनर्निमाण हेतु राष्ट्रवादी पुनर्जारण को प्रज्वलित करनेवाले पुरोधा स्वामी विवेकानन्द ही थे। भारत को उसकी आत्मा हिन्दू धर्म के प्रति सजग कर उन्हांेने इस पुनर्जागरण की नीव  रखी।
    स्वामी विवेकानन्द की 150 वी जयंती को 12 जनवरी 2013 से 12 जनवरी 2014 तक सार्ध शती समारोह को भव्यता से मनाने की सघन तैयारियाँ देश के कोनें कोनें में चल पड़ी है। विभिन्न संगठन व सरकारें भी समारोह की योजना बना रहे हैं।
    भारत की जनता ने सम्मिलित होकर इस महान पर्व को मनाने का निश्चय किया है। आज जब राष्ट्र दोराहे पर खड़ा है तब उसके बौद्धिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, राजनैतिक व राष्ट्रीय आलस व भ्रम को दूर करने का उर्वर अवसर यह समारोह प्रस्तुत करता है।
    महत्वपूर्ण सामाजिक नेता, विचारक, स्वामीजी के प्रशंसक तथा अनेक सेवा संगठनों के अनुभवी कार्यकर्ता व युवाओं ने एकत्रित आकर अखिल भारतीय स्तर पर तथा 39 प्रांतों में ‘‘आयोजन समिति’’ गठित की है। इन समितियों ने प्रख्यात चिंतक, युवा आदर्श, सामाजिक व आध्यात्मिक वैचारिक नेतृत्व, वैज्ञानिक, आर्थिक, व्यावसायिक तथा क्रीड़ा क्षेत्र के सफल विजेताओं व अन्य अनेक लोगों से सम्पर्क प्रारम्भ कर दिया है। इनके सहभाग से राष्ट्रीय तथा राज्य दोनों स्तरों पर ‘‘स्वामी विवेकानन्द सार्ध शती समारोह समिति’’ का गठन होगा।
    यह समितियाँ ही समारोह वर्ष में सभी आयोजन करेंगी।
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    मंगलवार, 27 सितम्बर 2011

    स्वागतम !


    भारत जागो विश्व जगाओ जागृत मन्त्र हमारा है|
    स्वामीजी की सार्ध शती का सार्थक व्रत ये धारा है||धृ||


    वेदमयी है अमृतवाणी, उपनिषदों का सार  भरा|
    हृदय से निकले हृदय पे पहुंचे, शब्द नहीं है अनल खरा||
    स्वामीजी के अग्निमंत्र ये, साहित्याग्नी यज्ञ शिखा |
    फिर से घर घर पहुचने का, व्यापक तंत्र उभारा है ||१||


    सिंहनाद को प्रेषित करने, खोजे खालिस शावक हम |
    हनुमत बल जागृत करते, निकले सहस्र जाम्बवंत||
    स्नेहसुत्र में एक एक को, जोड़े प्रभावी संपर्क|
    चमूबद्ध सब कार्य-कर्ता, ईश्वरीय यन्त्र निखारा है ||२||


    धरा सनातन संस्कृति अक्षय, अखंड स्वर्ण धरोहर |
    धारण शाश्वत धर्म है पाता, युग युग नव अविष्कार||
    शिव भावे करे जीव सेवा, भाँति भाँति के संघ|
    संगठित यह सज्जन-शक्ति, जगद्गुरु भारत प्यारा है ||३||
     
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    बुधवार, 28 सितम्बर 2011

    गीत गाये! तत्पर हो जाये!

    कल के गीत का स्वर|
    संगीत स्वर - सौ गायत्री कानिटकर 
    http://150svhin.blogspot.in/2011/09/blog-post_28.html 
  •  
  • http://www.vivekananda150jayanti.org/ 

नैसर्गिक सौन्दर्य निखार का पर्व : रूप चौदस

http://hindi.webdunia.com/religion/occasion/dipawali/0711/02/images/img1071102051_1_1.jpg


सौन्दर्य निखार का ब्यूटी पर्व रूप चौदस.
रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) बृहस्पतिवार, अक्तूबर 27, 2011
सदियों से रूप का आकर्षण मानव मन को मोहित करता रहा है। नैसर्गिक सौन्दर्य भरी प्रकृति के फूल-पत्तों, तितलियों, पखेरुओं, कल-कल बहती सरिताओं का हो चाहे मनुष्य के तन का। रूप के पाश से आबद्ध हो मन-प्राण खीचें चले आते हैं। मानव मात्र में रूपवान बनने-दिखने की चिरन्तन अभिलाषा के साथ ही रूप सौन्दर्य के प्रति पारम्परिक एवं सहज स्वाभाविक आकर्षण रहा है। वनवासियों में स्वाभाविक सौन्दर्य, ओज और लावण्य नैसर्गिक वरदान है। वनाँचल सुघड़ एवं सबल देहयष्टि प्रदान करता है।

दीपावली से ठीक एक दिन पूर्व वनांचल के लोगों के लिए रूप निखार का वार्षिक पर्व होता है। रूप चौदस के दिन न केवल घर परिवेश बल्कि स्वयं का भी रूप निखारने का यत्न किया जाता है। इस दिन सौन्दर्य निखार की प्राचीन संस्कृति एवं परम्परा के दर्शन रूप चौदस की सार्थकता को भली प्रकार अभिव्यक्त करते हैं। दक्षिणांचल के लोगों में सौन्दर्य एवं रूप के प्रति पिपासा किसी भी प्रकार से कम नहीं कही जा सकती। वे किसी उद्यान में सायास पल्लवित किए पुष्पों की तरह नहीं है अपितु समग्र प्रकृति के आँगन में हिरणों की तरह कुलाँचे भरते हुए प्रकृति से ही इन्द्रधनुषी रंग सहेज कर रूपश्री से भरे पूरे होते हैं।

प्रकृति सामीप्य एवं मनः सौन्दर्य से कोसों दूर भागता आज का समाज जाने किन-किन किस्मों के श्रृंगार प्रसाधनों पर बेहिसाब धन खर्च कर खूबसूरत दिखने का स्वाँग रच रहा है, ऐसे में वनांचल के लोग परम्परागत सौन्दर्य निखार संसाधनों का प्रयोग कर आज भी इनकी अर्थवत्ता को बरकरार रखे हुए अनकहे ही ढेरों संदेश सुना रहे हैं। यहाँ के लोग अपना रूप निखारने में नदी-नालों, झरनों व नहरों के किनारे या किसी जलाशय के तट पर बैठकर सूरज की रोशनी में रूप निखार का यत्न करते हैं। आधुनिक समाज की मनः विकृतियों से मुक्त वनांचल के लोग मनः सौन्दर्य के साथ-साथ प्रकृति में रमे हुए हैं और यही उनकी देहयष्टि के सौन्दर्यशाली होने का एक कारण भी है।

आम तौर पर साबुन, क्रीम, शैम्पू या ऐसी ही सामग्री की बजाय पर्वतीय अंचल के नर-नारियों के लिए छिपा हुआ रूप निखारने में मिट्टी (स्थानीय व मुलतानी), हल्दी, उबटन, पीठी, अरीठा, दहीं, दूध, छाछ, मलाई आदि सहज सुलभ एवं असरकारी रसायनों का प्रयोग करते हैं। नदी-नाले, तालाब, या किसी बावड़ी की सीढ़ियों पर, नहरों के किनारे बैठी ग्राम्य तरुणियां जब कोपरिये (कवेलू का खुरदरा टुकड़ा) या सूखे गलकों के रेशों से रगड़-रगड़ कर अपनी एड़ियों का सौन्दर्य निखारती हैं, तब हमें कविवर भारतेन्दु हरिशचन्द्र की ये पंक्तियां याद आ जाती हैं- ‘‘कहऊ सुन्दरी नहावत।’’

शहरीकरण के दौर में गली -कूचों तक खुलते जा रहे ब्यूटी पॉर्लरों से निखरने वाला सौन्दर्य यहां के नैसर्गिक एवं सहज सुलभ संसाधनों से प्रकट होने वाले सौन्दर्य की तुलना में कहीं नहीं ठहरता। परम्परागत रूप निखार पद्धतियों में न धन का व्यय, न बार बार का झंझट और न प्रसाधनों से पैदा होने वाले खतरे। रूप के साथ आभूषणों का सनातन रिश्ता रहा है। रूप की लावण्यमय प्रतिमाएँ जब सर पर बोर, नाक में नथ, गले मेें हाँसली, कमर में कन्दोरा, कानों में कुण्डल/बालियाँ, भाल पर टिकड़ी, टिपकियों वाली, ओढ़नी/साड़ी, हाथों में चूड़ियां, पाँवों में तोड़े पायजेब/ कड़े पहन वनांचल की युवतियाँ जब हिरनियों की तरह कुलाँचे भरती विचरती हैं तब लगता है कामदेव भी इनके आगे नृत्य कर रहा हो। अनकहे ही प्रकृति से रूप निखारने वाले वनांचल के लोग हमें यही संदेश दे रहे हैं कि परंपरागत सहज सुलभ नैसर्गिक तरीकों से निहारा गया रूप ब्यूटी पॉर्लरों के महंगे प्रसाधनों से प्राप्त कृत्रिम रूप से कहीं भी उन्नीस नहीं है।

(डॉ. दीपक आचार्य)
महालक्ष्मी चौक, बाँसवाड़ा - 327001
(राजस्थान)
नरक चतुर्दशी
भारत डिस्कवरी प्रस्तुति
नरक चतुर्दशी कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को कहा जाता है। इस चतुर्दशी को 'नरक चौदस', 'रूप चौदस', 'रूप चतुर्दशी', 'नर्क चतुर्दशी' या 'नरका पूजा' के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन मृत्यु के देवता यमराज की पूजा का विधान है। नरक चतुर्दशी को 'छोटी दीपावली' भी कहते हैं। दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी के दिन संध्या के पश्चात दीपक प्रज्जवलित किए जाते हैं। इस चतुर्दशी का पूजन कर अकाल मृत्यु से मुक्ति तथा स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए यमराज जी की पूजा व उपासना की जाती है।
 कथाएँ
इस चतुर्दशी से जुड़ी पौराणिक कथाएँ इस प्रकार हैं-

प्रथम कथानुसार-
एक कथा के अनुसार रन्तिदेव नामक एक राजा हुए थे। वह बहुत ही पुण्यात्मा और धर्मात्मा पुरूष थे। सदैव धर्म, कर्म के कार्यों में लगे रहते थे। जब उनका अंतिम समय आया तो यमराज के दूत उन्हें लेने के लिए आये। वे दूत राजा को नरक में ले जाने के लिए आगे बढ़े। यमदूतों को देख कर राजा आश्चर्य चकित हो गये और उन्होंने पूछा- "मैंने तो कभी कोई अधर्म या पाप नहीं किया है तो फिर आप लोग मुझे नर्क में क्यों भेज रहे हैं। कृपा कर मुझे मेरा अपराध बताइये, कि किस कारण मुझे नरक का भागी होना पड़ रहा ह।". राजा की करूणा भरी वाणी सुनकर यमदूतों ने कहा- "हे राजन एक बार तुम्हारे द्वार से एक ब्राह्मण भूखा ही लौट गया था, जिस कारण तुम्हें नरक जाना पड़ रहा है।
राजा ने यमदूतों से विनती करते हुए कहा कि वह उसे एक वर्ष का और समय देने की कृपा करें। राजा का कथन सुनकर यमदूत विचार करने लगे और राजा को एक वर्ष की आयु प्रदान कर वे चले गये। यमदूतों के जाने के बाद राजा इस समस्या के निदान के लिए ऋषियों के पास गया और उन्हें समस्त वृत्तांत बताया। ऋषि राजा से कहते हैं कि यदि राजन कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करे, ब्रह्मणों को भोजन कराये और उनसे अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करे तो वह पाप से मुक्त हो सकता है। ऋषियों के कथन के अनुसार राजा कार्तिक माह की कृष्ण चतुर्दशी का व्रत करता है। इस प्रकार वह पाप से मुक्त होकर भगवान विष्णु के वैकुण्ठ धाम को पाता है।
द्वितीय कथानुसार-
एक अन्य प्रसंगानुसार भगवान श्रीकृष्ण ने कार्तिक माह में कृष्ण चतुर्दशी के दिन नरकासुर का वध करके देवताओं व ऋषियों को उसके आतंक से मुक्ति दिलवाई थी। इसके साथ ही कृष्ण भगवान ने सोलह हज़ार कन्याओं को नरकासुर के बंदीगृह से मुक्त करवाया। इसी उपलक्ष्य में नगरवासियों ने नगर को दीपों से प्रकाशित किया और उत्सव मनाया। तभी से नरक चतुर्दशी का त्यौहार मनाया जाने लगा।
रूप चौदस :
धनतेरस के अगले दिन 'नरक चौदस' होती है, जिसे 'रूप चौदस' भी कहा जाता है। इस दिन ब्रह्म मुहुर्त में उठकर स्नान करने का तथा उगते सूर्य को अर्घ्य देने का विशेष महत्व होता है। रूप चौदस के दिन रूप-लावण्य को निखारने के लिए तरह-तरह के उबटन आदि लगाते हैं। इस दिन घर के दरवाजे के बाहर तेल का एक दीपक जलाया जाता है, जिसे यम दीपक कहा जाता है।
मूल भाव : मनुष्य के लिए तन और मन दोनों की शुद्धि करना जरूरी होता है। 'रूप चौदस' का अभिप्राय केवल सज-धजकर केवल शरीर की मलिनता को दूर करना ही नहीं है बल्कि अपने मन में विकारों को भी दूर करना है।

 नरक चतुर्दशी से जुड़ी हैं परंपराएं
नया इंडिया
11th Nov 2012
नई दिल्ली। दीपावली पर्व के ठीक एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी को छोटी दीवाली, रूप चौदस और काली चतुर्दशी भी कहा जाता है और इस दिन से कई परंपराएं जुड़ी हैं। नरक चतुर्दशी कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है।
दिल्ली विश्‍वविद्यालय के संस्कृत विभाग के सेवानवृत्त प्राध्यापक सी के मिश्र ने बताया कि हिंदू कैलेंडर के अनुसार, नरक चतुर्दशी कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है। इसके अगले दिन दीपावली मनाई जाती है। मिश्र ने बताया कि माना जाता है कि दैत्य राज नरकासुर ने देवराज इंद्र को पराजित कर सुरलोक की शासक मातृ देवी अदिति के कानों के कुंडल छीन लिए थे। अदिति भगवान कृष्ण की पत्नी सत्यभामा की रिश्तेदार थीं।
नरकासुर के अत्याचार की खबर सुन कर सत्यभामा नाराज हो गई और भगवान कृष्ण से नरकासुर को सजा देने के लिए कहा। नरकासुर को श्राप मिला था कि उसकी मृत्यु महिला के हाथों होगी। कृष्ण ने तब सत्यभामा को यह बात बताई और युद्ध के मैदान में सत्यभामा के रथ के सारथी बने। नरकासुर का वध सत्यभामा ने किया और अदिति के कुंडल उन्हें वापस दिए। उन्होंने बताया कि नरकासुर के वध के बाद कृष्ण ने उसके रक्त से तिलक किया और सुबह सुबह अपने महल वापस पहुंचे। उस दिन नरक चतुर्दशी थी। कृष्ण ने सुगंधित तेल लगाया और स्नान किया। कहा जाता है कि तब से ही इस दिन सुबह तेल लगा कर स्नान करने की परंपरा है।
पौराणिक गाथा के अनुसार, नरकासुर ने देवराज इंद्र को परास्त करने के बाद जिन 16 हजार देव कन्याओं को कारागार में डाल दिया था, उन्हें कृष्ण ने दैत्य राज के वध के बाद रिहा किया और उनसे विवाह किया। ये 16 हजार देव कन्याएं उनकी रानियां बनीं। इसीलिए इस दिन को रूप चौदस भी कहा जाता है और महिलाएं इस दिन विशेष श्रृंगार करती हैं।
ज्योतिष में दिलचस्पी रखने वाली संस्कृत की प्राध्यापक डॉ कमल मुखर्जी ने बताया कि राजस्थान में रूप चौदस खास तौर पर मनाया जाता है। यह आयोजन पांच दिन तक चलता है। इस दिन महिलाएं घर की सफाई और खुद अपना श्रृंगार करती हैं। घर पर तरह तरह के पकवान बनाए जाते हैं। उन्होंने बताया कि दक्षिण भारत में इस दिन को बच्चों के मुंडन संस्कार के लिए शुभ माना जाता है। वहां इस दिन सुबह स्नान के बाद तेल में कुमकुम मिला कर लगाया जाता है और करेले को हाथ के प्रहार से तोड कर उसका रस माथे पर लगाया जाता है।
करेले को नरकासुर के सिर का प्रतीक माना जाता है। इसके बाद तेल और चंदन लगा कर फिर स्नान किया जाता है। आम तौर पर इस दिन महिलाएं सुबह उठ कर घर की साफ सफाई करती हैं और घर के बाहर रंगोली सजाती हैं। महाराष्ट्र में इस दिन चने के आटे और चंदन का उबटन लगा कर स्नान करने की परंपरा है। आंध्रप्रदेश में इस दिन सुबह पानी में तिल के कुछ दाने डाल कर स्नान करने की परंपरा है।
मुखर्जी ने बताया कि नरक चतुर्दशी के दिन महाकाली और भगवान यमराज की पूजा भी की जाती है। माना जाता है कि इस दिन पूजा करने से यमराज नरक में नहीं भेजते। कई घरों में इस दिन एक विशेष दिया यमराज के लिए जलाया जाता है और दरवाजे के सामने रखा जाता है। कई घरों में रात को घर का सबसे बुजुर्ग सदस्य एक दिया जला कर पूरे घर में घुमाता है और फिर उसे ले कर घर से बाहर कहीं दूर रख कर आता है।
घर के अन्य सदस्य अंदर रहते हैं और इस दिये को नहीं देखते। यह दीया यम का दीया कहलाता है और माना जाता है कि पूरे घर में इसे घुमा कर बाहर ले जाने से सभी बुराइयां और कथित बुरी शक्तियां घर से बाहर चली जाती हैं।