बुधवार, 21 नवंबर 2012

26/11 के हमले में छः अमेरिकी नागरिक मारे गये थे




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26/11 के हमले में भारतीय मुजाहिद्यीन की सुगमतादायक भूमिका: संयुक्त राज्य
सितम्बर 16, 2011  टाइम्स ऑफ इण्ड़िया,
MEA - Ministry of External Affairs
यह खबर भारत सरकार के इस  पेज से ली गई है 
वाशिंगटन : संयुक्त राज्य ने बृहस्पतिवार को पुष्टि की थी कि भारतीय मुजाहिद्यीन (आई एम) ने वर्ष, 2008 के मुम्बई हमले में सुगमतादायक भूमिका निभाई थी, जो लश्कर-ए-तायबा (एल ई टी) द्वारा किया गया था, जिसमें छः अमेरिकी नागरिक सहित 163 लोग मारे गये थे”| इस कार्यवाई में जिस तथ्य को रेखाँकित किया गया है, वह यह है कि संयुक्त राज्य भारत पर हुए आतंकी हमले पर अब और अधिक तटस्थ नही है, राजकीय विभाग से प्राप्त एक मीडिया की टिप्पणी के साथ पाकिस्तान से जुड़े एक वैश्विक आतंकवादी संगठन के रूप में, आई एम का औपचारिक पद नाम स्वीकार करता है कि “ये पदवियाँ न केवल आई एम के माध्यम से पश्चिमी हितों के खतरों का उल्लेख करती हैं बल्कि भारत और एक निकट भागीदार संयुक्त राज्य को भी”.

“जनसाधारण भारतियों ने भारतीय मुजाहिद्यीन की निर्दयतापूर्ण हिंसा का घातक प्रभाव झेला है और आज के कार्यकलापों से भारत सरकार के साथ हमारी एकता व्यक्त हो रही है,” आतंकवाद रोधी राजकीय समन्वय विभाग के राजदूत डैनियल बेंजामिन ने आगे जोड़ते हुए कहा था, “ये पद नाम आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में निर्णायक भूमिका निभाते हैं और आतंकी गतिविधियों के लिए समर्थन को कम करने और समूहों पर आतंकवाद को त्याग देने पर दबाव बनाने के लिए एक प्रभावकारी माध्यम भी हैं।”

राजकीय विभाग ने कहा था कि राजकीय सचिव हिलेरी क्लिंटन ने भारतीय मुजाहिद्यीन (आई एम) को आप्रावासन एवं राष्ट्रीय अधिनियम की धारा 219 के अन्तर्गत एक विदेशी आतंकवादी संगठन (एफ टी ओ) और एक कार्यपालक आदेश क्रमाँक 13224 की धारा 1 (ख) के अन्तर्गत एक विशेषरूप से पद नाम प्राप्त वैश्विक आतंकवादी की संज्ञा दी है। इन पदनामों के परिणामों में जान-बूझ कर भौतिक संसाधनों से समर्थन अथवा अन्य लेन-देन में भारतीय मुजाहिद्यीन के साथ संलिप्त होना और संयुक्त राज्य में स्थित अथवा संयुक्त राज्य के अन्तर्गत या फिर संयुक्त राज्य के नागरिक के नियंत्रण में स्थित संगठनों की सभी सम्पत्ति एवं सम्पत्ति के हितों को जब्त कर लिया है। राजकीय विभाग ने ये सारी कार्यवाईयां, न्याय एवं राजकोष विभाग से परामर्श करके किया था, मीडिया नोट से व्यक्त हुआ था।
राजकीय विभाग के अनुसार भारतीय मुजाहिद्यीन (आई एम) के आक्रमण का प्राथमिक तरीका आर्थिक एवं गैर सैन्य ठिकानों के अनेकों समन्वित बम विस्फोट, भीड़ वाले क्षेत्रों आतंक फैलाने और अधिकाधिक लोगों को हताहत करने के लक्ष्य से करने का है। भारतीय मुजाहिद्यीन के आतंकी हमले की विशेषता यह कि इसने कहा था कि वर्ष, 2010 में भारतीय मुजाहिद्यीन ने पुणे की लोकप्रिय जर्मन बेकरी जहाँ पर्यटकों का आवागमन बना रहता है, बम विस्फोट किया था जिसमें 17 लोग मारे गये थे और 60 लोग घायल हुए थे।
वर्ष, 2008 में भारतीय मुजाहिद्यीन ने दिल्ली में हमला किया था जिसमें 30 लोग मारे गये थे। वर्ष, 2008 मे ही भारतीय मुजाहिद्यीन, अहमदाबाद के भीड़ वाले शहरी क्षेत्र एवं एक स्थानीय चिकित्सालय में ताल-मेल बिठा कर एक समय पर 16 बम विस्फोट करने के लिए जिम्मेदार था, जिसमें 38 लोग मारे गये थे और 100 से अधिक घायल हुए थे।
संयुक्त राज्य से यह पद नाम ऐसे समय पर आया जब वाशिंगटन और भारत के बीच सम्बंध, आतंकवाद के मुद्दे पर तेजी से लगातार नीचे जा रहे थे।
इस सप्ताह के प्रारम्भ में संयुक्त राज्य अधिकारी, जिसमें सम्मिलित रक्षा सचिव श्री लियॉन पनेटा ने पाकिस्तान समर्थित हक्कानी आतंकवादी समूह पर काबुल में संयुक्त राज्य सेनाओं पर हुए ताजे आक्रमण के पीछे हाथ होने का आरोप लगाया था, यह एक ऐसा परिवर्तन था जिसका अनुमोदन उप राष्ट्रपति श्री जोय बीदेन द्वारा किया गया था।
“यह समय था जब हमने पुनः पाकिस्तान से आग्रह किया था कि वह हक्कानी द्वारा इस प्रकार के हमले पर अपने प्रभावों का उपयोग करे। इस क्षेत्र में हमने बहुत कम प्रगति की थी ,” पनेटा ने बुधवार को सम्वाद दाताओं को बताया था।
इसलामाबाद ने बृहस्पतिवार को इस धमकी का उत्तर यह कहते हुए दिया था कि संयुक्त राज्य के विद्रोहियों पर यह चेतावनी वाशिंगटन के साथ सम्बंधों को आहत करेगा क्योंकि पाकिस्तान अपनी ओर से बहुत अच्छा कर रहा है। “यदि विद्रोही अफगानिस्तान में कुछ कर रहे हैं, तब ये अफगान और पश्चिमी सेनाओं की जिम्मेदारी है कि वे उन्हें सीमाओं पर रोंके,” एक पाकिस्तानी अधिकारी को उद्धृत करते हुए संकेत मिल रहा था कि हमारी नीति लगातार खण्ड़न की है और देश में आतंकवादी समूहों को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी नही लेने की है।
आई एस आई के अन्तर्गत नियुक्त पाकिस्तान समर्थित हक्कानी समूह वर्ष, 2008 में काबुल स्थित भारतीय राजदूतावास पर हुए हमले को अंजाम देने का भी संदिग्ध आरोपी था जिसमें एक युवा भारतीय राजनयिक एवं एक सेना अटैची मारे गये थे। हक्कानी समूह को इसके सेना प्रमुख परवेज अशफा़क कयानी द्वारा इसकी व्याख्या पाकिस्तान की “रणनीतिक परिसम्पत्ति” के रूप में की गयी है।
(व्यक्त किये गये उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं)

चीन से 1962 का युद्ध नेहरू की वजह से हारे :पूर्व वायु सेना प्रमुख





चीन से 1962 का युद्ध नेहरू की वजह से हारे थे हम: टिपणिस
Tuesday,20 November, 2012,
लिंक - http://zeenews.india.com/hindi/news
नई दिल्ली: पूर्व वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल (सेवानिवृत्त) ए वाई टिपणिस ने 1962 में चीन के साथ युद्ध में भारत की हार के लिए पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को उस वक्त जिम्मेदार ठहराने का प्रयास किया है जब जंग के दौरान वायु सेना का इस्तेमाल नहीं किये जाने पर बहस जारी है।
यहां ‘भारत और चीन, 1962 के युद्ध के पांच दशक बाद’ शीषर्क से आयोजित सेमिनार को संबोधित करते हुए टिपणिस ने यह आरोप भी लगाया कि नेहरू ने वैश्विक नेता बनने की महत्वाकांक्षा के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों को पीछे छोड़ दिया था।
उन्होंने कहा कि यह बात थोड़ी बहुत सार्वभौमिक तौर पर मान्य है। हो सकता है कि कुछ भारतीयों को हिचकिचाहट में राजनीतिक मकसद से खुलकर यह बात स्वीकार्य नहीं हो कि पंडित नेहरू ने संघर्ष मुक्त निगरुट दुनिया के बड़े दृष्टिकोण के साथ वैश्विक नेता बनने की महत्वाकांक्षा के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा के हित को छोड़ दिया।
कल दिये उनके ये बयान वायु सेना के मौजूदा प्रमुख एयर चीफ मार्शल एन ए के ब्राउन द्वारा हाल ही में दी गयी इस टिप्पणी की पृष्ठभूमि में आए हैं कि चीन के साथ 1962 के युद्ध का नतीजा अलग होता अगर वायु सेना को आक्रामक भूमिका अदा करने दी गयी होती।
अपने बयान को विस्तार से बताते हुए टिपणिस ने कहा कि नेहरू की भारत की हार में बड़ी भूमिका थी। वायुसेना प्रमुख के तौर पर 31 दिसंबर, 1998 से तीन साल का कार्यकाल पूरा करने वाले 72 साल के टिपणिस को भारत और चीन के बीच लड़ाई से दो साल पहले 1960 में लड़ाकू पायलट के तौर पर वायु सेना में शामिल किया गया था।
टिपनीस ने कहा कि उन्होंने उन दिनों एक सेना प्रमुख को उसके कथित मिजाज के लिए प्रधानमंत्री नेहरू द्वारा स्कूली बच्चे की तरह सताते हुए देखा था।
1962 के युद्ध में वायु सेना का इस्तेमाल नहीं किये जाने के मुद्दे पर सैन्य इतिहासकारों और विशेषज्ञों के बीच अब भी बहस चल रही है और इस बात को लेकर कोई स्पष्ट धारणा नहीं है कि वायु सेना का इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया।
ब्राउन ने कहा था कि वायु सेना को आक्रामक भूमिका क्यों नहीं निभाने दी गयी और केवल सेना के परिवहन सहयोग तक क्यों सीमित रखा गया।पिछले 50 साल में पहली बार भारत ने 20 अक्तूबर को चीन के साथ 1962 के युद्ध की बरसी मनाई जहां रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने तीनों सेना प्रमुखों के साथ अमर जवान ज्योति पर फूलमालाए़ं चढ़ाकर युद्ध में शहीद हुए लोगों को श्रद्धांजलि दी। (एजेंसी)

कसाब को फांसी : कब क्या हुआ ?










26/11 के मुंबई हमले के दोषी अजमल आमिर कसाब को फांसी दे दी गई है। सुबह साढ़े सात बजे पुणे की यरवडा जेल में उसे फांसी दी गई है। 9 नवंबर को ही राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कसाब की दया याचिका कर दी थी। पिछले एक हफ्ते से कसाब की फांसी की तैयारी की जा रही थी। महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर आर पाटिल ने इस खबर की पुष्टि करते हुए बताया कि कसाब को पूरी प्रक्रिया के बाद फांसी दी गई है। केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने भी खबर की पुष्टि की है।

कसाब मामले में कब क्या हुआ?

Wed, 21 Nov 2012
नई दिल्ली। वर्ष 2008 में 26 नवंबर को हुए मुंबई आतंकी हमले में 166 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। हमले में तीन पुलिस अधिकारी भी शहीद हो गए थे। एक नजर डालते हैं मामले पर कि कब-कब क्या-क्या हुआ?
26 नवंबर 2008 : अजमल कसाब और नौ आतंकियों ने मुंबई पर हमला किया, जिसमें 166 लोगों की जान गई।
27 नवंबर 2008 : अजमल कसाब गिरफ्तार।
30 नवंबर 2008 : कसाब ने पुलिस के सामने अपना गुनाह कुबूल किया।
27/28 दिसंबर 2008 : आइडेंटीफिकेशन परेड हुई।
13 जनवरी 2009 : एम एल तहलियानी को 26/11 मामले में विशेष जज नियुक्त किया गया।
16 जनवरी 2009 : ऑर्थर रोड जेल को कसाब का ट्रायल के लिए चुना गया।
22 फरवरी 2009 : उज्ज्वल निकम को सरकारी वकील नियुक्त किया गया।
25 फरवरी 2009 : मेट्रोपॉलिटिन कोर्ट में कसाब के खिलाफ चार्जशीट दायर।
1 अप्रैल 2009 : स्पेशल कोर्ट ने अंजलि वाघमारे को कसाब का वकील नियुक्त किया।
20 अप्रैल 2009 : अभियोजन पक्ष ने 312 मोचरें पर कसाब को आरोपी बनाया।
29 अप्रैल 2009 : कसाब नाबालिग नहीं है। विशेषज्ञों की राय पर अदालत ने फैसला सुनाया।
6 मई 2009 : मामले में आरोप तय किए गए। कसाब पर 86 आरोप तय,लेकिन आरोपों से कसाब का इंकार।
23 जून 2009 : हाफिज सईद, जकी-उर-रहमान लखवी समेत 22 लोगों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किए गए।
16 दिसंबर 2009 : अभियोजन पक्ष ने 26/11 के मामले में आर्ग्यूमेंट पूरा किया।
9 मार्च 2010 : अंतिम बहस शुरू।
31 मार्च 2010 : फैसला 3 मई के लिए सुरक्षित रखा गया।
3 मई 2010 : कोर्ट ने कसाब को मुंबई हमले का दोषी ठहराया। सबाउद्दीन अहमद और फहीम अंसारी आरोपों से बरी।
6 मई 2010 : कसाब को विशेष अदालत ने मौत की सजा सुनाई।
18 अक्टूबर 2010 : बॉम्बे हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई शुरू। कसाब की वीडियो कांफ्रेसिंग के जरिए पेशी।
19 अक्टूबर 2010 : कसाब ने निजी तौर पर अदालत में हिस्सा लेने की बात कही।
21 अक्टूबर 2010 : कसाब ने निजी तौर पर अदालत में हिस्सा लेने की बात अपने वकील से दोहराई।
25 अक्टूबर 2010 : हाई कोर्ट के जजों ने सीसीटीवी फुटेज देखी।
27 अक्टूबर 2010 : वकील उज्जवल निकम ने निचली अदालत द्वारा दी गई कसाब को मौत की सजा को सही ठहराया।
29 अक्टूबर 2010 : वकील उज्जवल निकम ने तर्क दिया कि कसाब ने बार-बार यू-टर्न लेकर निचली अदालत को गुमराह करने की कोशिश की।
19 नवंबर 2010: निकम ने अदालत को बताया कि 26/11 के हमलावर देश में मुसलमानों के लिए अलग राज्य चाहते थे।
22 नवंबर 2010 : निकम ने कसाब को झूठा और साजिशकर्ता ठहराया।
23 नवंबर 2010 : हाईकोर्ट के जजों ने एक बार फिर से कसाब के सीसीटीवी फुटेज देखें।
24 नवंबर 2010 : निकम ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि निचली अदालत ने कसाब के इकबालिया बयान को स्वीकार करने में गलती की थी।
25 नवंबर 2010 : कसाब के वकील अमीन सोलकर ने आर्ग्यूमेंट शुरू किया। निचली अदालत की कार्वायही को गलत ठहराते हुए 26/11 मामले पर दोबारा ट्रायल की माग की।
30 नवंबर 2010 : सोलकर ने तर्क दिया कि कसाब के खिलाफ देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने के आरोप नहीं बनते।
2 दिसंबर 2010 : बचाव पक्ष के वकील ने अदालत में कहा कि कसाब पाकिस्तान से कश्ती से नहीं आया था क्योंकि कश्ती में सिर्फ दस व्यक्ति ही आ सकते हैं।
3 दिसंबर 2010 : उसके वकील का तर्क था कि कसाब को फंसाने के लिए पुलिस ने झूठी कहानी बनाई।
5 दिसंबर 2010 : बचाव पक्ष के वकील सोलकर ने तर्क दिया कि सबूतों को दबा दिया गया है। सिर्फ कुछ सीसीटीवी फुटेज अदालत में दिखाई गई।
6 दिसंबर 2010 : सोलकर ने फुटेज में दिखी तस्वीरों को गलत बताया।
7 दिसंबर 2010 : कसाब ने पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे और दो अन्य पुलिस अधिकारियों की हत्या से इनकार किया। उसके वकील का तर्क था कि मारे गए पुलिस अधिकारियों के शरीर में मिली गोलिया कसाब की राइफल के साथ मैच नहीं होती।
8 दिसंबर 2010 : सोलकर का कहना था कि पुलिस ने गिरगाम चौपाटी में 26 नवंबर, 2008 को झूठी मुठभेड़ का नाटक करके कसाब को फंसाया है। साथ ही मौके पर कसाब की मौजूदगी से इनकार करते हुए उसकी गिरफ्तारी को गलत ठहराया।
9 दिसंबर 2010 :कसाब के वकील ने उसके खिलाफ पेश किए गए सबूतों को कमजोर बताते हुए पुलिस अधिकारी करकरे के मारे जाने से इंकार किया।
10 दिसंबर 2010 : कसाब के वकील ने निचली अदालत में रखी कश्ती का निरीक्षण किया और उस कश्ती को 10 व्यक्तियों के आने के लिए नाकाफी बताया और दावा किया कि अभियोजन पक्ष का दावा गलत है।
13 दिसंबर 2010 : कसाब ने खुद के किशोर होने की दलील देते हुए अदालत से अपनी मानसिक हालत के लिए चिकित्सा विशेषज्ञों के एक पैनल नियुक्ति करने का आग्रह किया।
14 दिसंबर 2010 : अदालत ने कसाब की माग को खारिज कर दिया।
21 दिसंबर 2010 : अदालत ने 26/11 के मामले में फहीम अंसारी को बरी किए जाने के खिलाफ राज्य की अपील सुनी।
22 दिसंबर 2010 : सरकारी वकील निकम ने तर्क दिया कि निचली अदालत ने फहीम अंसारी और सबाउद्दीन अहमद को बरी करने में गलती की थी।
21 फरवरी 2011 : बॉम्बे हाईकोर्ट ने कसाब पर निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया और उसकी अपील खारिज कर दी। मुंबई हमलों के मामले में फहीम अंसारी और सबाउद्दीन अहमद को बरी कर दिया गया।
29 जुलाई 2011 : कसाब ने फासी की सजा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
10 अक्तूबर 2011 : सुप्रीम कोर्ट ने कसाब की फासी की सजा पर रोक लगाई थी।
31 जनवरी 2012 : सुप्रीम कोर्ट में शुरू हुई मामले की सुनवाई। कसाब का पक्ष रखने के लिए वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन को एमिकस-क्यूरी नियुक्त किया गया।
25 अप्रैल 2012 : कसाब की अपील पर कोर्ट ने सुनवाई पूरी की और फैसला सुरक्षित रखा।
28 अगस्त 2012: मुंबई हमले के दोषी आमिर अजमल कसाब को फासी की सजा को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा। फहीम अंसारी और सबाउद्दीन अहमद के बॉम्बे हाईकोर्ट की रिहाई के फैसले को भी बरकरार रखा है। इन दोनों पर भारत से मुंबई हमलावरों को मदद करने का आरोप था।
21 नवंबर 2012 : राष्ट्रपति ने कसाब की दया याचिका खारिज कर उसे फांसी दे दी।