सोमवार, 3 दिसंबर 2012

रानी कलावती का त्याग



रानी कलावती का त्याग
रानी कलावती के साहस और बलिदान को शत शत  नमन ..!!

अल्लाउद्दीन खिलजी के सेनापति ने दक्षिण भारत पर विजय प्राप्त करने से पूर्व रास्ते मे एक छोटे से राज्य के राजा कर्णसिंह को अधीनता स्वीकार करने का प्रस्ताव भेजा | बिना युद्ध किये एक क्षत्रिय पराजय स्वीकार करले,यह कैसे संभव हो सकता है ? अत: कर्णसिंह ने यवनों से संघर्ष करने को तैयार हुआ | अंत:पुर में अपनी रानी से जब वह युद्ध के लिए विदा लेने गया तो उसकी रानी कलावती ने युद्ध में साथ चलने का निवेदन करते हुए कहा - " स्वामी ! मैं आपकी जीवनसंगिनी हूँ,मुझे सदा संग रहने का अवसर प्रदान कीजिये | सिंहनी के आघात अपने वनराज से दुर्बल भलें हों पर गीदड़ों व सियारों के संहार हेतु तो पर्याप्त है |" कर्णसिंह ने अपनी वीर पत्नी की भावनाओं को समझते हुए उसे साथ चलने की अनुमति दे दी | छोटी सी सेना का विशाल यवन सेना से मुकाबला था | रानी कलावती शस्त्र-सञ्चालन में निपुण थी | अपने पति की पार्श्व रक्षा करती हुई वह शत्रु का संहार कर रही थी | इधर स्वाधीनता की रक्षा करने वाले वीर राजपूत मृत्यु का वरण करने को उत्सुक थे और उनके सामने थे वेतनभोगी यवन सैनिक | घमासान युद्ध हो रहा था,इतने में एक आघात कर्णसिंह को लगा जिससे वे बेहोश हो गए | कलावती ने दोनों हाथों से शस्त्र सञ्चालन कर पति के आस-पास स्थित सारे शत्रु सैनिकों का सफाया कर दिया | युद्ध उत्साही क्षत्रिय सैनिको के आगे वेतनभोगी यवन सेना पराजित हुई |
विजय हासिल कर रानी कलावती अपने घायल पति को लेकर वापिस लौटी | राजवैध ने परिक्षण कर बताया कि विषैले शस्त्र से आहात होने के कारण राजा कर्णसिंह बेहोश हुए है,उनके विष को चूसने के सिवाय और कोई उपाय नहीं है |
विष चूसने वाले के जीवित रहने की सम्भावना कम थी क्योंकि शत्रु द्वारा प्रयुक्त जहर बहुत विषैला था | इससे पहले कि विष चूसने वाले की खोज की जाय,उसे तलाश करने का प्रयास किया जाय,रानी ने स्वयं उस मारक विष को चूस डाला | विष चूसने की विधि में कलावती निपुण नहीं थी फिर भी पति के प्राणों की रक्षार्थ उसने अविलम्ब यह कार्य किया | जब राजा कर्णसिंह की बेहोशी टूटी और उन्होंने अपने नेत्र खोले तो समीप ही पड़ी प्रेमप्रतिमा की मृत देह नजर आई |
अपने प्राणोंत्सर्ग कर पति के प्राणों की रक्षा करने वाली रानी कलावती का त्याग अविस्मरणीय व वन्दनीय है |

लेखक: विक्रमसिंह राठौड़,गुन्दोज
Source - Gyandarsan

गंगा , गंगोत्री और गोमुख

मूल लेख का लिंक , जन हित में प्रसार हेतु संग्रहित .......

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गंगोत्री



गोमुख : उदगम

 
गंगा : प्रारंभ में 

परम पवित्र माता गंगा का उद्गगम गंगौत्री से माना जाता है।
बहुत ही छोटी सी यह धारा,चलते चलते गंगासागर के रूप में विशाल हो कर
बंगाल की खाडी में समुद्र में मिल जाती है।
श्रद्धा, सौहार्द व रोमांच का त्रिवेणी संगम: गंगोत्री
गंगोत्री
गंगा के वेग से कलकल करती, वर्फ की सफेद चादरों से लिपटी, ऊचे- ऊचे पर्वतों के दृश्यों से सराबोर कर देने वाली भूमि गंगोत्री जिसे उत्तराखंड के चार धामां से एक जाना जाता है, जो ना सिर्फ हिन्दुओं की एक पावन तीर्थस्थली है बल्कि प्रकृति व पर्यटन में रूचि रखने वालों के लिए यात्रा का एक गंतव्य भी।
गंगा
समुद्र तल से 3140 किलो मीटर की ऊंचाई पर स्थित गंगोत्री ही वह स्थल है, जहां से देश की सबसे लम्बी व हिन्दुओं की पावन नदी मां गंगा का उद्गम हुआ यह उद्गम स्रोत स्थिति है गंगोत्री से 18 किमी दूर गोमुख ग्लेश्यिर में। पुराणों में ऐसा वर्णित है कि यह धारा कैलाश से शिवजी की जटाओं से निकलती है, और वहां से गंगोत्री तक सैकड़ों मील का रास्ता तय करके पहंचती है। यहां पर तपस्या कर भागीरथ गंगा को पृथ्वी पर लाये थे। इसीलिये इसे भागीरथी नाम से भी जाना जाता है। 
उदगम स्रोत गोमुख
भागीरथी यहां से उत्तर दिशा की ओर बहती है, इसलिये इस स्थान का नाम गंगोत्री पड़ा। यहॉ तीर्थालु गंगा किनारे बने गंगा माता के मंदिर के दर्शन करते हैं कुछ साहसी यात्री जो गंगा के वास्तविक उदगम स्रोत  को देखना चाहते हैं उन्हें गोमुख तक 18 किमी की पदयात्रा करनी पड़ती है हालांकि घोड़े खच्चर करके भी जाया जा सकता है किंतु यह घोड़े भोजवासा तक ही जाते हैं उसके आगे 6 किमी की रास्ता पैदल ही पार करना पड़ता है। आगे का मार्ग अत्यंत ही जोखिम भरा है। बड़ी बड़ी चट्टानों व उनपर कहीं कहीं जमी हुई वर्फ के बीच रास्ता अपने आप बनाना पड़ता है।