शनिवार, 1 दिसंबर 2012

आत्मविश्वास को बढाएं





खुदी को कर बुलंद इतना..
May 16, 12:26 am
- मीनाक्षी स्वामी

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आत्मविश्वास के बगैर आप सफल जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकतीं। सांसें लेना और छोड़ना ही जिंदगी नहीं है। जिंदगी का आशय है आत्मविश्वास के साथ सम्मानपूर्वक अपने किसी सकारात्मक मिशन और लक्ष्य को हासिल करना, लेकिन हर तस्वीर के दो पहलू होते हैं। आत्मविश्वास के बारे में भी यही बात लागू होती है। आत्मविश्वास के बारे में चर्चा करना आसान है, पर खुद को वास्तविक रूप में आत्मविश्वासी बनाना सहज बात नहीं है। मशहूर मनोवैज्ञानिक एब्राहम मैसलो का कहना था कि अक्सर पुरुष और महिलाएं स्वयं की योग्यताओं को कमतर करकर आंकते है। यही कारण है कि उनमें आत्मविश्वास की कमी होती है। आत्मविश्वास की कमी का ही यह नतीजा होता है कि वह उन लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पाते, जिन्हे दूसरे लोग हासिल कर लेते है। कुछ लोग तो ऐसे होते है कि आत्मविश्वास की कमी के कारण किसी कार्ययोजना पर प्रयास ही शुरू नहीं करते।
मनोचिकित्सकों की राय में चुनौतियां स्वीकारने से ही व्यक्ति के मन में आत्मविश्वास का जज्बा पैदा होता है। जब आप अपनी जिंदगी व हालात को सुचारु रूप से नियंत्रित करती है, तब आप स्वयं को आत्मविश्वासी महसूस करती है। अधिकतर बिहेवियरल एक्सप‌र्ट्स की राय है कि तनाव व हीनता की ग्रंथि के कारण व्यक्ति का आत्मविश्वास विचलित हो जाता है और वह हालात पर से अपना नियंत्रण खो देता है।
आत्मविश्वास को बढ़ावा देने वाले कुछ सुझाव-

[संबंधों में सुधार]
आत्मविश्वासी होने पर आपके परिवेश से जुड़े लोगों के साथ संबंधों में स्वत: ही सकारात्मक सुधार होने लगता है। आप जितना अधिक आत्मविश्वासी बनती जाती है, उतने ही आपके सामाजिक और व्यावसायिक संबंध अधिक अच्छे, व्यापक और गहरे होते जाते हैं। आपके संपर्को का दायरा भी स्वत: बढ़ जाता है। लोग आपके व्यक्तित्व से आकर्षित होकर खुद-ब-खुद आपके पास चले आते है।

[कॅरियर में कामयाबी]
आंतरिक आत्मविश्वास आपको सफलता की राह पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। आत्मविश्वासी व्यक्ति अपने कॅरियर में भी आगे बढ़ता है। असल में कोई भी नियोक्ता अपने कर्मचारी को आत्मविश्वास से परिपूर्ण देखना चाहता है। कारण, उसे पता रहता है कि ऐसा शख्स किसी भी चुनौती या कार्य का समाधान करने की हरसंभव कोशिश करता है। इसके साथ ही वह सकारात्मक सोच रखता है। नियोक्ता इस बात को अच्छी तरह जानते है कि कोई भी व्यक्ति जॉब से संबंधित जिम्मेदारियों को तो चंद दिनों में सीख सकता है, पर आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच ऐसे गुण है, जो चंद दिनों में या अचानक पैदा नहीं होते। ये आपके व्यक्तित्व के गुण है।

[हाव-भाव का महत्व]
आप अपने व्यक्तित्व व हावभाव को बाहरी रूप से किस तरह से पेश करती है, यह बात भी आपके आत्मविश्वास को बढ़ाती है। जैसे मुस्कराते हुए प्रेम और विश्वास के साथ दूसरों के साथ संवाद स्थापित करना। अगर आप खुशमिजाजी से दूसरों के साथ पेश आएंगी, तो इससे दूसरे लोग बरबस ही आपके व्यक्तित्व की ओर आकर्षित होंगे।

[कुशल वार्ताकार बनें]
जो लोग बात करने में कुशल होते है, उन्हे लोग सराहते ही नहीं है, बल्कि ऐसे लोग दूसरों पर प्रभाव छोड़कर अपना कार्य भी करवा लेते है। संवाद स्थापित करने का हुनर एक दिन में नहीं आता। यह अभ्यास से विकसित होता है। जो लोग कुशल वार्ताकार है, उनकी बातों को एक अच्छी श्रोता बनकर सुनें। जिन लोगों की संवाद क्षमता से आप प्रभावित है, उनके बोलने का अंदाज, हावभाव और बॉडी लैंग्वेज आदि को निरीक्षित करे। खुद भी अध्ययन करे और अवसर आने पर सामाजिक समारोह या किसी फंक्शन में बोलें। अपने विचार और प्रतिक्रिया व्यक्त करे।

[आत्मचिंतन करे]
आत्मविश्वास का जज्बा विकसित करने के लिए यह जरूरी है कि आप खुद पर विश्वास करे यानी किसी पर निर्भर होकर फैसले न लें। अक्सर होता यह है कि लोग सही कार्य कर रहे है या गलत, इन बातों की जानकारी के लिए अपने किसी प्रियजन या दोस्त की राय लेते है। सहेलियों व दोस्तों से राय लेना बुरा नहीं है, पर इस क्रम में हमारा जोर इस बात पर है कि आप सुनें सबकी, लेकिन अपने कॅरियर और जिंदगी से संबंधित फैसले आत्मचिंतन करने के बाद करे। साथ ही कोई फैसला लेने से पहले अपने अंतर्मन की पुकार भी सुनें।

[जोखिम लें]
कॅरियर में आपको जोखिम उठाना चाहिए। जोखिम उठाने का आशय यह नहीं कि आप आगा-पीछा सोचे बगैर कोई निर्णय लें। अगर कॅरियर में आपको कोई अच्छा अवसर मिल रहा है, तो उसे इसलिए हाथ से न गंवाएं कि मैं जहां हूं, वहीं पर ठीक हूं। कॅरियर में कुछ अवसर ऐसे भी आते है, जब आगे बढ़ने के लिए आपको जोखिम भी उठाने पड़ सकते है। जोखिम उठाने से आपके आत्मविश्वास में इजाफा होता है।

[नकारात्मक सोच से बचें]
आपके आत्मविश्वासी बनने की राह में एक सबसे बड़ी बाधा नकारात्मक सोच व विचार हैं। निराशावादी सोच आपके मन-मस्तिष्क को कुंठित कर आपके आत्मविश्वास को डगमगा देती है। नकारात्मक सोच से बचने की एक ही दवा है सकारात्मक सोच। सकारात्मक यानी आशावादी सोच विपरीत स्थितियों में भी आपका आत्मविश्वास बरकरार रखती है। अपने मन में इस तरह के सकारात्मक वाक्यों जैसे जो कार्य मैंने अपने हाथ में लिया है, उसमें मैं कामयाबी हासिल करके ही रहूंगी आदि को मन में बैठाएं।

[अभ्यास से पूर्णता आती है]
वस्तुत: कोई व्यक्ति जन्म से नकारात्मक सोच लेकर पैदा नहीं होता। असल में नकारात्मक सोच यह संकेत देती है कि आप में सकारात्मक ढंग से सोचने का हुनर नहीं है। साथ ही आप में आत्मविश्वास की भी कमी है। इसलिए आप भयों और आशंकाओं से घिरी है। अपने जीवन में सकारात्मक सोच को तरजीह दें। इसके लिए अभ्यास की जरूरत है। यह भी याद रखें कि विफलता कभी भी अंतिम नहीं होती और सफलता का सिलसिला कभी खत्म नहीं होता।
[मीनाक्षी स्वामी]

रामलला 20 साल से टाट में....



रामलला 20 साल से टाट में
2014 में शुरू हो जाएगा राम मंदिर का निर्माण -अशोक सिंहल
तारीख: 12/1/2012
-Dev Nagar
विश्व हिंदू परिषद के संरक्षक श्री अशोक सिंहल राम मंदिर के निर्माण को लेकर अति उत्साहित दिखे। उन्होंने कहा कि केंद्र में हिंदूवादी सरकार बनाने की जरूरत है। उससे अयोध्
या में राम मंदिर के निर्माण का रास्ता प्रशस्त होगा। उन्होंने संकल्प के साथ कहा कि 2014 में मंदिर निर्माण शुरू हो जाएगा। उससे पहले पूरे देश में संतों के मार्गदर्शन में जनजागरण अभियान चलाया जाएगा।
श्री सिंघल बीते दिनों एक दिन के प्रवास पर अयोध्या में थे। इसी दौरान दूरभाष पर बातचीत में उन्होंने कहा कि रामलला अब बहुत दिनों तक टाट की झोपड़ी (तिरपाल से ढंका अस्थाई मंदिर) में नहीं रह सकते। उनका मंदिर पूरी भव्यता के साथ बनेगा। 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी ढांचा गिरा था, अब 20 साल बीत गए हैं। 20 साल की प्रतीक्षा के बाद अब मंदिर बनाने का समय आ गया है। उन्होंने ब्रह्मलीन देवरहा बाबा का स्मरण करते हुए कहा कि उनकी इच्छा को हर हाल में पूरा किया जाएगा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि राम मंदिर न्यायालय का विषय नहीं है। उसकी परिधि से बाहर का विषय है। उसके लिए तो संसद ही कानून बनाएगी। इसके लिए केंद्र में चाहिए हिन्दूवादी सरकार, वह भी पूरे बहुमत की सरकार, ताकि वह मंदिर के लिए संसद में कानून बना सके।
उन्होंने व्यापक जनजागरण की जरूरत बतायी। जनजागरण के लिए पूरे देश में 'जयराम जयराम, जय-जयराम' मंत्र का करोड़ों लोग जाप करेंगे। इस अनुष्ठान के साथ प्रयाग के महाकुंभ में मंदिर निर्माण की रणनीति को अंतिम रूप दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि रामजन्भूमि का आंदोलन मात्र मंदिर बनाने का आंदोलन नहीं है, यह हिंदू संस्कृति की रक्षा का आंदोलन है। हम चाहे मर जाएं लेकिन अयोध्या में किसी भी सूरत में किसी भी मस्जिद का निर्माण स्वीकार नहीं करेंगे। देश के करोड़ों हिन्दुओं के लिए राम मंदिर आस्था का विषय है। सारा हिंदू समाज उसके लिए कटिबद्ध है और कोई भी कुर्बानी देने के लिए तैयार है। मंदिर का विरोध करने वाले सेकुलर राजनीतिक दलों का विरोध रामभक्तों के जनजागरण के आगे निष्प्रभावी हो जाएगा।
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अयोध्या आंदोलन के बीस वर्ष, शौर्य दिवस (6 दिसंबर) पर विशेष तेज हो रही है संकल्प की लौ -
-Dev Nagar
बीते 26 नवंबर को अयोध्या के कारसेवकपुरम में विशाल संत सम्मेलन हुआ। रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपालदास समेत बड़ी संख्या में अयोध्या के संतों और महंतों ने इसमें हिस्सा लिया। सभी संतों ने राम मंदिर निर्माण के प्रति प्रतिबध्दता जताते हुए यह संकल्प दोहराया कि अयोध्या की शास्त्रीय सीमा में किसी भी मस्जिद का निर्माण स्वीकार नहीं करेंगे। विहिप संरक्षक श्री अशोक सिंहल को सभी संतों ने विश्वास दिलाया कि राम मंदिर के उनके प्रयासों को सभी संतों का सर्वथा समर्थन व आशीर्वाद प्राप्त है।
6 दिसंबर, 1992 से 6 दिसम्बर, 2012! पूरे 20 साल। तब रामजन्मभूमि परिसर स्थित गुलामी के प्रतीक बाबरी ढांचे को ढहा दिया गया था। इसकी आड़ में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर दिया गया था। केंद्र में सरकार थी कांग्रेस की। प्रधानमंत्री थे पी.वी. नरसिंह राव। बीते 20 सालों में सरयू में पानी काफी बह चुका है। केंद्र में कई सरकारें आईं, उत्तर प्रदेश में भी राजनीतिक परिवर्तन हुए।
तब भी तिरपाल अब भी तिरपाल
पिछले 20 सालों में अगर कुछ नहीं बदला है तो केवल रामलला का घर। जैसे पहले वह तिरपाल में रहते थे, वैसे ही अब भी तिरपाल में रहते हैं। अस्थाई मंदिर ही उनका आवास है। वही अवरोध, वही प्रतिबंध, वही बाधाएं। दर्शन करने में वही परेशानी। अयोध्या में प्रवेश करते ही रामलला मंदिर की ओर बढ़िए तो सबसे पहले सुरक्षा बलों की पूछताछ और जांच-पड़ताल से गुजरना पड़ता है। जैसे-तैसे मंदिर के मुख्य द्वार तक पहुंचे तो वहां दो-तीन बार गहन तलाशी के बाद अंदर प्रवेश की इजाजत। रामलला के पास तक पहुंचते ही भक्त हालांकि हर परेशानी को भूल जाता है, लेकिन उसे उनके दर्शन दूर से ही करने पड़ते हैं। वहां के पुजारी उसका चढ़ावा आदि रामलला के पास तक पहुंचाते हैं। उसकी इच्छा रहती है कि वह अपने रामलला का दर्शन नजदीक से करे। इसकी टीस संतों से लेकर अयोध्या आने वाले हर श्रद्धालु के मन में है। कार्तिक पूर्णिमा का अवसर हो, 14 कोसी या पंचकोसी परिक्रमा का अवसर या कोई अन्य त्योहार, अयोध्या आने वाले हर भक्त के मन में यह आकांक्षा होती है कि उसके रामलला का मंदिर भव्यता प्राप्त करे।
मजबूत है रामलला का पक्ष
पिछले साल अक्तूबर में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला आया रामलला के पक्ष में। न्यायालय ने रामलला को पक्षकार माना और कहा कि केंद्र सरकार द्वारा अधिग्रहीत भूमि का एक तिहाई (बीच का हिस्सा) हिस्सा उनका है। न्यायालय ने निर्मोही अखाड़े और 'बाबरी मस्जिद' पक्षों की याचिकाओं को कालबाह्य मानते हुए खारिज कर दिया। दोनों का एक-एक तिहाई हिस्से पर अधिकार माना। प्रकारांतर से दो तिहाई हिस्सा हिंदू पक्ष को मिला। हालांकि इस पर उच्च न्यायालय ने रोक लगी दी है। विभिन्न न्यायालयों में रामलला के सखा त्रिलोकी नाथ पांडे कहते हैं कि यह रोक ठीक है, क्योंकि असल पक्षकार तो रामलला हैं और पूरा परिसर उनका ही है।
हर हाल में बनेगा मंदिर
हनुमान गढ़ी में महंत मनमोहन दास से मुलाकात हुई तो बेचैन दिखे, कहा, राम मंदिर का निर्माण हर हिंदू की अभिलाषा है। यह उसके स्वत्व से जुड़ा प्रश्न है। 20 साल हो गए, अब बहुत प्रतीक्षा हो गई। हिंदू समाज कितना बर्दाश्त करेगा? तब हिंदू समाज की एकजुटता से ढांचा ढहा था, अब मंदिर बनाने के लिए भी उसी एकजुटता की जरूरत है। उन्होंने कहा कि पिछले 20 साल में हिंदू समाज में मंदिर निर्माण को लेकर उत्सुकता बनी हुई है। अब समय आ गया है कि हिन्दू समाज फिर से एकजुट हो। अयोध्या स्थित रामबल्लभा कुंज के अधिकारी राजकुमार दास कहते हैं कि राम मंदिर बनेगा। उसके लिए अब शांतिपूर्ण तरीके से दबाव बनाने की जरूरत है। ऐसा दबाव बने जो केंद्र और प्रदेश सरकारों को बाध्य करे ताकि वे उसके पक्ष में खड़ी होने के लिए विवश हो जाएं। वह कहते हैं कि केंद्र में दृढ़ इच्छाशक्ति वाली सरकार चाहिए। रामलला तो हर हिंदू को प्राणों से भी प्यारे हैं। पिछली बार की तरह इस बार भी वरिष्ठ संतों के मार्गदर्शन में युवा संतों को आगे आने की जरूरत है।
अभी और कुर्बानी की जरूरत
रामभक्त देवन्द्र सिंह राठौर कहते हैं कि जिस दिन हिंदू समाज में एकजुटता आ जाएगी, उसी दिन मंदिर का रास्ता साफ हो जाएगा। एकजुटता के कारण ही 6 दिसंबर, 1992 को केंद्र सरकार की हिम्मत नहीं पड़ी कि वह ढांचा ढहाने का अभियान रोक पाए। मंदिर के लिए कोठारी बंधुओं सहित अनेक कारसेवकों का बलिदान आज भी प्रेरणा देता है कि राम मंदिर के लिए अभी और बलिदान की जरूरत है। अयोध्या-फैजाबाद में 'हिंदू हेल्पलाइन' के संयोजक गया प्रसाद तो मंदिर निर्माण को लेकर खासे उत्साहित हैं। वह कहते हैं कि राम मंदिर को लेकर संत समाज जो मार्गदर्शन देगा, उसी के अनुसार हिंदू युवा आगे काम करेंगे। ढांचा तो ढह चुका है, अब मंदिर बनाने की बारी है। 20 साल का समय बहुत होता है। मंदिर निर्माण की तैयारी चल रही है।
तैयारी तेज
राम मंदिर निर्माण की तैयारी देखनी हो तो अयोध्या आना होगा। दो प्रमुख केंद्र हैं तैयारी के। एक कारसेवकपुरम और दूसरा है श्रीराम कार्यशाला। कारसेवकपुरम में योजनाएं बनती हैं। कार्यशाला में मंदिर के लिए पत्थर तराशने का काम हो रहा है। देशभर से अयोध्या आने वाले भक्त रामलला के दर्शन करते हैं तो कार्यशाला और राम मंदिर के भव्य मॉडल को देखना नहीं भूलते। यहां आकर उनकी यह आशंका निर्मूल हो जाती है कि मंदिर नहीं बनेगा। यह देखकर कि कारीगरों द्वारा निरंतर पत्थरों को तराशने का काम हो रहा है, उनके मन को संतोष होता है। पास में ही एक स्थान पर करीब साढ़े तीन लाख रामशिलाएं भी रखी हैं, जिन्हें पूरे देश में 1989 में पूजा गया था। देश के कोने-कोने से पुजकर लाई गईं रामशिलाओं को देखकर भक्त प्रसन्न हो जाते हैं। इन भक्तों में कई ने उस समय इनको पूजा था। राजस्थान के कोटा से आईं फूलमती तो रामशिलाओं को देर तक निहारतीं रह गईं। यही हाल मॉडल देख रहे मध्य प्रदेश के राम प्रसाद और सूर्य प्रसाद का था। इन सभी का कहना था कि अब मंदिर बनने का उन्हें पूरी तरह विश्वास हो चुका है। साथ ही यह भी कहते हैं कि इस बार शांति से काम हो। शांति से ही मंदिर निर्माण को भव्य स्वरूप दिया जा सकेगा।
उत्साह में भारी बढ़ोतरी
न्यायालय में 'रामलला के सखा' त्रिलोकी नाथ पांडेय बताते हैं कि गत वर्ष उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद देशभर के रामभक्तों में नये उत्साह का संचार हुआ है। बड़ी संख्या में भक्त यहां आते हैं, कार्यशाला देखते हैं, मॉडल देखते हैं, रामशिलाओं को नमन करते हैं। रामशिलाओं के तराशने आदि में हर माह करीब दो लाख रुपये का खर्च आता है। मॉडल के पास दानपात्र में पहले माह भर में करीब 30-35 हजार रुपये चढ़ावा आता था। पिछले साल उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद उत्साह में बढ़ोतरी हुई है। धीरे-धीरे रामभक्तों की संख्या बढ़ रही है। चढ़ावा भी बढ़ने लगा है, अब करीब 80 हजार से लेकर एक लाख रुपये हर माह चढ़ावा आ रहा है। इससे पता चलता है कि मंदिर निर्माण को लेकर लोगों में कितना उत्साह है।