शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

राजस्थानी का राष्ट्रगीत : धरती धोरां री













लिंक http://www.aapanorajasthan.org

कन्हैयालाल सेठिया (11 Sept. 1919- 11Nov. 2008)
   सुजानगढ़ के संपन्न घराने में जन्मे सेठियाजी ने युवावस्था में ही अपने पिताश्री को स्पष्ट व विनम्र शब्दों में बता दिया कि उन्हें व्यवसाय के चक्कर से दूर रखे, वरना उन्हें दिया पैसा डूबता जाएगा | पिताजी ने भी समझ लिया कि उनका बेटा कलम का धनी है | सेठियाजी ने जीवन भर अपने पास कभी पैसा नहीं रखा | 1939 में सुजानगढ़ जैसे पिछड़े क्षेत्र में सेठियाजी ने हरिजन सेवा का कार्य शुरु कर दिया | भंगी-मुक्ति- आंदोलन चलाया 1940 में हरिजनों के लिए विद्यालय की स्थापना की | अपने जीवन के समस्त क्रिया-कलापों, चिंतन व मंथन के संबधं में उनकी पैनी दृष्टि रही है |
  सेठियाजी ने राजस्थानी और हिन्दी के साथ उर्दू में भी लेखन किया | राजस्थानी की 14 हिन्दी की 18, उर्दू की दो पुस्तकों के इस विलक्षण रचनाकार को देश और दुनिया के कई सम्मान मिले, जिनमें पद्मश्री, साहित्य अकादमी पुरस्कार, मूर्तिदेवी पुरस्कार, राजस्थानी भाषा, साहित्य और संस्कृति अकादमी का सूर्यमल्ल मिश्रण शिखर पुरस्कार और हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग का विद्या वाचस्पति सम्मान भी शामिल है |
  मुख्यतः एक कवि के तौर पर पहचाने जाने वाले सेठियाजी की सर्वश्रेष्ठ कृतियों में उनकी राजस्थानी गद्य कृति 'गळगचिया' का उल्लेख किया जा सकता इसमें प्रकृति और जीवन के विविध प्रसंगों को आधार बनाकर लिखी गई लघुकथाएं संकलित हैं | ये कहानियां पाठक के दिल को गहरे तक छूती है |
धरती धोरां री
  धरती धोरा री !
आ तो सुरगा नै सरमावै, ईं पर देव रमण नै आवे,
ईं रो जस नर नारी गावै, धरती धोरा री !
सूरज कण कण नै चमकावै, चन्दो इमरत रस बरसावै,
तारा निछरावल कर ज्यावै, धरती धोरा री !
काळा बादलिया घहरावै, बिरखा घूघरिया घमकावै,
बिजली डरती ओला खावै, धरती धोरा री !
लुळ लुळ बाजरिया लैहरावै, मक्की झालो दे'र बुलावै,
कुदरत दोन्यूं हाथ लुटावै, धरती धोरा री !
पंछी मधरा मधरा बोलै, मिसरी मीठै सुर स्यूं घोलै,
झीणूं बादरियो पपोळै, धरती धोरां री !
नारा नागौरी हिद ताता, मदुआ ऊंट अणूंता खाथा!
ईं रे घोड़ा के बाता ? धरती धोरां री !
ईं रा फल फुलड़ा मन भावण, ईं रै धीणो आंगणा आंगण,
बाजै सगळा स्यूं बड़ भागण, धरती धोरां री !
ईं रो चित्तौड़ो गढ़ लूंठो, ओ तो रण वीरां रो खूंटो,
ईं रे जोधाणूं नौ कुंटो, धरती धोरां री !
आबू आभै रै परवाणै, लूणी गंगाजी ही जाणै,
ऊभो जयसलमेर सिंवाणै, धरती धोरां री !
ईं रो बीकाणूं गरबीलो, ईं रो अलवर जबर हठीलो,
ईं रो अजयमेर भड़कीलो, धरती धोरां री !
जैपर नगर्यां में पटराणी, कोटा बूंदी कद अणजाणी?
चम्बल कैवे आं री का'णी, धरती धोरां री !
कोनी नांव भरतपुर छोटो, घूम्यो सुरजमल रो घोटो,
खाई मात फिरंगी मोटो, धरती धोरां री !
ईं स्यूं नही माळवो न्यारो, मोबी हरियाणो है प्यारो,
मिलतो तीन्या रो उणयारो, धरती धोरां री !
ईडर पालनपुर है ईं रा, सागी जामण जाया बीरां,
औ तो टुकड़ा मरू रै जी रा, धरती धोरां री !
सौरठ बंध्यो सोरठां लारै, भेळप सिंध आप हंकारै,
मूमल बिसर्यो हेत चितारै, धरती धोरां री !
ईं पर तनड़ो मनड़ो वारां, ईं पर जीवण प्राण उवारां,
ईं री धजा उडै गिगनारां, धरती धोरां री !
ईं नै मोत्या थाल बधावां, ईं री धूल लिलाड़ लगावां,
ईं रो मोटो भाग सरावां, धरती धोरां री !
ईं रै सत री आण निभावां ईं रै पत नै नही लजावां,
ईं नै माथो भेंट चढा़वां, भायड़ कोड़ा रीं,
धरती धोरां री !
-------------------------------------------
कन्हैयालाल सेठिया
नांव : कन्हैयालाल सेठिया]शिक्षा : साधारण
जन्म स्थान : सुजानगढ़ (चरू-राज.)
कविताएं
पातल’र पीथल
धरती धोरां री !
जलम भोम
धर कूंचा धर मजळा
हळदीघाटी!
हिन्दी!

छप्योड़ी पोथियां
रमणियै रा सोरठा, मीझर, गलगचिया (गद्य-गीत), कूंकूं

पत्र-पत्रिकावां में छप्योड़ी रचनावां
मरूवाणी, राजस्थान-भारती पर अनेक दूजी पत्रिकावां रे कवितावां अर गद्य-गीत छप्या, संकलन-ग्रन्थां में कवितावां छपी

दूजी सूचनावां
हिन्दी में अनेक पोथियां छपी

सदीव रो ठिकाणो
रतन निवास, सुजानगढ़ (चूरी-राज.)
-रामस्वरूप किसान
जो स्थान आधुनिक हिंदी कविता में निराला, नागार्जुन, केदार व त्रिलोचन को है वही राजस्थानी कविता में कन्हैयालाल सेठिया को प्राप्त है। जिस तरह हिंदी के इन बड़े कवियों ने भारतीय काव्य परम्परा के दायरे में रहकर अपनी कविता को शिखर तक पहुंचाया है, ठीक उसी तरह सेठिया ने राजस्थानी कविता को अपनी माटी से जोड़े रखा है। उनका काव्य-फलक बहुत व्यापक और विस्तृत है। उनके काव्य में मरूभूमि (राजस्थान) अपने समग्र रूप मंे चित्रित हुई है। मरूप्रदेश के किसी भी आयाम को उन्होंने स्पर्श किए बिना नहीं छोड़ा। यहां का भूगोल, संस्कृति, इतिहास, राजनीति, अध्यात्म व लोकजीवन उनकी कविताओं में प्रवेश करता दिखता है। सेठिया असल में बड़े कवि हैं। राजस्थानी के जातीय कवि। क्योंकि इनकी कविताओं में सब कुछ राजस्थानी है। जिन्हें पढ़ते हुए लगता है मानो हम राजस्थान की आत्मा में डुबकी लगा रहे हैं। इनकी कविताएं पाठक को राजस्थान के अनदेखे कोनों की सैर करवाती हैं।
सेठिया ने तुकांत और अतुकांत दोनों तरह की कविताएं लिखीं। राजस्थानी चिंतन व भावबोध पर आधारित इनकी कविताएं सरलता, सहजता व सरसता के लिए विशेष जानी जाती हैं। ‘कुण जमीन रो धणी’, ‘पातळ’र पीथळ’ अर ‘धरती धोरां री’ जैसी अमर कविताएं लिखकर उन्होंने बड़े कवि होने का प्रमाण दिया है। ‘धरती धोरां री’ तो राजस्थानी का राष्ट्रगीत-सा लगता है। यह कविता विदेशों में भी बहुत सराही गई है।
सही मायनों में सेठिया जनकवि हैं। इनके पास जो लोकानुभव है, वह अद्भुत है। जिस शिद्दत से लोकपीड़ा को उन्होंने पकड़ा वह अन्यत्र विरल है। कृषक-शोषण के विरुद्ध आजादी से पूर्व, रजवाड़ों के वक्त ‘कुण जमीन रो धणी’ जैसी क्रांतिकारी कविता एक जनकवि ही लिख सकता है। इनकी कविताओं में लोक अपने सभी रूपों में आया है। लोक के अद्भुत मर्मज्ञ थे वे। अपनी राजस्थानी कविताओं के लगभग एक हजार पृष्ठों मंे लोक के भिन्न-भिन्न रूपों को जिस तरह से सेठिया ने चित्रित किया है, वह संभवतया अन्य भारतीय भाषाओं में दुर्लभ है। जिस तरह सूरदास ने बाल-मनोविज्ञान का कोना-कोना झांक कर देखा था उसी तरह सेठिया ने भी पूरे लोक को छान डाला था। प्रायः जो अधिक लिखते हैं, श्रेष्ठ नहीं लिख पाते। परन्तु सेठिया पर यह बात लागू नहीं होती। उन्होंने बहुत लिखा और श्रेष्ठ लिखा। रमणिया रा सोरठा, गळगचिया, मींझर, कूंकूं, लीलटांस, धर कूंचां धर मजलां, मायड़ रो हेलो, सबद, सतवाणी, अघोरी काळ, दीठ, लीकलकोळिया व हेमाणी इनके राजस्थानी कविता संग्रह हैं। हिंदी में भी इनके अठारह तथा उर्दू में एक संग्रह प्रकाशित हुआ। इन सब में यहां का जनजीवन बोलता है। ये पुस्तकें लोकजीवन का दस्तावेज हैं। इनमें लोगों के राग-रंग, सुख-दुख, जीवण-मरण, तीज-त्योहार सब दर्ज हैं। सेठिया राजस्थानी के रसूल हमजातोव हैं। जिन्हें अपनी मां-भाषा व मां-भूमि से उतना ही प्रेम है, जितना रसूल को अपनी मां-भाषा ‘अवार’ व मां-भूमि दागिस्तान से। मातृभाषा राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता न मिलने की पीड़ उन्हें अंत तक सालती रही। ‘मायड़ रो हेलो’ संग्रह की हर कविता में उनकी यही पीड़ प्रकट हुई है। उन्होंने इसे लोकतंत्र की हानि बताया- ‘अतै बडै जनबळ री मायड़/ भाषा राजस्थानी/ नहीं मानता इण नै दी आ/ लोकतंत्र री हाणी।’  
सेठिया ने अपनी कविताओं में राजस्थान को कमाया है। उसकी हर चीज को सुरक्षित रखने का भरसक प्रयत्न किया है। प्रलय के बाद भी बड़े कवि की कृतियों में देश सुरक्षित रहता है और सेठिया ऐसे ही बड़े कवि हैं जिनके मतीरे का रस चखने भर से हरि-रस तक फीका लगने लगता है।
-लेखक राजस्थानी के वरिष्ठ कवि-कथाकार हैं जो किसानी करते और साहित्य रचते हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें