रविवार, 18 नवंबर 2012

शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे : अंतिम संस्कार






शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में प्रमुख हस्तियां यहां स्थित ऐतिहासिक शिवाजी पार्क मैदान में पहुंचीं जिनमें राजनीति, फिल्म और कापरेरेट जगत के दिग्गज शामिल थे। दादर में शिवसेना मुख्यालय से कुछ मी
टर की दूरी पर स्थित शिवाजी पार्क मैदान में ठाकरे के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए पहुंचे प्रमुख लोगों में राकांपा प्रमुख शरद पवार, भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, अभिनेता अमिताभ बच्चन और उद्योगपति अनिल अंबानी शामिल थे।
इसके साथ ही वहां पर भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, भाजपा नेता मेनका गांधी एवं शाहनवाज हुसैन, वरिष्ठ कांग्रेसी नेता डा डी वाई पाटिल और महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष के नेता एकनाथ खडसे भी उपस्थित थे। इसके अलावा वहां पर केंद्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल,वरिष्ठ भाजपा नेता अरुण जेटली, विहिप नेता प्रवीण तोगड़िया, कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला और महाराष्ट्र के लोकनिर्माण मंत्री छगन भुजबल भी उपस्थित थे। इस मौके पर बॉलीवुड अभिनेता नाना पाटेकर, अभिनेता निर्देशक महेश मांजरेकर और रितेश देशमुख भी उपस्थित थे। ठाकरे की शवयात्रा मुम्बई की प्रमुख सड़कों से गुजरते हुए छह घंटे में शिवाजी पार्क मैदान पहुंची। इस शवयात्रा में लाखों शिवसैनिक और ठाकरे के समर्थक शामिल थे। (एजेंसी)

शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे



बाला साहब ठाकरे के जाने से...,

आज मन व्यथित है।

हमने एक सच्चा हिन्दू हित चिन्तक खो दिया।

जिसकी ललकार की आवाज दूर दूर तक सुनी जाती थी।

समय इस रिक्तता की पूर्ती समय कब और कैसे करता है,

यह तो भगवान ही जानें।




शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे का शिवाजी पार्क में आज अंतिम संस्कार
NDTVIndia, : 18 नवम्बर , 2012

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मुंबई: पिछले कई दिनों से गंभीर रूप से बीमार चल रहे शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे का शनिवार 17 नवम्बर , 2012 को 86 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। शनिवार दोपहर 3 बजकर 33 मिनट पर बाला साहब ठाकरे ने अंतिम सांस ली। डॉक्टर के मुताबिक दिल का दौरा पड़ने से ठाकरे का निधन हुआ।
ठाकरे को सांस की बीमारी के अलावा पैंक्रियास की बीमारी थी। उनके परिवार में पुत्र जयदेव और उद्धव हैं। इनमें उद्धव पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष हैं। ठाकरे का अंतिम संस्कार रविवार को किया जाएगा और इससे पहले उनके पार्थिव शरीर को शिवाजी पार्क में दर्शन के लिए रखा जाएगा। शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा कि आम जनता सुबह से शाम पांच बजे तक ठाकरे के पार्थिव शरीर का अंतिम दर्शन कर सकती है। बाद में पास में स्थित श्मशान में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।
ठाकरे के निधन का समाचार सुनते ही बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे अपने परिवार के साथ मातोश्री पहुंच गए। उनके अलावा पार्टी के वरिष्ठ नेता और अन्य राजनीतिक नेता भी दिवंगत नेता के आवास पर पहुंचने लगे। ठाकरे के निधन के बाद महानगर में सुरक्षा-व्यवस्था मजबूत कर दी गई। पुलिस ने मीडिया के लोगों को मातोश्री से थोड़ी दूरी पर रहने को कहा। शिवसेना की ओर से पार्टी नेता संजय राउत ने सभी शिवसैनिकों से शांति बनाए रखने की अपील की।
ठाकरे के निवास मातोश्री के पास सुरक्षा के मद्देनजर भारी संख्या में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। पुलिस ने संभावित भीड़ को नियंत्रित करने के लिए तमाम मार्गों पर बैरिकेडिंग कर दी है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ठाकरे के निधन पर शोक व्यक्त किया। मनमोहन सिंह ने बीजेपी नेताओं के लिए आयोजित रात्रिभोज को रद्द कर दिया।
यह दिलचस्प है कि कांग्रेस के कट्टर विरोधी माने जाने वाले ठाकरे ने 2006 में राष्ट्रपति पद के चुनाव में कांग्रेस की उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल का समर्थन किया था और इस वर्ष के राष्ट्रपति चुनाव में भी उन्होंने कांग्रेसी उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी का समर्थन किया।
पिछले कुछ दिन से उनकी तबीयत खराब होने के बावजूद शिवसेना के नेता और उनका मुखपत्र 'सामना' लगातार उनकी तबीयत में सुधार की बात कह रहे थे। उनकी मौत की खबर सुनते ही राजनीति, बॉलीवुड और उद्योग जगत की बड़ी हस्तियां उनके आवास पर पहुंच रही हैं। मातोश्री के बाहर खड़े मीडिया प्रतिनिधियों और शिवसेना कार्यकर्ताओं को अपराह्न चार बजे के बाद कुछ सुगबुगाहट महसूस हुई, क्योंकि शिवसेना, बीजेपी और अन्य पार्टियों के कई वरिष्ठ नेता वहां पहुंचने लगे और पुलिस भी पहले से चौकन्नी हो गई।
शिवसेना नेता संजय राउत और दिवाकर राओते अपने साथ डॉक्टर जलील पारकर को लेकर करीब पांच बजे मातोश्री से बाहर आए। डॉक्टर पारकर पिछले तीन वर्ष से बाल ठाकरे का इलाज कर रहे थे। उन्होंने ठाकरे के निधन का ऐलान किया। यह खबर सुनते ही वहां बड़ी संख्या में मौजूद शिवसैनिकों ने 'बाल ठाकरे अमर रहें' का नारा लगाते हुए मातोश्री में घुसने का प्रयास किया, लेकिन पुलिस ने उन्हें बाहर ही रोक लिया। अपने नेता की मौत की खबर सुनकर बहुत से शिवसैनिक अपने आंसू नहीं रोक पाए।
शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए बीजेपी ने कहा कि 'एक शेर' नहीं रहा। बीजेपी संसदीय दल के अध्यक्ष और एनडीए के कार्यकारी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने कहा, एक असाधारण व्यक्ति चला गया। स्वतंत्र भारत के 65 वर्ष में देश पर ऐसी गहरी छाप छोड़ने वाला व्यक्तित्व विरले ही होगा, जैसी छाप बाल ठाकरे ने छोड़ी है।
लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने कहा कि बाला साहब के निधन की खबर से उन्हें गहरा सदमा हुआ है। एक शेर नहीं रहा। ठाकरे की सेहत में पिछले कुछ दिन से उतार-चढ़ाव आ रहा था। उनके पुत्र उद्धव ने गुरुवार की रात शिवसैनिकों से शांति बनाए रखने और उनके पिता के लिए प्रार्थना करने की अपील की।
शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत ने लोगों से शांति और सौहार्द बनाए रखने का आग्रह किया। ठाकरे का इलाज लीलावती अस्पताल के डॉक्टरों द्वारा किया जा रहा था।

क्रान्तिकारी बटुकेश्वर दत्त





***** क्रान्तिकारी बटुकेश्वर दत्त *****


आज भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रान्तिकारी बटुकेश्वर दत्त का जन्मदिवस है जिन्हें देश ने सबसे पहले 8 अप्रैल, 1929 को तब जाना, जब वे भगत सिंह के साथ केंद्रीय विधान सभा में बम विस्फोट के बाद गिरफ्तार किए गए।
                 उनका जन्म  १८ नवम्बर, 1910 को बंगाली कायस्थ परिवार में ग्राम-औरी, जिला-नानी बेदवान (बंगाल) में हुआ , कुछ स्थानों पर उनका जन्म  नवम्बर, 1908 में कानपुर में हुआ भी लिखा है । पिता 'गोष्ठ बिहारी दत्त' कानपुर में नौकरी करते थे। उनका पैत्रिक गाँव बंगाल के 'बर्दवान ज़िले' में था | दत्त की स्नातक स्तरीय शिक्षा पी.पी.एन. कॉलेज कानपुर में सम्पन्न हुई। 1924 में कानपुर में ही इनकी भगत सिंह से भेंट हुई जो उन दिनों गणेश शंकर विद्यार्थी के पत्र 'प्रताप' में छद्म नाम से काम कर रहे थे और क्रन्तिकारी गतिविधियों में संलग्न थे|। भगत सिंह के संपर्क में आकर बटुकेश्वर दत्त ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के लिए कानपुर में कार्य करना प्रारंभ किया और इसी क्रम में बम बनाना भी सीखा। उन्होंने कई वर्षों तक कई स्थानों पर क्रांति का प्रचार किया, विशेषकर आगरा में| ब्रिटिश राज्य की तानाशाही का विरोध करने के लिए जब भगत सिंह ने दिल्ली स्थित केंद्रीय विधानसभा (वर्तमान का संसद भवन) बम फेंकने की योजना बनायीं तो अपने साथी के रूप में उन्होंने दत्त का चुनाव किया । 8 अप्रैल, 1929 को लोगों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए इन दोनों द्वारा बम विस्फोट बिना किसी को नुकसान पहुंचाए सिर्फ अपनी बात को प्रचारित करने के लिए और भगत सिंह के शब्दों में बहरों के कान खोलने के लिए किया गया| उस दिन भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार की ओर से पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट बिल लाया गया था, जो इन लोगों के विरोध के कारण एक वोट से पारित नहीं हो पाया।
इस घटना के बाद बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। 12 जून, 1929 को इन दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास काटने के लिए काला पानी जेल भेज दिया गया। जेल में ही उन्होंने 1933 और 1937 में ऐतिहासिक भूख हड़ताल की। सेल्यूलर जेल से 1937 में बांकीपुर केन्द्रीय कारागार, पटना में लाए गए और 1938 में रिहा कर दिए गए। काला पानी से गंभीर बीमारी लेकर लौटे दत्त फिर गिरफ्तार कर लिए गए और चार वर्षों के बाद 1945 में रिहा किए गए। आजादी के बाद नवम्बर, 1947 में अंजली दत्त से शादी करने के बाद वे पटना में रहने लगे।
परन्तु देश की आजादी के लिए तमाम पीड़ा झेलने वाले क्रांतिकारी एवं स्वतंत्रता सेनानी बटुकेश्वर दत्त का जीवन भारत की स्वतंत्रता के बाद भी दंश, पीड़ाओं, और संघर्षों की गाथा बना रहा और उन्हें वह सम्मान नहीं मिल पाया जिसके वह हकदार थे। आजादी की खातिर 15 साल जेल की सलाखों के पीछे गुजारने वाले बटुकेश्वर दत्त को आजाद भारत में रोजगार मिला एक सिगरेट कंपनी में एजेंट का, जिससे वह पटना की सड़कों पर खाक छानने को विवश हो गये। उन्होंने कुछ और काम भी अपने भरण पोषण के लिए किया पर दुर्भाग्यवश असफलता ही हाथ लगी और उनका जीवन अभावों से ग्रसित रहा| बटुकेश्वर दत्त के 1964 में अचानक बीमार होने के बाद उन्हें गंभीर हालत में पटना के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया जहाँ उन्हें लावारिसों की तरह उनके भाग्य पर छोड़ दिया गया| इस पर उनके मित्र चमनलाल आजाद ने एक लेख में लिखा, क्या दत्त जैसे कांतिकारी को भारत में जन्म लेना चाहिए, परमात्मा ने इतने महान शूरवीर को हमारे देश में जन्म देकर भारी भूल की है। खेद की बात है कि जिस व्यक्ति ने देश को स्वतंत्र कराने के लिए प्राणों की बाजी लगा दी और जो फांसी से बाल-बाल बच गया, वह आज नितांत दयनीय स्थिति में अस्पताल में पड़ा एडियां रगड़ रहा है और उसे कोई पूछने वाला नहीं है
इसके बाद सत्ता के गलियारों में हड़कंप मच गया और 22 नवंबर 1964 को उन्हें इलाज के लिए दिल्ली लाया गया। बाद में पता चला कि दत्त बाबू को कैंसर है और उनकी जिंदगी के चंद दिन ही शेष बचे हैं। भीषण वेदना झेल रहे दत्त चेहरे पर शिकन भी न आने देते थे। पंजाब के मुख्यमंत्री रामकिशन जब दत्त से मिलने पहुंचे और उन्होंने पूछ लिया, हम आपको कुछ देना चाहते हैं, जो भी आपकी इच्छा हो मांग लीजिए। छलछलाई आंखों और फीकी मुस्कान के साथ उन्होंने कहा, हमें कुछ नहीं चाहिए। बस मेरी यही अंतिम इच्छा है कि मेरा दाह संस्कार मेरे मित्र भगत सिंह की समाधि के बगल में किया जाए। 17 जुलाई को वह कोमा में चले गये और 20 जुलाई 1965 की रात एक बजकर 50 मिनट पर दत्त बाबू इस दुनिया से विदा हो गये। उनका अंतिम संस्कार उनकी इच्छा के अनुसार, भारत-पाक सीमा के करीब हुसैनीवाला में भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की समाधि के निकट किया गया। आज हमें देश के लिए सर्वस्व बलिदान करने वाले लोगों की याद नहीं पर हमें इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि जो कौम अपना इतिहास भूल जाती है, इतिहास उसका ज्योग्राफिया बदल देता है | आज उनके जन्मदिवस पर उन्हें कोटिशः नमन|