रविवार, 9 दिसंबर 2012

जन गण मन : राजस्थान का जिक्र तक नहीं



जन गण मन अंग्रेजी दासता का गीत है क्या ?
अंग्रेज राजा की स्तुति में रविन्द्र नाथ टेगोर द्वारा लिखा गया गीत है जब वे भारत में आए थे ... क्या हम अब भी अंग्रेजी उपनिवेश हैं ? कोई इस पर प्रकाश डालेगा क्या ? हाँ,
यह जोर्ज पंचम की स्तुति है. इसी के कारण टेगोर को नोबल पुरस्कार मिला था. १९११ में गीत गाया गया और १९१३ में नोबल. ये 'अधिनायक' शब्द से ही जाहिर है. मुझे तो इसमें यह भी अजीब लगता है कि हमारे राजस्थान का इसमें कहीं भी जिक्र तक नहीं है.

‘’वन्देमातरम’’ VS जन गण मन
सच जाने,इस पोस्ट को पूरा पढे !
http://donateforsmile.blogspot.in/2012/09/vs.html
http://donateforsmile.blogspot.in/2012/09/vs.html

‘’वन्देमातरम’’ बंकिमचंद्र चटर्जी ने लिखा था ! उन्होने इस गीत को लिखा !लिखने
के बाद 7 साल लगे जब यह गीत लोगो के सामने आया ! क्यूँ की उन्होने जब इस गीत
लो लिखा उसके बाद उन्होने एक उपन्यास लिखा जिसका नाम था ‘’आनद मठ’’ उसमे इस
गीत को डाला !वो उपन्यास छपने मे 7 साल लगे !

1882 आनद मठ उपनास का हिस्सा बना वन्देमातरम और उसके बाद जब लोगो ने इसको पढ़ा
तो इसका अर्थ पता चला की वन्देमातरम क्या है ! आनद मठ उपन्यास बंकिम चंद्र
चटर्जी ने लिखा था अँग्रेजी सरकार के विरोध मे और उन राजा महाराजाओ के विरोध
मे जो किसी भी संप्रदाय के हो लेकिन अँग्रेजी सरकार को सहयोग करते थे ! फिर
उसमे उन्होने बगावत की भूमिका लिखी कि अब बगावत होनी चाहिए !विरोध होना चाहिए
ताकि इस अँग्रेजी सत्ता को हम पलट सके ! और इस तरह वन्देमातरम को सार्वजनिक
गान बनना चाहिए ये उन्होने घोषित किया !

उनकी एक बेटी हुआ करती थी जिसका अपने पिता बंकिमचंद्र चटर्जी जी से इस बात पर
बहुत मत भेद था ! उनकी बेटी कहती थी आपने यह वन्देमातरम लिखा है उसके ये श्बद
बहुत कलिष्ट हैं ! कि बोलने और सुनने वाले कि ही समझ में नहीं आएंगे ! इसलिए
गीत को आप इतना सरल बनाइये कि बोलने और सुनने वाले कि समझ मे आ सके !

तब बंकिम चंद्र चटर्जी ने कहा देखो आज तुमको यह कलिष्ट लग रहा हो लेकिन मेरी
बात याद रखना एक दिन ये गीत हर नोजवान के होंटो पर होगा और हर क्रांतिवीर कि
प्रेरणा बनेगा ! और हम सब जानते है इस घोषणा के 12 साल बाद बंकिम चंद्र चटर जी
का स्वर्गवास हो गया ! बाद मे उनके बेटी और परिवार ने आनद मठ पुस्तक जिसमे ये
गीत था उसका बड़े पेमाने पर प्रचार किया !

वो पुस्तक पहले बंगला मे बनी बाद मे उसका कन्नड ,मराठी तेलगु ,हिन्दी आदि बहुत
भाषा मे छपी ! उस पुस्तक ने क्रांतिकारियों मे बहुत जोश भरने का काम किया ! उस
पुस्तक मे क्या था कि इस पूरी अँग्रेजी व्यवस्था का विरोध करे क्यू कि यह
विदेशी है ! उसमे ऐसे बहुत सी जानकारिया थी जिसको पढ़ कर लोग बहुत उबलते थे
!और वो लोगो मे जोश भरने का काम करती थी ! अँग्रेजी सरकार ने इस पुस्तक पर
पाबंदी लगाई कई बार इसको जलाया गया ! लेकिन इस कोई न कोई एक मूल प्रति बच ही
जाती ! और आगे बढ़ती रहती !

1905 मे अंग्रेज़ो की सरकार ने बंगाल का बंटवारा कर दिया एक अंग्रेज़ अधिकारी
था उसका नाम था कर्ज़न ! उसने बंगाल को दो हिस्सो मे बाँट दिया !एक पूर्वी
बंगाल एक पश्चमी बंगाल ! पूर्वी बंगाल था मुसलमानो के लिए पश्चमी बगाल था
हिन्दुओ के लिए !! हिन्दू और मूसलमान के आधार पर यह पहला बंटवारा था !

तो भारत के कई लोग जो जानते थे कि आगे क्या हो सकता है उन्होने इस बँटवारे का
विरोध किया ! और भंग भंग के विरोध मे एक आंदोलन शुरू हुआ ! और इस आंदोलन के
प्रमुख नेता थे (लाला लाजपतराय) जो उत्तर भारत मे थे !(विपिन चंद्र पाल) जो
बंगाल और पूर्व भारत का नेतत्व करते थे ! और लोक मान्य बाल गंगाधर तिलक जो
पश्चिम भारत के बड़े नेता थे ! इस तीनों नेताओ ने अंग्रेज़ो के बंगाल विभाजन
का विरोध शुरू किया ! इस आंदोलन का एक हिस्सा था (अंग्रेज़ो भारत छोड़ो)
(अँग्रेजी सरकार का असहयोग) करो ! (अँग्रेजी कपड़े मत पहनो) (अँग्रेजी वस्तुओ
का बहिष्कार करो) ! और दूसरा हिस्सा था पोजटिव ! कि भारत मे स्वदेशी का
निर्माण करो ! स्वदेशी पथ पर आगे बढ़ो !

लोकमान्य तिलक ने अपने शब्दो मे इसको स्वदेशी आंदोलन कहा ! अँग्रेजी सरकार
इसको भंग भंग विरोधे आंदोलन कहती रही !लोकमान्य तिलक कहते थे यह हमारा स्वदेशी
आंदोलन है ! और उस आंदोलन के ताकत इतनी बड़ी थी !कि यह तीनों नेता अंग्रेज़ो
के खिलाफ जो बोल देते उसे पूरे भारत के लोग अपना लेते ! जैसे उन्होने आरके
इलान किया अँग्रेजी कपड़े पहनना बंद करो !करोड़ो भारत वासियो ने अँग्रेजी
कपड़े पहनना बंद कर दिया ! उयर उसी समय भले हिंदुतसनी कपड़ा मिले मोटा मिले
पतला मिले वही पहनना है ! फिर उन्होने कहाँ अँग्रेजी बलेड का ईस्टमाल करना
ब्नद करो ! तो भारत के हजारो नाईयो ने अँग्रेजी बलेड से दाड़ी बनाना बंद कर
दिया ! और इस तरह उस्तरा भारत मे वापिस आया ! फिर लोक मान्य तिलक ने कहा
अँग्रेजी चीनी खाना बंद करो ! क्यू कि चीनी उस वक्त इंग्लैंड से बन कर आती थी
भारत मे गुड बनाता था ! तो हजारो लाखो हलवाइयों ने गुड दाल कर मिठाई बनाना
शुरू कर दिया ! फिर उन्होने अपील लिया अँग्रेजी कपड़े और अँग्रेजी साबुन से
अपने घरो को मुकत करो ! तो हजारो लाखो धोबियो ने अँग्रेजी साबुन से कपड़े धोना
मुकत कर दिया !फिर उन्होने ने पंडितो से कहा तुम शादी करवाओ अगर तो उन लोगो कि
मत करवाओ जो अँग्रेजी वस्त्र पहनते हो ! तो पंडितो ने सूट पैंट पहने टाई पहनने
वालों का बहिष्कार कर दिया !

इतने व्यापक स्तर पर ये आंदोलन फैला !कि 5-6 साल मे अँग्रेजी सरकार घबरागी
क्यूंकि उनका माल बिकना बंद हो गया ! ईस्ट इंडिया कंपनी का धंधा चोपट हो गया !
तो ईस्ट इंडिया कंपनी ने अंग्रेज़ सरकार पर दबाव डाला ! कि हमारा तो धंधा ही
चोपट हो गया भारत मे ! हमारे पास कोई उपाय नहीं है आप इन भारतवासियो के मांग
को मंजूर करो मांग क्या थी कि यह जो बंटवारा किया है बंगाल का हिन्दू मुस्लिम
से आधार पर इसको वापिस लो हमे बंगाल के विभाजन संप्रदाय के आधार पर नहीं चाहिए
! और आप जानते अँग्रेजी सरकार को झुकना पड़ा ! और 1911 मे divison of bangal
act वापिस लिया गया ! इतनी बड़ी होती है बहिष्कार कि ताकत !

तो लोक मान्य तिलक को समझ आ गया ! अगर अंग्रेज़ो को झुकाना है ! तो बहिष्कार
ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है ! यह 6 साल जो आंदोलन चला इस आंदोलन का मूल मंत्र
था वन्देमातरम ! जीतने क्रांतिकारी थे लोक मान्य बाल गंगाधर तिलक,लाला लाजपत
राय ,विपिन चंद्र पाल के साथ उनकी संख्या !1 करोड़ 20 लाख से ज्यादा थी ! वो
हर कार्यक्रम मे वन्देमातरम गाते थे ! कार्यक्रम कि शुरवात मे वन्देमातरम !
कार्यक्रम कि समाप्ति पर वन्देमातरम !!


उसके बाद क्या हुआ अंग्रेज़ अपने आप को बंगाल से असुरक्षित महसूस करने लगे
!क्यूंकि बंगाल इस आंदोलन का मुख्य केंद्र था ! सन 1911 तक भारत की राजधानी
बंगाल हुआ करता था। सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ
बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने
आपको बचाने के लिए …के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में
दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया। पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे
हुए थे तो …अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि
लोग शांत हो जाये। इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया।
रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत
में लिखना ही होगा। उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता
था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे,
उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता
डिविजन के निदेशक (Director) रहे। उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी
में लगा हुआ था। और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के
लिए।

रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है “जन गण मन
अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता”। इस गीत के सारे के सारे शब्दों में
अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये
तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था। इस राष्ट्रगान का अर्थ
कुछ इस तरह से होता है “भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का
भाग्य विधाता समझती है और मानती है। हे अधिनायक (Superhero) तुम्ही भारत के
भाग्य विधाता हो। तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी
प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महारास्त्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण
भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये
सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और
तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है। तुम्हारी ही हम गाथा गाते है। हे भारत के
भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो। ” में ये गीत गाया गया।

जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया।
जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो
मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की। वह बहुत खुश हुआ। उसने आदेश
दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड
बुलाया जाये। रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए। जोर्ज पंचम उस समय नोबल
पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था। उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार
से सम्मानित करने का फैसला किया। तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार
को लेने से मना कर दिया। क्यों कि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ
टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था। टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल
पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर
मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे
जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है।
जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना
के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया।

रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलिया वाला कांड
हुआ और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी
तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम
अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए फिर
गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और बहुत जोर से डाटा कि अभी तक
तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद
खुली। इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को
लौटा दिया।

सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार
के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे
थे। रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और
ICS ऑफिसर थे। अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की
घटना है) । इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत ‘जन गण मन’ अंग्रेजो के द्वारा
मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है। इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है। इस
गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है।लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस
चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता
हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे।

7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र
नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन
गीत न गाया जाये। 1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी। लेकिन वह दो
खेमो में बट गई। जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे
में मोती लाल नेहरु के समर्थक थे। मतभेद था सरकार बनाने को लेकर। एक दल चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition
Government) बने। जबकिदूसरे दल वाले कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार
बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है। इस मतभेद के कारण
एक नरम दल और एक गरम दल। बन गया गया !गर्म दल
वे हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे। और
(यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से
इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए
आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे)। लेकिन नरम दल वाले
ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे।

नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो
अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को
वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है। और
आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है। उस समय मुस्लिम लीग
भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे। उन्होंने भी इसका विरोध करना
शुरू कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और
वचन से अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और
मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया। जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली।
संविधान सभा की बहस चली। संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे
जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर
सहमति जताई। बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना। और उस एक सांसद का नाम
था पंडित जवाहर लाल नेहरु। उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के
दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों
को नहीं अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी)। अब इस झगडे का फैसला कौन करे,
तो वे पहुचे गाँधी जी के पास। गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो मैं
भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत
तैयार किया जाये। तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया
“विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा”। लेकिन नेहरु जी उस पर भी
तैयार नहीं हुए। नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता
और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है।
उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले
रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया
और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ
और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को
राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया। नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं
करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे,
मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा
दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे, जन गण मन को इस लिए
तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और
वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था।
बीबीसी ने एक सर्वे किया था। उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते
थे, उनसे पुछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों
ने कहा वन्देमातरम। बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया के
सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम है। कई देश है जिनके लोगों
को इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक
जज्बा पैदा होता है। तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का। अब ये आप
को तय करना है कि आपको क्या गाना है
रविन्द्र नाथ टैगोर द्वारा लिखित उनका हस्ताक्षरित …. इंग्लिश में अनुवादित
पत्र


मिर्गी के लिए वरदान है हल्‍दी : Epilepsy Treatment




मिर्गी के लिए वरदान है हल्‍दी
भारतीय खानों में हल्‍दी का प्रयोग धड़ल्‍ले से किया जाता है क्‍योंकि यह एंटी बायोटिक का काम करती है।
लेकिन एम्‍स के शोधकर्ताओं ने हल्‍दी पर शोध कर बताया है कि हल्‍दी सिर्फ एंटीबायोटिक का ही काम नहीं करती है बल्कि मिर्गी के मरीजों के लिए भी दवा का काम करती है। उनका कहना है कि हल्‍दी में मौजूद एंटी ऑक्‍सीडेंट तत्‍व मिर्गी की बीमारी दूर करने के साथ साथ तनाव दूर करने व यादाश्‍त को मजबूत करने में भी कारगर है।
प्रोफेसर के एच रीता का कहना है कि मिर्गी के इलाज के लिए एंटी एपीलेप्टिक ड्रग्‍स थैरेपी का इस्‍तेमाल होता है। इससे डीएनए के मॉलीक्‍यूल क्षतिग्रस्‍त हो जाते हैं। लेकिन हल्‍दी का इस्‍तेमाल इस दवा के साइड इफेक्‍ट को कम करती है। हल्‍दी को अन्‍य दवाओं के साथ मिक्‍स करके इस्‍तेमाल किया जा सकता है।

Epilepsy Treatment
http://www.news-medical.net/health/Epilepsy-Treatment.aspx
   Epilepsy is usually treated with medication prescribed by a physician; primary caregivers, neurologists, and neurosurgeons all frequently care for people with epilepsy. In some cases the implantation of a stimulator of the vagus nerve, or a special diet can be helpful. Neurosurgical operations for epilepsy can be palliative, reducing the frequency or severity of seizures; or, in some patients, an operation can be curative.
Responding to a seizure

In most cases, the proper emergency response to a generalized tonic-clonic epileptic seizure is simply to prevent the patient from self-injury by moving him or her away from sharp edges, placing something soft beneath the head, and carefully rolling the person into the recovery position to avoid asphyxiation. In some cases the person may seem to start snoring loudly following a seizure, before coming to. This merely indicates that the person is beginning to breathe properly and does not mean he or she is suffocating. Should the person regurgitate, the material should be allowed to drip out the side of the person's mouth by itself. If a seizure lasts longer than 5 minutes, or if the seizures begin coming in 'waves' one after the other - then Emergency Medical Services should be contacted immediately. Prolonged seizures may develop into ''status epilepticus'', a dangerous condition requiring hospitalization and emergency treatment.

Objects should never be placed in a person's mouth by anybody - including paramedics - during a seizure as this could result in serious injury to either party. Despite common folklore, it is not possible for a person to swallow their own tongue during a seizure. However, it is possible that the person will bite their own tongue, especially if an object is placed in the mouth.

With other types of seizures such as simple partial seizures and complex partial seizures where the person is not convulsing but may be hallucinating, disoriented, distressed, or unconscious, the person should be reassured, gently guided away from danger, and sometimes it may be necessary to protect the person from self-injury, but physical force should be used only as a last resort as this could distress the person even more. In complex partial seizures where the person is unconscious, attempts to rouse the person should not be made as the seizure must take its full course. After a seizure, the person may pass into a deep sleep or otherwise they will be disoriented and often unaware that they have just had a seizure, as amnesia is common with complex partial seizures. The person should remain observed until they have completely recovered, as with a tonic-clonic seizure.

After a seizure, it is typical for a person to be exhausted and confused. (this is known as post-ictal state). Often the person is not immediately aware that they have just had a seizure. During this time one should stay with the person - reassuring and comforting them - until they appear to act as they normally would. Seldom during seizures do people lose bladder or bowel control. In some instances the person may vomit after coming to. People should not be allowed to wander about unsupervised until they have returned to their normal level of awareness. Many patients will sleep deeply for a few hours after a seizure - this is common for those having just experienced a more violent type of seizure such as a tonic-clonic. In about 50% of people with epilepsy, headaches may occur after a seizure. These headaches share many features with migraines, and respond to the same medications.

It is helpful if those present at the time of a seizure make note of how long and how severe the seizure was. It is also helpful to note any mannerisms displayed during the seizure. For example, the individual may twist the body to the right or left, may blink, might mumble nonsense words, or might pull at clothing. Any observed behaviors, when relayed to a neurologist, may be of help in diagnosing the type of seizure which occurred.
Pharmacologic treatment

The mainstay of treatment of epilepsy is anticonvulsant medications. Often, anticonvulsant medication treatment will be lifelong and can have major effects on quality of life. The choice among anticonvulsants and their effectiveness differs by epilepsy syndrome. Mechanisms, effectiveness for particular epilepsy syndromes, and side effects, of course, differ among the individual anticonvulsant medications. Some general findings about the use of anticonvulsants are outlined below.

History and Availability- The first anticonvulsant was bromide, suggested in 1857 by Charles Locock who used it to treat women with "hysterical epilepsy" (probably ''catamenial epilepsy''). Potassium bromide was also noted to cause impotence in men. Authorities concluded that potassium bromide would dampen sexual excitement thought to cause the seizures. In fact, bromides were effective against epilepsy, and also caused impotence; it is now known that impotence is a side effect of bromide treatment, which is not related to its anti-epileptic effects. It also suffered from the way it affected behaviour, introducing the idea of the 'epileptic personality' which was actually a result of the medication. Phenobarbital was first used in 1912 for both its sedative and antiepileptic properties. By the 1930s, the development of animal models in epilepsy research lead to the development of phenytoin by Tracy Putnam and H. Houston Merritt, which had the distinct advantage of treating epileptic seizures with less sedation. By the 1970s, an National Institutes of Health initiative, the Anticonvulsant Screening Program, headed by J. Kiffin Penry, served as a mechanism for drawing the interest and abilities of pharmaceutical companies in the development of new anticonvulsant medications.

Currently there are 20 medications approved by the Food and Drug Administration for the use of treatment of epileptic seizures in the US: carbamazepine (common US brand name Tegretol), clorazepate (Tranxene), clonazepam (Klonopin), ethosuximide (Zarontin), felbamate (Felbatol), fosphenytoin (Cerebyx), gabapentin (Neurontin), lacosamide (Vimpat), lamotrigine (Lamictal), levetiracetam (Keppra), oxcarbazepine (Trileptal), phenobarbital (Luminal), phenytoin (Dilantin), pregabalin (Lyrica), primidone (Mysoline), tiagabine (Gabitril), topiramate (Topamax), valproate semisodium (Depakote), valproic acid (Depakene), and zonisamide (Zonegran). Most of these appeared after 1990.

Medications commonly available outside the US but still labelled as "investigational" within the US are

clobazam (Frisium) and vigabatrin (Sabril). Medications currently under clinical trial under the supervision of the FDA include retigabine, brivaracetam, and seletracetam.

Other drugs are commonly used to abort an active seizure or interrupt a seizure flurry; these include diazepam (Valium, Diastat) and lorazepam (Ativan). Drugs used only in the treatment of refractory status epilepticus include paraldehyde (Paral), midazolam (Versed), and pentobarbital (Nembutal).

Some anticonvulsant medications do not have primary FDA-approved uses in epilepsy but are used in limited trials, remain in rare use in difficult cases, have limited "grandfather" status, are bound to particular severe epilepsies, or are under current investigation. These include acetazolamide (Diamox), progesterone, adrenocorticotropic hormone (ACTH, Acthar), various corticotropic steroid hormones (prednisone), or bromide.

Effectiveness - The definition of "effective" varies. FDA-approval usually requires that 50% of the patient treatment group had at least a 50% improvement in the rate of epileptic seizures. About 20% of patients with epilepsy continue to have breakthrough epileptic seizures despite best anticonvulsant treatment. Most side effects are mild and "dose-related" and can often be avoided or minimized by the use of the smallest effective amount. Some examples include mood changes, sleepiness, or unsteadiness in gait. Some anticonvulsant medications have "idiosyncratic" side-effects that can not be predicted by dose. Some examples include drug rashes, liver toxicity (hepatitis), or aplastic anemia. Safety includes the consideration of teratogenicity (the effects of medications on fetal development) when women with epilepsy become pregnant.

Principles of Anticonvulsant Use and Management - The goal for individual patients is, of course, no seizures and no side effects, and the job of the physician is to aid the patient to find the best balance between the two during the prescribing of anticonvulsants. Most patients can achieve this balance best with ''monotherapy'', the use of a single anticonvulsant medication. Some patients, however, require ''polypharmacy''; the use of two or more anticonvulsants.

Serum levels of AEDs can be checked to determine medication compliance, to assess the effects of new drug-drug interactions upon previous stable medication levels, or to help establish if particular symptoms such as instability or sleepiness can be considered a drug side-effect or are due to different causes. Children or impaired adults who may not be able to communicate side effects may benefit from routine screening of drug levels. Beyond baseline screening, however, trials of recurrent, routine blood or urine monitoring show no proven benefits and may lead to unnecessary medication adjustments in most older children and adults using routine anticonvulsants.

If a person's epilepsy cannot be brought under control after adequate trials of two or three (experts vary here) different drugs, that person's epilepsy is generally said to be ''medically refractory''. A study of patients with previously untreated epilepsy demonstrated that 47% achieved control of seizures with the use of their first single drug. 14% became seizure free during treatment with a second or third drug. An additional 3% became seizure-free with the use of two drugs simultaneously. Other treatments, in addition to or instead of, anticonvulsant medications may be considered by those people with continuing seizures.
Surgical treatment

Epilepsy surgery is an option for patients whose seizures remain resistant to treatment with anticonvulsant medications who also have symptomatic localization-related epilepsy; a focal abnormality that can be located and therefore removed. The goal for these procedures is total control of epileptic seizures , although anticonvulsant medications may still be required.

The evaluation for epilepsy surgery is designed to locate the "epileptic focus" (the location of the epileptic abnormality) and to determine if resective surgery will affect normal brain function. Physicians will also confirm the diagnosis of epilepsy to make sure that spells arise from epilepsy (as opposed to non-epileptic seizures). The evaluation typically includes neurological examination, routine EEG, Long-term video-EEG monitoring, neuropsychological evaluation, and neuroimaging such as MRI, Single photon emission computed tomography (SPECT), positron emission tomography (PET). Some epilepsy centers use intracarotid sodium amobarbital test (Wada test), functional MRI or Magnetoencephalography (MEG) as supplementary tests.

Certain lesions require Long-term video-EEG monitoring with the use of intracranial electrodes if noninvasive testing was inadequate to identify the epileptic focus or distinguish the surgical target from normal brain tissue and function. Brain mapping by the technique of cortical electrical stimulation or Electrocorticography are other procedures used in the process of invasive testing in some patients.

The most common surgeries are the resection of lesions like tumors or arteriovenous malformations which, in the process of treating the underlying lesion, often result in control of epileptic seizures caused by these lesions.

Other lesions are more subtle and feature epilepsy as the main or sole symptom. The most common form of intractable epilepsy in these disorders in adults is temporal lobe epilepsy with hippocampal sclerosis, and the most common type of epilepsy surgery is the anterior temporal lobectomy, or the removal of the front portion of the temporal lobe including the amygdala and hippocampus. Some neurosurgeons recommend selective amygdalahippocampectomy because of possible benefits in postoperative memory or language function. Surgery for temporal lobe epilepsy is effective, durable, and results in decreased health care costs.. Despite the efficacy of epilepsy surgery, some patients decide not to undergo surgery owing to fear or the uncertainty of having a brain operation.

Palliative surgery for epilepsy is intended to reduce the frequency or severity of seizures. Examples are callosotomy or commissurotomy to prevent seizures from generalizing (spreading to involve the entire brain), which results in a loss of consciousness. This procedure can therefore prevent injury due to the person falling to the ground after losing consciousness. It is performed only when the seizures cannot be controlled by other means. Multiple subpial transection can also be used to decrease the spread of seizures across the cortex especially when the epileptic focus is located near important functional areas of the cortex. Resective surgery can be considered palliative if it is undertaken with the expectation that it will reduce but not eliminate seizures.

Hemispherectomy involves removal or a functional disconnection of most or all of one half of the cerebrum. It is reserved for people suffering from the most catastrophic epilepsies, such as those due to Rasmussen syndrome. If the surgery is performed on very young patients (2–5 years old), the remaining hemisphere may acquire some rudimentary motor control of the ipsilateral body; in older patients, paralysis results on the side of the body opposite to the part of the brain that was removed. Because of these and other side effects it is usually reserved for patients who have exhausted other treatment options.
Other treatment

Ketogenic diet- a high fat, low carbohydrate diet developed in the 1920s, largely forgotten with the advent of effective anticonvulsants, and resurrected in the 1990s. The mechanism of action is unknown. It is used mainly in the treatment of children with severe, medically-intractable epilepsies.

Electrical stimulation - methods of anticonvulsant treatment with both currently approved and investigational uses. A currently approved device is ''vagus nerve stimulation (VNS''). Investigational devices include the ''responsive neurostimulation system'' and ''deep brain stimulation''.

Vagus nerve stimulation (VNS)- The VNS (US manufacturer = Cyberonics) consists of a computerized electrical device similar in size, shape and implant location to a heart pacemaker that connects to the vagus nerve in the neck. The device stimulates the vagus nerve at pre-set intervals and intensities of current. Efficacy has been tested in patients with localization-related epilepsies demonstrating that 50% of patients experience a 50% improvement in seizure rate. Case series have demonstrated similar efficacies in certain generalized epilepsies such as Lennox-Gastaut syndrome. Although success rates are not usually equal to that of epilepsy surgery, it is a reasonable alternative when the patient is reluctant to proceed with any required invasive monitoring, when appropriate presurgical evaluation fails to uncover the location of epileptic foci, or when there are multiple epileptic foci.

Responsive Neurostimulator System (RNS) (US manufacturer Neuropace) consists of an computerized electrical device implanted in the skull with electrodes implanted in presumed epileptic foci within the brain. The brain electrodes send EEG signal to the device which contains seizure-detection software. When certain EEG seizure criteria are met, the device delivers a small electrical charge to other electrodes near the epileptic focus and disrupt the seizure. The efficacy of the RNS is under current investigation with the goal of FDA approval.

Deep brain stimulation (DBS) (US manufacturer Medtronic) consists of computerized electrical device implanted in the chest in a manner similar to the VNS, but electrical stimulation is delivered to deep brain structures through depth electrodes implanted through the skull. In epilepsy, the electrode target is the anterior nucleus of the thalamus. The efficacy of the DBS in localization-related epilepsies is currently under investigation.

Noninvasive surgery- The use of the Gamma Knife or other devices used in radiosurgery are currently being investigated as alternatives to traditional open surgery in patients who would otherwise qualify for anterior temporal lobectomy.

Avoidance therapy- Avoidance therapy consists of minimizing or eliminating triggers in patients whose seizures are particularly susceptible to seizure precipitants (see above). For example, sunglasses that counter exposure to particular light wavelengths can improve seizure control in certain photosensitive epilepsies.

Warning systems- A seizure response dog is a form of service dog that is trained to summon help or ensure personal safety when a seizure occurs. These are not suitable for everybody and not all dogs can be so trained. Rarely, a dog may develop the ability to sense a seizure before it occurs. Development of electronic forms of seizure detection systems are currently under investigation.

Alternative or complementary medicine- A number of systematic reviews by the Cochrane Collaboration into treatments for epilepsy looked at acupuncture, psychological interventions, vitamins and yoga and found there is no reliable evidence to support the use of these as treatments for epilepsy.
Further Reading

    What is Epilepsy?
    Epilepsy Classification
    Epilepsy Epidemiology
    Epilepsy Seizure Types
    Epilepsy Syndromes
    Epilepsy Pathophysiology
    Epilepsy Legal Implications

This article is licensed under the Creative Commons Attribution-ShareAlike License. It uses material from the Wikipedia article on "Epilepsy" All material adapted used from Wikipedia is available under the terms of the Creative Commons Attribution-ShareAlike License. Wikipedia® itself is a registered trademark of the Wikimedia Foundation, Inc.
Recent Epilepsy News

    Advance Study to evaluate safety and benefit of DBS-f for patients with mild Alzheimer'sThe first U.S. patient to enroll in Functional Neuromodulation's ADvance Study was successfully implanted with a deep brain stimulation (DBS) system. ADvance will evaluate the safety and potential cli...
    Ketogenic diet and fasting can reduce seizures in childrenChildren with persistent and drug-resistant seizures treated with the high-fat, low-carbohydrate ketogenic diet may get an added therapeutic benefit from periodic fasting, according to a small Johns H...
    C-reactive protein levels increased in schizophreniaPatients with schizophrenia have elevated levels of high-sensitivity C-reactive protein compared with mentally healthy individuals, US researchers report.
    C-reactive protein levels increased in schizophreniaPatients with schizophrenia have elevated levels of high sensitivity C-reactive protein compared with mentally healthy individuals, US researchers report.
    Revised version of UPLIFT proves successful in preventing epilepsy-related depressionEmory researchers announced results of a new study that has proven successful in the prevention of depression in people diagnosed with epilepsy.