सोमवार, 24 दिसंबर 2012

भारत जागो विश्व जगाओ महा अभियान

 
‘‘आज हमारे देश की आवश्यकता है लोहे की मांसपेशियाँ और फौलाद के स्नायु तंत्र, ऐसी प्रचण्ड इच्छाशक्ति जिसे कोई न रोक सके, जो समस्त विश्व के रहस्यों की गहराई में जाकर अपने उद्देश्यों को सभी प्रकार से प्राप्त कर सके। इस हेतु समुद्र के तल तक क्यों न जाना पड़े या मृत्यु का ही सामना क्यों न करना पड़े।’’
-स्वामी विवेकानन्द

भारत जागो विश्व जगाओ महा अभियान
श्रीस्वामी रामकृष्ण परमहंस के प्रमुख शिष्य, स्वामी विवेकानन्द आधुनिक समय के प्रथम धर्म-प्रचारक थे जिन्होने विदेश जाकर विश्व के सम्मुख सनातन धर्म के सर्वासमावेशक, वैश्विक संदेश को पुनःप्रतिपादित किया। ऐसा संदेश जो सब को स्वीकार करता है किसी भी मत, सम्प्रदाय को नकारता नहीं।
    स्वामीजी एक प्रखर देशभक्त, राष्ट्र-निर्माता, समाजशास्त्री तथा महासंगठक थे। विदेशी शासन से विदीर्ण शक्ति, परास्त मन व आत्मग्लानी से परिपूर्ण राष्ट्र के पुनर्निमाण हेतु राष्ट्रवादी पुनर्जारण को प्रज्वलित करनेवाले पुरोधा स्वामी विवेकानन्द ही थे। भारत को उसकी आत्मा हिन्दू धर्म के प्रति सजग कर उन्हांेने इस पुनर्जागरण की नीव  रखी।
स्वामी विवेकानन्द की 150 वी जयंती को 12 जनवरी 2013 से 12 जनवरी 2014 तक सार्ध शती समारोह को भव्यता से मनाने की सघन तैयारियाँ देश के कोनें कोनें में पूरी की जा चुकीं हैं। विभिन्न संगठन व सरकारें भी समारोह की योजना बना रहे हैं।
भारत की जनता ने सम्मिलित होकर इस महान पर्व को मनाने का निश्चय किया है। आज जब राष्ट्र दोराहे पर खडा है तब उसके बौद्धिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, राजनैतिक व राष्ट्रीय आलस व भ्रम को दूर करने का उर्वर अवसर यह समारोह प्रस्तुत करता है। 
महत्वपूर्ण सामाजिक नेता, विचारक, स्वामीजी के प्रशंसक तथा अनेक सेवा संगठनों के अनुभवी कार्यकर्ता व युवाओं ने एकत्रित आकर अखिल भारतीय स्तर पर तथा प्रांतों में ‘‘आयोजन समिति’’ गठित की है। इन समितियों ने प्रख्यात चिंतक, युवा आदर्श, सामाजिक व आध्यात्मिक वैचारिक नेतृत्व, वैज्ञानिक, आर्थिक, व्यावसायिक तथा क्रीडा क्षेत्र के सफल विजेताओं व अन्य अनेक लोगों से सम्पर्क प्रारम्भ कर दिया है। इनके सहभाग से राष्ट्रीय तथा राज्य दोनों स्तरों पर ‘‘स्वामी विवेकानन्द सार्ध शती समारोह समिति’’ का गठन स्थानीय स्तर तक हो चुका है। यह समितियाँ ही समारोह वर्ष में सभी आयोजन करेंगी।
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प्रगति के प्रेरक हैं युवा : स्वामी विवेकानंद
स्वामी विवेकानंद का कहना है कि बहती हुई नदी की धारा ही स्वच्छ, निर्मल तथा स्वास्थ्यप्रद रहती है। उसकी गति अवरुद्ध हो जाने पर उसका जल दूषित व अस्वास्थ्यकर हो जाता है। नदी यदि समुद्र की ओर चलते-चलते बीच में ही अपनी गति खो बैठे, तो वह वहीं पर आबद्ध हो जाती है। प्रकृति के समान ही मानव समाज में भी एक सुनिश्चित लक्ष्य के अभाव में राष्ट्र की प्रगति रुक जाती है और सामने यदि स्थिर लक्ष्य हो, तो आगे बढ़ने का प्रयास सफल तथा सार्थक होता है।
हमारे आज के जीवन के हर क्षेत्र में यह बात स्मरणीय है। अब इस लक्ष्य को निर्धारित करने के पूर्व हमें विशेषकर अपने चिरन्तन इतिहास, आदर्श तथा आध्यात्मिकता का ध्यान रखना होगा। स्वामीजी ने इसी बात पर सर्वाधिक बल दिया था। देश की शाश्वत परंपरा तथा आदर्शों के प्रति सचेत न होने पर विश्रृंखलापूर्ण समृद्धि आएगी और संभव है कि अंततः वह राष्ट्र को प्रगति के स्थान पर अधोगति की ओर ही ले जाए।
विशेषकर आज के युवा वर्ग को, जिसमें देश का भविष्य निहित है, और जिसमें जागरण के चिह्न दिखाई दे रहे हैं, अपने जीवन का एक उद्देश्य ढूँढ लेना चाहिए। हमें ऐसा प्रयास करना होगा ताकि उनके भीतर जगी हुई प्रेरणा तथा उत्साह ठीक पथ पर संचालित हो। अन्यथा शक्ति का ऐसा अपव्यय या दुरुपयोग हो सकता है कि जिससे मनुष्य की भलाई के स्थान पर बुराई ही होगी। स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि भौतिक उन्नाति तथा प्रगति अवश्य ही वांछनीय है, परंतु देश जिस अतीत से भविष्य की ओर अग्रसर हो रहा है, उस अतीत को अस्वीकार करना निश्चय ही निर्बुद्धिता का द्योतक है।
अतीत की नींव पर ही राष्ट्र का निर्माण करना होगा। युवा वर्ग में यदि अपने विगत इतिहास के प्रति कोई चेतना न हो, तो उनकी दशा प्रवाह में पड़े एक लंगरहीन नाव के समान होगी। ऐसी नाव कभी अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँचती। इस महत्वपूर्ण बात को सदैव स्मरण रखना होगा। मान लो कि हम लोग आगे बढ़ते जा रहे हैं, पर यदि हम किसी निर्दिष्ट लक्ष्य की ओर नहीं जा रहे हैं, तो हमारी प्रगति निष्फल रहेगी। आधुनिकता कभी-कभी हमारे समक्ष चुनौती के रूप में आ खड़ी होती है। इसलिए भी यह बात हमें विशेष रूप से याद रखनी होगी।
इसी उपाय से आधुनिकता के प्रति वर्तमान झुकाव को देश के भविष्य के लिए उपयोगी एक लक्ष्य की ओर सुपरिचालित किया जा सकता है। स्वामी ने बारंबार कहा है कि अतीत की नींव के बिना सुदृढ़ भविष्य का निर्माण नहीं हो सकता। अतीत से जीवनशक्ति ग्रहण करके ही भविष्य जीवित रहता है। जिस आदर्श को लेकर राष्ट्र अब तक बचा हुआ है, उसी आदर्श की ओर वर्तमान युवा पीढ़ी को परिचालित करना होगा, ताकि वे देश के महान अतीत के साथ सामंजस्य बनाकर लक्ष्य की ओर अग्रसर हो सकें।
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विवेकानंद जयंती : कौन मांगने वाला, कौन याचक ?
एक बार की बात है, विवेकानन्द के पिता चल बसे, तो घर में बहुत गरीबी थी और घर मे भोजन भी नही था कि माँ और बेटा दोनों भोजन कर पाएँ. तो विवेकानन्द अपनी माँ को कह कर की आज किस मित्र के घर निमंत्रण है, मै वहाँ जाता हूँ - कोई निमंत्रण नही होता था, कोई मित्र भी नही था - सड़को पर चक्कर लगा कर घर वापस लौट आते थे. अन्यथा भोजन इतना कम है की माँ उनको खिला देगी और ख़ुद भूखी रहेगी. तो भूखे घर लौट आते. हँसते हुए आते की आज तो बहुत गजब का खाना मिला, क्या चीजे बनी थी!
रामकृष्ण को पता चला तो उन्होंने कहा की तू कैसा पागल है, भगवन से क्यों नही कह देता! सब पूरा हो जाऐगा . तो विवेकानन्द ने कहा की खाने-पीने की बात भगवन से चलाऊँ तो जरा बहुत साधारण बात हो जायेगी. फिर भी रामकृष्ण ने कहा, तूं एक दफा कह कर देख! तो विवेकानन्द को भीतर भेजा. घंटा बीता, डेढ़ घंटा बीता, वे मन्दिर से बाहर आए, बड़े आन्दित थे, नाचते हुए बाहर निकले थे। रामकृष्ण ने कहा, मिल गया है?  मांग लिया न?  विवेकनद ने कहा, क्या?  रामकृष्ण ने कहा, तुझे मैंने कहा था की मांग अपनी रख देना। तू इतना आन्दित क्यों आ रहा है ? विवेकानन्द ने कहा, वह तो मैं भूल ही गया।
ऐसा कई बार हुआ। रामकृष्ण भेजते और विवेकानन्द वहाँ से बाहर आते और वे पूछते तो वे कहते, क्या? तो रामकृष्ण ने कहा, तूं पागल तो नही है! क्योंकि भीतर जब जाता है तो पक्का वचन देकर जाता है. विवेकानन्द कहते की जब भीतर जाता हूँ, तो परमात्मा से भी मांगूं, यह तो ख्याल ही नही रह जाता. देने का मन हो जाता है की अपने को दे दूँ. और जब अपने को देता हूँ तो इतना आनंद, इतना आनंद की फिर कैसी भूख, कैसी प्यास, कौन मांगने वाला, कौन याचक ?
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 उठो जागो और लक्श्य ..........
उठो जागो और लक्श्य तक पहून्चे बिना रुको मत...........
ऐसा कहना था भारत के उस महान संत स्वामी विवेकानन्द का ! किन्तु प्रिश्न यह उथत है लक्श्य क्या है? एक बदे लक्श्य को पने के लिये हमऐन कई मील के पथर पास कर्ने पडते हैं! मानव जीवन का लक्श्य तो पर्मात्मा को ही पाना है और भारत भूमि इसके लिये सब्से महान है जिसकी गोद मैं खेल खेल कर कितने हि लोगोन ने वो लक्श्य को पाया है ! तभी तो शिकागो सो लौट्ते समय उन्होने जहाज से ब्न्दर्गह पर चल्लन्ग लगा दी और इस पावन भारत की पवित्र मिट्टी मैन लोतैन मरने लगे और कहने लगे कि इतने दिन विदेश मैन रह्कर मेर शरीर अप्वित्र हो गया है और कआफ़ी देर तक उस मिट्टी मैन लोतते ब रहे ध्न्य है ऐस मत्रिभूमि से प्यर और धन्य है ऐसी भारत मां कई पावन माटी ..... उसे कोटि - कोटि प्रनाम...
उन्होने कहा था....."केवल तब और तब ही तुम हिन्दू कहलाने के लायक हो, जब उस शब्द को सुनते ही तुम्हारी रगों में से शक्ती की विद्युत तरंग दौड जाय"
किन्तु आज देश क दुर्भाग्य है कि आज पास्चत्य के अन्धानुकरन पर चल पडे हैन और ब भारत मै धर्म्परिवर्तन जैसे कुच लोगोन के जीवन क प्रमुख उद्देश्य बन ग्या है हमऐन इसे रोकना होग और भर्त को फ़िर से विश्वगुरु बनाना होगा !
शिकागो मओन उनके द्वर कहे गये कुच सुवचन....
१ "The very idea of life implies death and the very idea of pleasure implies pain. The lamp is constantly burning out, and that is its life. If you want to have life, you have to die for it every moment. Life and death are only different expressions of the same thing looked at from different standpoints. They are the falling and rising of the same wave, and the two form one whole. One looks at the "fall" side and becomes a pessimist, another looks at the "rise" side and becomes an optimist."

२ "You have not caught my fire yet--you do not understand me! You run in the old ruts of sloth and enjoyments. Down with all sloth, down with all enjoyments here or hereafter. Plunge into the fire and bring the people towards the Lord. That you may catch my fire, that you may be intensely sincere, that you may die the heroes' death on the field of battle--is the constant prayer of
We cannot add happiness to the world. Similarly, we cannot add pain to it either. The sum total of the energies of pleasure and pain displayed here on earth will be the same throughout. We just push it from this side to the other side, and from that side to this, but it will remain the same, because to remain so is its very nature. This ebb and flow, this rising and falling, is in the world's very nature; it would be as logical to hold otherwise as to say that we may have life without death."