मंगलवार, 27 नवंबर 2012

तनोट राय (आवड़ माता) मंदिर : जहाँ पाकिस्तान सेना द्वारा गिराए गए बम नहीं फटे थे।







वाह एसा मंदिर व चमत्कार पहली बार सूना और
आज इस मंदिर को देखकर यकीन हो गया : महावीर प्रसाद
जैसलमेर से करीब 130 किमी दूर स्थि‍त माता तनोट राय (आवड़ माता) का मंदिर है। तनोट माता को देवी हिंगलाज माता का एक रूप माना जाता है। हिंगलाज माता शक्तिपीठ वर्तमान में पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के लासवेला जिले में स्थित है।
भाटी राजपूत नरेश तणुराव ने तनोट को अपनी राजधानी बनाया था। उन्होंने विक्रम संवत 828 में माता तनोट राय का मंदिर बनाकर मूर्ति को स्थापित किया था। भाटी राजवंशी और जैसलमेर के आस-पास के इलाके के लोग पीढ़ी दर पीढ़ी तनोट माता की अगाध श्रद्धा के साथ उपासना करते रहे। कालांतर में भाटी राजपूतों ने अपनी राजधानी तनोट से हटाकर जैसलमेर ले गए परंतु मंदिर तनोट में ही रहा।
तनोट माता का य‍ह मंदिर यहाँ के स्थानीय निवासियों का एक पूज्यनीय स्थान हमेशा से रहा परंतु 1965 को भारत-पाक युद्ध के दौरान जो चमत्कार देवी ने दिखाए उसके बाद तो भारतीय सैनिकों और सीमा सुरक्षा बल के जवानों की श्रद्धा का विशेष केन्द्र बन गई। सितम्बर 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हुआ। तनोट पर आक्रमण से पहले श‍त्रु (पाक) पूर्व में किशनगढ़ से 74 किमी दूर बुइली तक पश्चिम में साधेवाला से शाहगढ़ और उत्तर में अछरी टीबा से 6 किमी दूर तक कब्जा कर चुका था। तनोट तीन दिशाओं से घिरा हुआ था। यदि श‍त्रु तनोट पर कब्जा कर लेता तो वह रामगढ़ से लेकर शाहगढ़ तक के इलाके पर अपना दावा कर सकता था। अत: तनोट पर अधिकार जमाना दोनों सेनाओं के लिए महत्वपूर्ण बन गया था।
17 से 19 नवंबर 1965 को श‍त्रु ने तीन अलग-अलग दिशाओं से तनोट पर भारी आक्रमण किया। दुश्मन के तोपखाने जबर्दस्त आग उगलते रहे।तनोट की रक्षा के लिए मेजर जय सिंह की कमांड में 13 ग्रेनेडियर की एक कंपनी और सीमा सुरक्षा बल की दो कंपनियाँ दुश्मन की पूरी ब्रिगेड का सामना कर रही थी। शत्रु ने जैसलमेर से तनोट जाने वाले मार्ग को घंटाली देवी के मंदिर के समीप एंटी पर्सनल और एंटी टैंक माइन्स लगाकर सप्लाई चैन को काट दिया था।
दुश्मन ने तनोट माता के मंदिर के आस-पास के क्षेत्र में करीब 3 हजार गोले बरसाएँ पंरतु अधिकांश गोले अपना लक्ष्य चूक गए। अकेले मंदिर को निशाना बनाकर करीब 450गोले दागे गए परंतु चमत्कारी रूप से एक भी गोला अपने निशाने पर नहीं लगा और मंदिर परिसर में गिरे गोलों में से एक भी नहीं फटा और मंदिर को खरोंच तक नहीं आई।
सैनिकों ने यह मानकर कि माता अपने साथ है, कम संख्या में होने के बावजूद पूरे आत्मविश्वास के साथ दुश्मन के हमलों का करारा जवाब दिया और उसके सैकड़ों सैनिकों को मार गिराया। दुश्मन सेना भागने को मजबूर हो गई। कहते हैं सैनिकों को माता ने स्वप्न में आकर कहा था कि जब तक तुम मेरे मंदिर के परिसर में हो मैं तुम्हारी रक्षा करूँगी।
सैनिकों की तनोट की इस शानदार विजय को देश के तमाम अखबारों ने अपनी हेडलाइन बनाया। एक बार फिर 4 दिसम्बर 1971 की रात को पंजाब रेजीमेंट की एक कंपनी और सीसुब की एक कंपनी ने माँ के आशीर्वाद से लोंगेवाला में विश्व की महानतम लड़ाइयों में से एक में पाकिस्तान की पूरी टैंक रेजीमेंट को धूल चटा दी थी। लोंगेवाला को पाकिस्तान टैंकों का कब्रिस्तान बना दिया था। 1965 के युद्ध के बाद सीमा सुरक्षा बल ने यहाँ अपनी चौकी स्थापित कर इस मंदिर की पूजा-अर्चना व व्यवस्था का कार्यभार संभाला तथा वर्तमान में मंदिर का प्रबंधन और संचालन सीसुब की एक ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। मंदिर में एक छोटा संग्रहालय भी है जहाँ पाकिस्तान सेना द्वारा मंदिर परिसर में गिराए गए वे बम रखे हैं जो नहीं फटे थे।

सीसुब पुराने मंदिर के स्थान पर अब एक भव्य मंदिर निर्माण करा रही है। लोंगेवाला विजय के बाद माता तनोट राय के परिसर में एक विजय स्तंभ का निर्माण किया, जहाँ हर वर्ष 16 दिसम्बर को महान सैनिकों की याद में उत्सव मनाया जाता है। हर वर्ष आश्विन और चै‍त्र नवरात्र में यहाँ विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। अपनी दिनों दिन बढ़ती प्रसिद्धि के कारण तनोट एक पर्यटन स्थल के रूपमें भी प्रसिद्ध होता जा रहा है।

इतिहास: मंदिर के वर्तमान पुजारी सीसुब में हेड काँस्टेबल कमलेश्वर मिश्रा ने मंदिर के इतिहास के बारे में बताया कि बहुत पहले मामडिया नाम के एक चारण थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्त करने की लालसा में उन्होंने हिंगलाज शक्तिपीठ की सात बार पैदल यात्रा की। एक बार माता ने स्वप्न में आकर उनकी इच्छा पूछी तो चारण ने कहा कि आप मेरे यहाँ जन्म लें। माता कि कृपा से चारण के यहाँ 7 पुत्रियों और एक पुत्र ने जन्म लिया। उन्हीं सात पुत्रियों में से एक आवड़ ने विक्रम संवत 808 में चारण के यहाँ जन्म लिया और अपने चमत्कार दिखाना शुरू किया।सातों पुत्रियाँ देवीय चमत्कारों से युक्त थी। उन्होंने हूणों के आक्रमण से माड़ प्रदेश की रक्षा की।
काँस्टेबल कालिकांत सिन्हा जो तनोट चौकी पर पिछले चार साल से पदस्थ हैं कहते हैं कि माता बहुत शक्तिशाली है और मेरी हर मनोकामना पूर्ण करती है। हमारे सिर पर हमेशा माता की कृपा बनी रहती है। दुश्मन हमारा बाल भी बाँका नहीं कर सकता है।
माड़ प्रदेश में आवड़ माता की कृपा से भाटी राजपूतों का सुदृढ़ राज्य स्थापित हो गया। राजा तणुराव भाटी ने इस स्थान को अपनी राजधानी बनाया और आवड़ माता को स्वर्ण सिंहासन भेंट किया। विक्रम संवत 828 ईस्वी में आवड़ माता ने अपने भौतिक शरीर के रहते हुए यहाँ अपनी स्थापना की।
      विक्रम संवत 999 में सातों बहनों ने तणुराव के पौत्र सिद्ध देवराज, भक्तों, ब्राह्मणों, चारणों, राजपूतों और माड़ प्रदेश के अन्य लोगों को बुलाकर कहा कि आप सभी लोग सुख शांति से आनंद पूर्वक अपना जीवन बिता रहे हैं अत: हमारे अवतार लेने का उद्देश्य पूर्ण हुआ। इतना कहकर सभी बहनों ने पश्चिम में हिंगलाज माता की ओर देखते हुए अदृश्य हो गईं। पहले माता की पूजा साकल दीपी ब्राह्मण किया करते थे। 1965 से माता की पूजा सीसुब द्वारा नियुक्त पुजारी करता है।

गुरु नानक देव : सिखों के प्रथम गुरु



गुरु नानक देव
गुरू नानक देव, सिखों के प्रथम गुरु (आदि गुरु) हैं। इनके अनुयायी इन्हें गुरु नानक, बाबा नानक और नानकशाह नामों से संबोधित करते हैं। गुरु नानक अपने व्यक्तित्व में दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्मसुधारक, समाजसुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु - सभी के गुण समेटे हुए थे। इनका जन्म रावी नदी के किनारे स्थित तिलौंडा तलवंडी (पंजाब) नामक गाँव में (आधुनिक रायपुर) संवत् १५२७ में कार्तिकी पूर्णिमा (१५ अप्रैल, १४६९) को एक खत्री कुल एवं बेदी वंश में हुआ था । इनके पिता का नाम कल्यानचंद या कालू था । तलवंडी का नाम आगे चलकर नानक के नाम पर ननकाना पड़ गया। बचपन से इनमें प्रखर बुद्धि के लक्षण दिखाई देने लगे थे। लड़कपन ही से ये सांसारिक विषयों से उदासीन रहा करते थे । ७-८ साल की उम्र में स्कूल छूट गया और सारा समय वे आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में व्यतीत करने लगे। इनका विवाह सोलह वर्ष की अवस्था में गुरुदासपुर जिले के अंतर्गत लाखौकी नामक स्थान के रहनेवाले मूला की कन्या सुलक्ष्मी से हुआ था । ३२ वर्ष की अवस्था में इनके प्रथम पुत्र हरीचंद्र का जन्म हुआ । चार वर्ष पीछे दूसरे पुत्र लखमीदास का जन्म हुआ । गुरु नानक नित्य प्रात: बेई नदी में स्नान करने जाया करते थे। कहते हैं कि एक दिन वे स्नान करने के पश्चात वन में अन्तर्धान हो गये। उन्हें परमात्मा का साक्षात्कार हुआ। परमात्मा ने उन्हें अमृत पिलाया और कहा- मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ, मैंने तुम्हें आनन्दित किया है। जो तुम्हारे सम्पर्क में आयेगें, वे भी आनन्दित होगें। जाओ नाम में रहो, दान दो, उपासना करो, स्वयं नाम लो और दूसरों से भी नाम स्मरण कराओं। इस घटना के पश्चात वे अपने परिवार का भार अपने श्वसुर मूला को सौंपकर विचरण करने निकल पड़े और धर्म का प्रचार करने लगे। मरदाना उनकी यात्रा में बराबर उनके साथ रहा। ये चारों ओर घूमकर उपदेश करने लगे । १५२१ तक इन्होंने तीन यात्राचक्र पूरे किए, जिनमें भारत, अफगानिस्तान, फारस और अरब के मुख्य मुख्य स्थानों का भ्रमण किया।

क्रन्तिकारी तात्याटोपे को फांसी नहीं लगी थी






*** 1857 की क्रांति के महानायक तात्या टोपे ***

1857 की क्रांति के इस महानायक तांत्या टोपे का जन्म, 1814 में हुआ था। बचपन से ही ये अत्यंत सुंदर थे। तांत्या टोपे ने देश की आजादी के लिये हंसते-हंसते प्राणो का त्याग कर दिया। इनका जन्म स्थल नासीक था। इनके बचपन का नाम रघुनाथ पंत था। ये जन्म से ही बुद्धिमान थे। इनके पिता का नाम पांडुरंग पंत था। जब रघुनाथ छोटे थे उस समय मराठों पर पेशवा बाजीराव द्वितीय का शासन था। रघु के पिता बाजी राव के दरबार में कार्यरत थे। कई बार बालक रघु अपने पिता के साथ दरबार में जाते थे। एक बार बाजी राव बालक की बुद्धिमानी देखकर बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने बालक को एक टोपी उपहार में दी और उन्होंने उनको तांत्या टोपे नाम दिया। उसी दिन से लोग इन्हें इसी नाम से पुकारने लगे।
उस समय ब्रितानी भारत में व्यापार करने के लिये आए थे। लेकिन भारत के राजा आपसी फ़ूट के कारण आपस में ही झगड़ा किया करते थे इसलिये फ़िरंगी आसानी से यहां अपने पैर जमा पाए और तानाशाही कर पाए। ब्रितानियों ने बाजी राव पेशवा की सम्पत्ति हड़प ली व उनकी राजधानी को अपने अधिकार में ले लिया व उसके बदले में उन्हें 8 लाख रुपये दे दिये। बाजी राव ने उनकी तानाशाही मान ली और वहां से कानपुर चले गये। कई मराठा भी उनके साथ चले गये। उनके साथ पांडुराव व उनका परिवार भी चला गया लेकिन सभी में क्रांति की लहर दौड़ गयी। कुछ समय बाद बाजीराव पेशवा की मृत्यु हो गई। उनकी जगह नाना साहब को पेशवा बनाया गया, ये बहुत बहादुर थे। नाना साहब तांत्या टोपे के मित्र व सलाहकार थे।
    कानपुर में झांसी की रानी लक्ष्मी बाई, तांत्या टोपे, नाना साहब ने क्रांति की लहर फ़ैलाई। इन सबने युद्ध किया। तांत्या टोपे को भी युद्ध विद्या का प्रशिक्षण दिया गया। इस समय लार्ड डलहौजी गवर्नर जनरल था। उसने मराठों से उनकी जमीन छीन ली व उन पर अपना धर्म अपनाने के लिये दबाव ड़ाला, लेकिन नाना साहब, कुंवर सिंह, लक्ष्मीबाई, तांत्या टोपे जैसे धर्मनिष्ठ व स्वतंत्रता प्रिय लोगों ने उनका विरोध किया व उनसे युद्ध करने को आमादा हो गए। लेकिन ब्रिटिश सरकार की सेना सशक्त्त थी व उनके पास घातक हथियार व गोला बारुद था जो भारतीयों के पास नहीं था, लेकिन मराठों ने हार नहीं मानी व साहस से उनका सामना किया। फ़लस्वरू प प्रबल सैन्य शक्ति के कारण मराठा उनका सामना अधिक समय तक नहीं कर पाये लेकिन उन्होंने कई ब्रितानियों को मौत के घाट उतार दिया व कई लोग आजादी के लिये वीर गति को प्राप्त हो गये। तात्या टोपे न पकड़े गये न फाँसी लगी |
रचनाकार : टी.आर.शर्मा
संदर्भ - पाथेय कण (हिंदी पत्रिका)
दिनांक 16 अप्रैल (संयुक्तांक) 2007,
अंक : 1, पेज न. 82
1857 के स्वातंत्र्य समर के सूत्रधारो में तात्या टोपे का महत्वपूर्ण स्थान है। वे क्रांति के योजक नाना साहब पेशवा के निकट सहयोगी और प्रमुख सलाहकार थे। वे एक ऐसे सेना-नायक थे जो ब्रिटिश सत्ता की लाख कोशिशों के पश्चात भी उनके कब्जे में नहीं आए। इनको पकड़ने के लिए अंग्रेज सेना के 14-15 वरिष्ठ सेनाधिकारी तथा उनकी 8 सेनाएं 10 माह तक भरसक प्रयत्न करती रहीं, परन्तु असफल रहीं। इस दौरान कई स्थानों पर उनकी तात्या से मुठभेड़ें हुई परन्तु तात्या उनसे संघर्ष करते हुए उनकी आँखों में धूल झोंककर सुरक्षित निकल जाते।
महत्त्वपूर्ण दस्तावेज
उनको हुई कथित फाँसी के सम्बन्ध में तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने दस्तावेज तथा समकालीन कुछ अंग्रेज लेखक तथा बाद में वीर सावरकर, वरिष्ठ इतिहासकार आर. सी. मजूमदार व सुरेन्द्र नाथ सेन ने अपने ग्रंथों में तात्या टोपे को 7 अप्रैल, 1859 में पाड़ौन (नवरवर) राज्य के जंगल से, उस राज्य के राजा मानसिंह द्वारा विश्वासघात कर पकड़वाना बताया है। 18 अप्रैल, 1859 को शिवपुरी में उनको फाँसी देने की बात भी लिखी गई है। कुछ समय पूर्व तक यही इतिहास का सत्य माना जाता रहा है। परन्तु गत 40-50 वर्षो में कुछ लेखकों व इतिहासकारों ने परिश्रम पूर्वक अन्वेषण कर अपने परिपुष्ट तथ्यों व साक्ष्यों के आधार पर इस पूर्व ऐतिहासिक अवधारणा को बदल दिया है।
"तात्या टोपे के कथित फाँसी - दस्तावेज क्या कहते हैं" नाम छोटी परन्तु महत्वपूर्ण पुस्तक के रचियता गजेन्द्र सिंह सोलंकी तथा च् तात्या टोपे छ नामक ग्रंथ के लेखक श्री निवास बाला जी हर्डीकर ऐसे लेखको में अग्रणी हैं। दोनों ही लेखक इस पर सहमत हैं कि 18 अप्रैल को शिवपुरी में जिस व्यक्ति को फांसी लगी थी वह तात्या नहीं थे बल्कि वह तात्या के साथी नारायण राव भागवत थे। इनका कहना है कि राजा मानसिंह तात्या के मित्र थे। उन्होंने योजनापूर्वक नारायण राव भागवत को अंग्रेजों के हवाले किया और तात्या को वहाँ से निकालने में मदद की। जिन दो पंडितों का उल्लेख अंग्रेज लेखकों तथा भारतीय इतिहासकारों ने घोड़ो पर बैठकर भाग जाने का किया है, वे और कोई नहीं, तात्या टोपे और पं. गोविन्द राव थे जो अंग्रेजों की आँखों में धूल झोंककर निकल गए।
वे मेरे बाबा थे |
राजा मानसिहं स्वयं अंग्रेजों के शत्रु थे और उनसे बचने के लिए, छिपकर पाडौन के जंगलों में रह-रहे थे। अंग्रेजों ने चालाकी से उनके घर की महिलाओ को बंदी बना दिया और उनको छोड़ने की शर्त जो अंग्रेजों ने रखी थी वह थी मानसिंह द्वारा समर्पण करना तथा तात्या को पकड़ने में मदद करना। यह बात तात्या को पकड़ने वाले प्रभारी अंग्रेज मेजर मीड ने स्वयं अपने पत्र में लिखी है। इस शर्त के बाद तात्या टोपे तथा राजा मानसिंह ने गम्भीर विचार विमर्श कर योजना बनाई, जिसके तहत मानसिंह का समर्पण उनके परिवार की महिलाओं का छुटकारा तथा कथित तात्या की गिरफ्तारी की घटनाएं अस्तित्व में आई।
इसमें ध्यान देने की बात यह है कि जिसको स्वयं मेजर मीड ने भी लिखा है कि तात्या को पकड़ने के लिए राजा मानसिंह ने अपने ऊपर जिम्मेदारी ली थी। यह तात्या को पकड़ने की एक शर्त थी, जिसे अंग्रेज सरकार ने (मेजर मीड के द्वारा) स्वीकार किया था। वास्तव में यह राजा मानसिंह व तात्या की एक चाल थी।
नारायण राव भागवत को लगी फाँसी के सम्बन्ध में जो एक महत्वपूर्ण तथ्य दोनों लेखकों के सामने आया, उसका उल्लेख उन दोनों ने इस प्रकार किया है- 'बचपन में नारायण राव (तात्या के भतीजे) ग्वालियर में जनकंगज के स्कूल में पढ़ते थे, उस समय स्कूल के प्राधानाचार्य रघुनाथराव भागवत नाम के एक सज्जन थे। एक दिन रघुनाथ राव ने बालक नारायणराव को भावना पूर्ण स्वर में बताया कि "तुम्हारे चाचा फाँसी पर नहीं चढ़ाए गए थे। उनकी जगह फाँसी पर लटकाये जाने वाले व्यक्ति मेरे बाबा थे।" दोनों लेखकों के अनुसार उन्होंने स्वयं भी रघुनाथराव भागवत के बाबा को हुई फाँसी की बात का अनुमोदन उनके पौत्र रघुनाथराव के प्राप्त किया।'
चिट्ठियों के साख्य
"तात्या टोपे की कथित फाँसी दस्तावेज क्या कहते हैं?" पुस्तक के लेखक गजेन्द्र सिंह सोलंकी स्वयं राजा मानसिंह के प्रपौत्र राजा गंगासिंह से उनके निवास पर मिले थे। जब राजा मानसिंह के कथित विश्वासघात की बात हुई तो उन्होंने इस बात को झूठा बताया। आग्रह करने पर उन्होंने लेखक को उनके पास पड़ा पुराना बस्ता खोलकर उसमें पड़े कई पत्र और दस्तावेज खोलकर दिखाए। जिसमें दो और पत्र थे जो तात्या जी की कथित फाँसी के बाद तात्या को लिखे गए थे।
संवत् 1917 (सन् 1960) में लिखी चिट्ठी का नमूना लेखक ने अपनी पुस्तक के पृष्ठ 54 पर इस प्रकार दिया है-
"सिद्धे श्री राजे मान्य राजे श्री महाराज तांतिया साहिब पांडुरंग जी एतैसिद्ध श्री महाराजधिराज श्री राजा नूपसिंह जू देव बहादुर की राम-राम बांचने। आगे आपकी कृपा से भले हैं। आगे हम मुआने आइके राठ में पो होचे आपु के पास पौचत है इस वास्ते इतल करौ है आप के मोरचा लगै है जिसमे हमको कोई रास्ता मैं रोके नहीं जादा, शुभ मिती फागुन सुदी 6 सं. 1917"
इस पत्र की मूल प्रति अभिलेखागार भोपाल में तात्या टोपे की पत्रावली में सुरक्षित है। यह चिट्ठी राजा नृपसिंह द्वारा तात्या को लिखी गई है। तात्या को कथित फाँसी संवत् 1919 (सन् 1859) में लगी थी।
इस प्रकार संवत् 1918 में लिखी दूसरी चिट्ठी महारानी लडई रानी जू के नाम है, जो राव माहोरकर ने लिखी है जिसमें तात्या के जिंदा रहने का सबूत है। इस पत्र की फोटो प्रति लेखक ने अपनी पुस्तक में दी है।
इसके अतिरिक्त 2 अन्य पत्रों के अंश भी उस्क पुस्तक में दिये गये हैं, जिसमें तात्या को सरदार नाम से सम्बोधित किया गया है। जिसमें पहला पत्र राजाराम प्रताप सिंह जू देव का लिखा हुआ है, जो तातिया को कथित फांसी के एक वर्ष दो माह बाद का लिखा हुआ है। यह पत्र राजा मानसिंह को सम्बोधित किया गया है।
दूसरा पत्र भी राजा मानसिंह को सम्बोधित है और वह पं. गोविन्दराव द्वारा कथित फाँसी के चार वर्ष बाद का लिखा हुआ है।
प्रथम पत्र के अंश- "आगे आपके उहां सिरदार हमराह पं. गोविन्दराव जी सकुशल विराजते हैं और उनके आगे तीरथ जाइवे के विचार है आप कोई बात की चिन्ता मन में नल्यावें...."
दूसरे पत्र का अंश- "अपरंच आपको खबर होवे के अब चिंता को कारण नहीं रहियो खत लाने वारा आपला विश्वासू आदमी है कुल खुलासे समाचार देहीगा सरदार की पशुपति यात्रा को खरच ही हीमदाद (इमदाद) खत लाइवे वारे के हाथ भिजवादवे की कृपा कराएवं में आवे मौका मिले में खुसी के समाचार देहोगे।"
पाठकों को ज्ञात हो कि कालपी का युद्ध सरदार (तात्या) के नेतृत्व में लड़ा गया था। उसे सरदार घोषित किया गया था। जो बस्ता टीकमगढ़ से प्राप्त हुआ है उसमें भी तात्या को सरदार सम्बोधित किया गया है। इन दोनों चिट्टियों को राजा मानसिंह के प्रपौत्र राजा गंगासिंह ने पहली बार सन् 1969 में घ् धर्म युग ' में प्रकाशित कराया था। प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता डॉ. मथुरालाल शर्मा ने इन पत्रों की अनुकृतियों को देखकर प्रसन्नता प्रकट की तथा इसे सही घोषित करते हुए शोध के लिए उपयोगी बताया था।
तात्या के परिवार के सदस्य तात्या को फाँसी हुई नहीं मानते-
तात्या टोपे के परिवार के सदस्यों का भी यही कहना है कि उनको अंग्रेजों द्वारा फाँसी नहीं दी गई तथा उनकी मृत्यु बाद में हुई। इस सम्बन्ध में उपरोक्त दोनों लेखकों ने तात्या के परिवार के सदस्यों से हुई वार्ता का उपनी पुस्तकों में इस प्रकार उल्लेख किया है-
1.बम्बई में 1857 के शताब्दी समारोह में तात्या टोपे के भतीजे प्रो. टोप तथा तात्या की भतीजी का सम्मान किया गया। अपने सम्मान का उत्तर देते हुए दोनों ने बताया कि तात्या को फाँसी नहीं हुई। उनका कहना था कि उनकी मृत्यु सन् 1909 ई. में हुई। तभी उनके विधिवत् संस्कार आदि किये गए थे।
2.तात्या के वंशज आज भी ब्रह्मावर्त (बिठूर) तथा ग्वालियर में रहते है। इन परिवारों का विश्वास है कि तात्या की मृत्यु फाँसी के तख्ते पर नहीं हुई। ब्रह्मावर्त में रहने वाले तात्या के भतीजे श्री नारायण लक्ष्मण टोपे तथा तात्या की भतीजी गंगूबाई (सन् 1966 में इनकी मृत्यु हो चुकी है) का कथन है कि वे बालपन से अपने कुटुम्बियों से सुनते आये हैं कि तात्या की कथित फाँसी के बाद भी तात्या अक्सर विभिन्न वेशों में, अपने कुटुम्बियों से आकर मिलते रहते थे। तात्या के पिता पांडुरंग तात्या 27 अगस्त 1859 को ग्वालियर के किले से, जहाँ वह अपने परिवार के साथ नजरबंद थे, मुक्त किये गए। मुक्त होने पर टोपे कुटुम्ब पुनः ब्रह्मावर्त वापिस आया। उस समय पांडुरंग (तात्या के पिता) के पास न पैसा था और न कोई मित्र था। इस संकट काल में तात्या वेश बदलकर अपने पिता से आकर मिले थे तथा घन देकर सहायता की थी।
3.सन् 1861 इं. में तात्या की सौतेली बहन (दूसरी माँ से) दुर्गा का विवाह काशी के खुर्देकर परिवार में हुआ था। श्रीनारायण राव टोपे का कथन है कि इस अवसर पर भी तात्या गुप्तवेश में उपस्थित हुए थे तथा उन्होंने विवाह के लिए आर्थिक सहायता की थी।
4.तात्या के पिता तथा उसकी सौतेली माता का कुछ ही महीने के अन्तर पर सन् 1862 में काशी में देहावसान हुआ। टोपे परिवार के लोगों का कहना है कि इस समय भी तात्या सन्यासी के वेश में अपने माता-पिता की मृत्यु-शय्या के पास उपस्थित थे।
5.ग्वालियर में रहने वाले श्री शंकर लक्ष्मण टोपे का कथन है कि जब वे 13 वर्ष के थे तो एक बार उनके पिता (तात्या के सौतेले भाई) बीमार हुए। उन्हें देखने के लिए एक संन्यासी आये। मेरे पिता ने मुझे बुलवाया और कहा कि ये तात्या हैं इन्हें प्रमाण करो। इस समय शंकर की आयु कोई 75 वर्ष की है। इनके अनुसार यह घटना सन् 1895 ई. के आस-पास की है अर्थात् तात्या की कथित फाँसी के 36 वर्ष बाद की।
ऐतिहासिक साक्ष्य
नजरबंदी से मुक्त होने के बाद तात्या के भाइयों को आर्थिक संकट के कारण जीविका की खोज में इधर-उधर भटकना पड़ा। उनके एक भाई रामकृष्ण 1862 ई. में बडौदा के महाराजा गायकवाड़ के पास पहुँचा। उनको उसने परिचय दिया मैं तात्या का भाई हूँ तथा नौकरी की खोज में यहाँ आया हूँ। महाराजा ने उसे गिरफ्तार कर उसे वहाँ के अंग्रेज रेजीडैंट को सौंप दिया। उसने राम कृष्ण से अनेक प्रश्न किये। उनमें एक प्रश्न यह भी था कि, "आजकल तात्या टोपे कहां पर हैं?" तात्या की कथित फाँसी के 3 वर्ष बाद एक जिम्मेदार अंग्रेज अफसर द्वारा ऐसा प्रश्न करना आश्चर्यजनक और संदेहास्पद था। रामकृष्ण ने इसके उत्तर में तात्या के बारे में मालूम न होने की बात कही।
इस ऐतिहासिक घटना का उल्लेख " सोर्समेटेरियल फॉर द हिस्ट्री ऑफ फ्रीडम मूवनमेन्ट इन इंडिया। (बोम्बे गवर्नमेन्ट रिकॉर्ड्स) वाल्युम 1 पी. पी. 231-237 पर अंकित है।"
यह प्रश्न राव साहब पेशवा पर चले मुकदमे (1862 में) के दौरान भी उनसे पूछा गया था, जो राव साहब की केस की मूल पत्रावली (फाईल) में अंकित है। तात्या के सम्बन्ध में उक्त प्रश्न उनकी फाँसी पर अंग्रेजों में व्याप्त संदेह को प्रकट करते हैं।
इतिहास की इस नई जानकारी के पक्ष में और भी कई तथ्य उक्त पुस्तकों में दिये गए हैं, जिनमें कुछ इस प्रकार हैं- पद्म स्व. डॉ. वाकणकर का कहना था कि अम्बाजी का प्रसिद्ध मंदिर तात्या टोपे द्वारा बनवाया गया। उस मंदिर के एक कोने में जो साधु वेश में चित्र लगा है, वह तात्या टोपे का ही है। गुजरात में नवसारी क्षेत्र में साधुवेश में उनकी प्रतिष्ठा चर्चित है।
बीकानेर के पुरालेखागार में 1857 के फरारशुदा लोगों की सूची में तात्या का भी नाम है। झांसी से प्रसारित एक भेंट वार्ता में तात्या के बच निकलने व उनकी मृत्यु के अनेक प्रसंग छपे हैं।
तात्या के मुकदमे में जो अत्यधिक शीघ्रता की गई उससे यह संदेह होने लगता है कि इस जल्दी की आड़ में सरकार कोई न काई बात छिपाने की कोशिश कर रही थी।
तात्या के हस्ताक्षर नहीं
ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार तात्या टोपे के स्थान पर पकड़ गए व्यक्ति को जल्दी से जल्दी फाँसी पर लटकाकर छुट्टी पाना चाहती थी। पाठकों को मालूम हो कि कथित तात्या को 7 अप्रैल, 1859 को पड़ौन के जंगलों से पकड़ा गया। 15 अप्रैल 1859 को सैनिक अदालत में मुकदमा चलाया गया। उसी दिन फैसला सुनाकर 18 अप्रैल 1859 को सायंकाल फाँसी दे दी गई। शिवपुरी जहाँ उन्हें फाँसी दी गई वहाँ के विनायक ने अपनी गवाही में कहां कि में तात्या को नहीं पहचानता।
जो भी गवाह पेश किये गए वे सरलता पूर्वक अंग्रेज अफसरों द्वारा प्रभावित किये जा सकते थे। इनमे एक भी स्वतंत्र गवाह नहीं था। ब्रह्मवर्त (बिठूर) या कानपुर का एक भी गवाह नहीं था, जो तात्या को अच्छी तरह पहचानता हो।
फाँसी पर चढ़े तात्या टोपे ने अपने मुकदमे के बयान पर जो हस्ताक्षर किये वे मराठी भाषा की मोड़ी लिपि में इस प्रकार थे-"तात्या टोपे कामदार नाना साहब बहादुर" ये हस्ताक्षर फांसी पर चढ़े व्यक्ति ने अंग्रेजों को विश्वास दिलाने के लिए किये थे, क्योंकि अंग्रेज तात्या को इस नाम से पहचानते थे। महाराष्ट्र में हस्ताक्षर करने की जो पद्धति है उसमें सबसे पहले स्वयं का नाम, बाद में पिता का नाम तत्पश्चात् कुटुम्ब का नाम होता है। उसके अनुसार तात्या के हस्ताक्षर इस प्रकार होते- रामचन्द्र (तात्या का असलीनाम) पांडुरंग टोपे या रामचन्द्र राव या पंत टोपे। राव साहब पेशवा ने अपने मुकदमे के कागजों पर पांडुरंग राव ही हस्ताक्षर किये थे। उपरोक्त हस्ताक्षरों से स्पष्ट होता है कि वे तात्या के नहीं थे।